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अंग 1407

अंग
1407
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: Bhatt Kal
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर अरजुन गुण सहजि बिचारं ॥
गुर रामदास घरि कीअउ प्रगासा ॥
सगल मनोरथ पूरी आसा ॥
तै जनमत गुरमति ब्रहमु पछाणिओ ॥
कल्य जोड़ि कर सुजसु वखाणिओ ॥
भगति जोग कौ जैतवारु हरि जनकु उपायउ ॥
सबदु गुरू परकासिओ हरि रसन बसायउ ॥
गुर नानक अंगद अमर लागि उतम पदु पायउ ॥
गुरु अरजुनु घरि गुर रामदास भगत उतरि आयउ ॥1॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: और प्रेम से गुरू अरजन देव जी के गुण विचारता हूँ। (आप ने) गुरू रामदास (जी) के घर में जनम लिया। (उनके) सारे मनोरथ और आशाएं पूरी हुई। जनम से ही आप ने गुरू की मति के द्वारा ब्रहम को पहचाना है (परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाली हुई है)। (हे गुरू अरजुन !) कॅल् कवि हाथ जोड़ के (आपकी) सिफत उचारता है। आप ने भगती के जोग को जीत लिया है (भाव। आपने भगती का मिलाप पा लिया है)। हरी ने (आप को) ‘जनक’ पैदा किया है। (आप ने) गुरू शबद को प्रकट किया है। और हरी को (आप ने) जीभ पर बसाया है। गुरू नानक देव। गुरू अंगद साहिब और गुरू अमरदास जी के चरणों में लग के। (गुरू अरजन साहिब जी ने) उक्तम पदवी पाई है ; गुरू रामदास (जी) के घर में गुरू अरजुन भगत पैदा हो गया है। 1।
बडभागी उनमानिअउ रिदि सबदु बसायउ ॥
मनु माणकु संतोखिअउ गुरि नामु द्रिड़॑ायउ ॥
अगमु अगोचरु पारब्रहमु सतिगुरि दरसायउ ॥
गुरु अरजुनु घरि गुर रामदास अनभउ ठहरायउ ॥2॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजन) बहुत भाग्यशाली है। पूर्ण खिलाव में है। (आपने) हृदय में शबद बसाया है; (आपने अपने) माणक-रूप मन को संतोख में टिकाया है; गुरू (रामदास जी) ने (आप को) नाम दृढ़ कराया है। सतिगुरू (रामदास जी) ने (आप को) अगम अगोचर पारब्रहम दिखा दिया है। गुरू रामदास (जी) के घर में अकाल-पुरख ने गुरू अरजुन (जी) को ज्ञान-रूप स्थापित किया है। 2।
जनक राजु बरताइआ सतजुगु आलीणा ॥
गुर सबदे मनु मानिआ अपतीजु पतीणा ॥
गुरु नानकु सचु नीव साजि सतिगुर संगि लीणा ॥
गुरु अरजुनु घरि गुर रामदास अपरंपरु बीणा ॥3॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजन साहिब ने) ज्ञान का राज बरता दिया है। (अब तो) सतिगुरू बरत रहा है। (आप का) मन गुरू के शबद में माना हुआ है। और यह ना पतीजने वाला मन पतीज गया है। गुरू नानक देव स्वयं ‘सचु’-रूप नींव उसार के गुरू (अरजन देव जी) में लीन हो गया है। गुरू रामदास (जी) के घर में गुरू अरजुन देव अपरंपर-रूप बना हुआ है। 3।
खेलु गूड़॑उ कीअउ हरि राइ संतोखि समाचर्यिओ बिमल बुधि सतिगुरि समाणउ ॥
आजोनी संभविअउ सुजसु कल्य कवीअणि बखाणिअउ ॥
गुरि नानकि अंगदु वर्यउ गुरि अंगदि अमर निधानु ॥
गुरि रामदास अरजुनु वर्यउ पारसु परसु प्रमाणु ॥4॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: अकाल पुरख ने (यह) आश्चर्य (भरी) खेल रची है। (गुरू अरजुन) संतोख में विचर रहा है। निर्मल बुद्धि गुरू (अरजुन) में समाई हुई है। आप जूनियों से रहित और स्वयंभु हरी का रूप हैं। कल् आदि कवियों ने (आप का) सुंदर यश उचारा है। गुरू नानक (देव जी) ने गुरू अंगद को वर बख्शा; गुरू अंगद (देव जी) ने (सब पदार्थों के) खजाना (गुरू) अमरदास (जी) को दिया। गुरू रामदास जी ने (गुरू) अरजुन (साहिब जी) को वर दिया; और उन (के चरणों) को छूना पारस की छोह जैसा हो गया। 4।
सद जीवणु अरजुनु अमोलु आजोनी संभउ ॥
भय भंजनु पर दुख निवारु अपारु अनंभउ ॥
अगह गहणु भ्रमु भ्रांति दहणु सीतलु सुख दातउ ॥
आसंभउ उदविअउ पुरखु पूरन बिधातउ ॥
नानक आदि अंगद अमर सतिगुर सबदि समाइअउ ॥
धनु धंनु गुरू रामदास गुरु जिनि पारसु परसि मिलाइअउ ॥5॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: (गुरू) अरजन (साहिब) सद-जीवी हैं। (आपका) मूल्य नहीं आँका जा सकता। (आप) जूनियों से रहत और स्वयंभू हरी का रूप है; (गुरू अरजन) भय दूर करने वाले। पराए दुख हरने वाले। बेअंत और ज्ञान-स्वरूप है। (गुरू अरजन साहिब जी की) उस हरी तक पहुँच है जो (जीवों की) पहुँच से परे है। (गुरू अरजन) भरम और भटकना को दूर करने वाला है। सीतल है और सुखों को देने वाला है; (मानो) अजन्मा। पूरन पुरख सृजनहार प्रकट हो गया है। गुरू नानक। गुरू अंगद और गुरू अमरदास जी की बरकति से। (गुरू अरजन देव) सतिगुरू के शबद में लीन है। गुरू रामदास जी धन्य हैं। जिसने गुरू (अरजन जी को) परस के पारस बना के अपने जैसा कर लिया है। 5।
जै जै कारु जासु जग अंदरि मंदरि भागु जुगति सिव रहता ॥
गुरु पूरा पायउ बड भागी लिव लागी मेदनि भरु सहता ॥
भय भंजनु पर पीर निवारनु कल्य सहारु तोहि जसु बकता ॥
कुलि सोढी गुर रामदास तनु धरम धुजा अरजुनु हरि भगता ॥6॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: जिस गुरू की महिमा जगत में हो रही है। जिसके हृदय के भाग्य जाग उठे हैं। जो हरी से जुड़ा रहता है। (जिसने) बड़े भाग्यों से पूरा गुरू पा लिया है। (जिसकी) बिरती (हरी में) जुड़ी रहती है। और जो धरती का भार सह रहा है; (हे गुरू अरजुन जी !) आप भय दूर करने वाला। पराई पीड़ा हरने वाला है। कवि कलसहार आपका यश कहता है। गुरू अरजुन साहिब गुरू रामदास जी का पुत्र। सोढी कुल में धर्म के झण्डे वाला। हरी का भगत है। 6।
ध्रंम धीरु गुरमति गभीरु पर दुख बिसारणु ॥
सबद सारु हरि सम उदारु अहंमेव निवारणु ॥
महा दानि सतिगुर गिआनि मनि चाउ न हुटै ॥
सतिवंतु हरि नामु मंत्रु नव निधि न निखुटै ॥
गुर रामदास तनु सरब मै सहजि चंदोआ ताणिअउ ॥
गुर अरजुन कल्युचरै तै राज जोग रसु जाणिअउ ॥7॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजन देव जी ने) धैर्य को अपना धर्म बनाया हुआ है। (गुरू अरजन) गुरमति में गहरा है। पराए दुख दूर करने वाला है। श्रेष्ठ शबद वाला है। हरी जैसा उदार-चित्त है। और अहंकार को दूर करता है। (आप) बड़े दानी हैं। गुरू के ज्ञान वाले हैं। (आप के) मन में उत्साह कभी कम नहीं होता। (आप) सतिवंत हैं। हरी का नाम-रूप मंत्र (जो। मानो) नौ-निधियां (हैं। जो आप के खजाने में से) कभी खत्म नहीं होती। गुरू रामदास जी का सपुत्र (गुरू अरजन जी) सर्व-व्यापक (का रूप) है; (आपने) आत्मिक अडोलता में (अपना) चँदोआ ताना हुआ है (भाव। आप सहज रूप में आनंद ले रहे हैं)। कल् कवि कहता है। “हे गुरू अरजुन देव ! तूने राज और जोग का आनंद समझ लिया है” (भोग रहा है)। 7।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “और प्रेम से गुरू अरजन देव जी के गुण विचारता हूँ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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