जालपा पदारथ इतड़े गुर अमरदासि डिठै मिलहि ॥५॥१४॥
ता ते अंगदु लहणा प्रगटि तासु चरणह लिव रहिअउ ॥
तितु कुलि गुर अमरदासु आसा निवासु तासु गुण कवण वखाणउ ॥
जो गुण अलख अगंम तिनह गुण अंतु न जाणउ ॥
बोहिथउ बिधातै निरमयौ सभ संगति कुल उधरण ॥
गुर अमरदास कीरतु कहै त्राहि त्राहि तुअ पा सरण ॥१॥१५॥
निरंकारि आकारु जोति जग मंडलि करियउ ॥
जह कह तह भरपूरु सबदु दीपकि दीपायउ ॥
जिह सिखह संग्रहिओ ततु हरि चरण मिलायउ ॥
नानक कुलि निंमलु अवतर्यिउ अंगद लहणे संगि हुअ ॥
गुर अमरदास तारण तरण जनम जनम पा सरणि तुअ ॥२॥१६॥
सरणि परहि ते उबरहि छोडि जम पुर की लिखह ॥
भगति भाइ भरपूरु रिदै उचरै करतारै ॥
गुरु गउहरु दरीआउ पलक डुबंत्यह तारै ॥
नानक कुलि निंमलु अवतर्यिउ गुण करतारै उचरै ॥
गुरु अमरदासु जिन॑ सेविअउ तिन॑ दुखु दरिद्रु परहरि परै ॥३॥१७॥
सरब चिंत तुझु पासि साधसंगति हउ तकउ ॥
तेरै हुकमि पवै नीसाणु तउ करउ साहिब की सेवा ॥
जब गुरु देखै सुभ दिसटि नामु करता मुखि मेवा ॥
अगम अलख कारण पुरख जो फुरमावहि सो कहउ ॥
गुर अमरदास कारण करण जिव तू रखहि तिव रहउ ॥४॥१८॥
भिखे के ॥
गुरु गिआनु अरु धिआनु तत सिउ ततु मिलावै ॥
सचि सचु जाणीऐ इक चितहि लिव लावै ॥
काम क्रोध वसि करै पवणु उडंत न धावै ॥
निरंकार कै वसै देसि हुकमु बुझि बीचारु पावै ॥
कलि माहि रूपु करता पुरखु सो जाणै जिनि किछु कीअउ ॥
गुरु मिल्यिउ सोइ भिखा कहै सहज रंगि दरसनु दीअउ ॥१॥१९॥
संनिआसी तपसीअह मुखहु ए पंडित मिठे ॥
बरसु एकु हउ फिरिओ किनै नहु परचउ लायउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो दूसरा भाव है वह तब ही दूर होता है जब मनुष्य गुरू के श्रेष्ठ उपदेश से एक परमात्मा को पहचान के प्राप्त कर लेते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।