कुन्ती की प्रार्थना
गंगा का जल उस सुबह धीरे बह रहा था। परीक्षित् ने मुनिवर शुकदेव की ओर देखा और कुछ देर मौन रहे, फिर बोले।
”भगवन्, मेरे पास अब थोड़े ही दिन बचे हैं। और मैं देखता हूँ कि जब यह घड़ी सामने नहीं थी, तब मैंने भगवान् को इतना नहीं पुकारा जितना अब पुकारता हूँ। क्या दुख ही हमें उनके पास ले जाता है? क्या सुख में उनका स्मरण नहीं रहता?”

शुकदेव की आँखों में एक हल्की-सी आर्द्रता तैर गई। ”राजन्, यही प्रश्न आपकी ही परदादी ने जान लिया था, उस घड़ी जब श्रीकृष्ण द्वारका लौटने को तत्पर थे। सुनिए, कुन्ती ने उनसे क्या माँगा था।”
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। पाण्डव विजयी हुए थे। पर विजय के पश्चात् का घर रीता था।
पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ गंगातट पर गये और मरे हुए स्वजनों को जलदान देकर उनके गुणों का स्मरण करते हुए बहुत विलाप किया। अभिमन्यु गया, द्रौपदी के पाँचों पुत्र गये, एक के पश्चात् एक, सब के सब।
धृतराष्ट्र पुत्र-शोक से व्याकुल थे, गांधारी अपने सौ बेटों के लिए शोक में डूबी थीं। भगवान् श्रीकृष्ण ने धौम्य आदि मुनियों के साथ सबको सान्त्वना दी और समझाया कि संसार के सभी प्राणी काल के अधीन हैं, मृत्यु से किसी को कोई बचा नहीं सकता।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने अजातशत्रु युधिष्ठिर को उनका राज्य, जो छल से छीन लिया गया था, लौटा दिया, और उनसे तीन अश्वमेध यज्ञ कराये। हस्तिनापुर के सिंहासन पर युधिष्ठिर प्रतिष्ठित हुए। राज भरा था, पर भीतर से रीता था।
अब श्रीकृष्ण द्वारका लौटने को तत्पर थे। उनका अपना कुल था, अपना राज्य। पाण्डवों से उन्होंने विदा ली और व्यास आदि ब्राह्मणों का सत्कार किया। फिर सात्यकि और उद्धव को साथ लेकर वे रथ पर सवार हुए।
उसी समय कुन्ती श्रीकृष्ण के पास आईं।
वे वसुदेव की बहन थीं, श्रीकृष्ण की बूआ। रिश्ता पुराना था। पर इन वर्षों में, युद्ध के बीच, उन्होंने श्रीकृष्ण को इस नाते से कहीं अधिक जान लिया था।

श्रीकृष्ण रथ पर चढ़ने ही वाले थे। कुन्ती ने हाथ जोड़कर उन्हें रोका।
कुन्ती के पास पाँचों पाण्डव पुत्र थे, जिन्होंने उनका मान रखा था। द्रौपदी थीं, जो बहू कम और बेटी अधिक थीं। कमी किसी वस्तु की न थी।
पर उनके भीतर एक स्मृति थी, जिसे कोई नहीं जानता था।
जब-जब विपत्ति आई थी, श्रीकृष्ण आये थे। हर बार। दुर्योधन का दिया विष, वारणावत के लाक्षागृह की भयानक आग, हिडिम्ब आदि राक्षसों की दृष्टि, दुष्टों की द्यूतसभा जहाँ द्रौपदी का चीर खींचा गया, वनवास के अनेक कष्ट, युद्ध में अनेक महारथियों के शस्त्र-अस्त्र, और अभी-अभी अश्वत्थामा का वह ब्रह्मास्त्र, जो उत्तरा के गर्भ की ओर दौड़ा था। हर बार श्रीकृष्ण ने ही उनकी रक्षा की थी।
हर एक विपत्ति में श्रीकृष्ण आये थे। और अब, जब विपत्ति समाप्त हुई है, वे जा रहे हैं।
कुन्ती ने हाथ जोड़कर स्तुति आरम्भ की।
”हे पुरुष! आप प्रकृति से परे आदिपुरुष परमेश्वर हैं। आप समस्त जीवों के भीतर और बाहर एकरस स्थित हैं, फिर भी इन्द्रियों और वृत्तियों से देखे नहीं जाते। मैं अबोध नारी आपको कैसे पहचान सकती हूँ? आप शुद्ध हृदयवाले विचारशील जीवन्मुक्त परमहंसों के हृदय में अपनी प्रेममयी भक्ति का सृजन करने के लिए अवतीर्ण हुए हैं। फिर हम अल्पबुद्धि स्त्रियाँ आपको कैसे पहचान सकती हैं?”

”आप श्रीकृष्ण हैं, वसुदेव-नन्दन, देवकी के लाल, नन्द-गोप के दुलारे गोविन्द। आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। जिनकी नाभि से ब्रह्मा का जन्मस्थान कमल प्रकट हुआ, जो सुन्दर कमलों की माला धारण करते हैं, जिनके नेत्र कमल के समान विशाल हैं, जिनके चरणों में कमल का चिह्न है, ऐसे आपको मेरा बार-बार नमस्कार है।”
”हृषीकेश! जैसे आपने दुष्ट कंस के बन्दीगृह में चिरकाल से शोकग्रस्त देवकी की रक्षा की थी, वैसे ही आपने अपने पुत्रों समेत मेरी भी बार-बार विपत्तियों से रक्षा की है। विष से, लाक्षागृह की आग से, राक्षसों से, द्यूतसभा से, वनवास से, और रण के अनेक महारथियों के शस्त्र-अस्त्र से, आप ही ने हमें उबारा है।”
फिर कुन्ती ने वह माँगा, जो किसी ने न माँगा था।
”जगद्गुरो! मेरी प्रार्थना यह है कि हमारे जीवन में सर्वदा पद-पद पर विपत्तियाँ आती रहें। दुख फिर आए, तकलीफ़ फिर आए।”
”क्योंकि विपत्तियों में ही निश्चितरूप से आपके दर्शन हुआ करते हैं, और आपके दर्शन हो जाने पर फिर जन्म-मृत्यु के चक्कर में नहीं आना पड़ता। मैं यह नहीं चाहती कि आप मन से उतर जाएँ। मुझे विपत्ति मंज़ूर है, यदि उसके साथ आपका दर्शन भी आता हो।”
”ऊँचे कुल में जन्म, ऐश्वर्य, विद्या और सम्पत्ति के कारण जिसका घमंड बढ़ा रहता है, वह तो आपका नाम भी नहीं ले सकता, क्योंकि आप तो उन लोगों को दर्शन देते हैं जो अकिंचन हैं। आप निर्धनों के परम धन हैं। आप अपने-आप में ही विहार करनेवाले, परम शान्तस्वरूप हैं। आप ही कैवल्य-मोक्ष के अधिपति हैं।”
कुन्ती जो माँग रही थीं, वह अहैतुकी भक्ति थी, जिसमें किसी प्रतिफल या सौदे की चाह नहीं रहती। वे केवल उन्हें चाहती थीं, किसी उपकार का फल नहीं।
उन्होंने आगे कहा, ”भक्तवांछाकल्पतरु प्रभो! क्या अब आप अपने आश्रित और सम्बन्धी हमलोगों को छोड़कर जाना चाहते हैं? आप जानते हैं कि आपके चरणकमलों के अतिरिक्त हमें और किसी का सहारा नहीं। पृथ्वी के राजाओं के तो हम यों ही विरोधी हो गये हैं।”
”आप विश्वके स्वामी हैं, विश्वके आत्मा हैं और विश्वरूप हैं। यदुवंशियों और पाण्डवों में मेरी बड़ी ममता हो गई है, और यही ममता की डोर मुझे बाँधे रखती है। आप कृपा करके स्वजनों के साथ जोड़े हुए इस स्नेह की दृढ़ फाँसी को काट दीजिए। मेरा मन किसी और ओर न जाए। जैसे गंगा की अखण्ड धारा समुद्र में ही गिरती रहती है, वैसे ही मेरी बुद्धि किसी दूसरी ओर न जाकर निरन्तर आप ही में लगी रहे।”
”श्रीकृष्ण! अर्जुन के प्यारे सखा, यदुवंशशिरोमणि! आप पृथ्वी के भाररूप राजवेशधारी दैत्यों को जलाने के लिए अग्निस्वरूप हैं। आपकी शक्ति अनन्त है। गोविन्द! आपका यह अवतार गौ, ब्राह्मण और देवताओं के दुःख मिटाने के लिए ही है। योगेश्वर! चराचर के गुरु भगवन्! मैं आपको नमस्कार करती हूँ।”

इस प्रकार कुन्ती ने बड़े मधुर शब्दों में भगवान् की अनेक लीलाओं का वर्णन किया। यह सब सुनकर वैकुण्ठनाथ श्रीकृष्ण अपनी माया से उन्हें मोहित करते हुए मन्द-मन्द मुस्कराने लगे।
उन्होंने कुन्ती से केवल इतना कहा, ”अच्छा, ठीक है,” और रथ के स्थान से वे हस्तिनापुर लौट आये।
रथ चलने लगा। कुन्ती खड़ी देखती रहीं।
कुन्ती ने आँखें मूँद लीं। शायद कोई विपत्ति फिर आएगी, कोई दुख फिर। पर तब वे जानती थीं, उन विपत्तियों के साथ श्रीकृष्ण फिर आएँगे।
शुकदेव कुछ देर मौन रहे। गंगा की लहरें किनारे से टकराकर लौट रही थीं।
”राजन्, देखिए, कुन्ती को विपत्ति इसलिए प्रिय थी कि वही उन्हें उस घड़ी तक ले जाती थी जिसमें भगवान् याद आते हैं। जो स्मरण दुख अपने साथ लाता है, उसी स्मरण के लिए उन्होंने दुख को सिर झुकाकर स्वीकार लिया।”
परीक्षित् ने धीरे से कहा, ”भगवन्, तो मेरा यह जो थोड़ा-सा समय बचा है, यही मेरी विपत्ति है, और यही मेरा वरदान भी।”
शुकदेव मुस्कुराए और कुछ न बोले। ऊपर एक पंछी गंगा के पार की ओर उड़ता चला गया।
कुन्ती की प्रार्थना भागवतम् के अत्यन्त विरल क्षणों में से एक है।
सुख की चाह स्वाभाविक है, और दुख माँगना सामान्य बुद्धि को विचित्र लगेगा। कुन्ती ने इसी बात को दूसरी दृष्टि से देखा।
उन्होंने अपने भीतर पहचाना था कि जब सब ठीक चल रहा होता, तब भगवान् मन से उतर जाते, और जब विपत्ति आती, तब वे फिर याद आ जाते। जिस वस्तु ने उन्हें भगवान् के पास टिकाए रखा था, वह सुख नहीं, दुख था।
यह एक असुविधाजनक सच है। मन की यही रीत है, सुख में विस्मरण, दुख में पुकार, फिर सुख में फिर विस्मरण।
कुन्ती मानो कह रही थीं, ”इस फेर को टूटने मत दीजिए। दुख ही दे दीजिए, यदि वही मुझे आपके पास रखता है।” यह एक माँ की चतुराई है, अपनी ही भूलने की आदत को मात देकर भक्ति में टिके रहने की।
भागवत-परम्परा में यह कुन्ती-स्तुति बहुत प्रिय है। भक्ति के प्रसंग में इसका स्मरण बार-बार किया जाता है।
साहित्यिक-संदर्भ
कुन्ती-स्तुति श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध, अष्टम अध्याय (1.8.18-43) में आती है। महाभारत के पश्चात् श्रीकृष्ण द्वारका लौटने को तत्पर हैं, और कुन्ती उन्हें यह स्तुति सुनाती हैं।
‘विपदः सन्तु ताः शश्वत्’ (1.8.25), अर्थात् विपत्तियाँ बनी रहें ताकि आपके दर्शन होते रहें, इस स्तुति का सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोक है, जिसमें भक्ति का वह विरल भाव है कि भक्त सुख के बदले केवल भगवान् का स्मरण माँगता है।
क्यों यह कथा अभी मायने रखती है
कुन्ती की प्रार्थना थी, ”हे गोविन्द, मुझे विपत्तियाँ दीजिए, ताकि आप याद रहें।” मन्दिर की देहरी प्रायः तभी याद आती है जब जीवन डगमगाता है। कुन्ती ने इसी आदत को पहचानकर उसे अपनी भक्ति का साधन बना लिया।