अंग 1401

अंग
1401
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: Bhatt Gayandh
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरू गुरु गुरु करहु गुरू हरि पाईऐ ॥
उदधि गुरु गहिर गंभीर बेअंतु हरि नाम नग हीर मणि मिलत लिव लाईऐ ॥
फुनि गुरू परमल सरस करत कंचनु परस मैलु दुरमति हिरत सबदि गुरु ध्याईऐ ॥
अंम्रित परवाह छुटकंत सद द्वारि जिसु ग्यान गुर बिमल सर संत सिख नाईऐ ॥
नामु निरबाणु निधानु हरि उरि धरहु गुरू गुरु गुरु करहु गुरू हरि पाईऐ ॥३॥१५॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) सदा ‘गुरू’ ‘गुरू’ करो। गुरू के द्वारा ही हरी मिलता है। सतिगुरू गहरा गंभीर और बेअंत समुंद्र है। (उसमें) डुबकी लगाने से हरी का नाम-रूपी नग। हीरे और मणियां प्राप्त होती हैं। और। सतिगुरू की छोह (जीव के अंदर) स्वादिष्ट सुगन्धि पैदा कर देती है; सोना बना देती है। दुर्मति की मैल दूर कर देती है; (इसलिए) शबद के माध्यम से गुरू को सिमरें। जिस गुरू के दर पर सदा अमृत के चश्मे (निरंतर) बह रहे हैं। जिस गुरू के ज्ञान-रूप निर्मल सरोवर में सिख संत स्नान करते हैं। उस गुरू के द्वारा हरी के वासना-रहित नाम-खजाने को हृदय में बसाओ। सदा ‘गुरू’ ‘गुरू’ करो। गुरू के द्वारा ही हरी मिलता है। 3। 15।
गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु मंन रे ॥
जा की सेव सिव सिध साधिक सुर असुर गण तरहि तेतीस गुर बचन सुणि कंन रे ॥
फुनि तरहि ते संत हित भगत गुरु गुरु करहि तरिओ प्रहलादु गुर मिलत मुनि जंन रे ॥
तरहि नारदादि सनकादि हरि गुरमुखहि तरहि इक नाम लगि तजहु रस अंन रे ॥
दासु बेनति कहै नामु गुरमुखि लहै गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु मंन रे ॥४॥१६॥२९॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! गुरू गुरू जप। शिव जी। उसके गण। सिद्ध। साधिक। दैव। दैत्य और तैतिस करोड़ देवता। उस (गुरू) की सेवा करके और गुरू के वचन कानों से सुन के पार उतर जाते हैं। और। वह संत जन और भगत तैर जाते हैं। जो प्यार से ‘गुरू’ ‘गुरू’ करते हैं। गुरू को मिल के प्रहलाद तैर गया और कई मुनि तैर गए। हरी-रूप गुरू के द्वारा एक नाम में जुड़ के नारद और सनक आदि तैर जाते हैं; (इसलिए। हे मन ! आप भी) अन्य स्वाद छोड़ दे (और एक नाम जप)। दास नॅल् कवि अर्ज करता है कि नाम गुरू के द्वारा मिलता है। (इसलिए) हे मन ! ‘गुरू’ ‘गुरू’ जप। 4। 16। 29।
सिरी गुरू साहिबु सभ ऊपरि ॥
करी क्रिपा सतजुगि जिनि ध्रू परि ॥
स्री प्रहलाद भगत उधरीअं ॥
हस्त कमल माथे पर धरीअं ॥
अलख रूप जीअ लख्या न जाई ॥
साधिक सिध सगल सरणाई ॥
गुर के बचन सति जीअ धारहु ॥
माणस जनमु देह निस्तारहु ॥
गुरु जहाजु खेवटु गुरू गुर बिनु तरिआ न कोइ ॥
गुर प्रसादि प्रभु पाईऐ गुर बिनु मुकति न होइ ॥
गुरु नानकु निकटि बसै बनवारी ॥
तिनि लहणा थापि जोति जगि धारी ॥
लहणै पंथु धरम का कीआ ॥
अमरदास भले कउ दीआ ॥
तिनि स्री रामदासु सोढी थिरु थप्यउ ॥
हरि का नामु अखै निधि अप्यउ ॥
अप्यउ हरि नामु अखै निधि चहु जुगि गुर सेवा करि फलु लहीअं ॥
बंदहि जो चरण सरणि सुखु पावहि परमानंद गुरमुखि कहीअं ॥
परतखि देह पारब्रहमु सुआमी आदि रूपि पोखण भरणं ॥
सतिगुरु गुरु सेवि अलख गति जा की स्री रामदासु तारण तरणं ॥१॥
जिह अंम्रित बचन बाणी साधू जन जपहि करि बिचिति चाओ ॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: उस गुरू ने सारे जीवों पर मेहर की है। जिस (गुरू) ने सतियुग में ध्रुव पर कृपा की। प्रहलाद भगत को बचाया। और उसके माथे पर अपने कमल जैसे हाथ रखे। किसी भी पक्ष से अलख प्रभू के रूप को और गुरू के स्वरूप को परखा नहीं जा सकता। सारे सिद्ध और साधना करने वाले सतिगुरू की शरण आए हैं। (हे मन !) गुरू का वचन दृढ़ करके चिक्त में बसाओ। (और इस तरह) अपने मानस-जन्म और शरीर को सफल कर लो। (इस संसार सागर को तैरने के लिए) गुरू जहाज है। गुरू ही मल्लाह है। कोई प्राणी गुरू (की सहायता) के बिना नहीं तैर सका। गुरू की कृपा से ही प्रभू मिलता है। गुरू के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती। गुरू नानक अकाल-पुरख के नजदीक बसता है। उस (गुरू नानक) ने लहणे को निवाज के जगत में (ईश्वरीय) जोति प्रकाश की। लहणे ने धर्म का राह चलाया। और भल्ले (गुरू) अमरदास जी को (नाम की दाति) दी। उस (गुरू अमरदास जी) ने सोढी गुरू रामदास जी को हरी का नाम-रूप ना खत्म होने वाला खजाना बख्शा और (उनको सदा के लिए) अटल कर दिया। अपने गुरु (अमरदास) की निष्काम सेवा से उन्हें राज योग का फल प्राप्त हुआ। जो (मनुष्य गुरू के) चरणों में गिरते हैं और शरण आते हैं। वे सुख पाते हैं। वे परम-आनंद पाते हैं। और उन्हें गुरमुख कहते हैं। सतिगुरू की सेवा करके उनको (नाम-रूप) फल प्राप्त होता है। (हे भाई !) जिस गुरू (रामदास) की आत्मिक अवस्था बयान से बाहर है। जो संसार-सागर से तैराने के लिए जहाज है। उसकी सेवा करो। जिस (गुरू) के अमृत वचनों और बाणी को संत-जन हृदय में बड़े उत्साह के साथ जपते हैं और
आनंदु नित मंगलु गुर दरसनु सफलु संसारि ॥
संसारि सफलु गंगा गुर दरसनु परसन परम पवित्र गते ॥
जीतहि जम लोकु पतित जे प्राणी हरि जन सिव गुर ग्यानि रते ॥
रघुबंसि तिलकु सुंदरु दसरथ घरि मुनि बंछहि जा की सरणं ॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: सदा आनंद-मंगल (करते हैं)। उस गुरू का दर्शन संसार में (उक्तम) फल देने वाला है। संसार में सतिगुरू के दर्शन गंगा की तरह सफल हैं। गुरू के (चरन) परसने से परम पवित्र पदवी प्राप्त होती है। जो मनुष्य (पहले) पतित भी (भाव। गिरे हुए आचरण वाले) होते हैं। वे कल्याण-स्वरूप सतिगुरू के ज्ञान में रंगे जा के ईश्वर के सेवक बन के जम-लोक को जीत लेते हैं। (भाव। उनको जमों का डर नहीं रहता)। रघु की कुल में दशरथ के घर शिरोमणि और सुंदर (मेरी निगाहों में तो गुरू अमरदारस जी ही थे) जिनकी शरण आना (सारे) मुनि लोचते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) सदा ‘गुरू’ ‘गुरू’ करो।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।