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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1403 · सवैये

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अंग
1403
सवैये
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  1. बेवजीर बडे धीर धरम अंग अलख अगम खेलु कीआ आपणै उछाहि जीउ ॥
  2. सतिगुरू सतिगुरू सतिगुरु गुबिंद जीउ ॥
  3. सिरी गुरू सिरी गुरू सिरी गुरू सति जीउ ॥
  4. सेवक कै भरपूर जुगु जुगु वाहगुरू तेरा सभु सदका ॥
  5. वाहु वाहु का बडा तमासा ॥
  6. कीआ खेलु बड मेलु तमासा वाहिगुरू तेरी सभ रचना ॥

बेवजीर बडे धीर धरम अंग अलख अगम खेलु कीआ आपणै उछाहि जीउ ॥

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बेवजीर बडे धीर धरम अंग अलख अगम खेलु कीआ आपणै उछाहि जीउ ॥
अकथ कथा कथी न जाइ तीनि लोक रहिआ समाइ सुतह सिध रूपु धरिओ साहन कै साहि जीउ ॥
सति साचु स्री निवासु आदि पुरखु सदा तुही वाहिगुरू वाहिगुरू वाहिगुरू वाहि जीउ ॥3॥8॥

हिन्दी अर्थ: आप बड़े धैर्य वाले हैं। आपको सलाहकार की जरूरत नहीं। आप धर्म-स्वरूप हैं। अलख और अगम हैं। ये सारा खेल आपने (ही) अपने चाव से रचा है। (हे गुरु !) आपकी महिमा बयान से परे है जो कही नहीं जा सकती। आप तीन लोगों के बीच व्यापक हैं। हे शाह के राजा ! आपने अपनी इच्छा के साथ (मानव रूप) लिया है। हे गुरु ! आप चमत्कारिक, सत्-रूप और अन्नत हैं; आप लक्ष्मी का आसरा हैं; आप प्रारंभ से हैं और सदा के लिये। वाह-गुरू वाह-गुरू जी !

सतिगुरू सतिगुरू सतिगुरु गुबिंद जीउ ॥

सतिगुरू सतिगुरू सतिगुरु गुबिंद जीउ ॥
बलिहि छलन सबल मलन भग्ति फलन कान॑ कुअर निहकलंक बजी डंक चड़्हू दल रविंद जीउ ॥
राम रवण दुरत दवण सकल भवण कुसल करण सरब भूत आपि ही देवाधि देव सहस मुख फनिंद जीउ ॥
जरम करम मछ कछ हुअ बराह जमुना कै कूलि खेलु खेलिओ जिनि गिंद जीउ ॥
नामु सारु हीए धारु तजु बिकारु मन गयंद सतिगुरू सतिगुरू सतिगुर गुबिंद जीउ ॥4॥9॥

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू गोबिंद-रूप है। (मेरे वास्ते तो) सतिगुरू ही है (वह) जिसने राजा बली को छला था। आप अहंकारियों का घमण्ड तोड़ने वाले हैं। भगती का फल देने वाले हैं। (मेरे लिए तो) गुरू ही कान्ह-कुमार है। (आप में) कोई कलंक नहीं। आप का डंका बज रहा है। सूरज और चँद्रमा का दल आप ही की शोभा बढ़ाने के लिए चढ़ता है। आप अकाल-पुरख का सिमरन करते हैं। पापों को दूर करने वाले हैं। सब जगह सुख पैदा करने वाले हैं। सारे जीवों में आप ही हैं। आप ही देवताओं के देवता हैं। और (मेरे लिए तो) हजारों मुँहों वाले शेशनाग भी आप ही हैं। (मेरे लिए तो गोबिंद-रूप सतिगुरू ही है वह) जिसने मॅछ-कॅछ और वराह के जनम ले के काम किए। जिसने यमुना के किनारे गेंद की खेल खेली थी। हे गयंद के मन ! (इस सतिगुरू का) श्रेष्ठ नाम हृदय में धारण करें और विकार छोड़ दें; यह गुरू वही गोबिंद है। 4। 9।

सिरी गुरू सिरी गुरू सिरी गुरू सति जीउ ॥

सिरी गुरू सिरी गुरू सिरी गुरू सति जीउ ॥
गुर कहिआ मानु निज निधानु सचु जानु मंत्रु इहै निसि बासुर होइ कल्यानु लहहि परम गति जीउ ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु जण जण सिउ छाडु धोहु हउमै का फंधु काटु साधसंगि रति जीउ ॥
देह गेहु त्रिअ सनेहु चित बिलासु जगत एहु चरन कमल सदा सेउ द्रिड़ता करु मति जीउ ॥
नामु सारु हीए धारु तजु बिकारु मन गयंद सिरी गुरू सिरी गुरू सिरी गुरू सति जीउ ॥5॥10॥

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू ही सदा अटल हैं। हे मन! सतिगुरू का वचन मानें, यही साथ निभाने वाला खजाना है। निश्चय करके जानें कि यही मंत्र है जिससे दिन-रात कल्याण होगा और आप सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था पाएँगे। काम, क्रोध, लोभ, मोह और लोगों के साथ छल करना छोड़ दें। अहंकार का फंदा काटें और साध-संगति में प्रेम रखें। यह शरीर, घर, स्त्री का प्यार और यह सारा संसार मन का ही खेल है। सतिगुरू के चरण-कमलों का सदा स्मरण करें और अपनी बुद्धि में यही भाव दृढ़ करें। हे गयंद के मन! सतिगुरू का श्रेष्ठ नाम हृदय में धारण करें और विकार छोड़ दें। सतिगुरू ही सदा अटल हैं। 5। 10।

सेवक कै भरपूर जुगु जुगु वाहगुरू तेरा सभु सदका ॥

सेवक कै भरपूर जुगु जुगु वाहगुरू तेरा सभु सदका ॥
निरंकारु प्रभु सदा सलामति कहि न सकै कोऊ तू कद का ॥
ब्रहमा बिसनु सिरे तै अगनत तिन कउ मोहु भया मन मद का ॥
चवरासीह लख जोनि उपाई रिजकु दीआ सभ हू कउ तद का ॥
सेवक कै भरपूर जुगु जुगु वाहगुरू तेरा सभु सदका ॥1॥11॥

हिन्दी अर्थ: हे गुरू ! आप धन्य हैं ! आप अपने सेवकों के हृदय में सदा हाजर-नाजर हैं। आपकी ही सारी बरकति है; आप निरंकार (-रूप) हैं। प्रभू (-रूप) हैं। सदा स्थिर हैं। कोई नहीं कह सकता। आप कब के हैं। (हे गुरू !) आपने ही अगनित ब्रहमा और विष्णु पैदा किए हैं। और उनको अपने मन के अहंकार का मोह हो गया। (हे गुरू ! आपने ही) चौरासी लाख जूनें पैदा की हैं। और सभी को तब से ही रिजक दे रहे हैं। हे गुरू ! आप धन्य हैं ! आप अपने सेवकों के हृदय में सदा हाजिर-नाजर हैं। आपकी ही सारी बरकति है। 1। 11।

वाहु वाहु का बडा तमासा ॥

वाहु वाहु का बडा तमासा ॥
आपे हसै आपि ही चितवै आपे चंदु सूरु परगासा ॥
आपे जलु आपे थलु थंम॑नु आपे कीआ घटि घटि बासा ॥
आपे नरु आपे फुनि नारी आपे सारि आप ही पासा ॥
गुरमुखि संगति सभै बिचारहु वाहु वाहु का बडा तमासा ॥2॥12॥

हिन्दी अर्थ: बरकति वाले गुरू (रामदास) का (संसार-रूप यह) बड़ा खेल हो रहा है। (सरब-व्यापक प्रभू का रूप गुरू) आप ही हस रहा है। आप ही विचार रहा है। आप ही चाँद और सूरज को रौशनी दे रहा है। (वह गुरू) आप ही जल है। आप ही धरती है। आप ही आसरा है और उसने आप ही हरेक शरीर में निवास किया हुआ है। (सर्व-व्यापक प्रभू का रूप गुरू रामदास) आप ही नर और आप ही नारी है; स्वयं ही नर्द है और स्वयं ही चौपड़ है। हे गुरमुखो ! संगति में मिल के सारे विचार करें। बरकति वाले गुरू (रामदास जी) का (संसार-रूप) यह खेल हो रहा है। 2। 12।

कीआ खेलु बड मेलु तमासा वाहिगुरू तेरी सभ रचना ॥

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कीआ खेलु बड मेलु तमासा वाहिगुरू तेरी सभ रचना ॥
तू जलि थलि गगनि पयालि पूरि रह्या अंम्रित ते मीठे जा के बचना ॥
मानहि ब्रहमादिक रुद्रादिक काल का कालु निरंजन जचना ॥

हिन्दी अर्थ: हे गुरू ! आप धन्य हैं। ये सृष्टि सभ आपकी (की हुई) है; आपने (तत्वों का) मेल (करके) एक खेल और तमाशा रचा दिया है। आप जल में। पृथ्वी पर। आकाश पर। पाताल में (सब जगह) व्यापक हैं; आपके वचन अमृत से भी मीठे हैं। हे गुरू ! ब्रहमा और रुद्र (शिव) आदि (आपको) मानते हैं (आपको सेवते हैं)। आप काल का भी काल हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भट्ट गयन्द।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1403 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।