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1401
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गुरू गुरु गुरु करहु गुरू हरि पाईऐ ॥
गुरू गुरु गुरु करहु गुरू हरि पाईऐ ॥
उदधि गुरु गहिर गंभीर बेअंतु हरि नाम नग हीर मणि मिलत लिव लाईऐ ॥
फुनि गुरू परमल सरस करत कंचनु परस मैलु दुरमति हिरत सबदि गुरु ध्याईऐ ॥
अंम्रित परवाह छुटकंत सद द्वारि जिसु ग्यान गुर बिमल सर संत सिख नाईऐ ॥
नामु निरबाणु निधानु हरि उरि धरहु गुरू गुरु गुरु करहु गुरू हरि पाईऐ ॥3॥15॥
उदधि गुरु गहिर गंभीर बेअंतु हरि नाम नग हीर मणि मिलत लिव लाईऐ ॥
फुनि गुरू परमल सरस करत कंचनु परस मैलु दुरमति हिरत सबदि गुरु ध्याईऐ ॥
अंम्रित परवाह छुटकंत सद द्वारि जिसु ग्यान गुर बिमल सर संत सिख नाईऐ ॥
नामु निरबाणु निधानु हरि उरि धरहु गुरू गुरु गुरु करहु गुरू हरि पाईऐ ॥3॥15॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) सदा 'गुरू' 'गुरू' करें। गुरू के द्वारा ही हरी मिलता है। सतिगुरू गहरा गंभीर और बेअंत समुंद्र है। (उसमें) डुबकी लगाने से हरी का नाम-रूपी नग। हीरे और मणियां प्राप्त होती हैं। और। सतिगुरू की छोह (जीव के अंदर) स्वादिष्ट सुगन्धि पैदा कर देती है; सोना बना देती है। दुर्मति की मैल दूर कर देती है; (इसलिए) शबद के माध्यम से गुरू को सिमरें। जिस गुरू के दर पर सदा अमृत के चश्मे (निरंतर) बह रहे हैं। जिस गुरू के ज्ञान-रूप निर्मल सरोवर में सिख संत स्नान करते हैं। उस गुरू के द्वारा हरी के वासना-रहित नाम-खजाने को हृदय में बसाएँ। सदा 'गुरू' 'गुरू' करें। गुरू के द्वारा ही हरी मिलता है। 3। 15।
गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु मंन रे ॥
गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु मंन रे ॥
जा की सेव सिव सिध साधिक सुर असुर गण तरहि तेतीस गुर बचन सुणि कंन रे ॥
फुनि तरहि ते संत हित भगत गुरु गुरु करहि तरिओ प्रहलादु गुर मिलत मुनि जंन रे ॥
तरहि नारदादि सनकादि हरि गुरमुखहि तरहि इक नाम लगि तजहु रस अंन रे ॥
दासु बेनति कहै नामु गुरमुखि लहै गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु मंन रे ॥4॥16॥29॥
जा की सेव सिव सिध साधिक सुर असुर गण तरहि तेतीस गुर बचन सुणि कंन रे ॥
फुनि तरहि ते संत हित भगत गुरु गुरु करहि तरिओ प्रहलादु गुर मिलत मुनि जंन रे ॥
तरहि नारदादि सनकादि हरि गुरमुखहि तरहि इक नाम लगि तजहु रस अंन रे ॥
दासु बेनति कहै नामु गुरमुखि लहै गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु मंन रे ॥4॥16॥29॥
हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! गुरू गुरू जपें। शिव जी, उसके गण, सिद्ध, साधिक, दैव, दैत्य और तैतिस करोड़ देवता। उस (गुरू) की सेवा करके और गुरू के वचन कानों से सुन के पार उतर जाते हैं। और। वह संत जन और भगत तैर जाते हैं। जो प्यार से 'गुरू' 'गुरू' करते हैं। गुरू को मिल के प्रहलाद तैर गया और कई मुनि तैर गए। हरी-रूप गुरू के द्वारा एक नाम में जुड़ के नारद और सनक आदि तैर जाते हैं; (इसलिए। हे मन ! आप भी) अन्य स्वाद छोड़ दें (और एक नाम जपें)। दास नॅल् कवि अर्ज करता है कि नाम गुरू के द्वारा मिलता है। (इसलिए) हे मन ! 'गुरू' 'गुरू' जपें। 4। 16। 29।
सिरी गुरू साहिबु सभ ऊपरि ॥
सिरी गुरू साहिबु सभ ऊपरि ॥
करी क्रिपा सतजुगि जिनि ध्रू परि ॥
स्री प्रहलाद भगत उधरीअं ॥
हस्त कमल माथे पर धरीअं ॥
अलख रूप जीअ लख्या न जाई ॥
साधिक सिध सगल सरणाई ॥
गुर के बचन सति जीअ धारहु ॥
माणस जनमु देह निस्तारहु ॥
गुरु जहाजु खेवटु गुरू गुर बिनु तरिआ न कोइ ॥
गुर प्रसादि प्रभु पाईऐ गुर बिनु मुकति न होइ ॥
गुरु नानकु निकटि बसै बनवारी ॥
तिनि लहणा थापि जोति जगि धारी ॥
लहणै पंथु धरम का कीआ ॥
अमरदास भले कउ दीआ ॥
तिनि स्री रामदासु सोढी थिरु थप्यउ ॥
हरि का नामु अखै निधि अप्यउ ॥
अप्यउ हरि नामु अखै निधि चहु जुगि गुर सेवा करि फलु लहीअं ॥
बंदहि जो चरण सरणि सुखु पावहि परमानंद गुरमुखि कहीअं ॥
परतखि देह पारब्रहमु सुआमी आदि रूपि पोखण भरणं ॥
सतिगुरु गुरु सेवि अलख गति जा की स्री रामदासु तारण तरणं ॥1॥
जिह अंम्रित बचन बाणी साधू जन जपहि करि बिचिति चाओ ॥
करी क्रिपा सतजुगि जिनि ध्रू परि ॥
स्री प्रहलाद भगत उधरीअं ॥
हस्त कमल माथे पर धरीअं ॥
अलख रूप जीअ लख्या न जाई ॥
साधिक सिध सगल सरणाई ॥
गुर के बचन सति जीअ धारहु ॥
माणस जनमु देह निस्तारहु ॥
गुरु जहाजु खेवटु गुरू गुर बिनु तरिआ न कोइ ॥
गुर प्रसादि प्रभु पाईऐ गुर बिनु मुकति न होइ ॥
गुरु नानकु निकटि बसै बनवारी ॥
तिनि लहणा थापि जोति जगि धारी ॥
लहणै पंथु धरम का कीआ ॥
अमरदास भले कउ दीआ ॥
तिनि स्री रामदासु सोढी थिरु थप्यउ ॥
हरि का नामु अखै निधि अप्यउ ॥
अप्यउ हरि नामु अखै निधि चहु जुगि गुर सेवा करि फलु लहीअं ॥
बंदहि जो चरण सरणि सुखु पावहि परमानंद गुरमुखि कहीअं ॥
परतखि देह पारब्रहमु सुआमी आदि रूपि पोखण भरणं ॥
सतिगुरु गुरु सेवि अलख गति जा की स्री रामदासु तारण तरणं ॥1॥
जिह अंम्रित बचन बाणी साधू जन जपहि करि बिचिति चाओ ॥
हिन्दी अर्थ: उस गुरू ने सारे जीवों पर मेहर की है। जिस (गुरू) ने सतियुग में ध्रुव पर कृपा की। प्रहलाद भगत को बचाया। और उसके माथे पर अपने कमल जैसे हाथ रखे। किसी भी पक्ष से अलख प्रभू के रूप को और गुरू के स्वरूप को परखा नहीं जा सकता। सारे सिद्ध और साधना करने वाले सतिगुरू की शरण आए हैं। (हे मन !) गुरू का वचन दृढ़ करके चित्त में बसाएँ। (और इस तरह) अपने मानस-जन्म और शरीर को सफल कर लें। (इस संसार सागर को तैरने के लिए) गुरू जहाज है। गुरू ही मल्लाह है। कोई प्राणी गुरू (की सहायता) के बिना नहीं तैर सका। गुरू की कृपा से ही प्रभू मिलता है। गुरू के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती। गुरू नानक अकाल-पुरख के नजदीक बसता है। उस (गुरू नानक) ने लहणे को निवाज के जगत में (ईश्वरीय) जोति प्रकाश की। लहणे ने धर्म का राह चलाया। और भल्ले (गुरू) अमरदास जी को (नाम की दाति) दी। उस (गुरू अमरदास जी) ने सोढी गुरू रामदास जी को हरी का नाम-रूप ना खत्म होने वाला खजाना बख्शा और (उनको सदा के लिए) अटल कर दिया। अपने गुरु (अमरदास) की निष्काम सेवा से उन्हें राज योग का फल प्राप्त हुआ। जो (मनुष्य गुरू के) चरणों में गिरते हैं और शरण आते हैं। वे सुख पाते हैं। वे परम-आनंद पाते हैं। और उन्हें गुरमुख कहते हैं। सतिगुरू की सेवा करके उनको (नाम-रूप) फल प्राप्त होता है। (हे भाई !) जिस गुरू (रामदास) की आत्मिक अवस्था बयान से बाहर है। जो संसार-सागर से तैराने के लिए जहाज है। उसकी सेवा करें। जिस (गुरू) के अमृत वचनों और बाणी को संत-जन हृदय में बड़े उत्साह के साथ जपते हैं और
आनंदु नित मंगलु गुर दरसनु सफलु संसारि ॥
आनंदु नित मंगलु गुर दरसनु सफलु संसारि ॥
संसारि सफलु गंगा गुर दरसनु परसन परम पवित्र गते ॥
जीतहि जम लोकु पतित जे प्राणी हरि जन सिव गुर ग्यानि रते ॥
रघुबंसि तिलकु सुंदरु दसरथ घरि मुनि बंछहि जा की सरणं ॥
संसारि सफलु गंगा गुर दरसनु परसन परम पवित्र गते ॥
जीतहि जम लोकु पतित जे प्राणी हरि जन सिव गुर ग्यानि रते ॥
रघुबंसि तिलकु सुंदरु दसरथ घरि मुनि बंछहि जा की सरणं ॥
हिन्दी अर्थ: सदा आनंद-मंगल (करते हैं)। उस गुरू का दर्शन संसार में (उक्तम) फल देने वाला है। संसार में सतिगुरू के दर्शन गंगा की तरह सफल हैं। गुरू के (चरन) परसने से परम पवित्र पदवी प्राप्त होती है। जो मनुष्य (पहले) पतित भी (भाव। गिरे हुए आचरण वाले) होते हैं। वे कल्याण-स्वरूप सतिगुरू के ज्ञान में रंगे जा के ईश्वर के सेवक बन के जम-लोक को जीत लेते हैं। (भाव। उनको जमों का डर नहीं रहता)। रघु की कुल में दशरथ के घर शिरोमणि और सुंदर (मेरी निगाहों में तो गुरू अमरदारस जी ही थे) जिनकी शरण आना (सारे) मुनि लोचते हैं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भट्ट गयन्द।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1401 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।