फुनि कीरतिवंत सदा सुख संपति रिधि अरु सिधि न छोडइ सथु ॥
दानि बडौ अतिवंतु महाबलि सेवकि दासि कहिओ इहु तथु ॥
ताहि कहा परवाह काहू की जा कै बसीसि धरिओ गुरि हथु ॥7॥49॥
अपन सरसु कीअउ न जगत कोई ॥
आपुन आपु आप ही उपायउ ॥
सुरि नर असुर अंतु नही पायउ ॥
पायउ नही अंतु सुरे असुरह नर गण गंध्रब खोजंत फिरे ॥
अबिनासी अचलु अजोनी संभउ पुरखोतमु अपार परे ॥
करण कारण समरथु सदा सोई सरब जीअ मनि ध्याइयउ ॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥1॥
अंगदि अनंत मूरति निज धारी अगम ग्यानि रसि रस्यउ हीअउ ॥
गुरि अमरदासि करतारु कीअउ वसि वाहु वाहु करि ध्याइयउ ॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥2॥
अंबरीकु जयदेव त्रिलोचनु नामा अवरु कबीरु भणं ॥
तिन कौ अवतारु भयउ कलि भिंतरि जसु जगत्र परि छाइयउ ॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥3॥
बाचा करि सिमरंत तुझै तिन॑ दुखु दरिद्रु मिटयउ जु खिणं ॥
करम करि तुअ दरस परस पारस सर बल्य भट जसु गाइयउ ॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥4॥
जिह सतिगुर सिमरंथि रिदै हरि नामु दिनो दिनु ॥
जिह सतिगुर सिमरंथि जीअ की तपति मिटावै ॥
जिह सतिगुर सिमरंथि रिधि सिधि नव निधि पावै ॥
सोई रामदासु गुरु बल्य भणि मिलि संगति धंनि धंनि करहु ॥
जिह सतिगुर लगि प्रभु पाईऐ सो सतिगुरु सिमरहु नरहु ॥5॥54॥
ता ते गउहरु ग्यान प्रगटु उजीआरउ दुख दरिद्र अंध्यार को नासु ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(गुरू रामदास जी ने) माया के मद में मोहे हुए सेसार का उद्धार किया है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।