अंग 1396

अंग
1396
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: Bhatt Kal
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कहतिअह कहती सुणी रहत को खुसी न आयउ ॥
हरि नामु छोडि दूजै लगे तिन॑ के गुण हउ किआ कहउ ॥
गुरु दयि मिलायउ भिखिआ जिव तू रखहि तिव रहउ ॥२॥२०॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: बल्कि (मुँह से) कहते ही कहते (भाव। औरों को उपदेश करते ही) सुने हैं। पर किसी की रहत देख के मुझे आनंद नहीं आया। उन लोगों के गुण मैं क्या कहूँ। जो हरी के नाम को छोड़ के दूसरे (भाव। माया के प्यार) में लगे हुए हैं। हे गुरू (अमरदास) ! प्यारे (हरी) ने मुझे। भिखे को। आपसे मिला दिया है। जैसे आप रखेगा वैसे मैं रहूँगा। 2। 20।
पहिरि समाधि सनाहु गिआनि है आसणि चड़िअउ ॥
ध्रंम धनखु कर गहिओ भगत सीलह सरि लड़िअउ ॥
भै निरभउ हरि अटलु मनि सबदि गुर नेजा गडिओ ॥
काम क्रोध लोभ मोह अपतु पंच दूत बिखंडिओ ॥
भलउ भूहालु तेजो तना न्रिपति नाथु नानक बरि ॥
गुर अमरदास सचु सल्य भणि तै दलु जितउ इव जुधु करि ॥१॥२१॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: समाधि-रूप संनाह (जिरह बख्तर) पहन के ज्ञान-रूप घोड़े पर (गुरू अमरदास जी ने) आसन जमाया हुआ है। धर्म का धनुष हाथों में पकड़ कर (गुरू अमरदास) भगतों वाले सील रूप तीर से (कामादिक वैरियों से) लड़ रहा है। हरी का भय रखने के कारण (गुरू अमरदास जी) निरभउ हैं। सतिगुरू के शबद की बरकति से हरी को (गुरू अमरदास ने) मन में धारा है- यह (गुरू अमरदास ने मानो)। नेजा गाड़ा हुआ है और काम। क्रोध लोभ। मोह। अहंकार। इन पाँचों वैरियों का नाश कर दिया है। तेजभान जी के पुत्र हे गुरू अमरदास जी ! आप भल्लों की कुल में शिरोमणि है और (गुरू) नानक (देव जी) के वर से राजाओं का राजा है। हे सल् कवि ! (ऐसा) कह- ‘हे गुरू अमरदास ! आप इस तरह युद्ध कर के (इन विकारों का) दल जीत लिया है। 1। 21।
घनहर बूंद बसुअ रोमावलि कुसम बसंत गनंत न आवै ॥
रवि ससि किरणि उदरु सागर को गंग तरंग अंतु को पावै ॥
रुद्र धिआन गिआन सतिगुर के कबि जन भल्य उनह जोु गावै ॥
भले अमरदास गुण तेरे तेरी उपमा तोहि बनि आवै ॥१॥२२॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: बादलों की बूँदें। धरती की बनस्पति। बसंत के फूल- इनकी गिनती नहीं हो सकती। सूरज और चँद्रमा की किरणें। समुंद्र का पेट गंगा की लहरें- इनका अंत कौन पा सकता है। शिव जी की तरह पूर्ण समाधि लगा के और सतिगुरू के बख्शे हुए ज्ञान द्वारा। हे भॅल् कवि ! उन उपरोक्त बताए पदार्थों को चाहे कोई मनुष्य वर्णन कर सके। पर भॅलों की कुल में प्रकट हुए हे गुरू अमरदास जी ! आपके गुण वर्णन नहीं हैं सकते। आपके जैसा आप खुद ही है। 1। 22।
सवईए महले चउथे के ४
सतिगुर प्रसादि ॥
इक मनि पुरखु निरंजनु धिआवउ ॥
गुर प्रसादि हरि गुण सद गावउ ॥
गुन गावत मनि होइ बिगासा ॥
सतिगुर पूरि जनह की आसा ॥
सतिगुरु सेवि परम पदु पायउ ॥
अबिनासी अबिगतु धिआयउ ॥
तिसु भेटे दारिद्रु न चंपै ॥
कल्य सहारु तासु गुण जंपै ॥
जंपउ गुण बिमल सुजन जन केरे अमिअ नामु जा कउ फुरिआ ॥
इनि सतगुरु सेवि सबद रसु पाया नामु निरंजन उरि धरिआ ॥
हरि नाम रसिकु गोबिंद गुण गाहकु चाहकु तत समत सरे ॥
कवि कल्य ठकुर हरदास तने गुर रामदास सर अभर भरे ॥१॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: गुरू रामदास जी की उस्तति में उचारे हुए सवईऐ। वह परब्रह्म केवल एक (ओंकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। मैं एकाग्र-मन हो के माया के रहत अकाल-पुरख को सिमरूँ। गुरू की कृपा से सदा हरी के गुण गाऊँ और गुण गाते-गाते मेरे मन में खिलाव पैदा हो। हे सतिगुरू ! मुझ दास की आस पूरी कर । (जिस गुरू रामदास जी ने) गुरू (अमरदास जी) की सेवा करके ऊँची पदवी पाई है। और अविनाशी व अदृष्य हरी को सिमरा है। उस (गुरू रामदास) की चरनीं लगने से। दरिद्रता नहीं चिपकती। कॅलसहार कवि उस (गुरू रामदास जी) के गुण गाता है। मैं उस श्रेष्ठ जन (गुरू रामदास जी) के निर्मल गुण गाता हूँ। जिसको आत्मिक जीवन देने वाला नाम अनुभव हुआ है। इस (गुरू रामदास जी) ने (अमरदास जी) को सेव के सबद का आनंद प्राप्त किया है और निरंजन का नाम हृदय में टिकाया है। गुरू रामदास जी (हृदय-रूपी) खाली सरोवरों को (नाम-जल से) भरने वाले हैं। (गुरू रामदास) अकाल पुरख के नाम का रसिया है। गोबिंद के गुणों का गाहक है। अकाल-पुरख से प्यार करने वाला है। हे कल्सहार कवि ! ठाकुर हरदास जी के सपुत्र। और सम-श्रेष्ठता का सरोवर है। 1।
छुटत परवाह अमिअ अमरा पद अंम्रित सरोवर सद भरिआ ॥
ते पीवहि संत करहि मनि मजनु पुब जिनहु सेवा करीआ ॥
तिन भउ निवारि अनभै पदु दीना सबद मात्र ते उधर धरे ॥
कवि कल्य ठकुर हरदास तने गुर रामदास सर अभर भरे ॥२॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: (गुरू रामदास) अमृत का सरोवर (है। जो) सदा भरा रहता है (और जिसमें से) अटल पदवी देने वाले अमृत के चश्मे चल रहे हैं। (इस अमृत को) वे संत-जन पीते हैं (और) अंतरात्मे स्नान करते हैं। जिन्होंने पूर्बले जन्मों में कोई सेवा की हुई है। (गुरू रामदास जी ने) उन (संत-जनों) का भय दूर कर के। उनको निर्भयता की पदवी बख्श दी है। और अपना शबद सुनाते हुए ही उनका पार उतार दिया है। हे कल्सहार कवि ! ठाकुर हरदास जी के सपुत्र गुरू रामदास जी (हृदय-रूपी) खाली सरोवरों को (नाम-अमृत से) भरने वाले हैं। 2।
सतगुर मति गूड़॑ बिमल सतसंगति आतमु रंगि चलूलु भया ॥
जाग्या मनु कवलु सहजि परकास्या अभै निरंजनु घरहि लहा ॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: गुरू (रामदास जी) की मति गहरी है। (आप की) निर्मल सत्संगति है; (और आप की) आत्मा हरी के प्यार में गाढ़ी रंगी हुई है। (सतिगुरू रामदास जी का) मन जागा हुआ है। (उनके हृदय का) कमल फूल आत्मिक अडोलता में खिला हुआ है और (उन्होंने) निर्भय हरी को हृदय में ही पा लिया है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “बल्कि (मुँह से) कहते ही कहते (भाव।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।