विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 14 · जीवन्मुक्त की पहचान, हृदय में पूर्ण ब्रह्म · श्लोक 408-440
पहले एक तीन-श्लोकी टेक, जो हृदय में पूर्ण ब्रह्म को रखने की एक ही तस्वीर तीन बार सुनाती है। फिर वैराग्य से शांति तक की वह प्रसिद्ध चार-कड़ी सीढ़ी। और अंत में, ज़मीन पर चलता-फिरता एक मुक्त पुरुष भीतर से कैसा होता है, यह सोलह सटीक लक्षणों में।
अब तक की समाधि-विधि और अद्वैत-निर्णय एक ख़ास जगह आ पहुँचते हैं, एक तस्वीर पर। गुरु एक ऐसी पंक्ति उठाते हैं जो तीन बार लौटेगी, “विद्वान पूर्ण ब्रह्म को हृदय में, समाधि में, रखता है।” यहाँ “कलयति”, धारण करता है, करने से अधिक थामने की बात है, मानो हृदय एक पात्र हो और ब्रह्म उसमें सहज भरा रहता हो। पहली बार ब्रह्म का वर्णन ऐसे आता है, सतत-बोध, केवल-आनंद-रूप, अनुपम, सीमा-पार, नित्य-मुक्त, निश्चेष्ट, असीम आकाश-जैसा, निष्कल और निर्विकल्प।

408 · हृदि कलयति विद्वान्, पूर्ण ब्रह्म समाधि में
किमपि सततबोधं केवलानन्दरूपं निरुपममतिवेलं नित्यमुक्तं निरीहम् ।
निरवधिगगनाभं निष्कलं निर्विकल्पं हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ 408 ॥
वही धड़कन दूसरी बार सुनाई देती है, इस बार एक बेहद सुंदर शब्द के साथ, “अस्मत्-प्रसिद्धम्”, हमारे लिए प्रसिद्ध। यानी यह अनजाना नहीं। यह हम सबको पता है, बस उस तरह नहीं जैसे हम चीज़ों को जानते हैं। यह वह जानकारी है जो हमारे होने में बसी है, और वेद-वाणी इसे साफ़ तो करती है, पर नया नहीं बताती, बस याद दिलाती है। फिर तीसरी और आख़िरी बार वही पंक्ति लौटती है, इस बार सबसे प्यारी उपमा के साथ, स्थिर पानी की एक विशाल राशि, जिसमें न लहर है, न तरंग, न हलचल। और “आख्या-विहीनम्”, नाम-रहित, क्योंकि हम जो भी नाम देते हैं वह सब नामों के पार है। यह तीसरा दोहराव “एकम्”, एक, शब्द पर थमता है।
409 · 410
प्रकृतिविकृतिशून्यं भावनातीतभावं समरसमसमानं मानसं बन्धदूरम् ।
निगमवचनसिद्धं नित्यमस्मत्प्रसिद्धं हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ 409 ॥
अजरममरमस्ताभाववस्तुस्वरूपं स्तिमितसलिलराशिप्रख्यमाख्याविहीनम् ।
शमितगुणविकारं शाश्वतं शान्तमेकं हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ 410 ॥
अब गुरु शिष्य की ओर मुड़ कर एक हिम्मत वाली पुकार देते हैं। समाहित अंतःकरण से, अपने स्वरूप में, उस आत्मा को देख लो जिसका वैभव अखंड है। और संसार की गंध से बसे इस बंधन को काट दो, क्योंकि बंधन इत्र की तरह है, हर जगह से उठता हुआ। यहीं वह कड़ी बात आती है, अपनी मनुष्यता को सफल कर लो, क्योंकि यह जन्म तभी सार्थक है जब वह यह एक काम कर ले। फिर वे और गहरे ले जाते हैं, सब उपाधियों से मुक्त, सच्चिदानंद, अद्वय आत्मा को सिर्फ़ सोचो नहीं, उसे महसूस करो, उसमें बस जाओ, क्योंकि एक बार यह भाव पक्का हो जाए, तो जन्म-मरण के रास्ते पर लौटने का कोई कारण ही नहीं बचता।
411 · 412
समाहितान्तःकरणः स्वरूपे विलोकयात्मानमखण्डवैभवम् ।
विच्छिन्द्धि बन्धं भवगन्धगन्धितं यत्नेन पुंस्त्वं सफलीकुरुष्व ॥ 411 ॥
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सच्चिदानन्दमद्वयम् ।
भावयात्मानमात्मस्थं न भूयः कल्पसेऽध्वने ॥ 412 ॥
शरीर का क्या? गुरु एक प्यारी तस्वीर बनाते हैं, परछाई। परछाई पुरुष के साथ-साथ चलती है, फिर भी पुरुष और उसकी परछाई एक नहीं, यह सहज जाना जाता है। महात्मा का शरीर भी ऐसा ही है, साथ चलता, दिखता, पर वह “मैं” नहीं, बस एक आभास, जिसे वह दोबारा अपने में नहीं जोड़ता। फिर एक तीखी, जान-बूझ कर अप्रिय उपमा आती है, “वान्त-वस्तु”, उगली हुई चीज़, जिसे कोई दोबारा याद नहीं करना चाहता; वैसे ही एक बार छोड़े शरीर-भाव को दोबारा याद नहीं करना। और इसे केवल छोड़ना नहीं, “समूलम्”, जड़ सहित जलाना है, क्योंकि अज्ञान की जड़ें सूक्ष्म-शरीर और वासनाओं में बची रह जाएँ तो पौधा फिर उग आता है; निर्विकल्प-समाधि वही आग है जो जड़ तक पहुँचती है, और श्रेष्ठ विद्वान फिर नित्य-विशुद्ध बोध-आनंद-आत्मा में स्थित हो जाता है।
413 · 414 · 415
छायेव पुंसः परिदृश्यमान् माभासरूपेण फलानुभूत्या ।
शरीरमाराच्छववन्निरस्तं पुनर्न संधत्त इदं महात्मा ॥ 413 ॥
सततविमलबोधानन्दरूपं समेत्य त्यज जडमलरूपोपाधिमेतं सुदूरे ।
अथ पुनरपि नैष स्मर्यतां वान्तवस्तु स्मरणविषयभूतं पल्पते कुत्सनाय ॥ 414 ॥
समूलमेतत्परिदाह्य वन्हौ सदात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे ।
ततः स्वयं नित्यविशुद्धबोधानन्दात्मना तिष्ठति विद्वरिष्ठः ॥ 415 ॥
गुरु अब एक गाँव की सीधी उपमा लाते हैं, गाय के गले की माला। कोई गाय के गले में फूल-माला डाल देता है; गाय न जानती है, न परवाह करती है। प्रारब्ध से गूँथा यह शरीर भी ऐसा ही है, चला जाए या रहे, तत्त्व-वेत्ता को कोई फ़र्क नहीं, उसकी वृत्ति तो आनंद-आत्मा-ब्रह्म में लीन है। और एक मीठा सवाल उठता है, जिसे अखंड-आनंद आत्मा का बोध हो चुका, वह किस आस में, किसके लिए शरीर को सजाने-सँवारने दौड़े? देखभाल उन्हीं को सूझती है जिन्हें शरीर “मेरा” लगता है। फिर गुरु जीवन्मुक्ति का असली फल बताते हैं, कोई चमत्कार नहीं, कोई स्वर्ग-वास नहीं, बस “बहिः अन्तः”, अंदर और बाहर, आत्मा में सदा-आनंद-रस का सतत स्वाद। यही असली परीक्षा है, समाधि में तो सबको आनंद मिलता है, पर जीवन्मुक्त को बाज़ार में भी मिलता है।
416 · 417 · 418
प्रारब्धसूत्रग्रथितं शरीरं प्रयातु वा तिष्ठतु गोरिव स्रक् ।
न तत्पुनः पश्यति तत्त्ववेत्ता आनन्दात्मनि ब्रह्मणि लीनवृत्तिः ॥ 416 ॥
अखण्डानन्दमात्मानं विज्ञाय स्वस्वरूपतः ।
किमिच्छन् कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति तत्त्ववित् ॥ 417 ॥
संसिद्धस्य फलं त्वेतज्जीवन्मुक्तस्य योगिनः ।
बहिरन्तः सदानन्दरसास्वादनमात्मनि ॥ 418 ॥
अब वह सबसे यादगार चार-कड़ी की सीढ़ी आती है। वैराग्य का फल बोध, बोध का फल उपरति, और स्व-आनंद के अनुभव से शांति, यही उपरति का फल। चार शब्द, चार कदम, और एक पूरी यात्रा का सुथरा नक़्शा, जहाँ हर कड़ी अगली के लिए ज़रूरी है। पर गुरु तुरंत एक सख़्त बात भी जोड़ते हैं, अगर आगे की कड़ी न हो, तो पीछे की सब निष्फल। वैराग्य है पर बोध नहीं, तो वैराग्य बेकार; बोध है पर उपरति नहीं, तो बोध बेकार। आधी सीढ़ी कहीं नहीं ले जाती। और पूरी चढ़ाई का फल, “स्वतः”, अपने आप उठती निवृत्ति की परम तृप्ति, वह अनुपम आनंद जो किसी करने से नहीं आता।
419 · 420
वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम् ।
स्वानन्दानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम् ॥ 419 ॥
यद्युत्तरोत्तराभावः पूर्वपूर्वन्तु निष्फलम् ।
निवृत्तिः परमा तृप्तिरानन्दोऽनुपमः स्वतः ॥ 420 ॥
अब गुरु एक बहुत व्यावहारिक कसौटी देते हैं, विद्या का प्रत्यक्ष फल क्या है? बस यह, सामने दिख रहे दुखों में अब वैसी घबराहट नहीं उठती। दुख तो आएँगे, बीमारी, हार, अपमान; फ़र्क इसमें है कि आप उद्वेग में आते हैं या अनुद्वेग में रहते हैं। और जो भ्रम के समय अनेक निंदा-योग्य कर्म किए थे, विवेक आने पर वे अपने आप छूट जाते हैं, क्योंकि अब वे करने योग्य ही नहीं दिखते। इसी को गुरु एक साफ़ तस्वीर से समझाते हैं, मरीचिका। एक प्यासा मरीचिका को पानी समझ कर उसकी तरफ़ दौड़ता है, यह अज्ञान का फल; एक जानकार उसी मरीचिका से निवृत्त रहता है, यह विद्या का फल। यह फ़र्क प्रत्यक्ष है, सिद्धांत-मात्र नहीं, और यही विद्या की असली कसौटी है।
421 · 422
दृष्टदुःखेष्वनुद्वेगो विद्यायाः प्रस्तुतं फलम् ।
यत्कृतं भ्रान्तिवेलायां नाना कर्म जुगुप्सितम् पश्चान्नरो विवेकेन तत्कथं कर्तुमर्हति ॥ 421 ॥
विद्याफलं स्यादसतो निवृत्तिः प्रवृत्तिरज्ञानफलं तदीक्षितम् ।
तज्ज्ञाज्ञयोर्यन्मृगतृष्णिकादौ नोचेद्विदां दृष्टफलं किमस्मात् ॥ 422 ॥
गुरु एक तर्क रखते हैं, एक बार “हृदय-ग्रंथि”, हृदय की वह गाँठ जो मुख्यतः “मैं शरीर हूँ” वाली पहचान है, पूरी टूट जाए, तो अनिच्छुक के सामने विषय अपने आप कैसे प्रवृत्ति का कारण बनेंगे? गाँठ खुलते ही विषयों में “मेरा सुख” बाक़ी नहीं रहता, वे सामने रहें तो भी खींच नहीं पाते। फिर वे तीनों, वैराग्य, बोध और उपरति, की अंतिम सीमा बताते हैं। भोग्य चीज़ देख कर भी वासना न उठे, वैराग्य की वही सीमा; कुछ भी हो, “मैं” का अहंकार न जागे, बोध की परम सीमा; और जो वृत्तियाँ लीन हो चुकीं, वे दोबारा सिर न उठाएँ, उपरति की वही सीमा।
423 · 424
अज्ञानहृदयग्रन्थेर्विनाशो यद्यशेषतः ।
अनिच्छोर्विषयः किं नु प्रवृत्तेः कारणं स्वतः ॥ 423 ॥
वासनानुदयो भोग्ये वैरागस्य तदावधिः ।
अहंभावोदयाभावो बोधस्य परमावधिः लीनवृत्तैरनुत्पत्तिर्मर्यादोपरतेस्तु सा ॥ 424 ॥
अब गुरु एक अद्भुत तस्वीर खींचते हैं, जीवन्मुक्त की रोज़ की ज़िंदगी। वह ब्रह्म-आकार में सदा स्थित है, बाहरी पदार्थों की बुद्धि से मुक्त, भोग्य का अनुमान भी दूसरों के बताने पर लगाता है। “निद्रालु-वत् बाल-वत्”, नींद में डूबे की तरह, बच्चे की तरह; एक बच्चा खाना नहीं माँगता, माँ देती है, खा लेता है, और नींद में डूबा आदमी विचार नहीं करता, चीज़ें चलती रहती हैं। जीवन्मुक्त इस जगत को सपने में देखी दुनिया की तरह देखता है, कहीं ज्ञान-प्राप्त बैठा हुआ, अनंत-पुण्य का फल भोगता, धरती पर माननीय। वही गीता का प्रसिद्ध “स्थितप्रज्ञ” है, जो सदा-आनंद का भोग करता है, ब्रह्म में ही विलीन-आत्मा, निर्विकार और निष्क्रिय।
425 · 426
ब्रह्माकारतया सदा स्थिततया निर्मुक्तबाह्यार्थधीर् अन्यावेदितभोग्यभोगकलनो निद्रालुवद्बालवत् ।
स्वप्नालोकितलोकवज्जगदिदं पश्यन् क्वचिल्लब्धधीर् आस्ते कश्चिदनन्तपुण्यफलभुग्धन्यः स मान्यो भुवि ॥ 425 ॥
स्थितप्रज्ञो यतिरयं यः सदानन्दमश्नुते ।
ब्रह्मण्येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिष्क्रियः ॥ 426 ॥
गुरु अब “प्रज्ञा” और “स्थितप्रज्ञ” को एकदम साफ़ शब्दों में परिभाषित करते हैं। प्रज्ञा वह वृत्ति है जो शुद्ध हुए ब्रह्म और आत्मा की एकता में डूबती है, निर्विकल्प है, और चिन्-मात्र, बस चेतना। यह वृत्ति जब “सुस्थित”, मज़बूत और स्थिर हो जाए, तभी वह व्यक्ति स्थितप्रज्ञ कहलाता है; प्रज्ञा का एक बार उठ आना बात नहीं, उसका टिक जाना ही असली बात है। यहीं से जीवन्मुक्त की पहली संक्षिप्त परिभाषा आती है, तीन गुणों में, जिसकी प्रज्ञा स्थित हो, जिसका आनंद निरंतर हो, और जिसके लिए प्रपंच “विस्मृत-प्राय”, भूले-जैसा हो गया हो। यह तीसरा शब्द बारीक है, दुनिया पूरी तरह भूली नहीं, बस भूले-जैसी हो गई, दिखती तो है, पर अब कोई पकड़ नहीं।
427 · 428
ब्रह्मात्मनोः शोधितयोरेकभावावगाहिनी ।
निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते सुस्थितासौ भवेद्यस्य स्थितप्रज्ञः स उच्यते ॥ 427 ॥
यस्य स्थिता भवेत्प्रज्ञा यस्यानन्दो निरन्तरः ।
प्रपञ्चो विस्मृतप्रायः स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ 428 ॥
दूसरी परिभाषा और भी सुंदर है, लीन-धी, पर जागृत। आम तौर पर जब बुद्धि लीन होती है, सुषुप्ति या समाधि में, तब हम जागते नहीं; और जब जागते हैं, तब बुद्धि चालू, विचार-व्यवहार में डूबी रहती है। पर जीवन्मुक्त एक तीसरी अवस्था में है, जागृत भी और साथ ही बुद्धि लीन, बाहर सब काम करता हुआ, भीतर सब शांत, और उसका बोध “निर्वासन”, जिसे कोई वासना हिला नहीं पाती। तीसरी परिभाषा एक अद्भुत विरोधाभास रखती है, “कलावान् अपि निष्कलः”, अंगों वाला हो कर भी निष्कल। शरीर दिखता है, अंग हैं, पर उसकी पहचान अंगों से नहीं, निष्कल चेतना से है; संसार की कल्पना उसमें शांत हो चुकी, और चित्त निश्चिंत है, चिंताएँ चाहे आस-पास हों।
429 · 430
लीनधीरपि जागर्ति जाग्रद्धर्मविवर्जितः ।
बोधो निर्वासनो यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ 429 ॥
शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः ।
यस्य चित्तं विनिश्चिन्तं स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ 430 ॥
यहाँ से सोलह लक्षणों की वह गहन शृंखला शुरू होती है, हर एक मानो भीतर के बदलाव में खुलती एक छोटी खिड़की। पहला लक्षण सबसे बुनियादी और सबसे मुश्किल है, परछाई की तरह साथ चलते इस वर्तमान देह में भी “मैं” और “मेरा” की पकड़ का अभाव। कोई भी जान सकता है कि “मैं देह नहीं हूँ”, पर रोज़ की भागदौड़ में यह बोध टिकाना ही असली परीक्षा है। दूसरा लक्षण तीनों कालों में फैला है, बीते का बार-बार अनुसंधान न करना, आगत का विचार न करना, और सामने आ पड़े वर्तमान में भी उदासीनता। गुरु यहाँ केवल वर्तमान में टिकने की बात नहीं कहते, एक क़दम और आगे ले जाते हैं, कि इस सामने पड़े क्षण में भी मन कहीं अटके नहीं।
431 · 432
वर्तमानेऽपि देहेऽस्मिञ्छायावदनुवर्तिनि ।
अहन्ताममताभावो जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 431 ॥
अतीताननुसन्धानं भविष्यदविचारणम् ।
अउदासीन्यमपि प्राप्तं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 432 ॥
तीसरा लक्षण दृष्टि का है। दुनिया तो वैसी ही है, गुण-दोष से भरी, स्वभाव से अनेक प्रकार की; यह बदलती नहीं, बदलती है देखने वाले की दृष्टि। “सम-दर्शिता” का यह अर्थ नहीं कि गुण-दोष में फ़र्क नहीं दिखता, अर्थ यह है कि हर जगह वही एक आत्मा दिखती है, भिखारी हो या राजा, शत्रु हो या मित्र, पीछे एक ही चेतना। चौथा लक्षण इसी का सबसे रोज़मर्रा और सबसे कड़ा रूप है, इष्ट मिले या अनिष्ट, दोनों में अविकार। यह नहीं कि कुछ अनुभव ही न हो, अनुभव होता है, पर वह विकार नहीं बनता; जैसे स्थिर झील में पत्थर गिरने से छोटी लहर उठती है, पर झील झील ही रहती है।
433 · 434
गुणदोषविशिष्टेऽस्मिन्स्वभावेन विलक्षणे ।
सर्वत्र समदर्शित्वं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 433 ॥
इष्टानिष्टार्थसम्प्राप्तौ समदर्शितयात्मनि ।
उभयत्राविकारित्वं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 434 ॥
अगला लक्षण एक अंतरंग झलक देता है, “अंदर-बाहर का अविज्ञान”। आम तौर पर हम अंदर-बाहर में बँटे रहते हैं, बाहर काम, अंदर हलचल; पर जब चित्त एकदम ब्रह्मानंद-रस के स्वाद में डूब जाए, तो यह बँटवारा घुल जाता है, न अंदर रहता है, न बाहर, बस एक रस। फिर एक बहुत व्यावहारिक लक्षण, देह और इन्द्रियों के काम तो चलते रहते हैं, खाना देना है, इन्द्रियों के काम निभाने हैं, पर जीवन्मुक्त इनमें “मैं कर रहा हूँ”, “यह मेरा है” नहीं डालता। यहाँ उदासीनता उपेक्षा का नाम नहीं, अलगाव का नाम है, काम चलता रहता है, शरीर अपने आप करता रहता है, मानो उससे अलग कोई बैठा देख रहा हो।
435 · 436
ब्रह्मानन्दरसास्वादासक्तचित्ततया यतेः ।
अन्तर्बहिरविज्ञानं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 435 ॥
देहेन्द्रियादौ कर्तव्ये ममाहंभाववर्जितः ।
अउदासीन्येन यस्तिष्ठेत्स जीवन्मुक्तलक्षणः ॥ 436 ॥
गुरु एक और प्यारा शब्द देते हैं, “श्रुतेः बलात्”, श्रुति के बल से। जिसने अपनी आत्मा का ब्रह्म-भाव अकेले अपनी अटकल से नहीं, परम्परागत वचनों की पक्की नींव पर खड़े हो कर जाना, और संसार-बंधन से मुक्त हुआ, वही जीवन्मुक्त लक्षण वाला है; अपनी जिज्ञासा और अपना अनुभव ज़रूरी तो हैं, पर “श्रुति का बल” उन्हें प्रामाणिकता देता है। फिर अद्वैत की एक बहुत बारीक बात आती है, “मैं” और “यह” दोनों एक जोड़ी हैं। जब “मैं देह हूँ” होता है, तभी बाक़ी सब “यह दूसरा है” बनता है; जीवन्मुक्त में दोनों नहीं, न अपने में “मैं”, न दूसरों में “यह”, बस एक चेतना बचती है, बिना सीमा, बिना बँटवारे।
437 · 438
विज्ञात आत्मनो यस्य ब्रह्मभावः श्रुतेर्बलात् ।
भवबन्धविनिर्मुक्तः स जीवन्मुक्तलक्षणः ॥ 437 ॥
देहेन्द्रियेष्वहंभाव इदंभावस्तदन्यके ।
यस्य नो भवतः क्वापि स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ 438 ॥
अब गुरु दो स्तर का अद्वैत बताते हैं। पहला, भीतर का “मैं” और ब्रह्म एक; दूसरा, ब्रह्म और उसकी सृष्टि एक। आम तौर पर लोग पहली एकता तक पहुँच जाते हैं, “मैं ब्रह्म हूँ”, पर दूसरी एकता, “यह सृष्टि भी ब्रह्म है”, कठिन है; जीवन्मुक्त दोनों एकताएँ प्रज्ञा से जानता है, बौद्धिक रूप से नहीं, अनुभव से। और सबसे कड़ा लक्षण गुरु आख़िर में रखते हैं, सम्मान और अपमान में बराबरी। साधु इस शरीर को पूजें, तो अहंकार उठने का मौक़ा; दुर्जन सताएँ, तो क्रोध और दुख उठने का मौक़ा; ये मन की सबसे पुरानी प्रतिक्रियाएँ हैं। पर जिसमें दोनों जगह एक ही सम-भाव बना रहे, वही जीवन्मुक्त है, क्योंकि “यह शरीर मैं हूँ” वाली पकड़ ख़त्म होने पर, शरीर को पूजें या सताएँ, असली “मैं” से वह जुड़ता ही नहीं।
439 · 440
न प्रत्यग्ब्रह्मणोर्भेदं कदापि ब्रह्मसर्गयोः ।
प्रज्ञया यो विजानिति स जीवन्मुक्तलक्षणः ॥ 439 ॥
साधुभिः पूज्यमानेऽस्मिन् पीड्यमानेऽपि दुर्जनैः ।
समभावो भवेद्यस्य स जीवन्मुक्तलक्षणः ॥ 440 ॥
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना भाग 15 है, जहाँ विषयों की नदी जीवन्मुक्त-समुद्र में बिना कोई विकार उठाए घुल जाती है। फिर तीन कर्मों, संचित, प्रारब्ध और आगामी, का स्वच्छ विश्लेषण आता है, और “एकमेव अद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन” की सात-श्लोकी टेक।
इस भाग का सार श्लोक 440 में बैठा है, साधु पूजें या दुर्जन सताएँ, भीतर एक ही सम-भाव बना रहे। मान और अपमान, दोनों मन की सबसे पुरानी प्रतिक्रियाएँ हैं, और जिस मात्रा में ये अब भी हिलाती हैं, उसी मात्रा में देह से जुड़ी पुरानी पकड़ अभी शेष है।
यही कथा वहाँ भी
- अध्याय 2: सांख्य योग
भगवद्गीता अध्याय 2: स्थितप्रज्ञ के लक्षण - अष्टावक्र गीता
अष्टावक्र गीता: मुक्त पुरुष की दशा