अंग 1391

अंग
1391
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: Bhatt Kall Sahaar
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सवईए महले दूजे के 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सोई पुरखु धंनु करता कारण करतारु करण समरथो ॥
सतिगुरू धंनु नानकु मसतकि तुम धरिओ जिनि हथो ॥
त धरिओ मसतकि हथु सहजि अमिउ वुठउ छजि सुरि नर गण मुनि बोहिय अगाजि ॥
मारिओ कंटकु कालु गरजि धावतु लीओ बरजि पंच भूत एक घरि राखि ले समजि ॥
जगु जीतउ गुर दुआरि खेलहि समत सारि रथु उनमनि लिव राखि निरंकारि ॥
कहु कीरति कल सहार सपत दीप मझार लहणा जगत्र गुरु परसि मुरारि ॥1॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: गुरू अंगद देव जी की उस्तति में उचारे गए सवईऐ। वह परब्रह्म केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। धन्य है वह करतार सर्व-व्यापक हरी। जो इस सृष्टि का मूल कारण है। सृजने वाला है और समर्थता वाला है। धन्य है सतिगुरू नानक। जिस ने (हे गुरू अंगद !) आपके माथे पर (अपना) हाथ रखा है। तब सहजे ही (गुरू नानक ने आपके) माथे पर हाथ रखा। (आपके हृदय में) नाम-अमृत छहबर लगा के बस गया। जिसकी बरकति से देवतागण। मनुष्य। गण और ऋषि-मुनि प्रत्यक्ष तौर पर भीग गए। (हे गुरू अंगद !) तूने दुखदाई काल को अपना बल दिखा के नाश कर दिया। अपने मन को भटकने से रोक लिया। और कामादिक पाँचों को ही एक जगह पर इकट्ठा करके काबू कर लिया। (हे गुरू अंगद !) गुरू (नानक) के दर पर पड़ कर तूने जगत को जीत लिया है। आप समता की बाजी खोल रहा है; (भाव। आप सबका एक-दृष्टि से देख रहा है)। निरंकार में लिव रखने के कारण आपकी बिरती का प्रवाह पूर्ण खिलाव की अवस्था में बना रहता है। हे कॅलसहार ! कह- “हरी-रूप जगत के गुरू (नानक देव जी) को परस के (भाव। गुरू नानक के चरणों में लग के) लहणे की शोभा सारे संसार में फैल रही है”। 1।
जा की द्रिसटि अंम्रित धार कालुख खनि उतार तिमर अग्यान जाहि दरस दुआर ॥
ओइ जु सेवहि सबदु सारु गाखड़ी बिखम कार ते नर भव उतारि कीए निरभार ॥
सतसंगति सहज सारि जागीले गुर बीचारि निंमरी भूत सदीव परम पिआरि ॥
कहु कीरति कल सहार सपत दीप मझार लहणा जगत्र गुरु परसि मुरारि ॥2॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: जिस (गुरू अंगद देव जी) की दृष्टि अमृत बरसाने वाली है। (पापों की) कालिख़ खोद के दूर करने में समर्थ है। उसके दर का दर्शन करने से अज्ञान आदि के अंधेरे दूर हो जाते हैं। जो मनुष्य (उसके) श्रेष्ठ शबद को जपते हैं। और (ये) मुश्किल और बिखड़ी कार करते हैं। उनको संसार-सागर से पार लंघा के सतिगुरू ने मुक्त कर दिया है। (वह मनुष्य) सत्संगति में सहज अवस्था को प्राप्त करते हैं। सतिगुरू की बताई हुई विचार की बरकति से (उनके मन) जाग उठते हैं; वे सदा विनम्रता और परम-प्यार में (भीगे) रहते हैं। हे कलसहार ! कह- “मुरारी के रूप जगत-गुरू (नानक देव जी) को परस के (ऐसे गुरू अंगद) लहणे की शोभा सारे संसार में पसर रही है। “। 2।
तै तउ द्रिड़िओ नामु अपारु बिमल जासु बिथारु साधिक सिध सुजन जीआ को अधारु ॥
तू ता जनिक राजा अउतारु सबदु संसारि सारु रहहि जगत्र जल पदम बीचार ॥
कलिप तरु रोग बिदारु संसार ताप निवारु आतमा त्रिबिधि तेरै एक लिव तार ॥
कहु कीरति कल सहार सपत दीप मझार लहणा जगत्र गुरु परसि मुरारि ॥3॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: (हे गुरू अंगद !) तूमने तो (अकाल पुरख के) अपार नाम को अपने हृदय में टिकाया है। आपकी निर्मल शोभा पसरी हुई है। आप साधिक सिद्ध और संत जनों की जिंदगी का सहारा है। (हे गुरू अंगद !) आप तो (निर्लिपता में) राजा जनक का अवतार है (भाव। जैसे राजा जनक निर्लिप रहता था। वैसे ही आप निर्लिप रहता है)। जगत में (आपका) शबद श्रेष्ठ है। आप जगत में इस तरह निर्लिप रहता है। जैसे कमल-फूल जल में। (हे गुरू अंगद देव !) आप कल्प वृक्ष है। रोगों को दूर करने वाला है। संसार के दुखों को निर्वित करने वला है। सारे संसारी जीव आपके (चरनों) में एक-रस लिव लगाए बैठे हैं। हे कलॅसहार ! कह-‘मुरारी-रूप जगत-गुरू (नानक देव जी) को परस के (ऐसे गुरू अंगद) लहणे की शोभा सातों द्वीपों में फैल रही है’। 3।
तै ता हदरथि पाइओ मानु सेविआ गुरु परवानु साधि अजगरु जिनि कीआ उनमानु ॥
हरि हरि दरस समान आतमा वंतगिआन जाणीअ अकल गति गुर परवान ॥
जा की द्रिसटि अचल ठाण बिमल बुधि सुथान पहिरि सील सनाहु सकति बिदारि ॥
कहु कीरति कल सहार सपत दीप मझार लहणा जगत्र गुरु परसि मुरारि ॥4॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: (हे गुरू अंगद !) तूने तो (गुरू-नानक की) हजूरी में सम्मान पाया है; तूने प्रामाणिक गुरू (नानक) की सेवा की है। जिसने असाध्य मन को साध के उसको ऊँचा किया हुआ है। जिस (गुरू नानक) की निगाह अचल ठिकाने पर (टिकी हुई) है। जिस गुरू की बुद्धि निर्मल है और श्रेष्ठ जगह पर लगी हुई है। और जिस गुरू नानक ने विनम्रता वाले स्वभाव का सनाह (कवच) पहन के माया (के प्रभाव) को नाश किया है। (हे गुरू अंगद !) जिस गुरू का दर्शन हरी के दर्शनों के समान है। जो आत्म ज्ञान वाला है। तूने उस प्रामाणिक और सर्व-व्यापक प्रभू के रूप गुरू (नानक देव जी) की ऊँची आत्मिक अवस्था समझ ली है। हे कॅलसहार ! कह- “मुरारी के रूप जगत-गुरू (नानक देव जी के चरणों) को परस के (ऐसे गुरू अंगद) लहणे की शोभा सारे संसार में पसर रही है”। 4।
द्रिसटि धरत तम हरन दहन अघ पाप प्रनासन ॥
सबद सूर बलवंत काम अरु क्रोध बिनासन ॥
लोभ मोह वसि करण सरण जाचिक प्रतिपालण ॥
आतम रत संग्रहण कहण अंम्रित कल ढालण ॥
सतिगुरू कल सतिगुर तिलकु सति लागै सो पै तरै ॥
गुरु जगत फिरणसीह अंगरउ राजु जोगु लहणा करै ॥5॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: (हे गुरू अंगद !) दृष्टि करते ही आप (अज्ञान-रूप) अंधेरे को दूर कर देता है; आप पाप जलाने वाला है। और पाप नाश करने वाला है। आप शबद का सूरमा है और बलवान है। काम और क्रोध को आप नाश कर देता है। (हे गुरू अंगद !) तूने लोभ और मोह को काबू किया हुआ है। शरण आए मंगतों को आप पालने वाला है। तूने आत्मिक प्रेम को इकट्ठा किया हुआ है। आपके वचन अमृत के सुंदर चश्मे हैं। हे कॅलसहार ! सतिगुरू (अंगद देव) शिरोमणी गुरू है। जो मनुष्य श्रद्धा धार के उसके चरणों में लगता है उसका उद्धार हो जाता है। जगत का गुरू। बाबा फेरू (जी) का सपुत्र लहिणा जी (गुरू) अंगद राज और जोग माणता है। 5।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू अंगद देव जी की उस्तति में उचारे गए सवईऐ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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