अंग 1400

अंग
1400
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: Bhatt Nal
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तारण तरण सम्रथु कलिजुगि सुनत समाधि सबद जिसु केरे ॥
फुनि दुखनि नासु सुखदायकु सूरउ जो धरत धिआनु बसत तिह नेरे ॥
पूरउ पुरखु रिदै हरि सिमरत मुखु देखत अघ जाहि परेरे ॥
जउ हरि बुधि रिधि सिधि चाहत गुरू गुरू गुरु करु मन मेरे ॥५॥९॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: जिस गुरू की बाणी सुन के समाधि (में लीन हो जाया जाता है)। वह गुरू कलियुग में (संसार-सागर से) तैरा लेने के लिए समर्थ जहाज है। वह गुरू दुखों का नाश करने वाला है। सुखों के देने वाला शूरवीर है। जो मनुष्य उसका ध्यान धरता है। वह गुरू उसके अंग-संग बसता है। सतिगुरू पूरन पुरख है। गुरू हृदय में हरी को सिमरता है। (उसका) मुख देखने से पाप दूर हो जाते हैं। हे मेरे मन ! यदि आप ईश्वरीय बुद्धि। रिद्धियां और सिद्धियां चाहता है। तो ‘गुरू’ ‘गुरू’ जप। 5। 9।
गुरू मुखु देखि गरू सुखु पायउ ॥
हुती जु पिआस पिऊस पिवंन की बंछत सिधि कउ बिधि मिलायउ ॥
पूरन भो मन ठउर बसो रस बासन सिउ जु दहं दिसि धायउ ॥
गोबिंद वालु गोबिंद पुरी सम जल्यन तीरि बिपास बनायउ ॥
गयउ दुखु दूरि बरखन को सु गुरू मुखु देखि गरू सुखु पायउ ॥६॥१०॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू (अमरदास जी) के दर्शन कर के (गुरू रामदास जी ने) बड़ा आनंद पाया है। (आप को) अमृत पीने की जो तमन्ना लगी हुई थी। उस मन-इच्छित (चाहत की) सफलता का ढंग (हरी ने) बना दिया है। (संसारी जीवों का) जो मन रसों-वासनाओं के पीछे दसों-दिशाओं में दौड़ता है आप का वह मन तृप्त हैं गया है और टिक गया है। (जिस सतिगुरू अमरदास जी ने) बैकुंठ जैसा गोइंदवाल ब्यास के पानी के किनारे पर बना दिया है। उस गुरू का मुँह देख के (गुरू रामदास जी ने) बड़ा आनंद पाया है। (आप का। जैसे) वर्षों का दुख दूर हैं गया है। 6। 10।
समरथ गुरू सिरि हथु धर्यउ ॥
गुरि कीनी क्रिपा हरि नामु दीअउ जिसु देखि चरंन अघंन हर्यउ ॥
निसि बासुर एक समान धिआन सु नाम सुने सुतु भान डर्यउ ॥
भनि दास सु आस जगत्र गुरू की पारसु भेटि परसु कर्यउ ॥
रामदासु गुरू हरि सति कीयउ समरथ गुरू सिरि हथु धर्यउ ॥७॥११॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: समर्थ गुरू (अमरदास जी) ने (गुरू रामदास जी के) सिर पर हाथ रखा है। जिस (गुरू अमरदास जी) के दर्शन करने से पाप दूर हो जाते हैं। उस गुरू ने मेहर की है। (गुरू रामदास जी को) हरी का नाम बख्शा है; (उस नाम में गुरू रामदास जी का) दिन-रात एक-रस ध्यान रहता है। उस नाम को सुनने से जम-राज (भी) डरता है (भाव। नजदीक नहीं आता)। हे दास नॅल ! कवि ! कह- ‘गुरू रामदास जी को केवल जगत के गुरू की ही आस है। पारस (गुरू अमरदास जी) को मिल के आप भी परसन-योग (पारस ही) हैं गए हैं। हरी ने गुरू रामदास जी को अटल कर रखा है। (क्योंकि) समर्थ गुरू (अमरदास जी) ने (उनके) सिर पर हाथ रखा हुआ है’। 7। 11।
अब राखहु दास भाट की लाज ॥
जैसी राखी लाज भगत प्रहिलाद की हरनाखस फारे कर आज ॥
फुनि द्रोपती लाज रखी हरि प्रभ जी छीनत बसत्र दीन बहु साज ॥
सोदामा अपदा ते राखिआ गनिका पड़्हत पूरे तिह काज ॥
स्री सतिगुर सुप्रसंन कलजुग होइ राखहु दास भाट की लाज ॥८॥१२॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: (हे सतिगुरू जी !) अब इस दास (नॅल्) भॅट की लाज रख लो। जैसे (आप ने) प्रहलाद भगत की इज्जत रखी थी और हर्णाक्षस को हाथों के नाखूनों से मार दिया था। और। हे हरी-प्रभू जी ! द्रोपदी की (भी) आपने इज्जत बचाई। जब उसके वस्त्र छीने जा रहे थे। (आपने) उसको बहुत सम्मान बख्शा था। हे सतिगुरू जी ! सुदामे को (आपने) बिपता से बचाया। (राम नाम) पढ़ती गनिका का काम सफल किया। अब कलियुग के समय इस सेवक (नॅल्) भॅट पर (भी) प्रसन्न हो के इसकी लाज रखो। 8। 12।
झोलना ॥
गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु प्रानीअहु ॥
सबदु हरि हरि जपै नामु नव निधि अपै रसनि अहिनिसि रसै सति करि जानीअहु ॥
फुनि प्रेम रंग पाईऐ गुरमुखहि धिआईऐ अंन मारग तजहु भजहु हरि ग्यानीअहु ॥
बचन गुर रिदि धरहु पंच भू बसि करहु जनमु कुल उधरहु द्वारि हरि मानीअहु ॥
जउ त सभ सुख इत उत तुम बंछवहु गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु प्रानीअहु ॥१॥१३॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: झोलना ॥ हे प्राणियो ! नित्य ‘गुरू’ ‘गुरू’ जपो। (ये बात) सच जानो। कि (सतिगुरू स्वयं) हरी-शबद जपता है। (औरों को) नाम-रूपी नौ-निद्धियां बख्शता है। और हर वक्त जीभ से (नाम का) आनंद ले रहा है। (अगर) गुरू की शिक्षा ले के (हरी को) सिमरें। तो हरी के प्रेम का रंग प्राप्त होता है। (इसलिए) हे ज्ञानवानों ! और रास्ते छोड़ दो। और हरी को सिमरो। (हे प्राणियो !) सतिगुरू के वचनों को हृदय में टिकाओ (और इस तरह) अपने मन को काबू करो। अपने जनम और कुल को सफल करो। हरी के दर पर आदर पाएँगे। अगर आप परलोक के सारे सुख चाहते हैं। तो हे प्राणियो ! सदा गुरू गुरू जपो। 1। 13।
गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपि सति करि ॥
अगम गुन जानु निधानु हरि मनि धरहु ध्यानु अहिनिसि करहु बचन गुर रिदै धरि ॥
फुनि गुरू जल बिमल अथाह मजनु करहु संत गुरसिख तरहु नाम सच रंग सरि ॥
सदा निरवैरु निरंकारु निरभउ जपै प्रेम गुर सबद रसि करत द्रिड़ु भगति हरि ॥
मुगध मन भ्रमु तजहु नामु गुरमुखि भजहु गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु सति करि ॥२॥१४॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: हे संतजनो ! हे गुरसिखो ! श्रद्धा से गुरू गुरू जपो। सतिगुरू के वचन हृदय में बसा के (घट-घट की) जाननेवाले और बेअंत गुणों के खजाने हरी को मन में बसाओ। और दिन-रात उसी का ध्यान धरो। फिर सतिगुरू-रूपी निर्मल और गंभीर जल में डुबकी लगाओ। और सच्चे नाम के प्रेम में तैराकी करो। (जो गुरू रामदास) सदा निर्वैर और निर्भय निरंकार को जपता है। और सतिगुरू के शबद के प्रेम के आनंद में हरी की भगती दृढ़ करता है। उस गुरू के सन्मुख हो के हे मूर्ख मन ! (हरी का) नाम जप। और भ्रम छोड़ दे। श्रद्धा से ‘गुरू’ ‘गुरू’ कर। 2। 14।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस गुरू की बाणी सुन के समाधि (में लीन हो जाया जाता है)।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।