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1408
सवैये
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- भै निरभउ माणिअउ लाख महि अलखु लखायउ ॥
- अमिउ रसना बदनि बर दाति अलख अपार गुर सूर सबदि हउमै निवार्यउ ॥
- सोरठे ॥
- भवजलु साइरु सेतु नामु हरी का बोहिथा ॥
- जगत उधारणु नामु सतिगुर तुठै पाइअउ ॥
- जोति रूपि हरि आपि गुरू नानकु कहायउ ॥
- सति रूपु सति नामु सतु संतोखु धरिओ उरि ॥
- तिह जन जाचहु जगत्र पर जानीअतु बासुर रयनि बासु जा को हितु नाम सिउ ॥
· सवैया
भै निरभउ माणिअउ लाख महि अलखु लखायउ ॥
भै निरभउ माणिअउ लाख महि अलखु लखायउ ॥
अगमु अगोचर गति गभीरु सतिगुरि परचायउ ॥
गुर परचै परवाणु राज महि जोगु कमायउ ॥
धंनि धंनि गुरु धंनि अभर सर सुभर भरायउ ॥
गुर गम प्रमाणि अजरु जरिओ सरि संतोख समाइयउ ॥
गुर अरजुन कल्युचरै तै सहजि जोगु निजु पाइयउ ॥8॥
अगमु अगोचर गति गभीरु सतिगुरि परचायउ ॥
गुर परचै परवाणु राज महि जोगु कमायउ ॥
धंनि धंनि गुरु धंनि अभर सर सुभर भरायउ ॥
गुर गम प्रमाणि अजरु जरिओ सरि संतोख समाइयउ ॥
गुर अरजुन कल्युचरै तै सहजि जोगु निजु पाइयउ ॥8॥
हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजन देव जी ने) उस हरी को माणा है। जिसको कोई डर छू नहीं सकता। और जो लाखों में रमा हुआ है। गुरू (रामदास जी) ने आपको उस हरी का उपदेश दिया है जो अगम है। गंभीर है और जिसकी हस्ती इन्द्रियों की पहुँच से परे है। गुरू के उपदेश के कारण आप (प्रभू की हजूरी में) कबूल हो गए हैं। आप ने राज में जोग कमाया है। गुरू अरजन देव धन्य हैं। खाली हृदयों को आप ने (नाम-अमृत से) नाको-नाक भर दिया है। गुरू वाली पदवी प्राप्त कर लेने के कारण आप ने अजर अवस्था को जरा है। और आप संतोख के सरोवर में लीन हो गए हैं। कवि 'कल्' कहता है: 'हे गुरू अरजुन (देव जी)! आपने आत्मिक अडोलता में टिक के (अकाल-पुरख से) असली कृपा प्राप्त कर ली है'। 8।
· सवैया
अमिउ रसना बदनि बर दाति अलख अपार गुर सूर सबदि हउमै निवार्यउ ॥
अमिउ रसना बदनि बर दाति अलख अपार गुर सूर सबदि हउमै निवार्यउ ॥
पंचाहरु निदलिअउ सुंन सहजि निज घरि सहार्यउ ॥
हरि नामि लागि जग उधर्यउ सतिगुरु रिदै बसाइअउ ॥
गुर अरजुन कल्युचरै तै जनकह कलसु दीपाइअउ ॥9॥
पंचाहरु निदलिअउ सुंन सहजि निज घरि सहार्यउ ॥
हरि नामि लागि जग उधर्यउ सतिगुरु रिदै बसाइअउ ॥
गुर अरजुन कल्युचरै तै जनकह कलसु दीपाइअउ ॥9॥
हिन्दी अर्थ: हे अलख! हे अपार! हे सूरमे गुरू! आप जीभ से अमृत (बरसाते हैं) और मुँह से वर की बख्शिश करते हैं। शबद द्वारा आपने अहंकार दूर किया है। अज्ञान को आपने नाश कर दिया है और आत्मिक अडोलता से अफुर निरंकार को अपने हृदय में टिकाया है। हे गुरू अरजुन! हरी-नाम में जुड़ के (आपने) जगत को बचा लिया है; (आप ने) सतिगुरू को हृदय में बसाया है। कल् कवि कहता है: आपने ज्ञान-रूप कलश को चमकाया है। 9।
· सवैया
सोरठे ॥
सोरठे ॥
गुरु अरजुनु पुरखु प्रमाणु पारथउ चालै नही ॥
नेजा नाम नीसाणु सतिगुर सबदि सवारिअउ ॥1॥
गुरु अरजुनु पुरखु प्रमाणु पारथउ चालै नही ॥
नेजा नाम नीसाणु सतिगुर सबदि सवारिअउ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सोरठे ॥ गुरू अरजुन (देव जी) अकाल-पुरख-रूप है। अर्जुन की तरह कभी घबराने वाले नहीं हैं (भाव, जैसे अर्जुन कुरुक्षेत्र के युद्ध में वैरियों के दलों से नहीं घबराते थे, वैसे ही गुरू अरजुन देव जी कामादिक वैरियों से नहीं घबराते; नाम का प्रकाश आपका नेजा है (हथियार है)। गुरू के शबद ने आपको सुंदर बनाया हुआ है। 1।
· सवैया
भवजलु साइरु सेतु नामु हरी का बोहिथा ॥
भवजलु साइरु सेतु नामु हरी का बोहिथा ॥
तुअ सतिगुर सं हेतु नामि लागि जगु उधर्यउ ॥2॥
तुअ सतिगुर सं हेतु नामि लागि जगु उधर्यउ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: संसार समुंद्र है। अकाल-पुरख का नाम पुल है और जहाज है। आपका गुरू से प्यार है। (अकाल-पुरख के) नाम में जुड़ के आप ने जगत को (संसार-समुंद्र से) बचा लिया है। 2।
· सवैया
जगत उधारणु नामु सतिगुर तुठै पाइअउ ॥
जगत उधारणु नामु सतिगुर तुठै पाइअउ ॥
अब नाहि अवर सरि कामु बारंतरि पूरी पड़ी ॥3॥12॥
अब नाहि अवर सरि कामु बारंतरि पूरी पड़ी ॥3॥12॥
हिन्दी अर्थ: जगत को तैराने वाला नाम आपने गुरू के प्रसन्न होने पर प्राप्त किया है। हमें अब किसी से कोई सरोकार नहीं। (गुरू अरजुन देव जी के) दर पर ही हमारे सारे कारज रास हो गए हैं। 3। 12।
· सवैया
जोति रूपि हरि आपि गुरू नानकु कहायउ ॥
जोति रूपि हरि आपि गुरू नानकु कहायउ ॥
ता ते अंगदु भयउ तत सिउ ततु मिलायउ ॥
अंगदि किरपा धारि अमरु सतिगुरु थिरु कीअउ ॥
अमरदासि अमरतु छत्रु गुर रामहि दीअउ ॥
गुर रामदास दरसनु परसि कहि मथुरा अंम्रित बयण ॥
मूरति पंच प्रमाण पुरखु गुरु अरजुनु पिखहु नयण ॥1॥
ता ते अंगदु भयउ तत सिउ ततु मिलायउ ॥
अंगदि किरपा धारि अमरु सतिगुरु थिरु कीअउ ॥
अमरदासि अमरतु छत्रु गुर रामहि दीअउ ॥
गुर रामदास दरसनु परसि कहि मथुरा अंम्रित बयण ॥
मूरति पंच प्रमाण पुरखु गुरु अरजुनु पिखहु नयण ॥1॥
हिन्दी अर्थ: प्रकाश-रूप हरी ने अपने आप को गुरू नानक कहलवाया। उस (गुरू नानक देव जी) से (गुरू अंगद प्रकट हुआ)। (गुरू नानक देव जी की) जोति (गुरू अंगद जी की) जोति के साथ मिल गई। (गुरू) अंगद (देव जी) ने कृपा करके अमरदास जी को गुरू स्थापित किया; (गुरू) अमरदास (जी) ने अपने वाला छत्र गुरू रामदास (जी) को दे दिया। मथुरा कहता है: 'गुरू रामदास (जी) का दर्शन कर के (गुरू अरजन देव जी के) वचन आत्मिक जीवन देने वाले हो गए हैं। पाँचवें स्वरूप अकाल-पुरख रूप गुरू अरजुन देव जी को आँखों से देखिए। 1।
· सवैया
सति रूपु सति नामु सतु संतोखु धरिओ उरि ॥
सति रूपु सति नामु सतु संतोखु धरिओ उरि ॥
आदि पुरखि परतखि लिख्यउ अछरु मसतकि धुरि ॥
प्रगट जोति जगमगै तेजु भूअ मंडलि छायउ ॥
पारसु परसि परसु परसि गुरि गुरू कहायउ ॥
भनि मथुरा मूरति सदा थिरु लाइ चितु सनमुख रहहु ॥
कलजुगि जहाजु अरजुनु गुरू सगल स्रिस्टि लगि बितरहु ॥2॥
आदि पुरखि परतखि लिख्यउ अछरु मसतकि धुरि ॥
प्रगट जोति जगमगै तेजु भूअ मंडलि छायउ ॥
पारसु परसि परसु परसि गुरि गुरू कहायउ ॥
भनि मथुरा मूरति सदा थिरु लाइ चितु सनमुख रहहु ॥
कलजुगि जहाजु अरजुनु गुरू सगल स्रिस्टि लगि बितरहु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: गुरु अर्जुन देव जी ने सत्य और संतोष हृदय में धारण किए हैं। उन्होंने उस हरि को अपने भीतर बसाया है जिसका रूप सत्य है और जिसका नाम सदा अटल है। अकाल पुरख ने आरंभ से ही आपके माथे पर यह लेख प्रकट रूप में लिखा है। आपके भीतर हरि की ज्योति जगमगा रही है और आपका तेज धरती पर छाया हुआ है। पारस-रूप और स्पर्श के योग्य गुरु के संपर्क में आकर आप गुरु की कृपा से गुरु कहलाए। हे मथुरा! कहें: गुरु अर्जुन देव जी के स्वरूप में मन स्थिर करके उनके सन्मुख रहें। कलियुग में गुरु अर्जुन जहाज हैं। हे संसार के लोगो! उनके चरणों में लगकर संसार-सागर से सकुशल पार उतरें। 2।
· सवैया
तिह जन जाचहु जगत्र पर जानीअतु बासुर रयनि बासु जा को हितु नाम सिउ ॥
तिह जन जाचहु जगत्र पर जानीअतु बासुर रयनि बासु जा को हितु नाम सिउ ॥
परम अतीतु परमेसुर कै रंगि रंग्यौ बासना ते बाहरि पै देखीअतु धाम सिउ ॥
अपर परंपर पुरख सिउ प्रेमु लाग्यौ बिनु भगवंत रसु नाही अउरै काम सिउ ॥
मथुरा को प्रभु स्रब मय अरजुन गुरु भगति कै हेति पाइ रहिओ मिलि राम सिउ ॥3॥
परम अतीतु परमेसुर कै रंगि रंग्यौ बासना ते बाहरि पै देखीअतु धाम सिउ ॥
अपर परंपर पुरख सिउ प्रेमु लाग्यौ बिनु भगवंत रसु नाही अउरै काम सिउ ॥
मथुरा को प्रभु स्रब मय अरजुन गुरु भगति कै हेति पाइ रहिओ मिलि राम सिउ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे लोगो! उस गुरू के दर से माँगें। जो सारे संसार में प्रकट है और दिन-रात जिसका प्यार और वासा नाम के साथ है। जो पूरन वैरागवान है। हरी के प्यार में भीगा हुआ है। वाशना से परे है; पर वैसे गृहस्थ में देखा जाता है। (जिस गुरू अरजुन का) प्यार बेअंत हरी के साथ लगा हुआ है। और जिसको हरी के बिना किसी और काम के साथ कोई सरोकार नहीं। वह वह गुरू अरजुन ही मथुरा के सर्व-व्यापक प्रभू हैं। वह भगती की खातिर हरी के चरणों में जुड़ा हुआ है। 3।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भट्ट कल; भट्ट मथुरा।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1408 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।