लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1397 · सवैये

इस पृष्ठ पर
अंग
1397
सवैये
अंग बदलें या अंश चुनें · 7 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. सतगुरि दयालि हरि नामु द्रिड़॑ाया तिसु प्रसादि वसि पंच करे ॥
  2. अनभउ उनमानि अकल लिव लागी पारसु भेटिआ सहज घरे ॥
  3. अभर भरे पायउ अपारु रिद अंतरि धारिओ ॥
  4. संतोख सरोवरि बसै अमिअ रसु रसन प्रकासै ॥
  5. जगु जितउ सतिगुर प्रमाणि मनि एकु धिआयउ ॥
  6. प्रेम भगति परवाह प्रीति पुबली न हुटइ ॥
  7. जगत उधारणु नव निधानु भगतह भव तारणु ॥

सतगुरि दयालि हरि नामु द्रिड़॑ाया तिसु प्रसादि वसि पंच करे ॥

अंग 1396 से चला आ रहा अंश

सतगुरि दयालि हरि नामु द्रिड़॑ाया तिसु प्रसादि वसि पंच करे ॥
कवि कल्य ठकुर हरदास तने गुर रामदास सर अभर भरे ॥3॥

हिन्दी अर्थ: दयालु गुरू (अमरदास जी) ने (गुरू रामदास जी को) नाम दृढ़ करवाया है (भाव। जपाया है); उस नाम की बरकति से (गुरू रामदास जी ने) कामादिक पाँचों को अपने काबू किया हुआ है। हे कल्सहार कवि ! ठाकुर हरदास जी के सपुत्र गुरू रामदास जी (हृदय-रूपी) खाली सरोवरों को (नाम-अमृत से) भरने वाले हैं। 3।

अनभउ उनमानि अकल लिव लागी पारसु भेटिआ सहज घरे ॥

अनभउ उनमानि अकल लिव लागी पारसु भेटिआ सहज घरे ॥
सतगुर परसादि परम पदु पाया भगति भाइ भंडार भरे ॥
मेटिआ जनमांतु मरण भउ भागा चितु लागा संतोख सरे ॥
कवि कल्य ठकुर हरदास तने गुर रामदास सर अभर भरे ॥4॥

हिन्दी अर्थ: (गुरू रामदास जी को) विचार द्वारा ज्ञान प्राप्त हुआ है। (आपकी) बिरती एक-रस व्यापक हरी के साथ जुड़ी हुई है। (गुरू रामदास जी को गुरू अमरदास) पारस मिल गया है (जिसकी बरकति से गुरू रामदास) सहज अवस्था में पहुँच गया है। सतिगुरू (अमरदास जी) की कृपा से (गुरू रामदास जी ने) ऊँची पदवी पाई है और भगती के प्यार से (आप के) खजाने भरे हुए हैं। गुरू रामदास जी ने (अपना) जनम-मरण मिटा लिया हुआ है। (गुरू रामदास जी का) मौत का डर दूर हो चुका है और (उनका) चित्त संतोख के सरोवर अकाल पुरख में जुड़ा रहता है। हे कल्सहार कवि ! ठाकुर हरदास जी के सपुत्र गुरू रामदास जी (हृदय-रूपी) खाली सरोवरों को (नाम-अमृत से) भरने वाले हैं। 4।

अभर भरे पायउ अपारु रिद अंतरि धारिओ ॥

अभर भरे पायउ अपारु रिद अंतरि धारिओ ॥
दुख भंजनु आतम प्रबोधु मनि ततु बीचारिओ ॥
सदा चाइ हरि भाइ प्रेम रसु आपे जाणइ ॥
सतगुर कै परसादि सहज सेती रंगु माणइ ॥
नानक प्रसादि अंगद सुमति गुरि अमरि अमरु वरताइओ ॥
गुर रामदास कल्युचरै तैं अटल अमर पदु पाइओ ॥5॥

हिन्दी अर्थ: (गुरू रामदास जी ने) खाली हृदयों को भरने वाला हरी पा लिया है। (आप ने बेअंत हरी को अपने) हृदय में बसा लिया है। (और अपने) मन में (उस) अकाल-पुरख को सिमरा है (जो) दुखों का नाश करने वाला है और आत्मा को जगाने वाला है। (गुरू रामदास) नित्य खुशी में (रहता है)। हरी के प्यार में (मस्त है और हरी के) प्यार के स्वाद को वह स्वयं ही जानता है। (गुरू रामदास) सतगुरू (अमरदास जी) की कृपा द्वारा आत्मिक अडोलता से आनंद पा रहा है। कवि कलसहार कहता है- (गुरू) नानक जी की कृपा से (और गुरू) अंगद जी की बख्शी सुंदर बुद्धि से। गुरू अमरदास जी ने अकाल-पुरख का हुकम प्रयोग में लाया है। (कि) हे गुरू रामदास जी ! आपने सदा-स्थिर रहने वाले अविनाशी हरी की पदवी प्राप्त कर ली है। 5।

संतोख सरोवरि बसै अमिअ रसु रसन प्रकासै ॥

संतोख सरोवरि बसै अमिअ रसु रसन प्रकासै ॥
मिलत सांति उपजै दुरतु दूरंतरि नासै ॥
सुख सागरु पाइअउ दिंतु हरि मगि न हुटै ॥
संजमु सतु संतोखु सील संनाहु मफुटै ॥
सतिगुरु प्रमाणु बिध नै सिरिउ जगि जस तूरु बजाइअउ ॥
गुर रामदास कल्युचरै तै अभै अमर पदु पाइअउ ॥6॥

हिन्दी अर्थ: (गुरू रामदास) संतोख के सरोवर में बसता है। (और अपनी) जीभ से नाम-अमृत के स्वाद को प्रकट करता है। (गुरू रामदास जी के) दर्शन करने से (हृदय में) ठंढ पैदा होती है और पाप दूर से ही (देख के) नाश हो जाते हैं। (गुरू रामदास जी ने गुरू अमरदास जी का) दिया हुआ सुखों का सागर (प्रभू-मिलाप) प्राप्त किया है। (तभी गुरू रामदास) हरी के राह में (चलते हुए) थकते नहीं हैं। (गुरू रामदास जी का) संजम सत संतोख और मीठा स्वभाव-रूपी संजोअ (ऐसा है कि वह) टूटता नहीं है; (भाव। आप इतने गुण समपन्न हैं)। (गुरू रामदास जी को) करतार ने गुरू (अमरदास जी) के तुल्य बनाया है। जगत ने (आप की) शोभा का बाजा बजाया है। कवि कलसहार कहता है- 'हे गुरू रामदास ! आपने निरभउ और अविनाशी हरी की पदवी पा ली है'। 6।

जगु जितउ सतिगुर प्रमाणि मनि एकु धिआयउ ॥

जगु जितउ सतिगुर प्रमाणि मनि एकु धिआयउ ॥
धनि धनि सतिगुर अमरदासु जिनि नामु द्रिड़ायउ ॥
नव निधि नामु निधानु रिधि सिधि ता की दासी ॥
सहज सरोवरु मिलिओ पुरखु भेटिओ अबिनासी ॥
आदि ले भगत जितु लगि तरे सो गुरि नामु द्रिड़ाइअउ ॥
गुर रामदास कल्युचरै तै हरि प्रेम पदारथु पाइअउ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: (गुरू रामदास जी ने) गुरू (अमरदास जी) की तरह जगत को जीता है और (अपने) मन में एक (अकाल-पुरख) को सिमरा है। सतिगुरू अमरदास धन्य है। जिसने (गुरू रामदास जी को) नाम दृढ़ कराया है। (गुरू रामदास जी को) नाम-खजाना मिल गया है। (मानो) नौ निधियां प्राप्त हो गई हैं। सभ रिद्धियां और सिद्धियां उसकी दासियां हैं। (गुरू रामदास जी को) शांति का सरोवर हरी मिल गया है। अविनाशी सर्व-व्यापक प्रभू मिल गया है। जिस (नाम) में लग के आदि से ही भगतों का उद्धार होता आया है। वह नाम गुरू (अमरदास जी) को दृढ़ करवाया है। कवि कल्सहार कहता है- 'हे गुरू रामदास जी ! आपने अकाल-पुरख के प्यार का (उक्तम) पदार्थ पा लिया है'। 7।

प्रेम भगति परवाह प्रीति पुबली न हुटइ ॥

प्रेम भगति परवाह प्रीति पुबली न हुटइ ॥
सतिगुर सबदु अथाहु अमिअ धारा रसु गुटइ ॥
मति माता संतोखु पिता सरि सहज समायउ ॥
आजोनी संभविअउ जगतु गुर बचनि तरायउ ॥
अबिगत अगोचरु अपरपरु मनि गुर सबदु वसाइअउ ॥
गुर रामदास कल्युचरै तै जगत उधारणु पाइअउ ॥8॥

हिन्दी अर्थ: (गुरू रामदास जी के हृदय में) अकाल पुरख की प्यार भरी भगती के चश्मे चल रहे हैं। (गुरू रामदास जी की अकाल-पुरख के साथ जो) पहले की प्रीति (है। वह) खत्म नहीं होती; गुरू (अमरदास जी) का (जो) अथाह शबद (है। उस द्वारा गुरू रामदास) नाम-अमृत की धाराओं का स्वाद गट-गट करके ले रहा है। (ऊँची) मति (गुरू रामदास जी की) माता है और संतोख (आप का) पिता है (भाव। आप इन गुणों में जन्में-पले हैं। आप ऊँची बुद्धि वाले और पूर्ण संतोखी हैं)। (गुरू रामदास) सदा शान्ति के सरोवर में डुबकी लगाए रखता है। (गुरू रामदास) जूनियों से रहित और स्वै-प्रकाश हरी का रूप है। संसार को (आप ने) सतिगुरू के वचनों से तैरा दिया है। (गुरू रामदास) अदृष्य अगोचर और बेअंत हरी का रूप है। (आप ने अपने) मन में सतिगुरू का शबद बसाया है। कवि कलसहार कहता है- 'हे गुरू रामदास ! आपने जगत का उद्धार करने वाला अकाल-पुरख पा लिया है'। 8।

जगत उधारणु नव निधानु भगतह भव तारणु ॥

जगत उधारणु नव निधानु भगतह भव तारणु ॥
अंम्रित बूंद हरि नामु बिसु की बिखै निवारणु ॥
सहज तरोवर फलिओ गिआन अंम्रित फल लागे ॥
गुर प्रसादि पाईअहि धंनि ते जन बडभागे ॥
ते मुकते भए सतिगुर सबदि मनि गुर परचा पाइअउ ॥
गुर रामदास कल्युचरै तै सबद नीसानु बजाइअउ ॥9॥

हिन्दी अर्थ: (सतिगुरू रामदास जी के पास) हरी का नाम। (मानो)। अमृत की बूँद है। जो संसार को तारने-योग्य है। जो नौ निधियों का भंडार है। जो भगत-जनों को संसार-सागर से पार करने के समर्थ है और जो सारे संसार के विष को दूर करने योग्य है। गुरू रामदास आत्मिक अडोलता का श्रेष्ठ वृक्ष है जो फला-फुला हुआ है। (इस वृक्ष को) ज्ञान देने वाले अमृत फल लगे हुए हैं। (यह फल) गुरू की कृपा से मिलते हैं। और वह मनुष्य धन्य और अति भाग्याशाली हैं। (जिनको यह फल प्राप्त हुए हैं)। वह मनुष्य सतिगुरू के शबद की बरकति से मुक्त हो गए हैं। जिन्होंने अपने मन में गुरू (रामदास जी) के साथ प्यार डाला है। कवि कलसहार कहता है- 'हे गुरू रामदास ! आपने शबद का नगारा बजाया है'। 9।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भट्ट कल।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1397 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।