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अंग 1408

अंग
1408
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: Bhatt Mathuraa
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भै निरभउ माणिअउ लाख महि अलखु लखायउ ॥
अगमु अगोचर गति गभीरु सतिगुरि परचायउ ॥
गुर परचै परवाणु राज महि जोगु कमायउ ॥
धंनि धंनि गुरु धंनि अभर सर सुभर भरायउ ॥
गुर गम प्रमाणि अजरु जरिओ सरि संतोख समाइयउ ॥
गुर अरजुन कल्युचरै तै सहजि जोगु निजु पाइयउ ॥8॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजन देव जी ने) उस हरी को माणा है। जिसको कोई डर छू नहीं सकता। और जो लाखों में रमा हुआ है। गुरू (रामदास जी) ने आपको उस हरी का उपदेश दिया है जो अगम है। गंभीर है और जिसकी हस्ती इन्द्रियों की पहुँच से परे है। गुरू के उपदेश के कारण आप (प्रभू की हजूरी में) कबूल हैं गए हैं। आप ने राज में जोग कमाया है। गुरू अरजन देव धन्य हैं। खाली हृदयों को आप ने (नाम-अमृत से) नाको-नाक भर दिया है। गुरू वाली पदवी प्राप्त कर लेने के कारण आप ने अजर अवस्था को जरा है। और आप संतोख के सरोवर में लीन हैं गए हैं। कवि ‘कल्’ कहता है- ‘हे गुरू अरजुन (देव जी) ! तूने आत्मिक अडोलता में टिक के (अकाल-पुरख से) असली कृपा प्राप्त कर ली है’। 8।
अमिउ रसना बदनि बर दाति अलख अपार गुर सूर सबदि हउमै निवार्यउ ॥
पंचाहरु निदलिअउ सुंन सहजि निज घरि सहार्यउ ॥
हरि नामि लागि जग उधर्यउ सतिगुरु रिदै बसाइअउ ॥
गुर अरजुन कल्युचरै तै जनकह कलसु दीपाइअउ ॥9॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: हे अलख ! हे अपार ! हे सूरमे गुरू ! आप जीभ से अमृत (बरसाते हो) और मुँह से वर की बख्शिश करते हैं। शबद द्वारा आपने अहंकार दूर किया है। अज्ञान को आपने नाश कर दिया है और आत्मिक अडोलता से अफुर निरंकार को अपने हृदय में टिकाया है। हे गुरू अरजुन ! हरी-नाम में जुड़ के (आपने) जगत को बचा लिया है; (आप ने) सतिगुरू को हृदय में बसाया है। कल् कवि कहता है- आपने ज्ञान-रूप कलश को चमकाया है। 9।
सोरठे ॥
गुरु अरजुनु पुरखु प्रमाणु पारथउ चालै नही ॥
नेजा नाम नीसाणु सतिगुर सबदि सवारिअउ ॥1॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: सोरठे ॥ गुरू अरजुन (देव जी) अकाल-पुरख-रूप है। अर्जुन की तरह कभी घबराने वाले नहीं हैं (भाव। जैसे अर्जुन कुरुक्षेत्र के युद्ध में वैरियों के दलों से नहीं घबराते थे। वैसे ही गुरू अरजुन देव जी कामादिक वैरियों से नहीं घबराते; नाम का प्रकाश आपका नेजा है (हथियार है)। गुरू के शबद ने आपको सुंदर बनाया हुआ है। 1।
भवजलु साइरु सेतु नामु हरी का बोहिथा ॥
तुअ सतिगुर सं हेतु नामि लागि जगु उधर्यउ ॥2॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: संसार समुंद्र है। अकाल-पुरख का नाम पुल है और जहाज है। आपका गुरू से प्यार है। (अकाल-पुरख के) नाम में जुड़ के आप ने जगत को (संसार-समुंद्र से) बचा लिया है। 2।
जगत उधारणु नामु सतिगुर तुठै पाइअउ ॥
अब नाहि अवर सरि कामु बारंतरि पूरी पड़ी ॥3॥12॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: जगत को तैराने वाला नाम आपने गुरू के प्रसन्न होने पर प्राप्त किया है। हमें अब किसी से कोई सरोकार नहीं। (गुरू अरजुन देव जी के) दर पर ही हमारे सारे कारज रास हो गए हैं। 3। 12।
जोति रूपि हरि आपि गुरू नानकु कहायउ ॥
ता ते अंगदु भयउ तत सिउ ततु मिलायउ ॥
अंगदि किरपा धारि अमरु सतिगुरु थिरु कीअउ ॥
अमरदासि अमरतु छत्रु गुर रामहि दीअउ ॥
गुर रामदास दरसनु परसि कहि मथुरा अंम्रित बयण ॥
मूरति पंच प्रमाण पुरखु गुरु अरजुनु पिखहु नयण ॥1॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: प्रकाश-रूप हरी ने अपने आप को गुरू नानक कहलवाया। उस (गुरू नानक देव जी) से (गुरू अंगद प्रकट हुआ)। (गुरू नानक देव जी की) जोति (गुरू अंगद जी की) जोति के साथ मिल गई। (गुरू) अंगद (देव जी) ने कृपा करके अमरदास जी को गुरू स्थापित किया; (गुरू) अमरदास (जी) ने अपने वाला छत्र गुरू रामदास (जी) को दे दिया। मथुरा कहता है- ‘गुरू रामदास (जी) का दर्शन कर के (गुरू अरजन देव जी के) वचन आत्मिक जीवन देने वाले हो गए हैं। पाँचवें स्वरूप अकाल-पुरख रूप गुरू अरजुन देव जी को आँखों से देखो। 1।
सति रूपु सति नामु सतु संतोखु धरिओ उरि ॥
आदि पुरखि परतखि लिख्यउ अछरु मसतकि धुरि ॥
प्रगट जोति जगमगै तेजु भूअ मंडलि छायउ ॥
पारसु परसि परसु परसि गुरि गुरू कहायउ ॥
भनि मथुरा मूरति सदा थिरु लाइ चितु सनमुख रहहु ॥
कलजुगि जहाजु अरजुनु गुरू सगल स्रिस्टि लगि बितरहु ॥2॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजुन देव जी ने) संत-संतोख हृदय में धारण किया है। और उस हरी को अपने अंदर बसाया है जिसका रूप सति है और नाम सदा-स्थिर है। प्रत्यक्ष तौर पर अकाल पुरख ने धुर से ही आप के माथे पर लेख लिखा है। (आप के अंदर) प्रतयक्ष तौर पर (हरी की) जोति जगमग-जगमग कर रही है। (आपका) तेज धरती पर छाया हुआ है। पारस (गुरू) को और परसने-योग्य (गुरू) को छू के (आप) गुरू से गुरू कहलवाए। हे मथुरा ! कह- (गुरू अरजुन देव जी के) स्वरूप में मन भली प्रकार जोड़ के सन्मुख रहो। गुरू अरजन कलियुग में जहाज है। हे दुनिया के लोगो ! उसके चरणों में लग के (संसार-सागर) से सही-सलामत पार हो जाएँ। 2।
तिह जन जाचहु जगत्र पर जानीअतु बासुर रयनि बासु जा को हितु नाम सिउ ॥
परम अतीतु परमेसुर कै रंगि रंग्यौ बासना ते बाहरि पै देखीअतु धाम सिउ ॥
अपर परंपर पुरख सिउ प्रेमु लाग्यौ बिनु भगवंत रसु नाही अउरै काम सिउ ॥
मथुरा को प्रभु स्रब मय अरजुन गुरु भगति कै हेति पाइ रहिओ मिलि राम सिउ ॥3॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: हे लोगो ! उस गुरू के दर से माँगो। जो सारे संसार में प्रकट है और दिन-रात जिसका प्यार और वासा नाम के साथ है। जो पूरन वैरागवान है। हरी के प्यार में भीगा हुआ है। वाशना से परे है; पर वैसे गृहस्थ में देखा जाता है। (जिस गुरू अरजुन का) प्यार बेअंत हरी के साथ लगा हुआ है। और जिसको हरी के बिना किसी और काम के साथ कोई सरोकार नहीं। वह वह गुरू अरजुन ही मथुरा के सर्व-व्यापक प्रभू हैं। वह भगती की खातिर हरी के चरणों में जुड़ा हुआ है। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(गुरू अरजन देव जी ने) उस हरी को माणा है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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