ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: (गुरू अमरदास जी के) दाएं हाथ में पदम है; सीधे (उनके) मुँह के सामने हो के ताक रही है; (आप के) बाएं अंग में रिद्धि बस रही है। जो तीन लोगों को मोहती है। (गुरू अमरदास जी के) हृदय में अकथ हरी बस रहा है। इस आनंद को उस (गुरू अमरदास जी) ने आप ही जाना है। इस रंग में रति हुआ गुरू अमरदास अपने मुख से (अकाल-पुरख की) भगती उचार रहा है। (गुरू अमरदास जी के) माथे पर (परमात्मा की) सच्ची बख्शिश-रूप निशान है। हे कल् कवि ! हाथ जोड़ के (इस सतिगुरू को) जिस मनुष्य ने ध्याया है और इस शिरोमणी सतिगुरू की सेवा की है। उसने अपनी सारी मनो-कामनाएं पूरी कर ली हैं। 9।
चरण त पर सकयथ चरण गुर अमर पवलि रय ॥ हथ त पर सकयथ हथ लगहि गुर अमर पय ॥ जीह त पर सकयथ जीह गुर अमरु भणिजै ॥ नैण त पर सकयथ नयणि गुरु अमरु पिखिजै ॥ स्रवण त पर सकयथ स्रवणि गुरु अमरु सुणिजै ॥ सकयथु सु हीउ जितु हीअ बसै गुर अमरदासु निज जगत पित ॥ सकयथु सु सिरु जालपु भणै जु सिरु निवै गुर अमर नित ॥१॥१०॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: वही चरण अच्छी तरह सकार्थ हैं। जो चरन गुरू अमरदास जी के राह पर चलते हैं। वही हाथ सफल हैं। जो हाथ गुरू अमरदास जी के चरणों पर लगते हैं। वही जीभ सकार्थ है। जो गुरू अमरदास जी को सराहती है। वही आँखें सफल हैं जिन आँखों से गुरू अमरदास जी को देखें। वही कान सफल हैं। जिन कानों से गुरू अमरदास जी की शोभा सुनी जाती है। वही हृदय सकार्थ है। जिस हृदय में जगत का पिता प्यारा गुरू अमरदास जी बसता है। जालप कवि कहता है- ‘वही सिर सफल है। जो सिर सदा गुरू अमरदास जी के आगे झुकता है’।
ति नर दुख नह भुख ति नर निधन नहु कहीअहि ॥ ति नर सोकु नहु हुऐ ति नर से अंतु न लहीअहि ॥ ति नर सेव नहु करहि ति नर सय सहस समपहि ॥ ति नर दुलीचै बहहि ति नर उथपि बिथपहि ॥ सुख लहहि ति नर संसार महि अभै पटु रिप मधि तिह ॥ सकयथ ति नर जालपु भणै गुर अमरदासु सुप्रसंनु जिह ॥२॥११॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: उन मनुष्यों को ना कोई दुख है ना भूख। वे मनुष्य कंगाल नहीं कहे जा सकते; उन मनुष्यों को कोई चिंता नहीं व्यापती; वे मनुष्य ऐसे हैं कि उनका अंत नहीं पाया जा सकता। वे मनुष्य किसी की मुथाजी नहीं करते। वे मनुष्य (तो स्वयं) सैकड़ों-हजारों (पदार्थ और मनुष्यों को) देते हैं; गलीचे पर बैठते हैं (भाव। राज भोगते हैं) और वे मनुष्य (अवगुणों को हृदय में से) उखाड़ के (शुभ गुणों को हृदय में) बसाते हैं। वह मनुष्य संसार में सुख पाते हैं। (कामादिक) वैरियों के बीच निर्भयता का वस्त्र पहने रखते हैं (भाव। निडर रहते हैं)। जालप कवि कहता है- ‘जिन मनुष्यों पर गुरू अमरदास जी प्रसन्न हैं। वे मनुष्य सफल हैं (भाव। उनका जनम सफल है)। 2। 11।
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: (हे गुरू अमरदास !) तूने एक अकाल-पुरख को ही पढ़ा है। तूने (अपने) मन में एक को ही सिमरा है। और यही निश्चय किया है कि अकाल-पुरख स्वयं ही स्वयं है (भाव। कोई उस जैसा नहीं है); (आपकी) दृष्टि में। (आपके) वचनों में और (आपके) मुँह में केवल अकाल-पुरख ही अकाल-पुरख है। तूने द्वैत को (भाव। इस ख्याल को कि अकाल-पुरख के बिना कोई और भी दूसरा है) अपने हृदय में समझा ही नहीं। हे गुरु ! आपके सपने में भी हरिनाम बसा हुआ है और प्रत्यक्ष भी ‘एक’ उसी को आप रसिया बना रहता है और आप एक प्रभु में ही लीन रहते हैं। जो अकाल-पुरख तीसों (दिनों में। भाव। महीने साल सदियों जुगों में सदा हर समय) में एक ही है। जो अकाल-पुरख पाँच-तत्वों के समूह में। (भाव। सारी सृष्टि में) प्रकट है। जो अविनाशी प्रभू पैंतिस अक्षरों में (भाव। सारी बाणी में इन अक्षरों द्वारा लिखती रूप में आई है) मौजूद है। उस एक को। (हे गुरू अमरदास !) आप सपने में भी और जागते हुए भी (सिमरता है)। आप उस एक में ही (सदा) लीन रहता है। जिस एक हरी से लाखों जीव बने हैं। और जो इन लाखों जीवों की समझ से परे है। उस एक को (हे गुरू अमरदास !) आप एक (अद्वितीय) करके ही वर्णन किया है। जालप भॅट कहता है – ‘हे गुरू अमरदास ! आप एक अकाल-पुरख को ही माँगता है और एक को ही मानता है’। 3। 12।
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: जो मति जैदेव ने सीखी। जो मति नामदेव में समाई हुई थी। जो मति त्रिलोचक के हृदय में थी। जो मति भगत कबीर ने समझी थी। जिस मति का सदका रुकमांगद का ये काम था (कि खुद जपता था और औरों को कहता था) हे भाई ! नित्य राम को सिमरो। जिस मति द्वारा अंबरीक और प्रहलादि ने गोबिंद की शरण पड़ कर ऊँची आत्मिक अवस्था पाई थी (हे गुरू अमरदास !) जल् (कहता है) तूने उस मत की जुगती जान ली है तूने लोभ। क्रोध और तृष्णा त्याग दी है। गुरू अमरदास अकाल-पुरख का प्यारा भगत है। मैं (उसके) दर्शन देख के विकारों से खलासी हासिल करता हूँ। 4। 13।
गुरु अमरदासु परसीऐ पुहमि पातिक बिनासहि ॥ गुरु अमरदासु परसीऐ सिध साधिक आसासहि ॥ गुरु अमरदासु परसीऐ धिआनु लहीऐ पउ मुकिहि ॥ गुरु अमरदासु परसीऐ अभउ लभै गउ चुकिहि ॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! आओ) गुरू अमरदास (जी के चरनों) को परसें। (गुरू अमरदास के चरन परसने से) धरती के पाप दूर हो जाते हैं। गुरू अमरदास जी को परसें। (गुरू अमरदास के चरन परसन को) सिद्ध और साधिक लोचते हैं। गुरू अमरदास (जी के चरणों) को परसें। (इस तरह परमात्मा वाला) ध्यान प्राप्त होता है (भाव। परमात्मा में बिरती जुड़ती है) और (जनम-मरण के) सफर समाप्त हो जाते हैं। गुरू अमरदास जी को परसें। (इस तरह) निर्भउ अकाल-पुरख मिल जाता है और जनम-मरण के चक्र समाप्त हो जाते हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कवि कल्सहार कहता है- ‘उस मनुष्य का जन्म सकार्थ है जिसने प्रकाश-स्वरूप गुरू अमरदास जी की सेवा की है’।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।