विवेकचूडामणि
भाग 15 · कर्म-त्रय और “एकमेव अद्वयं” टेक · श्लोक 441-470
बोध हो जाने पर भी ज्ञानी खाता है, चलता है, बोलता है, फिर वह संसार में बँधता क्यों नहीं। गुरु यह गुत्थी टालते नहीं, सीधे सुलझाते हैं। संचित, प्रारब्ध और आगामी, तीनों कर्मों का साफ़ हिसाब, और अंत में मंत्र की तरह सात बार लौटती एक ही पंक्ति, “एकमेव अद्वयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन।”
पहले एक बात
एक सहज प्रश्न उठता है, बोध हो जाने पर भी ज्ञानी इस संसार में दिखता क्यों है, खाता क्यों है, चलता क्यों है, सुख-दुख का अनुभव क्यों करता है। गुरु इस प्रश्न को टालते नहीं, सीधे उठाते हैं, और तीन कर्मों के हिसाब से इसका उत्तर देते हैं।

संचित, पिछले जन्मों का जमा हुआ कर्म-कोष, ज्ञान की आग में जल जाता है। आगामी, अब से आगे का कर्म, “मैं कर्ता” का भाव न रहने से बनता ही नहीं। बस प्रारब्ध, जिसका तीर छूट चुका, वह अपना फल देता है, और उतनी देर शरीर चलता है, फिर शांत हो जाता है। इन सब के बाद आती है सात-श्लोकी टेक, “एकमेव अद्वयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन।”
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। तीन हिस्से, विषयों की नदी और संचित का नाश (441-457), प्रारब्ध-कल्पना का खंडन (458-463), और “एकमेव अद्वयं” सात-श्लोकी टेक (464-470)। मुख्य खंभे, 441 (नदी-समुद्र उपमा), 447 (अहं ब्रह्मास्मि, कल्प-कोटियों के कर्म स्वप्न की तरह विलीन), 451-452 (बाण की उपमा), 461 (शरीर की प्रारब्ध-कल्पना भी भ्रम), 464-470 (सात बार टेक)।
गुरु पहले एक उपमा से बात खोलते हैं। ज्ञानी एक समुद्र है। विषय, सुख-दुख, मान-अपमान, ये सब नदियों की तरह उसमें आ कर मिलते हैं, पर समुद्र को न बढ़ाते हैं, न उसमें कोई लहर उठाते हैं, बस सत्-मात्र होने से उसी में लीन हो जाते हैं। ऐसा यति विमुक्त है, उसे अब विषयों से बचने की चेष्टा भी नहीं करनी पड़ती, क्योंकि वे उसे बदल ही नहीं सकते। और साथ ही गुरु एक कड़ी कसौटी रख देते हैं। जिसने ब्रह्म-तत्त्व सचमुच जान लिया, उसका संसार-अनुभव पहले जैसा नहीं रह जाता। यदि अब भी सुख में उछाल और दुख में डूबना वैसा ही है, तो वह ज्ञानी नहीं, बहिर्मुखी ही है। यही वह आईना है जिसमें ज्ञान की सच्चाई परखी जाती है।
441 · 442
यत्र प्रविष्टा विषयाः परेरिता नदीप्रवाहा इव वारिराशौ ।
लिनन्ति सन्मात्रतया न विक्रियां उत्पादयन्त्येष यतिर्विमुक्तः ॥ 441 ॥
विज्ञातब्रह्मतत्त्वस्य यथापूर्वं न संसृतिः ।
अस्ति चेन्न स विज्ञातब्रह्मभावो बहिर्मुखः ॥ 442 ॥
तब कोई आपत्ति उठा सकता है, ज्ञानी तो पुरानी वासनाओं के वेग से ही अब भी संसार में चलता दिखता है। गुरु कहते हैं, नहीं। सत्-एकत्व का ज्ञान वासना को मिटाता भले न हो, पर उसका वेग मंद कर देता है। चुंबक कमज़ोर पड़ जाए तो लोहा बस सरकता है, उछलता नहीं। इसे और ज़मीन पर लाने को गुरु एक सीधी-सी बात कहते हैं। अत्यंत कामी पुरुष की वृत्ति भी अपनी माँ के सामने अपने आप थम जाती है, वहाँ एक पवित्र, पूर्ण भाव उठता है और काम ठंडा पड़ जाता है। ठीक वैसे ही, मनीषी जब पूर्णानंद ब्रह्म से जुड़ जाता है, तो छोटे विषयों की चाह अपने आप शांत हो जाती है, बड़ा रस मिल जाए तो छोटे की भूख कहाँ बचती है।
443 · 444
प्राचीनवासनावेगादसौ संसरतीति चेत् ।
न सदेकत्वविज्ञानान्मन्दी भवति वासना ॥ 443 ॥
अत्यन्तकामुकस्यापि वृत्तिः कुण्ठति मातरि ।
तथैव ब्रह्मणि ज्ञाते पूर्णानन्दे मनीषिणः ॥ 444 ॥
अब गुरु एक तकनीकी गुत्थी लेते हैं। यदि ज्ञानी सब-कुछ ब्रह्म ही देख रहा है, तो उसे यह बाहरी दुनिया दिखती क्यों है, वह खाता-चलता क्यों है। उत्तर है, ये बाह्य-अनुभव उसे “प्रारब्ध” से होते हैं, श्रुति इसी को प्रारब्ध कहती है, क्योंकि यहाँ पुराने कर्म का फल सामने दिख रहा है। और जब तक सुख-दुख का अनुभव चल रहा है, तब तक मानना पड़ेगा कि किसी क्रिया का फल पक रहा है, और वह क्रिया पुरानी ही हो सकती है, क्योंकि वर्तमान में ज्ञानी कर्ता है ही नहीं। फल बिना पहले की क्रिया के कहीं उगता नहीं। यही प्रारब्ध की परिभाषा है, वह तीर जो पहले छूट चुका, अब अपना निशाना पाएगा ही।
445 · 446
निदिध्यासनशीलस्य बाह्यप्रत्यय ईक्ष्यते ।
ब्रवीति श्रुतिरेतस्य प्रारब्धं फलदर्शनात् ॥ 445 ॥
सुखाद्यनुभवो यावत्तावत्प्रारब्धमिष्यते ।
फलोदयः क्रियापूर्वो निष्क्रियो न हि कुत्रचित् ॥ 446 ॥
अब आता है इस भाग का सबसे आश्वासन-भरा वचन। असंख्य जन्मों का जमा हुआ कर्म-बोझ कैसे हटेगा, इस आशंका का उत्तर एक ही जागृति में मिल जाता है। “अहं ब्रह्मास्मि” का विज्ञान वैसी ही जागृति है, जैसे स्वप्न से जागना। सौ करोड़ कल्पों में अर्जित संचित कर्म इस एक बोध में स्वप्न-कर्म की तरह विलीन हो जाता है। और गुरु इसका प्रमाण भी रोज़ के अनुभव से देते हैं। स्वप्न में किसी ने पाप किया या पुण्य, क्या जाग उठने पर वह उसे स्वर्ग या नरक देगा। नहीं, क्योंकि वह स्वप्न-कर्ता जागने पर रहता ही नहीं। उसी तरह अज्ञान में किए कर्म उस अज्ञानी कर्ता के थे, जो ज्ञान आते ही नहीं बचता, तो फल पाने वाला भी कोई नहीं बचता।
447 · 448
अहं ब्रह्मेति विज्ञानात्कल्पकोटिशतार्जितम् ।
सञ्चितं विलयं याति प्रबोधात्स्वप्नकर्मवत् ॥ 447 ॥
यत्कृतं स्वप्नवेलायां पुण्यं वा पापमुल्बणम् ।
सुप्तोत्थितस्य किं तत्स्यात्स्वर्गाय नरकाय वा ॥ 448 ॥
संचित का हिसाब हुआ, अब आगामी का। ज्ञानी पर कोई आगे होने वाला कर्म चिपकता ही नहीं, क्योंकि वह अपने को असंग, उदासीन और आकाश-जैसा जान चुका है, हर वस्तु उससे होकर गुज़र जाती है, उसे छुए बिना। ये तीन शब्द ही आगामी-कर्म की सारी समस्या सुलझा देते हैं। और आकाश की उपमा गुरु और बारीक करते हैं। शराब के घड़े में भी आकाश रहता है, पर क्या आकाश उस गंध को पकड़ता है। घड़ा रहेगा, गंध रहेगी, आकाश साफ़ ही रहेगा। उसी तरह आत्मा हर शरीर-उपाधि में बसती है, सुख-दुख, गुण-दोष, क्रोध-काम के बीच, पर इनमें से कोई उसे लिप्त नहीं करता। वह सदा अछूती रहती है।
449 · 450
स्वमसङ्गमुदासीनं परिज्ञाय नभो यथा ।
न श्लिष्यति च यत्किंचित्कदाचिद्भाविकर्मभिः ॥ 449 ॥
न नभो घटयोगेन सुरागन्धेन लिप्यते ।
तथात्मोपाधियोगेन तद्धर्मैर्नैव लिप्यते ॥ 450 ॥
रह गया प्रारब्ध, और यहाँ गुरु एक प्यारी उपमा खोलते हैं। संचित और आगामी तो ज्ञान से कट जाते हैं, पर प्रारब्ध ज्ञान-उदय से पहले शुरू हो चुका था, इसलिए वह नष्ट नहीं होता, अपना फल दिए बिना थमता नहीं, ठीक उस बाण की तरह जो लक्ष्य पर छूट चुका। किसी तीरंदाज़ ने झाड़ी में बाघ समझ कर तीर छोड़ा, और बीच में जान लिया कि वह तो गाय है। अब क्या, तीर रुक नहीं सकता, वह वेग से अपना निशाना काट ही देगा। प्रारब्ध भी ऐसा ही है। अज्ञान में किए कर्मों के फल, अब ज्ञान आ जाने पर भी रुकेंगे नहीं, अपना काम पूरा करेंगे। कुछ चीज़ें रद्द नहीं हो सकतीं, बस देखी जा सकती हैं।
451 · 452
ज्ञानोदयात्पुरारब्धं कर्मज्ञानान्न नश्यति ।
अदत्वा स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्टबाणवत् ॥ 451 ॥
व्याघ्रबुद्ध्या विनिर्मुक्तो बाणः पश्चात्तु गोमतौ ।
न तिष्ठति छिनत्येव लक्ष्यं वेगेन निर्भरम् ॥ 452 ॥
अब गुरु तीनों कर्मों की पूरी तस्वीर एक ही श्लोक में रख देते हैं। प्रारब्ध बहुत बलवान है, ज्ञानियों के लिए भी, और उसका क्षय केवल भोग से होता है। सम्यक्-ज्ञान की आग में तो पूर्व-संचित और आगामी ही जलते हैं। तीन कर्म, दो मार्ग। पर इसके परे एक और ऊँची स्थिति है, जो सर्वदा ब्रह्म-आत्म-ऐक्य देख कर उसी में स्थित हैं, उनके लिए ये तीनों ही नहीं रहते, वे तो निर्गुण ब्रह्म ही हैं। और ऐसे मुनि से प्रारब्ध की सत्ता की बात करना भी असंगत है, जैसे जागे हुए व्यक्ति से पूछना कि स्वप्न में जो हुआ उससे उसका क्या नाता। वह बस हँस देगा। प्रारब्ध तो उसका विषय है जो अभी शरीर से बँधा है।
453 · 454
प्राब्धं बलवत्तरं खलु विदां भोगेन तस्य क्षयः सम्यग्ज्ञानहुताशनेन विलयः प्राक्षंचितागामिनाम् ।
ब्रह्मात्मैक्यमवेक्ष्य तन्मायातया ये सर्वदा संस्थिताः तेषां तत्त्रितयं नहि क्वचिदपि ब्रह्मैव ते निर्गुणम् ॥ 453 ॥
उपाधितादात्म्यविहीनकेवल ब्रह्मात्मनैवात्मनि तिष्ठतो मुनेः ।
प्रारब्धसद्भावकथा न युक्ता स्वप्नार्थसंबन्धकथेव जाग्रतः ॥ 454 ॥
गुरु इसी जागृति-स्वप्न की उपमा को रोज़ के अनुभव से जोड़ देते हैं। जागने पर मनुष्य स्वप्न में देखे शरीर और उसकी दुनिया से कोई जुड़ाव नहीं रखता, “वह स्वप्न था, अब हम जागे हैं”, बस इतना भाव रहता है, न उस देह में “मैं”, न उस प्रपंच में “मेरा”। ज्ञानी की स्थिति ऐसी ही है, यह संसार उसके लिए स्वप्न जैसा है, दिखता है, चलता है, पर वह केवल अपनी जागृति में बसा रहता है। और यहाँ गुरु एक तीखी कसौटी रखते हैं, जो स्वप्न में देखे को सत्य मान कर पकड़े रहे, बटोरने में लगा रहे, वह जागा ही नहीं, अभी निद्रा में ही है। इसी तरह जो “ज्ञानी हूँ” कहता है पर संसार-पदार्थों की पकड़ नहीं छोड़ता, उसका ज्ञान अधूरा है।
455 · 456
न हि प्रबुद्धः प्रतिभासदेहे देहोपयोगिन्यपि च प्रपञ्चे ।
करोत्यहन्तां ममतानिदन्तां किन्तु स्वयं तिष्ठति जागरेण ॥ 455 ॥
न तस्य मिथ्यार्थसमर्थनेच्छा न संग्रहस्तज्जगतोऽपि दृष्टः ।
तत्रानुवृत्तिर्यदि चेन्मृषार्थे न निद्रया मुक्त इतीष्यते ध्रुवम् ॥ 456 ॥
वही भाव गुरु ज्ञानी की दिनचर्या तक ले आते हैं। परब्रह्म में रहता हुआ ज्ञानी सद्-आत्मा से ही स्थित रहता है, दूसरा कुछ देखता ही नहीं। जागने के कुछ देर बाद बीते स्वप्न की एक दूर, हल्की स्मृति भर रह जाती है, किसी जुड़ाव से रहित। ज्ञानी के लिए खाना, उठना, बोलना, ग्रहण और त्याग, सब वैसे ही हैं, होते हैं, दिखते हैं, पर उनमें “मैं कर रहा हूँ” का भाव नहीं रहता।
457
तद्वत्परे ब्रह्मणि वर्तमानः सदात्मना तिष्ठति नान्यदीक्षते ।
स्मृतिर्यथा स्वप्नविलोकितार्थे तथा विदः प्राशनमोचनादौ ॥ 457 ॥
यहाँ से गुरु प्रारब्ध की कल्पना को ही जड़ से उठाने लगते हैं, और एक बारीक भेद करते हैं। प्रारब्ध देह का है, आत्मा का नहीं। देह कर्म से बना, इसलिए वह कर्म-फल अर्थात प्रारब्ध से जुड़ा है, पर आत्मा तो अनादि है, कर्म से बनी ही नहीं, फिर उसका प्रारब्ध कैसा। और श्रुति की अमोघ वाणी स्वयं आत्मा को अजन्मा, नित्य, शाश्वत कहती है। जो जन्म ही नहीं लेती, उस आत्म-स्वरूप में स्थित के लिए प्रारब्ध की कल्पना लागू ही कहाँ होती है। यह तर्क बहुत दृढ़ है, और बेबसी की भावना को जड़ से काट देता है।
458 · 459
कर्मणा निर्मितो देहः प्रारब्धं तस्य कल्प्यताम् ।
नानादेरात्मनो युक्तं नैवात्मा कर्मनिर्मितः ॥ 458 ॥
अजो नित्यः शाश्वत इति ब्रूते श्रुतिरमोघवाक् ।
तदात्मना तिष्ठतोऽस्य कुतः प्रारब्धकल्पना ॥ 459 ॥
गुरु अब साधक के सबसे प्रिय बहाने पर हाथ रखते हैं। प्रारब्ध की पूरी बात “मैं देह हूँ” इस भाव पर टिकी है, यह भाव हो तभी प्रारब्ध सिद्ध होता है। पर वह देह-आत्म-भाव हमें इष्ट ही नहीं, इसलिए प्रारब्ध को भी छोड़ देना चाहिए। साधक अकसर कहता है, “मेरा प्रारब्ध ही ऐसा है, क्या करूँ”, गुरु इस बहाने को काट देते हैं। और तर्क को और गहरा करते हुए कहते हैं, शरीर की प्रारब्ध-कल्पना तो स्वयं भ्रम है। चार प्रश्न एक के बाद एक उठते हैं, आरोपित का अपना होना कहाँ, असत्य का जन्म कहाँ, अजात का नाश कहाँ, और असत् का प्रारब्ध कहाँ। यह सीढ़ी शरीर-संबंधी हर धारणा को ढीला कर देती है।
460 · 461
प्रारब्धं सिध्यति तदा यदा देहात्मना स्थितिः ।
देहात्मभावो नैवेष्टः प्रारब्धं त्यज्यतामतः ॥ 460 ॥
शरीरस्यापि प्रारब्धकल्पना भ्रान्तिरेव हि ।
अध्यस्तस्य कुतः सत्त्वमसत्यस्य कुतो जनिः अजातस्य कुतो नाशः प्रारब्धमसतः कुतः ॥ 461 ॥
तब कोई जड़-बुद्धि शंका करता है, यदि ज्ञान से अज्ञान का कार्य मूल सहित मिट गया, तो यह देह फिर रहता क्यों है। गुरु जान-बूझ कर इसे “जड़ों की” शंका कहते हैं, यह असली प्रश्न नहीं, बस तर्क-जड़ता का परिणाम है। इसी का समाधान आगे है। श्रुति “प्रारब्ध” का ज़िक्र इन्हीं शंका करने वालों को संतुष्ट करने के लिए, बाह्य-दृष्टि से करती है, विवेकी को देह आदि की सत्ता समझाने के लिए नहीं। विवेकी के लिए तो श्रुति का असली संदेश यही है कि देह आदि असली नहीं। “प्रारब्ध” उनके लिए है जो अभी देह-तादात्म्य में हैं और पूछते हैं कि ज्ञानी का देह क्यों दिखता है, विवेकी इसे सिद्धांत न माने।
462 · 463
ज्ञानेनाज्ञानकार्यस्य समूलस्य लयो यदि ।
तिष्ठत्ययं कथं देह इति शङ्कावतो जडान् ॥ 462 ॥
समाधातुं बाह्यदृष्ट्या प्रारब्धं वदति श्रुतिः ।
न तु देहादिसत्यत्वबोधनाय विपश्चिताम् ॥ 463 ॥
कर्म-त्रय का सारा हिसाब चुक गया, अब बचता है केवल वह एक सत्य, जिसके लिए यह पूरा ग्रंथ रचा गया। यहाँ से सात-श्लोकी टेक आरंभ होती है, हर श्लोक एक नए वर्णन-गुच्छ के साथ खुलता है और वही एक पंक्ति मंत्र की तरह लौट आती है, “एकमेवाद्वयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन”, यहाँ कोई बहुत्व नहीं, यह कठ और बृहदारण्यक का प्रसिद्ध वचन है। पहले श्लोक में चार मूल लक्षण आते हैं, परिपूर्ण, अनादि-अनंत, अप्रमेय, अविकार। दूसरे में “घन” शब्द तीन बार गूँजता है, सत्-घन, चित्-घन, आनंद-घन, ब्रह्म रिक्त नहीं, वह सत्ता से, चेतना से, आनंद से सघन है, उसमें कोई अंतराल नहीं।
464 · 465
परिपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेयमविक्रियम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 464 ॥
सद्गनं चिद्घनं नित्यमानन्दघनमक्रियम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 465 ॥
तीसरे दोहराव में “सर्वतोमुख” शब्द आता है, ब्रह्म हर दिशा की ओर अभिमुख है, हर ओर उसकी दृष्टि है, और भीतर वह एक ही रस है, बाहर-भीतर का कोई विभाजन नहीं, सर्वत्र वही रस व्याप्त। चौथे में एक और गहरी बात, ब्रह्म न त्यागने योग्य है, न ग्रहण करने योग्य, क्योंकि वह स्वयं आत्मा ही है, अपने ही स्वरूप को कोई कैसे त्यागे या पकड़े, और वह किसी पर आश्रित भी नहीं, स्व-स्थित है। यही उपनिषदों की मूल प्रतिष्ठा है।
466 · 467
प्रत्यगेकरसं पूर्णमनन्तं सर्वतोमुखम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 466 ॥
अहेयमनुपादेयमनादेयमनाश्रयम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 467 ॥
पाँचवें दोहराव में पाँच “निर्” एक के बाद एक आते हैं, निर्गुण, निष्कल, सूक्ष्म, निर्विकल्प, निरंजन, हर “निर्” एक और बाधा हटाता है, और आख़िर में जो बचता है वह बहुत साफ़, बहुत खुला, बहुत मुक्त है। छठवें में गुरु एक ज़रूरी विरोधाभास सामने रख देते हैं, वर्णन-अयोग्य ब्रह्म का वर्णन। उपनिषद् कहते हैं, “जहाँ से वाणी लौट आती है, मन भी जहाँ नहीं पहुँच पाता”, वही भाव यहाँ एक पंक्ति में आ जाता है, इतने वर्णन के बीच यह स्वीकार भी बना रहता है कि वर्णन कभी पूरा हो नहीं सकता।
468 · 469
निर्गुणं निष्कलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं निरञ्जनम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 468 ॥
अनिरूप्य स्वरूपं यन्मनोवाचामगोचरम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 469 ॥
और सातवाँ, आख़िरी दोहराव। यहाँ “स्वतः-सिद्ध” शब्द अद्भुत है, ब्रह्म को प्रमाणित करने के लिए कोई बाहरी प्रमाण नहीं चाहिए, वह स्वयं अपना प्रमाण है। और “अनीदृश”, इसके समान कुछ नहीं, यह हर उपमा से परे है। सत्-समृद्ध, स्वतः-सिद्ध, शुद्ध, बुद्ध, अनुपम। सात दोहरावों के बाद एक स्थिरता रह जाती है, वही एक पंक्ति, जो मन में आकर ठहर जाती है।
470
सत्समृद्धं स्वतःसिद्धं शुद्धं बुद्धमनीदृशम् ।
एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ 470 ॥
पढ़ कर आगे क्या
अगला पन्ना, भाग 16, महान महात्माओं का निरस्त-राग, और गुरु से शिष्य को सीधा आदेश, “मोह मिटा, मुक्त-कृतार्थ-प्रबुद्ध हो।” फिर शिष्य की प्रत्यक्ष अनुभूति से खुलने वाला वचन, “बुद्धि नष्ट, प्रवृत्ति गली, क्या कहूँ, कितना अपार सुख।”
और इस भाग का सार उसी एक पंक्ति में बसा है, श्लोक 464 से 470 तक सात बार लौटती हुई, “एकमेवाद्वयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन।” बाहर बहुत्व दिखता रहे, भीतर यही एक सत्य ठहरा रहे।