विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 11 · अहंकार और प्रमाद · श्लोक 298-328
वासनाएँ कम तो हो गईं, पर एक राक्षस अब भी बचा है, अहंकार, “मैं ही करता हूँ” वाला छोटा “मैं।” गुरु इसे “अपना शत्रु” कह कर सीधी विदाई देते हैं, और एक आख़िरी, सख़्त चेतावनी जोड़ देते हैं, एक पल का प्रमाद भी, और सीढ़ी से गेंद की तरह नीचे।
पहले एक बात
भाग 10 में वासनाओं को पतला किया गया, कुल, गोत्र, शरीर, समाज वाली पहचानें छूटीं। तो अब काम पूरा? गुरु एक झटका देते हैं: नहीं। एक बड़ा शत्रु अब भी खड़ा है, और वह वासनाओं का राजा है: अहंकार।
“मैं ही करता हूँ, मैं ही भोगता हूँ”, यह छोटी सी पकड़ ही पूरे संसार की धुरी है। गुरु इसे “तीन सिर वाला नाग” कहते हैं, सत्व, रजस, तमस इसके तीन सिर, और जो “ब्रह्म-आनंद के ख़ज़ाने” पर लिपटा बैठा है। उसे विवेक की महान तलवार से काटना है।
और अंत में एक तीखी चेतावनी आती है, जिसका हर साधक को सामना करना पड़ता है, “प्रमाद।” बात समझ में आ गई, अहंकार जड़ से कट गया, पर अगर एक पल भी ध्यान चूका, तो वह वापस सिर उठा सकता है। गुरु कहते हैं, सनत्कुमार (ब्रह्मा के पुत्र) ने कहा था, “प्रमाद ही मृत्यु है।” और एक बेहद सटीक तस्वीर देते हैं: सीढ़ी पर खेलती गेंद। बस एक चूक, और नीचे, नीचे।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। तीन हिस्से, अहंकार: शत्रु को पहचानो (298-310), वासना-कर्म का चक्र और जीवन्मुक्ति (311-320), और प्रमाद की चेतावनी (321-328)। असली खंभे: 302 (तीन सिर वाला नाग), 309 (कटा हुआ भी फिर उग आता है), 317 (जीवन्मुक्ति की परिभाषा), 321 (प्रमाद ही मृत्यु), 325 (सीढ़ी पर गेंद)। हर श्लोक पर anchor है।
298 · सब बाधाओं की जड़, अहंकार
सन्त्यन्ये प्रतिबन्धाः पुंसः संसारहेतवो दृष्टाः ।
तेषामेवं मूलं प्रथमविकारो भवत्यहंकारः ॥ 298 ॥
santy anye pratibandhāḥ puṁsaḥ saṁsāra-hetavo dṛṣṭāḥ · teṣām evaṁ mūlaṁ prathama-vikāro bhavaty ahaṅkāraḥ
शब्दार्थ: सन्ति अन्ये प्रतिबन्धाः पुंसः · मनुष्य की और भी बाधाएँ हैं · संसार-हेतवः दृष्टाः · संसार के कारण देखे जाते हैं · तेषाम् एवं मूलं · उन सबकी जड़ · प्रथम-विकारः अहंकारः · पहला विकार, अहंकार।
अर्थ: मनुष्य के लिए और भी बाधाएँ हैं, संसार के कारण के रूप में देखी जाती हैं। उन सबकी जड़ है पहला विकार, अहंकार।
भावार्थ: गुरु एक नया मोड़ शुरू करते हैं। भाग 10 ने वासनाओं की बात की; यह भाग एक और गहरी, और एक “जड़” वाली बाधा की तरफ़ ले जाता है, अहंकार।
एक शब्द ख़ास है, “प्रथम-विकार”, पहला विकार। अद्वैत में जब आत्मा पर पहली परत चढ़ती है, तो वह कौनसी होती है? अहंकार। शरीर, मन, बुद्धि, ये बाद की चीज़ें हैं। सबसे पहली बूँद, जिससे पूरा बादल बनता है, वह है “मैं” का यह छोटा एहसास। और बाक़ी सब बाधाएँ, काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, सब इसी एक जड़ से उगते हैं। तो अगले श्लोक तय करते हैं, असली काम इस एक जगह है।
299 · अहंकार के साथ, मुक्ति की बात ही नहीं
यावत्स्यात्स्वस्य संबन्धोऽहंकारेण दुरात्मना ।
तावन्न लेशमात्रापि मुक्तिवार्ता विलक्षणा ॥ 299 ॥
yāvat syāt svasya saṁbandho’haṅkāreṇa durātmanā · tāvan na leśa-mātrāpi mukti-vārtā vilakṣaṇā
शब्दार्थ: यावत् स्यात् स्वस्य संबन्धः · जब तक अपना संबंध हो · अहंकारेण दुरात्मना · दुरात्मा अहंकार से · तावत् न लेश-मात्र अपि · तब तक रत्ती भर भी · मुक्ति-वार्ता विलक्षणा · अलग, असली मुक्ति की बात नहीं।
अर्थ: जब तक अपना संबंध दुरात्मा अहंकार से बना है, तब तक रत्ती भर भी, सच्ची, असली मुक्ति की बात तक नहीं हो सकती।
भावार्थ: गुरु एक तीखा शब्द इस्तेमाल करते हैं, “दुरात्मा”, बुरी-आत्मा। अहंकार को इस तरह संबोधित करना, यह जान-बूझ कर है।
अहंकार बहुत मासूम लगता है, “मैं”, बस इतना तो हर कोई कहता है। पर गुरु इसकी असली प्रकृति बेनक़ाब करते हैं: यह आख़िर में दुरात्मा है, एक बुरा साथी, जो आपको हर बार धोखा देता है, हर “मैं” के साथ एक नया बंधन बुनता है। और जब तक यह साथ है, तब तक “मुक्ति की बात तक नहीं”, एक तीखी बात। यानी आधी मुक्ति, थोड़ी समझ, अहंकार के साथ, ये सब झूठ हैं। मुक्ति या तो पूरी है, या नहीं।
300 · अहंकार छूटे, पूर्ण चाँद की तरह
अहंकारग्रहान्मुक्तः स्वरूपमुपपद्यते ।
चन्द्रवद्विमलः पूर्णः सदानन्दः स्वयंप्रभः ॥ 300 ॥
ahaṅkāra-grahān muktaḥ svarūpam upapadyate · candravad vimalaḥ pūrṇaḥ sadānandaḥ svayaṁ-prabhaḥ
शब्दार्थ: अहंकार-ग्रहात् मुक्तः · अहंकार की पकड़ से छूटा हुआ · स्वरूपम् उपपद्यते · अपने असली रूप को पा लेता है · चन्द्र-वत् विमलः पूर्णः · चाँद की तरह, निर्मल, पूर्ण · सदानन्दः स्वयं-प्रभः · सदा-आनंद, ख़ुद-प्रकाश।
अर्थ: अहंकार की पकड़ से छूटा हुआ अपने असली रूप को पा लेता है, चाँद की तरह: निर्मल, पूर्ण, सदा-आनंद, ख़ुद-प्रकाश।
भावार्थ: श्लोक 299 ने डर दिखाया; यह श्लोक तुरंत एक सुंदर तस्वीर देता है, पूर्णिमा का चाँद।
अहंकार की पकड़, मानो चाँद के सामने एक काला बादल। बादल हटे, और चाँद वैसा का वैसा, निर्मल, पूर्ण, ख़ुद-प्रकाश। चार शब्दों में पूरी मुक्ति-दशा रख दी: निर्मल (कोई दाग़ नहीं), पूर्ण (कुछ कम नहीं), सदा-आनंद (हमेशा सुख), ख़ुद-प्रकाश (किसी और की रोशनी की ज़रूरत नहीं)। और देखिए कितनी राहत है: आपको “बनना” नहीं है यह, आप पहले से चाँद हैं, बस अहंकार का बादल हटना है।
301 · “इस देह में मैं”, पूरी तरह मिटे
यो वा पुरे सोऽहमिति प्रतीतो बुद्ध्या प्रकॢप्तस्तमसातिमूढया ।
तस्यैव निःशेषतया विनाशे ब्रह्मात्मभावः प्रतिबन्धशून्यः ॥ 301 ॥
yo vā pure so’ham iti pratīto buddhyā prakḷptas tamasāti-mūḍhayā · tasyaiva niḥśeṣatayā vināśe brahmātma-bhāvaḥ pratibandha-śūnyaḥ
शब्दार्थ: यः पुरे “सः अहम्” इति प्रतीतः · जो शरीर रूपी पुर (नगर) में “वह मैं हूँ” अनुभव होता है · बुद्ध्या प्रकॢप्तः तमसा अति-मूढया · तमस से अति-मूढ बुद्धि से गढ़ा हुआ · तस्य एव निःशेषतया विनाशे · उसके पूरी तरह नष्ट होने पर · ब्रह्म-आत्म-भावः प्रतिबन्ध-शून्यः · ब्रह्म-आत्मा-भाव बिना रुकावट के।
अर्थ: शरीर रूपी पुर में जो “वह मैं हूँ” अनुभव होता है, तमस से अति-मूढ बुद्धि से गढ़ा हुआ, उसके पूरी तरह नष्ट होने पर, ब्रह्म-आत्मा का भाव बिना किसी रुकावट के [प्रकट होता है]।
भावार्थ: गुरु एक बारीक शब्द-खेल करते हैं, “पुरे” का मतलब “पुर” (नगर/शरीर) में भी है, और “पहले से” भी। तो दो अर्थ: एक, “इस शरीर में ‘मैं हूँ’ का अनुभव।” दूसरा, “जो पहले से ‘मैं हूँ’ मान कर बैठा है।”
दोनों अर्थ एक ही बात कहते हैं: यह अहंकार बुद्धि की एक “गढ़ी” हुई चीज़ है, और तमस ने उसे ढक रखा है। उसे “पूरी तरह” नष्ट होना है, आधे-अधूरे नहीं। और जैसे ही वह पूरा नष्ट हो, ब्रह्म-भाव “बिना रुकावट” आ जाता है। यानी समस्या ब्रह्म-भाव लाने में नहीं। वह तो वहीं है; रुकावट हटाने में है।
302 · तीन सिर वाला नाग, और विज्ञान की तलवार
ब्रह्मानन्दनिधिर्महाबलवताहंकारघोराहिना संवेष्ट्यात्मनि रक्ष्यते गुणमायाइश्चण्डेस्त्रिभिर्मस्तकैः ।
विज्ञानाख्यमहासिना श्रुतिमता विच्छिद्य शीर्षत्रयं निर्मूल्याहिमिमं निधिं सुखकरं धीरोऽनुभोक्तुं क्षमः ॥ 302 ॥
brahmānanda-nidhir mahā-balavatāhaṅkāra-ghorāhinā saṁveṣṭyātmani rakṣyate guṇa-māyaiś caṇḍais tribhir mastakaiḥ · vijñānākhya-mahā-sinā śruti-matā vicchidya śīrṣa-trayaṁ nirmūlyāhim imaṁ nidhiṁ sukha-karaṁ dhīro’nubhoktuṁ kṣamaḥ
शब्दार्थ: ब्रह्म-आनन्द-निधिः · ब्रह्म-आनंद का ख़ज़ाना · महा-बलवता अहंकार-घोर-अहिना · महाबली, घोर अहंकार-नाग से · संवेष्ट्य आत्मनि रक्ष्यते · आत्मा में लिपट कर रखा है · गुण-मायैः चण्डैः त्रिभिः मस्तकैः · गुण-माया के तीन उग्र सिरों से · विज्ञान-आख्य-महा-असिना · विज्ञान नाम की महान तलवार से · श्रुति-मता · श्रुति-प्रमाणित · विच्छिद्य शीर्ष-त्रयं · तीनों सिर काट कर · निर्मूल्य अहिम् इमं · इस नाग को जड़ से उखाड़ कर · धीरः अनुभोक्तुं क्षमः · धीर इस ख़ज़ाने को भोगने में समर्थ।
अर्थ: ब्रह्म-आनंद का ख़ज़ाना आत्मा में लिपटे, महाबली, घोर अहंकार-नाग से रक्षित है, जिसके तीन उग्र सिर हैं, गुण-माया के। श्रुति-प्रमाणित विज्ञान नाम की महान तलवार से उसके तीनों सिर काट कर, इस नाग को जड़ से उखाड़ कर, धीर इस सुखद ख़ज़ाने को भोगने में समर्थ होता है।
भावार्थ: यह विवेकचूडामणि की सबसे ज़ोरदार तस्वीरों में से है, एक गहरा ख़ज़ाना, और उस पर लिपटा एक तीन-सिर वाला नाग।
ख़ज़ाना आपके भीतर है, “ब्रह्म-आनंद-निधि।” पर उस तक पहुँचने नहीं देता एक रक्षक, अहंकार का घोर नाग। और उसके तीन सिर हैं, सत्व, रजस, तमस, तीनों गुणों के। एक नाग को मारने का तरीक़ा एक है, सिर काटना। पर तीन सिर एक साथ। और गुरु हथियार बताते हैं: “विज्ञान-आख्य-महा-असि”, विज्ञान (आत्म-ज्ञान) नाम की महान तलवार। और सिर्फ़ काटना नहीं। “निर्मूल्य”, जड़ से उखाड़ना (श्लोक 309 बताएगा क्यों)। और जब यह हो जाए, तब “धीर”, जो डगमगाता नहीं। वह ख़ज़ाना भोग सकता है।
303 · ज़हर बचा हो, स्वास्थ्य कहाँ
यावद्वा यत्किंचिद्विषदोषस्फूर्तिरस्ति चेद्देहे ।
कथमारोग्याय भवेत्तद्वदहन्तापि योगिनो मुक्त्यै ॥ 303 ॥
yāvad vā yat kiṁcid viṣa-doṣa-sphūrtir asti ced dehe · katham ārogyāya bhavet tadvad ahantāpi yogino muktyai
शब्दार्थ: यावत् यत् किंचित् विष-दोष-स्फूर्तिः · जब तक रत्ती भर भी ज़हर का असर · अस्ति चेद् देहे · शरीर में हो · कथम् आरोग्याय भवेत् · स्वास्थ्य कैसे होंगे · तद्वत् अहन्ता अपि · वैसे ही अहंता (अहंकार) भी · योगिनः मुक्त्यै · योगी की मुक्ति के लिए।
अर्थ: जब तक शरीर में रत्ती भर भी ज़हर का असर बचा है, स्वास्थ्य कैसे होंगे? वैसे ही, जब तक रत्ती भर भी अहंता (अहंकार) बची है, योगी की मुक्ति कैसे होगी?
भावार्थ: गुरु एक सीधी, अकाट्य उपमा देते हैं, ज़हर। सोचिए, किसी को सर्प-दंश हुआ, और इलाज से 99% ज़हर निकाल लिया गया। बस 1% बचा है। क्या वह “स्वस्थ” है? नहीं। वह 1% धीरे-धीरे फैल कर फिर पूरे शरीर पर क़ब्ज़ा कर लेगा।
ज़हर के साथ कोई समझौता नहीं। या तो पूरा निकले, या कुछ नहीं हुआ। अहंकार भी ऐसा ही है। “थोड़ा-सा” अहंकार मुक्ति के साथ नहीं चल सकता; वह जैसे ही जगह पाता है, फिर फैलता है। यह श्लोक एक ज़रूरी, थोड़ी कठोर सच्चाई है: मुक्ति में आधे-अधूरे की कोई जगह नहीं। पूरी सफ़ाई। और इसीलिए श्लोक 309-310 इतने सावधान करेंगे।
304 · पूरी निवृत्ति, तब “यह मैं हूँ” का तत्व
अहमोऽत्यन्तनिवृत्त्या तत्कृतनानाविकल्पसंहृत्या ।
प्रत्यक्तत्त्वविवेकादिदमहमस्मीति विन्दते तत्त्वम् ॥ 304 ॥
ahamo’tyanta-nivṛttyā tat-kṛta-nānā-vikalpa-saṁhṛtyā · pratyak-tattva-vivekād idam aham asmīti vindate tattvam
शब्दार्थ: अहमः अत्यन्त-निवृत्त्या · अहंकार की पूरी निवृत्ति से · तद्-कृत-नाना-विकल्प-संहृत्या · उसकी बनाई भाँति-भाँति की कल्पनाओं के समेटने से · प्रत्यग्-तत्त्व-विवेकात् · भीतर के तत्व के विवेक से · “इदम् अहम् अस्मि” इति विन्दते तत्त्वम् · “यह मैं हूँ”, तत्व पा लेता है।
अर्थ: अहंकार की पूरी निवृत्ति से, उसकी बनाई भाँति-भाँति की कल्पनाओं के समेटने से, और भीतर के तत्व के विवेक से, “यह मैं हूँ”, तत्व पा लिया जाता है।
भावार्थ: गुरु तीन शर्तें गिनाते हैं, और तीनों एक साथ चाहिए। एक, अहंकार की “अत्यंत” निवृत्ति (पूरी, “रत्ती भर नहीं” वाली, श्लोक 303 की याद)। दो, अहंकार जो भाँति-भाँति की कल्पनाएँ बनाता है (काम, क्रोध, लोभ, चिंता, सपने), उन सबका समेटना। तीन, भीतर के तत्व का विवेक।
और इन तीनों का फल? “इदम् अहम् अस्मि”, “यह मैं हूँ”, सीधा, स्पष्ट, बिना संशय। ध्यान दीजिए शब्द, “इदम्”, “यह।” जैसे आप किसी ठोस चीज़ को छू कर कहें “यह यहाँ है।” आत्म-तत्व इतना सीधा, इतना उपलब्ध हो जाता है, बस अहंकार के बादलों को हटना है।
305 · अहंकार, चेतना का चोर
अहंकारे कर्तर्यहमिति मतिं मुञ्च सहसा विकारात्मन्यात्मप्रतिफलजुषि स्वस्थितिमुषि ।
यदध्यासात्प्राप्ता जनिमृतिजरादुःखबहुला प्रतीचश्चिन्मूर्तेस्तव सुखतनोः संसृतिरियम् ॥ 305 ॥
ahaṅkāre kartary aham iti matiṁ muñca sahasā vikārātmany ātma-pratiphala-juṣi sva-sthiti-muṣi · yad-adhyāsāt prāptā jani-mṛti-jarā-duḥkha-bahulā pratīcaś cin-mūrtes tava sukha-tanoḥ saṁsṛtir iyam
शब्दार्थ: अहंकारे कर्तरि “अहम्” इति मतिं मुञ्च सहसा · कर्ता अहंकार में “मैं” वाली बुद्धि तुरंत छोड़ · विकार-आत्मनि · विकार-स्वरूप · आत्म-प्रतिफल-जुषि · आत्मा का प्रतिबिंब लिए · स्व-स्थिति-मुषि · अपनी स्थिति को चुराने वाले · यद्-अध्यासात् प्राप्ता · जिसके अध्यास से आई · जनि-मृति-जरा-दुःख-बहुला संसृतिः · जन्म-मृत्यु-बुढ़ापे-दुख से भरी संसार-यात्रा · प्रत्यञ्चः चित्-मूर्तेः तव सुख-तनोः · भीतर के, चित्-मूर्ति, सुख-स्वरूप आप को।
अर्थ: कर्ता अहंकार में जो “मैं” वाली बुद्धि है, उसे तुरंत छोड़, वह विकार-स्वरूप है, आत्मा का प्रतिबिंब चुराए हुए, आपकी अपनी स्थिति को चुराने वाला। इसी के अध्यास से आप, भीतर के, चित्-स्वरूप, सुख-स्वरूप, को जन्म-मृत्यु-बुढ़ापे-दुख से भरी यह संसार-यात्रा मिली है।
भावार्थ: गुरु अहंकार को सबसे कठोर शब्दों में कहते हैं, “स्व-स्थिति-मुष्”, अपनी (आपकी असली) स्थिति को चुराने वाला, यानी एक चोर।
अहंकार क्या चुराता है? आपकी असली पहचान। आप सुख-स्वरूप हैं, चित्-मूर्ति। अहंकार आता है, आत्मा का प्रतिबिंब अपने भीतर ले लेता है (उधार की रोशनी), और कहता है “अब मैं ही हूँ।” और आपको मानने लगते हैं कि आप वह छोटा “मैं” हो, सुख-स्वरूप होते हुए दुख ढोने लगते हैं। यह असली डकैती है। और गुरु एक काम का शब्द देते हैं, “सहसा”, तुरंत, बिना देर के। जिस पल पहचान लो, उसी पल छोड़ दो।
306 · अहंकार-अध्यास के बिना, कोई संसार नहीं
सदैकरूपस्य चिदात्मनो विभोर् आनन्दमूर्तेरनवद्यकीर्तेः ।
नैवान्यथा क्वाप्यविकारिणस्ते विनाहमध्यासममुष्य संसृतिः ॥ 306 ॥
sadaika-rūpasya cid-ātmano vibhor ānanda-mūrter anavadya-kīrteḥ · naivānyathā kvāpy avikāriṇas te vināham-adhyāsam amuṣya saṁsṛtiḥ
शब्दार्थ: सदा-एक-रूपस्य चित्-आत्मनः विभोः · सदा एक-रूप, चित्-आत्मा, व्यापक · आनन्द-मूर्तेः अनवद्य-कीर्तेः · आनंद-मूर्ति, निष्पाप कीर्ति वाले · न एव अन्यथा क्वापि अविकारिणः ते · आप अविकारी का कभी कुछ और नहीं · विना अहम्-अध्यासम् अमुष्य संसृतिः · इसके अहंकार-अध्यास के बिना कोई संसार नहीं।
अर्थ: सदा एक-रूप, चित्-आत्मा, व्यापक, आनंद-मूर्ति, निष्पाप कीर्ति वाले, अविकारी, आप का कभी कुछ और नहीं हैं सकता। इस अहंकार-अध्यास के बिना आपका कोई संसार है ही नहीं।
भावार्थ: गुरु एक बेहद उत्साहजनक बात कहते हैं। पूरा संसार-दुख, एक ही चीज़ पर टिका है: अहंकार का अध्यास। उसे हटा दो, और संसार अपने आप नहीं रहेगा।
देखिए आपका असली रूप क्या है, “सदा-एक-रूप” (कभी नहीं बदलने वाला), “विभुः” (सर्वव्यापक), “आनंद-मूर्ति” (आनंद से बना), “अनवद्य-कीर्ति” (निष्पाप कीर्ति वाला), “अविकारी” (कभी विकार नहीं)। यह आप पहले से हैं। फिर संसार क्यों?, एक ही जवाब: अहंकार-अध्यास। तो लड़ाई बहुत साफ़ है, एक दुश्मन, एक हथियार (विवेक), एक मंज़िल। यह सरलता ख़ुद एक राहत है।
307 · गले में काँटा, विज्ञान की तलवार से निकाल
तस्मादहंकारमिमं स्वशत्रुं भोक्तुर्गले कण्टकवत्प्रतीतम् ।
विच्छिद्य विज्ञानमहासिना स्फुटं भुङ्क्ष्वात्मसाम्राज्यसुखं यथेष्टम् ॥ 307 ॥
tasmād ahaṅkāram imaṁ sva-śatruṁ bhoktur gale kaṇṭakavat pratītam · vicchidya vijñāna-mahā-sinā sphuṭaṁ bhuṅkṣvātma-sāmrājya-sukhaṁ yatheṣṭam
शब्दार्थ: अहंकारम् इमं स्व-शत्रुं · इस अहंकार, अपने शत्रु, को · भोक्तुः गले कण्टक-वत् प्रतीतम् · भोजन करने वाले के गले में काँटे की तरह दिखता हुआ · विच्छिद्य विज्ञान-महा-असिना स्फुटम् · विज्ञान की महान तलवार से साफ़ काट कर · भुङ्क्ष्व आत्म-साम्राज्य-सुखं यथेष्टम् · आत्म-साम्राज्य के सुख को इच्छानुसार भोग।
अर्थ: इसलिए, अपने इस शत्रु अहंकार को, जो भोजन करने वाले के गले में काँटे की तरह [चुभता] दिखता है, विज्ञान की महान तलवार से साफ़ काट कर, आत्म-साम्राज्य के सुख को इच्छानुसार भोग।
भावार्थ: एक एकदम ज़मीनी उपमा, गले में अटका काँटा। आप स्वादिष्ट खाना खा रहे हैं, पर गले में एक काँटा अटक गया। अब हर निवाला तकलीफ़ देता है। आप ख़ुश नहीं हैं सकते जब तक काँटा निकले नहीं।
आपका “भोजन” है, “आत्म-साम्राज्य का सुख”, आपके अपने स्वरूप का अनंत आनंद। पर हर बार जब आप उसे “भोगने” जाते हैं, अहंकार का काँटा अटक जाता है, “मैं ही करता हूँ”, “मेरा है यह”, “मुझे मिला”। इस काँटे को निकाले बिना सच्चा सुख नहीं। और हथियार वही, विज्ञान-असि, ज्ञान की तलवार। और गुरु एक प्यारा भरोसा देते हैं, “यथेष्टम्”, इच्छानुसार। काँटा निकले, और फिर भोग जितना चाहो।
308 · चुप हो जा, ब्रह्म में, निर्विकल्प
ततोऽहमादेर्विनिवर्त्य वृत्तिं संत्यक्तरागः परमार्थलाभात् ।
तूष्णीं समास्स्वात्मसुखानुभूत्या पूर्णात्मना ब्रह्मणि निर्विकल्पः ॥ 308 ॥
tato’ham-āder vinivartya vṛttiṁ saṁtyakta-rāgaḥ paramārtha-lābhāt · tūṣṇīṁ samāssvātma-sukhānubhūtyā pūrṇātmanā brahmaṇi nirvikalpaḥ
शब्दार्थ: अहम्-आदेः वृत्तिं विनिवर्त्य · “मैं” आदि की वृत्ति को लौटा कर · संत्यक्त-रागः · राग छोड़ कर · परमार्थ-लाभात् · परम सच की प्राप्ति से · तूष्णीं समास्स्व · चुप बैठ · आत्म-सुख-अनुभूत्या · आत्म-सुख के अनुभव से · पूर्ण-आत्मना ब्रह्मणि निर्विकल्पः · पूर्ण-आत्मा से ब्रह्म में, निर्विकल्प।
अर्थ: इसलिए “मैं” आदि की वृत्ति को लौटा कर, राग छोड़ कर, परम सच की प्राप्ति से, चुप बैठ। आत्म-सुख के अनुभव से, पूर्ण-आत्मा से, ब्रह्म में, निर्विकल्प।
भावार्थ: काँटा निकल गया (श्लोक 307), अब क्या? गुरु एक बेहद कोमल बात कहते हैं, “तूष्णीं समास्स्व”, चुप बैठ।
इस “चुप” को एक नकारात्मक बात मत समझिए, यह एक भरा हुआ, सुंदर मौन है। शब्दों की ज़रूरत ख़त्म, तर्क की ज़रूरत ख़त्म, करने की ज़रूरत ख़त्म। बस “आत्म-सुख-अनुभूति”, अपने सुख का सीधा स्वाद। और “पूर्ण-आत्मना”, पूरे होकर। आप कुछ कम नहीं। कुछ छूटा नहीं। और “निर्विकल्प”, कोई विकल्प नहीं। कोई “यह करूँ या वह” नहीं। यह विवेकचूडामणि की सबसे शांत पंक्तियों में से है, पूरी किताब इसी एक “तूष्णीं समास्स्व” की तरफ़ ले जा रही थी।
309 · जड़ कटी, फिर भी उग आता है
समूलकृत्तोऽपि महानहं पुनः व्युल्लेखितः स्याद्यदि चेतसा क्षणम् ।
संजीव्य विक्षेपशतं करोति नभस्वता प्रावृषि वारिदो यथा ॥ 309 ॥
samūla-kṛtto’pi mahān ahaṁ punaḥ vyullekhitaḥ syād yadi cetasā kṣaṇam · saṁjīvya vikṣepa-śataṁ karoti nabhasvatā prāvṛṣi vārido yathā
शब्दार्थ: समूल-कृत्तः अपि महान् अहं · जड़ समेत कटा हुआ बड़ा “मैं” · पुनः व्युल्लेखितः स्यात् · फिर रेखांकित हो जाए · यदि चेतसा क्षणम् · अगर मन से एक पल को भी · संजीव्य विक्षेप-शतं करोति · पुनः जीवित हो कर सैकड़ों बिखराव करता है · नभस्वता प्रावृषि वारिदः यथा · जैसे बरसात में हवा से बादल।
अर्थ: जड़ समेत कटा हुआ बड़ा “मैं” भी, अगर मन से एक पल को भी रेखांकित हो जाए, तो फिर पुनः जीवित हो कर सैकड़ों बिखराव करता है, जैसे बरसात में हवा से बादल।
भावार्थ: गुरु यहाँ एक बेहद चौंकाने वाली, और बहुत ज़रूरी चेतावनी देते हैं। श्लोक 302 में अहंकार-नाग को “जड़ से उखाड़ने” की बात थी; यह श्लोक कहता है, जड़ से कटा हुआ भी, अगर ध्यान चूका, तो वापस आ सकता है।
यह कैसे? तस्वीर: बरसात के मौसम में आसमान साफ़ है, बादल छँट गए। पर हवा एक झोंका मारती है, और कुछ ही पलों में, बादल फिर इकट्ठा, फिर अँधेरा, फिर बिजली। अहंकार बादल जैसा है, एक बार “जा” कर भी, मन की एक छोटी हवा से, सैकड़ों विक्षेप ले कर वापस आ सकता है। यह बात निराशा की नहीं। सावधानी की है: मुक्ति पा लेना एक काम है, उसमें टिकना दूसरा। अगला श्लोक रास्ता बताएगा।
310 · सूखे नींबू को पानी मत दो
निगृह्य शत्रोरहमोऽवकाशः क्वचिन्न देयो विषयानुचिन्तया ।
स एव संजीवनहेतुरस्य प्रक्षीणजम्बीरतरोरिवाम्बु ॥ 310 ॥
nigṛhya śatror ahamo’vakāśaḥ kvacin na deyo viṣayānucintayā · sa eva saṁjīvana-hetur asya prakṣīṇa-jambīra-taror ivāmbu
शब्दार्थ: निगृह्य शत्रोः अहमः अवकाशः · शत्रु अहंकार को रोक कर, उसे मौक़ा · क्वचित् न देयः · कहीं न दे · विषय-अनुचिन्तया · विषयों के बार-बार सोचने से · सः एव संजीवन-हेतुः अस्य · वही इसको फिर ज़िंदा करने का कारण · प्रक्षीण-जम्बीर-तरोः इव अम्बु · सूखे नींबू के पेड़ के लिए पानी की तरह।
अर्थ: शत्रु अहंकार को रोक कर, उसे, विषयों के बार-बार सोचने से, कहीं मौक़ा न दे। वही [विषय-चिंतन] उसे फिर ज़िंदा करने का कारण है, जैसे सूखे नींबू के पेड़ के लिए पानी।
भावार्थ: एक प्यारी, ज़मीनी उपमा, सूखता हुआ नींबू का पेड़।
एक पेड़ है जो लगभग सूख चुका है। आप सोचते हैं “चलो खाद नहीं। थोड़ा पानी ही दे देता हूँ।” बस, पानी मिलते ही वह फिर हरा होने लगता है, अंकुर फूटते हैं। अहंकार ऐसा ही है। आप कह सकते हैं “मैं तो विषय में लिप्त नहीं हो रहा, बस सोच रहा हूँ।” गुरु कहते हैं, बस वही “सोचना” अहंकार का “पानी” है। थोड़ा-सा विषय-चिंतन, और वह फिर हरा। तो इलाज सीधा है: ऐसा “पानी” मत दो। विषयों के बारे में बार-बार सोचना ही बंद करो। यह कठोर लगता है, पर समझदारी की बात है, सूखते दुश्मन को सींचना मूर्खता है।
311 · “मैं देह हूँ” से ही कामना
देहात्मना संस्थित एव कामी विलक्षणः कामयिता कथं स्यात् ।
अतोऽर्थसन्धानपरत्वमेव भेदप्रसक्त्या भवबन्धहेतुः ॥ 311 ॥
dehātmanā saṁsthita eva kāmī vilakṣaṇaḥ kāmayitā kathaṁ syāt · ato’rtha-sandhāna-paratvam eva bheda-prasaktyā bhava-bandha-hetuḥ
शब्दार्थ: देह-आत्मना संस्थितः एव कामी · “मैं देह हूँ” इस भाव में बैठा ही कामी होता है · विलक्षणः कामयिता कथं स्यात् · (देह से) अलग कैसे कामी होंगे · अर्थ-सन्धान-परत्वम् एव · विषयों के पीछे लगना ही · भेद-प्रसक्त्या · भेद की लिप्तता से · भव-बन्ध-हेतुः · संसार-बंधन का कारण।
अर्थ: “मैं देह हूँ” इस भाव में बैठा हुआ ही “कामी” (कामना करने वाला) होता है, देह से अलग कैसे कोई कामना करेगा? तो विषयों के पीछे लगना ही, भेद की लिप्तता से, संसार-बंधन का कारण है।
भावार्थ: गुरु एक बेहद बारीक, मनोवैज्ञानिक बात कहते हैं, कामना और देह-पहचान, दोनों एक ही जड़ से उगते हैं।
तर्क सीधा है: कौन कामना करता है? वही जो ख़ुद को एक “अलग, सीमित” शरीर मानता है, जिसे कुछ “चाहिए” है (क्योंकि उसे लगता है उसमें कुछ “कम” है)। आत्मा, पूर्ण, असीम, कुछ क्यों चाहेगी? वह तो पहले से सब है। तो जब भी कामना उठती है, उसके पीछे एक छिपी मान्यता है, “मैं कुछ कम हूँ, मुझे कुछ चाहिए।” और वह मान्यता ही “मैं देह हूँ” वाला अहंकार है। काम का असली इलाज तो काम पर हाथ रखना नहीं। उस “मैं देह हूँ” को देख लेना है।
312 · कार्य रोको, बीज रुकेगा
कार्यप्रवर्धनाद्बीजप्रवृद्धिः परिदृश्यते ।
कार्यनाशाद्बीजनाशस्तस्मात्कार्यं निरोधयेत् ॥ 312 ॥
kārya-pravardhanād bīja-pravṛddhiḥ paridṛśyate · kārya-nāśād bīja-nāśas tasmāt kāryaṁ nirodhayet
शब्दार्थ: कार्य-प्रवर्धनात् · कार्य (फल) के बढ़ने से · बीज-प्रवृद्धिः परिदृश्यते · बीज की भी वृद्धि देखी जाती है · कार्य-नाशात् बीज-नाशः · कार्य के नाश से बीज का नाश · तस्मात् कार्यं निरोधयेत् · इसलिए कार्य को रोको।
अर्थ: कार्य (फल) के बढ़ने से बीज की भी वृद्धि देखी जाती है। कार्य के नष्ट होने से बीज का नाश होता है। इसलिए कार्य को रोको।
भावार्थ: गुरु एक प्राकृतिक नियम बताते हैं, और यह बागवानी की भाषा है।
एक पौधा, फल देता है, फल से नए बीज, बीजों से नए पौधे, उनसे फिर फल। यह एक चक्र है। चक्र तोड़ने का सबसे आसान बिंदु, फल काट दो। फल नहीं तो बीज नहीं। बीज नहीं तो नया पौधा नहीं। अहंकार और कर्म का चक्र भी ऐसा है। अहंकार से कर्म, कर्म से नई वासनाएँ, वासनाओं से नया अहंकार। तोड़ने का बिंदु, कर्म रोको। यह “कर्म” शारीरिक काम नहीं। विषयों के पीछे की अंधी दौड़। उसे रोकोगे, तो वासना-बीज पनपेंगे नहीं।
313 · वासना और कर्म, दोनों एक-दूसरे को बढ़ाते
वासनावृद्धितः कार्यं कार्यवृद्ध्या च वासना ।
वर्धते सर्वथा पुंसः संसारो न निवर्तते ॥ 313 ॥
vāsanā-vṛddhitaḥ kāryaṁ kārya-vṛddhyā ca vāsanā · vardhate sarvathā puṁsaḥ saṁsāro na nivartate
शब्दार्थ: वासना-वृद्धितः कार्यं · वासना की वृद्धि से कर्म · कार्य-वृद्ध्या वासना · कर्म की वृद्धि से वासना · वर्धते सर्वथा · हर तरह से बढ़ती है · पुंसः संसारः न निवर्तते · मनुष्य का संसार लौटता-मिटता नहीं।
अर्थ: वासना की वृद्धि से कर्म, और कर्म की वृद्धि से वासना, दोनों हर तरह से बढ़ती चलती हैं, और मनुष्य का संसार लौटता-मिटता नहीं।
भावार्थ: गुरु एक दुष्ट चक्र (vicious cycle) का बेहद साफ़ नक्शा देते हैं।
एक बार सोचिए, सिगरेट पीने की वासना है (वासना)। तो सिगरेट पी जाती है (कर्म)। और जब पी जाती है, वासना मिटती नहीं। और गहरी होती है, अगली बार और मज़बूत आती है। फिर और सिगरेट, फिर और गहरी वासना। यह चक्र हर आदत के साथ चलता है, और गुरु कहते हैं, संसार पूरा ही इस चक्र पर टिका है। हर अनुभव अगली चाह की धरती तैयार करता है। तो “बस एक बार” वाला तर्क धोखा है, हर “एक बार” वासना को मज़बूत करता है। और जब तक यह चक्र चलता है, “संसार लौटता-मिटता नहीं।”
314 · दोनों को जला दो
संसारबन्धविच्छित्त्यै तद्द्वयं प्रदहेद्यतिः ।
वासनावृद्धिरेताभ्यां चिन्तया क्रियया बहिः ॥ 314 ॥
saṁsāra-bandha-vicchittyai tad-dvayaṁ pradahed yatiḥ · vāsanā-vṛddhir etābhyāṁ cintayā kriyayā bahiḥ
शब्दार्थ: संसार-बन्ध-विच्छित्त्यै · संसार-बंधन काटने के लिए · तत् द्वयं प्रदहेद् यतिः · यति इन दोनों को जला दे · वासना-वृद्धिः एताभ्यां · वासना की वृद्धि इन दोनों से · चिन्तया क्रियया बहिः · बाहर के विषय-चिंतन और क्रिया से।
अर्थ: संसार-बंधन काटने के लिए, यति इन दोनों (वासना और कर्म) को जला दे। वासना की वृद्धि इन्हीं दो से होती है, बाहरी विषयों के चिंतन और क्रिया से।
भावार्थ: गुरु इलाज देते हैं, और एक शब्द, “प्रदहेत्”, जला दे। यह नर्म नहीं है; आग की कठोरता वाला शब्द है, क्योंकि वासनाओं को बस “हटाना” काफ़ी नहीं। उन्हें जड़ से जलाना है।
और गुरु दो असली कारण नाम देते हैं, “चिन्ता” (विषयों के बारे में सोचना) और “क्रिया” (उन पर कर्म करना)। दोनों जुड़े हैं: चिन्ता क्रिया को जन्म देती है, क्रिया चिन्ता को मज़बूत करती है। इसलिए दोनों ओर से काम, बाहरी क्रिया कम करो, और भीतर का चिन्ता-प्रवाह भी रोको।
315 · और तीनों को मिटाने का उपाय
ताभ्यां प्रवर्धमाना सा सूते संसृतिमात्मनः ।
त्रयाणां च क्षयोपायः सर्वावस्थासु सर्वदा ॥ 315 ॥
tābhyāṁ pravardhamānā sā sūte saṁsṛtim ātmanaḥ · trayāṇāṁ ca kṣayopāyaḥ sarvāvasthāsu sarvadā
शब्दार्थ: ताभ्यां प्रवर्धमाना सा · इन दोनों से बढ़ती हुई वह (वासना) · सूते संसृतिम् आत्मनः · ख़ुद का संसार पैदा करती है · त्रयाणां च क्षय-उपायः · और तीनों के क्षय का उपाय · सर्व-अवस्थासु सर्वदा · सब अवस्थाओं में, सदा।
अर्थ: इन दोनों से बढ़ती हुई वह (वासना) ख़ुद का संसार पैदा करती है। और तीनों (वासना, कर्म, संसार) के क्षय का उपाय, सब अवस्थाओं में, सदा (यह है),
भावार्थ: गुरु पूरी समस्या को एक त्रिकोण में रखते हैं, वासना, कर्म, संसार। तीनों एक-दूसरे को पकाते रहते हैं। और श्लोक एक टीज़र पर ख़त्म होता है, “तीनों के क्षय का उपाय (यह है)”, यह वाक्य अधूरा है, अगले श्लोक में पूरा होंगे।
यह जान-बूझ कर है। गुरु शिष्य को इंतज़ार करवाते हैं, समस्या साफ़ रख दी, अब इलाज सुनो। और देखिए, इलाज सिर्फ़ “कुछ अवसरों” का नहीं; गुरु कहते हैं “सब अवस्थाओं में, सदा”, यानी हर पल, हर जगह काम आने वाला। ऐसा क्या होंगे? अगला श्लोक खोलेगा।
316 · हर जगह, हर ओर, सिर्फ़ ब्रह्म देखना
सर्वत्र सर्वतः सर्वब्रह्ममात्रावलोकनैः ।
सद्भाववासनादार्ढ्यात्तत्त्रयं लयमश्नुते ॥ 316 ॥
sarvatra sarvataḥ sarva-brahma-mātrāvalokanaiḥ · sad-bhāva-vāsanā-dārḍhyāt tat-trayaṁ layam aśnute
शब्दार्थ: सर्वत्र सर्वतः · हर जगह, हर ओर · सर्व-ब्रह्म-मात्र-अवलोकनैः · सब कुछ बस ब्रह्म देखने से · सद्-भाव-वासना-दार्ढ्यात् · सत्-भाव वाली वासना के पक्केपन से · तत्-त्रयं लयम् अश्नुते · वह तीनों (वासना, कर्म, संसार) लय को पाते हैं।
अर्थ: हर जगह, हर ओर सब कुछ बस ब्रह्म देखने से, सत्-भाव वाली वासना के पक्केपन से, वह तीनों (वासना, कर्म, संसार) लय को पाते हैं।
भावार्थ: अब इलाज खुलता है, और यह सुंदर है। उपाय एक “कुछ करना” नहीं। एक “देखना” है, पर एक बहुत ख़ास तरह का देखना।
“हर जगह, हर ओर”, कुछ भी छूटे न। “सब कुछ बस ब्रह्म”, हर चीज़ को ब्रह्म के रूप में देखो। यह कोई दर्शन नहीं। एक अभ्यास है। चाय पीते हुए, यह चाय भी ब्रह्म है। दोस्त से मिलते हुए, यह दोस्त भी ब्रह्म है। एक मुश्किल काम करते हुए, यह काम भी ब्रह्म ही है। और इस “सद्-भाव”, सच का भाव, को इतना पक्का कर दो कि वह आपकी एक नई “वासना” बन जाए, जो पुरानी सारी वासनाओं की जगह ले ले। एक वासना से दूसरी वासना को मिटाओ। और जब यह नई वासना पक्की हो जाए, तो पुरानी तीनों, वासना, कर्म, संसार, अपने आप घुलने लगती हैं।
317 · जीवन्मुक्ति की परिभाषा
क्रियानाशे भवेच्चिन्तानाशोऽस्माद्वासनाक्षयः ।
वासनाप्रक्षयो मोक्षः सा जीवन्मुक्तिरिष्यते ॥ 317 ॥
kriyā-nāśe bhavec cintā-nāśo’smād vāsanā-kṣayaḥ · vāsanā-prakṣayo mokṣaḥ sā jīvan-muktir iṣyate
शब्दार्थ: क्रिया-नाशे चिन्ता-नाशः · क्रिया के नाश से चिंता का नाश · अस्मात् वासना-क्षयः · इससे वासना का क्षय · वासना-प्रक्षयः मोक्षः · वासना का पूरा क्षय ही मोक्ष · सा जीवन्-मुक्तिः इष्यते · वही जीवन्मुक्ति मानी जाती है।
अर्थ: क्रिया के नाश से चिंता का नाश; इससे वासना का क्षय; और वासना का पूरा क्षय ही मोक्ष है। वही जीवन्मुक्ति मानी जाती है।
भावार्थ: गुरु पूरी विधि को एक सीधी सीढ़ी में रख देते हैं, और सबसे ज़रूरी बात कहते हैं: मोक्ष यानी “वासना का पूरा क्षय।”
क्रम सुंदर है: क्रिया कम → चिंता कम → वासना मिटी → मोक्ष। और यह “मोक्ष” कहाँ है? मरने के बाद नहीं। “जीवन्मुक्ति।” यानी इसी देह में, इसी जीवन में, अभी। यह विवेकचूडामणि का एक उदार वादा है: मुक्ति किसी अगले लोक की चीज़ नहीं। जिस पल वासनाएँ पूरी तरह मिट जाएँ, उसी पल, यहीं, आप मुक्त हैं। अगला भाग इस “जीवन्मुक्त” का पूरा चित्र देगा।
318 · रात का अँधेरा, सुबह की लाली में घुल जाता है
सद्वासनास्फूर्तिविजृम्भणे सति ह्यसौ विलीनाप्यहमादिवासना ।
अतिप्रकृष्टाप्यरुणप्रभायां विलीयते साधु यथा तमिस्रा ॥ 318 ॥
sad-vāsanā-sphūrti-vijṛmbhaṇe sati hy asau vilīnāpy aham-ādi-vāsanā · ati-prakṛṣṭāpy aruṇa-prabhāyāṁ vilīyate sādhu yathā tamisrā
शब्दार्थ: सद्-वासना-स्फूर्ति-विजृम्भणे सति · सत्-वासना का स्फूर्ति-स्फोट होने पर · असौ विलीना अहम्-आदि-वासना · वह “मैं” आदि वाली वासना घुल जाती है · अति-प्रकृष्टा अपि अरुण-प्रभायां · चाहे बहुत गहरी भी, अरुण (सुबह की) लाली में · विलीयते साधु यथा तमिस्रा · ठीक से घुल जाती है, जैसे रात का अँधेरा।
अर्थ: सत्-वासना (ब्रह्म-भावना) के पूरी तरह उठने पर, वह “मैं” आदि वाली वासना घुल जाती है, चाहे वह बहुत गहरी क्यों न हो, जैसे रात का गहरा अँधेरा भी सुबह की अरुण लाली में ठीक से घुल जाता है।
भावार्थ: एक सुंदर, उम्मीद भरी तस्वीर, सुबह की पहली लाली।
रात कितनी भी गहरी हो, कितने भी घंटे लंबी, सुबह के पहले रंग के साथ ही वह घुलने लगती है। उसे “मिटाना” नहीं पड़ता; वह बस लाली के सामने टिक नहीं पाती। गुरु कहते हैं, आपकी अहं-वासना भी, चाहे जन्म-जन्म पुरानी हो, “सत्-वासना” (ब्रह्म-भावना) की एक सच्ची स्फूर्ति के सामने टिक नहीं पाएगी। पुरानी वासना से लड़ना नहीं। एक नई, सच्ची वासना उठानी है। बादलों से हाथापाई मत करो; एक नया सूरज ले आएँ।
319 · सूरज उगा, अँधेरा गया, कोई बंधन नहीं
तमस्तमःकार्यमनर्थजालं न दृश्यते सत्युदिते दिनेशे ।
तथाद्वयानन्दरसानुभूतौ न वास्ति बन्धो न च दुःखगन्धः ॥ 319 ॥
tamas tamaḥ-kāryam anartha-jālaṁ na dṛśyate saty udite dineśe · tathādvayānanda-rasānubhūtau na vāsti bandho na ca duḥkha-gandhaḥ
शब्दार्थ: तमः तमः-कार्यम् अनर्थ-जालं · तमस और तमस के काम, मुसीबतों का जाल · न दृश्यते सति उदिते दिनेशे · दिनेश (सूरज) के उगने पर नहीं दिखता · तथा अद्वय-आनन्द-रस-अनुभूतौ · वैसे ही अद्वय-आनंद-रस के अनुभव में · न बन्धः न दुःख-गन्धः · न बंधन, न दुख की गंध।
अर्थ: तमस और तमस के काम, मुसीबतों का जाल, सूरज के उगने पर नहीं दिखते। वैसे ही अद्वय-आनंद-रस के अनुभव में, न बंधन रहता है, न दुख की गंध तक।
भावार्थ: गुरु उपमा को पूरा करते हैं। श्लोक 318 ने सुबह की पहली लाली दी; यह पूर्ण सूर्योदय देता है।
एक अद्भुत पंक्ति यहाँ है, “दुःख-गन्धः”, दुख की “गंध” तक नहीं। यानी सिर्फ़ बड़े दुख नहीं। दुख की हल्की-सी छाया, गंध, याद भी नहीं। यह पूरी मुक्ति है। और कैसे? “अद्वय-आनंद-रस के अनुभव में।” यहाँ रस तीन शब्दों में बंध गया: अद्वय (दो नहीं। एकत्व), आनंद (सुख), रस (स्वाद)। यह एक अनुभव है, सिर्फ़ जानकारी नहीं। एक स्वाद। और एक बार यह स्वाद आ जाए, तो दुख खड़ा नहीं रह पाता, सूरज के सामने अँधेरे की तरह।
320 · समाहित हो कर, समय बिता दो
दृश्यं प्रतीतं प्रविलापयन्सन् सन्मात्रमानन्दघनं विभावयन् ।
समाहितः सन्बहिरन्तरं वा कालं नयेथाः सति कर्मबन्धे ॥ 320 ॥
dṛśyaṁ pratītaṁ pravilāpayan san san-mātram ānanda-ghanaṁ vibhāvayan · samāhitaḥ san bahir antaraṁ vā kālaṁ nayethāḥ sati karma-bandhe
शब्दार्थ: दृश्यं प्रतीतं प्रविलापयन् सन् · दिखते-अनुभव होते को घोलते हुए · सत्-मात्रम् आनन्द-घनं विभावयन् · सिर्फ़ सत्, आनंद-ठोस को विचार-अनुभव करते हुए · समाहितः सन् · समाहित हो कर · बहिः अन्तरं वा कालं नयेथाः · बाहर या भीतर, समय बिता दे · सति कर्म-बन्धे · अगर कर्म-बंधन है तो।
अर्थ: दिखते-अनुभव होते (संसार) को घोलते हुए, सिर्फ़ सत्, आनंद से ठोस भरे, को अनुभव करते हुए, समाहित हो कर, बाहर हो या भीतर, समय बिता दे, अगर अभी कर्म-बंधन (प्रारब्ध) बचा है तो।
भावार्थ: गुरु एक बेहद व्यावहारिक सलाह देते हैं। एक स्वाभाविक सवाल था: अगर मुक्त हो गए, तो बाक़ी जीवन का क्या? गुरु जवाब देते हैं, “समय बिता दो।”
यह उदास “टाइम-पास” नहीं। यह एक भरा हुआ, ध्यान-भरा बीतना है। बाहर रहो या भीतर, करो या न करो, फ़र्क नहीं पड़ता। बस दो काम जारी रहें: (1) जो भी दिखे, उसे ब्रह्म में घोलते रहो (श्लोक 316 की तरह); (2) सत् और आनंद का स्वाद बना रहे। प्रारब्ध (पुराने कर्म) का शरीर अपना सफ़र पूरा करेगा; आप बस “समाहित”, मन की एकाग्रता, बनाए रखो। यह जीवन्मुक्त की रोज़ की रफ़्तार है।
321 · प्रमाद ही मृत्यु, सनत्कुमार ने कहा
प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः कदाचन ।
प्रमादो मृत्युरित्याह भगवान्ब्रह्मणः सुतः ॥ 321 ॥
pramādo brahma-niṣṭhāyāṁ na kartavyaḥ kadācana · pramādo mṛtyur ity āha bhagavān brahmaṇaḥ sutaḥ
शब्दार्थ: प्रमादः ब्रह्म-निष्ठायां · ब्रह्म-निष्ठा में प्रमाद · न कर्तव्यः कदाचन · कभी न करना चाहिए · “प्रमादः मृत्युः” इति · “प्रमाद ही मृत्यु है”, यह · आह भगवान् ब्रह्मणः सुतः · ब्रह्मा के पुत्र (सनत्कुमार) भगवान ने कहा।
अर्थ: ब्रह्म-निष्ठा में प्रमाद कभी नहीं करना चाहिए। “प्रमाद ही मृत्यु है”, ऐसा ब्रह्मा के पुत्र (सनत्कुमार) भगवान ने कहा।
भावार्थ: गुरु अब एक आख़िरी, बेहद ज़रूरी चेतावनी देते हैं, और इसकी ताक़त के लिए वे सबसे ऊँचा प्रमाण लाते हैं, सनत्कुमार (ब्रह्मा के पुत्र, छान्दोग्य उपनिषद् में नारद के गुरु)। उनकी एक प्रसिद्ध बात: “प्रमादो मृत्युः।”
“प्रमाद” क्या है? सिर्फ़ आलस नहीं। यह सजगता की एक चूक है, ध्यान का छूट जाना, “बात भूल जाना।” और गुरु इसे “मृत्यु” क्यों कहते हैं? क्योंकि शारीरिक मौत तो सबकी होती है, पर असली, आध्यात्मिक “मृत्यु” यह है कि जो जान लिया, उसे जीना बंद कर दो। बस एक पल का ध्यान चूका, और सारी कमाई बिखर सकती है (श्लोक 309 की याद)। अगले श्लोक प्रमाद की पूरी श्रृंखला खोलेंगे।
322 · प्रमाद → मोह → अहंकार → बंधन → दुख
न प्रमादादनर्थोऽन्यो ज्ञानिनः स्वस्वरूपतः ।
ततो मोहस्ततोऽहंधीस्ततो बन्धस्ततो व्यथा ॥ 322 ॥
na pramādād anartho’nyo jñāninaḥ sva-svarūpataḥ · tato mohas tato’haṁ-dhīs tato bandhas tato vyathā
शब्दार्थ: न प्रमादात् अनर्थः अन्यः · प्रमाद से बढ़ कर कोई और मुसीबत नहीं · ज्ञानिनः स्व-स्वरूपतः · ज्ञानी को, अपने स्वरूप से (दूर होने में) · ततः मोहः · उससे मोह · ततः अहं-धीः · उससे “मैं” वाली बुद्धि · ततः बन्धः · उससे बंधन · ततः व्यथा · उससे दुख।
अर्थ: ज्ञानी के लिए, अपने स्वरूप से [चूकने में], प्रमाद से बढ़ कर कोई और मुसीबत नहीं। उससे मोह, उससे “मैं” वाली बुद्धि, उससे बंधन, उससे दुख।
भावार्थ: गुरु प्रमाद की पूरी पतन-श्रृंखला एक श्लोक में दिखा देते हैं, और हर कड़ी छोटी, लगभग अनिवार्य।
पहली कड़ी, “प्रमाद” (एक पल की चूक)। दूसरी, “मोह” (पुराना भ्रम वापस)। तीसरी, “अहं-धी” (फिर “मैं” वाली बुद्धि)। चौथी, “बंधन” (फिर पुरानी पकड़)। पाँचवीं, “दुख” (और फिर पुरानी पीड़ा)। पाँच कदम, और आप वापस वहीं, जहाँ से शुरू हुए थे। और सब एक छोटे से प्रमाद से। यह बात डराने को नहीं। सावधान करने को है। मुक्ति “हासिल करना” नहीं। “बनाए रखना” है, हर पल, सहज रूप से।
323 · विषयों की ओर मुड़ा ज्ञानी, विस्मृति का शिकार
विषयाभिमुखं दृष्ट्वा विद्वांसमपि विस्मृतिः ।
विक्षेपयति धीदोषैर्योषा जारमिव प्रियम् ॥ 323 ॥
viṣayābhimukhaṁ dṛṣṭvā vidvāṁsam api vismṛtiḥ · vikṣepayati dhī-doṣair yoṣā jāram iva priyam
शब्दार्थ: विषय-अभिमुखं विद्वांसम् अपि दृष्ट्वा · विद्वान को भी विषयों की ओर मुड़ा देख कर · विस्मृतिः · विस्मृति (भूलना) · विक्षेपयति धी-दोषैः · बुद्धि के दोषों से विचलित कर देती है · योषा जारम् इव प्रियम् · जैसे एक स्त्री अपने प्रिय (जार) को।
अर्थ: विद्वान को भी विषयों की ओर मुड़ा देख कर, विस्मृति बुद्धि के दोषों से उसे विचलित कर देती है, जैसे एक चंचल स्त्री अपने प्रिय (जार/प्रेमी) को।
भावार्थ: गुरु एक तीखी, बहुत मानवीय उपमा देते हैं। एक स्त्री अपने जार-प्रेमी को कैसे फँसाती है, एक नज़र, एक मुस्कान, एक छेड़छाड़, और वह पीछे-पीछे चलने लगता है। “विस्मृति” वैसी ही है।
एक ज्ञानी विषयों की तरफ़ बस “मुड़” देखता है, सिर्फ़ नज़र उठाता है। और तुरंत विस्मृति आ कर उसे लुभा लेती है, पुरानी पहचान भुला कर। दो शब्द ख़ास हैं: “विद्वांसम् अपि”, विद्वान को भी, यानी इस से कोई बचा नहीं; पुरानी कमाई किसी का कवच नहीं। और “धी-दोषैः”, बुद्धि के दोषों से। यानी हमला सीधा नहीं। पहले बुद्धि में दोष पैदा होते हैं (तर्क “हाँ, यह ठीक है” कहने लगता है), और फिर पतन। यह बहुत बारीक चेतावनी है।
324 · हटी काई, एक पल में फिर
यथापकृष्टं शैवालं क्षणमात्रं न तिष्ठति ।
आवृणोति तथा माया प्राज्ञं वापि पराङ्मुखम् ॥ 324 ॥
yathāpakṛṣṭaṁ śaivālaṁ kṣaṇa-mātraṁ na tiṣṭhati · āvṛṇoti tathā māyā prājñaṁ vāpi parāṅmukham
शब्दार्थ: यथा अपकृष्टं शैवालं · जैसे हटाई गई काई · क्षण-मात्रं न तिष्ठति · पल भर भी (हटी) नहीं रहती · आवृणोति तथा माया · वैसे ही माया ढक देती है · प्राज्ञं वापि पराङ्मुखम् · ज्ञानी को भी, अगर वह विमुख हो जाए।
अर्थ: जैसे (तालाब से) हटाई गई काई पल भर भी हटी नहीं रहती, वैसे ही माया, ज्ञानी को भी, अगर वह विमुख हो जाए, ढक देती है।
भावार्थ: गुरु एक एकदम ज़मीनी, अनुभव की उपमा देते हैं। एक तालाब पर हरी काई जमी है। आप उसे हाथ से हटाते हैं, पानी साफ़ दिखता है। पर कुछ ही पलों में? वही काई वापस तैरने लगती है, फिर ढक देती है।
माया भी वैसी ही है। एक बार समझ कर, ध्यान कर के, माया हट जाती है, आत्मा का साफ़ पानी दिखता है। पर जिस पल आप ध्यान चूकते हैं, “पराङ्मुख”, मुड़ जाते हैं, माया वापस आ कर पल भर में ढक देती है। यह बेहद ईमानदार और थोड़ी डराने वाली बात है। पर यह निराशा की नहीं। धीरज की बात है: आत्म-निष्ठा एक “एक-बार-कर-लो” काम नहीं; यह एक रोज़ का, बार-बार का अभ्यास है। आँख खुली रखो, माया दूर रहती है।
325 · सीढ़ी से गिरती गेंद
लक्ष्यच्युतं चेद्यदि चित्तमीषद् बहिर्मुखं सन्निपतेत्ततस्ततः ।
प्रमादतः प्रच्युतकेलिकन्दुकः सोपानपङ्क्तौ पतितो यथा तथा ॥ 325 ॥
lakṣya-cyutaṁ ced yadi cittam īṣad bahir-mukhaṁ sannipatet tatas tataḥ · pramādataḥ pracyuta-keli-kandukaḥ sopāna-paṅktau patito yathā tathā
शब्दार्थ: लक्ष्य-च्युतं चेत् चित्तं ईषद् · अगर मन लक्ष्य से ज़रा भी हटे · बहिर्मुखं सन्निपतेत् ततः ततः · बाहर की ओर गिरते-गिरते · प्रमादतः प्रच्युत-केलि-कन्दुकः · प्रमाद से छूटी खेल की गेंद · सोपान-पङ्क्तौ पतितः यथा तथा · सीढ़ी पर गिरी हुई की तरह।
अर्थ: अगर मन लक्ष्य से ज़रा भी हटे, बाहर की ओर मुड़ कर गिरता ही जाता है, जैसे प्रमाद से छूटी खेल की गेंद सीढ़ी की कतार पर (एक के बाद एक) गिरती जाती है।
भावार्थ: यह एक अचूक, बेहद यादगार तस्वीर है, सीढ़ी पर गिरती हुई गेंद।
आप ऊँची सीढ़ी पर खड़े हैं कर एक गेंद से खेल रहे हैं। बस एक पल का प्रमाद, गेंद हाथ से छूटी। और अब? वह एक सीढ़ी नहीं गिरती, सीढ़ी पर सीढ़ी, धम-धम-धम, नीचे, नीचे, बहुत नीचे। आप ऊपर खड़े देखते रह जाते हैं। यही प्रमाद का काम है। बस एक पल, मन ज़रा सा “लक्ष्य” (आत्म-निष्ठा) से हटा, और एक पतन की पूरी श्रृंखला शुरू। पतन रुकता नहीं। क्योंकि हर निचली सीढ़ी अगली निचली की ओर ले जाती है। और यह तस्वीर इसलिए ज़ोरदार है क्योंकि यह डर पैदा नहीं करती, यह सावधानी पैदा करती है। गेंद को कस कर पकड़ कर रखो।
326 · विषय → कल्पना → कामना → कर्म
विषयेष्वाविशच्चेतः संकल्पयति तद्गुणान् ।
सम्यक्संकल्पनात्कामः कामात्पुंसः प्रवर्तनम् ॥ 326 ॥
viṣayeṣv āviśac cetaḥ saṁkalpayati tad-guṇān · samyak-saṁkalpanāt kāmaḥ kāmāt puṁsaḥ pravartanam
शब्दार्थ: विषयेषु आविशत् चेतः · विषयों में घुसता हुआ चित्त · संकल्पयति तद्-गुणान् · उनके गुणों की कल्पना करता है · सम्यक्-संकल्पनात् कामः · पूरी कल्पना से कामना · कामात् पुंसः प्रवर्तनम् · कामना से मनुष्य की प्रवृत्ति।
अर्थ: विषयों में घुसता हुआ चित्त उनके गुणों की कल्पना करता है। पूरी कल्पना से कामना (उठती है)। कामना से मनुष्य की प्रवृत्ति।
भावार्थ: गुरु पतन की पूरी रसायन-शास्त्र दिखाते हैं, पल-दर-पल कैसे एक “हानिरहित” शुरुआत एक बंधन बन जाती है।
चार कदम। एक, मन किसी विषय में “घुसता” है (बस उस ओर ध्यान जाता है)। दो, उसके गुणों की कल्पना (वह कितना सुखद होंगे, मज़ेदार होगा)। तीन, कल्पना पूरी हुई, तो “काम”, चाहत। चार, चाहत आई, तो “प्रवर्तनम्”, हाथ-पैर चलने लगे। एक “बस सोच” से एक “करना”, और बंधन। और हर कदम पर रोका जा सकता है, पर पहले कदम पर रोकना सबसे आसान है। बाद में वह गेंद सीढ़ी से नीचे जा चुकी होती है।
327 · सावधान, समाहित बन
अतः प्रमादान्न परोऽस्ति मृत्युः विवेकिनो ब्रह्मविदः समाधौ ।
समाहितः सिद्धिमुपैति सम्यक् समाहितात्मा भव सावधानः ॥ 327 ॥
ataḥ pramādān na paro’sti mṛtyuḥ vivekino brahma-vidaḥ samādhau · samāhitaḥ siddhim upaiti samyak samāhitātmā bhava sāvadhānaḥ
शब्दार्थ: प्रमादात् न परः अस्ति मृत्युः · प्रमाद से बढ़ कर कोई मृत्यु नहीं · विवेकिनः ब्रह्म-विदः समाधौ · विवेकी, ब्रह्म-ज्ञानी की, समाधि में · समाहितः सिद्धिम् उपैति सम्यक् · समाहित (सधा हुआ) ठीक से सिद्धि पा लेता है · समाहित-आत्मा भव सावधानः · समाहित-आत्मा बन, सावधान।
अर्थ: इसलिए, विवेकी, ब्रह्म-ज्ञानी की समाधि में, प्रमाद से बढ़ कर कोई मृत्यु नहीं। जो समाहित है, वह ठीक से सिद्धि पा लेता है। तो समाहित-आत्मा बन, सावधान।
भावार्थ: गुरु पूरी चेतावनी को एक सीधे आदेश पर समेटते हैं। और दो शब्द जोड़ते हैं, जो साथ चलते हैं।
“समाहित”, सधा हुआ, एकाग्र, अपने केंद्र में ठहरा हुआ। और “सावधान”, खुली आँख वाला, जागरूक। यह जोड़ी प्यारी है: समाहित अकेला निष्क्रिय हो सकता है (ध्यान की एक नींद-सी), सावधान अकेला तनाव में बदल सकता है। दोनों साथ, एक टिकी हुई जागरूकता। यही जीवन्मुक्त का असली रंग है। न करना है, न ज़ोर लगाना है, बस इस “समाहित-सावधान” अवस्था को बनाए रखना है।
328 · गिरा, तो बिना नाश के लौटना नहीं
ततः स्वरूपविभ्रंशो विभ्रष्टस्तु पतत्यधः ।
पतितस्य विना नाशं पुनर्नारोह ईक्ष्यते ॥ 328 ॥
tataḥ svarūpa-vibhraṁśo vibhraṣṭas tu pataty adhaḥ · patitasya vinā nāśaṁ punar nāroha īkṣyate
शब्दार्थ: ततः स्वरूप-विभ्रंशः · उससे (प्रमाद से) अपने स्वरूप से गिरना · विभ्रष्टः तु पतति अधः · गिरा हुआ नीचे गिरता है · पतितस्य विना नाशं · गिरे हुए के लिए, बिना नाश के · पुनः न आरोहः ईक्ष्यते · फिर चढ़ाई नहीं देखी जाती।
अर्थ: उससे (प्रमाद से) अपने स्वरूप से गिरना होता है; गिरा हुआ नीचे ही गिरता है। और गिरे हुए के लिए, बिना नाश के, फिर चढ़ाई दिखाई नहीं देती।
भावार्थ: यह भाग 11 का समापन है, और यह एक तीखी, ईमानदार चेतावनी पर बंद होता है।
तीन शब्द ख़ास हैं। “स्वरूप-विभ्रंश”, अपने असली रूप से गिर जाना। यह सबसे बड़ा नुक़सान। “पतत्य अधः”, नीचे ही गिरता है (फिर ऊपर नहीं उठ पाता उसी जन्म में)। और सबसे गहरा, “विना नाशम् पुनः न आरोहः”, बिना (इस शरीर के) नाश के, फिर ऊपर नहीं आता। यानी अगर इस जन्म में प्रमाद से गिरे, तो शायद इस जन्म में फिर वहाँ नहीं पहुँच पाओगे; अगले जन्म तक रुकना पड़ेगा। यह डराने को नहीं। बस यह दिखाने को कि दाँव क्या है। आप बहुत दूर आए हो; अब चूकना मत। और अगला भाग, सावधानी रख कर पहुँचे हुए को क्या मिलता है, वही जीवन्मुक्त का सुंदर चित्र देगा।
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना: भाग 12 · जीवन्मुक्ति, चेतावनी पीछे; अब वह सुंदर चित्र जिसमें पूरी यात्रा फूलती है। वह इंसान कैसा है जो “जीते-जी मुक्त” है? कैसे चलता है, कैसे रहता है, कैसा दिखता है? गुरु इस पर एक पूरा, गहरा अध्याय देते हैं।
और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 325 में “सीढ़ी पर गिरती गेंद”, यह तस्वीर बहुत पुख़्ता है। आज एक छोटा-सा प्रमाद पकड़िए, एक पल जब आपने ध्यान खो दिया और कोई पुरानी आदत वापस आई। बस उसे देख लेना ही गेंद को थोड़ा-सा पकड़ लेना है।