विवेकचूडामणि
भाग 11 · अहंकार और प्रमाद · श्लोक 298-328
वासनाएँ पतली पड़ चुकीं, पर एक शत्रु अब भी शेष है, “मैं ही करता हूँ” वाला वह छोटा “मैं।” गुरु इसे साधक का अपना शत्रु कह कर उसकी विदाई का मार्ग बताते हैं, और साथ ही एक अंतिम चेतावनी रख देते हैं, ब्रह्म-निष्ठा में एक पल का प्रमाद, और सीढ़ी से लुढ़कती गेंद की भाँति नीचे।
पहले एक बात
भाग 10 में वासनाओं को पतला किया गया था, कुल, गोत्र, शरीर और समाज से बँधी पहचानें छूटीं। पर गुरु यहाँ बताते हैं कि कार्य अभी अधूरा है। एक बड़ा शत्रु अब भी खड़ा है, और वही वासनाओं का राजा है, अहंकार।

“मैं ही करता हूँ, मैं ही भोगता हूँ”, यही सूक्ष्म पकड़ समस्त संसार की धुरी है। गुरु इसे तीन सिर वाला घोर नाग कहते हैं, सत्व, रजस और तमस उसके तीन सिर हैं, और वह ब्रह्म-आनंद के निधि पर कुंडली मारे बैठा है। उसे विवेक की महान तलवार से काटना है।
और अंत में एक तीखी चेतावनी आती है, जिसका सामना हर साधक को करना पड़ता है, प्रमाद। बात समझ में आ गई, अहंकार जड़ से कट गया, फिर भी एक पल की असावधानी उसे पुनः सिर उठाने का अवसर दे देती है। गुरु ब्रह्मा के पुत्र सनत्कुमार का वचन उद्धृत करते हैं, “प्रमाद ही मृत्यु है।” और एक सटीक चित्र रखते हैं, सीढ़ी पर खेलती गेंद, जिसके लिए एक चूक नीचे तक ले जाने को पर्याप्त है।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। तीन हिस्से हैं, अहंकार रूपी शत्रु की पहचान (298-310), वासना और कर्म का चक्र तथा जीवन्मुक्ति (311-320), और प्रमाद की चेतावनी (321-328)। मुख्य श्लोक, 302 (तीन सिर वाला नाग), 309 (कटा हुआ भी फिर उग आता है), 317 (जीवन्मुक्ति की परिभाषा), 321 (प्रमाद ही मृत्यु), और 325 (सीढ़ी पर गेंद)। प्रत्येक श्लोक अपने स्थान पर ठहर कर पढ़ा जा सकता है।
गुरु एक नया मोड़ लेते हैं। भाग 10 ने वासनाओं की बात की थी, यह भाग एक और गहरी, मूल बाधा की ओर ले चलता है। वे कहते हैं, मनुष्य की और भी बाधाएँ हैं जो संसार का कारण देखी जाती हैं, पर उन सबकी जड़ एक ही है, सबसे पहला विकार, अहंकार। अद्वैत में आत्मा पर सबसे पहली परत यही चढ़ती है, शरीर, मन, बुद्धि तो बाद की रचनाएँ हैं। काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, सब इसी एक बूँद से उगते हैं। और जब तक यह “मैं” वाला बंधन शेष है, गुरु इसे दुरात्मा कह कर पुकारते हैं, एक बुरा साथी जो हर “मैं” के साथ नया फंदा बुनता है, तब तक रत्ती भर भी सच्ची मुक्ति की बात तक नहीं हो सकती। आधी मुक्ति जैसी कोई वस्तु नहीं होती, मुक्ति या तो पूर्ण है, या है ही नहीं।
298 · 299
सन्त्यन्ये प्रतिबन्धाः पुंसः संसारहेतवो दृष्टाः ।
तेषामेवं मूलं प्रथमविकारो भवत्यहंकारः ॥ 298 ॥
यावत्स्यात्स्वस्य संबन्धोऽहंकारेण दुरात्मना ।
तावन्न लेशमात्रापि मुक्तिवार्ता विलक्षणा ॥ 299 ॥
पर जैसे ही यह पकड़ छूटती है, साधक अपने असली रूप को पा लेता है, चाँद की भाँति निर्मल, पूर्ण, सदा-आनंद और स्वयं-प्रकाश। अहंकार की पकड़ चाँद के सामने तैरते एक काले बादल जैसी है, बादल हटते ही चाँद वैसा का वैसा। शरीर रूपी इस पुर में जो “वह मैं हूँ” का अनुभव बैठा है, और जो तमस से अति-मूढ बुद्धि का गढ़ा हुआ है, उसके पूरी तरह नष्ट होने पर ब्रह्म-आत्मा का भाव बिना किसी रुकावट प्रकट हो जाता है। समस्या ब्रह्म-भाव लाने की है ही नहीं, वह तो वहीं है, समस्या केवल इस रुकावट को हटाने की है।
300 · 301
अहंकारग्रहान्मुक्तः स्वरूपमुपपद्यते ।
चन्द्रवद्विमलः पूर्णः सदानन्दः स्वयंप्रभः ॥ 300 ॥
यो वा पुरे सोऽहमिति प्रतीतो बुद्ध्या प्रकॢप्तस्तमसातिमूढया ।
तस्यैव निःशेषतया विनाशे ब्रह्मात्मभावः प्रतिबन्धशून्यः ॥ 301 ॥
अब गुरु ग्रंथ की सबसे प्रबल कल्पनाओं में से एक रखते हैं। साधक के भीतर एक गहरा ख़ज़ाना है, ब्रह्म-आनंद का निधि। पर उस तक पहुँचने नहीं देता एक महाबली रक्षक, अहंकार का घोर नाग, जो आत्मा में लिपटा बैठा है। उसके तीन उग्र सिर हैं, सत्व, रजस और तमस। एक सिर वाला नाग एक वार से मरता है, पर ये तीन एक साथ हैं। गुरु हथियार भी बताते हैं, विज्ञान अर्थात आत्म-ज्ञान नामक महान तलवार, जो श्रुति से प्रमाणित है। उससे तीनों सिर काट कर, और नाग को जड़ समेत उखाड़ कर, धीर साधक उस सुखद ख़ज़ाने को भोगने में समर्थ हो जाता है।
302
ब्रह्मानन्दनिधिर्महाबलवताहंकारघोराहिना संवेष्ट्यात्मनि रक्ष्यते गुणमायाइश्चण्डेस्त्रिभिर्मस्तकैः ।
विज्ञानाख्यमहासिना श्रुतिमता विच्छिद्य शीर्षत्रयं निर्मूल्याहिमिमं निधिं सुखकरं धीरोऽनुभोक्तुं क्षमः ॥ 302 ॥
क्यों जड़ समेत, क्यों रत्ती भर भी शेष न रहे, इसके लिए गुरु एक अकाट्य उपमा देते हैं। किसी को सर्प-दंश हुआ, और इलाज से निन्यानबे प्रतिशत ज़हर निकल गया, केवल एक प्रतिशत शेष है। क्या वह स्वस्थ है? वही एक प्रतिशत धीरे-धीरे फैल कर पुनः पूरे शरीर पर अधिकार कर लेगा। ज़हर के साथ कोई समझौता नहीं होता। वैसे ही अहंता शेष रहते मुक्ति नहीं। तब पूरा रास्ता क्या है, गुरु तीन शर्तें एक साथ गिनाते हैं, अहंकार की अत्यंत निवृत्ति, उसकी बनाई भाँति-भाँति की कल्पनाओं का समेटना, और भीतर के तत्व का विवेक। इन तीनों का फल है, “इदम् अहम् अस्मि”, “यह मैं हूँ”, सीधा, स्पष्ट, मानो किसी ठोस वस्तु को छू कर कहा जाए।
303 · 304
यावद्वा यत्किंचिद्विषदोषस्फूर्तिरस्ति चेद्देहे ।
कथमारोग्याय भवेत्तद्वदहन्तापि योगिनो मुक्त्यै ॥ 303 ॥
अहमोऽत्यन्तनिवृत्त्या तत्कृतनानाविकल्पसंहृत्या ।
प्रत्यक्तत्त्वविवेकादिदमहमस्मीति विन्दते तत्त्वम् ॥ 304 ॥
गुरु अहंकार को अब सबसे कठोर नाम देते हैं, चोर, साधक की अपनी असली स्थिति को हरने वाला। यह “मैं” वाली बुद्धि विकार-स्वरूप है, आत्मा का प्रतिबिंब चुराए हुए, उधार की रोशनी से कहती है “अब मैं ही हूँ।” इसी अध्यास से साधक, जो स्वयं चित्-मूर्ति और सुख-स्वरूप है, जन्म-मृत्यु-बुढ़ापे-दुख से भरी यह संसार-यात्रा ढोने लगता है। गुरु एक काम का शब्द देते हैं, “सहसा”, तुरंत, बिना देर के, जिस पल पहचान हो उसी पल त्याग। और एक गहरा आश्वासन भी, साधक का असली रूप तो सदा एक-रूप है, व्यापक, आनंद-मूर्ति, निष्पाप कीर्ति वाला, अविकारी, उसका कभी कुछ और हो ही नहीं सकता। इस एक अहंकार-अध्यास के बिना उसका कोई संसार है ही नहीं।
305 · 306
अहंकारे कर्तर्यहमिति मतिं मुञ्च सहसा विकारात्मन्यात्मप्रतिफलजुषि स्वस्थितिमुषि ।
यदध्यासात्प्राप्ता जनिमृतिजरादुःखबहुला प्रतीचश्चिन्मूर्तेस्तव सुखतनोः संसृतिरियम् ॥ 305 ॥
सदैकरूपस्य चिदात्मनो विभोर् आनन्दमूर्तेरनवद्यकीर्तेः ।
नैवान्यथा क्वाप्यविकारिणस्ते विनाहमध्यासममुष्य संसृतिः ॥ 306 ॥
इसलिए, गुरु कहते हैं, इस शत्रु अहंकार को काट डालो। यह भोजन करने वाले के गले में अटके काँटे की भाँति है, हर निवाला तकलीफ़ देता है। साधक का भोजन है आत्म-साम्राज्य का सुख, अपने ही स्वरूप का अनंत आनंद, पर हर बार जब वह उसे भोगने जाता है, “मैं ही करता हूँ”, “मेरा है यह”, का काँटा अटक जाता है। विज्ञान की उसी महान तलवार से इसे साफ़ काट कर, फिर आत्म-साम्राज्य का सुख इच्छानुसार भोग। और काँटा निकलने के बाद क्या, गुरु एक बेहद कोमल बात कहते हैं, “तूष्णीं समास्स्व”, मौन हो बैठ। यह मौन कोई अभाव नहीं, एक भरा हुआ मौन है, जिसमें केवल आत्म-सुख का सीधा स्वाद है, पूरे होकर, ब्रह्म में, निर्विकल्प, जहाँ “यह करूँ या वह” तक नहीं रहता।
307 · 308
तस्मादहंकारमिमं स्वशत्रुं भोक्तुर्गले कण्टकवत्प्रतीतम् ।
विच्छिद्य विज्ञानमहासिना स्फुटं भुङ्क्ष्वात्मसाम्राज्यसुखं यथेष्टम् ॥ 307 ॥
ततोऽहमादेर्विनिवर्त्य वृत्तिं संत्यक्तरागः परमार्थलाभात् ।
तूष्णीं समास्स्वात्मसुखानुभूत्या पूर्णात्मना ब्रह्मणि निर्विकल्पः ॥ 308 ॥
पर यहीं गुरु एक चौंकाने वाली चेतावनी रख देते हैं। जड़ समेत कटा हुआ वह बड़ा “मैं” भी, अगर मन से एक पल को भी फिर रेखांकित हो जाए, तो पुनः जीवित हो कर सैकड़ों बिखराव कर देता है, जैसे बरसात के साफ़ आसमान में हवा का एक झोंका पल भर में बादल फिर जुटा देता है, फिर अँधेरा, फिर बिजली। इसलिए इस शत्रु को रोक कर रखो, उसे विषयों के बार-बार सोचने का अवसर कहीं मत दो। वही विषय-चिंतन उसे फिर जीवित कर देता है, जैसे लगभग सूख चुके नींबू के पेड़ को थोड़ा-सा पानी मिलते ही वह फिर हरा होने लगता है। साधक कह सकता है, “मैं लिप्त तो नहीं हो रहा, केवल सोच रहा हूँ”, पर वही सोचना अहंकार का पानी है। सूखते शत्रु को सींचना ही उसे लौटाना है।
309 · 310
समूलकृत्तोऽपि महानहं पुनः व्युल्लेखितः स्याद्यदि चेतसा क्षणम् ।
संजीव्य विक्षेपशतं करोति नभस्वता प्रावृषि वारिदो यथा ॥ 309 ॥
निगृह्य शत्रोरहमोऽवकाशः क्वचिन्न देयो विषयानुचिन्तया ।
स एव संजीवनहेतुरस्य प्रक्षीणजम्बीरतरोरिवाम्बु ॥ 310 ॥
अब गुरु एक बारीक, मनोवैज्ञानिक बात खोलते हैं। कामना और देह-पहचान, दोनों एक ही जड़ से उगते हैं। “मैं देह हूँ” इस भाव में बैठा हुआ ही कामना करता है, देह से अलग रहने वाला भला क्यों कुछ चाहेगा? आत्मा तो पूर्ण और असीम है, उसमें कुछ कम ही नहीं। तो हर कामना के पीछे एक छिपी मान्यता है, “मैं कुछ कम हूँ, मुझे कुछ चाहिए”, और यही “मैं देह हूँ” वाला भेद ही संसार-बंधन का कारण है। फिर गुरु एक प्राकृतिक नियम, बागवानी की भाषा में रखते हैं, फल बढ़ने से बीज बढ़ता है, फल कटने से बीज मरता है, इसलिए फल को रोको। अहंकार-कर्म का चक्र भी ऐसा ही है, अहंकार से कर्म, कर्म से नई वासनाएँ, वासनाओं से नया अहंकार। तोड़ने का सरल बिंदु, विषयों के पीछे की अंधी दौड़ को रोक देना।
311 · 312
देहात्मना संस्थित एव कामी विलक्षणः कामयिता कथं स्यात् ।
अतोऽर्थसन्धानपरत्वमेव भेदप्रसक्त्या भवबन्धहेतुः ॥ 311 ॥
कार्यप्रवर्धनाद्बीजप्रवृद्धिः परिदृश्यते ।
कार्यनाशाद्बीजनाशस्तस्मात्कार्यं निरोधयेत् ॥ 312 ॥
यह चक्र अपने ही को पोसता रहता है। वासना की वृद्धि से कर्म, और कर्म की वृद्धि से वासना, दोनों हर तरह से बढ़ती चलती हैं, और मनुष्य का संसार लौटता-मिटता नहीं। कोई वासना उठती है तो कर्म होता है, और कर्म होने पर वासना मिटती नहीं, अगली बार और गहरी, और मज़बूत होकर आती है। “बस एक बार” वाला तर्क धोखा है, हर “एक बार” वासना को मज़बूत करता है। इसीलिए गुरु एक कठोर शब्द चुनते हैं, “प्रदहेत्”, जला दे। संसार-बंधन काटने के लिए यति वासना और कर्म दोनों को जला दे, क्योंकि वासना की वृद्धि इन्हीं दो से होती है, बाहरी विषयों के चिंतन और उन पर की गई क्रिया से। दोनों जुड़े हैं, चिन्ता क्रिया को जन्म देती है, क्रिया चिन्ता को पकाती है, इसलिए दोनों ओर से काम चाहिए।
313 · 314
वासनावृद्धितः कार्यं कार्यवृद्ध्या च वासना ।
वर्धते सर्वथा पुंसः संसारो न निवर्तते ॥ 313 ॥
संसारबन्धविच्छित्त्यै तद्द्वयं प्रदहेद्यतिः ।
वासनावृद्धिरेताभ्यां चिन्तया क्रियया बहिः ॥ 314 ॥
गुरु पूरी समस्या को एक त्रिकोण में रख देते हैं, वासना, कर्म और संसार, तीनों एक-दूसरे को पकाते रहते हैं। इन दोनों से बढ़ती हुई वह वासना अपना संसार स्वयं जन्म देती है। और तीनों के क्षय का उपाय, गुरु कहते हैं, “सब अवस्थाओं में, सदा” काम आने वाला, और वे एक अधूरे वाक्य पर ठहर कर शिष्य की प्रतीक्षा बढ़ाते हैं। फिर वह इलाज खुलता है, और यह सुंदर है, कोई “करना” नहीं, एक विशेष “देखना” है। हर जगह, हर ओर सब कुछ केवल ब्रह्म देखना। चाय पीते हुए यह चाय भी ब्रह्म, किसी से मिलते हुए यह व्यक्ति भी ब्रह्म, कठिन काम करते हुए यह काम भी ब्रह्म। इस सत्-भाव को इतना पक्का कर देना कि वह एक नई वासना बन जाए, जो पुरानी सब वासनाओं की जगह ले ले। एक वासना से दूसरी का क्षय, और तब पुरानी तीनों स्वयं घुलने लगती हैं।
315 · 316
ताभ्यां प्रवर्धमाना सा सूते संसृतिमात्मनः ।
त्रयाणां च क्षयोपायः सर्वावस्थासु सर्वदा ॥ 315 ॥
सर्वत्र सर्वतः सर्वब्रह्ममात्रावलोकनैः ।
सद्भाववासनादार्ढ्यात्तत्त्रयं लयमश्नुते ॥ 316 ॥
अब गुरु पूरी विधि को एक सीधी सीढ़ी में रख देते हैं। क्रिया कम होने से चिंता घटती है, चिंता घटने से वासना का क्षय, और वासना का पूरा क्षय ही मोक्ष है, वही जीवन्मुक्ति है। और यह मोक्ष कहाँ है, मरने के बाद नहीं, इसी देह में, इसी जीवन में। जिस पल वासनाएँ पूर्णतः मिट जाती हैं, उसी पल, यहीं, साधक मुक्त है। फिर एक आशा भरी तस्वीर आती है, सुबह की पहली लाली। सत्-वासना अर्थात ब्रह्म-भावना के पूरी तरह उठने पर वह “मैं” आदि वाली वासना घुल जाती है, चाहे वह कितनी भी गहरी, जन्म-जन्म पुरानी क्यों न हो, ठीक जैसे रात का गहरा अँधेरा सुबह की अरुण लाली के सामने टिक नहीं पाता। पुरानी वासना से उलझना नहीं है, एक नया सूरज ले आना है।
317 · 318
क्रियानाशे भवेच्चिन्तानाशोऽस्माद्वासनाक्षयः ।
वासनाप्रक्षयो मोक्षः सा जीवन्मुक्तिरिष्यते ॥ 317 ॥
सद्वासनास्फूर्तिविजृम्भणे सति ह्यसौ विलीनाप्यहमादिवासना ।
अतिप्रकृष्टाप्यरुणप्रभायां विलीयते साधु यथा तमिस्रा ॥ 318 ॥
गुरु उस उपमा को पूर्ण सूर्योदय तक ले जाते हैं। तमस और तमस के काम, मुसीबतों का सारा जाल, सूरज के उगते ही नहीं दिखता। वैसे ही अद्वय-आनंद-रस के अनुभव में न बंधन रहता है, न दुख की गंध तक। यह “दुख की गंध” अद्भुत पंक्ति है, अर्थात बड़े दुख ही नहीं, दुख की हल्की-सी छाया, स्मृति तक नहीं। फिर एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है, मुक्त हो जाने पर शेष जीवन का क्या? गुरु उत्तर देते हैं, समय बिता दे, पर यह निरुद्देश्य बीतना नहीं, एक ध्यान-भरा बीतना है। जो भी दिखे उसे ब्रह्म में घोलता रहे, केवल सत् और आनंद से घन उस तत्व का स्वाद बनाए रखे, समाहित हो कर, बाहर रहे या भीतर, समय बिता दे, यदि प्रारब्ध अर्थात पुराना कर्म अभी शेष हो तो। यही जीवन्मुक्त की दैनिक चाल है।
319 · 320
तमस्तमःकार्यमनर्थजालं न दृश्यते सत्युदिते दिनेशे ।
तथाद्वयानन्दरसानुभूतौ न वास्ति बन्धो न च दुःखगन्धः ॥ 319 ॥
दृश्यं प्रतीतं प्रविलापयन्सन् सन्मात्रमानन्दघनं विभावयन् ।
समाहितः सन्बहिरन्तरं वा कालं नयेथाः सति कर्मबन्धे ॥ 320 ॥
और अब गुरु एक अंतिम, बेहद आवश्यक चेतावनी देते हैं, और उसके बल के लिए सबसे ऊँचा प्रमाण लाते हैं, ब्रह्मा के पुत्र सनत्कुमार का प्रसिद्ध वचन, “प्रमादो मृत्युः”, प्रमाद ही मृत्यु है। ब्रह्म-निष्ठा में प्रमाद कभी नहीं करना चाहिए। प्रमाद केवल आलस नहीं, यह सजगता की एक चूक है, ध्यान का छूट जाना, और गुरु इसे मृत्यु इसलिए कहते हैं कि शारीरिक मृत्यु तो सबकी होती है, पर असली मृत्यु यह है कि जो जान लिया उसे जीना छोड़ देना। ज्ञानी के लिए, अपने स्वरूप से चूकने में, प्रमाद से बढ़ कर कोई अनर्थ नहीं। और गुरु पूरी पतन-श्रृंखला एक ही श्लोक में दिखा देते हैं, प्रमाद से मोह, मोह से “मैं” वाली बुद्धि, उससे बंधन, और उससे दुख। पाँच कदम, और साधक वापस वहीं जहाँ से चला था।
321 · 322
प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः कदाचन ।
प्रमादो मृत्युरित्याह भगवान्ब्रह्मणः सुतः ॥ 321 ॥
न प्रमादादनर्थोऽन्यो ज्ञानिनः स्वस्वरूपतः ।
ततो मोहस्ततोऽहंधीस्ततो बन्धस्ततो व्यथा ॥ 322 ॥
गुरु इसे और तीखी, बहुत मानवीय उपमा से समझाते हैं। विद्वान को भी विषयों की ओर मुड़ा देख कर, विस्मृति उसे बुद्धि के दोषों से विचलित कर देती है, ठीक जैसे एक चंचल स्त्री अपने जार-प्रेमी को एक नज़र और एक मुस्कान से फँसा लेती है। “विद्वान को भी”, अर्थात इससे कोई बचा नहीं, पुरानी कमाई किसी का कवच नहीं। और आक्रमण सीधा नहीं होता, पहले बुद्धि में दोष उपजते हैं, तर्क “हाँ, यह ठीक है” कहने लगता है, फिर पतन। और एक अनुभव की उपमा, तालाब से हाथ से हटाई गई हरी काई पल भर भी हटी नहीं रहती, कुछ ही पलों में वापस तैर आती है, फिर ढक देती है। वैसे ही माया, ज्ञानी को भी, यदि वह विमुख हो जाए तो पल भर में फिर ढक लेती है। आत्म-निष्ठा एक बार कर लेने का काम नहीं, यह दैनिक, बार-बार का अभ्यास है।
323 · 324
विषयाभिमुखं दृष्ट्वा विद्वांसमपि विस्मृतिः ।
विक्षेपयति धीदोषैर्योषा जारमिव प्रियम् ॥ 323 ॥
यथापकृष्टं शैवालं क्षणमात्रं न तिष्ठति ।
आवृणोति तथा माया प्राज्ञं वापि पराङ्मुखम् ॥ 324 ॥
और अब गुरु वह अचूक, यादगार चित्र रखते हैं, सीढ़ी पर लुढ़कती गेंद। कोई ऊँची सीढ़ी पर खड़ा गेंद से खेल रहा है, एक पल का प्रमाद, और गेंद हाथ से छूट जाती है। फिर वह एक सीढ़ी नहीं गिरती, सीढ़ी पर सीढ़ी, नीचे, और नीचे। मन ज़रा-सा लक्ष्य से, अर्थात आत्म-निष्ठा से हटा, और पतन की पूरी श्रृंखला आरंभ, क्योंकि हर निचली सीढ़ी अगली निचली की ओर ले जाती है। यह पतन शुरू कैसे होता है, गुरु चार कदम गिनाते हैं। विषयों में घुसता हुआ चित्त पहले उनके गुणों की कल्पना करता है, वह कितना सुखद होगा, कितना मनभावन। पूरी कल्पना से “काम”, अर्थात चाहत उठती है। और चाहत से “प्रवर्तनम्”, अर्थात हाथ-पैर चलने लगते हैं। एक “बस सोच” से एक “करना” तक, और बंधन। हर कदम पर रुका जा सकता है, पर पहले कदम पर रुकना सबसे सरल है।
325 · 326
लक्ष्यच्युतं चेद्यदि चित्तमीषद् बहिर्मुखं सन्निपतेत्ततस्ततः ।
प्रमादतः प्रच्युतकेलिकन्दुकः सोपानपङ्क्तौ पतितो यथा तथा ॥ 325 ॥
विषयेष्वाविशच्चेतः संकल्पयति तद्गुणान् ।
सम्यक्संकल्पनात्कामः कामात्पुंसः प्रवर्तनम् ॥ 326 ॥
गुरु पूरी चेतावनी को एक सीधे आदेश में समेटते हैं, और दो शब्द साथ-साथ रखते हैं। विवेकी, ब्रह्म-ज्ञानी की समाधि में प्रमाद से बढ़ कर कोई मृत्यु नहीं। जो समाहित है वही ठीक से सिद्धि पाता है, इसलिए समाहित-आत्मा बन, और सावधान। इस जोड़ी में संतुलन है, समाहित अकेला एक निष्क्रिय ध्यान-निद्रा बन सकता है, सावधान अकेला तनाव में, दोनों साथ हों तो एक टिकी हुई जागरूकता बनती है। और भाग का समापन एक तीखी, ईमानदार चेतावनी पर होता है। प्रमाद से अपने स्वरूप से गिरना होता है, और गिरा हुआ नीचे ही गिरता है। गिरे हुए के लिए, इस शरीर के नाश के बिना, फिर ऊपर की चढ़ाई दिखाई नहीं देती। अर्थात इस जन्म में प्रमाद से गिरा, तो संभव है इसी जन्म में फिर उस स्थिति तक न पहुँच पाए। साधक बहुत दूर आ चुका है, और यही वह बिंदु है जहाँ सबसे अधिक सावधानी चाहिए।
327 · 328
अतः प्रमादान्न परोऽस्ति मृत्युः विवेकिनो ब्रह्मविदः समाधौ ।
समाहितः सिद्धिमुपैति सम्यक् समाहितात्मा भव सावधानः ॥ 327 ॥
ततः स्वरूपविभ्रंशो विभ्रष्टस्तु पतत्यधः ।
पतितस्य विना नाशं पुनर्नारोह ईक्ष्यते ॥ 328 ॥
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना, भाग 12 · जीवन्मुक्ति। चेतावनी पीछे रह गई; अब वह सुंदर चित्र आता है जिसमें पूरी यात्रा फूलती है। वह व्यक्ति कैसा होता है जो जीते-जी मुक्त है, कैसे चलता है, कैसे रहता है, कैसा दिखता है। गुरु इस पर एक पूरा, गहरा अध्याय देते हैं।
श्लोक 325 की “सीढ़ी पर लुढ़कती गेंद” वाली छवि इसी भाग की सबसे पुख़्ता छवि है। पूरा भाग एक ही बात के इर्द-गिर्द घूमता है, कि अहंकार के कट जाने के बाद भी, ब्रह्म-निष्ठा में एक पल की चूक वह गेंद हाथ से छुड़ा देती है।