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भाग 8 · साक्षी और ब्रह्म

विवेकचूडामणि

भाग 8 · साक्षी और ब्रह्म · श्लोक 212-240

पाँचों कोश छिल चुके। अब शिष्य एक काँपती हुई आशंका में रुकता है, कि सब कुछ नकार देने पर जो शेष रहा, वह कहीं केवल एक रिक्तता तो नहीं। गुरु उस रिक्तता और साक्षी-आत्मा का अंतर खोलते हैं, और फिर वचन को आगे ले जाते हैं, कि यह समस्त विश्व भी ब्रह्म ही है।

29 श्लोक · पढ़ने का समय लगभग 36 मिनट · पहले पढ़ें: भाग 7 · पाँच कोश · दूसरा भाग · आगे-पीछे: विवेकचूडामणि मुख्य पृष्ठ

पहले एक बात

यह भाग एक अत्यंत ईमानदार आशंका से आरंभ होता है। पाँचों कोश छील दिए गए, शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, आनंद। हर एक के विषय में कहा गया, यह हम नहीं। अब शिष्य रुक कर एक काँपती हुई जिज्ञासा रखता है, कि सब कुछ नकार देने पर जो शेष रहा, वह कहीं केवल एक रिक्तता तो नहीं, कहीं अंत में हम एक “कुछ नहीं” तो नहीं।

यह जिज्ञासा बड़े मोल की है, क्योंकि यही वह स्थल है जहाँ नेति-नेति की समूची विधि उलट सकती है। गुरु का उत्तर इस भाग का पहला अंश है, और वह अत्यंत सूक्ष्म है, कि जो उस रिक्तता को भी देख रहा है, वह स्वयं रिक्त नहीं हो सकता।

फिर भाग एक बड़े मोड़ पर पहुँचता है। अब तक प्रश्न “आप कौन हैं” का था। अब गुरु एक और चरण रखते हैं, कि यह समस्त संसार भी, अंततः, वही एक ब्रह्म है। मृत्तिका और घट की उपमा से वे इसे खोलते हैं, और भीतर का साक्षी तथा सबका मूल ब्रह्म, दोनों एक ही सिद्ध होते हैं।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। दो अंश हैं। साक्षी (212-222, शिष्य की रिक्तता-वाली आशंका और गुरु का उत्तर), और ब्रह्म (223-240, संसार भी ब्रह्म ही है)। मुख्य खंभे, 214 (जो सबका अनुभव करता है, स्वयं अनुभव में नहीं आता), 218-220 (घट के जल में सूर्य), 228-229 (मृत्तिका और घट), 240 (ब्रह्म पूर्ण, और वही ज्योति हम हैं)।

कोश एक-एक कर के छील दिए गए, और हर परत पर शिष्य ने ईमानदारी से कहा, यह हम नहीं। अब वह एक काँपती हुई आशंका के साथ रुकता है। हे गुरुदेव, इन पाँचों कोशों को मिथ्या कह कर नकार देने पर तो यहाँ हमें एक सरासर ख़ालीपन के सिवा कुछ नहीं दिखता; तो आत्म-ज्ञानी के लिए जानने योग्य कौनसी वस्तु शेष रह गई। यह डर असली है, और हर सच्चे साधक को छूता है, कि कहीं सब कुछ हटा देने पर हाथ में बस एक सूनापन न बचे। शिष्य यह डर छिपाता नहीं, सीधे रख देता है।

212

शिष्य उवाच,
मिथ्यात्वेन निषिद्धेषु कोशेष्वेतेषु पञ्चसु ।
सर्वाभावं विना किंचिन्न पश्याम्यत्र हे गुरो विज्ञेयं किमु वस्त्वस्ति स्वात्मनात्मविपश्चिता ॥ 212 ॥

गुरु पहले शिष्य की प्रशंसा करते हैं, हे विद्वान, आपने सच कहा, आप विचार में निपुण हैं। पर फिर एक बेहद बारीक चाबी रख देते हैं, इतनी छोटी कि चूक सकती है। शिष्य ने कहा, हमें बस ख़ालीपन दिखता है। गुरु उस “दिखता है” को पकड़ लेते हैं। यदि वह ख़ालीपन आपको दिख रहा है, तो कोई है जो उसे देख रहा है। एक ख़ाली कमरा अपने ख़ालीपन को नहीं जानता, पर आप जानते हैं कि ख़ालीपन है, यानी एक जानने वाला उस अभाव के सामने हाज़िर है। शिष्य ने अनजाने में, अपने ही प्रश्न में, उस जानने वाले का सबूत दे दिया, और गुरु उँगली बस उसी ओर घुमा देते हैं।

213

श्रीगुरुरुवाच,
सत्यमुक्तं त्वया विद्वन्निपुणोऽसि विचारणे ।
अहमादिविकारास्ते तदभावोऽयमप्यनु ॥ 213 ॥

अब गुरु शिष्य की समूची आशंका का सीधा उत्तर रखते हैं। खोज ही ग़लत दिशा में है। शिष्य एक और वस्तु ढूँढ रहा है, जिसे जाना जाए, पर आत्मा कोई जानी जाने वाली वस्तु है ही नहीं। आत्मा तो जानने वाला है, नेत्र की भाँति, जो सब कुछ देखता है पर स्वयं को कभी नहीं देख पाता, और यह उसकी न्यूनता नहीं, यही उसका स्वभाव है। जिसके द्वारा सब कुछ अनुभव किया जाता है, पर जो ख़ुद कभी अनुभव नहीं किया जाता, उसी आत्मा को, उस जानने वाले को, बहुत सूक्ष्म बुद्धि से जान लीजिए। शिष्य को रिक्तता इसीलिए दिखी, क्योंकि उसने एक दृश्य वस्तु ढूँढी, और कोई वस्तु न मिली। पर देखने वाला तो हर क्षण वहीं था।

214

सर्वे येनानुभूयन्ते यः स्वयं नानुभूयते ।
तमात्मानं वेदितारं विद्धि बुद्ध्या सुसूक्ष्मया ॥ 214 ॥

गुरु एक अकाट्य नियम रखते हैं। जो-जो वस्तु अनुभव की जाती है, उसका एक साक्षी होता ही है, और जो वस्तु किसी के द्वारा अनुभव ही नहीं की गई, वहाँ साक्षीपन की बात ही लागू नहीं होती। अनुभव हों, और अनुभव करने वाला कोई न हो, यह असंभव है। यही नियम शिष्य की आशंका पर बैठ जाता है। शिष्य को रिक्तता का अनुभव हुआ, और जो अनुभूत हुई, उसका एक द्रष्टा अवश्य है। इस प्रकार उसकी अपनी आशंका ही अपना उत्तर दे देती है, क्योंकि उस रिक्तता को भी किसी ने देखा, और वही कोई असली तत्त्व है।

215

तत्साक्षिकं भवेत्तत्तद्यद्यद्येनानुभूयते ।
कस्याप्यननुभूतार्थे साक्षित्वं नोपयुज्यते ॥ 215 ॥

यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उठ सकता था, कि साक्षी सबको जानता है, पर साक्षी को कौन जानता है, फिर उसके लिए एक और साक्षी, और उसके लिए एक और, एक अंतहीन सीढ़ी। गुरु उस सीढ़ी को यहीं रोक देते हैं। साक्षी अपना ही साक्षी है, क्योंकि वह अपने आप से ही अनुभव होता है; उसे जानने के लिए किसी दूसरे की ज़रूरत नहीं। दीया कमरे की हर वस्तु दिखाता है, और दीये को दिखाने के लिए किसी दूसरे दीये की ज़रूरत नहीं, वह स्वयं-प्रकाश है। आत्मा ऐसी ही है, और इसीलिए वही, सीधा-सीधा, सर्वोच्च भीतर का आत्मा है, और कोई नहीं, सबसे क़रीब, बिना किसी बिचौलिए के।

216

असौ स्वसाक्षिको भावो यतः स्वेनानुभूयते ।
अतः परं स्वयं साक्षात्प्रत्यगात्मा न चेतरः ॥ 216 ॥

गुरु शिष्य के डर का उत्तर एक ठोस, अनुभवगम्य तथ्य पर ले आते हैं। शिष्य को लगा कि अंत में वह एक रिक्तता है। गुरु कहते हैं, नहीं, आप तो वही हैं जो हर अवस्था में “हम, हम” कह कर चमकता रहा है। जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों में जो बहुत साफ़, भीतर के रूप में उठता है, सदा “हम, हम” कर के एक-सा चमकता रहता है, जो इन भाँति-भाँति बदलती वस्तुओं को, इस “हम”-बुद्धि आदि को देखता है, और नित्य-आनंद-चेतन रूप में चमकता है, उसी को अपना स्वरूप जान लीजिए, अपने ही हृदय में। परिस्थितियाँ बदलीं, शरीर बदला, मन बदला, पर वह “हम हैं” वाला बोध हर अवस्था में एक-सा उपस्थित रहा। वह रिक्तता नहीं, सबसे ठोस, सबसे निरंतर तत्त्व है। और गुरु एक स्नेहभरा शब्द जोड़ते हैं, हृदय में, क्योंकि यह कोई दूर का दर्शन नहीं।

217

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटतरं योऽसौ समुज्जृम्भते प्रत्यग्रूपतया सदाहमहमित्यन्तः स्फुरन्नैकधा ।
नानाकारविकारभागिन इमान् पश्यन्नहंधीमुखान् नित्यानन्दचिदात्मना स्फुरति तं विद्धि स्वमेतं हृदि ॥ 217 ॥

अब तीन श्लोकों की एक अत्यंत सुंदर उपमा आरंभ होती है, घट के जल में सूर्य, जो समूची समस्या को एक ही चित्र में रख देती है। आँगन में एक घट रखा है, उसमें जल, और ऊपर असली सूर्य। उसका प्रतिबिंब जल में पड़ता है, एक छोटा, हिलता-डुलता सूर्य। घड़े के जल में पड़ा सूर्य का वह प्रतिबिंब देख कर कोई नादान उसी को सूर्य मान लेता है; वैसे ही उपाधि में बैठे चेतना के प्रतिबिंब को जड़-बुद्धि व्यक्ति भ्रम से “हम” मान बैठता है। असली चेतना, मानो सूर्य, ऊपर है। बुद्धि, मानो घट का जल, उसका प्रतिबिंब ग्रहण कर लेती है, और वह छोटा, हिलता प्रतिबिंब, यह “हम”, उसी को असली मान लिया जाता है। समूचा भ्रम एक वाक्य में, प्रतिबिंब को मूल समझ लेना।

218

घटोदके बिम्बितमर्कबिम्बम् आलोक्य मूढो रविमेव मन्यते ।
तथा चिदाभासमुपाधिसंस्थं भ्रान्त्याहमित्येव जडोऽभिमन्यते ॥ 218 ॥

अब वही उपमा मार्ग दिखाती है, और वह अत्यंत सीधा है। असली सूर्य तक पहुँचने का उपाय घट के जल को घूरते रहना नहीं। घड़े, पानी और उसमें पड़े प्रतिबिंब, इन तीनों को छोड़ कर ही असली सूर्य देखा जाता है, जो अलग, अछूता, इन तीनों को प्रकाशित करने वाला, स्वयं-प्रकाश है, और विद्वान इसी तरह उसे देखता है। इन तीनों से दृष्टि हटानी होती है, घट यानी शरीर, जल यानी बुद्धि, और प्रतिबिंब यानी वह उधार की चमक वाला “हम”। इनमें से किसी को भी असली “हम” मानना त्याग कर दृष्टि ऊपर उठती है, और असली सूर्य वहीं है, सदा से, तटस्थ, इन तीनों से पृथक और इन तीनों को प्रकाशित करता हुआ। यही नेति-नेति की समूची विधि का सार है।

219

घटं जलं तद्गतमर्कबिम्बं विहाय सर्वं विनिरीक्ष्यतेऽर्कः ।
तटस्थ एतत्त्रितयावभासकः स्वयंप्रकाशो विदुषा यथा तथा ॥ 219 ॥

गुरु अब घड़े-पानी-सूरज वाली उपमा को सीधे शिष्य पर लगा देते हैं। शरीर, बुद्धि और चेतना का प्रतिबिंब, इन तीनों को इस तरह छोड़ कर, बुद्धि की गुफ़ा में छिपे उस द्रष्टा-आत्मा को जान लीजिए, जो अखंड बोध है, सबको प्रकाशित करने वाला, सत् और असत् दोनों से परे। तीन वस्तुएँ, घड़ा, पानी, प्रतिबिंब, अब साफ़ नाम पाती हैं, और इनसे नज़र हटते ही जो मिलता है वह बुद्धि की गुफ़ा में छिपा है, एक भीतरी, शांत, ढकी हुई जगह में, सदा से। और एक गहरा शब्द आता है, सत् और असत् दोनों से अलग, यानी आत्मा को “है” या “नहीं है”, किसी एक खाँचे में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि वह दोनों खाँचों को जानने वाला है। शिष्य का ख़ालीपन वाला डर यहाँ पूरी तरह घुल जाता है, जो बचा वह सूनापन नहीं, एक भरा हुआ, रोशन, सबको रोशन करने वाला द्रष्टा है।

220

देहं धियं चित्प्रतिबिम्बमेवं विसृज्य बुद्धौ निहितं गुहायाम् ।
द्रष्टारमात्मानमखण्डबोधं सर्वप्रकाशं सदसद्विलक्षणम् ॥ 220 ॥

अब गुरु इस ज्ञान का फल बताते हैं। नित्य, व्यापक, सर्वगत, अति-सूक्ष्म, भीतर-बाहर के भेद से रहित, आत्मा से अभिन्न, इस अपने स्वरूप को ठीक से जान कर मनुष्य निष्पाप, निर्मल और मृत्यु से परे हो जाता है। ये कोई नई उपलब्धियाँ नहीं जो कमाई जाती हों, ये केवल जान लेने मात्र से सिद्ध हो जाती हैं, क्योंकि पाप, मलिनता और मृत्यु, ये सब उन्हीं परतों के थे, शरीर और मन के; असली आत्मा तो सदा से इनसे परे थी। निष्पाप बनना नहीं है, केवल यह पहचानना है कि असली स्वरूप कभी पापी था ही नहीं। यहाँ जानना ही मुक्ति है।

221

नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं अन्तर्बहिःशून्यमनन्यमात्मनः ।
विज्ञाय सम्यङ्निजरूपमेतत् पुमान् विपाप्मा विरजो विमृत्युः ॥ 221 ॥

गुरु पहले अंश को, साक्षी वाली बात को, एक ज़ोरदार वचन पर बंद करते हैं। ऐसा जानने वाला शोक से परे, आनंद से ठोस भरा, ज्ञानी हो जाता है, और कहीं से, किसी से नहीं डरता; और मुमुक्षु के लिए, संसार-बंधन से छूटने का, अपने तत्त्व को जाने बिना, कोई दूसरा रास्ता है ही नहीं। शिष्य की आशंका थी कि अंत में रिक्तता मिलेगी, पर गुरु का उत्तर इसके विपरीत है, कि अंत में जो मिलता है वह घन है, ठोस, परिपूर्ण भरा, और आनंद से लबालब। और इसका एक सीधा फल, कहीं से नहीं डरता, क्योंकि भय सदा एक दूसरे से होता है, और जहाँ यह जान लिया गया कि सब वही एक है, वहाँ डराने को शेष कौन। गुरु अंत में दो-टूक कहते हैं, इसका कोई दूसरा मार्ग नहीं, यह कठोरता नहीं, सरल सत्य है।

222

विशोक आनन्दघनो विपश्चित्
स्वयं कुतश्चिन्न बिभेति कश्चित् ।
नान्योऽस्ति पन्था भवबन्धमुक्तेः
विना स्वतत्त्वावगमं मुमुक्षोः ॥ 222 ॥

यहाँ भाग का दूसरा मोड़ शुरू होता है। अब तक बात भीतर के साक्षी की थी; अब गुरु एक बड़ा शब्द लाते हैं, ब्रह्म। ब्रह्म से अपनी अभिन्नता का ज्ञान, यही संसार से मुक्ति का कारण है, जिससे ज्ञानी अद्वितीय, आनंद-रूप ब्रह्म को पा लेते हैं। यहाँ एक बारीक बात है, जो आगे खुलेगी, कि अब तक जिस साक्षी की खोज हो रही थी, वह कोई छोटी, निजी वस्तु नहीं, वह वही असीम ब्रह्म है। भीतर का साक्षी और सबका मूल ब्रह्म, दो नहीं, एक। यही अद्वैत है, और यही पूरी पुस्तक का गंतव्य।

223

ब्रह्माभिन्नत्वविज्ञानं भवमोक्षस्य कारणम् ।
येनाद्वितीयमानन्दं ब्रह्म सम्पद्यते बुधैः ॥ 223 ॥

अब गुरु एक गहरी बात कहते हैं। ब्रह्म-रूप हो चुका ज्ञानी संसार के लिए फिर नहीं लौटता; इसलिए आत्मा की ब्रह्म से अभिन्नता को ठीक से जान लेना चाहिए। ध्यान दीजिए, ब्रह्म पा लेना नहीं, ब्रह्म हो जाना। यह फ़र्क बारीक और ज़रूरी है। जिस वस्तु को आप पाते हैं, उसे खो भी सकते हैं, पर जो आप हो जाते हैं, उससे लौटना नहीं होता। एक नदी समुद्र में मिल जाए, तो वह फिर नदी नहीं बन सकती, वह समुद्र हो गई। मुक्ति किसी वस्तु का हासिल होना नहीं, एक पहचान का बदल जाना है, और इसीलिए वह आख़िरी है। गुरु इस श्लोक को एक सीधे आदेश पर बंद करते हैं, तो इस अभिन्नता को ठीक से जान लीजिए।

224

ब्रह्मभूतस्तु संसृत्यै विद्वान्नावर्तते पुनः ।
विज्ञातव्यमतः सम्यग्ब्रह्माभिन्नत्वमात्मनः ॥ 224 ॥

अब गुरु ब्रह्म की एक प्रसिद्ध परिभाषा देते हैं। ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है, अनंत है, पवित्र, सर्वोच्च, अपने आप सिद्ध, नित्य आनंद का एक रस, और भीतर के आत्मा से अभिन्न, वह निरंतर जयवंत है। तीन शब्द, और हर एक एक दरवाज़ा। सत्य, जो हमेशा है, बदलता नहीं। ज्ञान, जो कोई जड़, बेजान वस्तु नहीं, यह जागरूकता है, चेतना। अनंत, जिसकी कोई सीमा नहीं, न समय की, न जगह की। पर इस श्लोक का असली रत्न आख़िरी पंक्ति में है, भीतर के आत्मा से अभिन्न; यानी यह विशाल, असीम ब्रह्म कोई दूर की वस्तु नहीं, वह आपके भीतर के उस “हम हैं” से रत्ती भर अलग नहीं। साक्षी और ब्रह्म, गुरु यहाँ साफ़ कह देते हैं, एक ही हैं।

225

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म विशुद्धं परं स्वतःसिद्धम् ।
नित्यानन्दैकरसं प्रत्यगभिन्नं निरन्तरं जयति ॥ 225 ॥

अद्वैत शब्द को गुरु अब खोलते हैं, अ-द्वैत, दो नहीं। यह सत् परम अद्वैत है, क्योंकि अपने सिवा कोई और वस्तु है ही नहीं; परम सच के सही बोध की दशा में, कुछ और है ही नहीं। गुरु और गहरे जाते हैं, अपने सिवा कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं। अद्वैत यह नहीं कहता कि दो वस्तुएँ असल में एक हैं, वह कहता है कि दूसरी वस्तु कभी थी ही नहीं। और एक मर्म-शब्द, बोध की दशा में, क्योंकि यह तर्क की मेज़ पर सिद्ध करने की वस्तु नहीं, यह अनुभव की एक अवस्था है। उस अवस्था में पहुँच कर ही प्रकट होता है कि, यथार्थ में, बस वही एक है।

226

सदिदं परमाद्वैतं स्वस्मादन्यस्य वस्तुनोऽभावात् ।
न ह्यन्यदस्ति किंचित्सम्यक्परमार्थतत्त्वबोधदशायाम् ॥ 226 ॥

अब गुरु एक बड़ी छलाँग लगाते हैं। अब तक बात “आप ब्रह्म हैं” तक थी, अब वे कहते हैं, यह पूरा संसार भी ब्रह्म ही है। यह जो पूरा विश्व अज्ञान से अनेक रूपों में दिखता है, झूठी कल्पना के सारे दोष हटा देने पर, वह सब ब्रह्म ही है। इसका यह अर्थ नहीं कि जगत कुछ नहीं है; जगत है, पर वह जो है, वह ब्रह्म है। समस्या जगत में नहीं, समस्या उस नाना-रूप में है, हमारी उसे अलग-अलग, टुकड़ों में देखने की आदत में। वह आदत हटे, तो वही जगत ब्रह्म दिखने लगता है। अगले श्लोक मिट्टी-घड़े की तस्वीर से इसे खोलेंगे।

227

यदिदं सकलं विश्वं नानारूपं प्रतीतमज्ञानात् ।
तत्सर्वं ब्रह्मैव प्रत्यस्ताशेषभावनादोषम् ॥ 227 ॥

अब अद्वैत की सबसे प्रिय उपमाओं में से एक आती है, मृत्तिका और घट। घड़ा मिट्टी का बना होते हुए भी मिट्टी से अलग नहीं, हर जगह वह मिट्टी-रूप ही है; घड़े का अपना कोई अलग रूप है ही नहीं, तो “घड़ा” है क्या, बस एक झूठा, गढ़ा हुआ नाम। घट को जहाँ कहीं छुआ जाए, अँगुली मृत्तिका को ही छूती है, हर स्थान पर; घट का हर अंश मृत्तिका है, और मृत्तिका के सिवा कुछ नहीं। यही न्याय संसार पर भी लागू होता है। हर वस्तु, हर वृक्ष, हर प्राणी, एक “घट” है, अर्थात एक नाम-रूप, और यथार्थ में जो है, वह सब में एक मृत्तिका, अर्थात ब्रह्म।

228

मृत्कार्यभूतोऽपि मृदो न भिन्नः कुम्भोऽस्ति सर्वत्र तु मृत्स्वरूपात् ।
न कुम्भरूपं पृथगस्ति कुम्भः कुतो मृषा कल्पितनाममात्रः ॥ 228 ॥

गुरु एक छोटा-सा प्रयोग रखते हैं, जो किसी से भी करवाया जा सकता है। कोई भी घड़े के स्वरूप को मिट्टी से अलग करके नहीं दिखा सकता, इसलिए घड़ा बस मोह से गढ़ी हुई वस्तु है, मिट्टी ही सत्य है, परम सच। मृत्तिका हटा देने पर घट शेष ही नहीं रहता, अर्थात घट मृत्तिका पर पूर्णतः आश्रित है। तब दोनों में सत्य कौन, मृत्तिका, क्योंकि वह घट के बिना भी रह सकती है, पर घट मृत्तिका के बिना एक क्षण नहीं। यही सत्य की कसौटी है, जो अपने ही बल पर स्थित हो। संसार की हर वस्तु एक घट है, और वह आधार, वह मृत्तिका, अर्थात ब्रह्म ही, अकेला परम सत्य है।

229

केनापि मृद्भिन्नतया स्वरूपं घटस्य संदर्शयितुं न शक्यते ।
अतो घटः कल्पित एव मोहान् मृदेव सत्यं परमार्थभूतम् ॥ 229 ॥

गुरु निष्कर्ष पर मुहर लगाते हैं, और एक तीखी, स्मरणीय उपमा देते हैं। सत्-ब्रह्म की सारी रचना सत् ही है, बस वही है, उससे अलग कुछ नहीं; और जो कहता है कि कोई अलग वस्तु है, उसका मोह अभी गया नहीं, उसकी बात सोते हुए की बड़बड़ाहट जैसी है। कोई गहरी निद्रा में बड़बड़ा रहा हो, उसके शब्द निरर्थक हैं, उसे ज्ञात नहीं कि वह क्या कह रहा है। जो व्यक्ति ब्रह्म से पृथक किसी वस्तु को असली मान कर बोलता रहता है, वह ठीक उसी दशा में है। यह कठोर प्रतीत होता है, पर यह एक आमंत्रण है, कि जागिए, और जागना अर्थात देख लेना कि यह सब, हर वस्तु, एक ही सत् है।

230

सद्ब्रह्मकार्यं सकलं सदेवं तन्मात्रमेतन्न ततोऽन्यदस्ति ।
अस्तीति यो वक्ति न तस्य मोहो विनिर्गतो निद्रितवत्प्रजल्पः ॥ 230 ॥

अब गुरु अपनी बात के लिए श्रुति को गवाह बनाते हैं। “यह विश्व ब्रह्म ही है”, श्रुति की श्रेष्ठ वाणी, अथर्व में टिकी हुई, ऐसा कहती है; इसलिए यह विश्व बस ब्रह्म ही है, आरोपित वस्तु का अपने आधार से कोई अलगाव होता ही नहीं। यह कोई निजी राय नहीं, यह परम्परा की सबसे गहरी घोषणा है। और आख़िरी पंक्ति एक ज़रूरी तार्किक बात रखती है। रस्सी पर साँप आरोपित था, पर क्या साँप रस्सी से कहीं अलग जा सकता था, नहीं; साँप था ही रस्सी, बस ग़लत नाम से। उसी तरह यह संसार ब्रह्म पर आरोपित है, और इसलिए ब्रह्म से अलग कहीं हो ही नहीं सकता। संसार भागने की कोशिश भी करे, तो जाएगा कहाँ, वह ब्रह्म ही है।

231

ब्रह्मैवेदं विश्वमित्येव वाणी श्रौती ब्रूतेऽथर्वनिष्ठा वरिष्ठा ।
तस्मादेतद्ब्रह्ममात्रं हि विश्वं नाधिष्ठानाद्भिन्नतारोपितस्य ॥ 231 ॥

अब गुरु एक तार्किक दलील देते हैं। मान लीजिए, यह जगत स्वतंत्र रूप से, अपने बल पर खड़ा एक सच हो, ब्रह्म से अलग। तो तीन बातें माननी पड़ेंगी, आत्मा की अनंतता का नाश, वेद का अप्रमाण हो जाना, और ईश्वर का झूठा सिद्ध होना, और ये तीनों स्वीकार करने योग्य नहीं। यदि आत्मा के अलावा भी कुछ “है”, तो आत्मा अनंत न रही, उसकी एक सीमा बन गई जहाँ वह ख़त्म होती है और जगत शुरू होता है। वेद बार-बार कहते हैं सब ब्रह्म है, सो वे झूठे हो जाएँ। ईश्वर ने भी यही कहा, सो वह भी झूठा। यह दिखाता है कि अद्वैत अंध-श्रद्धा नहीं माँगता, वह तर्क की मेज़ पर भी अपनी बात रखता है।

232

सत्यं यदि स्याज्जगदेतदात्मनोऽनन्तत्त्वहानिर्निगमाप्रमाणता ।
असत्यवादित्वमपीशितुः स्यान्नैतत्त्रयं साधु हितं महात्मनाम् ॥ 232 ॥

अब गुरु गीता की ओर इशारा करते हैं, और यह एक चौंकाने वाली पंक्ति है। चीज़ों की असलियत के जानने वाले ईश्वर ने स्वयं कहा, “हम उनमें स्थित नहीं, और न ही भूत-प्राणी हममें स्थित हैं”, ऐसा ही उन्होंने ठहराया। हम सोचते हैं अद्वैत कहता है सब ईश्वर में है, पर यहाँ ईश्वर ख़ुद कहते हैं, वे हममें नहीं, हम उनमें नहीं। यह विरोधाभास नहीं, एक सूक्ष्म बात है। “अ हममें है” तभी कहा जा सकता है जब “अ” और “हम”, दो अलग वस्तुएँ हों, एक दूसरे के भीतर, पर अद्वैत में दो हैं ही नहीं। साँप रस्सी ही है। सो यह कहना भी ग़लत है कि जगत ब्रह्म में है, क्योंकि वह जगत को अलग वस्तु मान लेना है। सच और गहरा है, जगत ब्रह्म “में” नहीं, जगत ब्रह्म “ही” है।

233

ईश्वरो वस्तुतत्त्वज्ञो न चाहं तेष्ववस्थितः ।
न च मत्स्थानि भूतानीत्येवमेव व्यचीकॢपत् ॥ 233 ॥

अब गुरु एक बेहद सरल, रोज़ का सबूत देते हैं, गहरी नींद। यदि विश्व स्वतंत्र रूप से सच होता, तो गहरी नींद में भी दिखना चाहिए था, पर वहाँ कुछ भी नहीं दिखता, इसलिए यह सपने जैसा है, अंतिम सच नहीं। तर्क सीधा है। यदि यह संसार सचमुच अपने ही बल पर खड़ा होता, तो गहरी सुषुप्ति में भी उसका भान रहना चाहिए था, पर हर रात समूचा संसार लुप्त हो जाता है और रत्ती भर अंतर नहीं पड़ता, उलटे विश्राम मिलता है। जो वस्तु सो जाने मात्र से लुप्त हो जाए, वह अंतिम सत्य कैसे। इसका तात्पर्य यह नहीं कि संसार है ही नहीं, तात्पर्य यह कि वह वैसा अंतिम सत्य नहीं जैसा प्रतीत होता है। असली, टिकने वाला सत्य वह है जो सुषुप्ति में भी रहा, अर्थात साक्षी, और वही ब्रह्म है।

234

यदि सत्यं भवेद्विश्वं सुषुप्तामुपलभ्यताम् ।
यन्नोपलभ्यते किंचिदतोऽसत्स्वप्नवन्मृषा ॥ 234 ॥

गुरु अब पूरी बात को एक साफ़ निष्कर्ष पर ले आते हैं, और आख़िरी पंक्ति बेहद गहरी है। इसलिए जगत परम आत्मा से अलग नहीं, उसका अलग दिखना झूठा है; आरोपित वस्तु का अपना क्या मोल, आधार ही, भ्रम के कारण, वैसा संसार जैसा दिखने लगता है। फिर रज्जु-सर्प, पर अब और गहराई से। अँधेरे में जब सर्प दिखा, वहाँ था क्या, रज्जु; सर्प कोई पृथक वस्तु नहीं थी जो रज्जु के ऊपर चढ़ आई हो, वह रज्जु ही थी, जो भ्रम के कारण सर्प जैसी प्रतीत हो रही थी। उसी प्रकार यह समूचा संसार कोई पृथक वस्तु नहीं जो ब्रह्म पर चढ़ी हो, यह ब्रह्म ही है, जो भ्रम के कारण अनेक रूपों वाले संसार जैसा प्रतीत हो रहा है।

235

अतः पृथङ्नास्ति जगत्परात्मनः पृथक्प्रतीतिस्तु मृषा गुणादिवत् ।
आरोपितस्यास्ति किमर्थवत्ता अधिष्ठानमाभाति तथा भ्रमेण ॥ 235 ॥

अब गुरु एक और प्रसिद्ध उपमा लाते हैं, सीप और चाँदी। भ्रम में पड़े व्यक्ति को जो-जो दिखता है, वह सब बस भ्रम ही है, जैसे “चाँदी” असल में सीप होती है; “यह, यह” कह कर हमेशा ब्रह्म को ही गढ़ा-पकड़ा जाता है, ब्रह्म पर आरोपित नाम-रूप बस एक नाम भर है। समुद्र-तट पर एक सीप का टुकड़ा धूप में चमकता है, दूर से चाँदी प्रतीत होता है, कोई दौड़ कर उठाता है, हाथ में आती है सीप। जब चाँदी दिखी, तब भी अँगुली पड़ी किस पर, सीप पर। उसी प्रकार, जब भी किसी वस्तु की ओर इंगित कर के “यह” कहा जाता है, यह वृक्ष, यह प्राणी, हर बार अँगुली यथार्थ में ब्रह्म पर ही पड़ रही है, बस उस पर एक नाम चढ़ा हुआ है।

236

भ्रान्तस्य यद्यद्भ्रमतः प्रतीतं भ्रामैव तत्तद्रजतं हि शुक्तिः ।
इदंतया ब्रह्म सदैव रूप्यते त्वारोपितं ब्रह्मणि नाममात्रम् ॥ 236 ॥

यहाँ से चार श्लोक ब्रह्म का पूरा परिचय हैं, हर शब्द एक खंभा। इसलिए सर्वोच्च ब्रह्म, सत्, अद्वितीय, शुद्ध चेतना से ठोस भरा, निर्मल, परम शांत, आदि-अंत से रहित, क्रिया-रहित, निरंतर आनंद-रस का स्वरूप, है। एक शब्द ख़ास तौर पर शिष्य के पुराने डर का जवाब देता है, चेतना से ठोस भरा हुआ। शिष्य की आशंका थी कि सब छील कर अंत में एक रिक्तता मिलेगी, पर गुरु बार-बार वही शब्द लाते हैं, घन, ठोस। ब्रह्म रिक्त नहीं, वह परिपूर्ण भरा है, शुद्ध चेतना से, और निरंतर आनंद से। आशंका थी कि सब हटाने पर एक सूना कक्ष मिलेगा, पर हटाने पर वहाँ प्रकाश ही प्रकाश था, बिना किसी अँधेरे के।

237

अतः परं ब्रह्म सदद्वितीयं विशुद्धविज्ञानघनं निरञ्जनम् ।
प्राशान्तमाद्यन्तविहीनमक्रियं निरन्तरानन्दरसस्वरूपम् ॥ 237 ॥

गुरु ब्रह्म का वर्णन आगे बढ़ाते हैं। माया के बनाए सारे भेदों से रहित, नित्य, सुख-रूप, अखंड, नाप से परे, निराकार, अव्यक्त, बिना नाम, अविनाशी, यह “कुछ” अपनी ही ज्योति से चमकता है। अनेक शब्द “अ” तथा “निर्” से आरंभ होते हैं, और यह सोच-समझ कर है, क्योंकि ब्रह्म को सीधे “यह है” कह कर पकड़ा नहीं जा सकता, हर “ऐसा है” उसे एक खाँचे में सीमित कर देगा। इसलिए गुरु संकेत से बताते हैं, यह नहीं, वह नहीं, कोई रूप नहीं, कोई नाम नहीं, कोई भेद नहीं। और फिर एक स्नेहभरा शब्द, “कुछ”, जहाँ से आरंभ हुआ था वहीं लौट आते हैं। वह “कुछ” नामहीन, रूपहीन है, पर है, और अपनी ही ज्योति से चमकता है।

238

निरस्तमायाकृतसर्वभेदं नित्यं सुखं निष्कलमप्रमेयम् ।
अरूपमव्यक्तमनाख्यमव्ययं ज्योतिः स्वयं किंचिदिदं चकास्ति ॥ 238 ॥

गुरु एक बेहद सूक्ष्म बात कहते हैं, कि ब्रह्म जानने वाला, जानी जाने वाली वस्तु, और जानने की क्रिया, इस तिकड़ी से भी परे है। इस तिकड़ी से रहित, अनंत, निर्विकल्प, सिर्फ़ अखंड चेतना भर, ज्ञानी इसे ही परम तत्त्व जानते हैं। हर साधारण जानने में तीन चीज़ें होती हैं, एक जानने वाला, एक जानी जाने वाली वस्तु, और दोनों को जोड़ती जानने की क्रिया। पर यह तिकड़ी ख़ुद एक भेद है, एक बँटवारा, और ब्रह्म इस बँटवारे से भी पहले है। उसे उस तरह नहीं जाना जा सकता जैसे एक वस्तु को जाना जाता है, क्योंकि वहाँ जानने वाला और जानी जाने वाली वस्तु दो नहीं रह जाते। ब्रह्म को जानना उसमें घुल जाना है, बस अखंड चेतना, बिना दरार, बिना बँटवारे।

239

ज्ञातृज्ञेयज्ञानशून्यमनन्तं निर्विकल्पकम् ।
केवलाखण्डचिन्मात्रं परं तत्त्वं विदुर्बुधाः ॥ 239 ॥

यह भाग 8 का समापन है, और यह एक विस्फोट पर ख़त्म होता है। जिसे छोड़ा नहीं जा सकता, जिसे बाहर से पाया नहीं जा सकता, जो मन और वाणी की पकड़ से परे है, जो नापा नहीं जा सकता, जिसका आदि-अंत नहीं, वह पूर्ण ब्रह्म, हम ही वह ज्योति हैं। पूरा भाग एक यात्रा थी। शुरू में शिष्य डरा हुआ था कि सब छील कर एक ख़ालीपन बचा, फिर गुरु ने साक्षी दिखाया, फिर ब्रह्म, फिर बताया कि संसार भी वही ब्रह्म है। और अब, इस आख़िरी श्लोक में, सारे धागे एक गाँठ में बँध जाते हैं, और वह गाँठ एक घोषणा है, वह असीम, अनादि, अनंत, पूर्ण ब्रह्म कोई दूर की वस्तु नहीं, वह हम हैं। इसे न छोड़ा जा सकता है, न बाहर से पाया जा सकता है, क्योंकि यह स्वयं का ही स्वरूप है, और शिष्य की रिक्तता-वाली आशंका यहाँ पूरी तरह उलट जाती है, अंत में मिली एक रिक्तता नहीं, एक पूर्णता।

240

अहेयमनुपादेयं मनोवाचामगोचरम् ।
अप्रमेयमनाद्यन्तं ब्रह्म पूर्णमहं महः ॥ 240 ॥

आगे

अगला पन्ना भाग 9 · तत् त्वम् असि है, ग्रंथ का चरम। गुरु अब वेदान्त के महावाक्य को खोलते हैं, “आप वही हैं।” उस “आप” और उस “वह” के बीच की हर परत वहाँ हट जाती है।

इस भाग की सबसे गहरी बात श्लोक 236 में टिकी है, कि हर बार किसी वस्तु की ओर “यह” कह कर इंगित करने में अँगुली यथार्थ में ब्रह्म पर ही पड़ती है। हर नाम-रूप के नीचे, वही एक मृत्तिका, वही एक ब्रह्म।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ मानक 580-श्लोक संस्करण से, अक्षरशः।

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-22

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