भाग 5 · आत्मा का स्वरूप

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 5 · आत्मा का स्वरूप, और बंधन की गाँठ · श्लोक 124-145

चार भागों तक गुरु ने सिर्फ़ कहा, “आप यह नहीं हैं।” अब, पहली बार, वे सीधा कहते हैं, “आप यह हैं।” और फिर दिखाते हैं कि वह गाँठ बँधी कैसे, जिसने इस साफ़ बात को इतनी देर ढके रखा।

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पहले एक बात

भाग 4 एक लंबी “नेति-नेति” थी, शरीर, मन, प्राण, माया, हर चीज़ एक तरफ़ रखी गई। अब, उस पूरे ढेर के बीच से, गुरु उस एक चीज़ की ओर इशारा करते हैं जो बच जाती है। और वह कोई और चीज़ नहीं। वह “आप” हो।

यह भाग दो हिस्सों में बहता है। पहला (124-136) आत्मा का सीधा चित्र है, और देखिए गुरु उसे कैसे खींचते हैं: एक भी सीधी परिभाषा नहीं। बस इशारों की एक लड़ी, “जो यह देखता है”, “जिसके होने भर से यह चलता है”, “जिसे कोई नहीं देख सकता।” क्योंकि आत्मा को पकड़ा नहीं जा सकता; उसकी ओर बस उँगली उठाई जा सकती है।

दूसरा हिस्सा (137-145) एक ज़रूरी सवाल का जवाब है: अगर मैं सच में यह निर्मल, मुक्त आत्मा हूँ, तो फँसा हुआ क्यों महसूस करता हूँ? गुरु बंधन की गाँठ खोल कर दिखाते हैं, और राहत यह है कि वह गाँठ असली नहीं। बस एक ग़लतफ़हमी की है।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। पहले हिस्से (124-136) के इशारों को दौड़ कर मत पढ़िए, हर एक पर ज़रा ठहरिए, वह किसी ओर इशारा कर रहा है। असली खंभे: 125 (एक चीज़ है), 134 (आत्मा जन्मती-मरती नहीं), 138 (फिर रस्सी-साँप), 145 (संसार का पेड़)। हर श्लोक पर anchor है।

124 · “अब आत्मा का स्वरूप सुनो”

अथ ते संप्रवक्ष्यामि स्वरूपं परमात्मनः ।
यद्विज्ञाय नरो बन्धान्मुक्तः कैवल्यमश्नुते ॥ 124 ॥

atha te saṁpravakṣyāmi svarūpaṁ paramātmanaḥ · yad vijñāya naro bandhān muktaḥ kaivalyam aśnute

शब्दार्थ: अथ · अब · ते संप्रवक्ष्यामि · आपको भली-भाँति बताऊँगा · स्वरूपं परमात्मनः · परमात्मा का स्वरूप · यत् विज्ञाय · जिसे जान कर · नरः बन्धात् मुक्तः · मनुष्य बंधन से मुक्त · कैवल्यम् अश्नुते · कैवल्य पा लेता है।

अर्थ: अब मैं आपको परमात्मा का स्वरूप भली-भाँति बताऊँगा, जिसे जान कर मनुष्य बंधन से मुक्त हो कर कैवल्य पा लेता है।

भावार्थ: एक शब्द पूरे मिज़ाज को बदल देता है, “अथ”, अब। यह एक दरवाज़ा है। चार भागों तक गुरु ने तैयारी कराई और अनात्मा का सर्वेक्षण किया। यह “अब” उस सबको पीछे छोड़ कर असली बात पर ले आता है।

और गुरु पहले ही वादा कर देते हैं, यह कोई दार्शनिक जानकारी नहीं; यह वह चीज़ है “जिसे जान कर” बंधन टूट जाता है। ध्यान दीजिए, “जान कर”, किसी और काम से नहीं। भाग 1 की बात (विचार से मुक्ति) यहाँ अपने चरम पर पहुँचने वाली है। आगे के बारह श्लोक एक ही चीज़ की ओर इशारा करते हैं।

125 · एक चीज़ है

अस्ति कश्चित्स्वयं नित्यमहंप्रत्ययलम्बनः ।
अवस्थात्रयसाक्षी संपञ्चकोशविलक्षणः ॥ 125 ॥

asti kaścit svayaṁ nityam aham-pratyaya-lambanaḥ · avasthā-traya-sākṣī saṁ-pañca-kośa-vilakṣaṇaḥ

शब्दार्थ: अस्ति कश्चित् · एक “कुछ” है · स्वयं नित्यम् · अपने आप, नित्य · अहम्-प्रत्यय-लम्बनः · “मैं” इस अनुभव का आधार · अवस्था-त्रय-साक्षी · तीनों अवस्थाओं का साक्षी · पञ्च-कोश-विलक्षणः · पाँच कोशों से अलग।

अर्थ: एक “कुछ” है, अपने आप, नित्य, “मैं” इस अनुभव का आधार, तीनों अवस्थाओं का साक्षी, और पाँच कोशों से बिल्कुल अलग।

भावार्थ: देखिए गुरु कितनी सावधानी से शुरू करते हैं, “अस्ति कश्चित्”, एक “कुछ” है। नाम नहीं देते, परिभाषा नहीं देते। बस इतना, कुछ है।

क्यों इतनी सावधानी? क्योंकि जिस पल आप आत्मा को नाम और परिभाषा देते हैं, वह एक “चीज़” बन जाती है, और चीज़ें जानी जाती हैं, “आप” नहीं। तो गुरु बस इशारा करते हैं: एक ऐसा कुछ है जो हर “मैं” के पीछे खड़ा है; जो जागते, सपने में, गहरी नींद में, तीनों में हाज़िर रहता है। और एक प्यारी बात, “पाँच कोशों से अलग।” यानी जिन पाँच परतों को अगला भाग खोलेगा, यह उन सबसे परे है। यह श्लोक पूरी आत्म-खोज का बीज है: कुछ है, और हम उसे ढूँढने निकलते हैं।

126 · जो तीनों अवस्थाओं को जानता है

यो विजानाति सकलं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ।
बुद्धितद्वृत्तिसद्भावमभावमहमित्ययम् ॥ 126 ॥

yo vijānāti sakalaṁ jāgrat-svapna-suṣuptiṣu · buddhi-tad-vṛtti-sad-bhāvam abhāvam aham ity ayam

शब्दार्थ: यः विजानाति सकलं · जो सब कुछ जानता है · जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिषु · जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति में · बुद्धि-तद्-वृत्ति-सद्भावम् अभावम् · बुद्धि और उसकी हलचल का होना और न होना · अहम् इति अयम् · यही “मैं” है।

अर्थ: जो जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों में सब कुछ जानता है; जो बुद्धि और उसकी हलचल के होने को भी जानता है और न होने को भी, यही “मैं” है।

भावार्थ: गुरु एक बहुत बारीक, पर अचूक तर्क देते हैं। हम सोचते हैं “मैं” यानी बुद्धि, मन। पर गुरु पूछते हैं, गहरी नींद में बुद्धि की हलचल थमी होती है, “नहीं” होती है। फिर भी सुबह आप कहते हैं “मुझे कुछ पता नहीं था।”

तो किसी को बुद्धि के “होने” का भी पता था, और “न होने” का भी। जो बुद्धि के होने और न होने, दोनों को जानता है, वह बुद्धि ख़ुद नहीं हो सकता। एक दीये की बात सोचिए, दीया कमरे की चीज़ें दिखाता है, पर दीया ख़ुद बुझे, तो “अँधेरा है” यह किसने जाना? एक और रोशनी, जो दीये के जलने और बुझने, दोनों को देखती है। वह दूसरी रोशनी ही असली “मैं” है।

127 · जो देखता है, जिसे कोई नहीं देखता

यः पश्यति स्वयं सर्वं यं न पश्यति कश्चन ।
यश्चेतयति बुद्ध्यादि न तद्यं चेतयत्ययम् ॥ 127 ॥

yaḥ paśyati svayaṁ sarvaṁ yaṁ na paśyati kaścana · yaś cetayati buddhy-ādi na tad yaṁ cetayaty ayam

शब्दार्थ: यः पश्यति स्वयं सर्वं · जो ख़ुद सब कुछ देखता है · यं न पश्यति कश्चन · जिसे कोई नहीं देखता · यः चेतयति बुद्धि-आदि · जो बुद्धि आदि को चेतन करता है · न तत् यं चेतयति · पर वे इसे चेतन नहीं करते।

अर्थ: जो ख़ुद सब कुछ देखता है, पर जिसे कोई नहीं देख सकता; जो बुद्धि आदि को चेतना देता है, पर बुद्धि आदि जिसे चेतना नहीं देते, यही वह है।

भावार्थ: गुरु आत्मा को एक ऐसी चीज़ बता रहे हैं जिसे कभी “देखा” नहीं जा सकता, और यह कोई कमी नहीं। यही उसकी पहचान है।

अपनी आँख की बात सोचिए। आँख सब कुछ देखती है, पर ख़ुद को कभी नहीं देख पाती। आईने में जो दिखता है वह आँख का प्रतिबिंब है, आँख नहीं। आँख हमेशा देखने वाली रहती है, देखी जाने वाली कभी नहीं बनती। आत्मा ऐसी ही है, वह हमेशा “देखने वाला” है। जिस पल आप किसी चीज़ को “देख” लेते हैं, चाहे वह विचार हो, भावना हो, अनुभव हो, वह चीज़ “आप” नहीं। आप तो उसे देखने वाले हैं। यह आत्म-खोज का सबसे बारीक और सबसे ताक़तवर इशारा है: आप जिसे भी पकड़ सको, वह आप नहीं; आप वह हैं जो पकड़ रहा है।

128 · जिससे सब रोशन

येन विश्वमिदं व्याप्तं यं न व्याप्नोति किंचन ।
अभारूपमिदं सर्वं यं भान्त्यमनुभात्ययम् ॥ 128 ॥

yena viśvam idaṁ vyāptaṁ yaṁ na vyāpnoti kiṁcana · ābhā-rūpam idaṁ sarvaṁ yaṁ bhānty am anubhāty ayam

शब्दार्थ: येन विश्वम् इदं व्याप्तं · जिससे यह विश्व व्याप्त है · यं न व्याप्नोति किंचन · जिसे कोई व्याप्त नहीं करता · आभा-रूपम् इदं सर्वं · यह सब बस आभा-रूप (परावर्तित प्रकाश) है · यं भान्ति अनुभाति · जिसके बाद ही सब चमकते हैं।

अर्थ: जिससे यह पूरा विश्व व्याप्त है, पर जिसे कोई चीज़ व्याप्त नहीं कर सकती; यह सब कुछ बस उसकी आभा है, और जिसके चमकने के बाद ही सब कुछ चमकता है, यही वह है।

भावार्थ: गुरु आत्मा को एक प्रकाश-स्रोत की तरह दिखाते हैं, और यह उपमा गहरी है।

एक अँधेरे कमरे में सूरज की रोशनी आती है। मेज़, किताब, दीवार, सब “दिखने” लगते हैं। अब, क्या मेज़ अपने आप चमक रही है? नहीं। वह सूरज की रोशनी “उधार” ले कर दिख रही है। गुरु कहते हैं, यह पूरा संसार ऐसा ही है, “आभा-रूप”, उधार की रोशनी से चमकता हुआ। और असली स्रोत? वह चेतना, वह आत्मा। हर चीज़ इसलिए “जानी” जाती है क्योंकि उस पर आत्मा की रोशनी पड़ती है। और आत्मा को कोई और रोशन नहीं करता, वह ख़ुद-प्रकाश है। यही उसे बाक़ी सब से अलग करता है: सब कुछ “जाना जाता है”, आत्मा “जानती है।”

129 · जिसके होने भर से सब चलता है

यस्य सन्निधिमात्रेण देहेन्द्रियमनोधियः ।
विषयेषु स्वकीयेषु वर्तन्ते प्रेरिता इव ॥ 129 ॥

yasya sannidhi-mātreṇa dehendriya-mano-dhiyaḥ · viṣayeṣu svakīyeṣu vartante preritā iva

शब्दार्थ: यस्य सन्निधि-मात्रेण · जिसके बस पास होने भर से · देह-इन्द्रिय-मनः-धियः · शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि · स्वकीयेषु विषयेषु · अपने-अपने विषयों में · वर्तन्ते प्रेरिताः इव · चलते हैं, मानो प्रेरित हों।

अर्थ: जिसके बस पास होने भर से शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने-अपने विषयों में चलने लगते हैं, मानो किसी ने उन्हें प्रेरित किया हैं।

भावार्थ: इस श्लोक में दो शब्द बेहद ज़रूरी हैं, “सन्निधि-मात्रेण” (बस पास होने भर से) और “इव” (मानो)।

आत्मा कुछ “करती” नहीं। वह शरीर-मन को धक्का नहीं देती, आदेश नहीं देती। वह बस “है”, और उसकी मौजूदगी भर से बाक़ी सब जीवंत हो उठता है। एक तस्वीर: सूरज निकलता है, और पूरी दुनिया जाग जाती है, पक्षी उड़ते हैं, फूल खुलते हैं, लोग काम पर निकलते हैं। सूरज ने किसी को आदेश नहीं दिया; वह बस उग आया, और उसकी मौजूदगी ने सब चला दिया। और “इव”, मानो, यह बताता है कि शरीर-मन को लगता है कोई उन्हें चला रहा है, पर असल में आत्मा सिर्फ़ मौजूद है। यह बात आगे, बंधन समझाते वक़्त, बहुत काम आएगी।

130 · जिससे सब कुछ “घड़े की तरह” जाना जाता है

अहङ्कारादिदेहान्ता विषयाश्च सुखादयः ।
वेद्यन्ते घटवद्येन नित्यबोधस्वरूपिणा ॥ 130 ॥

ahaṅkārādi-dehāntā viṣayāś ca sukhādayaḥ · vedyante ghaṭavad yena nitya-bodha-svarūpiṇā

शब्दार्थ: अहंकार-आदि-देह-अन्ताः · अहंकार से ले कर शरीर तक · विषयाः सुख-आदयः · विषय, सुख आदि · वेद्यन्ते घट-वत् · घड़े की तरह जाने जाते हैं · येन नित्य-बोध-स्वरूपिणा · जिस नित्य-बोध-स्वरूप से।

अर्थ: अहंकार से ले कर शरीर तक, और सारे विषय, सुख आदि, ये सब जिस नित्य-बोध-स्वरूप के द्वारा घड़े की तरह जाने जाते हैं, यही वह है।

भावार्थ: “घड़े की तरह”, यह छोटी सी उपमा बहुत कुछ कह जाती है, इसे पकड़िए।

एक घड़े को आप देखते हैं, वह “वहाँ” है, आपसे अलग, एक जानी जाने वाली चीज़। अब गुरु एक चौंकाने वाली बात कहते हैं: आपका अहंकार भी ऐसे ही “जाना जाता है”, एक घड़े की तरह। आपकी ख़ुशी, आपका दुख, आपके विचार, ये सब भी, असल में, उतने ही “बाहरी” हैं जितना एक घड़ा। जो इन सबको जानता है, वह इनसे अलग खड़ा है। यह विवेकचूडामणि का सबसे मुक्त कर देने वाला इशारा है: आपका अपना अहंकार भी “आप” नहीं। वह भी एक देखी जाने वाली चीज़ है, और आप उसे देखने वाले।

131 · यही अंतरात्मा है

एषोऽन्तरात्मा पुरुषः पुराणो निरन्तराखण्डसुखानुभूतिः ।
सदैकरूपः प्रतिबोधमात्रो येनेषिता वागसवश्चरन्ति ॥ 131 ॥

eṣo’ntarātmā puruṣaḥ purāṇo nirantarākhaṇḍa-sukhānubhūtiḥ · sadaika-rūpaḥ pratibodha-mātro yeneṣitā vāg-asavaś caranti

शब्दार्थ: एषः अन्तरात्मा पुरुषः पुराणः · यही अंतरात्मा, पुरातन पुरुष · निरन्तर-अखण्ड-सुख-अनुभूतिः · लगातार, अखंड सुख का अनुभव · सदा-एक-रूपः · हमेशा एक-सा · प्रतिबोध-मात्रः · शुद्ध चेतना भर · येन ईषिताः वाक्-असवः चरन्ति · जिससे प्रेरित हो कर वाणी और प्राण चलते हैं।

अर्थ: यही अंतरात्मा है, पुरातन पुरुष, लगातार, अखंड सुख का अनुभव, हमेशा एक-सा, शुद्ध चेतना भर, जिससे प्रेरित हो कर ही वाणी और प्राण चलते हैं।

भावार्थ: बारह श्लोकों के इशारों के बाद, गुरु पहली बार एक नाम देते हैं, “अंतरात्मा”, भीतर का आत्मा।

और एक शब्द-समूह पर रुकिए, “निरंतर-अखंड-सुख-अनुभूति।” यह आत्मा कोई सूखी, ठंडी “चेतना” नहीं। वह सुख है, लगातार, बिना टूटे, बिना दरार के। याद कीजिए भाग 4 का श्लोक 107, गहरी नींद में जो आनंद महसूस होता है, वह आत्मा का अपना आनंद। यह वही बात है। आप जिस सुख को ज़िंदगी भर बाहर ढूँढते रहे, एक चीज़ में, फिर दूसरी में, वह आपका अपना स्वरूप है, हमेशा से, भीतर। और “हमेशा एक-सा”, यह आत्मा बदलती नहीं। घटती-बढ़ती नहीं। बाक़ी सब डोलता है; यह अडिग है।

132 · बुद्धि की गुफ़ा में, सूरज की तरह

अत्रैव सत्त्वात्मनि धीगुहायां अव्याकृताकाश उशत्प्रकाशः ।
आकाश उच्चै रविवत्प्रकाशते स्वतेजसा विश्वमिदं प्रकाशयन् ॥ 132 ॥

atraiva sattvātmani dhī-guhāyāṁ avyākṛtākāśa uśat-prakāśaḥ · ākāśa uccai ravivat prakāśate sva-tejasā viśvam idaṁ prakāśayan

शब्दार्थ: अत्र एव सत्त्व-आत्मनि · यहीं, सत्व-रूप में · धी-गुहायां · बुद्धि की गुफ़ा में · उशत्-प्रकाशः · सुंदर प्रकाश वाला · रवि-वत् प्रकाशते · सूरज की तरह चमकता है · स्व-तेजसा विश्वम् प्रकाशयन् · अपने ही तेज से विश्व को रोशन करता हुआ।

अर्थ: यहीं, बुद्धि की गुफ़ा के भीतर के आकाश में, सुंदर प्रकाश वाला आत्मा, सूरज की तरह ऊँचा चमकता है, अपने ही तेज से इस पूरे विश्व को रोशन करता हुआ।

भावार्थ: एक शब्द इस श्लोक को राहत भरा बना देता है, “अत्र एव”, यहीं। आत्मा कहीं दूर, किसी आसमान में, किसी और लोक में नहीं। वह “यहीं” है, “धी-गुहा”, बुद्धि की गुफ़ा में।

“गुफ़ा” का इशारा प्यारा है। गुफ़ा यानी एक छिपी हुई, भीतरी, शांत जगह। आत्मा का यह “सूरज” किसी पहाड़ की चोटी पर नहीं। वह आपकी अपनी बुद्धि के पीछे, उसकी गहराई में, पहले से चमक रहा है। आपको कहीं जाना नहीं। कुछ लाना नहीं। बस उस गुफ़ा में, उस शांत भीतरी जगह में, झाँकना है। और याद रखिए, यह सूरज ख़ुद चमकता है (“स्व-तेजसा”), किसी और की रोशनी से नहीं।

133 · तपे हुए लोहे में आग की तरह

ज्ञाता मनोऽहंकृतिविक्रियाणां देहेन्द्रियप्राणकृतक्रियाणाम् ।
अयोऽग्निवत्ताननुवर्तमानो न चेष्टते नो विकरोति किंचन ॥ 133 ॥

jñātā mano’haṅkṛti-vikriyāṇāṁ dehendriya-prāṇa-kṛta-kriyāṇām · ayo’gnivat tān anuvartamāno na ceṣṭate no vikaroti kiṁcana

शब्दार्थ: ज्ञाता मनः-अहंकृति-विक्रियाणां · मन-अहंकार की हलचलों का जानने वाला · देह-इन्द्रिय-प्राण-कृत-क्रियाणाम् · शरीर-इन्द्रिय-प्राण के कामों का · अयः-अग्नि-वत् · तपे हुए लोहे में आग की तरह · तान् अनुवर्तमानः · उनके साथ चलता हुआ-सा · न चेष्टते न विकरोति किंचन · ख़ुद कुछ नहीं करता, कुछ नहीं बदलता।

अर्थ: मन-अहंकार की हलचलों का, और शरीर-इन्द्रिय-प्राण के कामों का जानने वाला, तपे हुए लोहे में आग की तरह उनके साथ चलता-सा दिखता है, पर ख़ुद कुछ नहीं करता, कुछ नहीं बदलता।

भावार्थ: यह एक बेहद सुंदर उपमा है, तपा हुआ लोहा। लोहे की एक छड़ को आग में ख़ूब तपाओ। अब वह लाल-गरम है। उसे देखो, वह जलाती है, वह मोड़ी जा सकती है, उसमें आग के सारे “गुण” आ गए लगते हैं।

पर रुकिए, आग ख़ुद मुड़ती है क्या? आग ख़ुद हथौड़े से पिटती है क्या? नहीं। लोहा मुड़ता है, लोहा पिटता है। आग बस मौजूद है, अपनी रोशनी और गर्मी देती हुई, अछूती। आत्मा वह आग है। शरीर-मन वह लोहा। शरीर थकता है, मन उलझता है, अहंकार “मैंने किया” चिल्लाता है, और आत्मा, सब के बीच, बस मौजूद है, अपनी चेतना देती हुई, ख़ुद कुछ न करती, ख़ुद न बदलती। यह श्लोक 99-100 (साक्षी, बढ़ई) की बात को एक और, और गहरी तस्वीर देता है।

134 · न जन्म, न मृत्यु, घड़े का आकाश

न जायते नो म्रियते न वर्धते न क्षीयते नो विकरोति नित्यः ।
विलीयमानेऽपि वपुष्यमुष्मिन् न लीयते कुम्भ इवाम्बरं स्वयम् ॥ 134 ॥

na jāyate no mriyate na vardhate na kṣīyate no vikaroti nityaḥ · vilīyamāne’pi vapuṣy amuṣmin na līyate kumbha ivāmbaraṁ svayam

शब्दार्थ: न जायते न म्रियते · न जन्मता है, न मरता है · न वर्धते न क्षीयते · न बढ़ता है, न घटता है · नो विकरोति नित्यः · न बदलता है, नित्य है · विलीयमाने अपि वपुषि · शरीर के मिट जाने पर भी · न लीयते · नहीं मिटता · कुम्भे अम्बरं इव · घड़े में आकाश की तरह।

अर्थ: यह न जन्मता है, न मरता है, न बढ़ता है, न घटता है, न बदलता है, नित्य है। इस शरीर के मिट जाने पर भी यह नहीं मिटता, जैसे घड़ा फूट जाने पर भी उसका भीतरी आकाश नहीं मिटता।

भावार्थ: गीता (2.20) की गूँज लिए यह श्लोक, और इसका दिल वह आख़िरी उपमा है, घड़े का आकाश।

एक घड़ा बनाओ। अब उसके भीतर का आकाश “घड़े का आकाश” कहलाने लगता है, वह छोटा, सीमित, घड़े के आकार का लगता है। अब घड़ा फोड़ दो। क्या भीतर का आकाश “मरा”? नहीं। वह तो बस बाहर के असीम आकाश में मिल गया, या यूँ कहिए, उसने पहचान लिया कि वह कभी अलग था ही नहीं। घड़ा फूटा, आकाश को कुछ नहीं हुआ। गुरु कह रहे हैं, आप वह आकाश हैं। यह शरीर घड़ा है। शरीर का जन्म-मृत्यु घड़े का बनना-फूटना है। और जिसे हम मौत का डर कहते हैं, वह असल में घड़े के आकाश का यह भूल जाना है कि वह तो हमेशा से असीम था। यह श्लोक मृत्यु के डर की जड़ पर सीधा वार करता है।

135 · “मैं, मैं”, साक्षी के रूप में

प्रकृतिविकृतिभिन्नः शुद्धबोधस्वभावः सदसदिदमशेषं भासयन्निर्विशेषः ।
विलसति परमात्मा जाग्रदादिष्ववस्था स्वहमहमिति साक्षात्साक्षिरूपेण बुद्धेः ॥ 135 ॥

prakṛti-vikṛti-bhinnaḥ śuddha-bodha-svabhāvaḥ sad-asad idam aśeṣaṁ bhāsayan nirviśeṣaḥ · vilasati paramātmā jāgrad-ādiṣv avasthāsv aham aham iti sākṣāt sākṣi-rūpeṇa buddheḥ

शब्दार्थ: प्रकृति-विकृति-भिन्नः · प्रकृति और उसके बदले रूपों से अलग · शुद्ध-बोध-स्वभावः · शुद्ध चेतना स्वभाव वाला · सत्-असत् इदं अशेषं भासयन् · इस पूरे सत्-असत् को रोशन करता हुआ · निर्विशेषः · बिना किसी भेद-गुण के · विलसति परमात्मा · परमात्मा खिलता है · “अहम् अहम्” इति साक्षि-रूपेण बुद्धेः · बुद्धि के साक्षी रूप में, “मैं, मैं” करता हुआ।

अर्थ: प्रकृति और उसके बदले रूपों से अलग, शुद्ध चेतना स्वभाव वाला, इस पूरे सत्-असत् को रोशन करता हुआ, बिना किसी भेद-गुण के, परमात्मा जागृत आदि अवस्थाओं में खिलता है, बुद्धि के साक्षी रूप में, “मैं, मैं” करता हुआ।

भावार्थ: यह आत्मा-वर्णन का समापन है, और यह एक बेहद नज़दीकी, अंतरंग बात पर ख़त्म होता है।

अब तक आत्मा कुछ ऊँची, दूर की चीज़ लग सकती थी, सूरज, आकाश, सबका साक्षी। यह श्लोक उसे एकदम पास ले आता है। वह “अहम् अहम्” के रूप में खिलता है, यानी जो सबसे सीधा, सबसे निकट का एहसास है, वह “मैं हूँ” वाला बोध, वही आत्मा है। आपको आत्मा को कहीं ढूँढने नहीं जाना; वह आपका सबसे क़रीबी, सबसे पहला अनुभव है, बस “मैं हूँ।” समस्या यह नहीं कि आत्मा दूर है; समस्या यह है कि वह इतने पास है कि हम उससे आगे की चीज़ों को देखते रह जाते हैं, और उस “देखने वाले” को कभी मुड़ कर नहीं देखते।

136 · “इसे जान, और पार हो जा”

नियमितमनसामुं त्वं स्वमात्मानमात्मन्य् अयमहमिति साक्षाद्विद्धि बुद्धिप्रसादात् ।
जनिमरणतरङ्गापारसंसारसिन्धुं प्रतर भव कृतार्थो ब्रह्मरूपेण संस्थः ॥ 136 ॥

niyamita-manasāmuṁ tvaṁ svam ātmānam ātmany ayam aham iti sākṣād viddhi buddhi-prasādāt · jani-maraṇa-taraṅgāpāra-saṁsāra-sindhuṁ pratara bhava kṛtārtho brahma-rūpeṇa saṁsthaḥ

शब्दार्थ: नियमित-मनसा · सधे हुए मन से · अमुं त्वं स्वम् आत्मानम् · इस अपने आत्मा को · आत्मनि · अपने भीतर · “अयम् अहम्” इति साक्षात् विद्धि · “यही मैं हूँ”, ऐसा सीधे जान · बुद्धि-प्रसादात् · निर्मल बुद्धि की कृपा से · जनि-मरण-तरङ्ग · जन्म-मृत्यु की लहरों वाला · संसार-सिन्धुं प्रतर · संसार-समुद्र पार कर · कृतार्थः भव · कृतार्थ हो जा।

अर्थ: सधे हुए मन से, निर्मल बुद्धि की कृपा से, इस अपने आत्मा को, अपने ही भीतर, “यही मैं हूँ”, ऐसा सीधे जान ले। जन्म-मृत्यु की लहरों वाले संसार-समुद्र को पार कर, और ब्रह्म-रूप में स्थिर हो कर कृतार्थ हो जा।

भावार्थ: बारह श्लोकों के इशारों के बाद, गुरु अब सीधा आदेश देते हैं, और यह आदेश प्रेम से भरा है। “विद्धि”, जान ले। और कैसे? “अयम् अहम्”, यही मैं हूँ।

यह विवेकचूडामणि का एक शिखर है। पूरी किताब का “तत्त्वमसि” (आप वही है) यहाँ एक व्यक्तिगत पुकार बन जाता है, गुरु शिष्य से कहते हैं, वह जो सबका साक्षी है, जो जन्मता-मरता नहीं। जो शुद्ध आनंद है, “वह कोई और नहीं। वह आप हैं। यही मैं हूँ, ऐसा जान।” और साथ में दो शर्तें, “नियमित मन” (सधा हुआ मन) और “बुद्धि-प्रसाद” (निर्मल बुद्धि)। साधना का सारा काम बस इसी एक पल के लिए था, कि यह बात सिर्फ़ सुनी न जाए, सीधे “जानी” जाए। और इसके बाद? “कृतार्थ हो जा”, काम पूरा। यह पहला हिस्सा, आत्मा का चित्र, यहाँ अपनी मंज़िल पर पहुँचता है। अब गुरु एक ज़रूरी सवाल की ओर मुड़ते हैं।

137 · बंधन, अनात्मा में “मैं”

अत्रानात्मन्यहमिति मतिर्बन्ध एषोऽस्य पुंसः प्राप्तोऽज्ञानाज्जननमरणक्लेशसंपातहेतुः ।
येनैवायं वपुरिदमसत्सत्यमित्यात्मबुद्ध्या पुष्यत्युक्षत्यवति विषयैस्तन्तुभिः कोशकृद्वत् ॥ 137 ॥

atrānātmany aham iti matir bandha eṣo’sya puṁsaḥ prāpto’jñānāj janana-maraṇa-kleśa-saṁpāta-hetuḥ · yenaivāyaṁ vapur idam asat satyam ity ātma-buddhyā puṣyaty ukṣaty avati viṣayais tantubhiḥ kośa-kṛd-vat

शब्दार्थ: अनात्मनि “अहम्” इति मतिः · अनात्मा में “मैं” की समझ · बन्धः एषः · यही बंधन है · अज्ञानात् प्राप्तः · अज्ञान से मिला · जनन-मरण-क्लेश-संपात-हेतुः · जन्म-मृत्यु-दुख की बौछार का कारण · असत् वपुः सत्यम् इति · इस असत् शरीर को सत्य मान कर · पुष्यति उक्षति अवति · पालता, नहलाता, बचाता है · तन्तुभिः कोशकृद्-वत् · धागों से रेशम के कीड़े की तरह।

अर्थ: अनात्मा में “मैं” की यह समझ, यही इस मनुष्य का बंधन है, जो अज्ञान से मिला, और जन्म-मृत्यु-दुख की बौछार का कारण है। इसी से वह इस असत् शरीर को सत्य, अपना आत्मा मान कर, उसे विषयों रूपी धागों से पालता, नहलाता, बचाता रहता है, ठीक रेशम के कीड़े की तरह।

भावार्थ: शिष्य का पहला सवाल था, “बंधन क्या है?” यह श्लोक उसका सीधा, पूरा जवाब है। और जवाब हैरान कर देने वाला है अपनी सादगी में: बंधन कोई ज़ंजीर नहीं। कोई बाहरी जेल नहीं। बंधन सिर्फ़ एक ग़लत समझ है, “अनात्मा में मैं”, यानी जो “मैं” नहीं है उसे “मैं” मान लेना।

और गुरु एक बेमिसाल उपमा देते हैं, रेशम का कीड़ा। रेशम का कीड़ा अपने ही मुँह से धागा निकालता है, और उसी धागे से अपने चारों ओर एक कोश (कोकून) बुन लेता है, और फिर उसी में क़ैद हो जाता है। किसी ने उसे बंद नहीं किया; उसने ख़ुद, अपने ही धागे से, अपनी जेल बुनी। गुरु कहते हैं, हम ठीक यही करते हैं। शरीर को “मैं” मान कर, हम विषयों रूपी धागों से अपने चारों ओर एक संसार बुनते जाते हैं, और उसी में क़ैद हो जाते हैं। यह बंधन की सबसे गहरी और सबसे मुक्त कर देने वाली बात है: जेल हमने ख़ुद बुनी है। और जो हमने बुना, उसे हम खोल भी सकते हैं।

138 · फिर वही रस्सी और साँप

अतस्मिंस्तद्बुद्धिः प्रभवति विमूढस्य तमसा विवेकाभावाद्वै स्फुरति भुजगे रज्जुधिषणा ।
ततोऽनर्थव्रातो निपतति समादातुरधिकः ततो योऽसद्ग्राहः स हि भवति बन्धः शृणु सखे ॥ 138 ॥

atasmiṁs tad-buddhiḥ prabhavati vimūḍhasya tamasā vivekābhāvād vai sphurati bhujage rajju-dhiṣaṇā · tato’nartha-vrāto nipatati samādātur adhikaḥ tato yo’sad-grāhaḥ sa hi bhavati bandhaḥ śṛṇu sakhe

शब्दार्थ: अतस्मिन् तद्-बुद्धिः · जो वह नहीं। उसमें “वह” की बुद्धि · विमूढस्य तमसा · तमस से मूढ़ हुए की · विवेक-अभावात् · विवेक के अभाव से · स्फुरति भुजगे रज्जु-धिषणा · साँप में रस्सी की समझ चमकती है (उल्टा भी) · अनर्थ-व्रातः निपतति · मुसीबतों का ढेर आ पड़ता है · असत्-ग्राहः सः बन्धः · असत् को पकड़ना ही बंधन · शृणु सखे · सुन, मित्र।

अर्थ:उसमें “वह” की बुद्धि हो जाती है, तमस से मूढ़ हुए इंसान को, विवेक के अभाव में, जैसे साँप में रस्सी का (या रस्सी में साँप का) भ्रम चमक उठता है। फिर पकड़ने वाले पर मुसीबतों का ढेर आ पड़ता है। इसलिए, सुन मित्र, असत् को पकड़ लेना, यही बंधन है।

भावार्थ: गुरु बंधन की पूरी प्रक्रिया को फिर रस्सी-साँप की भाषा में रखते हैं, और दो शब्द इस श्लोक को गर्मजोशी से भर देते हैं: “शृणु सखे”, सुन, मित्र।

गौर कीजिए गुरु ने यहाँ “सखे”, मित्र, कहा। यह कोई भारी-भरकम दार्शनिक घोषणा नहीं; यह दो दोस्तों के बीच की एक भरोसे भरी बात है। और बात क्या है? बंधन = “असत्-ग्रह”, असली न होने वाली चीज़ को कस कर पकड़ लेना। रस्सी में साँप देख लिया, और डर के मारे… कुछ लोग भागते हैं, कुछ लाठी उठाते हैं, मुसीबतों का ढेर शुरू। पर साँप था ही नहीं। पूरी हलचल एक न होने वाली चीज़ को पकड़ने से उठी। गुरु कह रहे हैं, आपका सारा संसारी दुख ऐसा ही है। और इसमें छिपी राहत यह है: अगर बंधन सिर्फ़ एक ग़लत पकड़ है, तो छूटना सिर्फ़ पकड़ का ढीला होना है। कुछ तोड़ना नहीं। बस देख लेना।

139 · राहु की तरह, आवरण

अखण्डनित्याद्वयबोधशक्त्या स्फुरन्तमात्मानमनन्तवैभवम् ।
समावृणोत्यावृतिशक्तिरेषा तमोमयी राहुरिवार्कबिम्बम् ॥ 139 ॥

akhaṇḍa-nityādvaya-bodha-śaktyā sphurantam ātmānam ananta-vaibhavam · samāvṛṇoty āvṛti-śaktir eṣā tamo-mayī rāhur ivārka-bimbam

शब्दार्थ: अखण्ड-नित्य-अद्वय-बोध-शक्त्या · अखंड, नित्य, अद्वय बोध-शक्ति से · स्फुरन्तम् आत्मानम् · चमकते आत्मा को · अनन्त-वैभवम् · अनंत वैभव वाले · समावृणोति आवृति-शक्तिः · आवरण-शक्ति ढक देती है · तमोमयी · तमस से बनी · राहुः इव अर्क-बिम्बम् · राहु की तरह सूरज को।

अर्थ: अखंड, नित्य, अद्वय बोध-शक्ति से चमकते, अनंत वैभव वाले आत्मा को, तमस से बनी यह आवरण-शक्ति ढक देती है, ठीक जैसे राहु सूरज को (ग्रहण में)।

भावार्थ: गुरु बंधन के दो हिस्से अब बारी-बारी खोलते हैं (भाग 4 के श्लोक 113 में परिचय हुआ था)। पहला, आवरण, ढकना। और उपमा है, सूर्य-ग्रहण।

ग्रहण के बारे में दो बातें गौर कीजिए। एक, ग्रहण में सूरज “बुझता” नहीं। वह वहीं है, उतना ही तेजस्वी, अपनी पूरी आग के साथ। बस कुछ बीच में आ गया है। दो, ग्रहण अस्थायी है; जो बीच में आया, वह हट जाता है, और सूरज फिर पूरा दिखता है। गुरु कहते हैं, आपका आत्मा वह सूरज है। वह कभी मलिन नहीं हुआ, कभी छोटा नहीं हुआ, कभी बुझा नहीं। आवरण-शक्ति ने बस उसे, थोड़ी देर के लिए, “ढक” दिया है। और जो ढका है, वह उघड़ भी सकता है। आपको एक नया सूरज बनाना नहीं। बस ग्रहण हटाना है।

140 · ढकने के बाद, विक्षेप का सताना

तिरोभूते स्वात्मन्यमलतरतेजोवति पुमान् अनात्मानं मोहादहमिति शरीरं कलयति ।
ततः कामक्रोधप्रभृतिभिरमुं बन्धनगुणैः परं विक्षेपाख्या रजस उरुशक्तिर्व्यथयति ॥ 140 ॥

tirobhūte svātmany amalatara-tejovati pumān anātmānaṁ mohād aham iti śarīraṁ kalayati · tataḥ kāma-krodha-prabhṛtibhir amuṁ bandhana-guṇaiḥ paraṁ vikṣepākhyā rajasa uru-śaktir vyathayati

शब्दार्थ: तिरोभूते स्व-आत्मनि · अपने आत्मा के ढक जाने पर · अमलतर-तेजोवति · जो अत्यंत निर्मल तेज वाला है · पुमान् अनात्मानं शरीरं · मनुष्य अनात्मा शरीर को · मोहात् “अहम्” इति कलयति · मोह से “मैं” मान लेता है · ततः काम-क्रोध-प्रभृतिभिः · फिर काम-क्रोध आदि से · विक्षेप-आख्या रजसः उरु-शक्तिः · रजस की विक्षेप नाम की बड़ी शक्ति · व्यथयति · सताती है।

अर्थ: जब अत्यंत निर्मल तेज वाला अपना आत्मा ढक जाता है, तब मनुष्य मोह से अनात्मा शरीर को “मैं” मान लेता है। और फिर रजस की “विक्षेप” नाम की बड़ी शक्ति उसे काम-क्रोध आदि बंधन-गुणों से सताती है।

भावार्थ: गुरु बंधन का दूसरा हिस्सा खोलते हैं, विक्षेप, और दिखाते हैं कि दोनों एक क्रम में काम करते हैं।

पहले आवरण: सूरज ढका। अब अँधेरा है। और अँधेरे में, मनुष्य शरीर को “मैं” मान बैठता है। यह पहली, बुनियादी ग़लती। फिर, उस ग़लती के बाद, विक्षेप-शक्ति आती है, और वह “सताती” है, काम, क्रोध, लोभ, डर। ध्यान दीजिए यह क्रम क्यों ज़रूरी है: काम-क्रोध अपने आप नहीं आते। वे तभी आते हैं जब पहले से एक “मैं यह छोटा शरीर हूँ” वाली समझ बैठ चुकी हो। एक शरीर को “मैं” मान लो, तो उसका डर आपका डर बन जाता है, उसकी कमी आपका लोभ। आवरण जड़ है; विक्षेप उस जड़ से उगा हुआ काँटेदार पेड़।

141 · संसार-समुद्र में डूबना-उतराना

महामोहग्राहग्रसनगलितात्मावगमनो धियो नानावस्थां स्वयमभिनयंस्तद्गुणतया ।
अपारे संसरे विषयविषपूरे जलनिधौ निमज्योन्मज्यायं भ्रमति कुमतिः कुत्सितगतिः ॥ 141 ॥

mahā-moha-grāha-grasana-galitātmāvagamano dhiyo nānāvasthāṁ svayam abhinayaṁs tad-guṇatayā · apāre saṁsare viṣaya-viṣa-pūre jala-nidhau nimajjyonmajjyāyaṁ bhramati kumatiḥ kutsita-gatiḥ

शब्दार्थ: महा-मोह-ग्राह-ग्रसन · महामोह रूपी मगरमच्छ के निगलने से · गलित-आत्म-अवगमनः · जिसका आत्म-ज्ञान घुल गया · धियः नाना-अवस्थां स्वयम् अभिनयन् · बुद्धि की तरह-तरह की अवस्थाओं का ख़ुद अभिनय करता हुआ · विषय-विष-पूरे जल-निधौ · विषय रूपी ज़हर से भरे समुद्र में · निमज्य-उन्मज्य भ्रमति · डूब-उतरा कर भटकता है।

अर्थ: महामोह रूपी मगरमच्छ के निगल लेने से जिसका आत्म-ज्ञान घुल गया, जो बुद्धि की तरह-तरह की अवस्थाओं को उनका गुण मान कर ख़ुद उनका अभिनय करता है, ऐसा कुबुद्धि मनुष्य, विषय रूपी ज़हर से भरे अथाह संसार-समुद्र में डूबता-उतराता भटकता रहता है।

भावार्थ: गुरु बंधन में फँसे इंसान की एक जीती-जागती तस्वीर देते हैं, और एक शब्द उसे बेधक बना देता है, “अभिनयन्”, अभिनय करता हुआ।

बुद्धि की अवस्थाएँ बदलती रहती हैं, कभी ख़ुश, कभी उदास, कभी डरी, कभी उत्साहित। और मनुष्य हर अवस्था को “मैं” मान कर उसका पूरा अभिनय कर देता है, “मैं ख़ुश हूँ”, “मैं टूट गया”, “मैं डरा हुआ हूँ।” वह एक नट है जो हर पल का किरदार इतनी गहराई से निभाता है कि भूल जाता है, मैं नट हूँ, ये किरदार नहीं। और इसीलिए वह समुद्र में डूबता-उतराता रहता है, एक लहर ऊपर उठाती है (सुख), अगली नीचे पटकती है (दुख), बिना रुके। यह डूबना-उतराना ही “संसार” है। और इसकी जड़? बस एक भूल, हर अवस्था को “मैं” मान लेना।

142 · सूरज की रोशनी से बने बादल

भानुप्रभासंजनिताभ्रपङ्क्तिः भानुं तिरोधाय विजृम्भते यथा ।
आत्मोदिताहंकृतिरात्मतत्त्वं तथा तिरोधाय विजृम्भते स्वयम् ॥ 142 ॥

bhānu-prabhā-saṁjanitābhra-paṅktiḥ bhānuṁ tirodhāya vijṛmbhate yathā · ātmoditāhaṅkṛtir ātma-tattvaṁ tathā tirodhāya vijṛmbhate svayam

शब्दार्थ: भानु-प्रभा-संजनित-अभ्र-पङ्क्तिः · सूरज की किरणों से बनी बादलों की कतार · भानुं तिरोधाय विजृम्भते · सूरज को ही ढक कर फैल जाती है · आत्म-उदित-अहंकृतिः · आत्मा से ही उठा अहंकार · आत्म-तत्त्वं तिरोधाय · आत्म-तत्व को ढक कर · विजृम्भते स्वयम् · ख़ुद फैल जाता है।

अर्थ: जैसे सूरज की किरणों से ही बनी बादलों की कतार उसी सूरज को ढक कर फैल जाती है, वैसे ही आत्मा से ही उठा अहंकार, उसी आत्म-तत्व को ढक कर ख़ुद फैल जाता है।

भावार्थ: यह एक बेहद बारीक, और बेहद सुंदर उपमा है, और यह अहंकार के बारे में सबसे गहरी बात कह देती है।

बादल कहाँ से बनते हैं? सूरज की गर्मी पानी को भाप बनाती है, भाप ऊपर उठ कर बादल बनती है। यानी बादल का जन्म ख़ुद सूरज से होता है। और फिर वही बादल ऊपर जा कर सूरज को ही ढक देता है। बेटा माँ को ढक देता है। अहंकार ठीक यही है। “मैं” का यह एहसास, यह आत्मा की ही चेतना उधार ले कर खड़ा होता है (श्लोक 103 की “आभा” वाली बात)। यानी अहंकार आत्मा का ही बच्चा है। और फिर वही अहंकार, फैल कर, अपनी ही माँ, आत्मा, को ढक देता है। इसमें एक राहत भी है: बादल सूरज को मिटा नहीं सकता, सिर्फ़ ढक सकता है। अहंकार आत्मा को नष्ट नहीं करता; वह सिर्फ़ नज़र से ओझल करता है। और हवा का एक झोंका, विवेक, बादल को बिखेर देता है।

143 · ढके सूरज, और ठंडा तूफ़ान

कवलितदिननार्थे दुर्दिने सान्द्रमेघैः व्यथयति हिमझंझावायुरुग्रो यथैतान् ।
अविरततमसात्मन्यावृते मूढबुद्धिं क्षपयति बहुदुःखैस्तीव्रविक्षेपशक्तिः ॥ 143 ॥

kavalita-dina-nārthe durdine sāndra-meghaiḥ vyathayati hima-jhañjhā-vāyur ugro yathaitān · avirata-tamasātmany āvṛte mūḍha-buddhiṁ kṣapayati bahu-duḥkhais tīvra-vikṣepa-śaktiḥ

शब्दार्थ: कवलित-दिन-नाथे · सूरज के निगल लिए जाने पर · दुर्दिने सान्द्र-मेघैः · घने बादलों वाले बुरे दिन · हिम-झंझा-वायुः उग्रः · बर्फ़ीला तूफ़ानी हवा का झोंका · व्यथयति एतान् · लोगों को सताता है · अविरत-तमसा आत्मनि आवृते · लगातार तमस से आत्मा के ढक जाने पर · मूढ-बुद्धिं क्षपयति · मूढ़-बुद्धि को सताती है · तीव्र-विक्षेप-शक्तिः · तेज़ विक्षेप-शक्ति।

अर्थ: घने बादलों से सूरज के निगल लिए जाने पर, जैसे एक बुरे दिन में बर्फ़ीला तूफ़ानी हवा का झोंका लोगों को सताता है, वैसे ही, लगातार तमस से आत्मा के ढक जाने पर, तेज़ विक्षेप-शक्ति मूढ़-बुद्धि को बहुत सारे दुखों से सताती है।

भावार्थ: गुरु आवरण और विक्षेप के रिश्ते को एक आख़िरी, बेहद सटीक तस्वीर देते हैं, सर्दी का एक बुरा दिन।

सोचिए। पहले घने बादल आते हैं और सूरज को ढक देते हैं, यह आवरण। अब दिन ठंडा, अँधेरा, उदास है। और इस ढके हुए, अँधेरे माहौल में ही, एक बर्फ़ीली तूफ़ानी हवा चलती है और लोगों को कँपा देती है, यह विक्षेप। गौर कीजिए, तूफ़ानी हवा तभी इतनी तकलीफ़ देती है जब सूरज पहले से ढका हो। अगर सूरज चमक रहा होता, गर्मी होती, तो वही हवा इतनी न सताती। यानी काम-क्रोध-डर (विक्षेप) हमें इतना तोड़ते हैं क्योंकि हमारा भीतरी सूरज ढका हुआ है। आत्म-ज्ञान का सूरज खुला हो, तो ज़िंदगी के तूफ़ान आते तो हैं, पर वे कँपा नहीं पाते, एक भीतरी गर्मी बनी रहती है।

144 · दो शक्तियाँ, और बंधन

एताभ्यामेव शक्तिभ्यां बन्धः पुंसः समागतः ।
याभ्यां विमोहितो देहं मत्वात्मानं भ्रमत्ययम् ॥ 144 ॥

etābhyām eva śaktibhyāṁ bandhaḥ puṁsaḥ samāgataḥ · yābhyāṁ vimohito dehaṁ matvātmānaṁ bhramaty ayam

शब्दार्थ: एताभ्यां एव शक्तिभ्यां · इन्हीं दो शक्तियों से · बन्धः पुंसः समागतः · मनुष्य का बंधन आया है · याभ्यां विमोहितः · जिनसे मोहित हो कर · देहं मत्वा आत्मानं · शरीर को आत्मा मान कर · भ्रमति अयम् · यह भटकता है।

अर्थ: इन्हीं दो शक्तियों, आवरण और विक्षेप, से मनुष्य का बंधन आया है। इन्हीं से मोहित हो कर वह शरीर को आत्मा मान बैठता है, और भटकता रहता है।

भावार्थ: गुरु बंधन की पूरी व्याख्या को एक गाँठ में बाँध देते हैं। शिष्य के दूसरे सवाल, “बंधन आया कैसे?”, का यह पूरा, साफ़ जवाब है: दो शक्तियों से।

आवरण ढकती है, सच को नज़र से ओझल कर देती है। विक्षेप फेंकती है, ओझल जगह पर एक नक़ली चीज़ खड़ी कर देती है। दोनों मिल कर वह एक बुनियादी ग़लती करवाती हैं, “देहं मत्वा आत्मानम्”, शरीर को आत्मा मान लेना। और यह जान लेना अपने आप में राहत है: बंधन की कोई रहस्यमयी, अनगिनत वजहें नहीं। बस दो काम करने वाली शक्तियाँ, और एक नतीजा, एक ग़लत पहचान। समस्या जब इतनी साफ़ हो, तो हल भी साफ़ हो जाता है। दोनों शक्तियाँ माया का हिस्सा हैं, और माया ज्ञान से मिटती है (श्लोक 110)।

145 · संसार का पेड़

बीजं संसृतिभूमिजस्य तु तमो देहात्मधीरङ्कुरो रागः पल्लवमम्बु कर्म तु वपुः स्कन्धोऽसवः शाखिकाः ।
अग्राणीन्द्रियसंहतिश्च विषयाः पुष्पाणि दुःखं फलं नानाकर्मसमुद्भवं बहुविधं भोक्तात्र जीवः खगः ॥ 145 ॥

bījaṁ saṁsṛti-bhūmijasya tu tamo dehātma-dhīr aṅkuro rāgaḥ pallavam ambu karma tu vapuḥ skandho’savaḥ śākhikāḥ · agrāṇīndriya-saṁhatiś ca viṣayāḥ puṣpāṇi duḥkhaṁ phalaṁ nānā-karma-samudbhavaṁ bahu-vidhaṁ bhoktātra jīvaḥ khagaḥ

शब्दार्थ: बीजं · बीज, तमस · देह-आत्म-धीः अङ्कुरः · “शरीर ही मैं” वाली बुद्धि, अंकुर · रागः पल्लवम् · राग, कोंपल · अम्बु कर्म · पानी, कर्म · वपुः स्कन्धः · शरीर, तना · असवः शाखिकाः · प्राण, डालियाँ · इन्द्रिय-संहतिः अग्राणि · इन्द्रियाँ, टहनियाँ · विषयाः पुष्पाणि · विषय, फूल · दुःखं फलं · दुख, फल · जीवः खगः · जीव, पक्षी।

अर्थ: संसार रूपी ज़मीन पर उगे इस पेड़ का बीज है तमस; “शरीर ही मैं हूँ” वाली बुद्धि उसका अंकुर; राग कोंपल; कर्म पानी; शरीर तना; प्राण डालियाँ; इन्द्रियाँ टहनियाँ; विषय फूल; और तरह-तरह के कर्मों से उपजा अनेक प्रकार का दुख, उसका फल। और यहाँ इस फल को खाने वाला जीव, एक पक्षी है।

भावार्थ: यह भाग 5 का समापन है, और गुरु एक पूरा, जीता-जागता पेड़ खड़ा कर देते हैं, संसार का पेड़, जिसमें हर हिस्सा बंधन की कहानी का एक पात्र है।

पेड़ की पूरी कथा : सबसे नीचे, ज़मीन में छिपा बीज, तमस, वह ढकने वाला अँधेरा। उससे फूटा अंकुर, “मैं शरीर हूँ” वाली पहली ग़लती। फिर राग की कोंपलें, कर्म का पानी जो पेड़ को बढ़ाता रहता है, और सबसे ऊपर खिले विषयों के सुंदर फूल। और उन फूलों से लगने वाला फल? “दुख।” यह पूरे पेड़ का बेरहम सच है, जड़ में एक भूल, और सबसे ऊपर, फल में, दुख। और सबसे मार्मिक तस्वीर आख़िर में, जीव एक पक्षी है, जो इसी पेड़ पर बैठ कर वह दुख-फल खा रहा है। पर एक पक्षी के बारे में एक प्यारी बात याद रखिए, जो आगे काम आएगी: पक्षी पेड़ नहीं। वह बस उस पर बैठा है। और जिस पल वह यह पहचान ले, वह पंख खोल कर उड़ सकता है। पेड़ बड़ा है, पर पक्षी बँधा नहीं। बस बैठा है।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना: भाग 6 · पाँच कोश, गुरु अब आत्मा तक पहुँचने का असली तरीक़ा देते हैं। आपके और आपके असली स्वरूप के बीच पाँच परतें हैं, अन्न, प्राण, मन, बुद्धि, और आनंद की। एक-एक कर के, गुरु उन्हें छीलते हैं, जैसे प्याज़ की परतें, जैसे तालाब पर जमी काई।

और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 137 कहता है, हम रेशम के कीड़े की तरह अपनी ही जेल ख़ुद बुनते हैं, अपने ही धागे से। आज एक “धागा” पहचानिए, एक चाह, एक पकड़, एक “मेरा”, जिसे आप ख़ुद, रोज़, थोड़ा-थोड़ा बुनते जा रहे हैं। बस पहचान लेना ही पहली ढील है।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, verbatim।

स्थायी URL: /vivekachudamani/atma-svarup/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-22