भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: (हे गुरू अंगद !) आपकी बिरती सदा अकाल-पुरख में टिकी रहती है। करणी में आप स्वतंत्र है (भाव। आपके ऊपर माया आदि का बल नहीं पड़ सकता)। जैसे फल वाला वृक्ष झुकता है और दुख सहता है। वैसे ही (गुरू अंगद की) निर्मल विचार है। (भाव। गुरू अंगद भी इसी तरह झुकता है। और संसारी जीवों की खातिर तकलीफें सहता है)। (हे गुरू अंगद !) तूने ये भेद पा लिया है कि आश्चर्यजनक और अलख हरी सर्व-व्यापक है। अमृत-भरी सुंदर बाणी-रूप किरण के द्वारा (संसारी जीवों के हृदय में) आप सहज स्वभाव ही अमृत सींच रहा है। (हे गुरू अंगद !) तूने गुरू (नानक देव जी) वाला दर्जा हासिल कर लिया है। और सत-संतोख को ग्रहण कर लिया है। कल्सहार (कवि) ऊँचा पुकार के कहता है- ‘जिन जनों को लहणा जी का दर्श्न हुआ है। उन्होंने अकाल-पुरख को परस लिया है’। 6।
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: (हे गुरू अंगद !) तूने अपने मन में श्रद्धा प्राप्त की है। हजूर (गुरू नानक जी) ने आपको गंभीर (हरी) में पहुँच दे दी है। नाश करने वाला जहर (भाव। माया का मोह) आपके शरीर में से भाग गया है और तूने अंतरात्मे नाम-अमृत पी लिया है। जिस अकाल-पुरख ने अपनी सक्ता (सारे) जुगों में रखी हुई है। उसका प्रकाश (गुरू अंगद के) हृदय में जाग उठा है। अकाल-पुरख एक-रस सबके अंदर व्याप रहा है। उसमें सतिगुरू (अंगद देव) आत्मिक अडोलता में समाधि जोड़े रखता है। कल्सहार कहता है- ‘मैं अपनी जीभ से सदा प्रेम में और आत्मिक अडोलता में (टिक के) उस लहणे जी का यश उचारता हूँ। जो उदार-चित्त वाला है। जो गरीबी दूर करने वाला है। और जिसको देख के पाप त्राहि जाते हैं। 7।
नामु अवखधु नामु आधारु अरु नामु समाधि सुखु सदा नाम नीसाणु सोहै ॥ रंगि रतौ नाम सिउ कल नामु सुरि नरह बोहै ॥ नाम परसु जिनि पाइओ सतु प्रगटिओ रवि लोइ ॥ दरसनि परसिऐ गुरू कै अठसठि मजनु होइ ॥8॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: अकाल पुरख का नाम (सारे रोगों की) दवाई है। नाम (सबका) आसरा है और नाम ही समाधि वाला आनंद है; अकाल-पुरख के नाम का झण्डा सदा शोभ रहा है। हे कल्सहार ! हरी-नाम की बरकति से ही (गुरू अंगद) रंग में रंगा हुआ है। यह नाम देवताओं और मनुष्यों को सुगंधित कर रहा है। जिस मनुष्य के नाम की छोह (गुरू अंगद देव जी) से प्राप्त की है। उसका सत धर्म-रूप सूरज संसार में चमक पड़ा है। सतिगुरू (अंगद देव जी) का दर्शन करने से अढ़सठ तीर्थों का स्नान हो जाता है। 8।
सचु तीरथु सचु इसनानु अरु भोजनु भाउ सचु सदा सचु भाखंतु सोहै ॥ सचु पाइओ गुर सबदि सचु नामु संगती बोहै ॥ जिसु सचु संजमु वरतु सचु कबि जन कल वखाणु ॥ दरसनि परसिऐ गुरू कै सचु जनमु परवाणु ॥9॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: सदा-स्थिर हरी का नाम ही (गुरू अंगद देव जी का) तीर्थ है। नाम ही स्नान है और नाम और प्यार ही (उनका) भोजन है। सदा-स्थिर प्रभू का नाम उचारते हुए ही (गुरू अंगद जी) शोभा दे रहे हैं। ये सच्चा नाम संगतों को सुगंधित करता है। (गुरू अंगद देव जी ने) अकाल-पुरख का नाम गुरू (नानक देव जी) के शबद द्वारा प्राप्त किया है। हे दास कलसहार कवि ! कह-“जिस (गुरू अंगद देव जी) का संयम अकाल-पुरख का नाम है और वरत भी हरी का नाम ही है। उस गुरू के दर्शन करने से सदा-स्थिर हरी-नाम प्राप्त हो जाता है और मनुष्य का जनम सफल हो जाता है”। 9।
अमिअ द्रिसटि सुभ करै हरै अघ पाप सकल मल ॥ काम क्रोध अरु लोभ मोह वसि करै सभै बल ॥ सदा सुखु मनि वसै दुखु संसारह खोवै ॥ गुरु नव निधि दरीआउ जनम हम कालख धोवै ॥ सु कहु टल गुरु सेवीऐ अहिनिसि सहजि सुभाइ ॥ दरसनि परसिऐ गुरू कै जनम मरण दुखु जाइ ॥10॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: (गुरू अंगद देव जी जिस पर) आत्मिक जीवन देने वाली भली निगाह करता है। (उसके) पाप और सारी मैलें दूर कर देता है। और काम। क्रोध। लोभ। मोह और अहंकार- ये सारे उसके काबू में कर देता है। (गुरू अंगद के) मन में सदा सुख बस रहा है। (वह) संसार का दुख दूर करता है। सतिगुरू नौ-निधियों का दरिया है; हमारे जन्मों (-जन्मों) की कालिख धोता है। हे कल्सहार ! कह- “(ऐसे) गुरू (अंगद देव जी) की दिन-रात आत्मिक अडोलता और प्रेम में टिक के सेवा करनी चाहिए। (ऐसे) सतिगुरू के दर्शन करने से जनम-मरण के दुख काटे जाते हैं”। 10।
सवईए महले तीजे के 3 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सोई पुरखु सिवरि साचा जा का इकु नामु अछलु संसारे ॥ जिनि भगत भवजल तारे सिमरहु सोई नामु परधानु ॥ तितु नामि रसिकु नानकु लहणा थपिओ जेन स्रब सिधी ॥ कवि जन कल्य सबुधी कीरति जन अमरदास बिस्तरीया ॥ कीरति रवि किरणि प्रगटि संसारह साख तरोवर मवलसरा ॥ उतरि दखिणहि पुबि अरु पस्चमि जै जै कारु जपंथि नरा ॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: गुरू अमरदास जी की उस्तति में उचारे हुए सवईऐ। वह परब्रह्म केवल एक (ओंकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। उस सदा-स्थिर अकाल-पुरख को सिमर; जिसका एक नाम संसार में अछल है। जिस नाम ने भगतों को संसार-सागर से पार उतारा है। उस उक्तम नाम को सिमरो। उसी नाम में (गुरू) नानक आनंद ले रहा है। (उसी नाम द्वारा) लहणा जी टिक गए। जिसके कारण सारी सिद्धियाँ उन्हें प्राप्त हुई। हे कल् कवि ! (उसी की बरकति से) उच्च बुद्धि वाले गुरू अमरदास जी की शोभा लोगों में पसर रही है। (जैसे) मौलसरी के श्रेष्ठ वृक्ष की शाखाएं (बिखर के सुगन्धि बिखेरती हैं। वैसे ही गुरू अमरदास की) शोभा-रूप सूरज की किरण के जगत में प्रकट होने के कारण पहाड़। उक्तर-दक्षिण-पुरब-पश्चिम (भाव। हर तरफ) लोग गुरू अमरदास जी की जय-जयकार कर रहे हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे गुरू अंगद !) आपकी बिरती सदा अकाल-पुरख में टिकी रहती है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।