विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 7 · पाँच कोश का दूसरा भाग, बुद्धि और आनंद · श्लोक 184-211
तीन परतें छिल चुकीं, अब दो सबसे सूक्ष्म शेष हैं, बुद्धि की और आनंद की। और बीच में शिष्य ठहर कर एक जलता हुआ संशय रखता है, कि यदि बंधन सदा से चला आ रहा है, तो उसका अंत भला कैसे संभव है। गुरु का उत्तर ही इस भाग का प्राण है।
अब चौथी परत सामने है, विज्ञानमय कोश, बुद्धि की परत। और इसकी पहचान एक ही शब्द में बँध जाती है, कर्ता। मनोमय कोश इच्छा करता था, शंका करता था; यह उससे एक डग और गहरा है, यही वह है जो दावा करता है, हम कर रहे हैं, जो निर्णय लेता है, जो स्वयं को इस पूरे खेल का करने वाला मान बैठता है। ज्ञान-इन्द्रियों के साथ, अपनी हलचलों सहित, यह बुद्धि ही मनुष्य के समूचे संसार-चक्र की धुरी है, और गुरु इसे सीधे संसार का कारण कह देते हैं। पर यह सबसे क़रीब है, सबसे अपना-सा जान पड़ता है, इसी से सबसे चुनौती-भरा है।

184 · विज्ञानमय कोश, बुद्धि की परत
बुद्धिर्बुद्धीन्द्रियैः सार्धं सवृत्तिः कर्तृलक्षणः ।
विज्ञानमायाकोशः स्यात्पुंसः संसारकारणम् ॥ 184 ॥
यहाँ एक शब्द पूरी गुत्थी खोल देता है, प्रतिबिंब। बुद्धि अपने आप जड़ है, प्रकृति का एक रूप भर। पर वह आत्मा की चेतना का प्रतिबिंब अपने भीतर ले लेती है, जैसे स्वच्छ जल चाँद को अपने भीतर झलका लेता है, और फिर जागरूक-सी जान पड़ने लगती है। यहीं से असली गड़बड़ उठती है, यह उधार की रोशनी वाली बुद्धि हम का दावा कर बैठती है, और शरीर-इन्द्रियों से अपने को कस कर जोड़ लेती है। जानने और करने वाली बन कर, लगातार, ज़ोर से, वह शरीर आदि में हम मान बैठती है। जल चाँद की चमक पा कर सोचने लगे कि हम चमकते हैं, यही विज्ञानमय कोश की भूल है।
185 · चेतना का प्रतिबिंब
अनुव्रजच्चित्प्रतिबिम्बशक्तिः विज्ञानसंज्ञः प्रकृतेर्विकारः ।
ज्ञानक्रियावानहमित्यजस्रं देहेन्द्रियादिष्वभिमन्यते भृशम् ॥ 185 ॥
अब गुरु इस कर्ता-भाव को नाम देते हैं, जीव। और सावधान कीजिए, जीव कोई आत्मा नहीं; वह विज्ञानमय कोश का ही एक रूप है, हम का बोझ ढोने वाला। चित्र यों समझिए, एक कुली जन्म-जन्म से सिर पर एक भारी गठरी ढो रहा है। गठरी में क्या है, पुरानी वासनाएँ, पुराने कर्म, और उनके फल। अनादि काल से हम-स्वभाव वाला यह जीव सारे व्यवहार का बोझ उठाता है, पुरानी वासनाओं से चलता हुआ पुण्य-पाप करता जाता है और उनके फल भी भोगता जाता है, और कुली कहीं रुकता नहीं। यही जीव है, कर्म और वासना का न थमने वाला बोझ। पर कुली गठरी नहीं, और गठरी उतारी जा सकती है।
186 · जीव, कर्म और वासना ढोने वाला
अनादिकालोऽयमहंस्वभावो जीवः समस्तव्यवहारवोढा ।
करोति कर्माण्यपि पूर्ववासनः पुण्यान्यपुण्यानि च तत्फलानि ॥ 186 ॥
गुरु यहाँ एक बारीक बात साफ़ कर देते हैं, जो आता-जाता है, जो जन्म-दर-जन्म भटकता है, वह यही जीव है, यानी विज्ञानमय कोश, आत्मा नहीं। आत्मा कहीं नहीं जाती, वह अचल है। यही कर्ता-बुद्धि तरह-तरह की योनियों में जा-जा कर भोगती है, ऊपर-नीचे आती-जाती है। जागृत, स्वप्न और शेष अवस्थाएँ, सुख और दुख का सारा भोग, सब इसी एक परत के हैं। जिस क्षण इस परत से अपनी पहचान छूटती है, वह पूरा भटकाव अपना नहीं रह जाता, और तब केवल उसे देखता हुआ, अचल साक्षी शेष रहता है।
187 · योनि-दर योनि, सुख-दुख का भोग
भुङ्क्ते विचित्रास्वपि योनिषु व्रजन् नायाति निर्यात्यध ऊर्ध्वमेषः ।
अस्यैव विज्ञानमायास्य जाग्रत् स्वप्नाद्यवस्थाः सुखदुःखभोगः ॥ 187 ॥
अब गुरु एक बहुत गहरी बात कहते हैं, यह विज्ञान कोश बहुत चमकीला है, और क्यों, क्योंकि यह परम आत्मा के सबसे पास है। यहीं इसका ख़तरा छिपा है। शरीर और प्राण की परतें साफ़ जड़ जान पड़ती हैं, उन्हें हम मानना अपेक्षाकृत आसानी से छूट जाता है। पर बुद्धि आत्मा की चेतना के इतने निकट है, उसका प्रतिबिंब इतना स्वच्छ ले लेती है, कि वह स्वयं जागरूक चेतना जैसी जान पड़ती है। शरीर आदि से जुड़े आश्रम, धर्म, कर्म और गुणों को यह मेरा, यह मेरा, ऐसा अभिमान करती हुई यह आत्मा की उपाधि बन जाती है, और इसी से आत्मा भ्रम से संसार में भटकती दिखती है। चाँद के सबसे पास का बादल सबसे ज़्यादा चमकता है, और इसी से सबसे सरलता से चाँद समझ लिया जाता है।
188 · सबसे चमकीली परत, और सबसे बड़ा भ्रम
देहादिनिष्ठाश्रमधर्मकर्म गुणाभिमानः सततं ममेति ।
विज्ञानकोशोऽयमतिप्रकाशः प्रकृष्टसान्निध्यवशात्परात्मनः ।
अतो भवत्येष उपाधिरस्य यदात्मधीः संसरति भ्रमेण ॥ 188 ॥
एक शब्द यहाँ बहुत सुंदर है, कूटस्थ। कूटस्थ का अर्थ है वह जो लोहार की निहाई की भाँति बिल्कुल अचल हो। निहाई पर हथौड़े के हज़ार वार पड़ते हैं, उस पर सब कुछ घड़ा जाता है, पर निहाई स्वयं हिलती नहीं। आत्मा ऐसी ही है, कूटस्थ, बिल्कुल अचल, वह कभी कुछ करती ही नहीं। यह विज्ञानमय कोश प्राणों में, हृदय में एक ज्योति की तरह चमकता है, और आत्मा इस उपाधि में बैठ कर कर्ता और भोक्ता बन जाती है। राजा सिंहासन पर बैठे तो सिंहासन वाला कहलाने लगता है, पर राजा सिंहासन नहीं। आत्मा बुद्धि की कुर्सी पर बैठ कर कर्ता दिखती है, पर कर्ता है नहीं; कुर्सी से उठते ही वह फिर वही कूटस्थ, अचल साक्षी।
189 · कूटस्थ, कर्ता बन बैठता है
योऽयं विज्ञानमायाः प्राणेषु हृदि स्फुरत्ययं ज्योतिः ।
कूटस्थः सन्नात्मा कर्ता भोक्ता भवत्युपाधिस्थः ॥ 189 ॥
अब एक प्यारी उपमा आती है, मिट्टी और घड़े। दस घड़े रखे हैं, और दृष्टि उन्हें दस अलग वस्तुएँ देखती है, यह घड़ा, वह घड़ा, यह बड़ा, वह छोटा। पर गहराई से वे दस अलग वस्तुएँ नहीं, एक ही मिट्टी के दस रूप हैं; मिट्टी की दृष्टि से सब एक, घड़ों की दृष्टि से सब अलग। आत्मा भी ऐसी ही है, सबका एक सार, मिट्टी की भाँति। पर बुद्धि से तादात्म्य के दोष से वह स्वयं को एक सीमित घड़ा मान बैठती है, और फिर शेष सबको भी अलग-अलग घड़े देखती है। भेद से भरी यह सारी दुनिया इसी एक भूल से खड़ी होती है, मिट्टी को भूल कर घड़े गिनना।
190 · घड़ों को मिट्टी से अलग देखना
स्वयं परिच्छेदमुपेत्य बुद्धेः तादात्म्यदोषेण परं मृषात्मनः ।
सर्वात्मकः सन्नपि वीक्षते स्वयं स्वतः पृथक्त्वेन मृदो घटानिव ॥ 190 ॥
गुरु फिर वही तपे लोहे की उपमा लाते हैं, क्योंकि यह विज्ञानमय कोश के भ्रम को ठीक-ठीक पकड़ती है। तपा हुआ लोहा लाल है, गरम है, मुड़ता है, ठंडा होता है। आग लोहे में बैठी है, और लोहे के ये सारे बदलाव मानो आग के ही बदलाव जान पड़ते हैं। पर आग स्वयं न लाल हुई, न मुड़ी, न ठंडी हुई, वह वही रही। आत्मा भी बुद्धि की उपाधि में बैठ कर उसके गुणों को अपना-सा दिखाने लगती है; बुद्धि बदलती है, प्रसन्न, उदास, उलझी, और लगता है आत्मा बदल रही है। पर स्वभाव से, अपने असली रूप में, वह सदा एक-सी, सदा वही, अचल रहती है। बुद्धि के सारे मौसम उसे छूते तक नहीं।
191 · तपे लोहे की तरह, दिखता बदला, है वही
उपाधिसंबन्धवशात्परात्मा ह्युपाधिधर्माननुभाति तद्गुणः ।
अयोविकारानविकारिवन्हिवत् सदैकरूपोऽपि परः स्वभावात् ॥ 191 ॥
यहीं शिष्य ठहर जाता है, और एक पैना, ईमानदार संशय रखता है। गुरु ने अभी कहा था कि जीव-भाव भ्रम है। शिष्य पीछे नहीं हटता, वह तर्क की डोर थाम लेता है। उसका कहना है, मान लीजिए आत्मा का जीव-भाव भ्रम से ही है, या किसी और रीति से, पर वह उपाधि तो अनादि है, सदा से चली आ रही। और जो अनादि है, उसका नाश तो माना नहीं जाता। यह दुर्बल प्रश्न नहीं, एक तीक्ष्ण शिष्य का सच्चा, जलता हुआ संशय है। शिष्य आँख मूँद कर नहीं मानता, और अगला श्लोक इस संशय को और स्पष्ट कर देता है।
192 · शिष्य का संशय, उपाधि तो अनादि है
शिष्य उवाच,
भ्रमेणाप्यन्यथा वास्तु जीवभावः परात्मनः ।
तदुपाधेरनादित्वान्नानादेर्नाश इष्यते ॥ 192 ॥
और अब शिष्य का संशय बहुत निजी हो उठता है। इसलिए, वह कहता है, इसका जीव-भाव भी नित्य हो जाता है, और संसार-चक्र भी; वह कभी मिटेगा नहीं। तो हे गुरुदेव, हमारा मोक्ष भला कैसे होगा, बताइए। यह अब बौद्धिक वाद-विवाद नहीं रहा। शिष्य एक सच्ची आशंका के साथ बोल रहा है, कि यदि तर्क से जीव-भाव अनादि है और संसार नित्य है, तो मुक्ति की समस्त संभावना ही समाप्त हो जाती है। यहीं एक सच्चे साधक की यात्रा रुक सकती है। विवेकचूडामणि इस संशय को दबाती नहीं, उसे पूरे, स्पष्ट रूप में सामने रख देती है, क्योंकि सच्चा उत्तर तभी मिलता है जब प्रश्न पूरी ईमानदारी से पूछा जाए। अब गुरु उत्तर देते हैं।
193 · “तो हमारा मोक्ष कैसे होगा, गुरुदेव?”
अतोऽस्य जीवभावोऽपि नित्या भवति संसृतिः ।
न निवर्तेत तन्मोक्षः कथं मे श्रीगुरो वद ॥ 193 ॥
गुरु उत्तर का आरंभ ही प्रश्न की प्रशंसा से करते हैं, हे विद्वान, आपने अच्छा पूछा; ध्यान से सुनिए। सच्चा गुरु संशय को दबाता नहीं, उसका स्वागत करता है। फिर वे पहली, बुनियादी कुंजी रखते हैं, कि भ्रम से मोहित एक कल्पना कभी प्रमाण नहीं होती। शिष्य का पूरा तर्क इस मान्यता पर चल रहा था कि जीव-भाव एक असली वस्तु है, जिसका हिसाब लगाना है। गुरु वही नींव खिसका देते हैं, कि जीव-भाव एक भ्रम है, और भ्रम के तर्क से असली नियम नहीं बनते। अगले श्लोक इसी को खोलते हैं।
194 · “अच्छा पूछा, ध्यान से सुनो”
श्रीगुरुरुवाच,
सम्यक्पृष्टं त्वया विद्वन्सावधानेन तच्छृणु ।
प्रामाणिकी न भवति भ्रान्त्या मोहितकल्पना ॥ 194 ॥
अब गुरु एक बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं, आकाश का नीलापन। आकाश नीला प्रतीत होता है, पर क्या आकाश सचमुच नीला है। नहीं, आकाश तो रंगहीन, रिक्त है; नीलापन एक भ्रम है, प्रकाश के बिखरने से प्रतीत होता है। अब यदि कोई पूछे कि आकाश का नीलेपन से संबंध कब से है, तो प्रश्न ही व्यर्थ है, क्योंकि वह संबंध है ही नहीं। आत्मा असंग है, निष्क्रिय है, निराकार है; भ्रम के बिना उसका किसी चीज़ से कोई असली संबंध बन ही नहीं सकता, ठीक जैसे आकाश का नीलेपन से। तब यह तर्क कि वह संबंध अनादि है, इसलिए अनंत, अपने आप गिर जाता है, क्योंकि जो है ही नहीं, उसकी आयु पूछना ही असंगत है।
195 · आकाश का नीलापन
भ्रान्तिं विना त्वसङ्गस्य निष्क्रियस्य निराकृतेः ।
न घटेतार्थसंबन्धो नभसो नीलतादिवत् ॥ 195 ॥
अब गुरु सीधे शिष्य के डर पर हाथ रखते हैं। शिष्य डरा था कि जीव-भाव अनादि है, इसलिए अमर। गुरु कहते हैं, यह जीव-भाव कोई असली वस्तु है ही नहीं। आत्मा, जो द्रष्टा है, निर्गुण है, क्रिया-रहित है, भीतर का बोध-आनंद-स्वरूप है, उसका भ्रम से आया यह जीव-भाव सच नहीं; मोह हटते ही वह नहीं रहता, क्योंकि वह असली चीज़ ही नहीं। जो वस्तु असली ही नहीं, उसे मिटाने का श्रम नहीं करना पड़ता; वह मोह हटते ही स्वयं नहीं रहती। स्वप्न का राक्षस कितनी भी देर का हो, उसे मारना नहीं पड़ता, आँख खुलते ही वह नहीं रहता, क्योंकि वह कभी था ही नहीं। शिष्य की आशंका इसी मान्यता पर टिकी थी कि जीव-भाव एक ठोस बेड़ी है, गुरु वह मान्यता ही हटा देते हैं।
196 · भ्रम से आया जीव-भाव सच नहीं
स्वस्य द्रष्टुर्निर्गुणस्याक्रियस्य प्रत्यग्बोधानन्दरूपस्य बुद्धेः ।
भ्रान्त्या प्राप्तो जीवभावो न सत्यो मोहापाये नास्त्यवस्तुस्वभावात् ॥ 196 ॥
अब गुरु पूरे उत्तर को रस्सी और साँप की भाषा में रख देते हैं, और यही श्लोक शिष्य के संशय को सीधे काट देता है। साँप का होना किस पर टिका है, भ्रम पर। जब तक रस्सी को साँप समझा जा रहा है, साँप है; जिस क्षण भ्रम मिटा, साँप गया। अब उस साँप का जन्म किस क्षण हुआ था, यह कोई नहीं बता सकता, वह तो जब से भ्रम था तब से था, अर्थात् अपनी रीति से अनादि था। पर क्या इससे वह अमर हो गया, बिल्कुल नहीं, प्रकाश आते ही गया। मिथ्या-ज्ञान से उठे इस जीव-भाव का होना भी बस उतनी ही देर है जितनी देर भ्रम है। अनादि होना और अमर होना, ये दो अलग बातें हैं।
197 · रस्सी का साँप, भ्रम भर रहता है
यावद्भ्रान्तिस्तावदेवास्य सत्ता मिथ्याज्ञानोज्जृम्भितस्य प्रमादात् ।
रज्ज्वां सर्पो भ्रान्तिकालीन एव भ्रान्तेर्नाशे नैव सर्पोऽपि तद्वत् ॥ 197 ॥
अब गुरु शिष्य के तर्क को आधा स्वीकार करते हैं, और यही उनके उत्तर को इतना सबल बनाता है। वे कहते हैं, अविद्या अनादि है, और उसका कार्य भी अनादि है; शिष्य की बात तर्क में ठीक है, गुरु उसे झुठलाते नहीं। पर तभी एक किन्तु रखते हैं, जैसे ही विद्या उठती है। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है, और इसी अधूरे वाक्य में पूरा उत्तर छिपा है, कि अनादि होना एक बात है, ज्ञान के सामने टिक पाना दूसरी। रात कब आरंभ हुई, यह कोई नहीं बता सकता, पर सूर्य निकलते ही वह जाती है, चाहे कितनी भी पुरानी रही हो।
198 · अविद्या अनादि, पर ज्ञान होते ही…
अनादित्वमविद्यायाः कार्यस्यापि तथेष्यते ।
उत्पन्नायां तु विद्यायामाविद्यकमनाद्यपि ॥ 198 ॥
अब गुरु पिछले श्लोक का वाक्य पूरा करते हैं, और दो उदाहरण देते हैं। पहला, स्वप्न। एक लंबा स्वप्न देखा गया, उसमें एक पूरा इतिहास था, बरसों की कथाएँ। आँख खुली, और वह सारा स्वप्न जड़ समेत ग़ायब, उसका बरसों वाला इतिहास भी। दूसरा उदाहरण और सूक्ष्म है, प्राग्-अभाव, अर्थात् किसी चीज़ के बनने से पहले का न-होना। घड़ा बनने से पहले उसका न-होना कब से था, सदा से, अनादि। पर घड़ा बनते ही वह न-होना समाप्त हो गया। तो यहाँ एक वस्तु है जो अनादि भी है और मिट भी जाती है। प्रबोध होते ही यह सब, स्वप्न की तरह, जड़ समेत मिट जाता है; अनादि होते हुए भी यह नित्य नहीं। अनादि और अनंत का साथ चलना आवश्यक नहीं।
199 · जागते ही, सपना, जड़ समेत
प्रबोधे स्वप्नवत्सर्वं सहमूलं विनश्यति ।
अनाद्यपीदं नो नित्यं प्रागभाव इव स्फुटम् ॥ 199 ॥
अब गुरु अपनी बात पर मुहर लगा देते हैं, अनादि वस्तु का भी नाश देखा गया है, प्राग्-अभाव में। यह देखा गया शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। गुरु कोई काल्पनिक तर्क नहीं दे रहे, वे कहते हैं यह बात अनुभव से, उदाहरण से सिद्ध है। अनादि वस्तु का अंत हो सकता है, यह कोई सैद्धांतिक छूट नहीं, एक देखी हुई सच्चाई है। और यह जीव-भाव तो वही है, जो बुद्धि-उपाधि के संबंध से आत्मा में गढ़ दिया गया है, आत्मा पर एक झूठी परत की भाँति चढ़ा हुआ। गढ़ी हुई वस्तु हटाई जा सकती है, चाहे वह कितनी भी पुरानी हो। इससे शिष्य की पूरी आशंका शांत हो जाती है।
200 · अनादि चीज़ का भी नाश देखा गया है
अनादेरपि विध्वंसः प्रागभावस्य वीक्षितः ।
यद्बुद्ध्युपाधिसंबन्धात्परिकल्पितमात्मनि ॥ 200 ॥
अब गुरु जीव-भाव की असलियत एकदम साफ़ कर देते हैं, और दो बातें एक साथ कहते हैं, जो पहली नज़र में उल्टी लगती हैं, पर मिल कर पूरी तस्वीर बनाती हैं। एक, जीवपन आत्मा से कोई अलग चीज़ नहीं; जीव कोई स्वतंत्र हस्ती नहीं, वह आत्मा ही है, एक भ्रम के परदे में। दो, स्वरूप से आत्मा बुद्धि से बिल्कुल अलग है; अपने असली रूप में आत्मा का बुद्धि से कोई जुड़ाव ही नहीं। तो जीव क्या है, आत्मा, जो बुद्धि से जुड़ी हुई दिखती है, पर वह जुड़ाव मिथ्या-ज्ञान पर टिका है, असली नहीं। फिर वही रस्सी और साँप, साँप रस्सी से अलग कोई चीज़ नहीं, वह रस्सी ही है, और रस्सी का साँप से कोई असली रिश्ता नहीं।
201 · जीव-भाव, आत्मा से अलग कुछ नहीं
जीवत्वं न ततोऽन्यस्तु स्वरूपेण विलक्षणः ।
संबन्धस्त्वात्मनो बुद्ध्या मिथ्याज्ञानपुरःसरः ॥ 201 ॥
अब गुरु शिष्य के संशय का अंतिम उत्तर देते हैं। शिष्य ने पूछा था, हमारा मोक्ष कैसे होगा, और यह श्लोक सीधा कहता है, सम्यग्-ज्ञान से, और किसी रीति से नहीं। और गुरु इस सही ज्ञान को एक विशिष्ट परिभाषा देते हैं, ब्रह्म और आत्मा की एकता का ज्ञान। सही ज्ञान बहुत-सी जानकारी जमा करना नहीं, वह एक विशेष पहचान है, कि ब्रह्म और हम दो नहीं, एक हैं। यही समस्त विवेकचूडामणि का केंद्र है, और बंधन की एकमात्र औषधि। शिष्य की आशंका अब पूरी तरह शांत हो चुकी, कि बंधन अनादि भले हो, सही ज्ञान उसे मिटा देता है।
202 · सिर्फ़ सम्यक्-ज्ञान से
विनिवृत्तिर्भवेत्तस्य सम्यग्ज्ञानेन नान्यथा ।
ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं सम्यग्ज्ञानं श्रुतेर्मतम् ॥ 202 ॥
अब गुरु पूरी बात को एक करने योग्य कर्म पर ले आते हैं, और किताब का नाम फिर सामने आ जाता है। सही ज्ञान कैसे आएगा, विवेक से। यह सही ज्ञान आत्मा और अनात्मा के सही विवेक से ही सिद्ध होता है, इसलिए भीतर के आत्मा और सद्-आत्मा, असली स्वरूप, का विवेक करना चाहिए। यह श्लोक पूरे उत्तर को एक करणीय कर्म में बदल देता है। शिष्य अब आशंका से बाहर है, पर इतना पर्याप्त नहीं; अब क्या करना है, यह स्पष्ट होना चाहिए। और उत्तर वही सीधा शब्द है, विवेक, असली और नक़ली में भेद करना, परत-दर-परत, ठीक वही कर्म जो यह भाग कर रहा है, कोश छीलना। यहाँ चर्चा एक पूरा घेरा बना लेती है, शिष्य का संशय शांत हुआ, और वह उसी विधि पर लौट आया जो चल रही थी।
203 · इसलिए, विवेक करो
तदात्मानात्मनोः सम्यग्विवेकेनैव सिध्यति ।
ततो विवेकः कर्तव्यः प्रत्यगात्मसदात्मनोः ॥ 203 ॥
भाग की काई-तालाब वाली तस्वीर अब थोड़ा बदल कर लौटती है, गंदला पानी और कीचड़। एक पात्र में मटमैला पानी है। उसमें कोई स्वच्छक मिलाना नहीं, कुछ बनाना नहीं; केवल पात्र को टिका कर कीचड़ को बैठ जाने देना है, और कुछ देर में वही पानी स्वयं स्वच्छ दिखने लगता है। पानी सदा स्वच्छ था, कीचड़ बस उसमें मिला हुआ था। आत्मा भी ऐसी ही है; गंदला पानी कीचड़-जैसा दिखता है, कीचड़ हटते ही वही पानी साफ़ दिखने लगता है, वैसे ही आत्मा भी दोष हटते ही साफ़ चमकने लगती है। कोई नई, चमकती आत्मा बनानी नहीं, केवल दोष, कोशों की मिलावट, हटने देना है। यह जोड़ने का नहीं, हटने देने का कार्य है।
204 · कीचड़ हटे, पानी साफ़
जलं पङ्कवदत्यन्तं पङ्कापाये जलं स्फुटम् ।
यथा भाति तथात्मापि दोषाभावे स्फुटप्रभः ॥ 204 ॥
अब गुरु एक व्यावहारिक नियम देते हैं, और एक शब्द ध्यान देने लायक़ है, अहम्-आदि। असत्, यानी नक़ली, के हट जाने पर ही इस भीतर के आत्मा का सद्-रूप में साफ़ अनुभव होता है; इसलिए सद्-आत्मा से हम आदि सब चीज़ों को अच्छी तरह हटा देना ही चाहिए। हटाने योग्य वस्तुओं में सबसे ऊपर है अहम्, यह हम वाला भाव, जो विज्ञानमय कोश का केंद्र है। असली स्वरूप तभी स्पष्ट अनुभव होगा जब यह हम कर्ता हैं, हम भोक्ता हैं वाला छोटा हम हटे। यह सबसे कठिन हटाव है, क्योंकि इसी से साधक सबसे गहराई से जुड़ा रहता है। पर विधि वही, गिलास से कीचड़ बैठ जाए तो पानी स्वयं स्वच्छ। छोटा हम हटे, तो असली आत्मा स्वयं प्रकाशित।
205 · असत् हटे, तभी सत् साफ़ दिखे
असन्निवृत्तौ तु सदात्मना स्फुटं प्रतीतिरेतस्य भवेत्प्रतीचः ।
ततो निरासः करणीय एव सदात्मनः साध्वहमादिवस्तुनः ॥ 205 ॥
और इसी के साथ चौथी परत, विज्ञानमय कोश, बुद्धि, भी छिल जाती है। गुरु पाँच कारण गिनाते हैं, और हर एक एक छोटा-सा परीक्षण है, यह कोश परम आत्मा नहीं, क्योंकि यह बदलता है, जड़ है, सीमित है, देखा जाता है, और अनियत है; जो अनित्य हो, वह नित्य आत्मा नहीं माना जाता। सबसे गहरा वही है, देखा जाना। बुद्धि के व्यापार को देखा जा सकता है, हमने यह तय किया, हमारी सोच यह कहती है। यह कह पाना ही सिद्ध कर देता है कि बुद्धि एक दृश्य है, और देखने वाला उससे अलग द्रष्टा। यह सबसे कठिन परत थी, क्योंकि आत्मा के सबसे निकट है, पर वही अंतिम जाँच इसे भी अलग कर देती है।
206 · विज्ञानमय भी आत्मा नहीं
अतो नायं परात्मा स्याद्विज्ञानमायाशब्दभाक् ।
विकारित्वाज्जडत्वाच्च परिच्छिन्नत्वहेतुतः ।
दृश्यत्वाद्व्यभिचारित्वान्नानित्यो नित्य इष्यते ॥ 206 ॥
अब पाँचवीं और आख़िरी परत सामने है, आनन्दमय कोश, आनंद की परत। और यह सबसे सूक्ष्म है, सबसे सरलता से आत्मा समझ ली जाने वाली, क्योंकि इसका नाम ही आनंद है। यह कब अनुभव होता है, जब कोई मनचाही चीज़ मिले, एक पल का सुकून, संतोष की एक लहर। आनंद के प्रतिबिंब से छुई, तमस से उठी यह एक वृत्ति है; इसमें प्रिय आदि गुण होते हैं, और यह मनचाही चीज़ मिलने पर उभरता है, और यहीं बिना किसी प्रयत्न के हर देहधारी आनंदित हो उठता है। पर गुरु इसकी असलियत खोल देते हैं, यह आत्मा का असली आनंद नहीं, यह आनंद का प्रतिबिंब है, उधार की चमक, फिर वही चाँद और जल। असली आत्म-आनंद बिना शर्त है, हमेशा; यह कोश शर्त वाला है, इसलिए जो आता है, वह जाता भी है।
207 · आनन्दमय कोश, आनंद की परत
आनन्दप्रतिबिम्बचुम्बिततनुर्वृत्तिस्तमोजृम्भिता स्यादानन्दमायाः प्रियादिगुणकः स्वेष्टार्थलाभोदयः ।
पुण्यस्यानुभवे विभाति कृतिनामानन्दरूपः स्वयं सर्वो नन्दति यत्र साधु तनुभृन्मात्रः प्रयत्नं विना ॥ 207 ॥
अब गुरु इस कोश को उसकी अवस्था से जोड़ देते हैं। जैसे अन्नमय का साथी जागृत था, सूक्ष्म का स्वप्न, वैसे ही आनन्दमय का साथी है गहरी नींद। इस कोश की सबसे तेज़ झलक गहरी नींद में होती है; स्वप्न और जागृत में यह बस थोड़ी-सी झलकता है, और वह भी तभी जब कुछ मनचाहा मिले। गुरु एक प्यारी तुलना करते हैं, जागते-सपने में आनंद बस थोड़ा-सा झलकता है, शर्त के साथ, पर गहरी नींद में, जब बाहर कुछ भी नहीं, कोई मनचाही चीज़ नहीं, फिर भी आनंद, और सबसे तेज़। यह एक इशारा है, आनंद का स्रोत बाहर नहीं। पर यही अगला श्लोक कहेगा, गहरी नींद का यह आनंद भी अभी आख़िरी मंज़िल नहीं।
208 · गहरी नींद में सबसे साफ़
आनन्दमायाकोशस्य सुषुप्तौ स्फूर्तिरुत्कटा ।
स्वप्नजागरयोरीषदिष्टसंदर्शनाविना ॥ 208 ॥
और अब पाँचवीं, सबसे चमकीली परत भी छिल जाती है। गुरु एक बेहद ज़रूरी कारण देते हैं, यह आनन्दमय कोश पुण्य-कर्म का फल है। यानी यह आनंद कमाया हुआ है; आपने अच्छे कर्म किए, उनका फल यह सुख-संतोष की परत है। पर जो कमाया जाता है, वह ख़र्च भी होता है; पुण्य चुकता, यह आनंद भी फीका। यह कोश परम आत्मा नहीं, क्योंकि यह उपाधि वाला है, प्रकृति का एक रूप है, एक परिणाम है, और बदलते हिस्सों के जोड़ से बना है। असली आत्म-आनंद कमाया नहीं जाता, वह आपका स्वभाव है, बिना शर्त, हमेशा। आनन्दमय कोश असली आनंद की एक झलक भर है, पर झलक स्रोत नहीं। पाँचों परतें अब छिल चुकीं।
209 · आनन्दमय भी आत्मा नहीं
नैवायमानन्दमायाः परात्मा सोपाधिकत्वात्प्रकृतेर्विकारात् ।
कार्यत्वहेतोः सुकृतक्रियाया विकारसङ्घातसमाहितत्वात् ॥ 209 ॥
यह पूरी पंच-कोश विधि का चरम है। पाँच परतें छील दी गईं, शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, आनंद, और हर एक के बारे में कहा गया, यह हम नहीं हैं। अब क्या बचा। गुरु एक बहुत सूक्ष्म, बहुत सुंदर बात कहते हैं, तर्क और श्रुति से पाँचों कोशों का निषेध करने पर, उस निषेध की हद पर, साक्षी, बोध-स्वरूप, बच रहता है। हर परत को यह हम नहीं कह कर हटाया गया, पर यह नहीं कहने वाला कौन। यह निषेध करने वाला, यह जाँचने वाला, हर निषेध में उपस्थित रहा, हर परत के पार जाते समय वहीं खड़ा था। वही साक्षी है, बोध-रूप, शुद्ध चेतना। उसे हटाया नहीं जा सकता, क्योंकि हटाने के प्रयत्न में भी वही उपस्थित रहता है। काई की अंतिम परत हटी, और पानी सामने, वही जो सदा देख रहा था।
210 · पाँचों के बाद, साक्षी बचता है
पञ्चानामपि कोशानां निषेधे युक्तितः श्रुतेः ।
तन्निषेधावधि साक्षी बोधरूपोऽवशिष्यते ॥ 210 ॥
और अब भाग 7 का समापन, और पूरी पंच-कोश यात्रा का फल, एक श्लोक में, आत्मा का पूरा परिचय। हर शब्द एक आधार है, ख़ुद-प्रकाश, जो किसी और के प्रकाश से नहीं चमकता; पाँचों कोशों से अलग; तीनों अवस्थाओं का साक्षी, जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, सबको देखने वाला; निर्विकार, कभी न बदलने वाला; निर्मल; और सदा-आनंद। और अंतिम शब्द सबसे महत्वपूर्ण है, अपने स्वरूप के रूप में। यह आत्मा कोई दूर की, सीखने की वस्तु नहीं, यही साधक का अपना स्वरूप है, और विवेकी को इसे ही अपना स्वरूप जानना चाहिए। पाँच परतें छील कर जो शेष रहा, वह कोई अजनबी नहीं, वह उसका सबसे अपना, सबसे असली रूप है, सदा से। काई हटी, पानी सामने, और वही पानी उसका अपना स्वरूप है।
211 · यही आत्मा है, इसे अपना स्वरूप जानो
योऽयमात्मा स्वयंज्योतिः पञ्चकोशविलक्षणः ।
अवस्थात्रयसाक्षी सन्निर्विकारो निरञ्जनः सदानन्दः स विज्ञेयः स्वात्मत्वेन विपश्चिता ॥ 211 ॥
आगे
अगला पन्ना भाग 8 है। पाँचों परतें छिल गईं, साक्षी शेष रह गया। पर अब शिष्य एक और गहरा संशय उठाता है, कि यदि सब कुछ नकार दिया, तो जो बचा वह कहीं केवल शून्य तो नहीं। गुरु उस शून्य और असली आत्मा का भेद खोलते हैं, और फिर ब्रह्म की चर्चा आरंभ होती है।
श्लोक 210 स्मरण रहे, हर परत को “यह मैं नहीं” कहने वाला, स्वयं हर बार वहीं उपस्थित रहा। यह पूरी रचना उसी द्रष्टा की ओर संकेत करती है।