अंग 1403

अंग
1403
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: Bhatt Gayandh
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बेवजीर बडे धीर धरम अंग अलख अगम खेलु कीआ आपणै उछाहि जीउ ॥
अकथ कथा कथी न जाइ तीनि लोक रहिआ समाइ सुतह सिध रूपु धरिओ साहन कै साहि जीउ ॥
सति साचु स्री निवासु आदि पुरखु सदा तुही वाहिगुरू वाहिगुरू वाहिगुरू वाहि जीउ ॥३॥८॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: आप बड़ा धैर्य वाला है। आपको सलाहकार की जरूरत नहीं। आप धर्म-स्वरूप है। अलख और अगम है। ये सारा खेल तूने (ही) अपने चाव से रचा है। (हे गुरु !) आपकी महिमा बयान से परे है जो कही नहीं जा सकती। आप तीन लोगों के बीच व्यापक हैं। हे शाह के राजा ! आपने अपनी इच्छा के साथ (मानव रूप) लिया है। हे गुरु ! आप चमत्कारिक। सत्-रूप और अन्नत हैं; आप लक्ष्मी का आसरा हैं; आप प्रारंभ से हैं और सदा के लिये। वाह-गुरू वाह-गुरू जी !
सतिगुरू सतिगुरू सतिगुरु गुबिंद जीउ ॥
बलिहि छलन सबल मलन भग्ति फलन कान॑ कुअर निहकलंक बजी डंक चड़्हू दल रविंद जीउ ॥
राम रवण दुरत दवण सकल भवण कुसल करण सरब भूत आपि ही देवाधि देव सहस मुख फनिंद जीउ ॥
जरम करम मछ कछ हुअ बराह जमुना कै कूलि खेलु खेलिओ जिनि गिंद जीउ ॥
नामु सारु हीए धारु तजु बिकारु मन गयंद सतिगुरू सतिगुरू सतिगुर गुबिंद जीउ ॥४॥९॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू गोबिंद-रूप है। (मेरे वास्ते तो) सतिगुरू ही है (वह) जिसने राजा बली को छला था। आप अहंकारियों का घमण्ड तोड़ने वाले हैं। भगती का फल देने वाले हैं। (मेरे लिए तो) गुरू ही कान्ह-कुमार है। (आप में) कोई कलंक नहीं। आप का डंका बज रहा है। सूरज और चँद्रमा का दल आप ही की शोभा बढ़ाने के लिए चढ़ता है। आप अकाल-पुरख का सिमरन करते हैं। पापों को दूर करने वाले हैं। सब जगह सुख पैदा करने वाले हैं। सारे जीवों में आप ही हैं। आप ही देवताओं के देवता हैं। और (मेरे लिए तो) हजारों मुँहों वाले शेशनाग भी आप ही हैं। (मेरे लिए तो गोबिंद-रूप सतिगुरू ही है वह) जिसने मॅछ-कॅछ और वराह के जनम ले के काम किए। जिसने यमुना के किनारे गेंद की खेल खेली थी। हे गयंद के मन ! (इस सतिगुरू का) श्रेष्ठ नाम हृदय में धारण कर और विकार छोड़ दे; यह गुरू वही गोबिंद है। 4। 9।
सिरी गुरू सिरी गुरू सिरी गुरू सति जीउ ॥
गुर कहिआ मानु निज निधानु सचु जानु मंत्रु इहै निसि बासुर होइ कल्यानु लहहि परम गति जीउ ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु जण जण सिउ छाडु धोहु हउमै का फंधु काटु साधसंगि रति जीउ ॥
देह गेहु त्रिअ सनेहु चित बिलासु जगत एहु चरन कमल सदा सेउ द्रिड़ता करु मति जीउ ॥
नामु सारु हीए धारु तजु बिकारु मन गयंद सिरी गुरू सिरी गुरू सिरी गुरू सति जीउ ॥५॥१०॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू ही सदा-स्थिर है। (हे मन !) सतिगुरू का वचन मान। यही साथ निभने वाला खजाना है; निष्चय करके मान कि यही मंत्र है (जिससे आपको) दिन-रात सुख हुआ और आप ऊँची पदवी पा लेगा। काम। क्रोध। लोभ। मोह और हर जने-खणे से ठॅगी करनी छोड़ दे; अहंकार का फंदा (भी) दूर कर के साध-संगति में प्यार डाल। ये शरीर। घर। स्त्री का प्यार। ये (सारा) संसार मन की (ही) खेल है। (सतिगुरू के) चरण-कमलों का सिमरन कर। (अपनी) मति में यही भाव दृढ़ कर। हे गयंद के मन ! (सतिगुरू का) श्रेष्ठ नाम हृदय में धारण कर और विकार छोड़ दे; सतिगुरू (ही) सदा-स्थिर है। 5।
सेवक कै भरपूर जुगु जुगु वाहगुरू तेरा सभु सदका ॥
निरंकारु प्रभु सदा सलामति कहि न सकै कोऊ तू कद का ॥
ब्रहमा बिसनु सिरे तै अगनत तिन कउ मोहु भया मन मद का ॥
चवरासीह लख जोनि उपाई रिजकु दीआ सभ हू कउ तद का ॥
सेवक कै भरपूर जुगु जुगु वाहगुरू तेरा सभु सदका ॥१॥११॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: हे गुरू ! आप धन्य है ! आप अपने सेवकों के हृदय में सदा हाजर-नाजर है। आपकी ही सारी बरकति है; आप निरंकार (-रूप) है। प्रभू (-रूप) है। सदा स्थिर है। कोई नहीं कह सकता। आप कब का है। (हे गुरू !) तूने ही अगनित ब्रहमा और विष्णु पैदा किए हैं। और उनको अपने मन के अहंकार का मोह हो गया। (हे गुरू ! आप ही) चौरासी लाख जून पैदा की है। और सभी को तब से ही रिजक दे रहा है। हे गुरू ! आप धन्य है ! आप अपने सेवकों के हृदय में सदा हाजिर-नाजर है। आपकी ही सारी बरकति है। 1। 11।
वाहु वाहु का बडा तमासा ॥
आपे हसै आपि ही चितवै आपे चंदु सूरु परगासा ॥
आपे जलु आपे थलु थंम॑नु आपे कीआ घटि घटि बासा ॥
आपे नरु आपे फुनि नारी आपे सारि आप ही पासा ॥
गुरमुखि संगति सभै बिचारहु वाहु वाहु का बडा तमासा ॥२॥१२॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: बरकति वाले गुरू (रामदास) का (संसार-रूप यह) बड़ा खेल हो रहा है। (सरब-व्यापक प्रभू का रूप गुरू) आप ही हस रहा है। आप ही विचार रहा है। आप ही चाँद और सूरज को रौशनी दे रहा है। (वह गुरू) आप ही जल है। आप ही धरती है। आप ही आसरा है और उसने आप ही हरेक शरीर में निवास किया हुआ है। (सर्व-व्यापक प्रभू का रूप गुरू रामदास) आप ही नर और आप ही नारी है; स्वयं ही नर्द है और स्वयं ही चौपड़ है। हे गुरमुखो ! संगति में मिल के सारे विचार करो। बरकति वाले गुरू (रामदास जी) का (संसार-रूप) यह खेल हो रहा है। 2। 12।
कीआ खेलु बड मेलु तमासा वाहिगुरू तेरी सभ रचना ॥
तू जलि थलि गगनि पयालि पूरि रह्या अंम्रित ते मीठे जा के बचना ॥
मानहि ब्रहमादिक रुद्रादिक काल का कालु निरंजन जचना ॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: हे गुरू ! आप धन्य है। ये सृष्टि सभ आपकी (की हुई) है; तूने (तत्वों का) मेल (करके) एक खेल और तमाशा रचा दिया है। आप जल में। पृथ्वी पर। आकाश पर। पाताल में (सब जगह) व्यापक है; आपके वचन अमृत से भी मीठे हैं। हे गुरू ! ब्रहमा और रुद्र (शिव) आदि (आपको) मानते हैं (आपको सेवते हैं)। आप काल का भी काल है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।