विवेकचूडामणि
भाग 5 · आत्मा का स्वरूप, और बंधन की गाँठ · श्लोक 124-145
चार भागों तक गुरु ने केवल यही कहा था, “आप यह नहीं हैं।” अब, पहली बार, वे सीधा कहते हैं, “आप यह हैं।” और फिर खोल कर रखते हैं कि वह गाँठ बँधी किस तरह, जिसने इस सीधी-सादी बात को इतनी देर ढके रखा।
भाग 4 एक लंबी “नेति-नेति” थी, शरीर, मन, प्राण, माया, हर वस्तु एक ओर रख दी गई। अब, उस सारे ढेर के बीच से, गुरु उस एक तत्व की ओर इशारा करते हैं जो शेष रह जाता है, और वह कोई और वस्तु नहीं, वह स्वयं आप हैं। पर वे आरंभ में ही एक वचन दे देते हैं, यह कोई शुष्क दर्शन नहीं, यह वह तत्व है जिसे जान भर लेने से बंधन टूट जाता है, और जिसे जान कर मनुष्य कैवल्य पा लेता है।

124 · “अब आत्मा का स्वरूप सुनिए”
अथ ते संप्रवक्ष्यामि स्वरूपं परमात्मनः ।
यद्विज्ञाय नरो बन्धान्मुक्तः कैवल्यमश्नुते ॥ 124 ॥
और गुरु कितनी सावधानी से पहला क़दम रखते हैं। वे न नाम देते हैं, न परिभाषा, बस इतना कहते हैं कि एक “कुछ” है, अपने आप, नित्य, हर “मैं” के पीछे खड़ा, जागते-सपने-गहरी नींद, तीनों अवस्थाओं का साक्षी, और पाँच कोशों से बिलकुल अलग। फिर वे एक बारीक तर्क रखते हैं। हमें लगता है “मैं” यानी बुद्धि और मन, पर गहरी नींद में बुद्धि की हलचल थम जाती है, फिर भी सुबह कहा जाता है, “मुझे कुछ पता नहीं था।” अर्थात् किसी को बुद्धि के होने का भी पता था और न होने का भी, और जो दोनों को जानता है वह बुद्धि स्वयं नहीं हो सकता। दीया कमरे की चीज़ें दिखाता है, पर दीया बुझ जाए तो “अँधेरा है” यह किसने जाना? एक और रोशनी, जो दीये के जलने और बुझने, दोनों को देखती है। वही दूसरी रोशनी असली “मैं” है।
125 · 126
अस्ति कश्चित्स्वयं नित्यमहंप्रत्ययलम्बनः ।
अवस्थात्रयसाक्षी संपञ्चकोशविलक्षणः ॥ 125 ॥
यो विजानाति सकलं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ।
बुद्धितद्वृत्तिसद्भावमभावमहमित्ययम् ॥ 126 ॥
अब गुरु इशारों की एक लड़ी पिरोते हैं, और हर इशारा एक ही ओर उँगली रखता है। यह वह है जो ख़ुद सब कुछ देखता है, पर जिसे कोई नहीं देख पाता, जो बुद्धि को चेतना देता है पर जिसे बुद्धि चेतना नहीं देती। अपनी आँख की तरह, जो सब देखती है पर ख़ुद को कभी नहीं देख पाती; जो आईने में दिखता है वह आँख का प्रतिबिंब है, आँख नहीं। आगे एक और छवि आती है, प्रकाश की। एक अँधेरे कमरे में सूरज की रोशनी आती है और मेज़, किताब, दीवार सब दिखने लगते हैं, पर मेज़ ख़ुद नहीं चमक रही, वह उधार की रोशनी से दिख रही है। यह पूरा विश्व ऐसा ही “आभा-रूप” है, उधार की रोशनी से चमकता हुआ, और असली स्रोत वह आत्म-चेतना है जिसे कोई और रोशन नहीं करता।
127 · 128
यः पश्यति स्वयं सर्वं यं न पश्यति कश्चन ।
यश्चेतयति बुद्ध्यादि न तद्यं चेतयत्ययम् ॥ 127 ॥
येन विश्वमिदं व्याप्तं यं न व्याप्नोति किंचन ।
अभारूपमिदं सर्वं यं भान्त्यमनुभात्ययम् ॥ 128 ॥
दो शब्द अब बेहद ज़रूरी हैं, “बस पास होने भर से” और “मानो”। आत्मा कुछ करती नहीं, वह शरीर-मन को धक्का या आदेश नहीं देती, वह बस “है”, और उसकी मौजूदगी भर से शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने-अपने काम में जुट जाते हैं, मानो किसी ने प्रेरित किया हो। सूरज निकलता है और पूरी दुनिया जाग जाती है, पक्षी उड़ते हैं, फूल खुलते हैं, लोग काम पर निकल पड़ते हैं; सूरज ने किसी को आदेश नहीं दिया, वह बस उग आया। और गुरु एक चौंकाने वाली बात जोड़ते हैं, अहंकार भी एक घड़े की तरह “जाना जाता है”। ख़ुशी, दुख, विचार, ये सब उतने ही बाहरी हैं जितना सामने रखा घड़ा, और जो इन सबको जानता है वह इनसे अलग खड़ा है। अपना अहंकार भी “आप” नहीं, वह भी एक देखी जाने वाली वस्तु है, और आप उसके देखने वाले।
129 · 130
यस्य सन्निधिमात्रेण देहेन्द्रियमनोधियः ।
विषयेषु स्वकीयेषु वर्तन्ते प्रेरिता इव ॥ 129 ॥
अहङ्कारादिदेहान्ता विषयाश्च सुखादयः ।
वेद्यन्ते घटवद्येन नित्यबोधस्वरूपिणा ॥ 130 ॥
बारह इशारों के बाद गुरु पहली बार एक नाम देते हैं, “अंतरात्मा”, भीतर का आत्मा, पुरातन पुरुष। और एक शब्द-समूह ठहरने योग्य है, लगातार, अखंड सुख का अनुभव। यह आत्मा कोई सूखी, ठंडी चेतना नहीं, वह सुख है, बिना टूटे, बिना दरार के, और हमेशा एक-सा रहता है। जिस सुख को जीवन भर बाहर ढूँढा जाता है, वह अपना ही स्वरूप है, सदा से, भीतर। और यह आत्मा कहीं दूर किसी और लोक में नहीं, “यहीं” है, बुद्धि की उस छिपी, शांत गुफ़ा में, जहाँ वह अपने ही तेज से सूरज की तरह चमकता है, किसी और की रोशनी से नहीं। कहीं जाना नहीं, कुछ लाना नहीं, बस उस गुफ़ा में झाँकना भर है।
131 · 132
एषोऽन्तरात्मा पुरुषः पुराणो निरन्तराखण्डसुखानुभूतिः ।
सदैकरूपः प्रतिबोधमात्रो येनेषिता वागसवश्चरन्ति ॥ 131 ॥
अत्रैव सत्त्वात्मनि धीगुहायां अव्याकृताकाश उशत्प्रकाशः ।
आकाश उच्चै रविवत्प्रकाशते स्वतेजसा विश्वमिदं प्रकाशयन् ॥ 132 ॥
अब एक बेहद सुंदर उपमा आती है, तपा हुआ लोहा। लोहे की एक छड़ आग में ख़ूब तपी, अब लाल-गरम है, वह जलाती है, मुड़ती है, उसमें आग के सारे गुण आ गए जान पड़ते हैं। पर आग ख़ुद मुड़ती है क्या, आग ख़ुद हथौड़े से पिटती है क्या? नहीं, लोहा मुड़ता है, लोहा पिटता है, आग बस मौजूद है, अपनी रोशनी और गर्मी देती हुई, अछूती। आत्मा वही आग है, शरीर-मन वह लोहा; शरीर थकता है, मन उलझता है, अहंकार “मैंने किया” कहता है, और आत्मा सबके बीच बस मौजूद है, ख़ुद कुछ न करती, ख़ुद न बदलती। और फिर गीता की वह गूँज आती है, घड़े का आकाश। घड़ा बनता है तो भीतर का आकाश “घड़े का आकाश” कहलाने लगता है, छोटा, सीमित जान पड़ता है; पर घड़ा फूट जाए तो भीतर का आकाश मरता नहीं, वह तो असीम आकाश में मिल जाता है, या यूँ कहें, पहचान लेता है कि वह कभी अलग था ही नहीं। यह शरीर वह घड़ा है, और आप वह आकाश।
133 · 134
ज्ञाता मनोऽहंकृतिविक्रियाणां देहेन्द्रियप्राणकृतक्रियाणाम् ।
अयोऽग्निवत्ताननुवर्तमानो न चेष्टते नो विकरोति किंचन ॥ 133 ॥
न जायते नो म्रियते न वर्धते न क्षीयते नो विकरोति नित्यः ।
विलीयमानेऽपि वपुष्यमुष्मिन् न लीयते कुम्भ इवाम्बरं स्वयम् ॥ 134 ॥
अब तक आत्मा कुछ ऊँची, दूर की वस्तु जान पड़ सकती थी, सूरज, आकाश, सबका साक्षी। यह श्लोक उसे एकदम पास ले आता है। प्रकृति और उसके बदले रूपों से अलग, शुद्ध चेतना-स्वभाव वाला परमात्मा जागृत आदि अवस्थाओं में “अहम् अहम्” के रूप में खिलता है, बुद्धि के साक्षी रूप में। अर्थात् जो सबसे सीधा, सबसे निकट का एहसास है, वह “मैं हूँ” वाला बोध, वही आत्मा है। फिर गुरु सीधा आदेश देते हैं, और यह आदेश प्रेम से भरा है, सधे हुए मन से और निर्मल बुद्धि की कृपा से, इस अपने आत्मा को अपने ही भीतर “यही मैं हूँ” ऐसा सीधे जान लीजिए, और जन्म-मृत्यु की लहरों वाले संसार-समुद्र को पार कर ब्रह्म-रूप में स्थिर हो कर कृतार्थ हो जाइए। पूरी रचना का “तत्त्वमसि” यहाँ एक व्यक्तिगत पुकार बन जाता है, और आत्मा का यह चित्र यहाँ अपनी मंज़िल पर पहुँचता है।
135 · 136
प्रकृतिविकृतिभिन्नः शुद्धबोधस्वभावः सदसदिदमशेषं भासयन्निर्विशेषः ।
विलसति परमात्मा जाग्रदादिष्ववस्था स्वहमहमिति साक्षात्साक्षिरूपेण बुद्धेः ॥ 135 ॥
नियमितमनसामुं त्वं स्वमात्मानमात्मन्य् अयमहमिति साक्षाद्विद्धि बुद्धिप्रसादात् ।
जनिमरणतरङ्गापारसंसारसिन्धुं प्रतर भव कृतार्थो ब्रह्मरूपेण संस्थः ॥ 136 ॥
अब गुरु एक अनिवार्य प्रश्न की ओर मुड़ते हैं। यदि मैं सचमुच यह निर्मल, मुक्त आत्मा हूँ, तो फँसा हुआ क्यों अनुभव करता हूँ, बंधन क्या है? और उत्तर अपनी सादगी में चकित कर देता है, बंधन कोई ज़ंजीर नहीं, कोई बाहरी जेल नहीं, बंधन केवल एक ग़लत समझ है, जो “मैं” नहीं उसे “मैं” मान लेना, और यही अज्ञान से जन्मे जन्म-मृत्यु-दुख की बौछार का कारण बनता है। गुरु एक बेमिसाल उपमा देते हैं, रेशम का कीड़ा। वह अपने ही मुँह से धागा निकालता है, उसी धागे से अपने चारों ओर एक कोश बुन लेता है, और फिर उसी में क़ैद हो जाता है; किसी ने उसे बंद नहीं किया, उसने ख़ुद अपनी जेल बुनी। मनुष्य ठीक यही करता है, शरीर को “मैं” मान कर विषयों रूपी धागों से अपने चारों ओर संसार बुनता जाता है। और इसी में कुंजी भी है, जो ख़ुद बुना गया, वह खोला भी जा सकता है।
137
अत्रानात्मन्यहमिति मतिर्बन्ध एषोऽस्य पुंसः प्राप्तोऽज्ञानाज्जननमरणक्लेशसंपातहेतुः ।
येनैवायं वपुरिदमसत्सत्यमित्यात्मबुद्ध्या पुष्यत्युक्षत्यवति विषयैस्तन्तुभिः कोशकृद्वत् ॥ 137 ॥
गुरु बंधन की पूरी प्रक्रिया को फिर रस्सी-साँप की भाषा में रखते हैं, और बीच में एक गर्मजोश संबोधन रख देते हैं, “सुनिए, मित्र”। यह कोई भारी-भरकम घोषणा नहीं, यह दो मित्रों के बीच की भरोसे भरी बात है। तमस से मूढ़ हुए मनुष्य को, विवेक के अभाव में, जो वह नहीं उसी में “वह” की बुद्धि हो जाती है, जैसे रस्सी में साँप का भ्रम चमक उठता है। फिर भय के मारे कोई भागता है, कोई लाठी उठाता है, मुसीबतों का ढेर लग जाता है, पर साँप था ही नहीं; पूरी हलचल एक न होने वाली वस्तु को पकड़ने से उठी। बंधन यही है, असत् को कस कर पकड़ लेना। और इसी में राहत भी है, यदि बंधन केवल एक ग़लत पकड़ है, तो छूटना केवल पकड़ का ढीला होना है, कुछ तोड़ना नहीं, बस देख लेना।
138
अतस्मिंस्तद्बुद्धिः प्रभवति विमूढस्य तमसा विवेकाभावाद्वै स्फुरति भुजगे रज्जुधिषणा ।
ततोऽनर्थव्रातो निपतति समादातुरधिकः ततो योऽसद्ग्राहः स हि भवति बन्धः शृणु सखे ॥ 138 ॥
अब गुरु बंधन के दो हिस्से बारी-बारी खोलते हैं, और पहला है आवरण, ढकना, जिसकी उपमा है सूर्य-ग्रहण। ग्रहण में सूरज बुझता नहीं, वह वहीं है, उतना ही तेजस्वी, बस कुछ बीच में आ गया है; और ग्रहण अस्थायी है, बीच का हट जाता है, सूरज फिर पूरा दिख जाता है। आत्मा वही सूरज है, अखंड, नित्य, अद्वय बोध-शक्ति से चमकता, अनंत वैभव वाला, जिसे तमस से बनी आवरण-शक्ति राहु की तरह थोड़ी देर के लिए ढक देती है। फिर दूसरा हिस्सा आता है, विक्षेप, और दोनों एक क्रम में काम करते हैं। पहले सूरज ढका, अब अँधेरा है, और अँधेरे में मनुष्य मोह से शरीर को “मैं” मान बैठता है, यह पहली, बुनियादी ग़लती। उसी ग़लती के बाद रजस की विक्षेप-शक्ति आती है और काम, क्रोध, लोभ, भय से सताती है। आवरण जड़ है, विक्षेप उसी जड़ से उगा काँटेदार पेड़।
139 · 140
अखण्डनित्याद्वयबोधशक्त्या स्फुरन्तमात्मानमनन्तवैभवम् ।
समावृणोत्यावृतिशक्तिरेषा तमोमयी राहुरिवार्कबिम्बम् ॥ 139 ॥
तिरोभूते स्वात्मन्यमलतरतेजोवति पुमान् अनात्मानं मोहादहमिति शरीरं कलयति ।
ततः कामक्रोधप्रभृतिभिरमुं बन्धनगुणैः परं विक्षेपाख्या रजस उरुशक्तिर्व्यथयति ॥ 140 ॥
अब गुरु बंधन में फँसे मनुष्य की एक जीती-जागती तस्वीर देते हैं, और एक शब्द उसे बेधक बना देता है, “अभिनय करता हुआ”। बुद्धि की अवस्थाएँ बदलती रहती हैं, कभी ख़ुश, कभी उदास, कभी डरी, कभी उत्साहित, और मनुष्य हर अवस्था को “मैं” मान कर उसका पूरा अभिनय कर देता है, “मैं ख़ुश हूँ”, “मैं टूट गया”, “मैं डरा हुआ हूँ”। वह एक नट है जो हर पल का किरदार इतनी गहराई से निभाता है कि भूल जाता है, मैं नट हूँ, ये किरदार नहीं। महामोह रूपी मगरमच्छ उसका आत्म-ज्ञान निगल जाता है, और वह विषय रूपी ज़हर से भरे अथाह संसार-समुद्र में डूबता-उतराता भटकता रहता है, एक लहर ऊपर उठाती है, अगली नीचे पटकती है, बिना रुके। यही डूबना-उतराना ही “संसार” है, और इसकी जड़ बस एक भूल, हर अवस्था को “मैं” मान लेना।
141
महामोहग्राहग्रसनगलितात्मावगमनो धियो नानावस्थां स्वयमभिनयंस्तद्गुणतया ।
अपारे संसरे विषयविषपूरे जलनिधौ निमज्योन्मज्यायं भ्रमति कुमतिः कुत्सितगतिः ॥ 141 ॥
अब गुरु अहंकार के विषय में सबसे गहरी बात कह देते हैं, और उपमा है बादल। बादल कहाँ से बनते हैं? सूरज की गर्मी पानी को भाप बनाती है, भाप ऊपर उठ कर बादल बनती है, अर्थात् बादल का जन्म ख़ुद सूरज से होता है; और फिर वही बादल ऊपर जा कर उसी सूरज को ढक देता है। संतान माता को ढक देती है। अहंकार ठीक यही है, “मैं” का यह एहसास आत्मा की ही चेतना उधार ले कर खड़ा होता है, और फिर फैल कर अपने ही उद्गम को ढक देता है। फिर एक आख़िरी, सटीक तस्वीर आती है, सर्दी का एक बुरा दिन। पहले घने बादल आ कर सूरज को ढक देते हैं, यह आवरण; और इसी ढके, अँधेरे माहौल में एक बर्फ़ीली तूफ़ानी हवा चलती है और लोगों को कँपा देती है, यह विक्षेप। तूफ़ानी हवा तभी इतना सताती है जब सूरज पहले से ढका हो; आत्म-ज्ञान का सूरज खुला हो तो जीवन के तूफ़ान आते तो हैं, पर कँपा नहीं पाते, एक भीतरी गर्मी बनी रहती है।
142 · 143
भानुप्रभासंजनिताभ्रपङ्क्तिः भानुं तिरोधाय विजृम्भते यथा ।
आत्मोदिताहंकृतिरात्मतत्त्वं तथा तिरोधाय विजृम्भते स्वयम् ॥ 142 ॥
कवलितदिननार्थे दुर्दिने सान्द्रमेघैः व्यथयति हिमझंझावायुरुग्रो यथैतान् ।
अविरततमसात्मन्यावृते मूढबुद्धिं क्षपयति बहुदुःखैस्तीव्रविक्षेपशक्तिः ॥ 143 ॥
अब गुरु बंधन की पूरी व्याख्या को एक गाँठ में बाँध देते हैं। इन्हीं दो शक्तियों, आवरण और विक्षेप, से मनुष्य का बंधन आया है; इन्हीं से मोहित हो कर वह शरीर को आत्मा मान बैठता है और भटकता रहता है। आवरण ढकती है, सच को नज़र से ओझल कर देती है; विक्षेप फेंकती है, ओझल जगह पर एक नक़ली वस्तु खड़ी कर देती है; और दोनों मिल कर वह एक बुनियादी ग़लती करवाती हैं, शरीर को आत्मा मान लेना। इस उत्तर की सादगी ही उसकी राहत है, बंधन की कोई रहस्यमयी, अनगिनत वजहें नहीं, बस दो काम करने वाली शक्तियाँ, और एक नतीजा, एक ग़लत पहचान।
144
एताभ्यामेव शक्तिभ्यां बन्धः पुंसः समागतः ।
याभ्यां विमोहितो देहं मत्वात्मानं भ्रमत्ययम् ॥ 144 ॥
और भाग 5 के समापन में गुरु एक पूरा, जीता-जागता पेड़ खड़ा कर देते हैं, संसार का पेड़, जिसमें हर अंग बंधन की कथा का एक पात्र है। सबसे नीचे, ज़मीन में छिपा बीज, तमस, वह ढकने वाला अँधेरा; उससे फूटा अंकुर, “मैं शरीर हूँ” वाली पहली ग़लती; फिर राग की कोंपलें, कर्म का पानी जो पेड़ को बढ़ाता रहता है, शरीर तना, प्राण डालियाँ, इन्द्रियाँ टहनियाँ, और सबसे ऊपर खिले विषयों के सुंदर फूल। उन फूलों से लगने वाला फल, “दुख”। यही पूरे पेड़ का बेरहम सच है, जड़ में एक भूल, और फल में दुख। और सबसे मार्मिक तस्वीर अंत में, जीव एक पक्षी है, जो इसी पेड़ पर बैठ कर वह दुख-फल खा रहा है। पर एक बात आगे काम आती है, पक्षी पेड़ नहीं, वह बस उस पर बैठा है; और जिस क्षण वह यह पहचान ले, वह पंख खोल कर उड़ सकता है। पेड़ बड़ा है, पर पक्षी बँधा नहीं, बस बैठा है।
145
बीजं संसृतिभूमिजस्य तु तमो देहात्मधीरङ्कुरो रागः पल्लवमम्बु कर्म तु वपुः स्कन्धोऽसवः शाखिकाः ।
अग्राणीन्द्रियसंहतिश्च विषयाः पुष्पाणि दुःखं फलं नानाकर्मसमुद्भवं बहुविधं भोक्तात्र जीवः खगः ॥ 145 ॥
आगे का पन्ना
सीधा अगला पन्ना भाग 6, पाँच कोश है, जहाँ गुरु अब आत्मा तक पहुँचने का असली तरीक़ा देते हैं। आप और आपके असली स्वरूप के बीच पाँच परतें हैं, अन्न, प्राण, मन, बुद्धि, और आनंद की। एक-एक कर के, गुरु उन्हें छीलते हैं, जैसे प्याज़ की परतें, जैसे तालाब पर जमी काई।
श्लोक 137 की बात यहाँ भी साथ चलती है, मनुष्य रेशम के कीड़े की तरह अपनी ही जेल ख़ुद बुनता है, अपने ही धागे से। एक “धागा” पहचान लेना, एक चाह, एक पकड़, एक “मेरा”, जो रोज़, थोड़ा-थोड़ा, बुना जा रहा है, यही पहचान ही पहली ढील है।