उदधि गुरु गहिर गंभीर बेअंतु हरि नाम नग हीर मणि मिलत लिव लाईऐ ॥
फुनि गुरू परमल सरस करत कंचनु परस मैलु दुरमति हिरत सबदि गुरु ध्याईऐ ॥
अंम्रित परवाह छुटकंत सद द्वारि जिसु ग्यान गुर बिमल सर संत सिख नाईऐ ॥
नामु निरबाणु निधानु हरि उरि धरहु गुरू गुरु गुरु करहु गुरू हरि पाईऐ ॥३॥१५॥
जा की सेव सिव सिध साधिक सुर असुर गण तरहि तेतीस गुर बचन सुणि कंन रे ॥
फुनि तरहि ते संत हित भगत गुरु गुरु करहि तरिओ प्रहलादु गुर मिलत मुनि जंन रे ॥
तरहि नारदादि सनकादि हरि गुरमुखहि तरहि इक नाम लगि तजहु रस अंन रे ॥
दासु बेनति कहै नामु गुरमुखि लहै गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु मंन रे ॥४॥१६॥२९॥
करी क्रिपा सतजुगि जिनि ध्रू परि ॥
स्री प्रहलाद भगत उधरीअं ॥
हस्त कमल माथे पर धरीअं ॥
अलख रूप जीअ लख्या न जाई ॥
साधिक सिध सगल सरणाई ॥
गुर के बचन सति जीअ धारहु ॥
माणस जनमु देह निस्तारहु ॥
गुरु जहाजु खेवटु गुरू गुर बिनु तरिआ न कोइ ॥
गुर प्रसादि प्रभु पाईऐ गुर बिनु मुकति न होइ ॥
गुरु नानकु निकटि बसै बनवारी ॥
तिनि लहणा थापि जोति जगि धारी ॥
लहणै पंथु धरम का कीआ ॥
अमरदास भले कउ दीआ ॥
तिनि स्री रामदासु सोढी थिरु थप्यउ ॥
हरि का नामु अखै निधि अप्यउ ॥
अप्यउ हरि नामु अखै निधि चहु जुगि गुर सेवा करि फलु लहीअं ॥
बंदहि जो चरण सरणि सुखु पावहि परमानंद गुरमुखि कहीअं ॥
परतखि देह पारब्रहमु सुआमी आदि रूपि पोखण भरणं ॥
सतिगुरु गुरु सेवि अलख गति जा की स्री रामदासु तारण तरणं ॥१॥
जिह अंम्रित बचन बाणी साधू जन जपहि करि बिचिति चाओ ॥
संसारि सफलु गंगा गुर दरसनु परसन परम पवित्र गते ॥
जीतहि जम लोकु पतित जे प्राणी हरि जन सिव गुर ग्यानि रते ॥
रघुबंसि तिलकु सुंदरु दसरथ घरि मुनि बंछहि जा की सरणं ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) सदा ‘गुरू’ ‘गुरू’ करो।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।