अंग 1395

अंग
1395
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: Bhatt Keerath
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इकु बिंनि दुगण जु तउ रहै जा सुमंत्रि मानवहि लहि ॥
जालपा पदारथ इतड़े गुर अमरदासि डिठै मिलहि ॥५॥१४॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: जो दूसरा भाव है वह तब ही दूर होता है जब मनुष्य गुरू के श्रेष्ठ उपदेश से एक परमात्मा को पहचान के प्राप्त कर लेते हैं। हे जालप ! यह सारे पदार्थ (जो ऊपर बताए गए हैं) सतिगुरू अमदास जी को देखने से मिल जाते हैं। 5। 14।
सचु नामु करतारु सु द्रिड़ु नानकि संग्रहिअउ ॥
ता ते अंगदु लहणा प्रगटि तासु चरणह लिव रहिअउ ॥
तितु कुलि गुर अमरदासु आसा निवासु तासु गुण कवण वखाणउ ॥
जो गुण अलख अगंम तिनह गुण अंतु न जाणउ ॥
बोहिथउ बिधातै निरमयौ सभ संगति कुल उधरण ॥
गुर अमरदास कीरतु कहै त्राहि त्राहि तुअ पा सरण ॥१॥१५॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: (गुरू) नानक (देव जी) ने अकाल पुरख का नाम जो सदा-स्थिर रहने वाला है। पक्के तौर पर ग्रहण किया।
आपि नराइणु कला धारि जग महि परवरियउ ॥
निरंकारि आकारु जोति जग मंडलि करियउ ॥
जह कह तह भरपूरु सबदु दीपकि दीपायउ ॥
जिह सिखह संग्रहिओ ततु हरि चरण मिलायउ ॥
नानक कुलि निंमलु अवतर्यिउ अंगद लहणे संगि हुअ ॥
गुर अमरदास तारण तरण जनम जनम पा सरणि तुअ ॥२॥१६॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

जपु तपु सतु संतोखु पिखि दरसनु गुर सिखह ॥
सरणि परहि ते उबरहि छोडि जम पुर की लिखह ॥
भगति भाइ भरपूरु रिदै उचरै करतारै ॥
गुरु गउहरु दरीआउ पलक डुबंत्यह तारै ॥
नानक कुलि निंमलु अवतर्यिउ गुण करतारै उचरै ॥
गुरु अमरदासु जिन॑ सेविअउ तिन॑ दुखु दरिद्रु परहरि परै ॥३॥१७॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: वह जम-पुरी की लिखत को छोड़ के पार लांघ जाते हैं। (गुरू अमरदास अपने) हृदय में (करतार की) भगती के प्रेम में भरा हुआ है। और करतार को सिमरता है; सतिगुरू (अमरदास) गंभीर है। दरिया-दिल है। डूबते हुए जीवों को पल भर में तैरा देता है। (गुरू) नानक (देव जी) की कुल में (गुरू अमरदास जी) निर्मल अवतार हुआ है। जो करतार के गुणों को उचारता है। जिन मनुष्यों ने गुरू अमरदास जी की सेवा की है। उनका दुख और दरिद्रता दूर हो जाती है। 3। 17।
चिति चितवउ अरदासि कहउ परु कहि भि न सकउ ॥
सरब चिंत तुझु पासि साधसंगति हउ तकउ ॥
तेरै हुकमि पवै नीसाणु तउ करउ साहिब की सेवा ॥
जब गुरु देखै सुभ दिसटि नामु करता मुखि मेवा ॥
अगम अलख कारण पुरख जो फुरमावहि सो कहउ ॥
गुर अमरदास कारण करण जिव तू रखहि तिव रहउ ॥४॥१८॥
भिखे के ॥
गुरु गिआनु अरु धिआनु तत सिउ ततु मिलावै ॥
सचि सचु जाणीऐ इक चितहि लिव लावै ॥
काम क्रोध वसि करै पवणु उडंत न धावै ॥
निरंकार कै वसै देसि हुकमु बुझि बीचारु पावै ॥
कलि माहि रूपु करता पुरखु सो जाणै जिनि किछु कीअउ ॥
गुरु मिल्यिउ सोइ भिखा कहै सहज रंगि दरसनु दीअउ ॥१॥१९॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: (हे गुरू अमरदास जी !) मैं चिक्त में सोचें सोचता हूँ कि (एक) विनती कहूँ; पर मैं कह भी नहीं सकता; (हे सतिगुरू !) मेरी सारी चिंताएं आपके हवाले हैं (भाव। आपको ही मेरे सारे फिकर हैं)। मैं साध-संगत (का आसरा) ताकता हूँ। (हे गुरू अमरदास जी !) अगर आपकी रज़ा में प्रवानगी मिल जाए। तो मैं मालिक-प्रभू की सेवा करूँ। जब सतिगुरू (अमरदास) मेहर की नजर से ताकता है। तो करतार का नाम-रूप फल मुँह में (भाव। खाने को) मिलता है। हे अगम-रूप सतिगुरू ! हे अलख-हरी-रूप गुरू ! हे कारण पुरख-रूप गुरू अमरदास जी ! जो आप हुकम करता है। मैं वही कहता हूं। हे सृष्टि के कर्ता-रूप गुरू अमरदास जी ! जैसे आप मुझे रखता है वैसे ही मैं रहता हूँ। 4। 18। भिखे के ॥ सतिगुरू अमरदास ज्ञान-रूप और ध्यान रूप है (भाव। पूर्ण ज्ञान वाला और दृढ़ ध्यान वाला है); (गुरू अमरदास ने) अपनी आत्मा को हरी के साथ मिला लिया है। सदा-स्थिर हरी में जुड़ने के कारण सतिगुरू को हरी-रूप ही समझना चाहिए। (गुरू अमरदास) एकाग्र मन हो के (हरी में) लिव लगा रहा है। गुरू अमरदास काम क्रोध को अपने वश में किए रखता है। (उनका) मन भटकता नहीं। (गुरू अमरदास) निरंकार के देश में टिक रहा है। (प्रभू का) हुकम पहचान के (उन्होंने) ज्ञान प्राप्त किया है। कलजुग में (गुरू अमरदास) करता पुरख-रूप है; (इस करिश्मे को) वह करतार ही जानता है जिसने यह आश्चर्यजनक करिश्मा किया है। भिॅखा कवि कहता है- ‘मुझे वह गुरू (अमरदास) मिल गया है। (उन्होंने) पूर्ण खिलाव के रंग में मुझे दर्शन दिया है’। 1। 19।
रहिओ संत हउ टोलि साध बहुतेरे डिठे ॥
संनिआसी तपसीअह मुखहु ए पंडित मिठे ॥
बरसु एकु हउ फिरिओ किनै नहु परचउ लायउ ॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: मैं संतों को तलाश्ता-तलाशता थक गया हूँ। मैंने कई साध (भी) देखे हैं। कई सन्यासी। कई तपस्वी और कई ये मुँह के मीठे पंडित (भी) देखे हैं। मैं एक साल से फिरता रहा हूँ। किसी ने मेरी निशा नहीं की।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो दूसरा भाव है वह तब ही दूर होता है जब मनुष्य गुरू के श्रेष्ठ उपदेश से एक परमात्मा को पहचान के प्राप्त कर लेते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।