भाग 15 · कर्म-त्रय और एकमेव अद्वयं

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 15 · कर्म-त्रय और “एकमेव अद्वयं” टेक · श्लोक 441-470

विषयों की नदियाँ ज्ञानी-समुद्र में घुलती हैं, बिना विकार उठाए। संचित-प्रारब्ध-, तीनों कर्मों का साफ़ हिसाब। और अंत में सात बार लौटती धड़कन: “एकमेव अद्वयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन।”

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पहले एक बात

एक सहज सवाल उठता है, अगर बोध हो गया, तो ज्ञानी इस दुनिया में क्यों फिर भी दिखता है? क्यों खाता है, क्यों चलता है, क्यों दुख-सुख का अनुभव करता है? गुरु इस सवाल को टालते नहीं। सीधे लेते हैं। और एक प्यारी, साफ़ शिक्षा देते हैं: तीन कर्मों का हिसाब।

संचित (पिछले जन्मों का जमा हुआ), ज्ञान की आग में जल जाता है। (अब से आगे का), अब “मैं कर्ता” नहीं, तो बनता ही नहीं। बस प्रारब्ध (जिसका तीर छूट चुका), वह अपना फल देता है, और शरीर तब तक चलता है। फिर ख़त्म। और इन सब के बाद, सात-श्लोकी टेक: “एकमेव अद्वयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन।”

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। तीन हिस्से, विषयों की नदी और संचित- का नाश (441-457), प्रारब्ध-कल्पना का खंडन (458-463), और “एकमेव अद्वयं” सात-श्लोकी टेक (464-470)। असली खंभे: 441 (नदी-समुद्र उपमा), 447 (अहं ब्रह्मास्मि, कल्प-कोटियों के कर्म स्वप्न की तरह विलीन), 451-452 (बाण की उपमा), 461 (शरीर की प्रारब्ध-कल्पना भी भ्रम), 464-470 (सात बार टेक)।

441 · विषय नदियाँ, समुद्र में घुलें, विकार न उठाएँ

यत्र प्रविष्टा विषयाः परेरिता नदीप्रवाहा इव वारिराशौ ।
लिनन्ति सन्मात्रतया न विक्रियां उत्पादयन्त्येष यतिर्विमुक्तः ॥ 441 ॥

yatra praviṣṭā viṣayāḥ pareritā nadī-pravāhā iva vāri-rāśau · linanti san-mātratayā na vikriyāṁ utpādayanty eṣa yatir vimuktaḥ

शब्दार्थ: यत्र प्रविष्टाः विषयाः परेरिताः · जहाँ प्रवेश करते विषय, दूसरों से प्रेरित · नदी-प्रवाहाः इव वारि-राशौ · नदी-प्रवाह की तरह जल-राशि में · लिनन्ति सन्-मात्रतया · सत्-मात्र होने से लीन हो जाते · न विक्रियां उत्पादयन्ति · विकार नहीं पैदा करते · एषः यतिः विमुक्तः · यह यति विमुक्त।

अर्थ: जहाँ विषय, दूसरों से प्रेरित, नदी-प्रवाह की तरह, जल-राशि (समुद्र) में आते हैं, सत्-मात्र होने से लीन हो जाते हैं, और विकार नहीं पैदा करते, यह यति विमुक्त है।

भावार्थ: गुरु एक अद्भुत उपमा देते हैं, नदियाँ और समुद्र। नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, पर समुद्र को बढ़ाती नहीं। उसमें “लहर” नहीं उठातीं। उसे जैसा है, वैसा रहने देती हैं।

जीवन्मुक्त ऐसा ही समुद्र है। विषय, सुख-दुख-मान-अपमान, आते हैं, “नदियों” की तरह। पर ज्ञानी-समुद्र में मिल कर वे “लीन” हो जाते हैं, बिना कोई विकार उठाए। समुद्र समुद्र रहता है। यह उपमा बहुत व्यावहारिक है, विषयों से बचने की कोशिश नहीं; बल्कि उन्हें आने देना, क्योंकि अब वे “मुझे” बदल नहीं सकते।

442 · ब्रह्म-तत्त्व जान कर, संसार पहले जैसा नहीं

विज्ञातब्रह्मतत्त्वस्य यथापूर्वं न संसृतिः ।
अस्ति चेन्न स विज्ञातब्रह्मभावो बहिर्मुखः ॥ 442 ॥

vijñāta-brahma-tattvasya yathā-pūrvaṁ na saṁsṛtiḥ · asti cen na sa vijñāta-brahma-bhāvo bahir-mukhaḥ

शब्दार्थ: विज्ञात-ब्रह्म-तत्त्वस्य · ब्रह्म-तत्त्व जान चुके के लिए · यथा-पूर्वं न संसृतिः · पहले जैसा संसार नहीं · अस्ति चेद् न सः विज्ञात-ब्रह्म-भावः · अगर हो तो वह ब्रह्म-भाव-ज्ञाता नहीं · बहिर्-मुखः · बाहर-मुखी।

अर्थ: ब्रह्म-तत्त्व जान चुके के लिए, पहले जैसा संसार [अनुभव] नहीं रहता। अगर रहता है, तो वह ब्रह्म-भाव-ज्ञाता नहीं। बहिर्-मुखी है।

भावार्थ: गुरु एक कड़ी कसौटी देते हैं, असली ज्ञान का प्रमाण क्या? संसार-अनुभव में बदलाव।

अगर “मैंने जाना” कह रहे हैं, पर आपका संसार-अनुभव वैसा ही है, सुख में उछलते, दुख में डूबते, इष्ट-अनिष्ट में बँधे, तो आपका “ज्ञान” सिर्फ़ शब्द-ज्ञान है, असली नहीं। असली ज्ञान संसार के सामने एक नया तेवर लाता है, एक नई दूरी। यह बहुत साफ़ बात है, और हर साधक को एक आईना है।

443 · पुरानी वासना से चले, पर वासना मंद होती है

प्राचीनवासनावेगादसौ संसरतीति चेत् ।
न सदेकत्वविज्ञानान्मन्दी भवति वासना ॥ 443 ॥

prācīna-vāsanā-vegād asau saṁsaratīti cet · na sad-ekatva-vijñānān mandī bhavati vāsanā

शब्दार्थ: प्राचीन-वासना-वेगात् असौ संसरति इति चेत् · “वह पुरानी वासना के वेग से संसार में चलता है”, अगर ऐसा कहें · न सद्-एकत्व-विज्ञानात् मन्दी भवति वासना · नहीं। सत्-एकत्व के ज्ञान से वासना मंद हो जाती।

अर्थ: अगर कहो, “वह पुरानी वासनाओं के वेग से ही अभी भी संसार में चलता है”, तो नहीं; सत्-एकत्व (ब्रह्म-एकता) के ज्ञान से वासना मंद हो जाती है।

भावार्थ: गुरु एक संभावित आपत्ति का सीधा जवाब देते हैं, “हो सकता है ज्ञानी पुरानी वासनाओं की वजह से ही चलता है।” गुरु कहते हैं, नहीं। ज्ञान वासनाओं को मंद करता है।

यह बहुत बारीक बात है। ज्ञान वासना को एकदम नहीं मिटाता; पर उसकी ताक़त, उसका “वेग”, कम कर देता है। पहले जो खींच रही थी, अब बस सरकती है। एक चुंबक से लोहा खींचता है; चुंबक कमज़ोर हो, तो लोहा बस सरकता है, उछलता नहीं। ज्ञान से वासना का चुंबक कमज़ोर होता है।

444 · कामुक की वृत्ति भी माँ के सामने थमती है

अत्यन्तकामुकस्यापि वृत्तिः कुण्ठति मातरि ।
तथैव ब्रह्मणि ज्ञाते पूर्णानन्दे मनीषिणः ॥ 444 ॥

atyanta-kāmukasyāpi vṛttiḥ kuṇṭhati mātari · tathaiva brahmaṇi jñāte pūrṇānande manīṣiṇaḥ

शब्दार्थ: अत्यन्त-कामुकस्य अपि · अत्यंत कामी की भी · वृत्तिः कुण्ठति मातरि · वृत्ति माँ के सामने कुंठित होती · तथा एव ब्रह्मणि ज्ञाते पूर्ण-आनन्दे · वैसे ही पूर्णानंद ब्रह्म के ज्ञान में · मनीषिणः · मनीषी की।

अर्थ: अत्यंत कामी की भी वृत्ति माँ के सामने कुंठित (थम) जाती है। वैसे ही, पूर्णानंद ब्रह्म के ज्ञान में, मनीषी की [वासना थम जाती है]।

भावार्थ: गुरु एक बेहद ज़मीनी, लगभग चौंकाने वाली उपमा देते हैं। एक अत्यंत कामी आदमी भी अपनी माँ के सामने वैसे नहीं रह सकता, वहाँ कुछ अपने आप थम जाता है।

क्यों? क्योंकि माँ की उपस्थिति में एक दूसरा भाव, पवित्र, पूर्ण, बेशर्त, उठता है, और काम की वृत्ति उसके सामने ठंडी पड़ जाती है। उसी तरह, मनीषी जब “पूर्णानंद” ब्रह्म से जुड़ता है, तो छोटे-छोटे विषयों की वासना ठंडी पड़ जाती है, क्योंकि बड़ा-असली रस मिल गया, छोटे की चाह ख़त्म। यह उपमा बहुत साहसी और सटीक है।

445 · निदिध्यासन-शील का बाह्य-प्रत्यय, प्रारब्ध-फल

निदिध्यासनशीलस्य बाह्यप्रत्यय ईक्ष्यते ।
ब्रवीति श्रुतिरेतस्य प्रारब्धं फलदर्शनात् ॥ 445 ॥

nididhyāsana-śīlasya bāhya-pratyaya īkṣyate · bravīti śrutir etasya prārabdhaṁ phala-darśanāt

शब्दार्थ: निदिध्यासन-शीलस्य · निदिध्यासन-स्वभाव वाले की · बाह्य-प्रत्ययः ईक्ष्यते · बाह्य-प्रत्यय (बाहरी अनुभव) देखा जाता · ब्रवीति श्रुतिः एतस्य प्रारब्धं · श्रुति इसका प्रारब्ध कहती · फल-दर्शनात् · फल दिखने से।

अर्थ: निदिध्यासन-स्वभाव वाले को भी बाह्य-प्रत्यय (बाहरी अनुभव) दिखाई देते हैं। श्रुति इसे “प्रारब्ध” कहती है, फल दिखने (होने) से।

भावार्थ: गुरु एक तकनीकी प्रश्न लेते हैं, अगर ज्ञानी सब-कुछ ब्रह्म ही देख रहा है, तो वह दुनिया कैसे देखता है?

जवाब: उसे भी बाह्य-अनुभव होते हैं, खाना, चलना, बोलना। पर ये “प्रारब्ध” से हैं, पुराने कर्मों का फल, जिसका तीर पहले ही चल चुका है। इस फल को रोका नहीं जा सकता; यह अपना काम पूरा करेगा। पर ज्ञानी इस फल में “मैं” नहीं डालता, बस होने देता है।

446 · सुख-अनुभव जब तक, प्रारब्ध; निष्क्रिय का फलोदय नहीं

सुखाद्यनुभवो यावत्तावत्प्रारब्धमिष्यते ।
फलोदयः क्रियापूर्वो निष्क्रियो न हि कुत्रचित् ॥ 446 ॥

sukhādy-anubhavo yāvat tāvat prārabdham iṣyate · phalodayaḥ kriyā-pūrvo niṣkriyo na hi kutracit

शब्दार्थ: सुख-आदि-अनुभवः यावत् · सुख आदि का अनुभव जब तक · तावत् प्रारब्धम् इष्यते · तब तक प्रारब्ध माना जाता · फल-उदयः क्रिया-पूर्वः · फल का उदय क्रिया-पूर्व का · निष्क्रियः न हि कुत्रचित् · निष्क्रिय (बिना क्रिया) कहीं नहीं।

अर्थ: सुख आदि का अनुभव जब तक है, तब तक प्रारब्ध माना जाता है। फल का उदय हमेशा क्रिया-पूर्व (पहले की क्रिया) से होता है, बिना क्रिया के कहीं नहीं।

भावार्थ: गुरु एक तर्क देते हैं, सुख-दुख का अनुभव हो रहा है, इसका मतलब “किसी” क्रिया का फल अभी पक रहा है। और वह क्रिया कोई पुरानी ही हो सकती है, क्योंकि वर्तमान में ज्ञानी “कर्ता” नहीं।

यानी जो भी अभी अनुभव हो रहा है, वह पुराने का फल है। नया कुछ नहीं बन रहा। यह प्रारब्ध की परिभाषा है, एक तीर जो पहले छूट चुका, अब अपना निशाना पाएगा।

447 · अहं ब्रह्मास्मि, कल्प-कोटियों के कर्म, स्वप्न की तरह विलीन

अहं ब्रह्मेति विज्ञानात्कल्पकोटिशतार्जितम् ।
सञ्चितं विलयं याति प्रबोधात्स्वप्नकर्मवत् ॥ 447 ॥

ahaṁ brahmeti vijñānāt kalpa-koṭi-śatārjitam · sañcitaṁ vilayaṁ yāti prabodhāt svapna-karmavat

शब्दार्थ: अहं ब्रह्म इति विज्ञानात् · “मैं ब्रह्म हूँ”, इस विज्ञान से · कल्प-कोटि-शत-अर्जितम् · सौ करोड़ कल्पों में अर्जित · सञ्चितं विलयं याति · संचित विलय में जाता · प्रबोधात् स्वप्न-कर्म-वत् · प्रबोध से स्वप्न-कर्म की तरह।

अर्थ: “अहं ब्रह्मास्मि”, इस विज्ञान से, सौ करोड़ कल्पों में अर्जित संचित (कर्म) विलय हो जाता है, प्रबोध (जागृति) से स्वप्न-कर्म की तरह।

भावार्थ: गुरु एक ज़बरदस्त उपमा देते हैं, “स्वप्न-कर्म।” सपने में आप पाप-पुण्य करते हैं, और जागते ही सब “गायब।”

“अहं ब्रह्मास्मि” का विज्ञान वैसी ही जागृति है। संचित, असंख्य जन्मों में जमा हुआ कर्म-कोष, एक झटके में विलीन। यह विवेकचूडामणि का एक सबसे आशा-भरा वचन है। साधक को लगता है, “इतने जन्मों का बोझ कैसे हटेगा?” गुरु कहते हैं, एक बार जाग जाएँ, सब बोझ गायब।

448 · स्वप्न में किया पुण्य-पाप, जागे हुए को क्या

यत्कृतं स्वप्नवेलायां पुण्यं वा पापमुल्बणम् ।
सुप्तोत्थितस्य किं तत्स्यात्स्वर्गाय नरकाय वा ॥ 448 ॥

yat kṛtaṁ svapna-velāyāṁ puṇyaṁ vā pāpam ulbaṇam · suptotthitasya kiṁ tat syāt svargāya narakāya vā

शब्दार्थ: यत् कृतं स्वप्न-वेलायां · जो किया स्वप्न-समय में · पुण्यं वा पापम् उल्बणम् · पुण्य या भारी पाप · सुप्त-उत्थितस्य किं तत् स्यात् · सोए से उठे को क्या होंगे · स्वर्गाय नरकाय वा · स्वर्ग या नरक के लिए।

अर्थ: जो स्वप्न-समय में पुण्य या भारी पाप किया, क्या वह सोए से उठे को स्वर्ग या नरक देगा?

भावार्थ: गुरु पिछले श्लोक का सीधा सबूत देते हैं। सपने में आप किसी को मार सकते हैं, पाप; या किसी को बचा सकते हैं, पुण्य। जागने पर कोई फल मिलेगा? नहीं।

क्योंकि स्वप्न के कर्म “स्वप्न-कर्ता” के थे, जो जागने पर “है ही नहीं।” उसी तरह, अज्ञान में किए कर्म “अज्ञानी कर्ता” के थे, जो ज्ञान आते ही “है ही नहीं।” तो कौन पाएगा फल? कोई नहीं। यह बहुत सटीक तर्क है।

449 · असंग, उदासीन, आकाश-जैसा, कर्म नहीं चिपकते

स्वमसङ्गमुदासीनं परिज्ञाय नभो यथा ।
न श्लिष्यति च यत्किंचित्कदाचिद्भाविकर्मभिः ॥ 449 ॥

svam asaṅgam udāsīnaṁ parijñāya nabho yathā · na śliṣyati ca yat-kiṁcit kadācid bhāvi-karmabhiḥ

शब्दार्थ: स्वम् असङ्गम् उदासीनं · अपने को असंग और उदासीन · परिज्ञाय नभः यथा · आकाश की तरह जान कर · न श्लिष्यति च यत्-किंचित् · और कुछ भी नहीं चिपकता · कदाचिद् भावि-कर्मभिः · कभी भविष्य के कर्मों से।

अर्थ: अपने को असंग, उदासीन, आकाश की तरह जान कर, कभी भी, किसी भी भविष्य के कर्म से, कुछ नहीं चिपकता।

भावार्थ: गुरु कर्मों (जो आगे होंगे) की बात करते हैं, और साफ़ कहते हैं: ज्ञानी पर कोई -कर्म “चिपकता” नहीं।

क्यों? क्योंकि वह “असंग” है, किसी से जुड़ता नहीं। और “उदासीन”, कोई पकड़ नहीं। और “आकाश-जैसा”, हर चीज़ उससे होकर गुज़र जाती है, बिना उसे छुए। तीन शब्द, असंग, उदासीन, आकाश-वत्, पूरी -कर्मों की समस्या को सुलझा देते हैं।

450 · आकाश घड़े या शराब-गंध से लिप्त नहीं

न नभो घटयोगेन सुरागन्धेन लिप्यते ।
तथात्मोपाधियोगेन तद्धर्मैर्नैव लिप्यते ॥ 450 ॥

na nabho ghaṭa-yogena surā-gandhena lipyate · tathātmopādhi-yogena tad-dharmair naiva lipyate

शब्दार्थ: न नभः घट-योगेन · आकाश घड़े के संयोग से नहीं · सुरा-गन्धेन लिप्यते · शराब-गंध से लिप्त होता · तथा आत्मा उपाधि-योगेन · वैसे ही आत्मा उपाधि-संयोग से · तद्-धर्मैः न एव लिप्यते · उसके धर्मों से नहीं लिप्त होता।

अर्थ: आकाश घड़े के संयोग से, शराब-गंध से नहीं लिप्त होता। वैसे ही, आत्मा उपाधि-संयोग से, उसके धर्मों से लिप्त नहीं होता।

भावार्थ: गुरु आकाश-उपमा को और बारीक करते हैं, एक शराब के घड़े में आकाश होंगे। पर क्या आकाश शराब की गंध पकड़ेगा? नहीं।

घड़ा रहेगा, गंध रहेगी, पर आकाश साफ़, बिना गंध। उसी तरह, आत्मा हर शरीर-उपाधि में रहती है, सुख-दुख, गुण-दोष, क्रोध-काम, पर इनमें से कोई आत्मा को “लिप्त” नहीं करता। आत्मा हमेशा साफ़, हमेशा अछूती।

451 · प्रारब्ध, ज्ञान से नष्ट नहीं। अपना फल देना ही पड़ता है

ज्ञानोदयात्पुरारब्धं कर्मज्ञानान्न नश्यति ।
अदत्वा स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्टबाणवत् ॥ 451 ॥

jñānodayāt purā-rabdhaṁ karma jñānān na naśyati · adattvā sva-phalaṁ lakṣyam uddiśyotsṛṣṭa-bāṇavat

शब्दार्थ: ज्ञान-उदयात् पुरा-रब्धं कर्म · ज्ञान-उदय से पहले शुरू हुआ कर्म · ज्ञानात् न नश्यति · ज्ञान से नष्ट नहीं होता · अदत्वा स्व-फलं · अपना फल दिए बिना · लक्ष्यम् उद्दिश्य उत्सृष्ट-बाण-वत् · लक्ष्य पर छोड़े हुए बाण की तरह।

अर्थ: ज्ञान के उदय से पहले शुरू हुआ कर्म ज्ञान से नष्ट नहीं होता, बिना अपना फल दिए, लक्ष्य पर छोड़े हुए बाण की तरह।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी उपमा शुरू करते हैं, छूटा हुआ बाण। एक तीरंदाज़ ने तीर छोड़ा। अब वह तीर अपने लक्ष्य तक जाएगा ही, चाहे तीरंदाज़ बाद में मन बदले, चाहे न।

प्रारब्ध-कर्म ऐसा ही है। ज्ञान आ गया, पर शरीर तब तक चलेगा जब तक प्रारब्ध-तीर अपने निशाने पर न पहुँच जाए। यह कर्म-शृंखला की एक बहुत ज़रूरी समझ है, कुछ चीज़ें “रद्द” नहीं हो सकतीं, बस “देखी” जा सकती हैं।

452 · बाण “बाघ” समझ कर छूटा, बाद में “गाय” लगे, रुकता नहीं

व्याघ्रबुद्ध्या विनिर्मुक्तो बाणः पश्चात्तु गोमतौ ।
न तिष्ठति छिनत्येव लक्ष्यं वेगेन निर्भरम् ॥ 452 ॥

vyāghra-buddhyā vinirmukto bāṇaḥ paścāt tu go-matau · na tiṣṭhati chinaty eva lakṣyaṁ vegena nirbharam

शब्दार्थ: व्याघ्र-बुद्ध्या विनिर्मुक्तः बाणः · “बाघ” समझ कर छोड़ा हुआ बाण · पश्चात् तु गो-मतौ · बाद में “गाय” की समझ होने पर · न तिष्ठति · नहीं रुकता · छिनत्ति एव लक्ष्यं वेगेन निर्भरम् · लक्ष्य को वेग से पूरी तरह काटता है।

अर्थ: “बाघ” समझ कर छोड़ा हुआ बाण, बाद में “गाय” की समझ होने पर भी नहीं रुकता; लक्ष्य को वेग से पूरी तरह काट ही देता है।

भावार्थ: गुरु पिछले श्लोक की उपमा को और गहरा करते हैं, एक तीरंदाज़ ने झाड़ी में “बाघ” समझ कर तीर छोड़ा। पर बीच में पता चला, वह तो गाय थी। अब क्या?

तीर अब रुक नहीं सकता, वह गाय को मारेगा ही। एक बार छूटा हुआ बाण, उसका वेग, उसका रास्ता, कुछ बदला नहीं जा सकता। प्रारब्ध भी ऐसा है। अज्ञान में किए कर्मों के फल, अब ज्ञान आया तो भी, रुकेंगे नहीं। अपना काम पूरा करेंगे।

453 · प्रारब्ध भोग से, संचित- ज्ञान-आग से; ब्रह्म-ऐक्य देखने वाले को कुछ नहीं

प्राब्धं बलवत्तरं खलु विदां भोगेन तस्य क्षयः सम्यग्ज्ञानहुताशनेन विलयः प्राक्षंचितागामिनाम् ।
ब्रह्मात्मैक्यमवेक्ष्य तन्मायातया ये सर्वदा संस्थिताः तेषां तत्त्रितयं नहि क्वचिदपि ब्रह्मैव ते निर्गुणम् ॥ 453 ॥

prārabdhaṁ balavattaraṁ khalu vidāṁ bhogena tasya kṣayaḥ samyag-jñāna-hutāśanena vilayaḥ prāk-sañcitāgāminām · brahmātmaikyam avekṣya tan-māyatayā ye sarvadā saṁsthitāḥ teṣāṁ tat-tritayaṁ na hi kvacid api brahmaiva te nirguṇam

शब्दार्थ: प्रारब्धं बलवत्तरं खलु विदां · प्रारब्ध बहुत बलवान है ज्ञानियों के लिए भी · भोगेन तस्य क्षयः · भोग से उसका क्षय · सम्यग्-ज्ञान-हुताशनेन विलयः · सम्यक्-ज्ञान-आग से विलय · प्राक्-सञ्चित-आगामिनाम् · पूर्व-संचित और का · ब्रह्म-आत्म-ऐक्यम् अवेक्ष्य तन्-मायतया · ब्रह्म-आत्म-ऐक्य देख कर, उसी रूप में · ये सर्वदा संस्थिताः · जो सर्वदा स्थित · तेषां तत्-त्रितयं नहि क्वचिद् अपि · उनको ये तीनों कहीं नहीं · ब्रह्म एव ते निर्गुणम् · वे निर्गुण ब्रह्म ही हैं।

अर्थ: ज्ञानियों के लिए भी प्रारब्ध बहुत बलवान है; उसका क्षय भोग से ही। सम्यक्-ज्ञान-आग से पूर्व-संचित और का विलय। पर जो ब्रह्म-आत्म-ऐक्य देख कर सर्वदा उसी रूप में स्थित हैं, उनके लिए ये तीनों कहीं नहीं। वे निर्गुण ब्रह्म ही हैं।

भावार्थ: गुरु तीनों कर्मों की पूरी तस्वीर एक श्लोक में रख देते हैं, और एक तीसरी, सबसे ऊँची संभावना भी।

संचित और , ज्ञान-आग से जलते। प्रारब्ध, भोग से ही ख़त्म। तीन कर्म, दो रास्ते। पर एक तीसरा रास्ता भी है, जो सर्वदा ब्रह्म-आत्म-ऐक्य में स्थित हैं, उनके लिए “तीनों” ही कुछ नहीं। वे “निर्गुण ब्रह्म ही हैं”, कर्म, फल, भोग, सब उनसे परे।

454 · केवल ब्रह्म-आत्मा में स्थित मुनि को, प्रारब्ध की बात ही नहीं

उपाधितादात्म्यविहीनकेवल ब्रह्मात्मनैवात्मनि तिष्ठतो मुनेः ।
प्रारब्धसद्भावकथा न युक्ता स्वप्नार्थसंबन्धकथेव जाग्रतः ॥ 454 ॥

upādhi-tādātmya-vihīna-kevala-brahmātmanaivātmani tiṣṭhato muneḥ · prārabdha-sad-bhāva-kathā na yuktā svapnārtha-sambandha-katheva jāgrataḥ

शब्दार्थ: उपाधि-तादात्म्य-विहीन-केवल-ब्रह्म-आत्मना एव आत्मनि तिष्ठतः मुनेः · उपाधि-तादात्म्य रहित केवल-ब्रह्म-आत्मा से ही आत्मा में स्थित मुनि के लिए · प्रारब्ध-सद्भाव-कथा न युक्ता · प्रारब्ध की सत्ता की बात ठीक नहीं · स्वप्न-अर्थ-संबन्ध-कथा इव जाग्रतः · जागे हुए के लिए स्वप्न-संबंध की बात की तरह।

अर्थ: उपाधि-तादात्म्य से रहित केवल-ब्रह्म-आत्मा के रूप में आत्मा में स्थित मुनि के लिए, प्रारब्ध की सत्ता की बात ठीक नहीं। जैसे जागे हुए व्यक्ति के लिए स्वप्न-संबंध की बात।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी उपमा देते हैं, जागे हुए आदमी से अगर पूछो “क्या स्वप्न में जो हुआ, उससे आप जुड़े हैं?”, वह हँस देगा।

क्योंकि जागृति में स्वप्न का “सम्बंध” बात ही ख़त्म। उसी तरह, जो “केवल-ब्रह्म-आत्मा” में जागा है, उससे “आपका प्रारब्ध है” कहना भी अजीब है। प्रारब्ध की बात “उस” को है, जो शरीर-तादात्म्य में है। बिना शरीर-तादात्म्य के, प्रारब्ध किसका?

455 · जागा हुआ, प्रतिभास-देह में अहंता-ममता नहीं डालता

न हि प्रबुद्धः प्रतिभासदेहे देहोपयोगिन्यपि च प्रपञ्चे ।
करोत्यहन्तां ममतानिदन्तां किन्तु स्वयं तिष्ठति जागरेण ॥ 455 ॥

na hi prabuddhaḥ pratibhāsa-dehe dehopayoginy api ca prapañce · karoty ahantāṁ mamatā-nidantāṁ kintu svayaṁ tiṣṭhati jāgareṇa

शब्दार्थ: न हि प्रबुद्धः प्रतिभास-देहे · प्रबुद्ध स्वप्न-देह में नहीं · देह-उपयोगिनी अपि च प्रपञ्चे · और देह-उपयोगी प्रपंच में भी · करोति अहन्तां ममता-निदन्तां · “मैं”, “मेरा”, “यह” नहीं डालता · किन्तु स्वयं तिष्ठति जागरेण · बल्कि स्वयं जागृति से रहता।

अर्थ: प्रबुद्ध (जागा हुआ) व्यक्ति, सपने में देखी देह में और उस देह के उपयोग की दुनिया में, “मैं,” “मेरा,” “यह” नहीं डालता; बल्कि स्वयं जागृति में रहता है।

भावार्थ: गुरु पिछली बात को सीधा रोज़मर्रा के अनुभव से जोड़ते हैं, जब आप जागते हैं, तो सपने में देखे शरीर और उसकी दुनिया से कोई जुड़ाव नहीं रखते।

“वह सपना था, अब मैं जागा हूँ”, बस इतना। शंकर कहते हैं, ज्ञानी की स्थिति इसी की तरह है। यह दुनिया उसके लिए “स्वप्न-जैसी”, दिखती है, चलती है, पर कोई “मैं,” “मेरा” नहीं। वह बस अपनी जागृति में बसा है।

456 · अगर “स्वप्न” में रुचि जागे, तो वह “जागा” नहीं

न तस्य मिथ्यार्थसमर्थनेच्छा न संग्रहस्तज्जगतोऽपि दृष्टः ।
तत्रानुवृत्तिर्यदि चेन्मृषार्थे न निद्रया मुक्त इतीष्यते ध्रुवम् ॥ 456 ॥

na tasya mithyārtha-samarthanecchā na saṁgrahas taj-jagato’pi dṛṣṭaḥ · tatrānuvṛttir yadi cen mṛṣārthe na nidrayā mukta itīṣyate dhruvam

शब्दार्थ: न तस्य मिथ्या-अर्थ-समर्थन-इच्छा · उसकी झूठी चीज़ों को पक्का करने की इच्छा नहीं · न संग्रहः तद्-जगतः अपि दृष्टः · उस जगत का संग्रह भी नहीं देखा जाता · तत्र अनुवृत्तिः यदि चेद् मृषा-अर्थे · अगर मिथ्या-अर्थ में अनुवृत्ति हो · न निद्रया मुक्तः इति इष्यते ध्रुवम् · तो वह नींद से मुक्त नहीं। निश्चित।

अर्थ: [जागे हुए] उसकी झूठी चीज़ों को पक्का करने की इच्छा नहीं; उस [स्वप्न-] जगत का संग्रह करते भी नहीं देखा जाता। अगर मिथ्या-अर्थ में अनुवृत्ति (पकड़) रहे, तो वह निद्रा से मुक्त नहीं। यह निश्चित।

भावार्थ: गुरु एक तीखी कसौटी देते हैं, अगर सपने में देखे को असली मान कर पकड़े रहो, तो आप जागे नहीं; आप अभी सपने में हैं।

इसी तरह, अगर “मैं ज्ञानी हूँ” कहते हैं, पर अभी भी संसार-पदार्थों को पकड़ने-जोड़ने में लगे हो, तो “ज्ञान” अधूरा है। यह जगत मिथ्या है, यह जानने का अर्थ है, इसकी पकड़ छूट जाए। पकड़ है, तो जान कहाँ?

457 · वैसे ही, परब्रह्म में रहता ज्ञानी, दूसरा देखता नहीं

तद्वत्परे ब्रह्मणि वर्तमानः सदात्मना तिष्ठति नान्यदीक्षते ।
स्मृतिर्यथा स्वप्नविलोकितार्थे तथा विदः प्राशनमोचनादौ ॥ 457 ॥

tadvat pare brahmaṇi vartamānaḥ sad-ātmanā tiṣṭhati nānyad īkṣate · smṛtir yathā svapna-vilokitārthe tathā vidaḥ prāśana-mocanādau

शब्दार्थ: तद्-वत् परे ब्रह्मणि वर्तमानः · वैसे ही, परब्रह्म में रहता हुआ · सद्-आत्मना तिष्ठति न अन्यद् ईक्षते · सद्-आत्मा से रहता, दूसरा नहीं देखता · स्मृतिः यथा स्वप्न-विलोकित-अर्थे · जैसे स्वप्न में देखे की स्मृति · तथा विदः प्राशन-मोचन-आदौ · वैसे ज्ञानी को खाने-त्यागने आदि में।

अर्थ: वैसे ही, परब्रह्म में रहता हुआ, ज्ञानी सद्-आत्मा से रहता है, दूसरा नहीं देखता। जैसे स्वप्न में देखी चीज़ की स्मृति [भर], वैसे ज्ञानी को खाने-त्यागने आदि [की क्रियाएँ]।

भावार्थ: गुरु ज्ञानी की रोज़मर्रा का सबसे प्यारा वर्णन देते हैं, खाना-पीना, मल-त्याग, सब “स्वप्न की स्मृति” जैसा।

सुबह आप उठते हैं, और कुछ देर बाद याद आता है, “अरे, मैंने ऐसा सपना देखा था।” यह स्मृति है, दूर की, हल्की, बिना कोई जुड़ाव वाली। ज्ञानी के लिए खाना, उठना, बोलना, सब वैसे ही दिखता है। होता है, दिखता है, पर कोई “मैं कर रहा हूँ” नहीं।

458 · कर्म से निर्मित देह, आत्मा कर्म-निर्मित नहीं

कर्मणा निर्मितो देहः प्रारब्धं तस्य कल्प्यताम् ।
नानादेरात्मनो युक्तं नैवात्मा कर्मनिर्मितः ॥ 458 ॥

karmaṇā nirmito dehaḥ prārabdhaṁ tasya kalpyatām · nānāder ātmano yuktaṁ naivātmā karma-nirmitaḥ

शब्दार्थ: कर्मणा निर्मितः देहः · कर्म से बना देह · प्रारब्धं तस्य कल्प्यताम् · प्रारब्ध उसका मान लें · न अनादेः आत्मनः युक्तं · अनादि आत्मा के लिए ठीक नहीं · न एव आत्मा कर्म-निर्मितः · आत्मा कर्म-निर्मित नहीं।

अर्थ: कर्म से बने देह का “प्रारब्ध” मान लें। पर यह अनादि आत्मा के लिए ठीक नहीं। आत्मा कर्म-निर्मित नहीं।

भावार्थ: गुरु एक बारीक भेद करते हैं, प्रारब्ध “देह” का है, “आत्मा” का नहीं।

देह कर्म से बना, इसलिए कर्म-फल (प्रारब्ध) से जुड़ा। पर आत्मा? वह अनादि है, कर्म से नहीं बनी। तो उसको “प्रारब्ध” क्यों? आप आत्मा हैं, तो प्रारब्ध आपका नहीं। देह का है। यह बात ख़ुद को “मैं आत्मा हूँ” मानने वाले के लिए मुक्ति-दायी है।

459 · अजर, नित्य, शाश्वत, श्रुति कहे; प्रारब्ध-कल्पना कहाँ

अजो नित्यः शाश्वत इति ब्रूते श्रुतिरमोघवाक् ।
तदात्मना तिष्ठतोऽस्य कुतः प्रारब्धकल्पना ॥ 459 ॥

ajo nityaḥ śāśvata iti brūte śrutir amogha-vāk · tad-ātmanā tiṣṭhato’sya kutaḥ prārabdha-kalpanā

शब्दार्थ: अजः नित्यः शाश्वतः इति ब्रूते · “अजन्मा, नित्य, शाश्वत”, कहती है · श्रुतिः अमोघ-वाक् · श्रुति की अमोघ वाणी · तद्-आत्मना तिष्ठतः अस्य · उस आत्मा से स्थित के लिए · कुतः प्रारब्ध-कल्पना · प्रारब्ध-कल्पना कहाँ।

अर्थ: “अजन्मा, नित्य, शाश्वत”, श्रुति की अमोघ वाणी कहती है। उस आत्मा के रूप में स्थित के लिए, प्रारब्ध-कल्पना कहाँ?

भावार्थ: गुरु श्रुति का सीधा वाक्य लाते हैं, आत्मा “अजन्मा, नित्य, शाश्वत।”

तो जो जन्म ही नहीं लेती, उसका प्रारब्ध (जन्म-कर्म-फल) कैसे? अगर आप आत्मा हैं, और श्रुति कहती है कि आप अजन्मा हैं, तो “प्रारब्ध-कल्पना” आपके लिए लागू नहीं। यह तर्क बहुत मज़बूत है, और साधक को “बेबसी” से बाहर निकालता है।

460 · प्रारब्ध तब है जब “मैं देह हूँ”, देह-भाव नहीं तो प्रारब्ध भी छोड़

प्रारब्धं सिध्यति तदा यदा देहात्मना स्थितिः ।
देहात्मभावो नैवेष्टः प्रारब्धं त्यज्यतामतः ॥ 460 ॥

prārabdhaṁ sidhyati tadā yadā dehātmanā sthitiḥ · dehātma-bhāvo naiveṣṭaḥ prārabdhaṁ tyajyatām ataḥ

शब्दार्थ: प्रारब्धं सिध्यति तदा · प्रारब्ध तभी सिद्ध · यदा देह-आत्मना स्थितिः · जब देह-आत्मा से स्थिति · देह-आत्म-भावः न एव इष्टः · देह-आत्म-भाव इष्ट नहीं · प्रारब्धं त्यज्यताम् अतः · इसलिए प्रारब्ध को छोड़।

अर्थ: प्रारब्ध तभी सिद्ध है जब “मैं देह हूँ”, यह स्थिति हो। देह-आत्म-भाव हमें इष्ट नहीं। इसलिए प्रारब्ध को भी छोड़।

भावार्थ: गुरु बेहद तार्किक हैं, प्रारब्ध की पूरी बात “देह-आत्म-भाव” पर टिकी है। अगर वह नहीं, तो प्रारब्ध भी “लागू” नहीं।

यह बात बहुत ज़रूरी है, साधक अकसर “प्रारब्ध” को एक बहाना बना लेता है: “मेरा प्रारब्ध ऐसा है, क्या करूँ।” गुरु कहते हैं, पहले देखो, क्या आप सच में आत्मा हैं? अगर हाँ, तो प्रारब्ध की पकड़ क्यों? यह बहाने को काटता है।

461 · शरीर की प्रारब्ध-कल्पना भी भ्रम, असत् का जन्म कहाँ

शरीरस्यापि प्रारब्धकल्पना भ्रान्तिरेव हि ।
अध्यस्तस्य कुतः सत्त्वमसत्यस्य कुतो जनिः अजातस्य कुतो नाशः प्रारब्धमसतः कुतः ॥ 461 ॥

śarīrasyāpi prārabdha-kalpanā bhrāntir eva hi · adhyastasya kutaḥ sattvam asatyasya kuto janiḥ ajātasya kuto nāśaḥ prārabdham asataḥ kutaḥ

शब्दार्थ: शरीरस्य अपि प्रारब्ध-कल्पना · शरीर की भी प्रारब्ध-कल्पना · भ्रान्तिः एव हि · बस भ्रम ही · अध्यस्तस्य कुतः सत्त्वम् · आरोपित का सत्त्व कहाँ · असत्यस्य कुतः जनिः · असत्य का जन्म कहाँ · अजातस्य कुतः नाशः · अजात का नाश कहाँ · प्रारब्धम् असतः कुतः · असत् का प्रारब्ध कहाँ।

अर्थ: शरीर की भी प्रारब्ध-कल्पना बस भ्रम है। आरोपित का “होना” कहाँ? असत्य का जन्म कहाँ? अजात का नाश कहाँ? असत् का प्रारब्ध कहाँ?

भावार्थ: गुरु एक श्रृंखला बद्ध तर्क देते हैं, चार सवाल, एक के बाद एक।

तो जन्म कैसे? जन्म नहीं,तो “प्रारब्ध” कहाँ बैठेगा? यह तर्क की एक सीढ़ी है, जो शरीर-संबंधी हर बात को ढीला कर देती है, हाँ, प्रारब्ध भी।

462 · “तो देह क्यों रहता है”, जड़ बुद्धि वालों की शंका

ज्ञानेनाज्ञानकार्यस्य समूलस्य लयो यदि ।
तिष्ठत्ययं कथं देह इति शङ्कावतो जडान् ॥ 462 ॥

jñānenājñāna-kāryasya sa-mūlasya layo yadi · tiṣṭhaty ayaṁ kathaṁ deha iti śaṅkāvato jaḍān

शब्दार्थ: ज्ञानेन अज्ञान-कार्यस्य · ज्ञान से अज्ञान-कार्य का · स-मूलस्य लयः यदि · मूल सहित लय हो, अगर · तिष्ठति अयं कथं देहः · तो यह देह क्यों रहता · इति शङ्कावतः जडान् · यह शंका करने वाले जड़ों के लिए।

अर्थ: “अगर ज्ञान से अज्ञान-कार्य का मूल सहित लय हो, तो यह देह कैसे रहता है?”, ऐसी शंका करने वाले जड़-बुद्धि लोगों के लिए [अगला श्लोक]।

भावार्थ: गुरु एक आपत्ति को साफ़ शब्दों में रखते हैं, और कहते हैं, ऐसी शंका “जड़-बुद्धि” वालों की है।

यानी जो लोग बौद्धिक स्तर पर अटके हैं, वे यह पूछते हैं, “ज्ञान आ गया, तो देह क्यों दिखता है?” इसका जवाब अगले श्लोक में । और गुरु “जड़ान्” (जड़ों के लिए) शब्द जान-बूझ कर लाते हैं, यह शंका असली नहीं। बस तर्क-जड़ता का परिणाम है।

463 · श्रुति “प्रारब्ध” बाह्य-दृष्टि से कहती है, विवेकी के लिए नहीं

समाधातुं बाह्यदृष्ट्या प्रारब्धं वदति श्रुतिः ।
न तु देहादिसत्यत्वबोधनाय विपश्चिताम् ॥ 463 ॥

samādhātuṁ bāhya-dṛṣṭyā prārabdhaṁ vadati śrutiḥ · na tu dehādi-satyatva-bodhanāya vipaścitām

शब्दार्थ: समाधातुं बाह्य-दृष्ट्या · संतुष्ट करने को बाह्य-दृष्टि से · प्रारब्धं वदति श्रुतिः · प्रारब्ध कहती श्रुति · न तु देह-आदि-सत्यत्व-बोधनाय · देह आदि की सत्ता बताने के लिए नहीं · विपश्चिताम् · विवेकी लोगों के लिए।

अर्थ: श्रुति “प्रारब्ध” की बात [शंका को] संतुष्ट करने के लिए, बाह्य-दृष्टि से कहती है, विवेकी लोगों के लिए देह आदि की सत्ता बताने के लिए नहीं।

भावार्थ: गुरु बहुत बारीक बात कहते हैं, श्रुति में “प्रारब्ध” का ज़िक्र है, पर वह क्यों है? साधारण लोगों की शंका मिटाने के लिए।

विवेकी के लिए तो श्रुति का असली संदेश है, “देह आदि असली नहीं।” “प्रारब्ध” तो उन लोगों के लिए है, जो अभी देह-तादात्म्य में हैं और पूछते हैं “तो ज्ञानी का देह क्यों।” यह उत्तर “उन्हें” के लिए है, विवेकी इसको सिद्धांत न माने।

464 · एकमेव अद्वयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन (1), परिपूर्ण, अनादि-अनंत

परिपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेयमविक्रियम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 464 ॥

paripūrṇam anādy-antam aprameyam avikriyam · ekam evādvayaṁ brahma neha nānāsti kiṁcana

शब्दार्थ: परिपूर्णम् अनादि-अन्तम् अप्रमेयम् अविक्रियम् · परिपूर्ण, अनादि-अनंत, अप्रमेय, अविकार · एकम् एव अद्वयं ब्रह्म · ब्रह्म एक ही, अद्वय · न इह नाना अस्ति किंचन · यहाँ कोई बहु नहीं।

अर्थ: परिपूर्ण, अनादि-अनंत, अप्रमेय, अविकार, ब्रह्म एक ही है, अद्वय; यहाँ कोई बहु नहीं।

भावार्थ: यहाँ से सात-श्लोकी टेक शुरू होती है, “एकमेवाद्वयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन।” इसे एक मंत्र की तरह पढ़िए। हर श्लोक नए वर्णन-गुच्छ के साथ खुलता है, और वही पंक्ति लौटती है।

“नेह नानास्ति किंचन”, “यहाँ कोई बहु नहीं”, यह उपनिषदों का प्रसिद्ध वाक्य है (कठ, बृहदारण्यक)। और हर बार, सात बार, यह एक ही सच नई-नई कोण से कहा जाता है। पहले श्लोक में चार बुनियादी गुण, पूर्ण, अनादि-अनंत, अप्रमेय, अविकार।

465 · टेक (2), सद्-घन, चित्-घन, आनंद-घन

सद्गनं चिद्घनं नित्यमानन्दघनमक्रियम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 465 ॥

sad-ghanaṁ cid-ghanaṁ nityam ānanda-ghanam akriyam · ekam evādvayaṁ brahma neha nānāsti kiṁcana

शब्दार्थ: सद्-घनं चिद्-घनं नित्यम् आनन्द-घनम् अक्रियम् · सद्-घन, चित्-घन, नित्य आनंद-घन, अक्रिय · एकम् एव अद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।

अर्थ: सद्-घन, चित्-घन, नित्य आनंद-घन, अक्रिय, ब्रह्म एक ही, अद्वय; यहाँ कोई बहु नहीं।

भावार्थ: टेक का दूसरा दोहराव। यहाँ एक प्यारा शब्द आता है, “घन।” तीन बार: सद्-घन, चित्-घन, आनंद-घन।

“घन” यानी ठोस, घना, पूरा-भरा। ब्रह्म खाली-खाली नहीं। वह सत्ता से घना, चेतना से घना, आनंद से घना है। कोई गैप नहीं। और सच्चिदानंद की पुरानी त्रिवेणी यहाँ “घन” शब्द से नई ताज़गी पाती है।

466 · टेक (3), प्रत्यक-एक-रस, पूर्ण, अनंत, सर्वतोमुख

प्रत्यगेकरसं पूर्णमनन्तं सर्वतोमुखम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 466 ॥

pratyag-eka-rasaṁ pūrṇam anantaṁ sarvato-mukham · ekam evādvayaṁ brahma neha nānāsti kiṁcana

शब्दार्थ: प्रत्यग्-एक-रसं पूर्णम् अनन्तं सर्वतो-मुखम् · प्रत्यक-एक-रस, पूर्ण, अनंत, सर्वतोमुख · एकम् एव अद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।

अर्थ: प्रत्यक-एक-रस, पूर्ण, अनंत, सर्वतोमुख, ब्रह्म एक ही, अद्वय; यहाँ कोई बहु नहीं।

भावार्थ: टेक का तीसरा दोहराव। “सर्वतोमुख”, हर तरफ़ मुख वाला।

यह कोई “हज़ार-हाथ-वाला देवता” की तस्वीर नहीं। यह कह रहा है कि ब्रह्म हर दिशा को “देखता” है, हर जगह उसकी आँख है। और साथ ही “प्रत्यक्-एक-रस”, भीतर एक रस। यानी बाहर-भीतर का बँटवारा भी नहीं। हर जगह वही एक स्वाद।

467 · टेक (4), न त्याज्य, न ग्राह्य, न आदेय, न आश्रित

अहेयमनुपादेयमनादेयमनाश्रयम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 467 ॥

aheyam anupādeyam anādeyam anāśrayam · ekam evādvayaṁ brahma neha nānāsti kiṁcana

शब्दार्थ: अहेयम् अनुपादेयम् अनादेयम् अनाश्रयम् · न त्याज्य, न ग्राह्य, न आदेय, न आश्रित · एकम् एव अद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।

अर्थ: न त्यागने योग्य, न लेने योग्य, न देने योग्य, न आश्रित, ब्रह्म एक ही, अद्वय; यहाँ कोई बहु नहीं।

भावार्थ: टेक का चौथा दोहराव। यह सबसे प्यारा है, “अहेयम् अनुपादेयम्।”

आम तौर पर हर चीज़ या तो त्यागने योग्य है, या लेने योग्य। ब्रह्म दोनों नहीं। क्योंकि वह आप ख़ुद हैं। अपने को कोई कैसे “त्यागे” या “ले?” और “अनाश्रय”, किसी पर निर्भर नहीं। यानी ब्रह्म स्व-स्थित है। यह उपनिषदों की एक बहुत मूल बात है।

468 · टेक (5), निर्गुण, निष्कल, सूक्ष्म, निर्विकल्प, निरंजन

निर्गुणं निष्कलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं निरञ्जनम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 468 ॥

nirguṇaṁ niṣkalaṁ sūkṣmaṁ nirvikalpaṁ nirañjanam · ekam evādvayaṁ brahma neha nānāsti kiṁcana

शब्दार्थ: निर्गुणं निष्कलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं निरञ्जनम् · निर्गुण, निष्कल, सूक्ष्म, निर्विकल्प, निरंजन · एकम् एव अद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।

अर्थ: निर्गुण, निष्कल, सूक्ष्म, निर्विकल्प, निरंजन, ब्रह्म एक ही, अद्वय; यहाँ कोई बहु नहीं।

भावार्थ: टेक का पाँचवाँ दोहराव। पाँच “निर्” शब्द, एक के बाद एक।

निर्गुण (गुण-रहित), निष्कल (अंग-रहित), सूक्ष्म (पकड़ से परे), निर्विकल्प (विकल्प-रहित), निरंजन (दाग-रहित)। हर “निर्” एक और बाधा हटाता है। आख़िर में जो बचता है, वह बहुत साफ़, बहुत खुला, बहुत मुक्त है।

469 · टेक (6), अनिरूप्य, मन-वाणी अगोचर

अनिरूप्य स्वरूपं यन्मनोवाचामगोचरम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 469 ॥

anirūpya-svarūpaṁ yan mano-vācām agocaram · ekam evādvayaṁ brahma neha nānāsti kiṁcana

शब्दार्थ: अनिरूप्य-स्वरूपं · वर्णन-अयोग्य स्वरूप · यद् मनो-वाचाम् अगोचरम् · जो मन-वाणी का विषय नहीं · एकम् एव अद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।

अर्थ: जिसका स्वरूप वर्णन-अयोग्य है, जो मन-वाणी का विषय नहीं। ब्रह्म एक ही, अद्वय; यहाँ कोई बहु नहीं।

भावार्थ: टेक का छठवाँ दोहराव। यहाँ गुरु एक ज़रूरी विरोधाभास सामने रखते हैं, वर्णन-अयोग्य ब्रह्म का वर्णन।

उपनिषदों की प्रसिद्ध पंक्ति “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह”, जहाँ से वाणी लौट आती है, मन भी नहीं पहुँच सकता। यह बात भी एक पंक्ति में कह दी जाती है। और शायद यही असली नम्रता है, हर वर्णन करते हुए भी मानना कि “वर्णन तो पूरा हो नहीं सकता।”

470 · टेक (7), सत्-समृद्ध, स्वतः-सिद्ध, शुद्ध, बुद्ध, अनुपम

सत्समृद्धं स्वतःसिद्धं शुद्धं बुद्धमनीदृशम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 470 ॥

sat-samṛddhaṁ svataḥ-siddhaṁ śuddhaṁ buddham anīdṛśam · ekam evādvayaṁ brahma neha nānāsti kiṁcana

शब्दार्थ: सत्-समृद्धं स्वतः-सिद्धं शुद्धं बुद्धम् अनीदृशम् · सत्-समृद्ध, स्वतः-सिद्ध, शुद्ध, बुद्ध, अनुपम (इसके जैसा कुछ नहीं) · एकम् एव अद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।

अर्थ: सत्-समृद्ध, स्वतः-सिद्ध, शुद्ध, बुद्ध, अनुपम, ब्रह्म एक ही, अद्वय; यहाँ कोई बहु नहीं।

भावार्थ: टेक का सातवाँ और आख़िरी दोहराव। यहाँ “स्वतः-सिद्ध” शब्द अद्भुत है।

“स्वतः-सिद्ध” यानी अपने आप सिद्ध, किसी और के सहारे नहीं। ब्रह्म को साबित करने के लिए कोई और प्रमाण नहीं चाहिए, वह अपने आप प्रमाण है। और “अनीदृशम्”, इसके जैसा कुछ नहीं। यह उपमा-अतीत है, समाधान नहीं हो सकती। सात दोहराव के बाद, एक तसल्ली, एक स्थिरता। यह पंक्ति को अब हमेशा-के-लिए दिल में बस जाने दीजिए।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना: भाग 16, महान महात्माओं का “निरस्त-राग,” और गुरु से शिष्य को सीधे आदेश: “मोह मिटा, मुक्त-कृतार्थ-प्रबुद्ध हो।” फिर शिष्य की प्रत्यक्ष अनुभूति में डूब कर खुलने वाला वचन, “बुद्धि नष्ट, प्रवृत्ति गली, क्या कहूँ, कितना अपार सुख!”

और एक काम जेब में रखिए: श्लोक 464-470 की पंक्ति, “एकमेवाद्वयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन।” इसे आज दिन-भर में सात बार धीरे-धीरे कहिए। बाहर “बहु” दिखे, अंदर यह पंक्ति। फ़र्क धीरे-धीरे आता है, पर पक्का।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, verbatim।

स्थायी URL: /vivekachudamani/karma-advaya/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-23