विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 7 · पाँच कोश का दूसरा भाग, बुद्धि और आनंद · श्लोक 184-211
तीन परतें छिल चुकीं। अब दो सबसे सूक्ष्म बाक़ी हैं, बुद्धि की परत, और आनंद की। और बीच में शिष्य एक तीखा सवाल उठाता है: अगर बंधन अनादि है, तो वह कभी ख़त्म कैसे होंगे?
पहले एक बात
भाग 6 ने तीन परतें छीलीं, शरीर, प्राण, मन। यह भाग आख़िरी दो छीलता है, और वे सबसे बारीक हैं।
विज्ञानमय कोश, बुद्धि की परत। यही वह “मैं” है जो कहता है “मैं करता हूँ, मैं भोगता हूँ”, कर्ता और भोक्ता। यही “जीव” है। और आनंदमय कोश, आनंद की परत, जो गहरी नींद में सबसे साफ़ महसूस होती है। दोनों इतनी पास, इतनी सूक्ष्म हैं कि हम इन्हें ही “मैं” मान बैठते हैं।
और इस भाग का एक ख़ास पल है: बीच में, शिष्य रुक कर एक बेहद ज़रूरी सवाल पूछता है। अगर “जीव-भाव” अनादि है, हमेशा से चला आ रहा, तो वह कभी ख़त्म कैसे होंगे? यह सवाल हर सच्चे साधक के मन में उठता है, और गुरु इसका जवाब बहुत धैर्य से देते हैं। यही जवाब इस भाग का दिल है।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। तीन हिस्से, विज्ञानमय कोश (184-191), शिष्य का सवाल और गुरु का जवाब (192-206), आनंदमय कोश और समापन (207-211)। असली खंभे: 189 (कूटस्थ कर्ता बन जाता है), 193 (शिष्य का सवाल), 197 (रस्सी का साँप भ्रम भर रहता है), 211 (पाँचों के परे, साक्षी)। हर श्लोक पर anchor है।
184 · विज्ञानमय कोश, बुद्धि की परत
बुद्धिर्बुद्धीन्द्रियैः सार्धं सवृत्तिः कर्तृलक्षणः ।
विज्ञानमायाकोशः स्यात्पुंसः संसारकारणम् ॥ 184 ॥
buddhir buddhīndriyaiḥ sārdhaṁ sa-vṛttiḥ kartṛ-lakṣaṇaḥ · vijñāna-mayā-kośaḥ syāt puṁsaḥ saṁsāra-kāraṇam
शब्दार्थ: बुद्धिः बुद्धि-इन्द्रियैः सार्धम् · बुद्धि, ज्ञान-इन्द्रियों के साथ · स-वृत्तिः · अपनी हलचलों सहित · कर्तृ-लक्षणः · “कर्ता” की पहचान वाला · विज्ञानमय-कोशः · विज्ञानमय कोश · पुंसः संसार-कारणम् · मनुष्य के संसार का कारण।
अर्थ: बुद्धि, ज्ञान-इन्द्रियों के साथ, अपनी हलचलों सहित, “कर्ता” की पहचान वाली, यह विज्ञानमय कोश है, मनुष्य के संसार का कारण।
भावार्थ: चौथी परत, विज्ञानमय कोश, बुद्धि की परत। और इसकी पहचान एक शब्द में है: “कर्तृ”, कर्ता।
मनोमय कोश (मन) इच्छा करता, शक करता था। विज्ञानमय कोश इससे एक कदम गहरा है, यह वह है जो “मैं कर रहा हूँ” का दावा करता है, जो निर्णय लेता है, जो ख़ुद को इस पूरे खेल का करने वाला मानता है। और गुरु इसे सीधे “संसार-कारण” कह देते हैं, यही “मैं कर्ता हूँ” वाला भाव ही संसार-चक्र की धुरी है। यह परत सबसे क़रीब है, सबसे “मैं” जैसी लगती है, इसीलिए सबसे चुनौती भरी।
185 · चेतना का प्रतिबिंब
अनुव्रजच्चित्प्रतिबिम्बशक्तिः विज्ञानसंज्ञः प्रकृतेर्विकारः ।
ज्ञानक्रियावानहमित्यजस्रं देहेन्द्रियादिष्वभिमन्यते भृशम् ॥ 185 ॥
anuvrajac-cit-pratibimba-śaktiḥ vijñāna-saṁjñaḥ prakṛter vikāraḥ · jñāna-kriyāvān aham ity ajasraṁ dehendriyādiṣv abhimanyate bhṛśam
शब्दार्थ: अनुव्रजत्-चित्-प्रतिबिम्ब-शक्तिः · चेतना का प्रतिबिंब अपने साथ लिए · विज्ञान-संज्ञः · “विज्ञान” नाम वाला · प्रकृतेः विकारः · प्रकृति का एक रूप · ज्ञान-क्रियावान् · जानने और करने वाला · अहम् इति अभिमन्यते · “मैं” मान बैठता है · देह-इन्द्रिय-आदिषु भृशम् · शरीर-इन्द्रिय आदि में, ज़ोर से।
अर्थ: “विज्ञान” नाम वाला यह कोश, चेतना का प्रतिबिंब अपने साथ लिए, प्रकृति का एक रूप है। जानने और करने वाला बन कर, यह लगातार, ज़ोर से, शरीर-इन्द्रिय आदि में “मैं” मान बैठता है।
भावार्थ: एक शब्द यहाँ सब कुछ खोल देता है, “प्रतिबिंब”, परावर्तित रोशनी (भाग 4, श्लोक 103 की याद)।
बुद्धि अपने आप जड़ है, “प्रकृति का एक रूप।” पर वह आत्मा की चेतना का प्रतिबिंब अपने भीतर ले लेती है, जैसे साफ़ पानी चाँद को प्रतिबिंबित कर लेता है। और फिर वह “जागरूक” दिखने लगती है। यहाँ असली गड़बड़ शुरू होती है: यह उधार की रोशनी वाली बुद्धि “मैं” का दावा कर बैठती है, और शरीर-इन्द्रियों से अपने आप को जोड़ लेती है। पानी चाँद की रोशनी पा कर सोचने लगे “मैं चमकता हूँ”, यही विज्ञानमय कोश की भूल है।
186 · जीव, कर्म और वासना ढोने वाला
अनादिकालोऽयमहंस्वभावो जीवः समस्तव्यवहारवोढा ।
करोति कर्माण्यपि पूर्ववासनः पुण्यान्यपुण्यानि च तत्फलानि ॥ 186 ॥
anādi-kālo’yam ahaṁ-svabhāvo jīvaḥ samasta-vyavahāra-voḍhā · karoti karmāṇy api pūrva-vāsanaḥ puṇyāny apuṇyāni ca tat-phalāni
शब्दार्थ: अनादि-कालः अहं-स्वभावः · अनादि काल से “मैं” स्वभाव वाला · जीवः समस्त-व्यवहार-वोढा · जीव, सारे व्यवहार का बोझ ढोने वाला · पूर्व-वासनः · पुरानी वासनाओं वाला · करोति कर्माणि पुण्यानि अपुण्यानि · पुण्य-पाप कर्म करता है · तत्-फलानि · और उनके फल।
अर्थ: अनादि काल से “मैं” स्वभाव वाला यह जीव, सारे व्यवहार का बोझ ढोने वाला है। पुरानी वासनाओं से चलता हुआ, यह पुण्य और पाप कर्म करता है, और उनके फल भी।
भावार्थ: गुरु “जीव” को पूरी तरह परिभाषित करते हैं, और देखिए, जीव कोई आत्मा नहीं; वह विज्ञानमय कोश का ही एक रूप है, “मैं” का यह बोझ ढोने वाला।
एक तस्वीर: एक कुली, जो जन्म-जन्म से एक भारी गठरी सिर पर ढो रहा है। गठरी में क्या है? पुरानी वासनाएँ, पुराने कर्म, उनके फल। और वह कुली रुकता नहीं। एक काम का फल भोगता है, साथ ही नए कर्म करता जाता है, गठरी और भारी होती जाती है। यही “जीव” है, कर्म और वासना का एक न रुकने वाला बोझ-ढोने वाला। पर एक बात याद रखिए: कुली गठरी नहीं। और गठरी उतारी जा सकती है।
187 · योनि-दर योनि, सुख-दुख का भोग
भुङ्क्ते विचित्रास्वपि योनिषु व्रजन् नायाति निर्यात्यध ऊर्ध्वमेषः ।
अस्यैव विज्ञानमायास्य जाग्रत् स्वप्नाद्यवस्थाः सुखदुःखभोगः ॥ 187 ॥
bhuṅkte vicitrāsv api yoniṣu vrajan nāyāti niryāty adha ūrdhvam eṣaḥ · asyaiva vijñāna-mayāsya jāgrat svapnādy-avasthāḥ sukha-duḥkha-bhogaḥ
शब्दार्थ: भुङ्क्ते विचित्रासु योनिषु व्रजन् · तरह-तरह की योनियों में जा कर भोगता है · आयाति निर्याति अधः ऊर्ध्वम् · आता-जाता, नीचे-ऊपर · अस्य एव विज्ञानमायस्य · इसी विज्ञानमय कोश की · जाग्रत्-स्वप्न-आदि-अवस्थाः · जागृत, स्वप्न आदि अवस्थाएँ · सुख-दुःख-भोगः · सुख-दुख का भोग।
अर्थ: यह जीव तरह-तरह की योनियों में जा-जा कर भोगता है, आता-जाता, नीचे-ऊपर। जागृत, स्वप्न आदि अवस्थाएँ, और सुख-दुख का भोग, ये सब इसी विज्ञानमय कोश के हैं।
भावार्थ: गुरु एक बारीक बात साफ़ कर देते हैं, जो “आता-जाता” है, जो जन्म-दर-जन्म भटकता है, वह जीव है, यानी विज्ञानमय कोश। आत्मा नहीं।
यह राहत भरी बात है। आत्मा कहीं नहीं जाती; वह अचल है। यह विज्ञानमय कोश, “मैं कर्ता” वाली बुद्धि, ही है जो योनि-दर योनि घूमती है, सुख-दुख भोगती है। और अगर सारी आवाजाही, सारा सुख-दुख, इस एक परत का है, तो जिस पल आप इस परत से अपनी पहचान हटा लेंगे, वह पूरा भटकाव “आपका” नहीं रह जाएगा। आप बस उसे देखते हुए, अचल, ठहरे रहोगे।
188 · सबसे चमकीली परत, और सबसे बड़ा भ्रम
देहादिनिष्ठाश्रमधर्मकर्म गुणाभिमानः सततं ममेति ।
विज्ञानकोशोऽयमतिप्रकाशः प्रकृष्टसान्निध्यवशात्परात्मनः ।
अतो भवत्येष उपाधिरस्य यदात्मधीः संसरति भ्रमेण ॥ 188 ॥
dehādi-niṣṭhāśrama-dharma-karma guṇābhimānaḥ satataṁ mameti · vijñāna-kośo’yam ati-prakāśaḥ prakṛṣṭa-sānnidhya-vaśāt parātmanaḥ · ato bhavaty eṣa upādhir asya yad ātma-dhīḥ saṁsarati bhrameṇa
शब्दार्थ: देह-आदि-निष्ठ-आश्रम-धर्म-कर्म-गुण-अभिमानः · शरीर आदि से जुड़े आश्रम, धर्म, कर्म, गुणों का अभिमान · सततं मम इति · लगातार “मेरा” · अति-प्रकाशः · बहुत चमकीला · प्रकृष्ट-सान्निध्य-वशात् परात्मनः · परम आत्मा के बहुत पास होने के कारण · उपाधिः अस्य · इसकी उपाधि · आत्म-धीः संसरति भ्रमेण · आत्मा भ्रम से संसार में भटकती है।
अर्थ: शरीर आदि से जुड़े आश्रम, धर्म, कर्म, गुणों का “यह मेरा”, ऐसा अभिमान करने वाला यह विज्ञान कोश बहुत चमकीला है, क्योंकि यह परम आत्मा के बहुत पास है। इसी कारण यह आत्मा की उपाधि बन जाता है, और इसी से आत्मा भ्रम से संसार में भटकती दिखती है।
भावार्थ: गुरु एक बेहद गहरी बात कहते हैं, विज्ञानमय कोश “बहुत चमकीला” है, और क्यों? क्योंकि यह आत्मा के “सबसे पास” है।
यहीं इसका ख़तरा है। बाक़ी परतें, शरीर, प्राण, साफ़ “जड़” लगती हैं, उन्हें “मैं” मानना अपेक्षाकृत आसानी से छूट जाता है। पर बुद्धि? वह आत्मा की चेतना के इतने पास है, उसका प्रतिबिंब इतना साफ़ ले लेती है, कि वह ख़ुद “जागरूक चेतना” जैसी लगती है। और इसीलिए यही सबसे गहरा भ्रम है, यही वह जगह है जहाँ “मैं” सबसे मज़बूती से बैठा है। चाँद के सबसे पास का बादल सबसे ज़्यादा चमकता है, और इसीलिए सबसे आसानी से चाँद समझ लिया जाता है।
189 · कूटस्थ, कर्ता बन बैठता है
योऽयं विज्ञानमायाः प्राणेषु हृदि स्फुरत्ययं ज्योतिः ।
कूटस्थः सन्नात्मा कर्ता भोक्ता भवत्युपाधिस्थः ॥ 189 ॥
yo’yaṁ vijñāna-mayāḥ prāṇeṣu hṛdi sphuraty ayaṁ jyotiḥ · kūṭasthaḥ sann ātmā kartā bhoktā bhavaty upādhi-sthaḥ
शब्दार्थ: विज्ञानमयः प्राणेषु हृदि स्फुरति · विज्ञानमय कोश प्राणों में, हृदय में चमकता है · अयं ज्योतिः · यह ज्योति · कूटस्थः सन् आत्मा · कूटस्थ (अचल) होते हुए भी आत्मा · कर्ता भोक्ता भवति · कर्ता-भोक्ता बन जाती है · उपाधि-स्थः · उपाधि में बैठ कर।
अर्थ: यह विज्ञानमय कोश प्राणों में, हृदय में, एक ज्योति की तरह चमकता है। और आत्मा, कूटस्थ (बिल्कुल अचल) होते हुए भी, इस उपाधि में बैठ कर “कर्ता” और “भोक्ता” बन जाती है।
भावार्थ: एक शब्द बहुत सुंदर है, “कूटस्थ।” कूटस्थ का मतलब है, जो लोहार की निहाई की तरह बिल्कुल अचल हो। निहाई पर हथौड़े के हज़ार वार पड़ते हैं, उस पर सब कुछ घड़ा जाता है, पर निहाई ख़ुद हिलती नहीं।
आत्मा ऐसी ही है, कूटस्थ, बिल्कुल अचल। वह कभी कुछ “करती” नहीं। फिर वह “कर्ता” कैसे बन जाती है? “उपाधि-स्थः”, उपाधि में बैठ कर। यानी विज्ञानमय कोश की कुर्सी पर बैठ कर। एक राजा सिंहासन पर बैठे, तो वह “सिंहासन वाला” कहलाने लगता है, पर राजा सिंहासन नहीं। आत्मा बुद्धि की कुर्सी पर बैठ कर “कर्ता” दिखती है, पर वह कर्ता है नहीं। कुर्सी से उठते ही, वह फिर बस कूटस्थ, अचल साक्षी।
190 · घड़ों को मिट्टी से अलग देखना
स्वयं परिच्छेदमुपेत्य बुद्धेः तादात्म्यदोषेण परं मृषात्मनः ।
सर्वात्मकः सन्नपि वीक्षते स्वयं स्वतः पृथक्त्वेन मृदो घटानिव ॥ 190 ॥
svayaṁ paricchedam upetya buddheḥ tādātmya-doṣeṇa paraṁ mṛṣātmanaḥ · sarvātmakaḥ sann api vīkṣate svayaṁ svataḥ pṛthaktvena mṛdo ghaṭān iva
शब्दार्थ: स्वयं परिच्छेदम् उपेत्य · ख़ुद सीमित-सा हो कर · बुद्धेः तादात्म्य-दोषेण · बुद्धि से तादात्म्य (एकाकार) के दोष से · मृषा-आत्मनः · झूठी (बुद्धि-रूपी) के साथ · सर्व-आत्मकः सन् अपि · सबका आत्मा होते हुए भी · स्वतः पृथक्त्वेन वीक्षते · ख़ुद को (दूसरों से) अलग देखता है · मृदः घटान् इव · जैसे मिट्टी से घड़ों को।
अर्थ: बुद्धि से तादात्म्य के दोष से, ख़ुद सीमित-सा बन कर, सबका आत्मा होते हुए भी, आत्मा अपने आप को (बाक़ी सबसे) अलग देखने लगती है; जैसे कोई मिट्टी को भूल कर घड़ों को आपस में अलग-अलग देखता है।
भावार्थ: एक बेहद सुंदर उपमा, मिट्टी और घड़े। सोचिए, दस घड़े रखे हैं। आप उन्हें “अलग-अलग दस चीज़ें” देखते हैं, यह घड़ा, वह घड़ा, यह बड़ा, वह छोटा।
पर ज़रा गहराई से देखिए, वे दस अलग चीज़ें हैं, या एक ही मिट्टी के दस रूप? अगर आप “मिट्टी” देखें, तो सब एक हैं; अगर “घड़े” देखें, तो सब अलग। आत्मा भी ऐसी ही है, वह सबका एक सार है (मिट्टी की तरह)। पर बुद्धि से जुड़ कर वह ख़ुद को एक अलग, सीमित “घड़ा” मान बैठती है, और फिर बाक़ी सबको भी अलग-अलग घड़े देखती है। “मैं अलग, आप अलग” वाली पूरी दुनिया इसी एक भूल से खड़ी होती है, मिट्टी को भूल कर घड़े गिनना।
191 · तपे लोहे की तरह, दिखता बदला, है वही
उपाधिसंबन्धवशात्परात्मा ह्युपाधिधर्माननुभाति तद्गुणः ।
अयोविकारानविकारिवन्हिवत् सदैकरूपोऽपि परः स्वभावात् ॥ 191 ॥
upādhi-saṁbandha-vaśāt parātmā hy upādhi-dharmān anubhāti tad-guṇaḥ · ayo-vikārān avikāri-vanhivat sadaika-rūpo’pi paraḥ svabhāvāt
शब्दार्थ: उपाधि-संबन्ध-वशात् · उपाधि के जुड़ाव से · परात्मा उपाधि-धर्मान् अनुभाति · आत्मा उपाधि के गुण दिखाने लगती है · अयः-विकारान् अविकारि-वन्हि-वत् · लोहे के बदलावों को, न बदलने वाली आग की तरह · सदा-एक-रूपः अपि परः स्वभावात् · स्वभाव से हमेशा एक-सा रहते हुए भी।
अर्थ: उपाधि के जुड़ाव से, आत्मा उपाधि के गुणों को अपना-सा दिखाने लगती है, जैसे न बदलने वाली आग लोहे के बदलावों को (अपना-सा) दिखाती है। पर स्वभाव से वह हमेशा एक-सी, अचल रहती है।
भावार्थ: गुरु फिर वही तपे लोहे की उपमा लाते हैं (भाग 5, श्लोक 133), क्योंकि यह विज्ञानमय कोश के भ्रम को ठीक-ठीक पकड़ती है।
तपा हुआ लोहा देखिए, वह लाल है, गरम है, मुड़ता है, ठंडा होता है। और आग? आग लोहे में बैठी है, और लोहे के ये सारे “बदलाव” मानो आग के बदलाव लगते हैं। पर आग ख़ुद? वह न लाल हुई, न मुड़ी, न ठंडी हुई। वह बस वही है। आत्मा बुद्धि की उपाधि में बैठ कर ऐसी ही दिखती है, बुद्धि बदलती है (ख़ुश, उदास, उलझी), और लगता है आत्मा बदल रही है। पर “स्वभाव से”, अपने असली रूप में, वह “सदा-एक-रूप”, हमेशा वही, अचल। बुद्धि के सारे मौसम उसे छूते नहीं।
192 · शिष्य का सवाल, उपाधि तो अनादि है
शिष्य उवाच,
भ्रमेणाप्यन्यथा वास्तु जीवभावः परात्मनः ।
तदुपाधेरनादित्वान्नानादेर्नाश इष्यते ॥ 192 ॥
śiṣya uvāca, bhrameṇāpy anyathā vāstu jīva-bhāvaḥ parātmanaḥ · tad-upādher anāditvān nānāder nāśa iṣyate
शब्दार्थ: शिष्य उवाच · शिष्य ने कहा · भ्रमेण अपि अन्यथा वा अस्तु · भ्रम से या किसी और तरह से सही · जीव-भावः परात्मनः · आत्मा का जीव-भाव · तद्-उपाधेः अनादित्वात् · उस उपाधि के अनादि होने से · न अनादेः नाशः इष्यते · जो अनादि है, उसका नाश नहीं माना जाता।
अर्थ: शिष्य ने कहा, मान लीजिए आत्मा का जीव-भाव भ्रम से ही है, या किसी और तरह से, पर वह उपाधि तो अनादि है। और जो अनादि है, उसका नाश तो नहीं माना जाता।
भावार्थ: यहाँ शिष्य फिर बोलता है, और वह एक बहुत तेज़, बहुत ईमानदार सवाल उठाता है। गुरु ने अभी-अभी कहा कि जीव-भाव “भ्रम” है। शिष्य पीछे नहीं हटता, वह दलील पकड़ लेता है।
उसका तर्क यह है: ठीक है, मान लिया जीव-भाव भ्रम है। पर यह भ्रम तो “अनादि” है, हमेशा से चला आ रहा। और जो चीज़ हमेशा से है, उसका कभी अंत कैसे होंगे? यह कोई कमज़ोर सवाल नहीं। यह एक तेज़ शिष्य का असली, जलता हुआ संशय है। और यही विवेकचूडामणि का सौंदर्य है: शिष्य आँख मूँद कर नहीं मानता। उसका यह सवाल हर सच्चे साधक के मन में उठता है। अगला श्लोक उसे और साफ़ कर देगा।
193 · “तो मेरा मोक्ष कैसे होंगे, गुरुदेव?”
अतोऽस्य जीवभावोऽपि नित्या भवति संसृतिः ।
न निवर्तेत तन्मोक्षः कथं मे श्रीगुरो वद ॥ 193 ॥
ato’sya jīva-bhāvo’pi nityā bhavati saṁsṛtiḥ · na nivarteta tan-mokṣaḥ kathaṁ me śrī-guro vada
शब्दार्थ: अतः अस्य जीव-भावः अपि · इसलिए इसका जीव-भाव भी · नित्या भवति संसृतिः · संसार-चक्र नित्य हो जाता है · न निवर्तेत · वह लौटता-मिटता नहीं · तत् मोक्षः कथं मे · तो मेरा मोक्ष कैसे · श्रीगुरो वद · हे गुरुदेव, बताइए।
अर्थ: इसलिए, इसका जीव-भाव भी नित्य हो जाता है, और संसार-चक्र भी; वह कभी मिटेगा नहीं। तो मेरा मोक्ष कैसे होंगे, हे गुरुदेव, बताइए।
भावार्थ: शिष्य अपना सवाल पूरा करता है, और देखिए वह कितना निजी हो गया है, “मेरा मोक्ष कैसे होंगे?”
यह अब बौद्धिक बहस नहीं रही। शिष्य एक सच्चे डर के साथ बोल रहा है: अगर तर्क से देखें तो जीव-भाव अनादि है, संसार नित्य है, तो फिर मेरी मुक्ति की पूरी उम्मीद ही ख़त्म। यह वह क्षण है जहाँ एक ईमानदार साधक की यात्रा रुक सकती है। और यही इस श्लोक की क़ीमत है, विवेकचूडामणि इस संशय को दबाती नहीं। छिपाती नहीं; वह उसे पूरे, साफ़ रूप में सामने रख देती है। क्योंकि एक सच्चा जवाब तभी मिलता है जब सवाल पूरी ईमानदारी से पूछा जाए। अब गुरु जवाब देंगे।
194 · “अच्छा पूछा, ध्यान से सुनो”
श्रीगुरुरुवाच,
सम्यक्पृष्टं त्वया विद्वन्सावधानेन तच्छृणु ।
प्रामाणिकी न भवति भ्रान्त्या मोहितकल्पना ॥ 194 ॥
śrī-gurur uvāca, samyak pṛṣṭaṁ tvayā vidvan sāvadhānena tac chṛṇu · prāmāṇikī na bhavati bhrāntyā mohita-kalpanā
शब्दार्थ: श्रीगुरुः उवाच · श्रीगुरु ने कहा · सम्यक् पृष्टं त्वया विद्वन् · हे विद्वान, आपने अच्छा पूछा · सावधानेन तत् शृणु · ध्यान से उसे सुनो · प्रामाणिकी न भवति · प्रमाण नहीं मानी जाती · भ्रान्त्या मोहित-कल्पना · भ्रम से मोहित कल्पना।
अर्थ: श्रीगुरु ने कहा, हे विद्वान, आपने अच्छा पूछा; ध्यान से सुनो। भ्रम से मोहित एक कल्पना कभी प्रमाण नहीं होती।
भावार्थ: गुरु जवाब शुरू करते हैं, और पहले वे सवाल की तारीफ़ करते हैं, “सम्यक् पृष्टम्”, आपने अच्छा पूछा। एक अच्छा शिक्षक संशय को दबाता नहीं; वह उसका स्वागत करता है।
और फिर गुरु जवाब की पहली, बुनियादी चाबी रखते हैं: “भ्रम से मोहित एक कल्पना कभी प्रमाण नहीं होती।” यानी, शिष्य की पूरी दलील एक बात मान कर चल रही है, कि “जीव-भाव” एक असली चीज़ है, जिसका हिसाब लगाना है। गुरु पहले ही वह नींव खिसका देते हैं: जीव-भाव एक भ्रम है, और भ्रम के तर्क से असली नियम नहीं बनते। अगले श्लोक इसे खोलेंगे, और यह जवाब बहुत सुंदर है।
195 · आकाश का नीलापन
भ्रान्तिं विना त्वसङ्गस्य निष्क्रियस्य निराकृतेः ।
न घटेतार्थसंबन्धो नभसो नीलतादिवत् ॥ 195 ॥
bhrāntiṁ vinā tv asaṅgasya niṣkriyasya nirākṛteḥ · na ghaṭetārtha-saṁbandho nabhaso nīlatādivat
शब्दार्थ: भ्रान्तिं विना · भ्रम के बिना · असङ्गस्य निष्क्रियस्य निराकृतेः · असंग, निष्क्रिय, निराकार आत्मा का · न घटेत अर्थ-संबन्धः · किसी चीज़ से असली संबंध नहीं बन सकता · नभसः नीलता-वत् · आकाश के नीलेपन की तरह।
अर्थ: भ्रम के बिना, असंग, निष्क्रिय, निराकार आत्मा का किसी चीज़ से कोई असली संबंध बन ही नहीं सकता, ठीक जैसे आकाश का नीलेपन से।
भावार्थ: गुरु एक बेहद सुंदर उदाहरण देते हैं, आकाश का नीलापन।
आकाश आपको नीला दिखता है। पर क्या आकाश सच में नीला है? नहीं। आकाश तो रंगहीन, ख़ाली है। नीलापन एक भ्रम है, रोशनी के बिखरने से दिखता है। अब सोचिए, अगर कोई पूछे “आकाश का नीलेपन से रिश्ता कब से है?”, तो सवाल ही बेमानी है, क्योंकि वह रिश्ता असली है ही नहीं। गुरु कहते हैं, आत्मा और बंधन का रिश्ता ठीक ऐसा ही है। आत्मा असंग है; उसका बंधन से कोई असली रिश्ता है ही नहीं। तो “वह रिश्ता अनादि है, इसलिए अनंत” वाली दलील गिर जाती है, क्योंकि एक न होने वाली चीज़ की उम्र पूछना ही ग़लत है।
196 · भ्रम से आया जीव-भाव सच नहीं
स्वस्य द्रष्टुर्निर्गुणस्याक्रियस्य प्रत्यग्बोधानन्दरूपस्य बुद्धेः ।
भ्रान्त्या प्राप्तो जीवभावो न सत्यो मोहापाये नास्त्यवस्तुस्वभावात् ॥ 196 ॥
svasya draṣṭur nirguṇasyākriyasya pratyag-bodhānanda-rūpasya buddheḥ · bhrāntyā prāpto jīva-bhāvo na satyo mohāpāye nāsty avastu-svabhāvāt
शब्दार्थ: स्वस्य द्रष्टुः निर्गुणस्य अक्रियस्य · अपने आत्मा का, द्रष्टा, निर्गुण, क्रिया-रहित · प्रत्यग्-बोध-आनन्द-रूपस्य · भीतर के बोध-आनंद-स्वरूप · भ्रान्त्या प्राप्तः जीव-भावः न सत्यः · भ्रम से आया जीव-भाव सच नहीं · मोह-अपाये न अस्ति · मोह हटते ही नहीं रहता · अवस्तु-स्वभावात् · क्योंकि वह असली चीज़ ही नहीं।
अर्थ: अपने आत्मा का, जो द्रष्टा है, निर्गुण है, क्रिया-रहित है, भीतर का बोध-आनंद-स्वरूप है, भ्रम से आया जीव-भाव सच नहीं। मोह हटते ही वह नहीं रहता, क्योंकि वह असली चीज़ ही नहीं।
भावार्थ: गुरु अब सीधे शिष्य के डर पर हाथ रखते हैं। शिष्य डरा था कि जीव-भाव अनादि है, इसलिए अमर। गुरु कहते हैं, जीव-भाव “अवस्तु” है, यानी कोई असली चीज़ ही नहीं।
और असली न होने वाली चीज़ के बारे में एक ख़ास बात है, उसे “ख़त्म” करने की मेहनत नहीं करनी पड़ती; वह बस “मोह हटते ही” अपने आप नहीं रहती। एक सपने का राक्षस सोचिए, वह कितनी भी देर का हो, उसे “मारना” नहीं पड़ता; आँख खुलते ही वह बस नहीं रहता, क्योंकि वह कभी था ही नहीं। शिष्य का डर इस मान्यता पर टिका था कि जीव-भाव एक ठोस, असली बेड़ी है। गुरु वह मान्यता ही हटा देते हैं।
197 · रस्सी का साँप, भ्रम भर रहता है
यावद्भ्रान्तिस्तावदेवास्य सत्ता मिथ्याज्ञानोज्जृम्भितस्य प्रमादात् ।
रज्ज्वां सर्पो भ्रान्तिकालीन एव भ्रान्तेर्नाशे नैव सर्पोऽपि तद्वत् ॥ 197 ॥
yāvad bhrāntis tāvad evāsya sattā mithyā-jñānojjṛmbhitasya pramādāt · rajjvāṁ sarpo bhrānti-kālīna eva bhrānter nāśe naiva sarpo’pi tadvat
शब्दार्थ: यावत् भ्रान्तिः तावत् एव अस्य सत्ता · जब तक भ्रम, तभी तक इसका होना · मिथ्या-ज्ञान-उज्जृम्भितस्य · मिथ्या-ज्ञान से उठे हुए का · रज्ज्वां सर्पः भ्रान्ति-कालीनः एव · रस्सी का साँप बस भ्रम के समय भर रहता है · भ्रान्तेः नाशे न एव सर्पः · भ्रम मिटने पर साँप नहीं रहता · तद्वत् · वैसे ही।
अर्थ: जब तक भ्रम है, तभी तक इस (जीव-भाव) का होना है, जो मिथ्या-ज्ञान से, लापरवाही से उठा है। रस्सी का साँप बस भ्रम के समय भर रहता है; भ्रम मिटते ही साँप नहीं रहता। जीव-भाव भी वैसा ही।
भावार्थ: गुरु पूरे जवाब को रस्सी-साँप की भाषा में रख देते हैं, और यह श्लोक शिष्य के सवाल को सीधे, साफ़ काट देता है।
शिष्य ने पूछा था, “अनादि चीज़ ख़त्म कैसे होगी?” गुरु का जवाब: साँप के बारे में सोचो। साँप का “होना” किस पर टिका है? भ्रम पर। जब तक रस्सी को साँप समझा जा रहा है, साँप “है।” जिस पल भ्रम मिटा, साँप गया। अब सवाल, साँप का जन्म “कब” हुआ था? आप कोई पल नहीं बता सकते; वह तो जब से भ्रम था, तब से था। यानी साँप, अपनी तरह से, “अनादि” था। पर क्या इससे वह अमर हो गया? बिल्कुल नहीं। रोशनी आते ही ग़ायब। बस इतनी बात है: जीव-भाव अनादि भले हो, पर वह भ्रम के साथ बँधा है। भ्रम गया, वह गया। अनादि होना और अमर होना, दो अलग बातें हैं।
198 · अविद्या अनादि, पर ज्ञान होते ही…
अनादित्वमविद्यायाः कार्यस्यापि तथेष्यते ।
उत्पन्नायां तु विद्यायामाविद्यकमनाद्यपि ॥ 198 ॥
anāditvam avidyāyāḥ kāryasyāpi tatheṣyate · utpannāyāṁ tu vidyāyām āvidyakam anādy api
शब्दार्थ: अनादित्वम् अविद्यायाः · अविद्या का अनादि होना · कार्यस्य अपि तथा इष्यते · उसके काम का भी वैसा माना जाता है · उत्पन्नायां विद्यायाम् · विद्या (ज्ञान) के उठते ही · आविद्यकम् अनादि अपि · अज्ञान का सब कुछ, अनादि होते हुए भी (मिट जाता है, अगला श्लोक)।
अर्थ: अविद्या का अनादि होना माना जाता है, और उसके काम (जैसे जीव-भाव) का भी वैसा ही। पर ज्ञान के उठते ही, अज्ञान का यह सब, अनादि होते हुए भी,
भावार्थ: गुरु शिष्य की दलील को आधा स्वीकार करते हैं, और यही उनके जवाब को इतना मज़बूत बनाता है। वे कहते हैं, “हाँ, आप सही हो: अविद्या अनादि है, और उसका काम भी अनादि है।”
शिष्य की बात तर्क में ठीक है, गुरु उसे झुठलाते नहीं। पर फिर वे एक “किन्तु” रखते हैं, “उत्पन्नायां तु विद्यायाम्”, पर जैसे ही विद्या उठती है… यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है। और इस आधे-वाक्य में ही पूरा जवाब छिपा है: अनादि होना एक बात है; ज्ञान के सामने टिक पाना दूसरी। रात कब शुरू हुई, यह कोई नहीं बता सकता, पर सूरज निकलते ही वह जाती है, चाहे कितनी भी “पुरानी” रही हो।
199 · जागते ही, सपना, जड़ समेत
प्रबोधे स्वप्नवत्सर्वं सहमूलं विनश्यति ।
अनाद्यपीदं नो नित्यं प्रागभाव इव स्फुटम् ॥ 199 ॥
prabodhe svapnavat sarvaṁ saha-mūlaṁ vinaśyati · anādy apīdaṁ no nityaṁ prāg-abhāva iva sphuṭam
शब्दार्थ: प्रबोधे स्वप्न-वत् सर्वं · जागने पर, सपने की तरह सब · सह-मूलं विनश्यति · जड़ समेत मिट जाता है · अनादि अपि इदं नो नित्यं · यह अनादि होते हुए भी नित्य नहीं · प्राग्-अभावः इव स्फुटम् · “प्राग्-अभाव” की तरह, साफ़।
अर्थ: ज्ञान का प्रबोध होते ही, सपने की तरह, यह सब जड़ समेत मिट जाता है। यह अनादि होते हुए भी नित्य नहीं, ठीक जैसे “प्राग्-अभाव” (किसी चीज़ के बनने से पहले का न-होना)।
भावार्थ: गुरु पिछले श्लोक का वाक्य पूरा करते हैं, और दो उदाहरण देते हैं।
पहला, सपना। आपने एक लंबा सपना देखा, उसमें एक पूरा “इतिहास” था, बरसों की कहानियाँ। आँख खुली, और वह पूरा सपना “जड़ समेत” ग़ायब, उसका बरसों वाला इतिहास भी। दूसरा उदाहरण और चतुर है, “प्राग्-अभाव।” एक घड़ा बनने से पहले, उसका “न-होना” कब से था? हमेशा से, अनादि। पर घड़ा बनते ही वह “न-होना” ख़त्म हो गया। यानी यहाँ एक चीज़ है जो अनादि भी है और ख़त्म भी हो जाती है। गुरु शिष्य की दलील की धुरी, “अनादि माने अमर”, को इस एक उदाहरण से तोड़ देते हैं। अनादि और अनंत, ज़रूरी नहीं साथ चलें।
200 · अनादि चीज़ का भी नाश देखा गया है
अनादेरपि विध्वंसः प्रागभावस्य वीक्षितः ।
यद्बुद्ध्युपाधिसंबन्धात्परिकल्पितमात्मनि ॥ 200 ॥
anāder api vidhvaṁsaḥ prāg-abhāvasya vīkṣitaḥ · yad buddhy-upādhi-saṁbandhāt parikalpitam ātmani
शब्दार्थ: अनादेः अपि विध्वंसः · अनादि चीज़ का भी नाश · प्राग्-अभावस्य वीक्षितः · प्राग्-अभाव में देखा गया · यत् बुद्धि-उपाधि-संबन्ध-कल्पितम् · जो बुद्धि-उपाधि के संबंध से गढ़ा गया · आत्मनि · आत्मा में।
अर्थ: अनादि चीज़ का भी नाश देखा गया है, “प्राग्-अभाव” में। और (जीव-भाव) तो वह है, जो बुद्धि-उपाधि के संबंध से आत्मा में गढ़ दिया गया है।
भावार्थ: गुरु अपनी बात पर मुहर लगा देते हैं, “अनादेः अपि विध्वंसः वीक्षितः”, अनादि चीज़ का भी नाश “देखा गया है।”
यह शब्द “वीक्षितः”, देखा गया, महत्वपूर्ण है। गुरु कोई काल्पनिक दलील नहीं दे रहे; वे कहते हैं यह बात अनुभव से, उदाहरण से सिद्ध है (प्राग्-अभाव वाला उदाहरण)। यानी “अनादि चीज़ का अंत हो सकता है” यह कोई सैद्धांतिक छूट नहीं। यह एक देखी हुई सच्चाई है। और इससे शिष्य का पूरा डर ज़मीन पर आ जाता है। उसका जीव-भाव गढ़ा हुआ है, बुद्धि की उपाधि के जुड़ाव से, आत्मा पर एक झूठी परत की तरह चढ़ा हुआ। गढ़ी हुई चीज़ हटाई जा सकती है, चाहे वह कितनी भी पुरानी हो।
201 · जीव-भाव, आत्मा से अलग कुछ नहीं
जीवत्वं न ततोऽन्यस्तु स्वरूपेण विलक्षणः ।
संबन्धस्त्वात्मनो बुद्ध्या मिथ्याज्ञानपुरःसरः ॥ 201 ॥
jīvatvaṁ na tato’nyas tu svarūpeṇa vilakṣaṇaḥ · saṁbandhas tv ātmano buddhyā mithyā-jñāna-puraḥsaraḥ
शब्दार्थ: जीवत्वं न ततः अन्यः · जीवपन उस (आत्मा) से कोई अलग चीज़ नहीं · स्वरूपेण विलक्षणः · स्वरूप से (आत्मा बुद्धि से) बिल्कुल अलग है · संबन्धः आत्मनः बुद्ध्या · आत्मा का बुद्धि से संबंध · मिथ्या-ज्ञान-पुरःसरः · मिथ्या-ज्ञान से आगे चलता हुआ (उसी पर टिका)।
अर्थ: “जीवपन” आत्मा से कोई अलग चीज़ नहीं है; और स्वरूप से तो आत्मा (बुद्धि से) बिल्कुल अलग है। आत्मा का बुद्धि से जो संबंध है, वह बस मिथ्या-ज्ञान पर टिका है।
भावार्थ: गुरु जीव-भाव की असलियत एकदम साफ़ कर देते हैं, और दो बातें एक साथ कहते हैं, जो पहली नज़र में उल्टी लगती हैं, पर मिल कर पूरी तस्वीर बनाती हैं।
एक, “जीवपन आत्मा से अलग कुछ नहीं।” यानी “जीव” कोई स्वतंत्र हस्ती नहीं; जीव बस आत्मा ही है, एक भ्रम के परदे में। दो, “स्वरूप से आत्मा बुद्धि से बिल्कुल अलग है।” यानी अपने असली रूप में, आत्मा का बुद्धि से कोई जुड़ाव ही नहीं। तो “जीव” क्या है? आत्मा, जो बुद्धि से जुड़ी हुई दिखती है, पर वह जुड़ाव “मिथ्या-ज्ञान” पर टिका है, असली नहीं। फिर रस्सी-साँप: साँप रस्सी से अलग कोई चीज़ नहीं (वह रस्सी ही है), और रस्सी का साँप से कोई असली रिश्ता नहीं।
202 · सिर्फ़ सम्यक्-ज्ञान से
विनिवृत्तिर्भवेत्तस्य सम्यग्ज्ञानेन नान्यथा ।
ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं सम्यग्ज्ञानं श्रुतेर्मतम् ॥ 202 ॥
vinivṛttir bhavet tasya samyag-jñānena nānyathā · brahmātmaikatva-vijñānaṁ samyag-jñānaṁ śruter matam
शब्दार्थ: विनिवृत्तिः भवेत् तस्य · उसका हटना होता है · सम्यग्-ज्ञानेन न अन्यथा · सही ज्ञान से, और किसी तरह नहीं · ब्रह्म-आत्म-एकत्व-विज्ञानं · ब्रह्म और आत्मा की एकता का ज्ञान · सम्यग्-ज्ञानं श्रुतेः मतम् · श्रुति के अनुसार यही सही ज्ञान है।
अर्थ: उस (मिथ्या जुड़ाव) का हटना सही ज्ञान से ही होता है, और किसी तरह नहीं। और श्रुति के अनुसार “सही ज्ञान” है, ब्रह्म और आत्मा की एकता का ज्ञान।
भावार्थ: गुरु शिष्य के सवाल का अंतिम जवाब देते हैं। शिष्य ने पूछा था “मेरा मोक्ष कैसे होंगे?”, और यह श्लोक सीधा कहता है: “सम्यग्-ज्ञान से।”
और गुरु “सम्यग्-ज्ञान” (सही ज्ञान) को एक ख़ास परिभाषा देते हैं, “ब्रह्म और आत्मा की एकता का ज्ञान।” यानी सही ज्ञान बहुत सारी जानकारी जमा करना नहीं। वह एक बहुत ख़ास पहचान है: कि “ब्रह्म” और “मैं” दो नहीं। एक हैं। यही पूरी विवेकचूडामणि का केंद्र है, और यही बंधन की एकमात्र दवा। शिष्य का डर अब पूरी तरह सँभल चुका, बंधन अनादि भले हो, सही ज्ञान उसे मिटा देता है। और वह सही ज्ञान क्या है, यह साफ़ हो गया।
203 · इसलिए, विवेक करो
तदात्मानात्मनोः सम्यग्विवेकेनैव सिध्यति ।
ततो विवेकः कर्तव्यः प्रत्यगात्मसदात्मनोः ॥ 203 ॥
tad ātmānātmanoḥ samyag-vivekenaiva sidhyati · tato vivekaḥ kartavyaḥ pratyag-ātma-sad-ātmanoḥ
शब्दार्थ: तत् आत्म-अनात्मनोः सम्यग्-विवेकेन एव सिध्यति · वह (सही ज्ञान) आत्मा-अनात्मा के सही विवेक से ही सिद्ध होता है · ततः विवेकः कर्तव्यः · इसलिए विवेक करना चाहिए · प्रत्यग्-आत्म-सद्-आत्मनोः · भीतर के आत्मा और सद्-आत्मा का।
अर्थ: वह सही ज्ञान आत्मा और अनात्मा के सही विवेक से ही सिद्ध होता है। इसलिए, भीतर के आत्मा और सद्-आत्मा (असली स्वरूप) का विवेक करना चाहिए।
भावार्थ: गुरु पूरी बात को एक व्यावहारिक कदम पर ले आते हैं, और किताब का नाम फिर सामने आता है। सही ज्ञान कैसे आएगा? “विवेक” से।
यह श्लोक पूरे जवाब को एक काम में बदल देता है। शिष्य अब डर से बाहर है, पर डर से बाहर आना काफ़ी नहीं; अब करना क्या है, यह साफ़ होना चाहिए। और जवाब वही पुराना, सीधा शब्द है, विवेक: असली और नक़ली में फ़र्क करना, परत-दर-परत। यानी ठीक वही काम जो यह भाग कर रहा है, कोश छीलना। बातचीत यहाँ एक पूरा घेरा बना लेती है: शिष्य का संशय सँभला, और वह उसी विधि पर लौट आया जो चल रही थी।
204 · कीचड़ हटे, पानी साफ़
जलं पङ्कवदत्यन्तं पङ्कापाये जलं स्फुटम् ।
यथा भाति तथात्मापि दोषाभावे स्फुटप्रभः ॥ 204 ॥
jalaṁ paṅkavad atyantaṁ paṅkāpāye jalaṁ sphuṭam · yathā bhāti tathātmāpi doṣābhāve sphuṭa-prabhaḥ
शब्दार्थ: जलं पङ्क-वत् अत्यन्तं · पानी कीचड़-जैसा (गंदला) · पङ्क-अपाये जलं स्फुटम् · कीचड़ हटने पर पानी साफ़ · यथा भाति · जैसे दिखता है · तथा आत्मा अपि दोष-अभावे स्फुट-प्रभः · वैसे ही आत्मा भी, दोष हटने पर, साफ़ चमकती है।
अर्थ: गंदला पानी कीचड़-जैसा दिखता है; कीचड़ हटते ही वही पानी साफ़ दिखने लगता है। वैसे ही आत्मा भी, दोष हटते ही, साफ़ चमकने लगती है।
भावार्थ: भाग की काई-तालाब वाली तस्वीर यहाँ थोड़ा बदल कर लौटती है, गंदला पानी और कीचड़।
एक गिलास में मटमैला पानी है। आप उसमें कोई “साफ़ी” मिलाते नहीं; आप कुछ “बनाते” नहीं। आप बस गिलास को टिका कर रखते हैं, या कीचड़ को बैठने देते हैं, और कुछ देर में, वही पानी, अपने आप, साफ़ दिखने लगता है। पानी हमेशा साफ़ था; कीचड़ बस उसमें मिला हुआ था। आत्मा भी ऐसी ही है। आपको कोई नई, चमकती आत्मा “बनानी” नहीं। आपको बस दोष, कोशों की मिलावट, हटने देना है, और जो हमेशा से साफ़ था, वह साफ़ दिखने लगता है। काम जोड़ने का नहीं। हटने देने का है।
205 · असत् हटे, तभी सत् साफ़ दिखे
असन्निवृत्तौ तु सदात्मना स्फुटं प्रतीतिरेतस्य भवेत्प्रतीचः ।
ततो निरासः करणीय एव सदात्मनः साध्वहमादिवस्तुनः ॥ 205 ॥
asan-nivṛttau tu sad-ātmanā sphuṭaṁ pratītir etasya bhavet pratīcaḥ · tato nirāsaḥ karaṇīya eva sad-ātmanaḥ sādhv aham-ādi-vastunaḥ
शब्दार्थ: असत्-निवृत्तौ · असत् (नक़ली) के हट जाने पर · सद्-आत्मना स्फुटं प्रतीतिः · सद्-रूप में साफ़ अनुभव · एतस्य प्रतीचः · इस भीतर के आत्मा का · ततः निरासः करणीय एव · इसलिए हटाना ही चाहिए · सद्-आत्मनः · सद्-आत्मा से · अहम्-आदि-वस्तुनः · “मैं” आदि चीज़ों को।
अर्थ: असत् (नक़ली) के हट जाने पर ही इस भीतर के आत्मा का सद्-रूप में साफ़ अनुभव होता है। इसलिए, सद्-आत्मा से “मैं” आदि सब चीज़ों को अच्छी तरह हटा देना ही चाहिए।
भावार्थ: गुरु एक व्यावहारिक नियम देते हैं, और एक शब्द ध्यान देने लायक़ है: “अहम्-आदि।”
हटाने की चीज़ों में सबसे ऊपर है, “अहम्”, यह “मैं” वाला भाव। यह विज्ञानमय कोश का दिल है। गुरु कह रहे हैं, असली स्वरूप तभी साफ़ अनुभव होंगे जब यह “मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ” वाला छोटा “मैं” हटे। और यह सबसे कठिन हटाव है, क्योंकि यही वह चीज़ है जिससे हम सबसे गहराई से चिपके हैं। पर तस्वीर वही, गिलास से कीचड़ हटाओ, पानी अपने आप साफ़। छोटा “मैं” हटे, असली “मैं” अपने आप चमके।
206 · विज्ञानमय भी आत्मा नहीं
अतो नायं परात्मा स्याद्विज्ञानमायाशब्दभाक् ।
विकारित्वाज्जडत्वाच्च परिच्छिन्नत्वहेतुतः ।
दृश्यत्वाद्व्यभिचारित्वान्नानित्यो नित्य इष्यते ॥ 206 ॥
ato nāyaṁ parātmā syād vijñāna-mayā-śabda-bhāk · vikāritvāj jaḍatvāc ca paricchinnatva-hetutaḥ · dṛśyatvād vyabhicāritvān nānityo nitya iṣyate
शब्दार्थ: न अयं परात्मा स्यात् · यह परम आत्मा नहीं · विज्ञानमय-शब्द-भाक् · “विज्ञानमय” नाम वाला · विकारित्वात् · बदलने से · जडत्वात् · जड़ होने से · परिच्छिन्नत्व-हेतुतः · सीमित होने से · दृश्यत्वात् व्यभिचारित्वात् · देखी जाने वाली, अनियत होने से · न अनित्यः नित्यः इष्यते · अनित्य आत्मा, नित्य नहीं माना जाता।
अर्थ: इसलिए “विज्ञानमय” नाम वाला यह कोश परम आत्मा नहीं। क्योंकि यह बदलता है, जड़ है, सीमित है, देखा जाता है, और अनियत है। जो अनित्य हो, वह नित्य आत्मा नहीं माना जाता।
भावार्थ: चौथी परत, विज्ञानमय कोश, बुद्धि, भी छिल जाती है। गुरु पाँच कारण गिनाते हैं, और हर एक एक छोटा-सा परीक्षण है: बुद्धि बदलती है, जड़ है (उधार की रोशनी से चमकती है), सीमित है, “देखी जाती है”, अनियत है।
सबसे गहरा फिर वही, “दृश्यत्व”, देखी जाना। आप अपनी बुद्धि के काम को “देख” सकते हैं, “मैंने यह तय किया”, “मेरी सोच यह कहती है।” यह कह पाना ही साबित कर देता है कि बुद्धि एक “दृश्य” है, और आप उसके “द्रष्टा।” यह सबसे चुनौती भरी परत थी, क्योंकि यह आत्मा के सबसे पास है, पर वही आख़िरी जाँच इसे भी अलग कर देती है: यह भी जानी जाती है, इसलिए “आप” नहीं।
207 · आनन्दमय कोश, आनंद की परत
आनन्दप्रतिबिम्बचुम्बिततनुर्वृत्तिस्तमोजृम्भिता स्यादानन्दमायाः प्रियादिगुणकः स्वेष्टार्थलाभोदयः ।
पुण्यस्यानुभवे विभाति कृतिनामानन्दरूपः स्वयं सर्वो नन्दति यत्र साधु तनुभृन्मात्रः प्रयत्नं विना ॥ 207 ॥
ānanda-pratibimba-cumbita-tanur vṛttis tamo-jṛmbhitā syād ānanda-mayāḥ priyādi-guṇakaḥ sveṣṭārtha-lābhodayaḥ · puṇyasyānubhave vibhāti kṛtinām ānanda-rūpaḥ svayaṁ sarvo nandati yatra sādhu tanu-bhṛn-mātraḥ prayatnaṁ vinā
शब्दार्थ: आनन्द-प्रतिबिम्ब-चुम्बित-तनुः · आनंद के प्रतिबिंब से छुई हुई · वृत्तिः तमः-जृम्भिता · तमस से उठी एक वृत्ति · आनन्दमयः · आनन्दमय कोश · प्रिय-आदि-गुणकः · प्रिय आदि गुणों वाला · स्व-इष्ट-अर्थ-लाभ-उदयः · मनचाही चीज़ मिलने पर उठता है · प्रयत्नं विना सर्वः नन्दति · बिना प्रयत्न के सब आनंदित होते हैं।
अर्थ: आनन्दमय कोश, आनंद के प्रतिबिंब से छुई, तमस से उठी एक वृत्ति है; इसमें प्रिय आदि गुण होते हैं, और यह मनचाही चीज़ मिलने पर उभरता है। पुण्य के अनुभव में यह पुण्यवानों को दिखता है; यहीं, बिना किसी प्रयत्न के, हर देहधारी आनंदित होता है।
भावार्थ: पाँचवीं और आख़िरी परत, आनन्दमय कोश। और यह सबसे सूक्ष्म है, सबसे आसानी से “आत्मा” समझ ली जाने वाली, क्योंकि इसका नाम ही “आनंद” है।
यह कब अनुभव होता है? जब कोई मनचाही चीज़ मिले, एक पल का सुकून, एक संतोष की लहर। गुरु इसकी असलियत खोल देते हैं, यह आत्मा का असली आनंद नहीं; यह आनंद का “प्रतिबिंब” है, उधार की चमक (फिर वही चाँद-पानी)। असली आत्मा का आनंद बिना शर्त है, हमेशा। यह आनन्दमय कोश शर्त वाला है, “मनचाही चीज़ मिलने पर” उभरता है। यानी यह आता है, तो जाता भी है। असली आनंद जैसा लगता है, पर असली नहीं।
208 · गहरी नींद में सबसे साफ़
आनन्दमायाकोशस्य सुषुप्तौ स्फूर्तिरुत्कटा ।
स्वप्नजागरयोरीषदिष्टसंदर्शनाविना ॥ 208 ॥
ānanda-mayā-kośasya suṣuptau sphūrtir utkaṭā · svapna-jāgarayor īṣad iṣṭa-saṁdarśanā vinā
शब्दार्थ: आनन्दमय-कोशस्य सुषुप्तौ स्फूर्तिः उत्कटा · आनन्दमय कोश की गहरी नींद में सबसे तेज़ झलक · स्वप्न-जागरयोः ईषत् · स्वप्न और जागृत में थोड़ी-सी · इष्ट-संदर्शना · मनचाही चीज़ के दिखने पर।
अर्थ: आनन्दमय कोश की सबसे तेज़ झलक गहरी नींद में होती है। स्वप्न और जागृत अवस्था में यह बस थोड़ी-सी झलकता है, मनचाही चीज़ के दिखने पर।
भावार्थ: गुरु इस कोश को उसकी अवस्था से जोड़ देते हैं, जैसे अन्नमय का साथी जागृत था, सूक्ष्म का स्वप्न, वैसे आनन्दमय का साथी है गहरी नींद।
यह बात भाग 4 (श्लोक 107) की याद दिलाती है, गहरी नींद में जो गहरा सुकून मिलता है। गुरु एक प्यारी तुलना करते हैं: जागते-सपने में आनंद बस “थोड़ा-सा” झलकता है, और वह भी तभी जब कुछ मनचाहा मिले, शर्त के साथ। पर गहरी नींद में, जब बाहर कुछ भी नहीं। कोई “मनचाही चीज़” नहीं। फिर भी आनंद, और सबसे तेज़। यह एक इशारा है: आनंद का स्रोत बाहर नहीं। पर, और यही अगला श्लोक कहेगा, गहरी नींद का यह आनंद भी अभी आख़िरी मंज़िल नहीं।
209 · आनन्दमय भी आत्मा नहीं
नैवायमानन्दमायाः परात्मा सोपाधिकत्वात्प्रकृतेर्विकारात् ।
कार्यत्वहेतोः सुकृतक्रियाया विकारसङ्घातसमाहितत्वात् ॥ 209 ॥
naivāyam ānanda-mayāḥ parātmā sopādhikatvāt prakṛter vikārāt · kāryatva-hetoḥ sukṛta-kriyāyā vikāra-saṅghāta-samāhitatvāt
शब्दार्थ: न एव अयं आनन्दमयः परात्मा · आनन्दमय कोश परम आत्मा नहीं · सोपाधिकत्वात् · उपाधि वाला होने से · प्रकृतेः विकारात् · प्रकृति का एक रूप होने से · कार्यत्व-हेतोः · एक “काम/परिणाम” होने से · सुकृत-क्रियायाः · पुण्य-कर्म का (फल) · विकार-सङ्घात-समाहितत्वात् · बदलते हिस्सों के जोड़ से बना होने से।
अर्थ: यह आनन्दमय कोश भी परम आत्मा नहीं। क्योंकि यह उपाधि वाला है, प्रकृति का एक रूप है, एक परिणाम है (पुण्य-कर्म का फल), और बदलते हिस्सों के जोड़ से बना है।
भावार्थ: पाँचवीं और आख़िरी परत भी छिल जाती है। और गुरु एक बेहद ज़रूरी कारण देते हैं, आनन्दमय कोश “पुण्य-कर्म का फल” है।
यानी यह आनंद कमाया हुआ है। आपने अच्छे कर्म किए, उनका फल यह सुख-संतोष की परत है। पर जो “कमाया” जाता है, वह ख़र्च भी होता है। पुण्य चुकता, यह आनंद भी फीका। तो यह आख़िरी, सबसे चमकीली परत भी, असली नहीं। क्योंकि यह आती-जाती है, शर्त पर टिकी है। असली आत्म-आनंद कमाया नहीं जाता; वह आपका स्वभाव है, बिना शर्त, हमेशा। आनन्दमय कोश असली आनंद की एक झलक भर है, पर झलक स्रोत नहीं। पाँचों परतें अब छिल चुकीं।
210 · पाँचों के बाद, साक्षी बचता है
पञ्चानामपि कोशानां निषेधे युक्तितः श्रुतेः ।
तन्निषेधावधि साक्षी बोधरूपोऽवशिष्यते ॥ 210 ॥
pañcānām api kośānāṁ niṣedhe yuktitaḥ śruteḥ · tan-niṣedhāvadhi sākṣī bodha-rūpo’vaśiṣyate
शब्दार्थ: पञ्चानां कोशानां निषेधे · पाँचों कोशों के निषेध पर · युक्तितः श्रुतेः · तर्क और श्रुति से · तत्-निषेध-अवधि · उस निषेध की हद पर (निषेध करने वाला) · साक्षी बोध-रूपः अवशिष्यते · साक्षी, बोध-स्वरूप, बच रहता है।
अर्थ: तर्क और श्रुति से पाँचों कोशों का निषेध करने पर, उस निषेध की हद पर, साक्षी, बोध-स्वरूप, बच रहता है।
भावार्थ: यह पूरी पंच-कोश विधि का चरम है। पाँच परतें छील दी गईं, शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, आनंद। हर एक के बारे में कहा गया “यह मैं नहीं हूँ।” अब क्या बचा?
गुरु एक बेहद सूक्ष्म, और बेहद सुंदर बात कहते हैं, “तन्-निषेध-अवधि।” गौर कीजिए: हर परत को “नहीं। यह मैं नहीं” कह कर हटाया गया। पर यह “नहीं” कहने वाला कौन? यह निषेध करने वाला, यह जाँचने वाला, वह तो हर निषेध में मौजूद रहा, हर परत के पार जाते वक़्त वहीं खड़ा था। वही “साक्षी” है, “बोध-रूप”, शुद्ध जागरूकता। उसे हटाया नहीं जा सकता, क्योंकि उसे हटाने की कोशिश में भी वही मौजूद रहेगा। काई की आख़िरी परत हटी, और पानी सामने, वह जो हमेशा देख रहा था।
211 · यही आत्मा है, इसे अपना स्वरूप जानो
योऽयमात्मा स्वयंज्योतिः पञ्चकोशविलक्षणः ।
अवस्थात्रयसाक्षी सन्निर्विकारो निरञ्जनः सदानन्दः स विज्ञेयः स्वात्मत्वेन विपश्चिता ॥ 211 ॥
yo’yam ātmā svayaṁ-jyotiḥ pañca-kośa-vilakṣaṇaḥ · avasthā-traya-sākṣī sann nirvikāro nirañjanaḥ sadānandaḥ sa vijñeyaḥ svātmatvena vipaścitā
शब्दार्थ: यः अयम् आत्मा स्वयं-ज्योतिः · यह आत्मा, जो ख़ुद-प्रकाश है · पञ्च-कोश-विलक्षणः · पाँचों कोशों से अलग · अवस्था-त्रय-साक्षी · तीनों अवस्थाओं का साक्षी · निर्विकारः निरञ्जनः · निर्विकार, निर्मल · सदानन्दः · सदा-आनंद · स विज्ञेयः स्वात्मत्वेन विपश्चिता · विवेकी को इसे अपना स्वरूप जानना चाहिए।
अर्थ: यह आत्मा, जो ख़ुद-प्रकाश है, पाँचों कोशों से अलग, तीनों अवस्थाओं का साक्षी, निर्विकार, निर्मल, सदा-आनंद, विवेकी को इसे ही अपना स्वरूप जानना चाहिए।
भावार्थ: यह भाग 7 का समापन है, और पूरी पंच-कोश यात्रा का फल, एक श्लोक में, आत्मा का पूरा परिचय।
हर शब्द एक खंभा है: “ख़ुद-प्रकाश” (किसी और की रोशनी से नहीं चमकता), “पाँचों कोशों से अलग” (शरीर-प्राण-मन-बुद्धि-आनंद, कोई नहीं), “तीनों अवस्थाओं का साक्षी” (जागने-सपने-नींद, सबको देखने वाला), “निर्विकार” (कभी न बदलने वाला), “निर्मल”, “सदा-आनंद।” और आख़िरी शब्द सबसे ज़रूरी है, “स्वात्मत्वेन”, अपने स्वरूप के रूप में। यह आत्मा कोई दूर की, सीखने की चीज़ नहीं। यह “आप” हो। पाँच परतें छील कर जो बचा, वह कोई अजनबी नहीं। वह आपका सबसे अपना, सबसे असली रूप है, हमेशा से। काई हटी, पानी सामने, और वह पानी आप हैं।
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना: भाग 8, पाँचों परतें छिल गईं, साक्षी बच गया। पर अब शिष्य एक और तीखा सवाल उठाता है: “अगर सब कुछ नकार दिया, तो जो बचा वह बस एक ख़ालीपन तो नहीं?” गुरु उस ख़ालीपन और असली आत्मा का फ़र्क खोलते हैं, और फिर ब्रह्म की बात शुरू होती है।
और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 210 कहता है, हर परत को “यह मैं नहीं” कहने वाला, ख़ुद हर बार वहीं मौजूद रहा। आज एक पल, अपने किसी विचार या भाव को “देखिए”, और फिर देखिए कि देखने वाला कौन है। उसी की ओर यह पूरी किताब इशारा कर रही है।