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अंग 1405

अंग
1405
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: भट्ट बल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तार्यउ संसारु माया मद मोहित अंम्रित नामु दीअउ समरथु ॥
फुनि कीरतिवंत सदा सुख संपति रिधि अरु सिधि न छोडइ सथु ॥
दानि बडौ अतिवंतु महाबलि सेवकि दासि कहिओ इहु तथु ॥
ताहि कहा परवाह काहू की जा कै बसीसि धरिओ गुरि हथु ॥7॥49॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: (गुरू रामदास जी ने) माया के मद में मोहे हुए सेसार का उद्धार किया है। (आप ने जीवों को) समर्था वाला अमृत नाम बख्शा है। आप सदा सुख। धन और शोभा के मालिक हैं। रिद्धी और सिद्धी आपका साथ नहीं छोड़ती। (गुरू रामदास) बड़ा दानी है और अत्यंत महाबली है। सेवक दास (मथुरा) ने यह सच कहा है। जिसके सिर पर गुरू (रामदास जी) ने हाथ रखा है। उसको किसी की क्या परवाह है। 7। 49।
तीनि भवन भरपूरि रहिओ सोई ॥
अपन सरसु कीअउ न जगत कोई ॥
आपुन आपु आप ही उपायउ ॥
सुरि नर असुर अंतु नही पायउ ॥
पायउ नही अंतु सुरे असुरह नर गण गंध्रब खोजंत फिरे ॥
अबिनासी अचलु अजोनी संभउ पुरखोतमु अपार परे ॥
करण कारण समरथु सदा सोई सरब जीअ मनि ध्याइयउ ॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥1॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: (जो) अकाल-पुरख स्वयं ही तीनों भवनों में व्यापक है। जगत का कोई दूसरा जीव (जिसने) अपने जैसा पैदा नहीं किया। अपना आप (जिसने) आप ही पैदा किया है। देवते। मनुष्य। दैत्य। किसी ने (जिसका) अंत नहीं पाया। देवते। दैत्य। मनुष्य। गण। गंधर्व- सब जिसको खोजते फिरते हैं। (किसी ने जिसका) अंत नहीं पाया। जो अकाल-पुरख अविनाशी है। अडोल है। जूनियों से रहित है। अपने आप से प्रकट हुआ है। उक्तम पुरख है और बहुत बेअंत है। (जो) हरी सृष्टि का मूल है। (जो) स्वयं ही सदा समर्थ है। सारे जीवों ने (जिसको) मन में सिमरा है। हे गुरू रामदास जी ! (आपकी) जगत में जै-जैकार हैं रही है कि आप ने ऊँची पदवी पा ली है। 1।
सतिगुरि नानकि भगति करी इक मनि तनु मनु धनु गोबिंद दीअउ ॥
अंगदि अनंत मूरति निज धारी अगम ग्यानि रसि रस्यउ हीअउ ॥
गुरि अमरदासि करतारु कीअउ वसि वाहु वाहु करि ध्याइयउ ॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥2॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: गुरू नानक देव जी ने एक-मन हो के भगती की। और (अपना) तन-मन-धन गोबिंद को अर्पित कर दिया। (गुरू) अंगद (साहिब जी) ने ‘अनंत मूरति’ हरी को अपने अंदर टिकाया। अपहुँच हरी के ज्ञान की बरकति से आपका हृदय प्रेम में भीग गया। गुरू अमरदास जी ने करतार को अपने वश में किया। ‘आप धन्य है। आप धन्य है’ – ये कह के आप ने करतार को सिमरा। हे गुरू रामदास जी ! आप की भी जगत में जय-जयकार हैं रही है। आप ने अकाल-पुरख के मिलाप का सबसे ऊँचा दर्जा हासिल कर लिया है। 2।
नारदु ध्रू प्रहलादु सुदामा पुब भगत हरि के जु गणं ॥
अंबरीकु जयदेव त्रिलोचनु नामा अवरु कबीरु भणं ॥
तिन कौ अवतारु भयउ कलि भिंतरि जसु जगत्र परि छाइयउ ॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥3॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: नारद। धु्रव। प्रहलाद। सुदामा और अंबरीक- जो हरी के पूर्बले जुगों के भगत गिने जाते हैं; जैदेव। त्रिलोचन। नामा और कबीर। जिनका जनम कलियुग में हुआ है- इन सभी का यश जगत में (हरी का भगत होने के कारण ही) पसरा हुआ है। हे गुरू रामदास जी ! आप जी की भी जय-जयकार जगत में हैं रही है। कि आप ने हरी (के मिलाप) की परम पदवी पाई है। 3।
मनसा करि सिमरंत तुझै नर कामु क्रोधु मिटिअउ जु तिणं ॥
बाचा करि सिमरंत तुझै तिन॑ दुखु दरिद्रु मिटयउ जु खिणं ॥
करम करि तुअ दरस परस पारस सर बल्य भट जसु गाइयउ ॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥4॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य (हे सतिगुरू !) आपको मन जोड़ के सिमरते हैं। उनका काम और क्रोध मिट जाता है। जो जीव आप को वचनों द्वारा (भाव। जीभ से) सिमरते हैं। उनका दुख और दरिद्र छिन में दूर हैं जाता है। हे गुरू रामदास जी ! बल् भॅट (आप का) यश गाता है (और कहता है कि) जो मनुष्य आप के दर्शन शारीरिक इन्द्रियों से परसते हैं। वे पारस समान हैं जाते हैं। हे गुरू रामदास जी ! आप की जय-जयकार जगत में हैं रही है कि आपने हरी की उच्च पदवी पा ली है। 4।
जिह सतिगुर सिमरंत नयन के तिमर मिटहि खिनु ॥
जिह सतिगुर सिमरंथि रिदै हरि नामु दिनो दिनु ॥
जिह सतिगुर सिमरंथि जीअ की तपति मिटावै ॥
जिह सतिगुर सिमरंथि रिधि सिधि नव निधि पावै ॥
सोई रामदासु गुरु बल्य भणि मिलि संगति धंनि धंनि करहु ॥
जिह सतिगुर लगि प्रभु पाईऐ सो सतिगुरु सिमरहु नरहु ॥5॥54॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: जिस गुरू का सिमरन करने से। आँखों का अंधेरा छिन में मिट जाता है। जिस गुरू का सिमरन करने से हृदय में हरी का नाम दिनो-दिन (ज्यादा पैदा होता है); जिस गुरू को सिमरने से (जीव) हृदय की तपश को मिटाता है। जिस गुरू को याद करके (जीव) रिद्धियां-सिद्धियां और नौ-निधियां पा लेता है; हे बल् (कवि !) कह- हे जनो ! जिस गुरू रामदास के चरणों में लग के प्रभू को मिलते हैं। उस गुरू को सिमरो और संगति में मिल के उसको कहो- ‘आप धन्य है। आप धन्य है’। 5। 54।
जिनि सबदु कमाइ परम पदु पाइओ सेवा करत न छोडिओ पासु ॥
ता ते गउहरु ग्यान प्रगटु उजीआरउ दुख दरिद्र अंध्यार को नासु ॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: जिस (गुरू रामदास जी) ने शबद को कमा के ऊँची पदवी पाई। और (गुरू अमरदास जी की) सेवा करते हुए साथ नहीं छोड़ा। उस (गुरू) से मोती-वत् उज्जवल ज्ञान का प्रकाश प्रकट हुआ। और दरिद्रता व अंधकार का नाश हो गया।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(गुरू रामदास जी ने) माया के मद में मोहे हुए सेसार का उद्धार किया है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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