भाग 14 · जीवन्मुक्त की पहचान

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 14 · जीवन्मुक्त की पहचान, हृदय में पूर्ण ब्रह्म · श्लोक 408-440

तीन-श्लोकी टेक, “हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ”। फिर वैराग्य से शांति तक की प्रसिद्ध सीढ़ी। और अंत में, जीवन्मुक्त को कैसे पहचानें, सोलह लक्षणों में।

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पहले एक बात

अब तक की समाधि-विधि और अद्वैत-निर्णय एक ख़ास जगह आ पहुँचते हैं, एक तस्वीर पर। विद्वान हृदय में पूर्ण ब्रह्म को रखता है। यह तस्वीर तीन श्लोक तक दोहराई जाती है, जैसे हृदय की एक धड़कन तीन बार सुनी जाए। फिर एक छोटी, चार-कड़ी की कारण-शृंखला, वैराग्य का फल बोध, बोध का फल उपरति, उपरति का फल स्व-आनंद की शांति।

और बाक़ी सब? बाक़ी सब है, जीवन्मुक्त की पहचान। ज़मीन पर चलते हुए एक मुक्त इंसान कैसा दिखता है? गुरु सोलह लक्षण देते हैं, हर एक एक छोटी खिड़की, जिससे हम झाँक कर देख सकते हैं कि अंदर का बदलाव कैसा है।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। तीन हिस्से, हृदि कलयति विद्वान् त्रिक (408-410), वैराग्य से शांति की सीढ़ी और फल-चर्चा (411-424), जीवन्मुक्त के सोलह लक्षण (425-440)। असली खंभे: 408-410 (तीन-श्लोकी टेक), 419 (वैराग्य → बोध → उपरति → शांति), 428-431 (जीवन्मुक्त की चार सटीक परिभाषाएँ), 433-434 (सर्वत्र समदर्शिता)।

408 · हृदि कलयति विद्वान्, पूर्ण ब्रह्म समाधि में (1)

किमपि सततबोधं केवलानन्दरूपं निरुपममतिवेलं नित्यमुक्तं निरीहम् ।
निरवधिगगनाभं निष्कलं निर्विकल्पं हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ 408 ॥

kim api satata-bodhaṁ kevalānanda-rūpaṁ nirupamam ati-velaṁ nitya-muktaṁ nirīham · niravadhi-gaganābhaṁ niṣkalaṁ nirvikalpaṁ hṛdi kalayati vidvān brahma pūrṇaṁ samādhau

शब्दार्थ: किम् अपि सतत-बोधं केवल-आनन्द-रूपं · कुछ ऐसा, सतत-बोध, केवल-आनंद-रूप · निरुपमम् अति-वेलं नित्य-मुक्तं निरीहम् · अनुपम, सीमा-पार, नित्य-मुक्त, निश्चेष्ट · निरवधि-गगन-आभं निष्कलं निर्विकल्पं · असीम आकाश-जैसा, निष्कल, निर्विकल्प · हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ · विद्वान पूर्ण ब्रह्म को हृदय में, समाधि में, रखता है।

अर्थ: कुछ ऐसा, सतत-बोध, केवल-आनंद-रूप, अनुपम, सीमा-पार, नित्य-मुक्त, निश्चेष्ट; असीम आकाश-जैसा, निष्कल, निर्विकल्प, पूर्ण ब्रह्म को विद्वान हृदय में, समाधि में, रखता है।

भावार्थ: यहाँ तीन-श्लोकी टेक शुरू होती है, “हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ।” यह विवेकचूडामणि का एक सबसे यादगार, गाने योग्य पंक्ति है।

हर श्लोक एक नया वर्णन देता है, सतत-बोध, केवल-आनंद, अनुपम, असीम-आकाश-जैसा, और अंत में वही पंक्ति लौटती है: “विद्वान इसे हृदय में रखता है।” यहाँ “कलयति”, रखता है, धारण करता है, एक प्यारा क्रिया है। यह कुछ करने का काम नहीं। कुछ “रखने” का काम है। हृदय एक पात्र है, ब्रह्म उसमें भरा रहता है।

409 · हृदि कलयति विद्वान्, पूर्ण ब्रह्म समाधि में (2)

प्रकृतिविकृतिशून्यं भावनातीतभावं समरसमसमानं मानसं बन्धदूरम् ।
निगमवचनसिद्धं नित्यमस्मत्प्रसिद्धं हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ 409 ॥

prakṛti-vikṛti-śūnyaṁ bhāvanātīta-bhāvaṁ sama-rasam asamānaṁ mānasa-bandha-dūram · nigama-vacana-siddhaṁ nityam asmat-prasiddhaṁ hṛdi kalayati vidvān brahma pūrṇaṁ samādhau

शब्दार्थ: प्रकृति-विकृति-शून्यं · प्रकृति और विकार से शून्य · भावना-अतीत-भावं · भावना से परे का भाव · सम-रसम् असमानं मानस-बन्ध-दूरम् · सम-रस, अनुपम, मानसिक बंधन से दूर · निगम-वचन-सिद्धं नित्यम् अस्मत्-प्रसिद्धं · वेद-वाणी से सिद्ध, नित्य हमारे लिए प्रसिद्ध · हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ · विद्वान पूर्ण ब्रह्म को हृदय में, समाधि में, रखता है।

अर्थ: प्रकृति और विकार से शून्य, भावना से परे का भाव, सम-रस, अनुपम, मानसिक बंधन से दूर; वेद-वाणी से सिद्ध, नित्य हमारे लिए प्रसिद्ध, पूर्ण ब्रह्म को विद्वान हृदय में, समाधि में, रखता है।

भावार्थ: टेक का दूसरा दोहराव। यहाँ एक बेहद सुंदर शब्द आता है, “अस्मत्-प्रसिद्धम्”, हमारे लिए प्रसिद्ध।

यानी यह “अनजाना” नहीं। यह हम सबको पता है, बस उस तरह नहीं जैसे हम चीज़ों को “जानते” हैं। यह वह जानकारी है जो “हमारे होने” में बसी है। हम इसके लिए ही जिए हैं, इसी की तरफ़ हम मुड़ते रहे हैं। वेद-वाणी इसे साफ़ करती है, पर “नया” नहीं बताती; बस याद दिलाती है।

410 · हृदि कलयति विद्वान्, पूर्ण ब्रह्म समाधि में (3)

अजरममरमस्ताभाववस्तुस्वरूपं स्तिमितसलिलराशिप्रख्यमाख्याविहीनम् ।
शमितगुणविकारं शाश्वतं शान्तमेकं हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ 410 ॥

ajaram amaram astābhāva-vastu-svarūpaṁ stimita-salila-rāśi-prakhyam ākhyā-vihīnam · śamita-guṇa-vikāraṁ śāśvataṁ śāntam ekaṁ hṛdi kalayati vidvān brahma pūrṇaṁ samādhau

शब्दार्थ: अजरम् अमरम् अस्त-अभाव-वस्तु-स्वरूपं · अजर, अमर, “अभाव नहीं” वाली वस्तु-स्वरूप · स्तिमित-सलिल-राशि-प्रख्यम् आख्या-विहीनम् · स्थिर पानी की राशि-जैसा, नाम-रहित · शमित-गुण-विकारं शाश्वतं शान्तम् एकं · गुण-विकार शांत, शाश्वत, शांत, एक · हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ · विद्वान पूर्ण ब्रह्म को हृदय में, समाधि में, रखता है।

अर्थ: अजर, अमर, “अभाव नहीं” वाली वस्तु-स्वरूप; स्थिर पानी की राशि-जैसा, नाम-रहित; गुण-विकार शांत, शाश्वत, शांत, एक, पूर्ण ब्रह्म को विद्वान हृदय में, समाधि में, रखता है।

भावार्थ: टेक का तीसरा और आख़िरी दोहराव। इस बार सबसे प्यारी उपमा, “स्थिर पानी की राशि।”

एक विशाल झील, जिसमें न लहर है, न तरंग, न हलचल, बस स्थिर पानी। ब्रह्म ऐसा ही है। और “आख्या-विहीनम्”, नाम-रहित। हम नाम देते हैं, “ब्रह्म”, “आत्मा”, “परम-सत्य”, पर असल में वह सब नामों के पार है। यह तीसरा दोहराव “एकम्” शब्द पर ख़त्म होता है, “एक।” तीन बार सुनी हुई एक ही धड़कन।

411 · समाहित अंतःकरण, अखंड वैभव देख, बंधन काट

समाहितान्तःकरणः स्वरूपे विलोकयात्मानमखण्डवैभवम् ।
विच्छिन्द्धि बन्धं भवगन्धगन्धितं यत्नेन पुंस्त्वं सफलीकुरुष्व ॥ 411 ॥

samāhitāntaḥkaraṇaḥ svarūpe vilokayātmānam akhaṇḍa-vaibhavam · vicchinddhi bandhaṁ bhava-gandha-gandhitaṁ yatnena puṁstvaṁ saphalī-kuruṣva

शब्दार्थ: समाहित-अन्तःकरणः स्वरूपे · समाहित अंतःकरण से स्वरूप में · विलोकय आत्मानम् अखण्ड-वैभवम् · आत्मा को अखंड-वैभव वाला देख · विच्छिन्द्धि बन्धं भव-गन्ध-गन्धितं · संसार-गंध से बसे बंधन को काट · यत्नेन पुंस्त्वं सफली-कुरुष्व · प्रयत्न से अपने पुरुषत्व को सफल कर।

अर्थ: समाहित अंतःकरण से, स्वरूप में, आत्मा को अखंड-वैभव वाला देख। संसार-गंध से बसे बंधन को काट। प्रयत्न से अपने पुरुषत्व (मनुष्यता) को सफल कर।

भावार्थ: गुरु एक प्यारा शब्द देते हैं, “भव-गन्ध”, संसार की गंध। बंधन इत्र की तरह है,पर हर जगह से उठता है।

और एक हिम्मत वाली बात, “पुंस्त्वं सफली-कुरुष्व”, अपनी मनुष्यता को सफल कर। यानी मनुष्य जन्म तभी सफल है, जब वह यह काम करे, अखंड-वैभव वाली आत्मा को देख ले, और संसार-बंधन काट दे। बाक़ी सब उपलब्धियाँ, कोई पैसा, कोई नाम, मनुष्यता को सफल नहीं करतीं।

412 · सर्व-उपाधि-मुक्त, सच्चिदानंद, अद्वय, दोबारा अध्वा में मत आ

सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सच्चिदानन्दमद्वयम् ।
भावयात्मानमात्मस्थं न भूयः कल्पसेऽध्वने ॥ 412 ॥

sarvopādhi-vinirmuktaṁ sac-cid-ānandam advayam · bhāvayātmānam ātma-sthaṁ na bhūyaḥ kalpase’dhvane

शब्दार्थ: सर्व-उपाधि-विनिर्मुक्तं सच्चिदानन्दम् अद्वयम् · सब उपाधियों से मुक्त, सच्चिदानंद, अद्वय · भावय आत्मानम् आत्म-स्थं · आत्मा को आत्म-स्थ भाव · न भूयः कल्पसे अध्वने · फिर अध्वा (संसार-मार्ग) के लिए कल्पित नहीं होंगे।

अर्थ: सब उपाधियों से मुक्त, सच्चिदानंद, अद्वय आत्मा को आत्म-स्थ भाव। फिर आप दोबारा संसार-मार्ग के लिए कल्पित नहीं होंगे।

भावार्थ: “अध्वा”, रास्ता, यानी जन्म-मरण का रास्ता। गुरु कहते हैं, एक बार यह भावना पक्की हो जाए, तो फिर “अध्वा” में पड़ने का कोई कारण नहीं।

“भावय”, महसूस कर, बस सोचो नहीं। यह कोई बौद्धिक काम नहीं। एक भावना है, जो धीरे-धीरे पूरे होने में बसती है। और जब बस जाए, तो जन्म-मरण की पटरी पर लौटने का “कल्पन” भी नहीं होता।

413 · शरीर परछाई की तरह, महात्मा दोबारा नहीं जोड़ता

छायेव पुंसः परिदृश्यमान् माभासरूपेण फलानुभूत्या ।
शरीरमाराच्छववन्निरस्तं पुनर्न संधत्त इदं महात्मा ॥ 413 ॥

chāyeva puṁsaḥ paridṛśyamāna-mābhāsa-rūpeṇa phalānubhūtyā · śarīram ārāc chavavan nirastaṁ punar na saṁdhatta idaṁ mahātmā

शब्दार्थ: छाया इव पुंसः परिदृश्यमान् · पुरुष की परछाई की तरह दिखता हुआ · आभास-रूपेण फल-अनुभूत्या · आभास-रूप में, फल के अनुभव से · शरीरम् आराच् शव-वत् निरस्तं · शव की तरह दूर रखा शरीर · पुनः न संधत्ते इदं महात्मा · महात्मा फिर इसे (शरीर को) नहीं जोड़ता।

अर्थ: पुरुष की परछाई की तरह दिखता हुआ, आभास-रूप में, फल के अनुभव से; शव की तरह दूर रखे शरीर को महात्मा फिर नहीं जोड़ता।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी तस्वीर बनाते हैं, परछाई। आपकी परछाई आपके साथ चलती है, पर आप “आप” और “परछाई” को अलग जानते हैं।

महात्मा का शरीर भी ऐसा है, साथ चलता है, दिखता है, पर वह “मैं” नहीं। और गुरु एक और कड़ा शब्द देते हैं, “शव-वत्”, शव की तरह। यानी शरीर अब एक मरा-सा बोझ नहीं। बस एक आभास, जो परछाई की तरह साथ है। और इस आभास को महात्मा “दोबारा नहीं जोड़ता”, यानी इसमें “मैं” नहीं डालता।

414 · ज्ञान-बोध-आनंद पा कर, मलिन उपाधि दूर रख

सततविमलबोधानन्दरूपं समेत्य त्यज जडमलरूपोपाधिमेतं सुदूरे ।
अथ पुनरपि नैष स्मर्यतां वान्तवस्तु स्मरणविषयभूतं पल्पते कुत्सनाय ॥ 414 ॥

satata-vimala-bodhānanda-rūpaṁ sametya tyaja jaḍa-mala-rūpopādhim etaṁ sudūre · atha punar api naiṣa smaryatāṁ vānta-vastu smaraṇa-viṣaya-bhūtaṁ palpate kutsanāya

शब्दार्थ: सतत-विमल-बोध-आनन्द-रूपं समेत्य · सतत-विमल बोध-आनंद-रूप को पा कर · त्यज जड-मल-रूप-उपाधिम् एतं सुदूरे · इस जड-मल-रूप उपाधि को बहुत दूर छोड़ · अथ पुनः अपि न एषः स्मर्यतां · और दोबारा भी यह याद न किया जाए · वान्त-वस्तु स्मरण-विषय-भूतं · उगली हुई वस्तु, याद की विषय बनी · पल्पते कुत्सनाय · निंदा का काम करती है।

अर्थ: सतत-विमल बोध-आनंद-रूप को पा कर, इस जड-मल-रूप उपाधि (शरीर) को बहुत दूर छोड़ दे। और दोबारा भी यह याद न किया जाए, उगली हुई वस्तु, याद का विषय बनी, बस निंदा का काम करती है।

भावार्थ: गुरु एक बहुत तीखी, थोड़ी अप्रिय उपमा देते हैं, “वान्त-वस्तु”, उगली हुई चीज़।

जैसे एक बार उगली हुई चीज़ को कोई दोबारा याद नहीं करना चाहता, वैसे ही, एक बार छोड़े हुए शरीर-भाव को दोबारा याद नहीं करना चाहिए। यह उपमा गुरु जान-बूझ कर देते हैं, ताकि पुरानी “मैं शरीर हूँ” वाली पकड़ कतई फिर से न लौटे। तीखा, पर असरदार।

415 · मूल सहित जला, फिर नित्य विशुद्ध बोध-आनंद में स्थित

समूलमेतत्परिदाह्य वन्हौ सदात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे ।
ततः स्वयं नित्यविशुद्धबोधानन्दात्मना तिष्ठति विद्वरिष्ठः ॥ 415 ॥

sa-mūlam etat paridāhya vanhau sad-ātmani brahmaṇi nirvikalpe · tataḥ svayaṁ nitya-viśuddha-bodhānandātmanā tiṣṭhati vidvariṣṭhaḥ

शब्दार्थ: स-मूलम् एतत् परिदाह्य वन्हौ · इसे मूल सहित आग में जला कर · सद्-आत्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे · सद्-आत्मा-ब्रह्म, निर्विकल्प में · ततः स्वयं नित्य-विशुद्ध-बोध-आनन्द-आत्मना तिष्ठति · फिर स्वयं नित्य-विशुद्ध बोध-आनंद-आत्मा से स्थित होता है · विद्वरिष्ठः · श्रेष्ठ विद्वान।

अर्थ: इसे (अज्ञान-वासना को) मूल सहित आग में, सद्-आत्मा-ब्रह्म, निर्विकल्प में, जला कर, फिर श्रेष्ठ विद्वान स्वयं नित्य-विशुद्ध बोध-आनंद-आत्मा से स्थित होता है।

भावार्थ: गुरु एक तेज़ शब्द देते हैं, “समूलम्”, मूल सहित। यानी जड़ें भी जलनी चाहिए, सिर्फ़ पत्तियाँ नहीं।

अज्ञान की जड़ें कहाँ हैं? सूक्ष्म-शरीर में, वासनाओं में, अहं-ममता में। ये जड़ें बच गईं, तो दोबारा पौधा उग आएगा। तो आग, “सद्-आत्मा-ब्रह्म, निर्विकल्प”, चाहिए जो जड़ तक पहुँचे। यह आग ज्ञान की आग है, और निर्विकल्प-समाधि वह जगह है जहाँ यह अंतिम जलावन होता है।

416 · प्रारब्ध-धागा-गूँथा शरीर, गाय की माला की तरह

प्रारब्धसूत्रग्रथितं शरीरं प्रयातु वा तिष्ठतु गोरिव स्रक् ।
न तत्पुनः पश्यति तत्त्ववेत्ता आनन्दात्मनि ब्रह्मणि लीनवृत्तिः ॥ 416 ॥

prārabdha-sūtra-grathitaṁ śarīraṁ prayātu vā tiṣṭhatu gor iva srak · na tat punaḥ paśyati tattva-vettā ānandātmani brahmaṇi līna-vṛttiḥ

शब्दार्थ: प्रारब्ध-सूत्र-ग्रथितं शरीरं · प्रारब्ध-धागे से गूँथा शरीर · प्रयातु वा तिष्ठतु गोः इव स्रक् · चला जाए या रहे, गाय के गले की माला की तरह · न तत् पुनः पश्यति तत्त्व-वेत्ता · तत्त्व-वेत्ता उसे फिर नहीं देखता · आनन्द-आत्मनि ब्रह्मणि लीन-वृत्तिः · आनंद-आत्मा-ब्रह्म में लीन वृत्ति वाला।

अर्थ: प्रारब्ध-धागे से गूँथा यह शरीर, चला जाए या रहे, गाय के गले की माला की तरह। तत्त्व-वेत्ता, जिसकी वृत्ति आनंद-आत्मा-ब्रह्म में लीन है, उसे फिर नहीं देखता।

भावार्थ: गुरु एक रोज़ की, गाँव की उपमा देते हैं, गाय के गले की माला।

कोई गाय के गले में फूल-माला डाल देता है। गाय न तो जानती है, न परवाह करती है, यह उसके लिए कुछ नहीं। माला रहे, या गिर जाए, गाय वैसी ही चलती रहती है। तत्त्व-वेत्ता का शरीर ऐसा ही है। प्रारब्ध (पिछले कर्मों का फल) इसे थोड़ी देर के लिए “गूँथे” रखता है, फिर एक दिन यह जाएगा। आए-जाए, तत्त्व-वेत्ता को कोई फ़र्क नहीं।

417 · अखंडानंद आत्मा जान कर, किसके लिए देह पुष्ट करे

अखण्डानन्दमात्मानं विज्ञाय स्वस्वरूपतः ।
किमिच्छन् कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति तत्त्ववित् ॥ 417 ॥

akhaṇḍānandam ātmānaṁ vijñāya sva-svarūpataḥ · kim icchan kasya vā hetor dehaṁ puṣṇāti tattva-vit

शब्दार्थ: अखण्ड-आनन्दम् आत्मानं विज्ञाय · अखंड-आनंद आत्मा जान कर · स्व-स्वरूपतः · अपने ही स्वरूप से · किम् इच्छन् कस्य वा हेतोः · क्या चाहते हुए, किस लिए · देहं पुष्णाति तत्त्व-वित् · तत्त्व-वेत्ता देह को पुष्ट करे।

अर्थ: अखंड-आनंद आत्मा को अपने ही स्वरूप से जान कर, तत्त्व-वेत्ता क्या चाहते हुए, किस के लिए देह को पुष्ट करे?

भावार्थ: गुरु एक मीठा सवाल पूछते हैं, “तत्त्व-वेत्ता शरीर को सजाने-सँवारने में क्यों लगे?”

शरीर की देखभाल वैसे लोग करते हैं जिन्हें वह “मेरा” लगता है। पर तत्त्व-वेत्ता को तो अखंड-आनंद-आत्मा का बोध है, वह अपने असली रूप में बसा है। तो शरीर के पीछे क्यों? यह श्लोक एक नर्म खुलासा है, साधक एक “मुक्ति का दिखावा” कर के ख़ुद को धोखा न दे; अगर सच में बोध हुआ, तो शरीर-संवारने का जुनून अपने आप कम होंगे।

418 · जीवन्मुक्त का फल, अंदर-बाहर सदा आनंद

संसिद्धस्य फलं त्वेतज्जीवन्मुक्तस्य योगिनः ।
बहिरन्तः सदानन्दरसास्वादनमात्मनि ॥ 418 ॥

saṁsiddhasya phalaṁ tv etaj jīvan-muktasya yoginaḥ · bahir antaḥ sadānanda-rasāsvādanam ātmani

शब्दार्थ: संसिद्धस्य फलं तु एतत् · संसिद्ध (पूर्ण-सिद्ध) का फल यह · जीवन्मुक्तस्य योगिनः · जीवन्मुक्त योगी का · बहिः अन्तः सदा-आनन्द-रस-आस्वादनम् आत्मनि · अंदर-बाहर, आत्मा में सदा-आनंद-रस का स्वाद।

अर्थ: संसिद्ध जीवन्मुक्त योगी का फल यह है, अंदर-बाहर, आत्मा में, सदा-आनंद-रस का स्वाद।

भावार्थ: गुरु जीवन्मुक्ति का असली “फल” बताते हैं, कोई शक्ति-प्रदर्शन नहीं। कोई चमत्कार नहीं। कोई स्वर्ग-वास नहीं। बस, आनंद-रस का सतत स्वाद।

और दो शब्द बहुत प्यारे हैं, “बहिः अन्तः”, अंदर-बाहर। यानी आँख खुली हो या बंद, ध्यान में हो या बाज़ार में, अकेला हो या भीड़ में, आनंद-रस का स्वाद रुकता नहीं। यह असली परीक्षा है। समाधि के दौरान सब को आनंद मिलता है; पर जीवन्मुक्त को बाज़ार में भी मिलता है।

419 · वैराग्य → बोध → उपरति → शांति

वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम् ।
स्वानन्दानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम् ॥ 419 ॥

vairāgyasya phalaṁ bodho bodhasyoparatiḥ phalam · svānanda-anubhavāc chāntir eṣaivoparateḥ phalam

शब्दार्थ: वैराग्यस्य फलं बोधः · वैराग्य का फल बोध · बोधस्य उपरतिः फलम् · बोध का फल उपरति · स्व-आनन्द-अनुभवात् शान्तिः · स्व-आनंद के अनुभव से शांति · एषा एव उपरतेः फलम् · यही उपरति का फल।

अर्थ: वैराग्य का फल बोध; बोध का फल उपरति; और स्व-आनंद के अनुभव से शांति, यही उपरति का फल।

भावार्थ: यह विवेकचूडामणि की सबसे यादगार चार-कड़ी की सीढ़ी है। चार शब्द, चार कदम, और एक पूरी आध्यात्मिक यात्रा।

वैराग्य (पकड़ ढीली) → बोध (समझ खुली) → उपरति (मन थमा) → शांति (अंदर-बाहर सब शांत)। हर कड़ी अगली के लिए ज़रूरी, और कोई कड़ी छोड़ी नहीं जा सकती। बहुत साधक “वैराग्य” बिना “बोध” चाहते हैं, पर बिना ज़मीन तैयार किए, बीज नहीं उगता। और “उपरति”, मन का सच में थम जाना, बिना बोध के नहीं आती। यह श्लोक एक नक़्शा है, जिसे साधक पास रखे।

420 · आगे न हो, तो पहले बेकार; निवृत्ति परम तृप्ति

यद्युत्तरोत्तराभावः पूर्वपूर्वन्तु निष्फलम् ।
निवृत्तिः परमा तृप्तिरानन्दोऽनुपमः स्वतः ॥ 420 ॥

yady uttarottarābhāvaḥ pūrva-pūrvan tu niṣphalam · nivṛttiḥ paramā tṛptir ānando’nupamaḥ svataḥ

शब्दार्थ: यदि उत्तर-उत्तर-अभावः · अगर आगे-आगे की कड़ी का अभाव · पूर्व-पूर्वं तु निष्फलम् · तो पहले-पहले बेकार · निवृत्तिः परमा तृप्तिः · निवृत्ति परम तृप्ति · आनन्दः अनुपमः स्वतः · आनंद अनुपम, अपने आप।

अर्थ: अगर आगे-आगे की कड़ियाँ न हों, तो पहले-पहले की कड़ियाँ बेकार। निवृत्ति परम तृप्ति है, और उससे आनंद अनुपम, अपने आप।

भावार्थ: गुरु पिछले श्लोक की सीढ़ी पर एक सख़्त बात कहते हैं, एक कड़ी रुक गई, तो पीछे की सब “निष्फल।”

यानी अगर वैराग्य है पर बोध नहीं। वैराग्य “बेकार।” बोध है पर उपरति नहीं। बोध “बेकार।” यह कठोर है, पर सच है। आधी सीढ़ी कहीं नहीं ले जाती। पूरी चढ़ाई का फल, “निवृत्ति परम तृप्ति।” और एक प्यारा शब्द, “स्वतः”, अपने आप। आनंद कुछ “करने” से नहीं आता; निवृत्ति के अपने आप का गुण है।

421 · दृष्ट दुखों में अनुद्वेग, विद्या का फल

दृष्टदुःखेष्वनुद्वेगो विद्यायाः प्रस्तुतं फलम् ।
यत्कृतं भ्रान्तिवेलायां नाना कर्म जुगुप्सितम् पश्चान्नरो विवेकेन तत्कथं कर्तुमर्हति ॥ 421 ॥

dṛṣṭa-duḥkheṣv anudvego vidyāyāḥ prastutaṁ phalam · yat kṛtaṁ bhrānti-velāyāṁ nānā karma jugupsitam paścān naro vivekena tat kathaṁ kartum arhati

शब्दार्थ: दृष्ट-दुःखेषु अनुद्वेगः · दिख रहे दुखों में अनुद्वेग (न उद्वेग) · विद्यायाः प्रस्तुतं फलम् · विद्या का प्रत्यक्ष फल · यत् कृतं भ्रान्ति-वेलायां नाना कर्म जुगुप्सितम् · जो भ्रम-समय में किए, अनेक जुगुप्सित कर्म · पश्चात् नरः विवेकेन तत् कथं कर्तुम् अर्हति · बाद में मनुष्य विवेक से वह कैसे करने योग्य।

अर्थ: दिख रहे दुखों में अनुद्वेग, यह विद्या का प्रत्यक्ष फल है। जो भ्रम-समय में अनेक जुगुप्सित कर्म किए, क्या मनुष्य बाद में, विवेक के बाद, वह करने योग्य है?

भावार्थ: गुरु एक बहुत व्यावहारिक परीक्षा देते हैं, “विद्या” का फल क्या है? बस यह: दुखों में अब वैसा घबराहट नहीं होता।

दुख तो आएँगे, बीमारी, हार, अपमान। फ़र्क इसमें है कि क्या आप उनसे “उद्वेग” में आते हैं या “अनुद्वेग” में रहते हैं। यह विद्या का असली प्रमाण है। और दूसरी बात, पुराने भ्रम के समय किए गए “जुगुप्सित” (निंदा-योग्य) काम, विवेक आने पर वे काम बंद हो जाते हैं, क्योंकि अब वे “करने योग्य” नहीं दिखते।

422 · विद्या का फल, असत् से निवृत्ति; अज्ञान का, प्रवृत्ति

विद्याफलं स्यादसतो निवृत्तिः प्रवृत्तिरज्ञानफलं तदीक्षितम् ।
तज्ज्ञाज्ञयोर्यन्मृगतृष्णिकादौ नोचेद्विदां दृष्टफलं किमस्मात् ॥ 422 ॥

vidyā-phalaṁ syād asato nivṛttiḥ pravṛttir ajñāna-phalaṁ tad īkṣitam · taj-jñājñayor yan mṛga-tṛṣṇikādau noced vidāṁ dṛṣṭa-phalaṁ kim asmāt

शब्दार्थ: विद्या-फलं स्याद् असतः निवृत्तिः · विद्या का फल असत् से निवृत्ति · प्रवृत्तिः अज्ञान-फलं तत् ईक्षितम् · प्रवृत्ति अज्ञान का फल, यह देखा गया · तत्-ज्ञ-अज्ञयोः यद् मृग-तृष्णिका-आदौ · मरीचिका आदि के जानने वाले और अनजान में जो [फ़र्क] · नो चेद् विदां दृष्ट-फलं किम् अस्मात् · नहीं तो विद्वानों को इससे क्या प्रत्यक्ष फल।

अर्थ: विद्या का फल है, असत् से निवृत्ति। प्रवृत्ति अज्ञान का फल, यह देखा गया है, मरीचिका आदि के जानने वाले और न जानने वाले में [फ़र्क की तरह]। नहीं तो, विद्वानों को इस [विद्या] से क्या प्रत्यक्ष फल?

भावार्थ: गुरु एक प्यारी, साफ़ कसौटी देते हैं, मरीचिका वाला।

एक प्यासा आदमी मरीचिका को पानी समझ कर उसकी तरफ़ “प्रवृत्त” (दौड़ता) हो जाता है, यह अज्ञान का फल है। एक जानकार उसी मरीचिका से “निवृत्त” रहता है, यह विद्या का फल है। और यह फ़र्क प्रत्यक्ष है, सिद्धांत नहीं। अगर आपको विद्या मिली है, तो आपकी असत् चीज़ों की तरफ़ की दौड़ कम होगी, यह कसौटी है।

423 · हृदय-ग्रंथि का नाश, अनिच्छ को विषय में प्रवृत्ति कैसे

अज्ञानहृदयग्रन्थेर्विनाशो यद्यशेषतः ।
अनिच्छोर्विषयः किं नु प्रवृत्तेः कारणं स्वतः ॥ 423 ॥

ajñāna-hṛdaya-granther vināśo yady aśeṣataḥ · anicchor viṣayaḥ kiṁ nu pravṛtteḥ kāraṇaṁ svataḥ

शब्दार्थ: अज्ञान-हृदय-ग्रन्थेः विनाशः यदि अशेषतः · अज्ञान की हृदय-ग्रंथि का नाश अगर पूरा हो · अनिच्छोः विषयः किं नु प्रवृत्तेः कारणं स्वतः · अनिच्छुक के लिए विषय अपने आप कैसे प्रवृत्ति का कारण।

अर्थ: अगर अज्ञान की हृदय-ग्रंथि का नाश पूरा हुआ है, तो अनिच्छुक के लिए विषय अपने आप कैसे प्रवृत्ति का कारण बनेगा?

भावार्थ: गुरु एक तर्क देते हैं, एक बार “हृदय-ग्रंथि” टूटी, तो विषयों की पुकार अपने आप ठंडी पड़ जाती है।

“हृदय-ग्रंथि”, हृदय की गाँठ, मुख्यतः है “मैं शरीर हूँ” वाली पहचान। यह गाँठ खुली, तो विषयों में “मेरा सुख” बाक़ी नहीं रहता। फिर विषय सामने हों, वे अब अपने आप आपको खींच नहीं सकते। प्रवृत्ति अपने आप नहीं होती; यह पुरानी पहचान का खेल था, जो अब नहीं।

424 · वैराग्य, बोध, उपरति की पराकाष्ठा

वासनानुदयो भोग्ये वैरागस्य तदावधिः ।
अहंभावोदयाभावो बोधस्य परमावधिः लीनवृत्तैरनुत्पत्तिर्मर्यादोपरतेस्तु सा ॥ 424 ॥

vāsanānudayo bhogye vairāgyasya tadāvadhiḥ · ahaṁ-bhāvodayābhāvo bodhasya paramāvadhiḥ līna-vṛttair anutpattir maryādoparates tu sā

शब्दार्थ: वासना-अनुदयः भोग्ये · भोग्य में वासना का न उठना · वैराग्यस्य तत्-अवधिः · वैराग्य की वही सीमा · अहं-भाव-उदय-अभावः · अहं-भाव का उठना न होना · बोधस्य परम-अवधिः · बोध की परम सीमा · लीन-वृत्तैः अनुत्पत्तिः · लीन-वृत्तियों का दोबारा न उपजना · मर्यादा-उपरतेः तु सा · वही उपरति की सीमा।

अर्थ: भोग्य चीज़ों में वासना का न उठना, वैराग्य की सीमा। अहं-भाव का न उठना, बोध की परम सीमा। लीन-वृत्तियों का दोबारा न उपजना, उपरति की सीमा।

भावार्थ: गुरु तीनों, वैराग्य, बोध, उपरति, की “अंतिम कसौटी” देते हैं। हर एक के लिए एक साफ़, बारीक टेस्ट।

वैराग्य की सीमा, भोग्य चीज़ देख कर भी वासना न उठे। बोध की सीमा, कुछ भी हो, “मैं” का अहंकार न जागे। उपरति की सीमा, मन की पुरानी आदतें, जो “लीन” हो गई हैं, दोबारा सिर न उठाएँ। ये तीनों कसौटियाँ अंतिम हैं, इनसे कम होंगे, तो काम बाक़ी है।

425 · ब्रह्म-आकार में स्थित, सोते-बच्चे की तरह दुनिया देखता

ब्रह्माकारतया सदा स्थिततया निर्मुक्तबाह्यार्थधीर् अन्यावेदितभोग्यभोगकलनो निद्रालुवद्बालवत् ।
स्वप्नालोकितलोकवज्जगदिदं पश्यन् क्वचिल्लब्धधीर् आस्ते कश्चिदनन्तपुण्यफलभुग्धन्यः स मान्यो भुवि ॥ 425 ॥

brahmākāra-tayā sadā sthita-tayā nirmukta-bāhyārtha-dhīr anyāvedita-bhogya-bhoga-kalano nidrāluvad bālavat · svapnālokita-loka-vaj jagad idaṁ paśyan kvacil labdha-dhīr āste kaścid ananta-puṇya-phala-bhug dhanyaḥ sa mānyo bhuvi

शब्दार्थ: ब्रह्म-आकार-तया सदा स्थिततया · ब्रह्म-आकार में सदा स्थित होने से · निर्मुक्त-बाह्य-अर्थ-धीः · बाहरी पदार्थों की बुद्धि से मुक्त · अन्य-आवेदित-भोग्य-भोग-कलनः · दूसरों के बताए भोग्य से भोग का अनुमान · निद्रालु-वत् बाल-वत् · नींद-में डूबे की तरह, बच्चे की तरह · स्वप्न-आलोकित-लोक-वत् · सपने में देखी दुनिया की तरह · जगद् इदं पश्यन् क्वचित् लब्ध-धीः आस्ते · इस जगत को देखता हुआ कहीं, ज्ञान-प्राप्त बैठा रहता · कश्चिद् अनन्त-पुण्य-फल-भुग्-धन्यः सः मान्यः भुवि · कोई अनंत-पुण्य-फल का भोगने वाला, धन्य, धरती पर माननीय।

अर्थ: ब्रह्म-आकार में सदा स्थित होने से, बाहरी पदार्थों की बुद्धि से मुक्त; भोग्य का अनुमान दूसरों के बताने पर लगाता है; नींद-में डूबे की तरह, बच्चे की तरह; इस जगत को सपने में देखी दुनिया की तरह देखता हुआ, कहीं ज्ञान-प्राप्त बैठा रहता है। कोई अनंत-पुण्य-फल भोगने वाला, धन्य, धरती पर माननीय।

भावार्थ: गुरु एक अद्भुत तस्वीर देते हैं, जीवन्मुक्त की रोज़ की ज़िंदगी। “निद्रालु-वत् बाल-वत्”, नींद में डूबे की तरह, बच्चे की तरह।

एक बच्चा खाना नहीं माँगता, माँ देती है, खा लेता है। एक नींद में डूबा आदमी विचार नहीं करता, चीज़ें चलती रहती हैं। जीवन्मुक्त भी ऐसा है, दुनिया चलती रहती है, उसे ले जाती है, पर वह उसमें “मैं चला रहा हूँ” नहीं डालता। और एक प्यारी पंक्ति, “जगत को सपने में देखी दुनिया की तरह देखता है।” यह सबसे सटीक वर्णन है।

426 · स्थितप्रज्ञ यति, ब्रह्म में विलीन, निर्विकार, निष्क्रिय

स्थितप्रज्ञो यतिरयं यः सदानन्दमश्नुते ।
ब्रह्मण्येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिष्क्रियः ॥ 426 ॥

sthita-prajño yatir ayaṁ yaḥ sadānandam aśnute · brahmaṇy eva vilīnātmā nirvikāro viniṣkriyaḥ

शब्दार्थ: स्थित-प्रज्ञः यतिः अयं · यह स्थितप्रज्ञ यति · यः सदा-आनन्दम् अश्नुते · जो सदा-आनंद का भोग करता · ब्रह्मणि एव विलीन-आत्मा · ब्रह्म में ही विलीन-आत्मा · निर्विकारः विनिष्क्रियः · निर्विकार, निष्क्रिय।

अर्थ: यह स्थितप्रज्ञ यति है, जो सदा-आनंद का भोग करता है, ब्रह्म में ही विलीन-आत्मा, निर्विकार, निष्क्रिय।

भावार्थ: गुरु गीता के एक प्रसिद्ध शब्द को लाते हैं, “स्थितप्रज्ञ।” गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन ने पूछा था: स्थितप्रज्ञ की क्या पहचान है?

शंकर तीन शब्दों में जवाब देते हैं: ब्रह्म में विलीन, निर्विकार, निष्क्रिय। और एक स्थायी फल, सदा-आनंद का भोग। यह कोई पल-भर का सुख नहीं। यह स्थायी “खाना” है। आनंद यहाँ “अश्नुते” (खाता है) क्रिया से जुड़ा है, मानो वह रोज़ का भोजन हो।

427 · प्रज्ञा क्या, सुस्थित प्रज्ञा वाला स्थितप्रज्ञ

ब्रह्मात्मनोः शोधितयोरेकभावावगाहिनी ।
निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते सुस्थितासौ भवेद्यस्य स्थितप्रज्ञः स उच्यते ॥ 427 ॥

brahmātmanoḥ śodhitayor eka-bhāvāvagāhinī · nirvikalpā ca cin-mātrā vṛttiḥ prajñeti kathyate susthitāsau bhaved yasya sthita-prajñaḥ sa ucyate

शब्दार्थ: ब्रह्म-आत्मनोः शोधितयोः एक-भाव-अवगाहिनी · शुद्ध हुए ब्रह्म और आत्मा की एकता में डूबने वाली · निर्विकल्पा च चिन्-मात्रा वृत्तिः · निर्विकल्प और चिन्-मात्र वृत्ति · प्रज्ञा इति कथ्यते · प्रज्ञा कही जाती है · सुस्थिता असौ भवेद् यस्य स्थित-प्रज्ञः सः उच्यते · जिसकी सुस्थित हो, वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता।

अर्थ: शुद्ध हुए ब्रह्म और आत्मा की एकता में डूबने वाली, निर्विकल्प, चिन्-मात्र वृत्ति, यह “प्रज्ञा” कही जाती है। जिसकी यह सुस्थित हो जाए, वह “स्थितप्रज्ञ” कहलाता है।

भावार्थ: गुरु “प्रज्ञा” और “स्थितप्रज्ञ” को एकदम साफ़ शब्दों में परिभाषित करते हैं।

प्रज्ञा = एक ख़ास तरह की वृत्ति (मानसिक धारा), जो ब्रह्म-आत्मा की एकता में डूबती है, निर्विकल्प है (विकल्पों से मुक्त), और चिन्-मात्र है (बस चेतना)। और यह वृत्ति “सुस्थित”, मज़बूत, स्थिर, हो जाए, तब वह व्यक्ति “स्थितप्रज्ञ।” यानी प्रज्ञा “होती” नहीं। “टिकती” है। टिकाना ही काम है।

428 · जीवन्मुक्त की पहली परिभाषा, स्थित प्रज्ञा, निरंतर आनंद, संसार भूला-सा

यस्य स्थिता भवेत्प्रज्ञा यस्यानन्दो निरन्तरः ।
प्रपञ्चो विस्मृतप्रायः स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ 428 ॥

yasya sthitā bhavet prajñā yasyānando nirantaraḥ · prapañco vismṛta-prāyaḥ sa jīvan-mukta iṣyate

शब्दार्थ: यस्य स्थिता भवेत् प्रज्ञा · जिसकी प्रज्ञा स्थित हो · यस्य आनन्दः निरन्तरः · जिसका आनंद निरंतर · प्रपञ्चः विस्मृत-प्रायः · प्रपंच लगभग भूला हुआ · सः जीवन्मुक्तः इष्यते · वह जीवन्मुक्त माना जाता है।

अर्थ: जिसकी प्रज्ञा स्थित हो, जिसका आनंद निरंतर हो, और जिसके लिए प्रपंच (दुनिया) लगभग भूला हुआ हो, वह जीवन्मुक्त माना जाता है।

भावार्थ: यह जीवन्मुक्त की पहली, संक्षिप्त, सटीक परिभाषा है, तीन गुणों में।

स्थित प्रज्ञा (वह वृत्ति जो ब्रह्म-आत्मा-एकता में टिकी है), निरंतर आनंद (रुकने वाला नहीं), और प्रपंच का “विस्मृत-प्राय” (भूले-जैसा) हो जाना। तीसरा शब्द बहुत बारीक है, “विस्मृत-प्राय।” यानी दुनिया पूरी तरह “भूल” नहीं गई, बस “भूले-जैसी” हो गई। दिखती है, पर अब कोई पकड़ नहीं। यह जीवन्मुक्ति का बहुत सजीव चित्र है।

429 · दूसरी परिभाषा, लीन-धी जागता है, पर जागृति-धर्मों से मुक्त

लीनधीरपि जागर्ति जाग्रद्धर्मविवर्जितः ।
बोधो निर्वासनो यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ 429 ॥

līna-dhīr api jāgarti jāgrad-dharma-vivarjitaḥ · bodho nirvāsano yasya sa jīvan-mukta iṣyate

शब्दार्थ: लीन-धीः अपि जागर्ति · लीन-बुद्धि भी जागता है · जाग्रद्-धर्म-विवर्जितः · जागृति के धर्मों से मुक्त · बोधः निर्वासनः यस्य · जिसका बोध निर्वासन (वासना-शून्य) · सः जीवन्मुक्तः इष्यते · वह जीवन्मुक्त माना जाता है।

अर्थ: जिसकी बुद्धि लीन (समाधि-स्थ) हो कर भी वह जागता है, पर जागृति के सामान्य धर्मों से मुक्त है, और जिसका बोध वासना-शून्य है, वह जीवन्मुक्त माना जाता है।

भावार्थ: यह जीवन्मुक्त की दूसरी सुंदर परिभाषा है, “लीन-धी, पर जागृत।”

आम तौर पर जब बुद्धि “लीन” होती है, सुषुप्ति, समाधि, तब हम जागृत नहीं रहते। जागृत होते हैं, तब बुद्धि “चालू”, विचार-व्यवहार में डूबी। पर जीवन्मुक्त एक तीसरी अवस्था में है, जागृत भी, और साथ ही बुद्धि “लीन।” बाहर सब काम कर रहा, अंदर सब शांत। और बोध “निर्वासन”, कोई वासना उसे नहीं हिलाती।

430 · तीसरी परिभाषा, संसार-चिंतन शांत, चित्त निश्चिंत

शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः ।
यस्य चित्तं विनिश्चिन्तं स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ 430 ॥

śānta-saṁsāra-kalanaḥ kalāvān api niṣkalaḥ · yasya cittaṁ viniścintaṁ sa jīvan-mukta iṣyate

शब्दार्थ: शान्त-संसार-कलनः · संसार की कलना (कल्पना) शांत · कला-वान् अपि निष्कलः · कलाओं (हिस्सों) वाला हो कर भी निष्कल · यस्य चित्तं विनिश्चिन्तं · जिसका चित्त निश्चिंत · सः जीवन्मुक्तः इष्यते · वह जीवन्मुक्त माना जाता है।

अर्थ: जिसके लिए संसार की कल्पना शांत हो गई है, जो कलाओं (अंगों, हिस्सों) वाला हो कर भी निष्कल है, और जिसका चित्त निश्चिंत है, वह जीवन्मुक्त माना जाता है।

भावार्थ: गुरु एक अद्भुत विरोधाभास देते हैं, “कलावान् अपि निष्कलः।” अंगों वाला हो कर भी, निष्कल।

शरीर दिखता है, अंग हैं, पर जीवन्मुक्त की पहचान “अंगों” से नहीं। उसकी पहचान निष्कल (अंग-रहित) चेतना से है। और “विनिश्चिंतम्”, निश्चिंत। चिंताएँ हो सकती हैं, काम, पैसा, स्वास्थ्य, पर “चित्त” वहाँ नहीं फँसता। यह स्वतंत्रता की एक बहुत व्यावहारिक झलक है।

431 · वर्तमान देह में भी, अहंता-ममता का अभाव

वर्तमानेऽपि देहेऽस्मिञ्छायावदनुवर्तिनि ।
अहन्ताममताभावो जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 431 ॥

vartamāne’pi dehe’smiñ chāyāvad anuvartini · ahantā-mamatā-bhāvo jīvan-muktasya lakṣaṇam

शब्दार्थ: वर्तमाने अपि देहे अस्मिन् · इस वर्तमान देह में भी · छाया-वत् अनुवर्तिनि · परछाई की तरह साथ चलने वाले · अहन्ता-ममता-अभावः · “मैं”, “मेरा” का अभाव · जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् · जीवन्मुक्त का लक्षण।

अर्थ: इस वर्तमान देह में भी, जो परछाई की तरह साथ चलती है, “मैं” और “मेरा” का अभाव होना, जीवन्मुक्त का लक्षण है।

भावार्थ: यहाँ से सोलह लक्षणों की प्यारी, गहन शृंखला शुरू होती है। पहला लक्षण: अहंता-ममता का अभाव।

देह है, चल रही है, पर “यह मैं हूँ” और “यह मेरा है” वाली पकड़ नहीं। यह सबसे बुनियादी लक्षण है, और सबसे मुश्किल भी। कोई भी अध्यात्म-प्रेमी जान सकता है कि “मैं देह नहीं हूँ”, पर रोज़ की भागदौड़ में यह बोध टिकाना? वहीं असली परीक्षा है।

432 · बीते का अनुसंधान नहीं। की चिंता नहीं। उदासीनता

अतीताननुसन्धानं भविष्यदविचारणम् ।
अउदासीन्यमपि प्राप्तं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 432 ॥

atītānanusandhānaṁ bhaviṣyad-avicāraṇam · audāsīnyam api prāptaṁ jīvan-muktasya lakṣaṇam

शब्दार्थ: अतीत-अननुसन्धानं · बीते का अनुसंधान नहीं · भविष्यद्-अविचारणम् · का अविचार · औदासीन्यम् अपि प्राप्तं · वर्तमान में भी उदासीनता आ चुकी · जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् · जीवन्मुक्त का लक्षण।

अर्थ: बीते का अनुसंधान (बार-बार सोचना) नहीं। का विचार नहीं। और वर्तमान [प्राप्त] में भी उदासीनता, यह जीवन्मुक्त का लक्षण है।

भावार्थ: गुरु तीन काल, भूत, भविष्य, वर्तमान, में जीवन्मुक्त की स्थिति बताते हैं।

भूत के लिए, कोई बार-बार सोच नहीं। भविष्य के लिए, कोई योजना-चिंता नहीं। वर्तमान के लिए, उदासीनता, यानी जो उसमें कोई पकड़ नहीं। यह “वर्तमान में जीने” का सबसे ऊँचा रूप है। आज के “mindfulness” वाले इसे थोड़ा कम कह कर “वर्तमान में रहो” कहते हैं, पर शंकर एक कदम आगे जाते हैं: वर्तमान में भी पकड़ नहीं।

433 · गुण-दोष भरे इस [विश्व] में सर्वत्र समदर्शिता

गुणदोषविशिष्टेऽस्मिन्स्वभावेन विलक्षणे ।
सर्वत्र समदर्शित्वं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 433 ॥

guṇa-doṣa-viśiṣṭe’smin svabhāvena vilakṣaṇe · sarvatra sama-darśitvaṁ jīvan-muktasya lakṣaṇam

शब्दार्थ: गुण-दोष-विशिष्टे अस्मिन् · इस गुण-दोष भरे में · स्वभावेन विलक्षणे · स्वभाव से विविध · सर्वत्र सम-दर्शित्वं · सर्वत्र समदर्शिता · जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् · जीवन्मुक्त का लक्षण।

अर्थ: इस गुण-दोष भरे, स्वभाव से विविध [संसार] में, सर्वत्र समदर्शी होना, जीवन्मुक्त का लक्षण है।

भावार्थ: गुरु एक ख़ास बात कहते हैं, दुनिया तो वैसी ही है, गुण-दोष से भरी, अनेक प्रकार की। यह बदलती नहीं। बदलती है, देखने वाले की दृष्टि।

“सम-दर्शिता”, हर जगह एक देखना। यह मतलब नहीं कि गुण-दोष में फ़र्क नहीं देखता; मतलब है, हर जगह उसी एक आत्मा को देखता है। एक भिखारी हो या राजा, एक शत्रु हो या मित्र, पीछे एक ही चेतना। बाहर के फ़र्क दिखते हैं, पर “मूल” में सब एक।

434 · इष्ट-अनिष्ट दोनों में, सम-दर्शिता और अविकार

इष्टानिष्टार्थसम्प्राप्तौ समदर्शितयात्मनि ।
उभयत्राविकारित्वं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 434 ॥

iṣṭāniṣṭārtha-samprāptau sama-darśitayātmani · ubhayatrāvikāritvaṁ jīvan-muktasya lakṣaṇam

शब्दार्थ: इष्ट-अनिष्ट-अर्थ-सम्प्राप्तौ · इष्ट और अनिष्ट चीज़ों की प्राप्ति में · सम-दर्शितया आत्मनि · आत्मा में समदर्शिता से · उभयत्र अविकारित्वं · दोनों जगह अविकार · जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् · जीवन्मुक्त का लक्षण।

अर्थ: इष्ट (मनचाही) और अनिष्ट (अनचाही) चीज़ों की प्राप्ति में, आत्मा में समदर्शिता से, दोनों जगह अविकार (बेअसर रहना), जीवन्मुक्त का लक्षण है।

भावार्थ: यह सबसे रोज़मर्रा, और सबसे कड़ा लक्षण है। इष्ट मिले, खुश; अनिष्ट मिले, दुखी। यह सबकी आदत।

जीवन्मुक्त की पहचान: दोनों जगह “अविकार”, कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मन-स्थिति में कोई हल-चल नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि कुछ अनुभव नहीं होता, होता है, पर वह “विकार” नहीं बनता। एक स्थिर झील में पत्थर गिरने से छोटी लहर उठती है, पर झील झील रहती है। जीवन्मुक्त वैसा।

435 · ब्रह्मानंद-रस में चित्त, अंदर-बाहर का “अविज्ञान”

ब्रह्मानन्दरसास्वादासक्तचित्ततया यतेः ।
अन्तर्बहिरविज्ञानं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ 435 ॥

brahmānanda-rasāsvādāsakta-cittatayā yateḥ · antar-bahir-avijñānaṁ jīvan-muktasya lakṣaṇam

शब्दार्थ: ब्रह्म-आनन्द-रस-आस्वाद-आसक्त-चित्ततया · ब्रह्मानंद-रस के स्वाद में आसक्त चित्त होने से · यतेः अन्तर्-बहिः-अविज्ञानं · यति को अंदर-बाहर का अविज्ञान · जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् · जीवन्मुक्त का लक्षण।

अर्थ: ब्रह्मानंद-रस के स्वाद में आसक्त चित्त होने से, यति को अंदर-बाहर का “अविज्ञान” (फ़र्क का न पता), जीवन्मुक्त का लक्षण है।

भावार्थ: “अंदर-बाहर का अविज्ञान”, एक प्यारा, सूक्ष्म शब्द। यानी “बाहर का जगत” और “अंदर का अनुभव”, इनमें अब फ़र्क नहीं रहता।

आम तौर पर हम अंदर-बाहर में बँटे रहते हैं, बाहर काम, अंदर हलचल। पर जब चित्त एकदम ब्रह्मानंद-रस में डूब जाए, तो यह बँटवारा घुल जाता है। न “अंदर,” न “बाहर”, बस एक रस। यह आत्म-अनुभव की एक बेहद अंतरंग झलक है।

436 · देह-इन्द्रिय के काम में, “मैं”, “मेरा” वर्जित, उदासीनता से

देहेन्द्रियादौ कर्तव्ये ममाहंभाववर्जितः ।
अउदासीन्येन यस्तिष्ठेत्स जीवन्मुक्तलक्षणः ॥ 436 ॥

dehendriyādau kartavye mamāhaṁ-bhāva-varjitaḥ · audāsīnyena yas tiṣṭhet sa jīvan-mukta-lakṣaṇaḥ

शब्दार्थ: देह-इन्द्रिय-आदौ कर्तव्ये · देह-इन्द्रिय आदि के कर्तव्य में · मम-अहं-भाव-वर्जितः · “मैं-मेरा” भाव से वर्जित · औदासीन्येन यः तिष्ठेत् · उदासीनता से जो खड़ा रहे · सः जीवन्मुक्त-लक्षणः · वह जीवन्मुक्त लक्षण वाला।

अर्थ: देह-इन्द्रिय आदि के कर्तव्य में, “मैं-मेरा” भाव से वर्जित, उदासीनता से जो खड़ा रहे, वह जीवन्मुक्त लक्षण वाला है।

भावार्थ: यह बहुत व्यावहारिक है। देह को खाना देना है, इन्द्रियों के काम चलाने हैं, काम तो होते रहते हैं।

फ़र्क: जीवन्मुक्त इन कामों में “मैं कर रहा हूँ”, “यह मेरा है” नहीं डालता। काम चलता है, शरीर अपने आप करता है, मानो उससे कुछ अलग बैठा देख रहा हैं। “उदासीनता”, यह उपेक्षा नहीं। बल्कि “अलगाव” है। काम होता है, करनेवाला नहीं।

437 · श्रुति-बल से ब्रह्म-भाव जान, भव-बंधन से मुक्त

विज्ञात आत्मनो यस्य ब्रह्मभावः श्रुतेर्बलात् ।
भवबन्धविनिर्मुक्तः स जीवन्मुक्तलक्षणः ॥ 437 ॥

vijñāta ātmano yasya brahma-bhāvaḥ śruter balāt · bhava-bandha-vinirmuktaḥ sa jīvan-mukta-lakṣaṇaḥ

शब्दार्थ: विज्ञातः आत्मनः यस्य ब्रह्म-भावः · जिसने अपनी आत्मा का ब्रह्म-भाव जाना · श्रुतेः बलात् · श्रुति के बल से · भव-बन्ध-विनिर्मुक्तः · संसार-बंधन से विनिर्मुक्त · सः जीवन्मुक्त-लक्षणः · वह जीवन्मुक्त लक्षण वाला।

अर्थ: जिसने अपनी आत्मा का ब्रह्म-भाव श्रुति के बल से जाना है, और संसार-बंधन से विनिर्मुक्त है, वह जीवन्मुक्त लक्षण वाला है।

भावार्थ: गुरु एक प्यारा शब्द देते हैं, “श्रुतेः बलात्”, श्रुति के बल से। यानी यह बोध अकेले अपनी अटकल से नहीं। परम्परागत वचनों के सहारे, पक्की नींव पर खड़ा है।

अपनी जिज्ञासा अच्छी है, अपना अनुभव ज़रूरी है, पर “श्रुति का बल” इसको प्रामाणिकता देता है। बस “मुझे महसूस हुआ” से आगे जा कर, “यह वही है जो हमेशा से बताया गया”, यह एक मज़बूत आधार है।

438 · देह-इन्द्रियों में “मैं” नहीं। अन्य में “यह” नहीं

देहेन्द्रियेष्वहंभाव इदंभावस्तदन्यके ।
यस्य नो भवतः क्वापि स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ 438 ॥

dehendriyeṣv ahaṁ-bhāva idaṁ-bhāvas tad-anyake · yasya no bhavataḥ kvāpi sa jīvan-mukta iṣyate

शब्दार्थ: देह-इन्द्रियेषु अहं-भावः · देह-इन्द्रियों में “मैं” भाव · इदं-भावः तद्-अन्यके · “यह” भाव उनसे अलग में · यस्य नो भवतः क्वापि · जिसको कहीं नहीं होते · सः जीवन्मुक्तः इष्यते · वह जीवन्मुक्त माना जाता।

अर्थ: देह-इन्द्रियों में “मैं” भाव, और उनसे अलग (बाहर) चीज़ों में “यह” भाव, जिसको ये कहीं नहीं होते, वह जीवन्मुक्त माना जाता है।

भावार्थ: गुरु अद्वैत की एक बहुत बारीक बात कहते हैं, “मैं” और “यह” दोनों जोड़े हैं। एक हो, तो दूसरा अपने आप।

जब “मैं देह हूँ” होता है, तो बाक़ी सब “यह दूसरा है” बनता है। दोनों एक साथ। जीवन्मुक्त में दोनों नहीं। न अपने में “मैं”, न दूसरों में “यह”। तो क्या बचा? बस एक चेतना, बिना सीमा, बिना बँटवारा। यह अद्वैत की सबसे साफ़ रोज़मर्रा झलक है।

439 · प्रत्यक्-ब्रह्म, ब्रह्म-सर्ग, कोई भेद नहीं

न प्रत्यग्ब्रह्मणोर्भेदं कदापि ब्रह्मसर्गयोः ।
प्रज्ञया यो विजानिति स जीवन्मुक्तलक्षणः ॥ 439 ॥

na pratyag-brahmaṇor bhedaṁ kadāpi brahma-sargayoḥ · prajñayā yo vijānīti sa jīvan-mukta-lakṣaṇaḥ

शब्दार्थ: न प्रत्यग्-ब्रह्मणोः भेदं कदापि · प्रत्यक्-आत्मा और ब्रह्म में कभी भेद नहीं · ब्रह्म-सर्गयोः · और ब्रह्म-सृष्टि में [भेद नहीं] · प्रज्ञया यः विजानीति · प्रज्ञा से जो जानता · सः जीवन्मुक्त-लक्षणः · वह जीवन्मुक्त लक्षण वाला।

अर्थ: भीतर के “मैं” (प्रत्यग्-आत्मा) और ब्रह्म में, और ब्रह्म और उसकी सृष्टि में, कभी भेद नहीं। जो प्रज्ञा से जानता है, वह जीवन्मुक्त लक्षण वाला है।

भावार्थ: गुरु दो स्तर के अद्वैत बताते हैं। पहला: भीतर का “मैं” और ब्रह्म, एक। दूसरा: ब्रह्म और सृष्टि, एक।

आम तौर पर लोग पहली एकता तक पहुँच जाते हैं, “मैं ब्रह्म हूँ।” पर दूसरी एकता, “यह सृष्टि भी ब्रह्म है”, यह कठिन है। जीवन्मुक्त दोनों एकताएँ “प्रज्ञा से” जानता है, बौद्धिक नहीं। अनुभव से। और तब हर चीज़ अद्वैत का चित्र बनती है।

440 · साधु पूजे या दुर्जन सताए, सम-भाव

साधुभिः पूज्यमानेऽस्मिन् पीड्यमानेऽपि दुर्जनैः ।
समभावो भवेद्यस्य स जीवन्मुक्तलक्षणः ॥ 440 ॥

sādhubhiḥ pūjyamāne’smin pīḍyamāne’pi durjanaiḥ · sama-bhāvo bhaved yasya sa jīvan-mukta-lakṣaṇaḥ

शब्दार्थ: साधुभिः पूज्यमाने अस्मिन् · इस [शरीर] के साधुओं द्वारा पूजे जाने पर · पीड्यमाने अपि दुर्जनैः · दुर्जनों द्वारा सताए जाने पर भी · सम-भावः भवेद् यस्य · जिसको सम-भाव हो · सः जीवन्मुक्त-लक्षणः · वह जीवन्मुक्त लक्षण वाला।

अर्थ: इस [शरीर] के साधुओं द्वारा पूजे जाने पर, और दुर्जनों द्वारा सताए जाने पर भी, जिसको सम-भाव हो, वह जीवन्मुक्त लक्षण वाला है।

भावार्थ: गुरु जीवन्मुक्ति का सबसे कड़ा लक्षण आख़िर में रखते हैं, सम्मान और अपमान में बराबरी।

यह सबसे मुश्किल है। साधु पूजें, अहंकार उठने का मौक़ा। दुर्जन सताएँ, क्रोध-दुख उठने का मौक़ा। ये दोनों मन की सबसे पुरानी प्रतिक्रियाएँ हैं। जीवन्मुक्त में दोनों नहीं। एक सम-भाव। यह तब आता है, जब “यह शरीर मैं हूँ” वाली पकड़ ख़त्म, फिर शरीर को पूजें या सताएँ, असली “मैं” से जुड़ता नहीं।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना: भाग 15, विषयों की नदी जीवन्मुक्त-समुद्र में घुलती है, बिना विकार उठाए। फिर तीन कर्मों (संचित, प्रारब्ध, का साफ़ विश्लेषण, और “एकमेव अद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन”, सात-श्लोकी टेक।

और एक काम जेब में रखिए: श्लोक 440 कहता है, साधु पूजें या दुर्जन सताएँ, सम-भाव। आज देखिए: इन हफ़्ते किसी ने तारीफ़ की, किसी ने उल्टा कहा। दोनों पर अंदर का प्रहार कितना अलग था? जितना अंतर, उतना अभी काम बाक़ी।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, verbatim।

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आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-23