गावहि गुण बरन चारि खट दरसन ब्रहमादिक सिमरंथि गुना ॥ गावै गुण सेसु सहस जिहबा रस आदि अंति लिव लागि धुना ॥ गावै गुण महादेउ बैरागी जिनि धिआन निरंतरि जाणिओ ॥ कबि कल सुजसु गावउ गुर नानक राजु जोगु जिनि माणिओ ॥5॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: चारों वर्ण। छह भेख। गुरू नानक के गुण गा रहे हैं। ब्रहम आदिक भी उसके गुण याद कर रहे हैं। शेशनाग हजारों जीभों द्वारा प्रेम से एक-रस लिव की धुनी लगा के गुरू नानक के गुण गाता है। जिस गुरू नानक ने एक-रस बिरती जोड़ के अकाल-पुरख को पहचाना है (सांझ डाली है)। उसके गुण वैरागवान शिव जी (भी) गाता है। कल् कवि (कहता है) – ‘मैं उस गुरू नानक के गुण गाता हूं। जिसने राज और जोग दोनों माणें हैं (जीए हैं)’। 5।
राजु जोगु माणिओ बसिओ निरवैरु रिदंतरि ॥ स्रिसटि सगल उधरी नामि ले तरिओ निरंतरि ॥ गुण गावहि सनकादि आदि जनकादि जुगह लगि ॥ धंनि धंनि गुरु धंनि जनमु सकयथु भलौ जगि ॥ पाताल पुरी जैकार धुनि कबि जन कल वखाणिओ ॥ हरि नाम रसिक नानक गुर राजु जोगु तै माणिओ ॥6॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: (गुरू नानक देव जी ने) राज भी पाया है और जोग भी; निरवैर अकाल-पुरख (उनके) हृदय में बस रहा है। (गुरू नानक देव) स्वयं एक-रस नाम जप के पार निकल गया है। और (उसने) सारी सृष्टि को भी नाम की बरकति से पार लगा दिया है। सनक आदि ब्रहमा के चारों पुत्र। जनक आदि पुरातन ऋषि-जन कई जुगों से (गुरू नानक देव जी के) गुण गा रहे हैं। धन्य हैं गुरू (नानक) ! धन्य हैं गुरू (नानक) ! जगत में (उनका) जन्म लेना सकार्थ और भला हुआ है। दास कल् कवि विनती करता है- ‘हरी के नाम के रसिए हे गुरू नानक ! पाताल लोक से भी आपकी जै-जैकार की आवाज (उठ रही है)। तूने राज और जोग दोनों पाए हैं’। 6।
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: (हे गुरू नानक !) सतियुग में (भी) तूने ही (राज और जोग) माण था। तूने ही राजा बलि को छला था और तब वामन अवतार बनना आपको अच्छा लगा था। त्रेते में भी तूने ही (राज और जोग) माणा था। तब तूने अपने आप को रघुवंशी राम कहलवाया था (भाव। हे गुरू नानक ! मेरे लिए तो आप ही है वामन अवतार। आप ही है रघुवंशी अवतार राम)। (हे गुरू नानक !) द्वापर जुग में कृष्ण मुरारी भी (आप ही था)। आप ही कंस को (मार के) मुक्त किया था (आप ही) उग्रसैन को (मथुरा का) राज और अपने भगत-जनों को निर्भयता बख्शी थी (भाव। हे गुरू नानक ! मेरे वास्ते तो आप ही है श्री कृष्ण)। हे गुरू नानक ! कलयुग में (भी आप ही) समर्थता वाला है। (आप ही अपने आप को) गुरू अंगद और गुरू अमरदास कहलवाया है। (यह तो) अकाल-पुरख ने (ही) हुकम दे रखा है कि श्री गुरू (नानक देव जी) का राज सदा-स्थिर और अटल है। 7।
गुण गावै रविदासु भगतु जैदेव त्रिलोचन ॥ नामा भगतु कबीरु सदा गावहि सम लोचन ॥ भगतु बेणि गुण रवै सहजि आतम रंगु माणै ॥ जोग धिआनि गुर गिआनि बिना प्रभ अवरु न जाणै ॥ सुखदेउ परीख्यतु गुण रवै गोतम रिखि जसु गाइओ ॥ कबि कल सुजसु नानक गुर नित नवतनु जगि छाइओ ॥8॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: (उस गुरू नानक के) गुण रविदास भगत गा रहा है। जैदेव और त्रिलोचन गा रहे हैं। भगत नामदेव और कबीर गा रहे हैं; (जो) अकाल पुरख को अपने नेत्रों से सब जगह देख रहा है। (जो गुरू नानक) अडोलता में टिक के परमात्मा के मिलाप के स्वाद का आनंद लेता है। (जो गुरू नानक) गुरू के ज्ञान की बरकति से अकाल-पुरख में सुरति जोड़ के उसके बिना किसी और को नहीं जानता। (उसके) गुणों को बेणी भगत गा रहा है। सुखदेव ऋषि (गुरू नानक के गुण) गा रहा है और (राजा) परीक्ष्यत (भी गुरू नानक के) गुणों को गा रहा है। गौतम ऋषी ने (भी गुरू नानक का ही) यश गाया है। हे कल् कवी ! गुरू नानक (देव जी) की सुंदर शोभा नित्य नई है और जगत में अपना प्रभाव डाल रही है। 8।
गुण गावहि पायालि भगत नागादि भुयंगम ॥ महादेउ गुण रवै सदा जोगी जति जंगम ॥ गुण गावै मुनि ब्यासु जिनि बेद ब्याकरण बीचारिअ ॥ ब्रहमा गुण उचरै जिनि हुकमि सभ स्रिसटि सवारीअ ॥ ब्रहमंड खंड पूरन ब्रहमु गुण निरगुण सम जाणिओ ॥ जपु कल सुजसु नानक गुर सहजु जोगु जिनि माणिओ ॥9॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: पाताल में भी (शेष-) नाग आदिक और सर्प-भगत (गुरू नानक के) गुण गा रहे हैं। महादेव, योगी, सन्यासी, जंगम इत्यादि सदा उसी के गौरव-गान में लीन रहते हैं। जिस (ब्यास मुनि) ने सारे वेदों को व्याकरणों द्वारा विचारा है। वह (गुरू नानक के) गुण गा रहा है। जिस (ब्रहमा) ने अकाल-पुरख के हुकम में सारी सृष्टि रची है। वह (गुरू नानक के) गुण उचार रहा है। जिस गुरू नानक ने अडोल अवस्था को और अकाल-पुरख के मिलाप को पाया है। जिस गुरू नानक ने सारी दुनिया में हाजिर-नाजर अकाल-पुरख को सरगुण और निरगुण रूपों में एक-समान पहचाना है। हे कल् ! उस गुरू नानक के सुंदर गुणों को याद कर। 9।
गुण गावहि नव नाथ धंनि गुरु साचि समाइओ ॥ मांधाता गुण रवै जेन चक्रवै कहाइओ ॥ गुण गावै बलि राउ सपत पातालि बसंतौ ॥ भरथरि गुण उचरै सदा गुर संगि रहंतौ ॥ दूरबा परूरउ अंगरै गुर नानक जसु गाइओ ॥ कबि कल सुजसु नानक गुर घटि घटि सहजि समाइओ ॥10॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: नौ नाथ (भी) गुरू नानक के गुण गाते हैं (और कहते हैं)। “गुरू नानक धन्य है जो सच्चे हरी में जुड़ा हुआ है। जिस मान्धाता ने अपने आप को चक्रवर्ती राजा कहलवाया था। वह भी गुरू नानक के गुण उचार रहा है। मांधाता = सूर्यवंशी कुल का एक राजा, युवनांशु का पुत्र था, बड़ा बली राजा था। जेन = जिनि, जिस ने (अपने आप को)। चक्रवै = चक्रवर्ती। कहाइओ = कहलवाया। सातवें पाताल में बसता हुआ राजा बली (गुरू नानक के) गुण गा रहा है। अपने गुरू के साथ रहता हुआ भरथरी भी सदा (गुरू नानक के) गुण उचार रहा है। दुर्वासा ऋषि ने। राजा पुरू ने और अंगर ऋषि ने गुरू नानक का यश गाया है। हे कल् कवि ! गुरू नानक की सुंदर शोभा सहज ही हरेक प्राणी-मात्र के हृदय में टिकी हुई है। 10।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।