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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1390 · सवैये

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अंग
1390
सवैये
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  1. गावहि गुण बरन चारि खट दरसन ब्रहमादिक सिमरंथि गुना ॥
  2. राजु जोगु माणिओ बसिओ निरवैरु रिदंतरि ॥
  3. सतजुगि तै माणिओ छलिओ बलि बावन भाइओ ॥
  4. गुण गावै रविदासु भगतु जैदेव त्रिलोचन ॥
  5. गुण गावहि पायालि भगत नागादि भुयंगम ॥
  6. गुण गावहि नव नाथ धंनि गुरु साचि समाइओ ॥

भट्ट कल · सवैया

गावहि गुण बरन चारि खट दरसन ब्रहमादिक सिमरंथि गुना ॥

गावहि गुण बरन चारि खट दरसन ब्रहमादिक सिमरंथि गुना ॥
गावै गुण सेसु सहस जिहबा रस आदि अंति लिव लागि धुना ॥
गावै गुण महादेउ बैरागी जिनि धिआन निरंतरि जाणिओ ॥
कबि कल सुजसु गावउ गुर नानक राजु जोगु जिनि माणिओ ॥5॥

हिन्दी अर्थ: चारों वर्ण, छह भेख। गुरू नानक के गुण गा रहे हैं। ब्रहम आदिक भी उसके गुण याद कर रहे हैं। शेशनाग हजारों जीभों द्वारा प्रेम से एक-रस लिव की धुनी लगा के गुरू नानक के गुण गाता है। जिस गुरू नानक ने एक-रस बिरती जोड़ के अकाल-पुरख को पहचाना है (सांझ डाली है)। उसके गुण वैरागवान शिव जी (भी) गाता है। कल् कवि (कहता है): 'मैं उस गुरू नानक के गुण गाता हूं। जिसने राज और जोग दोनों माणें हैं (जीए हैं)'। 5।

भट्ट कल · सवैया

राजु जोगु माणिओ बसिओ निरवैरु रिदंतरि ॥

राजु जोगु माणिओ बसिओ निरवैरु रिदंतरि ॥
स्रिसटि सगल उधरी नामि ले तरिओ निरंतरि ॥
गुण गावहि सनकादि आदि जनकादि जुगह लगि ॥
धंनि धंनि गुरु धंनि जनमु सकयथु भलौ जगि ॥
पाताल पुरी जैकार धुनि कबि जन कल वखाणिओ ॥
हरि नाम रसिक नानक गुर राजु जोगु तै माणिओ ॥6॥

हिन्दी अर्थ: (गुरू नानक देव जी ने) राज भी पाया है और जोग भी; निरवैर अकाल-पुरख (उनके) हृदय में बस रहा है। (गुरू नानक देव) स्वयं एक-रस नाम जप के पार निकल गया है। और (उसने) सारी सृष्टि को भी नाम की बरकति से पार लगा दिया है। सनक आदि ब्रहमा के चारों पुत्र। जनक आदि पुरातन ऋषि-जन कई जुगों से (गुरू नानक देव जी के) गुण गा रहे हैं। धन्य हैं गुरू (नानक)! धन्य हैं गुरू (नानक)! जगत में (उनका) जन्म लेना सकार्थ और भला हुआ है। दास कल् कवि विनती करता है: 'हरी के नाम के रसिए हे गुरू नानक! पाताल लोक से भी आपकी जै-जैकार की आवाज (उठ रही है)। आपने राज और जोग दोनों पाए हैं'। 6।

भट्ट कल · सवैया

सतजुगि तै माणिओ छलिओ बलि बावन भाइओ ॥

सतजुगि तै माणिओ छलिओ बलि बावन भाइओ ॥
त्रेतै तै माणिओ रामु रघुवंसु कहाइओ ॥
दुआपुरि क्रिसन मुरारि कंसु किरतारथु कीओ ॥
उग्रसैण कउ राजु अभै भगतह जन दीओ ॥
कलिजुगि प्रमाणु नानक गुरु अंगदु अमरु कहाइओ ॥
स्री गुरू राजु अबिचलु अटलु आदि पुरखि फुरमाइओ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: (हे गुरू नानक!) सतियुग में (भी) आपने ही (राज और जोग) माण था। आपने ही राजा बलि को छला था और तब वामन अवतार बनना आपको अच्छा लगा था। त्रेते में भी आपने ही (राज और जोग) माणा था। तब आपने अपने आप को रघुवंशी राम कहलवाया था (भाव, हे गुरू नानक! मेरे लिए तो आप ही हैं वामन अवतार। आप ही हैं रघुवंशी अवतार राम)। (हे गुरू नानक!) द्वापर जुग में कृष्ण मुरारी भी (आप ही थे)। आपने ही कंस को (मार के) मुक्त किया था (आपने ही) उग्रसैन को (मथुरा का) राज और अपने भगत-जनों को निर्भयता बख्शी थी (भाव, हे गुरू नानक! मेरे वास्ते तो आप ही हैं श्री कृष्ण)। हे गुरू नानक! कलयुग में (भी आप ही) समर्थता वाले हैं। (आपने ही अपने आप को) गुरू अंगद और गुरू अमरदास कहलवाया है। (यह तो) अकाल-पुरख ने (ही) हुकम दे रखा है कि श्री गुरू (नानक देव जी) का राज सदा-स्थिर और अटल है। 7।

भट्ट कल · सवैया

गुण गावै रविदासु भगतु जैदेव त्रिलोचन ॥

गुण गावै रविदासु भगतु जैदेव त्रिलोचन ॥
नामा भगतु कबीरु सदा गावहि सम लोचन ॥
भगतु बेणि गुण रवै सहजि आतम रंगु माणै ॥
जोग धिआनि गुर गिआनि बिना प्रभ अवरु न जाणै ॥
सुखदेउ परीख्यतु गुण रवै गोतम रिखि जसु गाइओ ॥
कबि कल सुजसु नानक गुर नित नवतनु जगि छाइओ ॥8॥

हिन्दी अर्थ: (उस गुरू नानक के) गुण रविदास भगत गा रहा है। जैदेव और त्रिलोचन गा रहे हैं। भगत नामदेव और कबीर गा रहे हैं; (जो) अकाल पुरख को अपने नेत्रों से सब जगह देख रहा है। (जो गुरू नानक) अडोलता में टिक के परमात्मा के मिलाप के स्वाद का आनंद लेता है। (जो गुरू नानक) गुरू के ज्ञान की बरकति से अकाल-पुरख में सुरति जोड़ के उसके बिना किसी और को नहीं जानता। (उसके) गुणों को बेणी भगत गा रहा है। सुखदेव ऋषि (गुरू नानक के गुण) गा रहा है और (राजा) परीक्ष्यत (भी गुरू नानक के) गुणों को गा रहा है। गौतम ऋषी ने (भी गुरू नानक का ही) यश गाया है। हे कल् कवी! गुरू नानक (देव जी) की सुंदर शोभा नित्य नई है और जगत में अपना प्रभाव डाल रही है। 8।

भट्ट कल · सवैया

गुण गावहि पायालि भगत नागादि भुयंगम ॥

गुण गावहि पायालि भगत नागादि भुयंगम ॥
महादेउ गुण रवै सदा जोगी जति जंगम ॥
गुण गावै मुनि ब्यासु जिनि बेद ब्याकरण बीचारिअ ॥
ब्रहमा गुण उचरै जिनि हुकमि सभ स्रिसटि सवारीअ ॥
ब्रहमंड खंड पूरन ब्रहमु गुण निरगुण सम जाणिओ ॥
जपु कल सुजसु नानक गुर सहजु जोगु जिनि माणिओ ॥9॥

हिन्दी अर्थ: पाताल में भी (शेष-) नाग आदिक और सर्प-भगत (गुरू नानक के) गुण गा रहे हैं। महादेव, योगी, सन्यासी, जंगम इत्यादि सदा उसी के गौरव-गान में लीन रहते हैं। जिस (ब्यास मुनि) ने सारे वेदों को व्याकरणों द्वारा विचारा है। वह (गुरू नानक के) गुण गा रहा है। जिस (ब्रहमा) ने अकाल-पुरख के हुकम में सारी सृष्टि रची है। वह (गुरू नानक के) गुण उचार रहा है। जिस गुरू नानक ने अडोल अवस्था को और अकाल-पुरख के मिलाप को पाया है। जिस गुरू नानक ने सारी दुनिया में हाजिर-नाजर अकाल-पुरख को सरगुण और निरगुण रूपों में एक-समान पहचाना है। हे कल्! उस गुरू नानक के सुंदर गुणों को याद करें। 9।

भट्ट कल · सवैया

गुण गावहि नव नाथ धंनि गुरु साचि समाइओ ॥

गुण गावहि नव नाथ धंनि गुरु साचि समाइओ ॥
मांधाता गुण रवै जेन चक्रवै कहाइओ ॥
गुण गावै बलि राउ सपत पातालि बसंतौ ॥
भरथरि गुण उचरै सदा गुर संगि रहंतौ ॥
दूरबा परूरउ अंगरै गुर नानक जसु गाइओ ॥
कबि कल सुजसु नानक गुर घटि घटि सहजि समाइओ ॥10॥

हिन्दी अर्थ: नौ नाथ (भी) गुरू नानक के गुण गाते हैं (और कहते हैं)। "गुरू नानक धन्य है जो सच्चे हरी में जुड़ा हुआ है। जिस मान्धाता ने अपने आप को चक्रवर्ती राजा कहलवाया था। वह भी गुरू नानक के गुण उचार रहा है। मांधाता = सूर्यवंशी कुल का एक राजा, युवनांशु का पुत्र था, बड़ा बली राजा था। जेन = जिनि, जिस ने (अपने आप को)। चक्रवै = चक्रवर्ती। कहाइओ = कहलवाया। सातवें पाताल में बसता हुआ राजा बली (गुरू नानक के) गुण गा रहा है। अपने गुरू के साथ रहता हुआ भरथरी भी सदा (गुरू नानक के) गुण उचार रहा है। दुर्वासा ऋषि ने। राजा पुरू ने और अंगर ऋषि ने गुरू नानक का यश गाया है। हे कल् कवि! गुरू नानक की सुंदर शोभा सहज ही हरेक प्राणी-मात्र के हृदय में टिकी हुई है। 10।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भट्ट कल।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1390 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।