अध्याय 20 · कर्ण-कुन्ती-संवाद

उद्योग पर्व · भगवद्यान पर्व, कर्णोपनिवर्तन पर्व · अध्याय 140 से 147

एक रथ पर दो जन्म

हस्तिनापुर के द्वार पर श्रीकृष्ण ने जिस पुरुष को अपने रथ पर खींच लिया, उसे उसके दोनों जन्मों का सच एक साथ सुनाया गया, और उसने जानते-बूझते दूसरा जन्म चुन लिया

द्वार के बाहर खड़े उस पुरुष ने रथ को अपनी ओर मुड़ते देखा और हाथ जोड़ लिये, क्योंकि वह जानता था कि सौरि उससे यों ही दो बात करने नहीं रुके होंगे। श्रीकृष्ण ने मुस्कराकर उसका दाहिना हाथ थामा और उसे अपने उसी बड़े श्वेत रथ पर अपने पास खींच लिया, जिसके घुँघरू अभी-अभी कुरुओं की सभा के द्वार पर बजे थे। नगर पीछे छूटता गया, पहियों की मेघ जैसी घरघराहट सड़क के दोनों ओर की दीवारों से टकराकर लौटती रही, और भीतर वह आवाज़ धीमी पड़ गई जो भरी सभा में किसी ने नहीं सुनी थी। राधा का वह पुत्र चुप बैठा रहा, और जनार्दन ने बिना किसी की उपस्थिति में, केवल दारुक के और घोड़ों के सिवा किसी के न रहते, उससे वह बात कही जो वह वर्षों से अपने भीतर दबाये बैठे थे।

उन्होंने कहा कि शास्त्र जानने वाले धर्मवेत्ता ब्राह्मणों से कर्ण ने सुना ही होगा कि कन्या-अवस्था में किसी पुरुष से जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह उस पुरुष का नहीं माना जाता जिससे वह जन्मा, बल्कि उस पुरुष का पुत्र होता है जो आगे चलकर शास्त्रोक्त विधि से उस कन्या का पाणिग्रहण करता है। इसलिये, उन्होंने कहा, कर्ण कानीन है, कुन्ती का कन्या-अवस्था में हुआ पुत्र, और धर्म की दृष्टि से पाण्डु का ही पुत्र। आइये, उन्होंने कहा, मेरे साथ चलिये, और पाण्डव यह जान लें कि आप कुन्ती के सबसे बड़े पुत्र हैं और पाँचों के बड़े भाई। इतना सुनकर भी कर्ण का मुख न तो हर्ष से खिला, न उसकी आँखों में कोई चमक उठी। वह घोड़ों की चाल को, सड़क की धूल को देखता रहा, जैसे सुनी हुई बात कोई बहुत पुरानी हो, इतनी पुरानी कि उसकी पीड़ा सूख चुकी हो।

श्रीकृष्ण ने तब उसके आगे वह सब रख दिया जो उसका हो सकता था। उन्होंने कहा कि वह आज ही उनके साथ चल पड़े, तो कल पाण्डव और वृष्णि-अन्धक उसे राजा के रूप में अभिषिक्त करेंगे। युधिष्ठिर उसके पीछे श्वेत चँवर डुलाते हुए युवराज होकर खड़ा रहेगा, भीमसेन उसके सिर पर श्वेत छत्र तानेगा, और अर्जुन उसके रथ की रास सँभालेगा। नकुल, सहदेव, द्रौपदी के पाँचों पुत्र और सुभद्रा का पुत्र उसकी सेवा में रहेंगे। अभिषेक की सारी सामग्री, सोने के घड़े, औषधियाँ, रत्न, सब सजेंगे, और वेद जानने वाले ब्राह्मण मन्त्र पढ़ेंगे। द्रौपदी छठे दिन ऋतुमती होकर उसकी भी होगी। नक्षत्रों से घिरे चन्द्रमा की भाँति वह अपने भाइयों से घिरकर इस पृथ्वी का राज्य भोगेगा और कुन्ती को आनन्दित करेगा। उन्होंने यह सब उस स्वर में कहा जिसमें न आग्रह था न लोभ, केवल एक सच्चा निमन्त्रण, और फिर चुप हो गये, क्योंकि अब बारी कर्ण की थी।

राधा का दिया हुआ नाम

कर्ण ने तब सिर हिलाया। उसने कहा कि केशव ने जो उसके प्रति स्नेह, मित्रता और हित-इच्छा से कहा, वह सब उसने समझ लिया, और इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह धर्म की दृष्टि से पाण्डु का पुत्र है। पर कुन्ती ने उसे गर्भ में धारण करते ही, जन्म देते ही त्याग दिया था, बिना उसका हित सोचे जल में बहा दिया था। अधिरथ नाम के सूत ने उसे उठाया, उसे अपनी गोद में लिया, और उसे देखते ही राधा के स्तनों में स्नेह से दूध उतर आया था। उसी राधा ने उसका मल-मूत्र साफ़ किया, उसी ने उसे पाला, और इसी कारण उसका नाम वसुषेण पड़ा, और वह राधेय कहलाया। अधिरथ उसे अपना पुत्र मानता है, वह अधिरथ को अपना पिता मानता है, और उस सूत-कुल में उसका विवाह हुआ, उसके पुत्र-पौत्र हुए, उसका मन और हृदय उन्हीं में बँधा है। यह सम्बन्ध, उसने कहा, समस्त पृथ्वी और ढेरों सोने के बदले भी वह नहीं तोड़ सकता।

फिर उसने उस ऋण की बात की जो उसके ऊपर तेरह वर्षों से था। उसने कहा कि दुर्योधन के आश्रय में रहते हुए उसने तेरह वर्ष तक निष्कण्टक राज्य भोगा, उसी के बल पर अनेक यज्ञ किये, सूत-कुलों में विवाह सम्बन्ध स्थापित किये। दुर्योधन ने उसी के भरोसे पाण्डवों से वैर ठाना और युद्ध की तैयारी की, और कर्ण को द्वंद्वयुद्ध में अर्जुन का प्रतिपक्षी बनाकर रखा। वह सब जानता है, उसने कहा, कि यह युद्ध एक भयानक विनाश है, कि कौरवों का नाश निश्चित है, कि दुर्योधन की हार सामने खड़ी है। पर इस घड़ी में, जब विपत्ति सिर पर है, उस मित्र को छोड़ देना, जिसने भरोसा करके अपना सब उसके हाथ सौंप दिया, मृत्यु से भी बुरा है। वह तो उसके लिये मरने को निकला है। इसलिये केशव से उसकी एक ही प्रार्थना है, कि वह इस बातचीत को छिपाये रखें, इसे किसी से न कहें, क्योंकि यदि धर्म और सत्य पर डटे रहने वाले युधिष्ठिर को यह पता चल गया कि कर्ण कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र है, तो वह यह राज्य स्वीकार नहीं करेगा और उसी को सौंप देगा, और कर्ण उसे फिर दुर्योधन को दे देगा। राज्य का स्वामी तो धर्मराज युधिष्ठिर ही हो, यही उसकी इच्छा है।

शस्त्रों का यज्ञ

और फिर कर्ण ने वह बात कही जिसमें उसका सारा क्षत्रियपन और सारी पीड़ा एक साथ बोल उठी। उसने कहा कि अब जो युद्ध होने को है, वह उसे एक महायज्ञ की भाँति दिखता है, और उस यज्ञ के सारे अंग उसकी आँखों के सामने सज चुके हैं। श्रीकृष्ण उसमें अध्वर्यु होंगे और अर्जुन होता का काम करेगा। गाण्डीव यज्ञ का स्रुक होगा, वीरों का पराक्रम घृत होगा। अर्जुन के अस्त्र मन्त्र होंगे, गाण्डीव की टंकार और रथ की घरघराहट सामवेद का गान होगी, और कुन्ती के पुत्रों की प्रत्यंचा से छूटे बाण उस यज्ञ की समिधाएँ। द्रोण और कृपाचार्य प्रधान ऋत्विज होंगे, युधिष्ठिर के राजसूय की वेदी पर जैसे आहुति पड़ी थी वैसी आहुति अब इस रणवेदी पर पड़ेगी। जब तक ये पर्वत खड़े रहेंगे और ये नदियाँ बहती रहेंगी, उसने कहा, तब तक इस महाभारत-युद्ध की कीर्ति-कथा अक्षय बनी रहेगी, और ब्राह्मण क्षत्रियों की सभाओं में इसी युद्ध का, जिसमें राजाओं के सुयशरूपी धन की राशि बटुरेगी, बखान करते रहेंगे। केशव से उसकी अन्तिम विनती यही थी, कि वे इस मन्त्रणा को सदा गुप्त रखकर कुन्तीकुमार अर्जुन को उसके साथ युद्ध करने के लिये ले आवें।

इसके बाद उसने वे लक्षण गिनाये जो उसने आकाश में और धरती पर पढ़ लिये थे, और जो सब के सब कौरवों की पराजय की ओर इशारा करते थे। उसने कहा कि उसे रात-रात भर भयानक स्वप्न आते हैं। उसने स्वप्न में देखा कि युधिष्ठिर अपने भाइयों समेत हज़ार खम्भों वाले एक महल पर चढ़ रहा है, सफ़ेद पगड़ी बाँधे, और चारों ओर श्वेत वस्त्र और श्वेत आभूषण। उसने आकाश को बिना बादल के गरजते देखा है, सूर्य के चारों ओर मांसभक्षी पक्षियों को मँडराते देखा है। ग्रहों में मंगल वक्र होकर चल रहा है, राहु सूर्य की ओर बढ़ रहा है, उल्काएँ कड़कड़ाहट के साथ धरती पर गिर रही हैं और दिशाएँ धुएँ से भरकर जल रही हैं। हाथी और घोड़े आँसू बहा रहे हैं, सेना के बीच आग की लपटें उठ रही हैं, और जल के स्रोत सूख रहे हैं। उसने कहा कि दुर्योधन के अधीन रहने वाले जितने राजा और राजकुमार हैं, वे सब शस्त्रों से मारे जाकर उत्तम गति को प्राप्त होंगे। यह उसका वरण था, खुली आँखों से चुनी हुई पराजय, और इसे कह चुकने के बाद वह शान्त हो गया।

श्रीकृष्ण ने सब सुना, और फिर मुस्कराते हुए कहा कि क्या कर्ण को राज्य का यह उपहार सचमुच नहीं चाहिये, क्या वह सचमुच इस सारी पृथ्वी को छोड़कर मृत्यु को वरना चाहता है। पर कर्ण ने वही दोहराया कि यदि वह जीतकर भी राज्य पाये, तो उस राज्य को भी वह दुर्योधन को ही दे देगा, और कौरव-पाण्डव का यह वैर अब किसी के टाले नहीं टलेगा, क्योंकि इसका विनाश-काल आ पहुँचा है। केशव उससे प्रसन्न हुए और उसे गले लगाकर उन्होंने उसे विदा दी। कर्ण ने प्रदक्षिणा करके उस श्वेत रथ से धरती पर पैर रखा, अपने सजे हुए रथ पर लौट गया, और मधुसूदन का रथ घुँघरुओं की पंक्तियाँ बजाता हुआ नगर की ओर मुड़ गया, जहाँ से वह उपप्लव्य को निकलेगा।

गंगा के तट पर पीछे खड़ी एक छाया

श्रीकृष्ण के लौट जाने पर भी एक स्त्री के भीतर वह बात नहीं ठहरी जो उसने वर्षों दबा रखी थी। कुन्ती ने सुन रखा था कि कर्ण ने सब पाण्डवों को मार डालने की प्रतिज्ञा की है, सिवा अर्जुन के नहीं, क्योंकि अर्जुन के साथ तो उसका मरना-मारना ही ठहरा था। उस माँ का हृदय काँप उठा, और उसने सोचा कि अब और मौन रखने का समय नहीं रहा। वह अपने पुत्रों के हित के लिये उठी, और गंगा के तट की ओर चली, उस घाट की ओर जहाँ कर्ण भोर से दोपहर तक हाथ ऊपर उठाकर सूर्य की उपासना करता था, क्योंकि वह सूर्य का उपासक था और उस समय किसी ब्राह्मण को कुछ भी देने से कभी इनकार नहीं करता था।

वह वहाँ पहुँची जब कर्ण पूर्व की ओर मुख किये, दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये, सूर्य का जप कर रहा था। जल की कोई बूँद उसकी अंजुलि से छूटकर पैरों के पास की गीली रेत में बैठ रही थी, और उस बूँद के गिरने की हल्की-सी आवाज़ के सिवा घाट पर और कोई स्वर न था। वह उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई, चुपचाप। उसके होंठ काँपे, परिचय का एक शब्द कण्ठ तक आया और वहीं रुक गया, क्योंकि उसका जप अभी पूरा न हुआ था और उसे रोकना वह सही न समझ सकी। सूर्य की किरणें ऊपर से सीधी उसकी अपनी पीठ पर पड़ने लगीं। पहले वह ताप कुछ न था, फिर वह वस्त्र को भेदकर त्वचा तक उतर आया, और भीतर के पुराने कुम्हलाये फूलों की महक की तरह कुछ उसके भीतर सुलगने लगा। पसीने की एक लकीर उसकी रीढ़ से नीचे की ओर बहती रही और वह अपनी जगह से न हिली। उसका गला सूखता गया, थूक निगलते हुए उसे अपने ही कण्ठ की खुरदरी पीड़ा का बोध हुआ, और उसी क्षण उसके मन में केवल एक बात उठी, कि जिस टोकरी को उसने जल में छोड़ा था, उस पर भी ऐसी ही धूप पड़ी होगी और उसे रोकने वाला कोई न था। उसकी हथेलियाँ, जो सामने जुड़ी थीं, भीग चुकी थीं, और वह अपने उस पुत्र की पीठ के पीछे खड़ी रही जिसे उसने पहली साँस लेते ही छोड़ दिया था। फिर कर्ण मुड़ा, और अपने पीछे कुरुकुल की उस बूढ़ी रानी को देखकर उसने हाथ जोड़कर, अपने तेज और अभिमान के अनुसार उसका सत्कार किया।

उसने अपना परिचय अपने ही ढंग से दिया, कि वह अधिरथ का पुत्र कर्ण है, राधा और अधिरथ का राधेय, और देवी आई हुई हैं, उन्हें वह क्या सेवा दे। कुन्ती ने तब वह कहा जो वह कहने आई थी। उसने कहा कि वह राधा का नहीं, अधिरथ का नहीं, सूत-कुल का नहीं, बल्कि उसका पुत्र है। उसने उसे उसके जन्म का सारा रहस्य सुनाया, कि कन्या-अवस्था में अपनी सेवा से प्रसन्न करके उसने दुर्वासा से एक वर पाया था, एक मन्त्र, जिसका उच्चारण करके किसी भी देवता को बुलाया जा सकता था, और कुतूहल में उसने उस मन्त्र से सूर्य का आवाहन कर लिया, और कर्ण उसी सूर्य से, उन्हीं देवों के देव से जन्मा, जन्म से ही कवच और कुण्डल पहने हुए। वह उसका ज्येष्ठ पुत्र है। यह कहकर उस राजमाता ने उससे प्रार्थना की कि वह अब अपने भाइयों के पास लौट आये, कि अर्जुन और कर्ण मिल जायें तो संसार में उनके आगे कौन टिकेगा, कि भाइयों से घिरा हुआ वह उस चन्द्रमा जैसा सोहे जो नक्षत्रों से घिरा हो। माता और पुत्र के, सूर्य के दो पुत्रों के एक हो जाने से इस पृथ्वी पर वह सब किया जा सकेगा जो अभी नहीं हो रहा।

पाँच पुत्र, हर हाल में

कर्ण ने यह सब सुना, सूर्य की ओर पीठ किये उस माँ को देखा जिसने उसे पहली बार माँ कहकर पुकारा था, और उसने अत्यन्त धीमे पर दृढ़ स्वर में उत्तर दिया। उसने कहा कि वह यह नहीं मान सकता कि माता का कहा हुआ वचन उसके लिये धर्म नहीं, पर जो अधर्म उसके साथ हुआ, उसे भी वह भूल नहीं सकता। उसने कहा कि उसका जो अनिष्ट किया जा सकता था, माता ने वह सब किया, क्योंकि उसे जन्मते ही त्याग देकर उसका यश और कीर्ति, जो क्षत्रिय को जन्म से मिलनी चाहिये थी, उससे छीन ली गई। उसे सूत-कुल में पलना पड़ा, सूत-पुत्र कहलाना पड़ा, और आज, युद्ध की घड़ी आ खड़ी होने पर, माता उसके पास आकर उसे अपना बताती हैं। यदि वह अब पाण्डवों के पक्ष में चला जाये, तो संसार उसे डरपोक और स्वार्थी कहेगा, और दुर्योधन, जिसने उस पर सब कुछ भरोसा किया, उससे ठगा जायेगा। ऐसा करके वह न यहाँ रहेगा न वहाँ का होगा।

पर उस माँ को वह खाली हाथ नहीं लौटाना चाहता था। उसने कहा कि कुन्ती के पास आज जो पाँच पुत्र हैं, वे आगे भी पाँच ही रहेंगे, उससे कम कभी न होंगे। वह प्रतिज्ञा करता है कि अर्जुन को छोड़कर शेष चार पाण्डवों, युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव पर, समर्थ होते हुए भी, वह अस्त्र नहीं उठायेगा, उन्हें नहीं मारेगा। उसका वैर तो केवल अर्जुन से है, और उस दोनों में से जो भी बचेगा, वह कुन्ती का पुत्र होगा। यदि वह अर्जुन को मार दे, तो कुन्ती के पास कर्ण समेत पाँच पुत्र रहेंगे, और यदि अर्जुन उसे मार दे, तो अर्जुन समेत पाँच पुत्र रहेंगे। पाँच का यह जोड़ हर हाल में पूरा रहेगा। इतना सुनकर कुन्ती शोक से काँप उठी, और उसने उससे केवल इतना ही कहा कि वह अपने भाइयों को अभय दे, और कर्ण ने उसे अभय दे दिया।

तब आकाश से एक स्वर उतरा, उसी सूर्य का स्वर, जो उस घाट पर अभी-अभी कर्ण के सिर पर तप रहा था, और उसने कह दिया कि कुन्ती ने जो कहा वह सत्य है, कि कर्ण माता की बात मान ले। पर अपने पिता के उस वचन को सुनकर भी, अपनी जननी को सामने पाकर भी, सत्य पर डटे रहने वाला वह पुरुष अपने निश्चय से नहीं डिगा, और उसने वही कहा जो कह चुका था। दोनों भुजाओं में अपने उस ज्येष्ठ पुत्र को भरकर, जिसे वह न रख पाई थी न पूरी तरह छोड़ ही पाई थी, कुन्ती ने उससे कहा कि कौरवों का क्षय निश्चित है, पर दैव से बढ़कर कुछ नहीं, और उसके चार भाई फिर भी सुरक्षित रहेंगे, यही उसके वचन ने उसे दे दिया। यह कहकर वह उससे विदा होकर, अपने घर की ओर लौट चली। कर्ण फिर अपने आराध्य की ओर मुख करके खड़ा हो गया, गंगा के उसी घाट पर, भुजाएँ ऊपर उठाये, और जल की एक बूँद फिर उसकी अंजुलि से छूटकर पैरों के पास की गीली रेत में बैठ गई।

उपप्लव्य में दूत लौट चुका था, और सन्धि के सब रास्ते बन्द हो चुके थे। दोनों ओर की सेनाएँ कुरुक्षेत्र की ओर मुँह कर चुकी थीं, अठारह अक्षौहिणियाँ, और उनके आगे-आगे उड़ती धूल क्षितिज पर उसी पीली धूप में मिलती जा रही थी जो अभी-अभी उस घाट पर खड़े सूर्यपुत्र की पीठ पर तप रही थी।

साहित्यिक-संदर्भ

यह अध्याय गीता-प्रेस व्यास महाभारत के उद्योग पर्व के अन्तर्गत भगवद्यान पर्व तथा कर्णोपनिवर्तन पर्व (अध्याय 140 से 147) से लिया गया है। श्रीकृष्ण का कर्ण को रथ पर खींचकर कानीन-पुत्र के शास्त्रीय धर्म से उसे पाण्डु-पुत्र सिद्ध करना तथा राज्य, श्वेत छत्र-चँवर, युधिष्ठिर का युवराज-पद, द्रौपदी का छठे दिन ऋतुमती होना आदि का प्रस्ताव; कर्ण का अधिरथ-राधा-वसुषेण-राधेय का परिचय देकर, दुर्योधन के तेरह-वर्ष के ऋण के कारण अस्वीकार करना; समरयज्ञ-रूपक (कृष्ण अध्वर्यु, अर्जुन होता, गाण्डीव स्रुक्) तथा कौरव-पराजय-सूचक उत्पात-स्वप्न; कुन्ती का गंगा-तट पर कर्ण की सूर्योपासना के पीछे ताप सहते हुए खड़ा रहना, ज्येष्ठ-पुत्र-रहस्य व दुर्वासा-मन्त्र का प्रकटन; और कर्ण की अर्जुन-भिन्न चार पाण्डवों को न मारने की प्रतिज्ञा (“पाँच पुत्र हर हाल में”) तथा सूर्य के आकाश-स्वर के बाद भी सत्य पर डटे रहना, इन सबसे सत्यापित। कुन्ती का अपने पुत्रों को बचाने आना तथा कर्ण की कृतज्ञता और उसके आत्म-वरण की नैतिक सूक्ष्मता मूल पाठ के अनुसार बिना सरल किये रखी गई है। गीता-प्रेस से सत्यापित।