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इकु बिंनि दुगण जु तउ रहै जा सुमंत्रि मानवहि लहि ॥
इकु बिंनि दुगण जु तउ रहै जा सुमंत्रि मानवहि लहि ॥
जालपा पदारथ इतड़े गुर अमरदासि डिठै मिलहि ॥5॥14॥
जालपा पदारथ इतड़े गुर अमरदासि डिठै मिलहि ॥5॥14॥
हिन्दी अर्थ: जो दूसरा भाव है वह तब ही दूर होता है जब मनुष्य गुरू के श्रेष्ठ उपदेश से एक परमात्मा को पहचान के प्राप्त कर लेते हैं। हे जालप ! यह सारे पदार्थ (जो ऊपर बताए गए हैं) सतिगुरू अमदास जी को देखने से मिल जाते हैं। 5। 14।
सचु नामु करतारु सु द्रिड़ु नानकि संग्रहिअउ ॥
सचु नामु करतारु सु द्रिड़ु नानकि संग्रहिअउ ॥
ता ते अंगदु लहणा प्रगटि तासु चरणह लिव रहिअउ ॥
तितु कुलि गुर अमरदासु आसा निवासु तासु गुण कवण वखाणउ ॥
जो गुण अलख अगंम तिनह गुण अंतु न जाणउ ॥
बोहिथउ बिधातै निरमयौ सभ संगति कुल उधरण ॥
गुर अमरदास कीरतु कहै त्राहि त्राहि तुअ पा सरण ॥1॥15॥
ता ते अंगदु लहणा प्रगटि तासु चरणह लिव रहिअउ ॥
तितु कुलि गुर अमरदासु आसा निवासु तासु गुण कवण वखाणउ ॥
जो गुण अलख अगंम तिनह गुण अंतु न जाणउ ॥
बोहिथउ बिधातै निरमयौ सभ संगति कुल उधरण ॥
गुर अमरदास कीरतु कहै त्राहि त्राहि तुअ पा सरण ॥1॥15॥
हिन्दी अर्थ: गुरु नानक देव जी ने सदा स्थिर रहने वाले कर्तार के सच्चे नाम को दृढ़ता से हृदय में बसाया। उनसे ही लहणा जी गुरु अंगद के रूप में प्रकट हुए और गुरु नानक देव जी के चरणों में प्रेमपूर्वक जुड़े रहे। उसी गुरु-परम्परा में आशाओं को पूरा करने वाले गुरु अमर दास जी प्रकट हुए। उनके कौन-कौन से गुण कहे जाएँ? वे गुण वर्णन और पहुँच से परे हैं; उनका अंत नहीं जाना जा सकता। समस्त संगत और कुलों को पार उतारने के लिए कर्तार ने उन्हें जहाज़ बनाया। भट्ट कीरत विनती करते हैं: हे गुरु अमर दास जी! हम आपके चरणों की शरण में हैं; हमारी रक्षा कीजिए, हमें बचाइए। 1।15।
आपि नराइणु कला धारि जग महि परवरियउ ॥
आपि नराइणु कला धारि जग महि परवरियउ ॥
निरंकारि आकारु जोति जग मंडलि करियउ ॥
जह कह तह भरपूरु सबदु दीपकि दीपायउ ॥
जिह सिखह संग्रहिओ ततु हरि चरण मिलायउ ॥
नानक कुलि निंमलु अवतर्यिउ अंगद लहणे संगि हुअ ॥
गुर अमरदास तारण तरण जनम जनम पा सरणि तुअ ॥2॥16॥
निरंकारि आकारु जोति जग मंडलि करियउ ॥
जह कह तह भरपूरु सबदु दीपकि दीपायउ ॥
जिह सिखह संग्रहिओ ततु हरि चरण मिलायउ ॥
नानक कुलि निंमलु अवतर्यिउ अंगद लहणे संगि हुअ ॥
गुर अमरदास तारण तरण जनम जनम पा सरणि तुअ ॥2॥16॥
हिन्दी अर्थ: भट्ट कीरत गुरु अमर दास जी की स्तुति करते हैं: नारायण ने अपनी शक्ति से जगत में प्रकट होकर कार्य किया है। निरंकार ने गुरु का रूप धारण करके संसार में अपनी ज्योति प्रकट की है। सर्वत्र व्याप्त शब्द को गुरु अमर दास रूपी दीपक से प्रकाशित किया है। जिन सिखों ने इस शब्द को ग्रहण किया, गुरु ने उन्हें तुरन्त हरि के चरणों से जोड़ दिया। गुरु अंगद, अर्थात् लहणा जी के साथ जुड़कर गुरु अमर दास जी गुरु नानक की निर्मल गुरु-परम्परा में प्रकट हुए। हे गुरु अमर दास जी, संसार से पार कराने वाले जहाज़, हम जन्म-जन्म आपके चरणों की शरण पाएँ। 2। 16। इस अंश का हिन्दी अर्थ गुरु ग्रंथ दर्पन की पंजाबी व्याख्या के आधार पर यहाँ तैयार किया गया है।
जपु तपु सतु संतोखु पिखि दरसनु गुर सिखह ॥
जपु तपु सतु संतोखु पिखि दरसनु गुर सिखह ॥
सरणि परहि ते उबरहि छोडि जम पुर की लिखह ॥
भगति भाइ भरपूरु रिदै उचरै करतारै ॥
गुरु गउहरु दरीआउ पलक डुबंत्यह तारै ॥
नानक कुलि निंमलु अवतर्यिउ गुण करतारै उचरै ॥
गुरु अमरदासु जिन॑ सेविअउ तिन॑ दुखु दरिद्रु परहरि परै ॥3॥17॥
सरणि परहि ते उबरहि छोडि जम पुर की लिखह ॥
भगति भाइ भरपूरु रिदै उचरै करतारै ॥
गुरु गउहरु दरीआउ पलक डुबंत्यह तारै ॥
नानक कुलि निंमलु अवतर्यिउ गुण करतारै उचरै ॥
गुरु अमरदासु जिन॑ सेविअउ तिन॑ दुखु दरिद्रु परहरि परै ॥3॥17॥
हिन्दी अर्थ: वह जम-पुरी की लिखत को छोड़ के पार लांघ जाते हैं। (गुरू अमरदास अपने) हृदय में (करतार की) भगती के प्रेम में भरा हुआ है। और करतार को सिमरता है; सतिगुरू (अमरदास) गंभीर है। दरिया-दिल है। डूबते हुए जीवों को पल भर में तैरा देता है। (गुरू) नानक (देव जी) की कुल में (गुरू अमरदास जी) निर्मल अवतार हुआ है। जो करतार के गुणों को उचारता है। जिन मनुष्यों ने गुरू अमरदास जी की सेवा की है। उनका दुख और दरिद्रता दूर हो जाती है। 3। 17।
चिति चितवउ अरदासि कहउ परु कहि भि न सकउ ॥
चिति चितवउ अरदासि कहउ परु कहि भि न सकउ ॥
सरब चिंत तुझु पासि साधसंगति हउ तकउ ॥
तेरै हुकमि पवै नीसाणु तउ करउ साहिब की सेवा ॥
जब गुरु देखै सुभ दिसटि नामु करता मुखि मेवा ॥
अगम अलख कारण पुरख जो फुरमावहि सो कहउ ॥
गुर अमरदास कारण करण जिव तू रखहि तिव रहउ ॥4॥18॥
सरब चिंत तुझु पासि साधसंगति हउ तकउ ॥
तेरै हुकमि पवै नीसाणु तउ करउ साहिब की सेवा ॥
जब गुरु देखै सुभ दिसटि नामु करता मुखि मेवा ॥
अगम अलख कारण पुरख जो फुरमावहि सो कहउ ॥
गुर अमरदास कारण करण जिव तू रखहि तिव रहउ ॥4॥18॥
हिन्दी अर्थ: (हे गुरू अमरदास जी !) मैं चित्त में सोचें सोचता हूँ कि (एक) विनती कहूँ; पर मैं कह भी नहीं सकता; (हे सतिगुरू !) मेरी सारी चिंताएं आपके हवाले हैं (भाव। आपको ही मेरे सारे फिकर हैं)। मैं साध-संगत (का आसरा) ताकता हूँ। (हे गुरू अमरदास जी !) अगर आपकी रज़ा में प्रवानगी मिल जाए। तो मैं मालिक-प्रभू की सेवा करूँ। जब सतिगुरू (अमरदास) मेहर की नजर से ताकता है। तो करतार का नाम-रूप फल मुँह में (भाव। खाने को) मिलता है। हे अगम-रूप सतिगुरू ! हे अलख-हरी-रूप गुरू ! हे कारण पुरख-रूप गुरू अमरदास जी ! जो आप हुकम करते हैं। मैं वही कहता हूं। हे सृष्टि के कर्ता-रूप गुरू अमरदास जी ! जैसे आप मुझे रखते हैं वैसे ही मैं रहता हूँ। 4। 18।
भिखे के ॥
भिखे के ॥
गुरु गिआनु अरु धिआनु तत सिउ ततु मिलावै ॥
सचि सचु जाणीऐ इक चितहि लिव लावै ॥
काम क्रोध वसि करै पवणु उडंत न धावै ॥
निरंकार कै वसै देसि हुकमु बुझि बीचारु पावै ॥
कलि माहि रूपु करता पुरखु सो जाणै जिनि किछु कीअउ ॥
गुरु मिल्यिउ सोइ भिखा कहै सहज रंगि दरसनु दीअउ ॥1॥19॥
गुरु गिआनु अरु धिआनु तत सिउ ततु मिलावै ॥
सचि सचु जाणीऐ इक चितहि लिव लावै ॥
काम क्रोध वसि करै पवणु उडंत न धावै ॥
निरंकार कै वसै देसि हुकमु बुझि बीचारु पावै ॥
कलि माहि रूपु करता पुरखु सो जाणै जिनि किछु कीअउ ॥
गुरु मिल्यिउ सोइ भिखा कहै सहज रंगि दरसनु दीअउ ॥1॥19॥
हिन्दी अर्थ: भिखे के ॥ सतिगुरू अमरदास ज्ञान-रूप और ध्यान रूप है (भाव। पूर्ण ज्ञान वाला और दृढ़ ध्यान वाला है); (गुरू अमरदास ने) अपनी आत्मा को हरी के साथ मिला लिया है। सदा-स्थिर हरी में जुड़ने के कारण सतिगुरू को हरी-रूप ही समझना चाहिए। (गुरू अमरदास) एकाग्र मन हो के (हरी में) लिव लगा रहा है। गुरू अमरदास काम क्रोध को अपने वश में किए रखता है। (उनका) मन भटकता नहीं। (गुरू अमरदास) निरंकार के देश में टिक रहा है। (प्रभू का) हुकम पहचान के (उन्होंने) ज्ञान प्राप्त किया है। कलजुग में (गुरू अमरदास) करता पुरख-रूप है; (इस करिश्मे को) वह करतार ही जानता है जिसने यह आश्चर्यजनक करिश्मा किया है। भिॅखा कवि कहता है- 'मुझे वह गुरू (अमरदास) मिल गया है। (उन्होंने) पूर्ण खिलाव के रंग में मुझे दर्शन दिया है'। 1। 19।
रहिओ संत हउ टोलि साध बहुतेरे डिठे ॥
रहिओ संत हउ टोलि साध बहुतेरे डिठे ॥
संनिआसी तपसीअह मुखहु ए पंडित मिठे ॥
बरसु एकु हउ फिरिओ किनै नहु परचउ लायउ ॥
संनिआसी तपसीअह मुखहु ए पंडित मिठे ॥
बरसु एकु हउ फिरिओ किनै नहु परचउ लायउ ॥
हिन्दी अर्थ: मैं संतों को तलाश्ता-तलाशता थक गया हूँ। मैंने कई साध (भी) देखे हैं। कई सन्यासी, कई तपस्वी और कई ये मुँह के मीठे पंडित (भी) देखे हैं। मैं एक साल से फिरता रहा हूँ। किसी ने मेरी निशा नहीं की।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भट्ट भिखा; भट्ट जलप; भट्ट कीरत।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1395 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।