ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: जो हरी का नाम गुरू नानक देव जी ने उचार के बाँटा और संसारी जीवों की बिरती संसार से पलट दी। वही अॅछल नाम। वही भगतों को संसार से पार उतारने वाला नाम गुरू अमरदास जी के हृदय में प्रकट हुआ।
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: उसी नाम को जख्। किन्नर। साधिक सिद्ध और शिव जी समाधी लगा के सिमर रहे हैं। उसी नाम को अनेकों नक्षत्र। ध्रुव भगत के मण्डल। नारद आदिक और प्रहलाद आदिक श्रेष्ठ भगत जप रहे हैं। चँद्रमा और सूरज उसी हरी-नाम को लोच रहे हैं। जिसने पत्थरों के ढेर तैरा दिए। वही अछॅल नाम। और भगतों को संसार से तैराने वाला नाम सतिगुरू अमरदास जी के हृदय में प्रकट हुआ। 2।
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: नौ नाथ। शिव जी। सनक आदिक उसी पवित्र नाम को सिमर के तैर गए; चौरासी सिद्ध व अन्य ज्ञानवान उसी रंग में रंगे हुए हैं; (उसी नाम की बरकति से) अंबरीक संसार-सागर से पार लांघ गया। उसी नाम को ऊधव। अक्रूर। त्रिलोचन और नामदेव भगत ने सिमरा। (उसी नाम ने) कलियुग में कबीर के पाप दूर किए। वही अछॅल नाम। और भगत जनों को संसार को पार कराने वाला नाम। सतिगुरू अमरदास जी को अनुभव हुआ। 3।
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: तैंतीस करोड़ देवते उसी नाम में जुड़ के (अकाल-पुरख को) सिमर रहे हैं। (वही नाम) जतियों व बड़े-बड़े तपियों के मन में बस रहा है। उसी नाम को सिमर के अकाल-पुरख के चरणों में जुड़ने के कारण भीष्म-पितामह के चिक्त में अमृत चूआ। उसी नाम में लग के। गंभीर और ऊँची मति वाले सतिगुरू के द्वारा। पूर्ण श्रद्धा के सदका। संगत का उद्धार हो रहा है। वही अछॅल नाम और भगत जनों को संसार-सागर से तैराने वाला नाम गुरू अमरदास जी के दिल में प्रकट हुआ। 4।
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: (जैसे) स्वर्ग के वृक्ष (मौलसरी) की शाखाएं (पसर के सुगंधी बिखेरती हैं)। (वैसे ही) परमात्मा के नाम की वडिआई-रूप सूरज की किरण के जगत में (प्रकाश करने के कारण) उक्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम देश में (भाव। हर तरफ) लोक नाम का यश उचार रहे हैं। वही जनम सकार्थ है जिस में परमात्मा का नाम हृदय में बसे। इस नाम की देवता। मनुष्य। गण। गंधर्व और छह भेष कामना करते हैं। तेज भान जी के पुत्र। भल्लों की कुल में अग्रणीय (गुरू अमरदास जी को) कल् कवि हाथ जोड़ के आराधता है (और कहता है) – हे गुरू अमरदास ! भगतों का जनम-मरण काटने वाला वही नाम तूने पा लिया है। 5।
नामु धिआवहि देव तेतीस अरु साधिक सिध नर नामि खंड ब्रहमंड धारे ॥ जह नामु समाधिओ हरखु सोगु सम करि सहारे ॥ नामु सिरोमणि सरब मै भगत रहे लिव धारि ॥ सोई नामु पदारथु अमर गुर तुसि दीओ करतारि ॥६॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: परमात्मा के नाम को तैंतिस करोड़ देवते साधिक-सिद्ध और मनुष्य ध्याते हैं। हरी के नाम ने सारे ही खंड-ब्रहिमण्ड (भाव। सारे लोक) टिकाए हुए हैं। जिन्होंने हरी नाम को सिमरा है। उन्होंने खुशी और चिंता को एक-समान सहा है। (सारे पदार्थों में से) सर्व-व्यापक हरी का नाम-पदार्थ उक्तम है। भगत जन इस नाम में बिरती जोड़ के टिक रहे हैं। हे गुरू अमरदास ! वही पदार्थ करतार ने प्रसन्न हो के (आपको) दिया है।
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: (गुरू अमरदास) सत्य का सूरमा है (भाव। नाम का पूरन रसिया)। सीलवंत है। शांत-स्वभाव में बलवान है। बड़ी संगति वाला है। गहरी मति वाला है और निर्वैर हरी में जुड़ा हुआ है; जिसका (भाव। गुरू अमरदास जी का) धुर दरगाह से धाीरज रूपी झण्डा बैकुंठ के पुल पर बना हुआ है (भाव। गुरू अमरदास जी की धाीरज से शिक्षा ले के सेवक जन संसार से पार लांघ के मुक्त होते हैं। गुरू अमरदास जी का धीरज सेवकों का। झण्डा-रूप हो के। अगवाई कर रहा है)। जिस (गुरू अमरदास जी) का करतार से संजोग बना हुआ है। उस प्यार-स्वरूप गुरू को संत-जन परसते हैं। सतिगुरू को सेव के सुख पाते हैं। क्योंकि गुरू अमरदास जी ने उनको इस योग्य बना दिया। 7।
नामु नावणु नामु रस खाणु अरु भोजनु नाम रसु सदा चाय मुखि मिस्ट बाणी ॥ धनि सतिगुरु सेविओ जिसु पसाइ गति अगम जाणी ॥ कुल संबूह समुधरे पायउ नाम निवासु ॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: (गुरू अमरदास के लिए) नाम ही स्नान है। नाम ही रसों का खाना-पीना है। नाम का रस ही (उनके लिए) उत्साह देने वाला है और नाम ही (उनके) मुख में मीठे वचन हैं। गुरू (अंगद देव) धन्य हैं (जिनकी गुरू अमरदास जी ने) सेवा की है और जिस की कृपा से उन्होंने अपहुँच प्रभू का भेद पाया है। (गुरू अमरदास जी ने) कई कुलों का उद्धार कर दिया। (आपने अपने हृदय में) नाम का निवास प्राप्त किया है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो हरी का नाम गुरू नानक देव जी ने उचार के बाँटा और संसारी जीवों की बिरती संसार से पलट दी।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।