कुन्ती की प्रार्थना
महाभारत का युद्ध ख़त्म हो चुका था। पाण्डव जीते थे। पर जीत के बाद का घर ख़ाली था।
अठारह दिन के युद्ध में अभिमन्यु गया। द्रौपदी के पाँच भाइयों के बच्चे, उपपाण्डव गए। न्यूल्के पुत्र गए। सब के सब।
कौरव पूरा कुल गया। दुर्योधन की माँ गांधारी ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी थी सालों तक, अंधे पति के सम्मान में। उसने अपनी आँख खोलकर अपने सब बेटों के शव देखे, फिर बाँध ली।
हस्तिनापुर का राज सिंहासन पर युधिष्ठिर बैठा था। ख़ाली महल। ख़ाली कुर्सी।
कृष्ण द्वारका जाने को तैयार थे। उन्हें अपना भी कुल था, अपना भी राज्य। पाण्डवों के पास उन्होंने जो ज़रूरी था, वो दिया। अब लौटने का समय था।
कुन्ती कृष्ण के पास आई।
वो उनकी फूफी थी। वासुदेव की बहन। पुराने रिश्ते। पर इन सालों में, युद्ध के समय, उसने कृष्ण को सिर्फ़ फूफी का भतीजा नहीं माना था। उसने उन्हें कुछ और माना था।

कृष्ण रथ पर चढ़ने वाले थे। कुन्ती ने उन्हें रोका।
”एक बात कहनी है।”
कृष्ण रुक गए। मुस्कुराए। ”बोलो, फूफी।”
कुन्ती के पास पाँच पाण्डव बेटे थे। पाँच ने उसकी रक्षा की थी, उसका मान रखा था। एक पति था, जो जा चुका था। द्रौपदी थी, जो बहू नहीं, बेटी जैसी थी। सब था।
पर उसके पास एक स्मृति भी थी, जो कोई नहीं जानता था।
जब-जब मुसीबत आई, कृष्ण आए। हर बार। पाँडव जब वनवास में थे, कृष्ण मिलने आते थे। द्रौपदी के साथ दुश्शासन ने जो किया, उस पल कृष्ण ने ही साड़ी बढ़ाई। जब अर्जुन कुरुक्षेत्र पर बैठ गया था, कृष्ण ने ही उसे उठाया।
हर एक मुसीबत में कृष्ण आए थे। और अब, जब मुसीबत ख़त्म हुई है, कृष्ण जा रहे हैं।

कुन्ती ने हाथ जोड़े।
”कृष्ण,” उसने धीरे से कहा, ”एक prayer है मेरी।”
”क्या?”
”मेरी प्रार्थना है कि मेरे जीवन में मुसीबतें फिर आएँ। दुख फिर आए। तकलीफ़ फिर आए।”
कृष्ण ने पहली बार उसकी तरफ़ ध्यान से देखा।
”क्यों, फूफी?”
”क्योंकि जब-जब मुसीबत आती है, तब-तब तुम आते हो। और जब सुख का दौर होता है, तब तुम कहीं और होते हो। मैं नहीं चाहती कि तुम कहीं और हो। मुझे मुसीबत मंज़ूर है, अगर उसके साथ तुम्हारा दर्शन आए।”

भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥
(श्रीमद्भागवत 1.8.25)
हे जगद्गुरु, मेरे जीवन में जगह-जगह विपत्तियाँ बनी रहें, क्योंकि उनमें ही आपके दर्शन होते हैं। और आपके दर्शन से वो दर्शन भी होता है जिससे फिर इस संसार में लौटना नहीं पड़ता।
कृष्ण कुछ नहीं बोले एक पल को।
यह वो प्रार्थना नहीं थी जो किसी ने उनसे की हो। लोग सुख माँगते हैं। राज्य माँगते हैं। बच्चे माँगते हैं। मुक्ति माँगते हैं। मुसीबत कौन माँगता है?
एक कुन्ती।
उन्होंने कुन्ती के सिर पर हाथ रखा।
”फूफी, तुम जो माँग रही हो, वो साधारण नहीं है। यह अहैतुकी भक्ति है। बिना किसी return के, बिना किसी exchange के। तुम सिर्फ़ मुझे चाहती हो, मेरे काम का परिणाम नहीं।”
कुन्ती ने सिर झुका लिया।

उसके अंदर कोई बड़ा spiritual achievement का feeling नहीं था। सिर्फ़ एक सीधी सी समझ। ”जब तुम पास हो, तब सब सहन है। जब तुम दूर हो, तब सुख भी ख़ाली है।”
उसने आगे कहा, ”एक और बात।”
”हाँ?”
”आज तुम जा रहे हो। अपने द्वारका। अपने राज्य की रक्षा करने। पर मैं नहीं चाहती कि तुम वहाँ जाओ।”
”क्यों?”
”क्योंकि वहाँ तुम राजा हो। राजा को बहुत सब कुछ करना होता है। तुम्हारी रानियाँ हैं, बेटे हैं, राजनीति है। और तुम कृष्ण नहीं रह जाओगे, तुम राजा बन जाओगे।”
”मैं चाहती हूँ कि तुम चरवाहे ही रहो। उँगली पर गोवर्धन उठाने वाले। बाँसुरी बजाने वाले। माखन-चोर। यही कृष्ण मुझे चाहिए।”

कृष्ण हँसे।
”फूफी, मैं वही हूँ। चाहे राजा हूँ, चाहे चरवाहा। बाहर का रूप मेरा नहीं है, बीच का तत्व मेरा है।”
”हाँ,” कुन्ती ने कहा। ”पर मुझे आसान रूप ही चाहिए। मेरी पहुँच के अंदर का।”
यह एक माँ का statement था। न philosophy, न theology। बस एक माँ का अपने बेटे के लिए preference।
कृष्ण ने एक बार और देखा। फिर रथ पर चढ़ गए।
रथ चलने लगा। कुन्ती खड़ी देखती रही। उसे पता था, यह वो आख़िरी बार होगा जब वो उन्हें इस रूप में देख रही थी।
रथ धूल में खो गया।

कुन्ती ने आँखें मूँदीं। शायद एक मुसीबत और आएगी। शायद कोई दुख फिर। पर तब तक वो इंतज़ार कर सकती थी। उन मुसीबतों के साथ कृष्ण फिर आएँगे।
कुन्ती की प्रार्थना भागवतम् के सबसे अनोखे क्षणों में से है।
हम सब सुख माँगते हैं। यह natural है। दुख कोई पागल ही माँगेगा। पर कुन्ती ने इसे एक अलग lens से देखा।
उसने notice किया था कि उसके अपने जीवन में, जब सब ठीक चल रहा था, तब वो भगवान को भूल जाती थी। जब मुसीबत आती थी, तब उसे याद आता था। तो जिस चीज़ ने उसे भगवान के पास रखा था, वो सुख नहीं, दुख था।
यह एक uncomfortable truth है। हम कई बार यही करते हैं। सुख आने पर भूल जाते हैं। दुख आने पर पुकारते हैं। फिर सुख आने पर फिर भूल जाते हैं।
कुन्ती कह रही है, ”इस cycle को मत तोड़ो। मुझे दुख दे दो, अगर वही चीज़ है जो मुझे तुम्हारे पास रखती है।” यह एक माँ की चालाकी है, अपनी ही memory को धोखा देकर भक्ति में टिकाए रखने की।
वैष्णव-परम्परा में यह कुन्ती-स्तुति बहुत प्रिय है। शास्त्रों में यह बार-बार उद्धृत होती है, ख़ासकर भक्ति योग के संदर्भ में।