फुनि दुखनि नासु सुखदायकु सूरउ जो धरत धिआनु बसत तिह नेरे ॥
पूरउ पुरखु रिदै हरि सिमरत मुखु देखत अघ जाहि परेरे ॥
जउ हरि बुधि रिधि सिधि चाहत गुरू गुरू गुरु करु मन मेरे ॥५॥९॥
हुती जु पिआस पिऊस पिवंन की बंछत सिधि कउ बिधि मिलायउ ॥
पूरन भो मन ठउर बसो रस बासन सिउ जु दहं दिसि धायउ ॥
गोबिंद वालु गोबिंद पुरी सम जल्यन तीरि बिपास बनायउ ॥
गयउ दुखु दूरि बरखन को सु गुरू मुखु देखि गरू सुखु पायउ ॥६॥१०॥
गुरि कीनी क्रिपा हरि नामु दीअउ जिसु देखि चरंन अघंन हर्यउ ॥
निसि बासुर एक समान धिआन सु नाम सुने सुतु भान डर्यउ ॥
भनि दास सु आस जगत्र गुरू की पारसु भेटि परसु कर्यउ ॥
रामदासु गुरू हरि सति कीयउ समरथ गुरू सिरि हथु धर्यउ ॥७॥११॥
जैसी राखी लाज भगत प्रहिलाद की हरनाखस फारे कर आज ॥
फुनि द्रोपती लाज रखी हरि प्रभ जी छीनत बसत्र दीन बहु साज ॥
सोदामा अपदा ते राखिआ गनिका पड़्हत पूरे तिह काज ॥
स्री सतिगुर सुप्रसंन कलजुग होइ राखहु दास भाट की लाज ॥८॥१२॥
गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु प्रानीअहु ॥
सबदु हरि हरि जपै नामु नव निधि अपै रसनि अहिनिसि रसै सति करि जानीअहु ॥
फुनि प्रेम रंग पाईऐ गुरमुखहि धिआईऐ अंन मारग तजहु भजहु हरि ग्यानीअहु ॥
बचन गुर रिदि धरहु पंच भू बसि करहु जनमु कुल उधरहु द्वारि हरि मानीअहु ॥
जउ त सभ सुख इत उत तुम बंछवहु गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु प्रानीअहु ॥१॥१३॥
अगम गुन जानु निधानु हरि मनि धरहु ध्यानु अहिनिसि करहु बचन गुर रिदै धरि ॥
फुनि गुरू जल बिमल अथाह मजनु करहु संत गुरसिख तरहु नाम सच रंग सरि ॥
सदा निरवैरु निरंकारु निरभउ जपै प्रेम गुर सबद रसि करत द्रिड़ु भगति हरि ॥
मुगध मन भ्रमु तजहु नामु गुरमुखि भजहु गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु सति करि ॥२॥१४॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस गुरू की बाणी सुन के समाधि (में लीन हो जाया जाता है)।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।