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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1400 · सवैये

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1400
सवैये
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  1. तारण तरण सम्रथु कलिजुगि सुनत समाधि सबद जिसु केरे ॥
  2. गुरू मुखु देखि गरू सुखु पायउ ॥
  3. समरथ गुरू सिरि हथु धर्यउ ॥
  4. अब राखहु दास भाट की लाज ॥
  5. झोलना ॥
  6. गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपि सति करि ॥

तारण तरण सम्रथु कलिजुगि सुनत समाधि सबद जिसु केरे ॥

अंग 1399 से चला आ रहा अंश

तारण तरण सम्रथु कलिजुगि सुनत समाधि सबद जिसु केरे ॥
फुनि दुखनि नासु सुखदायकु सूरउ जो धरत धिआनु बसत तिह नेरे ॥
पूरउ पुरखु रिदै हरि सिमरत मुखु देखत अघ जाहि परेरे ॥
जउ हरि बुधि रिधि सिधि चाहत गुरू गुरू गुरु करु मन मेरे ॥5॥9॥

हिन्दी अर्थ: जिस गुरू की बाणी सुन के समाधि (में लीन हो जाया जाता है)। वह गुरू कलियुग में (संसार-सागर से) तैरा लेने के लिए समर्थ जहाज है। वह गुरू दुखों का नाश करने वाला है। सुखों के देने वाला शूरवीर है। जो मनुष्य उसका ध्यान धरता है। वह गुरू उसके अंग-संग बसता है। सतिगुरू पूरन पुरख है। गुरू हृदय में हरी को सिमरता है। (उसका) मुख देखने से पाप दूर हो जाते हैं। हे मेरे मन ! यदि आप ईश्वरीय बुद्धि। रिद्धियां और सिद्धियां चाहते हैं, तो 'गुरू' 'गुरू' जपें। 5। 9।

गुरू मुखु देखि गरू सुखु पायउ ॥

गुरू मुखु देखि गरू सुखु पायउ ॥
हुती जु पिआस पिऊस पिवंन की बंछत सिधि कउ बिधि मिलायउ ॥
पूरन भो मन ठउर बसो रस बासन सिउ जु दहं दिसि धायउ ॥
गोबिंद वालु गोबिंद पुरी सम जल्यन तीरि बिपास बनायउ ॥
गयउ दुखु दूरि बरखन को सु गुरू मुखु देखि गरू सुखु पायउ ॥6॥10॥

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू (अमरदास जी) के दर्शन कर के (गुरू रामदास जी ने) बड़ा आनंद पाया है। (आप को) अमृत पीने की जो तमन्ना लगी हुई थी। उस मन-इच्छित (चाहत की) सफलता का ढंग (हरी ने) बना दिया है। (संसारी जीवों का) जो मन रसों-वासनाओं के पीछे दसों-दिशाओं में दौड़ता है आप का वह मन तृप्त हो गया है और टिक गया है। (जिस सतिगुरू अमरदास जी ने) बैकुंठ जैसा गोइंदवाल ब्यास के पानी के किनारे पर बना दिया है। उस गुरू का मुँह देख के (गुरू रामदास जी ने) बड़ा आनंद पाया है। (आप का। जैसे) वर्षों का दुख दूर हो गया है। 6। 10।

समरथ गुरू सिरि हथु धर्यउ ॥

समरथ गुरू सिरि हथु धर्यउ ॥
गुरि कीनी क्रिपा हरि नामु दीअउ जिसु देखि चरंन अघंन हर्यउ ॥
निसि बासुर एक समान धिआन सु नाम सुने सुतु भान डर्यउ ॥
भनि दास सु आस जगत्र गुरू की पारसु भेटि परसु कर्यउ ॥
रामदासु गुरू हरि सति कीयउ समरथ गुरू सिरि हथु धर्यउ ॥7॥11॥

हिन्दी अर्थ: समर्थ गुरू (अमरदास जी) ने (गुरू रामदास जी के) सिर पर हाथ रखा है। जिस (गुरू अमरदास जी) के दर्शन करने से पाप दूर हो जाते हैं। उस गुरू ने मेहर की है। (गुरू रामदास जी को) हरी का नाम बख्शा है; (उस नाम में गुरू रामदास जी का) दिन-रात एक-रस ध्यान रहता है। उस नाम को सुनने से जम-राज (भी) डरता है (भाव। नजदीक नहीं आता)। हे दास नॅल ! कवि ! कहें- 'गुरू रामदास जी को केवल जगत के गुरू की ही आस है। पारस (गुरू अमरदास जी) को मिल के आप भी परसन-योग (पारस ही) हो गए हैं। हरी ने गुरू रामदास जी को अटल कर रखा है। (क्योंकि) समर्थ गुरू (अमरदास जी) ने (उनके) सिर पर हाथ रखा हुआ है'। 7। 11।

अब राखहु दास भाट की लाज ॥

अब राखहु दास भाट की लाज ॥
जैसी राखी लाज भगत प्रहिलाद की हरनाखस फारे कर आज ॥
फुनि द्रोपती लाज रखी हरि प्रभ जी छीनत बसत्र दीन बहु साज ॥
सोदामा अपदा ते राखिआ गनिका पड़्हत पूरे तिह काज ॥
स्री सतिगुर सुप्रसंन कलजुग होइ राखहु दास भाट की लाज ॥8॥12॥

हिन्दी अर्थ: (हे सतिगुरू जी !) अब इस दास (नॅल्) भॅट की लाज रख लें। जैसे (आप ने) प्रहलाद भगत की इज्जत रखी थी और हर्णाक्षस को हाथों के नाखूनों से मार दिया था। और। हे हरी-प्रभू जी ! द्रोपदी की (भी) आपने इज्जत बचाई। जब उसके वस्त्र छीने जा रहे थे। (आपने) उसको बहुत सम्मान बख्शा था। हे सतिगुरू जी ! सुदामे को (आपने) बिपता से बचाया। (राम नाम) पढ़ती गनिका का काम सफल किया। अब कलियुग के समय इस सेवक (नॅल्) भॅट पर (भी) प्रसन्न हो के इसकी लाज रखें। 8। 12।

झोलना ॥

झोलना ॥
गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु प्रानीअहु ॥
सबदु हरि हरि जपै नामु नव निधि अपै रसनि अहिनिसि रसै सति करि जानीअहु ॥
फुनि प्रेम रंग पाईऐ गुरमुखहि धिआईऐ अंन मारग तजहु भजहु हरि ग्यानीअहु ॥
बचन गुर रिदि धरहु पंच भू बसि करहु जनमु कुल उधरहु द्वारि हरि मानीअहु ॥
जउ त सभ सुख इत उत तुम बंछवहु गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु प्रानीअहु ॥1॥13॥

हिन्दी अर्थ: झोलना ॥ हे प्राणियो ! नित्य 'गुरू' 'गुरू' जपें। (ये बात) सच जानिए कि (सतिगुरू स्वयं) हरी-शबद जपता है। (औरों को) नाम-रूपी नौ-निद्धियां बख्शता है। और हर वक्त जीभ से (नाम का) आनंद ले रहा है। (अगर) गुरू की शिक्षा ले के (हरी को) सिमरें। तो हरी के प्रेम का रंग प्राप्त होता है। (इसलिए) हे ज्ञानवानों ! और रास्ते छोड़ दें। और हरी को सिमरें। (हे प्राणियो !) सतिगुरू के वचनों को हृदय में टिकाएँ (और इस तरह) अपने मन को काबू करें। अपने जनम और कुल को सफल करें। हरी के दर पर आदर पाएँगे। अगर आप परलोक के सारे सुख चाहते हैं। तो हे प्राणियो ! सदा गुरू गुरू जपें। 1। 13।

गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपि सति करि ॥

गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपि सति करि ॥
अगम गुन जानु निधानु हरि मनि धरहु ध्यानु अहिनिसि करहु बचन गुर रिदै धरि ॥
फुनि गुरू जल बिमल अथाह मजनु करहु संत गुरसिख तरहु नाम सच रंग सरि ॥
सदा निरवैरु निरंकारु निरभउ जपै प्रेम गुर सबद रसि करत द्रिड़ु भगति हरि ॥
मुगध मन भ्रमु तजहु नामु गुरमुखि भजहु गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु सति करि ॥2॥14॥

हिन्दी अर्थ: हे संतजनो ! हे गुरसिखो ! श्रद्धा से गुरू गुरू जपें। सतिगुरू के वचन हृदय में बसा के (घट-घट की) जाननेवाले और बेअंत गुणों के खजाने हरी को मन में बसाएँ। और दिन-रात उसी का ध्यान धरें। फिर सतिगुरू-रूपी निर्मल और गंभीर जल में डुबकी लगाएँ। और सच्चे नाम के प्रेम में तैराकी करें। (जो गुरू रामदास) सदा निर्वैर और निर्भय निरंकार को जपता है। और सतिगुरू के शबद के प्रेम के आनंद में हरी की भगती दृढ़ करता है। उस गुरू के सन्मुख हो के हे मूर्ख मन ! (हरी का) नाम जपें। और भ्रम छोड़ दें। श्रद्धा से 'गुरू' 'गुरू' करें। 2। 14।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भट्ट गयन्द; भट्ट नल।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1400 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।