अंग 1402

अंग
1402
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: Bhatt Gayandh
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सतिगुरु गुरु सेवि अलख गति जा की स्री रामदासु तारण तरणं ॥२॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: श्री गुरू (रामदास जी) की सेवा करो (शरण पड़ो) जिसकी आत्मिक अवस्था बयान से बाहर है। और जो तैराने के लिए जहाज है। 2।
संसारु अगम सागरु तुलहा हरि नामु गुरू मुखि पाया ॥
जगि जनम मरणु भगा इह आई हीऐ परतीति ॥
परतीति हीऐ आई जिन जन कै तिन॑ कउ पदवी उच भई ॥
तजि माइआ मोहु लोभु अरु लालचु काम क्रोध की ब्रिथा गई ॥
अवलोक्या ब्रहमु भरमु सभु छुटक्या दिब्य द्रिस्टि कारण करणं ॥
सतिगुरु गुरु सेवि अलख गति जा की स्री रामदासु तारण तरणं ॥३॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: संसार अथाह समुंद्र है। और हरी का नाम (इसमें से पार लगाने के लिए) तुलहा है; (जिस मनुष्य ने) गुरू के द्वारा (ये तुलहा) प्राप्त कर लिया है और जिसको हृदय में यकीन बँध गया है। उसका जगत में जनम-मरण समाप्त हो जाता है। जिन मनुष्यों के हृदय में यकीन बँध गया है। उनको ऊँची पदवी मिली है; माया का मोह। लोभ और लालच त्याग के (भाव। उन्होंने त्याग दिया है और) उनकी काम-क्रोध की पीड़ा दूर हो गई है। जिस मनुष्य ने सृष्टि के मूल। दिव्य दृष्टि वाले हरी- (रूप गुरू रामदास जी) को देखा है। उसका सारा भ्रम मिट गया है। (इसलिए) गुरू रामदास जी की सेवा करो। जिसकी आत्मिक अवस्था बयान से परे है। और जो पार लगने के लिए जहाज है। 3।
परतापु सदा गुर का घटि घटि परगासु भया जसु जन कै ॥
इकि पड़हि सुणहि गावहि परभातिहि करहि इस्नानु ॥
इस्नानु करहि परभाति सुध मनि गुर पूजा बिधि सहित करं ॥
कंचनु तनु होइ परसि पारस कउ जोति सरूपी ध्यानु धरं ॥
जगजीवनु जगंनाथु जल थल महि रहिआ पूरि बहु बिधि बरनं ॥
सतिगुरु गुरु सेवि अलख गति जा की स्री रामदासु तारण तरणं ॥४॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू का प्रताप सदा हरेक घट में। और सतिगुरू का यश दासों के हृदय में प्रकट हो रहा है। कई मनुष्य (गुरू का यश) पढ़ते हैं। सुनते हैं और गाते हैं और (उस ‘यश’-रूप जल में) अमृत वेला में स्नान करते हैं। (कई मनुष्य गुरू के यश-रूप जल में) अमृत वेला में डुबकी लगाते हैं। और शुद्ध हृदय से मर्यादा अनुसार गुरू की पूजा करते हैं। जोति-रूप गुरू का ध्यान धरते हैं। और पारस-गुरू को छू के उनका शरीर कंचन (की तरह शुद्ध) हो जाता है। जो (गुरू) उस ‘जगत के जीवन’ और ‘जगत के नाथ’ हरी का रूप है जो (हरी) कई रंगों में जलों में थलों में व्यापक है। सतिगुरू रामदास जी की सेवा करो। (शरण पड़ो) जिसकी आत्मिक अवस्था कथन से परे है। और जो पार लगने के लिए जहाज है। 4।
जिनहु बात निस्चल ध्रूअ जानी तेई जीव काल ते बचा ॥
तिन॑ तरिओ समुद्रु रुद्रु खिन इक महि जलहर बिंब जुगति जगु रचा ॥
कुंडलनी सुरझी सतसंगति परमानंद गुरू मुखि मचा ॥
सिरी गुरू साहिबु सभ ऊपरि मन बच क्रंम सेवीऐ सचा ॥५॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: जिन (मनुष्यों ने) गुरू के वचन ध्रुव भगत की तरह दृढ़ करके माने हैं। वे मनुष्य काल (के भय) से बच गए हैं। भयानक संसार-समुंद्र उन्होंने एक पल में पार कर लिया है। जगत को वह बादलों की छाया की तरह रचा हुआ (समझते हैं)। उनके मन की उलझनें सत्संग में खुलती हैं। वे परमानंद पाते हैं और गुरू की बरकति से उनका यश प्रकटता है। (इसलिए इस तरह के) सच्चे गुरू को मन वचन और कर्मों द्वारा पूजना चाहिए; यह सतिगुरू सबसे ऊँचा है। 5।
वाहिगुरू वाहिगुरू वाहिगुरू वाहि जीउ ॥
कवल नैन मधुर बैन कोटि सैन संग सोभ कहत मा जसोद जिसहि दही भातु खाहि जीउ ॥
देखि रूपु अति अनूपु मोह महा मग भई किंकनी सबद झनतकार खेलु पाहि जीउ ॥
काल कलम हुकमु हाथि कहहु कउनु मेटि सकै ईसु बंम्यु ग्यानु ध्यानु धरत हीऐ चाहि जीउ ॥
सति साचु स्री निवासु आदि पुरखु सदा तुही वाहिगुरू वाहिगुरू वाहिगुरू वाहि जीउ ॥१॥६॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: वाह वाह ! हे प्यारे ! हे गुरू ! सदके ! आपके कमल जैसे नयन हैं। (मेरे वास्ते तो आप ही है जिसको) माँ यशोदा कहती थी- ‘हे लाल (आ)। दही चावल खा’। जब आप खेल मचाता था। आपकी तगाड़ी की आवाज आती थी। आपके अति सुंदर मुख को देख के (माँ यशोदा) आपके प्यार में मगन में हैं जाती थी। (हे भाई !) काल की कलम और हुकम (गुरू के ही) हाथ में हैं। बताओ। कौन (गुरू के हुकम को) मिटा सकता है। शिव और ब्रहमा (गुरू के बख्शे हुए) ज्ञान और ध्यान को अपने हृदय में धारण करना चाहते हैं। हे गुरू ! आप आश्चर्य है। आप सति-स्वरूप है। आप अटल है। आप ही लक्ष्मी का ठिकाना है। आप ही आदि पुरख है और सदा-स्थिर है। 6।
राम नाम परम धाम सुध बुध निरीकार बेसुमार सरबर कउ काहि जीउ ॥
सुथर चित भगत हित भेखु धरिओ हरनाखसु हरिओ नख बिदारि जीउ ॥
संख चक्र गदा पदम आपि आपु कीओ छदम अपरंपर पारब्रहम लखै कउनु ताहि जीउ ॥
सति साचु स्री निवासु आदि पुरखु सदा तुही वाहिगुरू वाहिगुरू वाहिगुरू वाहि जीउ ॥२॥७॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: हे सतिगुरू ! आपका ही नाम ‘राम’ है। और ठिकाना ऊँचा है। आप शुद्ध ज्ञान वाला है। (मेरे वास्ते तो आप ही है जिसने) भगत (प्रहलाद) की खातिर (नरसिंघ का) रूप धारण किया था। और हर्णाक्षस को नाखूनों से चीर दिया था। हे सतिगुरू ! (मेरे लिए तो आप ही वह है जिसके) शंख। चक्र। गदा और पदम (चिन्ह हैं); (मेरे लिए तो आप ही वह है जिसने) अपने आप को (बावन-रूप) छल बनाया था। आप बेअंत पारब्रहम (का रूप) है। आपके उस रूप को कौन पहचान सकता है। हे गुरू ! आप आश्चर्य है। आप अटल है। आप ही लक्ष्मी का ठिकाना है। आप आदि पुरख है। और सदा-स्थिर है। 2। 7।
पीत बसन कुंद दसन प्रिअ सहित कंठ माल मुकटु सीसि मोर पंख चाहि जीउ ॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: हे सतिगुरू ! (मेरे लिए तो) पीले वस्त्रों वाला (कृष्ण) आप ही है। (जिसके) जिसके कुंद जैसे सफेद दाँत हैं। (जो) अपनी प्यारी (राधिका) के साथ है; (जिसके) गले में माला है। मोर के पंखों का मुकुट (जिसने) अपने मस्तक पर चाव से (पहना हुआ है)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्री गुरू (रामदास जी) की सेवा करो (शरण पड़ो) जिसकी आत्मिक अवस्था बयान से बाहर है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।