भाग 8 · साक्षी और ब्रह्म

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 8 · साक्षी, और ब्रह्म · श्लोक 212-240

पाँचों परतें छिल गईं, और शिष्य घबरा जाता है: “अगर सब कुछ नकार दिया, तो जो बचा वह बस एक ख़ालीपन तो नहीं?” गुरु उस ख़ालीपन और असली आत्मा का फ़र्क खोलते हैं, और फिर एक बड़ी बात कहते हैं: यह पूरा संसार भी ब्रह्म ही है।

29 श्लोक · पढ़ने का समय ~ 36 मिनट · पहले पढ़ें: भाग 7 · पाँच कोश · दूसरा भाग · आगे-पीछे: विवेकचूडामणि मुख्य पृष्ठ

पहले एक बात

यह भाग एक बहुत ईमानदार डर से शुरू होता है। पाँच कोश छील दिए गए, शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, आनंद। हर एक के बारे में कहा गया “यह मैं नहीं।” और अब शिष्य रुक कर एक डरा हुआ सवाल पूछता है: अगर सब कुछ नकार दिया, तो जो बचा, वह बस एक ख़ालीपन है? क्या मैं अंत में एक “कुछ नहीं” हूँ?

यह सवाल बहुत ज़रूरी है, क्योंकि यह वह जगह है जहाँ नेति-नेति की पूरी विधि उल्टी पड़ सकती है। गुरु का जवाब इस भाग का पहला हिस्सा है, और वह बेहद सूक्ष्म है: जो “ख़ालीपन” को भी देख रहा है, वह ख़ुद ख़ाली नहीं हो सकता।

और फिर भाग एक बड़े मोड़ पर जाता है। अब तक बात “आप क्या हो” की थी। अब गुरु एक और कदम उठाते हैं, यह पूरा संसार भी, आख़िर में, वही एक ब्रह्म है। मिट्टी और घड़े की तस्वीर से वे यह खोलते हैं। भीतर का साक्षी और बाहर का ब्रह्म, दोनों एक निकलते हैं।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। दो हिस्से, साक्षी (212-222: शिष्य का ख़ालीपन-वाला डर, और गुरु का जवाब), और ब्रह्म (223-240: संसार भी ब्रह्म है)। असली खंभे: 214 (जो सबको जानता है, ख़ुद नहीं जाना जाता), 218-220 (घड़े के पानी में सूरज), 228-229 (मिट्टी और घड़ा), 240 (ब्रह्म पूर्ण, मैं ही वह ज्योति)। हर श्लोक पर anchor है।

212 · शिष्य का डर, “तो बस ख़ालीपन बचा?”

शिष्य उवाच,
मिथ्यात्वेन निषिद्धेषु कोशेष्वेतेषु पञ्चसु ।
सर्वाभावं विना किंचिन्न पश्याम्यत्र हे गुरो विज्ञेयं किमु वस्त्वस्ति स्वात्मनात्मविपश्चिता ॥ 212 ॥

śiṣya uvāca, mithyātvena niṣiddheṣu kośeṣv eteṣu pañcasu · sarvābhāvaṁ vinā kiṁcin na paśyāmy atra he guro vijñeyaṁ kim u vastv asti svātmanātma-vipaścitā

शब्दार्थ: मिथ्यात्वेन निषिद्धेषु · मिथ्या कह कर नकार दिए जाने पर · पञ्चसु कोशेषु · पाँचों कोशों के · सर्व-अभावं विना किंचित् न पश्यामि · सब के अभाव के सिवा कुछ नहीं दिखता · विज्ञेयं किमु वस्तु अस्ति · जानने योग्य कौनसी चीज़ बची है · स्व-आत्म-आत्म-विपश्चिता · आत्म-ज्ञानी द्वारा।

अर्थ: शिष्य ने कहा, इन पाँचों कोशों को मिथ्या कह कर नकार देने पर, हे गुरुदेव, यहाँ मुझे “सब का अभाव”, एक सरासर ख़ालीपन, के सिवा कुछ नहीं दिखता। तो आत्म-ज्ञानी के लिए जानने योग्य कौनसी चीज़ बची है?

भावार्थ: यह विवेकचूडामणि का एक बेहद ज़रूरी, और बेहद ईमानदार क्षण है। शिष्य ने पूरी विधि निभाई, एक-एक परत छीली, हर एक को “नहीं” कहा। और अब वह एक डर के साथ रुकता है: सब कुछ हटा दिया, तो हाथ में बचा क्या? बस एक ख़ालीपन?

यह डर असली है, और हर सच्चे साधक को छूता है। नेति-नेति का रास्ता यहाँ एक खतरनाक मोड़ पर है, कहीं ऐसा न हो कि “मैं कुछ नहीं हूँ” वाली एक उदास, सूनी जगह पर सब ख़त्म हो जाए। शिष्य यह डर छिपाता नहीं। सीधे रख देता है। और गुरु का अगला जवाब विवेकचूडामणि के सबसे सूक्ष्म, सबसे सुंदर हिस्सों में से है।

213 · “अच्छा पूछा, पर एक बात देखो”

श्रीगुरुरुवाच,
सत्यमुक्तं त्वया विद्वन्निपुणोऽसि विचारणे ।
अहमादिविकारास्ते तदभावोऽयमप्यनु ॥ 213 ॥

śrī-gurur uvāca, satyam uktaṁ tvayā vidvan nipuṇo’si vicāraṇe · aham-ādi-vikārās te tad-abhāvo’yam apy anu

शब्दार्थ: सत्यम् उक्तं त्वया · आपने सच कहा · निपुणः असि विचारणे · आप विचार में निपुण हैं · अहम्-आदि-विकाराः ते · “मैं” आदि वे सब विकार · तद्-अभावः अयम् अपि अनु · और उनका यह अभाव भी, उसी तरह (देखा तो जाता ही है)।

अर्थ: श्रीगुरु ने कहा, हे विद्वान, आपने सच कहा; आप विचार में निपुण हैं। “मैं” आदि वे सब विकार [नकारे गए], पर उनका यह “अभाव” भी, ध्यान दो, उसी तरह [देखा तो जाता ही है]।

भावार्थ: गुरु पहले शिष्य की तारीफ़ करते हैं, और फिर एक बेहद बारीक चाबी रख देते हैं, इतनी छोटी कि चूक सकती है।

शिष्य ने कहा, “मुझे बस ख़ालीपन दिखता है।” गुरु पकड़ लेते हैं: “दिखता है।” अगर आपको ख़ालीपन “दिख” रहा है, तो कोई है जो उसे देख रहा है। एक ख़ाली कमरा अपने ख़ालीपन को नहीं जानता; पर आप जानते हैं कि ख़ालीपन है, यानी एक जानने वाला वहाँ हाज़िर है, उस ख़ालीपन के सामने। शिष्य ने अनजाने में, अपने ही सवाल में, उस “जानने वाले” का सबूत दे दिया। गुरु बस उँगली उस ओर घुमा देते हैं। अगला श्लोक उसे खोलेगा।

214 · जो सबको जानता है, ख़ुद नहीं जाना जाता

सर्वे येनानुभूयन्ते यः स्वयं नानुभूयते ।
तमात्मानं वेदितारं विद्धि बुद्ध्या सुसूक्ष्मया ॥ 214 ॥

sarve yenānubhūyante yaḥ svayaṁ nānubhūyate · tam ātmānaṁ veditāraṁ viddhi buddhyā su-sūkṣmayā

शब्दार्थ: सर्वे येन अनुभूयन्ते · जिसके द्वारा सब अनुभव किए जाते हैं · यः स्वयं न अनुभूयते · जो ख़ुद अनुभव नहीं किया जाता · तम् आत्मानं वेदितारं विद्धि · उस आत्मा को, जानने वाले को, जान · बुद्ध्या सु-सूक्ष्मया · बहुत सूक्ष्म बुद्धि से।

अर्थ: जिसके द्वारा सब कुछ अनुभव किया जाता है, पर जो ख़ुद कभी अनुभव नहीं किया जाता, उस आत्मा को, उस जानने वाले को, बहुत सूक्ष्म बुद्धि से जान।

भावार्थ: यह शिष्य के पूरे डर का सीधा जवाब है। शिष्य पूछ रहा था, “जानने योग्य कौनसी चीज़ बची?” गुरु कहते हैं, आप ग़लत जगह देख रहे हैं। आप एक और “चीज़” ढूँढ रहे हैं, जिसे जाना जाए। पर आत्मा कोई जानी जाने वाली चीज़ है ही नहीं।

आत्मा “जानने वाला” है। अपनी आँख की बात फिर सोचिए, आँख सब देखती है, पर ख़ुद को कभी नहीं देख पाती। यह आँख की कमी नहीं; यही उसका होना है। आत्मा भी ऐसी ही, वह हर अनुभव के पीछे का अनुभव करने वाला है, इसलिए वह कभी एक अनुभव नहीं बन सकती। तो शिष्य को “ख़ालीपन” इसलिए दिखा क्योंकि उसने एक देखी जाने वाली चीज़ ढूँढी, और सही, कोई चीज़ नहीं मिली। पर देखने वाला तो हर पल वहीं था। ख़ालीपन नहीं। एक मौजूद, जागरूक “जानने वाला।”

215 · हर अनुभव का एक साक्षी होता है

तत्साक्षिकं भवेत्तत्तद्यद्यद्येनानुभूयते ।
कस्याप्यननुभूतार्थे साक्षित्वं नोपयुज्यते ॥ 215 ॥

tat-sākṣikaṁ bhavet tat tad yad yad yenānubhūyate · kasyāpy ananubhūtārthe sākṣitvaṁ nopayujyate

शब्दार्थ: तत्-साक्षिकं भवेत् · उसका एक साक्षी होता है · यत् यत् येन अनुभूयते · जो-जो चीज़ जिसके द्वारा अनुभव की जाती है · कस्य अपि अननुभूत-अर्थे · किसी के भी न-अनुभव की गई चीज़ में · साक्षित्वं न उपयुज्यते · साक्षीपन लागू नहीं होता।

अर्थ: जो-जो चीज़ अनुभव की जाती है, उसका एक साक्षी होता ही है। और जो चीज़ किसी के द्वारा अनुभव ही नहीं की गई, वहाँ “साक्षीपन” की बात ही लागू नहीं होती।

भावार्थ: गुरु एक सीधा, अकाट्य नियम रखते हैं: हर अनुभव के साथ एक साक्षी अपने आप जुड़ा है। अनुभव हैं, और कोई अनुभव करने वाला न हो, यह असंभव है।

अब इसे शिष्य के डर पर लगाइए। शिष्य को “ख़ालीपन का अनुभव” हुआ। इस श्लोक के नियम से, अगर ख़ालीपन का अनुभव हुआ, तो उसका एक साक्षी ज़रूर है। ख़ालीपन एक “अनुभव की गई चीज़” है; और हर अनुभव की गई चीज़ का एक देखने वाला होता है। तो शिष्य का “सब कुछ नकार दिया, ख़ालीपन बचा” वाला डर ख़ुद ही अपना जवाब दे देता है, क्योंकि उस ख़ालीपन को भी किसी ने देखा, और वही “कोई” असली बात है।

216 · आत्मा, ख़ुद से ही प्रकाशित

असौ स्वसाक्षिको भावो यतः स्वेनानुभूयते ।
अतः परं स्वयं साक्षात्प्रत्यगात्मा न चेतरः ॥ 216 ॥

asau sva-sākṣiko bhāvo yataḥ svenānubhūyate · ataḥ paraṁ svayaṁ sākṣāt pratyag-ātmā na cetaraḥ

शब्दार्थ: असौ स्व-साक्षिकः भावः · यह अपने आप का साक्षी है · यतः स्वेन अनुभूयते · क्योंकि वह अपने आप से ही अनुभव होता है · अतः परं स्वयं साक्षात् · इसलिए वही सर्वोच्च, सीधा-सीधा · प्रत्यग्-आत्मा · भीतर का आत्मा · न च इतरः · और कोई नहीं।

अर्थ: यह [साक्षी] अपने आप का ही साक्षी है, क्योंकि वह अपने आप से ही अनुभव होता है। इसलिए वही, सीधा-सीधा, सर्वोच्च भीतर का आत्मा है, और कोई नहीं।

भावार्थ: एक स्वाभाविक सवाल यहाँ उठ सकता था, “ठीक है, साक्षी सबको जानता है। पर साक्षी को कौन जानता है? उसके लिए एक और साक्षी चाहिए, फिर उसके लिए और एक…”, एक अंतहीन सीढ़ी।

गुरु उस सीढ़ी को यहीं रोक देते हैं: साक्षी “स्व-साक्षिक” है, ख़ुद ही अपना साक्षी। उसे जानने के लिए किसी और की ज़रूरत नहीं। एक तस्वीर: दीया कमरे की हर चीज़ दिखाता है, और दीये को दिखाने के लिए किसी दूसरे दीये की ज़रूरत नहीं; वह ख़ुद-प्रकाश है। आत्मा ऐसी ही है। वह जानने के लिए किसी पर निर्भर नहीं। वह जानना ही है। और इसीलिए वह “सीधा-सीधा” आत्मा है, सबसे क़रीब, सबसे अपना, बिना किसी बिचौलिए के।

217 · तीनों अवस्थाओं में, “मैं, मैं”

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटतरं योऽसौ समुज्जृम्भते प्रत्यग्रूपतया सदाहमहमित्यन्तः स्फुरन्नैकधा ।
नानाकारविकारभागिन इमान् पश्यन्नहंधीमुखान् नित्यानन्दचिदात्मना स्फुरति तं विद्धि स्वमेतं हृदि ॥ 217 ॥

jāgrat-svapna-suṣuptiṣu sphuṭataraṁ yo’sau samujjṛmbhate pratyag-rūpatayā sadāham-aham ity antaḥ sphuran naikadhā · nānākāra-vikāra-bhāgina imān paśyann ahaṁ-dhī-mukhān nityānanda-cid-ātmanā sphurati taṁ viddhi svam etaṁ hṛdi

शब्दार्थ: जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिषु · जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति में · प्रत्यग्-रूपतया समुज्जृम्भते · भीतर के रूप में उठता है · सदा “अहम् अहम्” इति स्फुरन् · सदा “मैं, मैं” कर के चमकता हुआ · एकधा · एक-सा · नाना-आकार-विकार-भागिनः इमान् पश्यन् · इन भाँति-भाँति बदलती चीज़ों को देखता हुआ · अहं-धी-मुखान् · “मैं”-बुद्धि आदि को · नित्य-आनन्द-चित्-आत्मना · नित्य-आनंद-चेतन रूप में।

अर्थ: जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों में जो बहुत साफ़, भीतर के रूप में उठता है, सदा “मैं, मैं” कर के एक-सा चमकता रहता है; जो इन भाँति-भाँति बदलती चीज़ों को, “मैं”-बुद्धि आदि को, देखता है, और नित्य-आनंद-चेतन रूप में चमकता है, उसी को अपना स्वरूप जान, हृदय में।

भावार्थ: गुरु शिष्य के डर का जवाब एक ठोस, अनुभव की जा सकने वाली बात पर ले आते हैं। शिष्य को लगा “मैं अंत में एक ख़ालीपन हूँ”, गुरु कहते हैं, नहीं। आप वह हैं जो हर हाल में “मैं, मैं” कर के चमकता रहा है।

सोचिए, जागते में एक “मैं” था, सपने में एक “मैं” था, गहरी नींद में भी (वरना “मुझे कुछ पता नहीं” किसने कहा?)। हालात बदले, शरीर बदला, मन बदला, पर वह “मैं हूँ” वाला बोध, हर अवस्था में, “एकधा”, एक-सा, मौजूद रहा। वह कोई ख़ालीपन नहीं; वह सबसे ठोस, सबसे लगातार चीज़ है जो आपके पास है। और गुरु एक प्यारा शब्द जोड़ते हैं, “हृदि”, हृदय में। यह कोई दूर का दर्शन नहीं; इसे अपने भीतर, अपने हृदय में पहचानना है।

218 · घड़े के पानी में सूरज

घटोदके बिम्बितमर्कबिम्बम् आलोक्य मूढो रविमेव मन्यते ।
तथा चिदाभासमुपाधिसंस्थं भ्रान्त्याहमित्येव जडोऽभिमन्यते ॥ 218 ॥

ghaṭodake bimbitam arka-bimbam ālokya mūḍho ravim eva manyate · tathā cid-ābhāsam upādhi-saṁsthaṁ bhrāntyāham ity eva jaḍo’bhimanyate

शब्दार्थ: घट-उदके बिम्बितम् अर्क-बिम्बम् · घड़े के पानी में पड़ा सूरज का प्रतिबिंब · आलोक्य मूढः रविम् एव मन्यते · देख कर मूढ़ उसे ही सूरज मान लेता है · तथा चित्-आभासम् उपाधि-संस्थं · वैसे ही उपाधि में बैठे चेतना के प्रतिबिंब को · भ्रान्त्या अहम् इति जडः अभिमन्यते · भ्रम से जड़ इंसान “मैं” मान बैठता है।

अर्थ: घड़े के पानी में पड़ा सूरज का प्रतिबिंब देख कर मूढ़ उसी को सूरज मान लेता है। वैसे ही, उपाधि में बैठे चेतना के प्रतिबिंब को जड़-बुद्धि इंसान भ्रम से “मैं” मान बैठता है।

भावार्थ: यहाँ से तीन श्लोकों की एक बेहद सुंदर तस्वीर शुरू होती है, घड़े के पानी में सूरज। इसे ध्यान से समझिए, क्योंकि यह पूरी समस्या को एक चित्र में रख देती है।

आँगन में एक घड़ा रखा है, उसमें पानी। ऊपर असली सूरज है। उसका प्रतिबिंब पानी में पड़ता है, एक छोटा, हिलता-डुलता सूरज। अब एक नादान आदमी उस प्रतिबिंब को देख कर कहता है “देखो, सूरज!” वह छोटे, काँपते प्रतिबिंब को असली सूरज समझ बैठा। हम ठीक यही करते हैं। असली चेतना (सूरज) तो ऊपर है। बुद्धि (घड़े का पानी) उसका प्रतिबिंब पकड़ लेती है, और वह छोटा, हिलता प्रतिबिंब, “मैं”, उसी को हम असली समझ बैठते हैं। पूरा भ्रम एक वाक्य में: प्रतिबिंब को मूल समझ लेना।

219 · घड़ा, पानी, प्रतिबिंब, तीनों छोड़ कर

घटं जलं तद्गतमर्कबिम्बं विहाय सर्वं विनिरीक्ष्यतेऽर्कः ।
तटस्थ एतत्त्रितयावभासकः स्वयंप्रकाशो विदुषा यथा तथा ॥ 219 ॥

ghaṭaṁ jalaṁ tad-gatam arka-bimbaṁ vihāya sarvaṁ vinirīkṣyate’rkaḥ · taṭastha etat-tritayāvabhāsakaḥ svayaṁ-prakāśo viduṣā yathā tathā

शब्दार्थ: घटं जलं तद्-गतम् अर्क-बिम्बं विहाय · घड़े, पानी, और उसमें पड़े प्रतिबिंब, तीनों को छोड़ कर · सर्वं विनिरीक्ष्यते अर्कः · असली सूरज देखा जाता है · तटस्थः · अलग, अछूता खड़ा · एतत्-त्रितय-अवभासकः · इन तीनों को रोशन करने वाला · स्वयं-प्रकाशः · ख़ुद-प्रकाश।

अर्थ: घड़े, पानी, और उसमें पड़े सूरज के प्रतिबिंब, इन तीनों को छोड़ कर, असली सूरज देखा जाता है: अलग, अछूता, इन तीनों को रोशन करने वाला, ख़ुद-प्रकाश। जैसे विद्वान इसे देखता है, वैसे ही [आप भी देखो]।

भावार्थ: श्लोक 218 ने भ्रम दिखाया; यह श्लोक रास्ता दिखाता है, और देखिए वह कितना सीधा है।

असली सूरज तक कैसे पहुँचें? घड़े के पानी को घूरते रहने से नहीं। तीन चीज़ों से नज़र हटानी होगी, घड़ा (शरीर), पानी (बुद्धि), और प्रतिबिंब (वह उधार की चमक वाला “मैं”)। इन तीनों को “छोड़ कर”, यानी इनमें से किसी को भी “असली मैं” मानना बंद कर के, नज़र ऊपर उठाओ। और असली सूरज वहीं है, हमेशा से, “तटस्थ”, अछूता, इन तीनों से अलग, और इन तीनों को रोशन करता हुआ। यह नेति-नेति की पूरी विधि का सार है: जिन्हें “मैं” समझा था, उन्हें छोड़ो, और जो हमेशा से रोशन कर रहा था, उसकी ओर देखो।

220 · बुद्धि की गुफ़ा में छिपा द्रष्टा

देहं धियं चित्प्रतिबिम्बमेवं विसृज्य बुद्धौ निहितं गुहायाम् ।
द्रष्टारमात्मानमखण्डबोधं सर्वप्रकाशं सदसद्विलक्षणम् ॥ 220 ॥

dehaṁ dhiyaṁ cit-pratibimbam evaṁ visṛjya buddhau nihitaṁ guhāyām · draṣṭāram ātmānam akhaṇḍa-bodhaṁ sarva-prakāśaṁ sad-asad-vilakṣaṇam

शब्दार्थ: देहं धियं चित्-प्रतिबिम्बम् विसृज्य · शरीर, बुद्धि, और चेतना का प्रतिबिंब, तीनों छोड़ कर · बुद्धौ गुहायां निहितं · बुद्धि की गुफ़ा में छिपे · द्रष्टारम् आत्मानम् · द्रष्टा आत्मा को · अखण्ड-बोधं · अखंड बोध · सर्व-प्रकाशं · सबको रोशन करने वाला · सत्-असत्-विलक्षणम् · सत् और असत् दोनों से अलग।

अर्थ: शरीर, बुद्धि, और चेतना का प्रतिबिंब, इन तीनों को इस तरह छोड़ कर, बुद्धि की गुफ़ा में छिपे उस द्रष्टा-आत्मा को [जानो], जो अखंड बोध है, सबको रोशन करने वाला, सत् और असत् दोनों से अलग।

भावार्थ: गुरु घड़े-पानी-सूरज वाली उपमा को सीधे शिष्य पर लगा देते हैं। तीन चीज़ें, घड़ा, पानी, प्रतिबिंब, अब साफ़ नाम पाती हैं: शरीर, बुद्धि, और वह उधार की चमक वाला “मैं।” इन तीनों से नज़र हटाओ।

और जो मिलेगा, वह “बुद्धि की गुफ़ा में छिपा” है (भाग 5, श्लोक 132 की याद)। “गुफ़ा”, एक भीतरी, शांत, ढकी हुई जगह। द्रष्टा वहीं है, हमेशा से। और एक गहरा शब्द, “सत्-असत्-विलक्षण”, सत् और असत् दोनों से अलग। यानी आत्मा को “है” या “नहीं है”, किसी एक खाँचे में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि वह दोनों खाँचों को जानने वाला है। शिष्य का “ख़ालीपन” वाला डर यहाँ पूरी तरह घुल जाता है: जो बचा, वह “नहीं है” वाला सूनापन नहीं। वह एक भरा हुआ, रोशन, सबको रोशन करने वाला द्रष्टा है।

221 · इसे जान कर, निष्पाप, निर्मल, निर्मृत्यु

नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं अन्तर्बहिःशून्यमनन्यमात्मनः ।
विज्ञाय सम्यङ्निजरूपमेतत् पुमान् विपाप्मा विरजो विमृत्युः ॥ 221 ॥

nityaṁ vibhuṁ sarva-gataṁ su-sūkṣmam antar-bahiḥ-śūnyam ananyam ātmanaḥ · vijñāya samyaṅ nija-rūpam etat pumān vipāpmā virajo vimṛtyuḥ

शब्दार्थ: नित्यं विभुं सर्व-गतं सु-सूक्ष्मं · नित्य, व्यापक, सर्वगत, अति-सूक्ष्म · अन्तर्-बहिः-शून्यम् · भीतर-बाहर के भेद से रहित · अनन्यम् आत्मनः · आत्मा से अभिन्न · विज्ञाय सम्यक् निज-रूपम् · इस अपने स्वरूप को ठीक से जान कर · पुमान् विपाप्मा विरजः विमृत्युः · इंसान निष्पाप, निर्मल, मृत्यु से परे।

अर्थ: नित्य, व्यापक, सर्वगत, अति-सूक्ष्म, भीतर-बाहर के भेद से रहित, आत्मा से अभिन्न, इस अपने स्वरूप को ठीक से जान कर, इंसान निष्पाप, निर्मल और मृत्यु से परे हो जाता है।

भावार्थ: गुरु अब इस जानने का फल बताते हैं, और देखिए तीनों शब्द “वि” से शुरू होते हैं, एक सुंदर लड़ी: विपाप्मा, विरज, विमृत्यु।

“विपाप्मा”, पाप से परे। “विरज”, हर मैल से, हर दोष से परे। “विमृत्यु”, मृत्यु से परे। और गौर कीजिए, ये कोई नई उपलब्धियाँ नहीं हैं जो “कमाई” जाती हैं। ये बस “जान लेने” से हो जाती हैं। क्यों? क्योंकि पाप, मैल, मृत्यु, ये सब उन परतों के थे (शरीर, मन)। असली आत्मा तो हमेशा से इनसे परे थी। आपको निष्पाप “बनना” नहीं है; आपको बस यह पहचानना है कि असली आप कभी पापी थे ही नहीं। जानना ही यहाँ मुक्ति है।

222 · शोक से परे, और कोई रास्ता नहीं

विशोक आनन्दघनो विपश्चित्
स्वयं कुतश्चिन्न बिभेति कश्चित् ।
नान्योऽस्ति पन्था भवबन्धमुक्तेः
विना स्वतत्त्वावगमं मुमुक्षोः ॥ 222 ॥

viśoka ānanda-ghano vipaścit svayaṁ kutaścin na bibheti kaścit · nānyo’sti panthā bhava-bandha-mukteḥ vinā sva-tattvāvagamaṁ mumukṣoḥ

शब्दार्थ: विशोकः · शोक से परे · आनन्द-घनः · आनंद से ठोस भरा · विपश्चित् · ज्ञानी · कुतश्चित् न बिभेति · कहीं से नहीं डरता · न अन्यः अस्ति पन्थाः · और कोई रास्ता नहीं · भव-बन्ध-मुक्तेः · संसार-बंधन से छूटने का · विना स्व-तत्त्व-अवगमं · अपने तत्व को जाने बिना।

अर्थ: [ऐसा जानने वाला] शोक से परे, आनंद से ठोस भरा, ज्ञानी हो जाता है; वह कहीं से, किसी से नहीं डरता। और मुमुक्षु के लिए, संसार-बंधन से छूटने का, अपने तत्व को जाने बिना, कोई दूसरा रास्ता नहीं।

भावार्थ: गुरु पहले हिस्से (साक्षी वाली बात) को एक ज़ोरदार बात पर बंद करते हैं। एक शब्द ख़ास है, “आनन्द-घन”, आनंद से ठोस भरा हुआ।

शिष्य डरा था कि अंत में एक ख़ालीपन मिलेगा। गुरु का जवाब उल्टा है, अंत में जो मिलता है वह “घन” है, ठोस, ख़ूब भरा हुआ, और किससे? आनंद से। ख़ालीपन नहीं। लबालब आनंद। और इसका एक सीधा फल, “कहीं से नहीं डरता।” डर हमेशा एक “दूसरे” से होता है, कोई और जो नुक़सान कर दे। पर जब आपने जान लिया कि सब कुछ वही एक है, तो डराने को बचा कौन? और गुरु आख़िर में दो-टूक कह देते हैं, इसका कोई दूसरा रास्ता नहीं। यह कठोरता नहीं। साफ़गोई है: मुक्ति बस अपने सच को जान लेने में है, और कहीं नहीं।

223 · ब्रह्म से अभिन्नता का ज्ञान

ब्रह्माभिन्नत्वविज्ञानं भवमोक्षस्य कारणम् ।
येनाद्वितीयमानन्दं ब्रह्म सम्पद्यते बुधैः ॥ 223 ॥

brahmābhinnatva-vijñānaṁ bhava-mokṣasya kāraṇam · yenādvitīyam ānandaṁ brahma sampadyate budhaiḥ

शब्दार्थ: ब्रह्म-अभिन्नत्व-विज्ञानं · ब्रह्म से अभिन्न होने का ज्ञान · भव-मोक्षस्य कारणम् · संसार से मुक्ति का कारण · येन अद्वितीयम् आनन्दं ब्रह्म · जिससे अद्वितीय, आनंद-रूप ब्रह्म · सम्पद्यते बुधैः · ज्ञानी पा लेते हैं।

अर्थ: ब्रह्म से अपनी अभिन्नता का ज्ञान, यही संसार से मुक्ति का कारण है, जिससे ज्ञानी अद्वितीय, आनंद-रूप ब्रह्म को पा लेते हैं।

भावार्थ: यहाँ भाग का दूसरा मोड़ शुरू होता है। अब तक बात “साक्षी” की थी, भीतर का वह जानने वाला। अब गुरु एक बड़ा शब्द लाते हैं, “ब्रह्म।”

और सीधे जोड़ देते हैं, मुक्ति का कारण है “ब्रह्म से अभिन्नता का ज्ञान”, यानी यह जान लेना कि “मैं” और “ब्रह्म” अलग नहीं। यहाँ एक बारीक बात है, जो आगे खुलेगी: अब तक जिस साक्षी की खोज हो रही थी, वह कोई छोटी, निजी चीज़ नहीं। वह वही असीम ब्रह्म है। भीतर का साक्षी और सबका मूल ब्रह्म, दो नहीं। एक। यही “अद्वैत” है, और यही पूरी किताब का गंतव्य।

224 · ब्रह्म हुआ, तो लौटना नहीं

ब्रह्मभूतस्तु संसृत्यै विद्वान्नावर्तते पुनः ।
विज्ञातव्यमतः सम्यग्ब्रह्माभिन्नत्वमात्मनः ॥ 224 ॥

brahma-bhūtas tu saṁsṛtyai vidvān nāvartate punaḥ · vijñātavyam ataḥ samyag brahmābhinnatvam ātmanaḥ

शब्दार्थ: ब्रह्म-भूतः विद्वान् · ब्रह्म-रूप हुआ ज्ञानी · संसृत्यै न आवर्तते पुनः · संसार के लिए फिर नहीं लौटता · विज्ञातव्यम् अतः सम्यक् · इसलिए ठीक से जान लेना चाहिए · ब्रह्म-अभिन्नत्वम् आत्मनः · आत्मा की ब्रह्म से अभिन्नता।

अर्थ: ब्रह्म-रूप हो चुका ज्ञानी संसार के लिए फिर नहीं लौटता। इसलिए, आत्मा की ब्रह्म से अभिन्नता को ठीक से जान लेना चाहिए।

भावार्थ: गुरु एक गहरी बात कहते हैं, “ब्रह्म-भूत”, ब्रह्म हो जाना। ध्यान दीजिए, “ब्रह्म पा लेना” नहीं। “ब्रह्म हो जाना।”

यह फ़र्क बारीक और ज़रूरी है। आप किसी चीज़ को “पाते” हैं, तो उसे खो भी सकते हैं, पाना-खोना का चक्र चलता रहता है। पर आप जो “हो जाते” हैं, उससे लौटना नहीं होता। एक नदी समुद्र में मिल जाए, तो वह फिर नदी नहीं बन सकती, वह समुद्र “हो गई।” मुक्ति किसी चीज़ का हासिल होना नहीं। एक पहचान का बदल जाना है, और इसीलिए वह आख़िरी है, “फिर नहीं लौटना।” और गुरु इस श्लोक को एक सीधे आदेश पर बंद करते हैं: तो इस अभिन्नता को ठीक से जान लो। अगले श्लोक बताएँगे कि वह ब्रह्म है क्या।

225 · सत्य, ज्ञान, अनंत, ब्रह्म

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म विशुद्धं परं स्वतःसिद्धम् ।
नित्यानन्दैकरसं प्रत्यगभिन्नं निरन्तरं जयति ॥ 225 ॥

satyaṁ jñānam anantaṁ brahma viśuddhaṁ paraṁ svataḥ-siddham · nityānandaika-rasaṁ pratyag-abhinnaṁ nirantaraṁ jayati

शब्दार्थ: सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म · ब्रह्म सत्य, ज्ञान, अनंत है · विशुद्धं परं स्वतः-सिद्धम् · पवित्र, सर्वोच्च, अपने आप सिद्ध · नित्य-आनन्द-एक-रसं · नित्य आनंद का एक रस · प्रत्यग्-अभिन्नं · भीतर के आत्मा से अभिन्न · निरन्तरं जयति · निरंतर जयवंत है।

अर्थ: ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है, अनंत है, पवित्र, सर्वोच्च, अपने आप सिद्ध, नित्य आनंद का एक रस, और भीतर के आत्मा से अभिन्न। वह निरंतर जयवंत है।

भावार्थ: गुरु ब्रह्म की एक मशहूर परिभाषा देते हैं, “सत्यं ज्ञानम् अनन्तम्” (यह तैत्तिरीय उपनिषद् की भी पंक्ति है)। तीन शब्द, और हर एक एक दरवाज़ा।

“सत्य”, जो हमेशा है, बदलता नहीं। उधार का नहीं। “ज्ञान”, यह कोई जड़, बेजान चीज़ नहीं; यह जागरूकता है, चेतना। “अनंत”, इसकी कोई सीमा नहीं। न समय की, न जगह की। पर इस श्लोक का असली रत्न आख़िरी पंक्ति में है, “प्रत्यग्-अभिन्नम्”, भीतर के आत्मा से अभिन्न। यानी यह विशाल, असीम ब्रह्म कोई दूर की चीज़ नहीं, वह आपके भीतर के उस “मैं हूँ” से रत्ती भर अलग नहीं। साक्षी और ब्रह्म, गुरु यहाँ साफ़ कह देते हैं, एक ही हैं।

226 · परम अद्वैत, दूसरा कुछ है ही नहीं

सदिदं परमाद्वैतं स्वस्मादन्यस्य वस्तुनोऽभावात् ।
न ह्यन्यदस्ति किंचित्सम्यक्परमार्थतत्त्वबोधदशायाम् ॥ 226 ॥

sad idaṁ paramādvaitaṁ svasmād anyasya vastuno’bhāvāt · na hy anyad asti kiṁcit samyak paramārtha-tattva-bodha-daśāyām

शब्दार्थ: सत् इदं परम-अद्वैतं · यह सत् परम अद्वैत है · स्वस्मात् अन्यस्य वस्तुनः अभावात् · अपने सिवा किसी और चीज़ के न होने से · न हि अन्यत् अस्ति किंचित् · कुछ और है ही नहीं · सम्यक्-परमार्थ-तत्त्व-बोध-दशायाम् · परम सच के सही बोध की दशा में।

अर्थ: यह सत् “परम अद्वैत” है, क्योंकि अपने सिवा कोई और चीज़ है ही नहीं। परम सच के सही बोध की दशा में, कुछ और है ही नहीं।

भावार्थ: “अद्वैत” शब्द को गुरु यहाँ खोलते हैं। अद्वैत यानी “अ-द्वैत”, दो नहीं। पर इसका मतलब क्या? कि बस एक चीज़ है, और बाक़ी सब उसी का रूप?

गुरु और गहरे जाते हैं, “स्वस्मात् अन्यस्य वस्तुनः अभावात्”, अपने सिवा कोई “दूसरी” चीज़ है ही नहीं। अद्वैत यह नहीं कहता कि “दो चीज़ें असल में एक हैं”; वह कहता है कि “दूसरी” चीज़ कभी थी ही नहीं। और एक ज़रूरी शब्द, “बोध-दशायाम्”, सही बोध की दशा में। यानी यह बात तर्क की मेज़ पर साबित करने की चीज़ नहीं; यह एक “दशा” है, एक अनुभव की अवस्था है। उस अवस्था में पहुँच कर ही यह दिखता है कि, सच में, बस वही एक है।

227 · यह पूरा संसार, ब्रह्म ही

यदिदं सकलं विश्वं नानारूपं प्रतीतमज्ञानात् ।
तत्सर्वं ब्रह्मैव प्रत्यस्ताशेषभावनादोषम् ॥ 227 ॥

yad idaṁ sakalaṁ viśvaṁ nānā-rūpaṁ pratītam ajñānāt · tat sarvaṁ brahmaiva pratyastāśeṣa-bhāvanā-doṣam

शब्दार्थ: यत् इदं सकलं विश्वं · यह जो पूरा विश्व · नाना-रूपं प्रतीतम् अज्ञानात् · अज्ञान से अनेक रूपों में दिखता है · तत् सर्वं ब्रह्म एव · वह सब ब्रह्म ही है · प्रत्यस्त-अशेष-भावना-दोषम् · जब [झूठी] कल्पना के सारे दोष हटा दिए जाएँ।

अर्थ: यह जो पूरा विश्व अज्ञान से अनेक रूपों में दिखता है, झूठी कल्पना के सारे दोष हटा देने पर, वह सब ब्रह्म ही है।

भावार्थ: गुरु अब एक बड़ी छलाँग लगाते हैं। अब तक बात “आप ब्रह्म हो” तक थी। अब वे कहते हैं, यह पूरा संसार भी ब्रह्म ही है।

यह “जगत मिथ्या” (भाग 2, श्लोक 20) वाली बात का दूसरा, और गहरा पहलू है। वहाँ कहा गया था जगत स्वतंत्र, ठोस सच नहीं। यहाँ गुरु जोड़ते हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि जगत “कुछ नहीं” है। जगत है, पर वह जो है, वह ब्रह्म है। समस्या जगत में नहीं; समस्या उस “नाना-रूप” में है, हमारी उसे अलग-अलग, टुकड़ों में, “मैं बनाम वह” में देखने की आदत में। वह आदत (भावना-दोष) हटे, तो वही जगत, ब्रह्म दिखने लगता है। अगले श्लोक मिट्टी-घड़े की तस्वीर से इसे खोलेंगे।

228 · घड़ा मिट्टी से अलग नहीं

मृत्कार्यभूतोऽपि मृदो न भिन्नः कुम्भोऽस्ति सर्वत्र तु मृत्स्वरूपात् ।
न कुम्भरूपं पृथगस्ति कुम्भः कुतो मृषा कल्पितनाममात्रः ॥ 228 ॥

mṛt-kārya-bhūto’pi mṛdo na bhinnaḥ kumbho’sti sarvatra tu mṛt-svarūpāt · na kumbha-rūpaṁ pṛthag asti kumbhaḥ kuto mṛṣā kalpita-nāma-mātraḥ

शब्दार्थ: मृत्-कार्य-भूतः अपि · मिट्टी का काम (बना हुआ) होते हुए भी · कुम्भः मृदः न भिन्नः · घड़ा मिट्टी से अलग नहीं · सर्वत्र मृत्-स्वरूपात् · हर जगह वह मिट्टी-रूप ही है · न कुम्भ-रूपं पृथक् अस्ति · घड़े का अपना कोई अलग रूप नहीं · कुम्भः मृषा कल्पित-नाम-मात्रः · घड़ा बस एक झूठा, गढ़ा हुआ नाम भर है।

अर्थ:वह हर जगह बस मिट्टी-रूप ही है। घड़े का अपना कोई अलग रूप है ही नहीं। तो “घड़ा” है क्या? बस एक झूठा, गढ़ा हुआ नाम।

भावार्थ: यह अद्वैत की सबसे प्यारी तस्वीरों में से है, मिट्टी और घड़ा। ध्यान से देखिए, क्योंकि यह “संसार ब्रह्म है” को पूरी तरह खोल देती है।

एक घड़े को छुओ, आपकी उँगली कहाँ-कहाँ मिट्टी को छूती है? हर जगह। घड़े का हर हिस्सा मिट्टी है, और मिट्टी के सिवा कुछ नहीं। “घड़ा” नाम की कोई अलग चीज़, जिसे मिट्टी से अलग करके दिखाया जा सके, वह है ही नहीं। “घड़ा” बस एक नाम है, एक आकार के लिए। असली में जो है, वह मिट्टी है। अब इसे संसार पर लगाइए: हर चीज़, हर पेड़, हर इंसान, हर वस्तु, एक “घड़ा” है, यानी एक नाम-रूप। और जो असल में है, वह सब में एक, “मिट्टी”, यानी ब्रह्म। आप जो भी छूते हैं, ब्रह्म ही छूते हैं, बस उसे “घड़े” के नाम से पुकारते हैं।

229 · असली बस मिट्टी है

केनापि मृद्भिन्नतया स्वरूपं घटस्य संदर्शयितुं न शक्यते ।
अतो घटः कल्पित एव मोहान् मृदेव सत्यं परमार्थभूतम् ॥ 229 ॥

kenāpi mṛd-bhinnatayā svarūpaṁ ghaṭasya saṁdarśayituṁ na śakyate · ato ghaṭaḥ kalpita eva mohān mṛd eva satyaṁ paramārtha-bhūtam

शब्दार्थ: केन अपि · किसी के द्वारा भी · मृद्-भिन्नतया · मिट्टी से अलग करके · घटस्य स्वरूपं संदर्शयितुं न शक्यते · घड़े का स्वरूप दिखाया नहीं जा सकता · अतः घटः कल्पितः एव मोहात् · इसलिए घड़ा बस मोह से गढ़ा हुआ है · मृत् एव सत्यं परमार्थ-भूतम् · मिट्टी ही सत्य है, परम सच।

अर्थ: कोई भी घड़े के स्वरूप को मिट्टी से अलग करके नहीं दिखा सकता। इसलिए घड़ा बस मोह से गढ़ी हुई चीज़ है; मिट्टी ही सत्य है, परम सच।

भावार्थ: गुरु एक छोटा-सा प्रयोग देते हैं, जो किसी से भी करवाया जा सकता है: “घड़े को मिट्टी से अलग कर के दिखाओ।” कोई नहीं कर सकता। आप मिट्टी हटा दें, तो घड़ा बचता ही नहीं। यानी “घड़ा” मिट्टी पर पूरी तरह उधार है।

तो दोनों में असली कौन? मिट्टी, क्योंकि वह घड़े के बिना भी रह सकती है, पर घड़ा मिट्टी के बिना एक पल नहीं। यही “सत्य” की कसौटी है: जो अपने बल पर खड़ा हो। संसार की हर चीज़ “घड़ा” है, किसी आधार पर उधार खड़ी। और वह आधार, वह “मिट्टी”, ब्रह्म, ही अकेला “परमार्थ-भूत”, असली सच है। यह बात भाग 2 के “ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या” को उसका पूरा, गहरा अर्थ दे देती है।

230 · सब कुछ सत् ही है

सद्ब्रह्मकार्यं सकलं सदेवं तन्मात्रमेतन्न ततोऽन्यदस्ति ।
अस्तीति यो वक्ति न तस्य मोहो विनिर्गतो निद्रितवत्प्रजल्पः ॥ 230 ॥

sad-brahma-kāryaṁ sakalaṁ sad evaṁ tan-mātram etan na tato’nyad asti · astīti yo vakti na tasya moho vinirgato nidritavat prajalpaḥ

शब्दार्थ: सत्-ब्रह्म-कार्यं सकलं · सत्-ब्रह्म का सारा काम (रचना) · सत् एवं तन्-मात्रम् · सत् ही है, बस वही है · न ततः अन्यत् अस्ति · उससे अलग कुछ नहीं · अस्ति इति यः वक्ति · “(अलग चीज़) है”, जो ऐसा कहता है · न तस्य मोहः विनिर्गतः · उसका मोह अभी गया नहीं · निद्रित-वत् प्रजल्पः · सोते हुए की बड़बड़ाहट जैसा।

अर्थ: सत्-ब्रह्म की सारी रचना सत् ही है, बस वही है, उससे अलग कुछ नहीं। और जो कहता है “(कोई अलग चीज़) है”, उसका मोह अभी गया नहीं; उसकी बात सोते हुए की बड़बड़ाहट जैसी है।

भावार्थ: गुरु निष्कर्ष पर मुहर लगाते हैं, और एक तीखी, यादगार उपमा देते हैं: “निद्रित-वत् प्रजल्पः”, सोते हुए की बड़बड़ाहट।

सोचिए, कोई गहरी नींद में बड़बड़ा रहा है, कुछ बोल रहा है। उसके शब्द बेमानी हैं,उसे पता नहीं वह क्या कह रहा है। गुरु कहते हैं, जो इंसान ब्रह्म से अलग किसी चीज़ को “असली” मान कर बोलता रहता है, वह ठीक उसी हाल में है, एक तरह की नींद में बड़बड़ा रहा है। यह कठोर लगता है, पर यह एक न्योता है: जागो। और जागना यानी देख लेना, यह सब, हर चीज़, एक ही सत् है। दूसरी चीज़ की बात, असल में, एक नींद में कही गई बात है।

231 · “यह विश्व ब्रह्म ही है”, श्रुति कहती है

ब्रह्मैवेदं विश्वमित्येव वाणी श्रौती ब्रूतेऽथर्वनिष्ठा वरिष्ठा ।
तस्मादेतद्ब्रह्ममात्रं हि विश्वं नाधिष्ठानाद्भिन्नतारोपितस्य ॥ 231 ॥

brahmaivedaṁ viśvam ity eva vāṇī śrautī brūte’tharva-niṣṭhā variṣṭhā · tasmād etad brahma-mātraṁ hi viśvaṁ nādhiṣṭhānād bhinnatāropitasya

शब्दार्थ: ब्रह्म एव इदं विश्वम् इति · “यह विश्व ब्रह्म ही है”, ऐसा · श्रौती वाणी अथर्व-निष्ठा वरिष्ठा · श्रुति की वाणी, अथर्व में टिकी, श्रेष्ठ · ब्रह्म-मात्रं हि विश्वं · विश्व बस ब्रह्म ही है · न अधिष्ठानात् भिन्नता आरोपितस्य · आरोपित चीज़ का अपने आधार से अलगाव नहीं।

अर्थ: “यह विश्व ब्रह्म ही है”, श्रुति की श्रेष्ठ वाणी, अथर्व में टिकी हुई, ऐसा कहती है। इसलिए यह विश्व बस ब्रह्म ही है; आरोपित चीज़ का अपने आधार से कोई अलगाव होता ही नहीं।

भावार्थ: गुरु अपनी बात के लिए श्रुति को गवाह बनाते हैं, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” जैसी उपनिषद्-वाणी। यह कोई शंकराचार्य की निजी राय नहीं; यह परम्परा की सबसे गहरी घोषणा है।

और आख़िरी पंक्ति एक ज़रूरी तार्किक बात रखती है, “आरोपित चीज़ का अपने आधार से अलगाव नहीं।” फिर रस्सी-साँप: साँप रस्सी पर “आरोपित” था। क्या साँप रस्सी से कहीं “अलग” जा सकता था? नहीं। साँप था ही रस्सी, बस ग़लत नाम से। उसी तरह, यह संसार ब्रह्म पर “आरोपित” है, और इसलिए वह ब्रह्म से अलग कहीं हो ही नहीं सकता। संसार ब्रह्म से भागने की कोशिश भी करे, तो जाएगा कहाँ? वह ब्रह्म ही है।

232 · अगर जगत स्वतंत्र सच होता

सत्यं यदि स्याज्जगदेतदात्मनोऽनन्तत्त्वहानिर्निगमाप्रमाणता ।
असत्यवादित्वमपीशितुः स्यान्नैतत्त्रयं साधु हितं महात्मनाम् ॥ 232 ॥

satyaṁ yadi syāj jagad etad ātmano’nantattva-hānir nigamāpramāṇatā · asatya-vāditvam apīśituḥ syān naitat trayaṁ sādhu hitaṁ mahātmanām

शब्दार्थ: सत्यं यदि स्यात् जगत् एतत् · अगर यह जगत (स्वतंत्र) सच हो · आत्मनः अनन्तत्त्व-हानिः · आत्मा की अनंतता का नाश · निगम-अप्रमाणता · वेद का अप्रमाण हो जाना · असत्य-वादित्वम् ईशितुः · ईश्वर का झूठा होना · न एतत् त्रयं साधु हितं · ये तीनों ठीक नहीं। हितकर नहीं।

अर्थ: अगर यह जगत स्वतंत्र रूप से सच हो, तो तीन बातें माननी पड़ेंगी, आत्मा की अनंतता का नाश, वेद का अप्रमाण हो जाना, और ईश्वर का झूठा सिद्ध होना। ये तीनों स्वीकार करने योग्य नहीं।

भावार्थ: गुरु एक तार्किक दलील देते हैं, मान लो जगत स्वतंत्र, अपने बल पर खड़ा एक सच है (ब्रह्म से अलग)। तो क्या होंगे?

तीन गड़बड़ियाँ। एक, अगर आत्मा/ब्रह्म के अलावा भी कुछ “है”, तो आत्मा “अनंत” नहीं रही; उसकी एक सीमा बन गई, जहाँ वह ख़त्म होती है और “जगत” शुरू होता है। दो, वेद बार-बार कहते हैं “सब ब्रह्म है”; अगर जगत अलग सच है, तो वेद झूठे हो गए। तीन, ईश्वर ने भी यही कहा; तो ईश्वर भी झूठा। गुरु कहते हैं, ये तीनों नतीजे अस्वीकार्य हैं। यह तर्क “जगत अलग सच नहीं” वाली बात को एक और कोण से पक्का करता है। और यह दिखाता है, अद्वैत अंध-श्रद्धा नहीं माँगता; वह तर्क की मेज़ पर भी अपनी बात रखता है।

233 · “वे मुझमें नहीं। मैं उनमें नहीं”

ईश्वरो वस्तुतत्त्वज्ञो न चाहं तेष्ववस्थितः ।
न च मत्स्थानि भूतानीत्येवमेव व्यचीकॢपत् ॥ 233 ॥

īśvaro vastu-tattva-jño na cāhaṁ teṣv avasthitaḥ · na ca mat-sthāni bhūtānīty evam eva vyacīkḷpat

शब्दार्थ: ईश्वरः वस्तु-तत्त्व-ज्ञः · ईश्वर, चीज़ों की असलियत का जानने वाला · “न च अहं तेषु अवस्थितः” · “मैं उनमें स्थित नहीं” · “न च मत्-स्थानि भूतानि” · “और न ही भूत मुझमें स्थित हैं” · इति एवम् एव व्यचीकॢपत् · ऐसा ही उन्होंने कहा।

अर्थ: चीज़ों की असलियत के जानने वाले ईश्वर ने स्वयं कहा, “मैं उनमें स्थित नहीं। और न ही भूत-प्राणी मुझमें स्थित हैं”, ऐसा ही उन्होंने ठहराया।

भावार्थ: गुरु गीता की ओर इशारा करते हैं (गीता 9.4-5 की गूँज), और यह एक चौंकाने वाली पंक्ति है। हम सोचते हैं अद्वैत कहता है “सब ईश्वर में है।” पर यहाँ ईश्वर ख़ुद कहते हैं, “वे मुझमें नहीं। मैं उनमें नहीं।”

यह विरोधाभास नहीं। एक सूक्ष्म बात है। “अ मुझमें है” तभी कहा जा सकता है जब “अ” और “मैं”, दो अलग चीज़ें हों, एक दूसरे के भीतर। पर अद्वैत में दो हैं ही नहीं।साँप रस्सी ही है। तो यह कहना भी ग़लत है कि “जगत ब्रह्म में है”, क्योंकि वह जगत को एक अलग चीज़ मान लेना है। सच इससे और गहरा है: जगत ब्रह्म “में” नहीं। जगत ब्रह्म “ही” है। एक बेहद बारीक फ़र्क, पर पूरे अद्वैत का दिल।

234 · गहरी नींद की कसौटी

यदि सत्यं भवेद्विश्वं सुषुप्तामुपलभ्यताम् ।
यन्नोपलभ्यते किंचिदतोऽसत्स्वप्नवन्मृषा ॥ 234 ॥

yadi satyaṁ bhaved viśvaṁ suṣuptām upalabhyatām · yan nopalabhyate kiṁcid ato’sat svapnavan mṛṣā

शब्दार्थ: यदि सत्यं भवेत् विश्वं · अगर विश्व (स्वतंत्र) सच होता · सुषुप्तां उपलभ्यताम् · तो गहरी नींद में भी दिखता · यत् न उपलभ्यते किंचित् · पर वहाँ कुछ नहीं दिखता · अतः असत् स्वप्न-वत् मृषा · इसलिए वह सपने जैसा, असली नहीं।

अर्थ: अगर विश्व स्वतंत्र रूप से सच होता, तो गहरी नींद में भी दिखना चाहिए था। पर वहाँ कुछ भी नहीं दिखता। इसलिए यह सपने जैसा है, स्वतंत्र, अंतिम सच नहीं।

भावार्थ: गुरु एक बेहद सरल, रोज़ का सबूत देते हैं, गहरी नींद (भाग 6, श्लोक 171 की याद)।

तर्क सीधा है: अगर यह संसार सच में, अपने बल पर, “वहाँ” खड़ा होता, चाहे आप सोओ या जागो, तो गहरी नींद में भी आपको मौजूद रहना चाहिए था। पर हर रात, गहरी नींद में, पूरा संसार ग़ायब हो जाता है, और आपको रत्ती भर फ़र्क नहीं पड़ता; उल्टा, सुकून मिलता है। जो चीज़ आपके सोने भर से ग़ायब हैं जाए, वह “स्वतंत्र, अंतिम सच” कैसे? यानी संसार सपने जैसा है, सपने में भी एक पूरी दुनिया होती है, और जागते ही नहीं रहती। इसका मतलब संसार “है ही नहीं”, ऐसा नहीं; मतलब वह उस तरह का अंतिम सच नहीं जैसा वह दिखता है। असली, टिकने वाला सच, वह जो नींद में भी रहा (साक्षी), वही ब्रह्म है।

235 · आधार ही, भ्रम से, संसार दिखता है

अतः पृथङ्नास्ति जगत्परात्मनः पृथक्प्रतीतिस्तु मृषा गुणादिवत् ।
आरोपितस्यास्ति किमर्थवत्ता दधिष्ठानमाभाति तथा भ्रमेण ॥ 235 ॥

ataḥ pṛthaṅ nāsti jagat parātmanaḥ pṛthak-pratītis tu mṛṣā guṇādivat · āropitasyāsti kim arthavattā d-adhiṣṭhānam ābhāti tathā bhrameṇa

शब्दार्थ: अतः पृथक् न अस्ति जगत् परात्मनः · इसलिए जगत आत्मा से अलग नहीं · पृथक्-प्रतीतिः तु मृषा · अलग दिखना झूठा है · गुण-आदि-वत् · गुण आदि की तरह · आरोपितस्य किम् अर्थवत्ता · आरोपित चीज़ का अपना क्या मोल · अधिष्ठानम् आभाति तथा भ्रमेण · आधार ही भ्रम से वैसा (संसार जैसा) दिखता है।

अर्थ: इसलिए जगत परम आत्मा से अलग नहीं। उसका अलग दिखना झूठा है। आरोपित चीज़ का अपना क्या मोल? आधार ही, भ्रम के कारण, वैसा (संसार जैसा) दिखने लगता है।

भावार्थ: गुरु पूरी बात को एक साफ़ निष्कर्ष पर ले आते हैं, और आख़िरी पंक्ति बेहद गहरी है: “अधिष्ठानम् आभाति तथा भ्रमेण”, आधार ही, भ्रम से, वैसा दिखता है।

फिर रस्सी-साँप, पर अब और गहराई से। अँधेरे में जब साँप दिखा, वहाँ “क्या” था? रस्सी। साँप कोई अलग चीज़ नहीं थी जो रस्सी के “ऊपर” आई हो, वह रस्सी ही थी, जो भ्रम के कारण साँप जैसी दिख रही थी। आधार (रस्सी) ही आरोपित रूप (साँप) जैसा दिखा। उसी तरह, यह पूरा संसार कोई अलग चीज़ नहीं जो ब्रह्म पर चढ़ी हो। यह ब्रह्म ही है, जो भ्रम के कारण “अनेक रूपों वाला संसार” जैसा दिख रहा है। आप संसार देखते हैं, आप असल में ब्रह्म ही देख रहे हैं, बस एक भ्रम के चश्मे से।

236 · सीप पर चाँदी

भ्रान्तस्य यद्यद्भ्रमतः प्रतीतं भ्रामैव तत्तद्रजतं हि शुक्तिः ।
इदंतया ब्रह्म सदैव रूप्यते त्वारोपितं ब्रह्मणि नाममात्रम् ॥ 236 ॥

bhrāntasya yad yad bhramataḥ pratītaṁ bhrāmaiva tat tad rajataṁ hi śuktiḥ · idantayā brahma sadaiva rūpyate tv āropitaṁ brahmaṇi nāma-mātram

शब्दार्थ: भ्रान्तस्य भ्रमतः यत् यत् प्रतीतं · भ्रम में पड़े को जो-जो दिखता है · भ्रामा एव तत् · वह सब बस भ्रम ही है · रजतं हि शुक्तिः · “चाँदी” असल में सीप है · इदंतया ब्रह्म सदा रूप्यते · “यह” के रूप में हमेशा ब्रह्म ही गढ़ा जाता है · आरोपितं ब्रह्मणि नाम-मात्रम् · ब्रह्म पर आरोपित बस एक नाम भर।

अर्थ: भ्रम में पड़े इंसान को जो-जो दिखता है, वह सब बस भ्रम ही है, जैसे “चाँदी” असल में सीप होती है। “यह, यह” कह कर हमेशा ब्रह्म को ही गढ़ा-पकड़ा जाता है; ब्रह्म पर आरोपित (नाम-रूप) बस एक नाम भर है।

भावार्थ: गुरु एक और क्लासिक उपमा लाते हैं, सीप और चाँदी। समुद्र किनारे एक सीप का टुकड़ा पड़ा है; धूप में वह चमकता है, और दूर से “चाँदी” दिखता है। आदमी दौड़ कर उठाता है, हाथ में सीप।

अब एक बेहद सुंदर बात, “इदंतया ब्रह्म सदैव रूप्यते।” जब आपने “चाँदी” देखी, तब भी आपकी उँगली असल में किस पर पड़ी? सीप पर। “चाँदी” नाम था, “सीप” वस्तु थी। उसी तरह, आप जब भी किसी चीज़ की ओर इशारा कर के “यह” कहते हैं, “यह मेज़, यह पेड़, यह इंसान”, हर बार आपकी उँगली असल में ब्रह्म पर ही पड़ रही है। बस आपने उस पर एक “नाम” चढ़ा रखा है। हर “यह” के नीचे, हमेशा, वही एक, ब्रह्म।

237 · इसलिए, ब्रह्म, सत्, अद्वितीय

अतः परं ब्रह्म सदद्वितीयं विशुद्धविज्ञानघनं निरञ्जनम् ।
प्राशान्तमाद्यन्तविहीनमक्रियं निरन्तरानन्दरसस्वरूपम् ॥ 237 ॥

ataḥ paraṁ brahma sad advitīyaṁ viśuddha-vijñāna-ghanaṁ nirañjanam · prāśāntam ādy-anta-vihīnam akriyaṁ nirantarānanda-rasa-svarūpam

शब्दार्थ: परं ब्रह्म सत् अद्वितीयं · सर्वोच्च ब्रह्म, सत्, अद्वितीय · विशुद्ध-विज्ञान-घनं · शुद्ध चेतना से ठोस भरा · निरञ्जनम् · निर्मल · प्राशान्तम् · परम शांत · आदि-अन्त-विहीनम् · आदि-अंत से रहित · अक्रियं · क्रिया-रहित · निरन्तर-आनन्द-रस-स्वरूपम् · निरंतर आनंद-रस का स्वरूप।

अर्थ: इसलिए सर्वोच्च ब्रह्म, सत्, अद्वितीय, शुद्ध चेतना से ठोस भरा, निर्मल, परम शांत, आदि-अंत से रहित, क्रिया-रहित, निरंतर आनंद-रस का स्वरूप, है।

भावार्थ: यहाँ से चार श्लोक ब्रह्म का पूरा परिचय हैं, हर शब्द एक खंभा। और एक शब्द ख़ास तौर पर शिष्य के पुराने डर का जवाब देता है, “विज्ञान-घन”, चेतना से ठोस भरा हुआ।

शिष्य डरा था कि सब छील कर अंत में एक ख़ालीपन मिलेगा। गुरु बार-बार वह शब्द लाते हैं, “घन”, ठोस। ब्रह्म ख़ाली नहीं। ठसाठस भरा है, और किससे? शुद्ध चेतना से, और निरंतर आनंद से। एक तस्वीर: आपने सोचा था सब हटा कर एक सूना कमरा मिलेगा; पर हटा कर देखा तो वहाँ रोशनी ही रोशनी थी, बिना किसी कोने के, बिना किसी अँधेरे के। नेति-नेति के अंत में सूनापन नहीं। एक भरा-पूरा प्रकाश है।

238 · माया के सारे भेदों से परे

निरस्तमायाकृतसर्वभेदं नित्यं सुखं निष्कलमप्रमेयम् ।
अरूपमव्यक्तमनाख्यमव्ययं ज्योतिः स्वयं किंचिदिदं चकास्ति ॥ 238 ॥

nirasta-māyā-kṛta-sarva-bhedaṁ nityaṁ sukhaṁ niṣkalam aprameyam · arūpam avyaktam anākhyam avyayaṁ jyotiḥ svayaṁ kiṁcid idaṁ cakāsti

शब्दार्थ: निरस्त-माया-कृत-सर्व-भेदं · माया के बनाए सारे भेदों से रहित · नित्यं सुखं निष्कलम् अप्रमेयम् · नित्य, सुख-रूप, अखंड, नाप से परे · अरूपम् अव्यक्तम् अनाख्यम् अव्ययम् · निराकार, अव्यक्त, बिना नाम, अविनाशी · ज्योतिः स्वयं किंचित् इदं चकास्ति · यह “कुछ” ख़ुद-ज्योति बन कर चमकता है।

अर्थ: माया के बनाए सारे भेदों से रहित, नित्य, सुख-रूप, अखंड, नाप से परे, निराकार, अव्यक्त, बिना नाम, अविनाशी, यह “कुछ” अपनी ही ज्योति से चमकता है।

भावार्थ: गुरु ब्रह्म का वर्णन जारी रखते हैं, और देखिए कितने शब्द “अ” / “निर्” से शुरू होते हैं, अरूप, अव्यक्त, अनाख्य, अव्यय, निष्कल। यह जान-बूझ कर है।

ब्रह्म को सीधे “यह है” कह कर पकड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि हर “ऐसा है” उसे एक खाँचे में सीमित कर देगा। तो गुरु इशारे से बताते हैं: यह नहीं। वह नहीं। कोई रूप नहीं। कोई नाम नहीं। कोई भेद नहीं। और फिर श्लोक के अंत में एक प्यारा शब्द, “किंचित्”, “कुछ।” गुरु वापस वहीं लौट आते हैं जहाँ से शुरू हुआ था (श्लोक 125, “अस्ति कश्चित्”, एक कुछ है)। वह “कुछ” नामहीन, रूपहीन है, पर है, और चमकता है, अपनी ही रोशनी से। उसे बखाना नहीं जा सकता, बस उसकी ओर इशारा किया जा सकता है।

239 · ज्ञाता-ज्ञेय-ज्ञान से परे

ज्ञातृज्ञेयज्ञानशून्यमनन्तं निर्विकल्पकम् ।
केवलाखण्डचिन्मात्रं परं तत्त्वं विदुर्बुधाः ॥ 239 ॥

jñātṛ-jñeya-jñāna-śūnyam anantaṁ nirvikalpakam · kevalākhaṇḍa-cin-mātraṁ paraṁ tattvaṁ vidur budhāḥ

शब्दार्थ: ज्ञातृ-ज्ञेय-ज्ञान-शून्यम् · जानने वाला, जानी जाने वाली चीज़, और जानने की क्रिया, इस तिकड़ी से रहित · अनन्तं निर्विकल्पकम् · अनंत, निर्विकल्प · केवल-अखण्ड-चित्-मात्रं · सिर्फ़ अखंड चेतना भर · परं तत्त्वं विदुः बुधाः · ज्ञानी इसे परम तत्व जानते हैं।

अर्थ: जानने वाला, जानी जाने वाली चीज़, और जानने की क्रिया, इस तिकड़ी से रहित, अनंत, निर्विकल्प, सिर्फ़ अखंड चेतना भर, ज्ञानी इसे ही परम तत्व जानते हैं।

भावार्थ: गुरु एक बेहद सूक्ष्म बात कहते हैं, ब्रह्म “ज्ञातृ-ज्ञेय-ज्ञान” की तिकड़ी से भी परे है।

हर साधारण “जानने” में तीन चीज़ें होती हैं, एक जानने वाला, एक जानी जाने वाली चीज़, और दोनों को जोड़ती जानने की क्रिया। (मैं, किताब को, पढ़ता हूँ।) पर यह तिकड़ी ख़ुद एक भेद है, एक बँटवारा। और ब्रह्म इस बँटवारे से भी पहले है। उसे “जाना” नहीं जा सकता उस तरह, जैसे एक चीज़ को जाना जाता है, क्योंकि वहाँ “जानने वाला” और “जानी जाने वाली चीज़” दो नहीं रह जाते। ब्रह्म को जानना उसमें घुल जाना है, “वह हो जाना” है। बस “अखंड चेतना”, बिना दरार, बिना बँटवारे, बिना तीन हिस्सों के। यह जानने का सबसे ऊँचा, सबसे अनोखा रूप है।

240 · ब्रह्म पूर्ण, मैं ही वह ज्योति

अहेयमनुपादेयं मनोवाचामगोचरम् ।
अप्रमेयमनाद्यन्तं ब्रह्म पूर्णमहं महः ॥ 240 ॥

aheyam anupādeyaṁ mano-vācām agocaram · aprameyam anādy-antaṁ brahma pūrṇam ahaṁ mahaḥ

शब्दार्थ: अहेयम् · जिसे छोड़ा न जा सके · अनुपादेयम् · जिसे (बाहर से) लिया-पाया न जा सके · मनः-वाचाम् अगोचरम् · मन और वाणी की पकड़ से परे · अप्रमेयम् · नापा न जा सके · अनादि-अन्तं · आदि-अंत से रहित · ब्रह्म पूर्णम् अहं महः · ब्रह्म, पूर्ण, मैं ही वह ज्योति/महिमा हूँ।

अर्थ: जिसे छोड़ा नहीं जा सकता, जिसे बाहर से पाया नहीं जा सकता, जो मन और वाणी की पकड़ से परे है, जो नापा नहीं जा सकता, जिसका आदि-अंत नहीं। वह पूर्ण ब्रह्म, मैं ही वह ज्योति हूँ।

भावार्थ: यह भाग 8 का समापन है, और यह एक विस्फोट पर ख़त्म होता है, “ब्रह्म पूर्णम् अहं महः।” मैं ही वह पूर्ण ब्रह्म हूँ, वह ज्योति हूँ।

पूरा भाग एक यात्रा थी। शुरू में शिष्य डरा हुआ था, “सब छील कर एक ख़ालीपन बचा।” फिर गुरु ने साक्षी दिखाया, फिर ब्रह्म दिखाया, फिर बताया कि संसार भी वही ब्रह्म है। और अब, इस आख़िरी श्लोक में, सारे धागे एक गाँठ में बँध जाते हैं, और वह गाँठ एक घोषणा है: वह असीम, अनादि, अनंत, पूर्ण ब्रह्म कोई दूर की चीज़ नहीं। “अहम्”, वह मैं हूँ।

दो शब्द ख़ास हैं। “अहेय-अनुपादेय”, इसे न छोड़ा जा सकता है, न बाहर से पाया जा सकता है। क्यों? क्योंकि यह आपका अपना स्वरूप है। आप जो पहले से हैं, उसे न खो सकते हैं, न नया हासिल कर सकते हैं, बस पहचान सकते हैं। और “पूर्ण”, पूरा, भरा हुआ। शिष्य का ख़ालीपन-वाला डर यहाँ पूरी तरह उलट जाता है: अंत में मिला एक ख़ालीपन नहीं। एक पूर्णता। और अब, अगले भाग में, यह “अहम् ब्रह्म” वाली बात अपने सबसे प्रसिद्ध रूप में आएगी, “तत् त्वम् असि”, आप वही है।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना: भाग 9 · तत् त्वम् असि, किताब का चरम। गुरु अब वेदान्त के सबसे बड़े वाक्य को खोलते हैं: “आप वही है।” वह “आप” और वह “वह”, दोनों के बीच की हर परत हट जाती है।

और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 236 कहता है, हर बार जब आप किसी चीज़ की ओर “यह” कह कर इशारा करते हैं, आपकी उँगली असल में ब्रह्म पर ही पड़ती है। आज एक “यह” चुनिए, कोई भी चीज़, कोई भी इंसान, और एक पल के लिए उस नाम के नीचे की “मिट्टी” को देखने की कोशिश कीजिए।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, verbatim।

स्थायी URL: /vivekachudamani/sakshi-aur-brahma/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-22