भाग 10 · वासना-क्षय

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 10 · वासना का क्षय · श्लोक 267-297

“तत् त्वम् असि” समझ में आ गया। पर पुरानी आदतें, “मैं ही करता हूँ, मैं ही भोगता हूँ”, समझ के बाद भी ज़ोर मारती रहती हैं। यह भाग उनकी विदाई है।

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पहले एक बात

यह विवेकचूडामणि का सबसे ईमानदार भाग है, और शायद सबसे ज़रूरी। भाग 9 में महावाक्य खुल गया, “आप वही है।” तो अब काम पूरा? गुरु बहुत साफ़ कह देते हैं, नहीं। समझ आना एक बात है, और जीना दूसरी।

श्लोक 267 पहले ही पल में बात रख देता है: “ज्ञाते वस्तुनि अपि बलवती वासना”, चीज़ जान लेने के बाद भी वासनाएँ ज़ोरदार बनी रहती हैं। पुरानी आदतें, “मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ”, समझ के बाद भी अपने आप उभरती रहती हैं। यही असली काम है, इस भाग में: वासनाओं का “क्षय”, पतला होते जाना।

बीच में नौ श्लोकों की एक लड़ी है (277-285), हर एक उसी टेक पर बंद, “स्वाध्यासापनयं कुरु”, अपनी ग़लत पहचान को मिटाने का काम कर। इसे एक मंत्र की तरह, बार-बार आती हथौड़े की चोट की तरह पढ़िए, क्योंकि वासनाओं को भी एक बार में नहीं। बार-बार, मिटाया जाता है।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। तीन हिस्से, वासना का परिचय और इलाज (267-276), “स्वाध्यासापनयं कुरु” वाली नौ-श्लोकी टेक (277-285), और भीतर बस जाने का काम (286-297)। असली खंभे: 267 (वासनाएँ ज्ञान के बाद भी रहती हैं), 273-274 (चंदन की सुगंध की उपमा), 288 (घटाकाश में महाकाश)। हर श्लोक पर anchor है।

267 · जान लेने के बाद भी, वासना

ज्ञाते वस्तुन्यपि बलवती वासनानादिरेषा कर्ता भोक्ताप्यहमिति दृढा यास्य संसारहेतुः ।
प्रत्यग्दृष्ट्यात्मनि निवसता सापनेया प्रयत्नान् मुक्तिं प्राहुस्तदिह मुनयो वासनातानवं यत् ॥ 267 ॥

jñāte vastuny api balavatī vāsanā-anādir eṣā kartā bhoktāpy aham iti dṛḍhā yāsya saṁsāra-hetuḥ · pratyag-dṛṣṭyātmani nivasatā sāpaneyā prayatnāt muktiṁ prāhus tad iha munayo vāsanā-tānavaṁ yat

शब्दार्थ: ज्ञाते वस्तुनि अपि · असली चीज़ जान लेने के बाद भी · बलवती वासना अनादिः · ज़ोरदार, अनादि वासना · “कर्ता भोक्ता अहम्” इति दृढा · “मैं कर्ता-भोक्ता हूँ”, यह पक्की · संसार-हेतुः · संसार का कारण · प्रत्यग्-दृष्ट्या आत्मनि निवसता सापनेया · भीतर की दृष्टि से आत्मा में बस कर हटाई जानी चाहिए · वासना-तानवं · वासनाओं का पतला होना · तत् मुक्तिं प्राहुः मुनयः · उसी को मुनि मुक्ति कहते हैं।

अर्थ: असली चीज़ जान लेने के बाद भी, अनादि वासना ज़ोरदार बनी रहती है, “मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ”, और यही पक्की वासना संसार का कारण है। इसे, भीतर की दृष्टि से आत्मा में बस कर, प्रयत्न से हटाना चाहिए। वासनाओं का यह पतला होते जाना, मुनि इसी को मुक्ति कहते हैं।

भावार्थ: यह विवेकचूडामणि के सबसे ईमानदार श्लोकों में से एक है। शिष्य ने महावाक्य समझ लिया, पर गुरु एक झटका देते हैं: समझ काफ़ी नहीं।

एक रोज़ का अनुभव, आप जानते हैं कि “मुझे ग़ुस्सा नहीं करना चाहिए।” फिर भी, मौक़ा आते ही, ग़ुस्सा अपने आप उभर आता है। यही “वासना” है, समझ से नीचे की, गहरी आदत। ज्ञान सिर्फ़ ऊपरी मन तक पहुँचता है; वासनाएँ इसकी जड़ों में बैठी होती हैं, और वे एक झटके में नहीं जातीं। और गुरु एक प्यारा शब्द देते हैं, “वासना-तानवम्”, वासनाओं का पतला होना। मुक्ति विस्फोट नहीं। यह एक धीमी, धीरज वाली पतला होने की प्रक्रिया है। अगले श्लोक यह काम कैसे हो, बताएँगे।

268 · “मैं-मेरा”, अध्यास को हटाओ

अहं ममेति यो भावो देहाक्षादावनात्मनि ।
अध्यासोऽयं निरस्तव्यो विदुषा स्वात्मनिष्ठया ॥ 268 ॥

ahaṁ mameti yo bhāvo dehākṣādāv anātmani · adhyāso’yaṁ nirastavyo viduṣā svātma-niṣṭhayā

शब्दार्थ: अहं मम इति यः भावः · “मैं” और “मेरा” वाला भाव · देह-अक्ष-आदौ अनात्मनि · शरीर-इन्द्रिय आदि अनात्मा में · अध्यासः अयं निरस्तव्यः · इस अध्यास (थोपी पहचान) को हटाना चाहिए · विदुषा स्व-आत्म-निष्ठया · ज्ञानी द्वारा, अपने आत्मा में टिक कर।

अर्थ: शरीर-इन्द्रिय आदि अनात्मा में जो “मैं” और “मेरा” वाला भाव है, इस अध्यास को ज्ञानी अपने आत्मा में टिक कर हटाए।

भावार्थ: गुरु काम को दो शब्दों में समेट देते हैं, “अध्यास” (ग़लत पहचान) और “स्व-आत्म-निष्ठा” (अपने आत्मा में टिकाव)।

अध्यास वही है, शरीर पर “मैं” का ठप्पा, शरीर से जुड़ी चीज़ों पर “मेरा।” इसे “मिटाना” नहीं, मिटाई नहीं जाती, क्योंकि वह असली कभी थी ही नहीं। बस इसे लगातार देखते रहना है, और हर बार “स्व-आत्म-निष्ठा”, असली आत्मा में लौट कर बैठना है। एक तस्वीर: आदत वाले विचार वापस आते रहेंगे; आपका काम बस बार-बार उसी कुर्सी, आत्मा की कुर्सी, पर लौट कर बैठना है। एक टिकाव, जिसे बार-बार चुनना है।

269 · साक्षी को जान, “वही मैं हूँ”

ज्ञात्वा स्वं प्रत्यगात्मानं बुद्धितद्वृत्तिसाक्षिणम् ।
सोऽहमित्येव सद्वृत्त्यानात्मन्यात्ममतिं जहि ॥ 269 ॥

jñātvā svaṁ pratyag-ātmānaṁ buddhi-tad-vṛtti-sākṣiṇam · so’ham ity eva sad-vṛttyānātmany ātma-matiṁ jahi

शब्दार्थ: ज्ञात्वा स्वं प्रत्यग्-आत्मानं · अपने भीतर के आत्मा को जान कर · बुद्धि-तद्-वृत्ति-साक्षिणम् · बुद्धि और उसकी हलचलों का साक्षी · सः अहम् इति सद्-वृत्त्या · “वही मैं हूँ”, इस सद्-वृत्ति से · अनात्मनि आत्म-मतिं जहि · अनात्मा में आत्मा-समझ को छोड़।

अर्थ: अपने भीतर के आत्मा को, बुद्धि और उसकी हलचलों का साक्षी, जान कर, “वही मैं हूँ” इस सद्-वृत्ति से, अनात्मा में आत्मा-समझ को छोड़ दे।

भावार्थ: “सोऽहम्”, वह मैं हूँ। यह एक प्रसिद्ध मंत्र है, और यह “तत् त्वम् असि” का आईने वाला रूप है। गुरु “आप वही है” कहते हैं, शिष्य भीतर से “वही मैं हूँ” जानता है।

और गुरु एक प्यारा शब्द देते हैं, “सद्-वृत्ति।” वृत्ति यानी मन की एक हलचल, एक तरंग। ज़्यादातर वृत्तियाँ “अ-सद्” हैं, झूठ की ओर ले जाने वाली। “सद्-वृत्ति” वह है जो सत्य की ओर ले जाए, “वही मैं हूँ।” काम है: हर बार जब “मैं यह शरीर हूँ” वाली पुरानी वृत्ति उठे, उसे “सोऽहम्” वाली नई वृत्ति से बदल दो। पुराने पैटर्न को मिटाना नहीं। उसकी जगह नया पैटर्न बसाना है।

270 · तीन को छोड़, स्वाध्यास हटाओ

लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम् ।
शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ 270 ॥

lokānuvartanaṁ tyaktvā tyaktvā dehānuvartanam · śāstrānuvartanaṁ tyaktvā svādhyāsāpanayaṁ kuru

शब्दार्थ: लोक-अनुवर्तनं त्यक्त्वा · समाज की चलती को छोड़ कर · देह-अनुवर्तनम् · शरीर की चलती को · शास्त्र-अनुवर्तनम् · शास्त्र-पाठ की चलती को · स्व-अध्यास-अपनयं कुरु · अपनी ग़लत पहचान को हटाने का काम कर।

अर्थ: समाज की चलती छोड़, शरीर की चलती छोड़, शास्त्र-पाठ की चलती छोड़, अपनी ग़लत पहचान (अध्यास) को हटाने का काम कर।

भावार्थ: गुरु तीन “अनुवर्तन” गिनाते हैं, तीन वे चीज़ें जिनके पीछे हम बिना सोचे चलते रहते हैं।

एक, लोक: “लोग क्या कहेंगे”, सामाजिक अपेक्षाएँ। दो, देह: शरीर की हर माँग, हर सुख-सुविधा के पीछे भागना। तीन, शास्त्र: किताबें पढ़ते रहना, “अध्ययन” का एक और बंधन बनाना (एक तीखी बात, शास्त्र भी एक “अनुवर्तन” बन सकता है, अगर सिर्फ़ रटना हो जाए)। इन तीनों के पीछे भागना अनजाने में आपको पुरानी पहचान में पक्का करता रहता है। इन्हें छोड़ने का मतलब समाज से भागना नहीं। शरीर की उपेक्षा करना नहीं। मतलब है इनके पीछे यंत्रवत् न चलना। और गुरु एक टेक देते हैं, “स्वाध्यासापनयं कुरु।” यह टेक अगले नौ श्लोकों तक हथौड़े की तरह गिरेगी।

271 · तीन वासनाएँ, ज्ञान को ढकती हैं

लोकवासनया जन्तोः शास्त्रवासनयापि च ।
देहवासनया ज्ञानं यथावन्नैव जायते ॥ 271 ॥

loka-vāsanayā jantoḥ śāstra-vāsanayāpi ca · deha-vāsanayā jñānaṁ yathāvan naiva jāyate

शब्दार्थ: लोक-वासनया · समाज की वासना से · शास्त्र-वासनया · शास्त्र की वासना से · देह-वासनया · शरीर की वासना से · ज्ञानं यथावत् न एव जायते · ज्ञान ठीक से उठता ही नहीं।

अर्थ: समाज की वासना से, शास्त्र की वासना से, और शरीर की वासना से, मनुष्य में ज्ञान ठीक से जन्म नहीं ले पाता।

भावार्थ: श्लोक 270 ने कहा “इन तीनों को छोड़ो”; यह श्लोक बताता है “क्यों।” इन तीन के पीछे की वासनाएँ ज्ञान को उगने ही नहीं देतीं।

एक तस्वीर: मन एक खेत है, ज्ञान का बीज उसी में उगना है। पर अगर खेत में पहले से तीन तरह की खर-पतवार, समाज की चिंता, शरीर की माँगें, शास्त्रों का बेजान भार, जमी हुई हो, तो बीज को धूप-पानी मिलेगा कहाँ? पहले खेत साफ़ करना है। और यह बात अनुभव से सही है: एक तनावग्रस्त मन (समाज की चिंता), एक थका शरीर (इन्द्रिय-भोग में डूबा), या एक बौद्धिक रूप से भरा हुआ अहंकार (शास्त्र की वासना), किसी में भी सच की एक नई किरण के लिए जगह नहीं बचती।

272 · लोहे की ज़ंजीरें

संसारकारागृहमोक्षमिच्छोर् अयोमायां पादनिबन्धशृङ्खलम् ।
वदन्ति तज्ज्ञाः पटु वासनात्रयं योऽस्माद्विमुक्तः समुपैति मुक्तिम् ॥ 272 ॥

saṁsāra-kārā-gṛha-mokṣam icchor ayo-mayāṁ pāda-nibandha-śṛṅkhalam · vadanti tajjñāḥ paṭu vāsanā-trayaṁ yo’smād vimuktaḥ samupaiti muktim

शब्दार्थ: संसार-कारागृह-मोक्षम् इच्छोः · संसार रूपी जेल से छूटना चाहने वाले के · अयोमयीं पाद-निबन्ध-शृङ्खलम् · पैर में बँधी लोहे की ज़ंजीर · वदन्ति तज्ज्ञाः पटु वासना-त्रयं · ज्ञानी इस मज़बूत तीनों-वासनाओं को (यही) कहते हैं · यः अस्मात् विमुक्तः समुपैति मुक्तिम् · जो इनसे छूट जाता है, वह मुक्ति पाता है।

अर्थ: संसार रूपी जेल से छूटना चाहने वाले के पैरों में पहनी लोहे की ज़ंजीर, यही तीनों वासनाएँ हैं, ज्ञानी कहते हैं। जो इनसे छूट जाता है, वह मुक्ति पाता है।

भावार्थ: गुरु एक ज़बरदस्त, चित्र-जैसी उपमा देते हैं। संसार एक “कारागृह”, जेल है। आप मुक्ति की चाह से बाहर निकलना चाहते हैं, पर पैरों में एक मज़बूत लोहे की ज़ंजीर है।

वह ज़ंजीर “तीनों वासनाएँ” हैं, समाज, देह, शास्त्र। ध्यान दीजिए, गुरु यह नहीं कहते कि कारागृह के दरवाज़े बंद हैं। दरवाज़े खुले हैं! बस आपके पैर बँधे हैं। और यह बात बेहद मुक्त करने वाली है: मुक्ति का रास्ता बाहर नहीं। यह आपके अपने पैरों की ज़ंजीर खोलने में है। और गुरु बार-बार उन्हीं तीन ज़ंजीरों को नाम दे रहे हैं ताकि आप जान सको, काम कहाँ करना है।

273 · पानी में डूबा अगर, मूल सुगंध छिपी

जलादिसंसर्गवशात्प्रभूत दुर्गन्धधूतागरुदिव्यवासना ।
संघर्षणेनैव विभाति सम्यग् विधूयमाने सति बाह्यगन्धे ॥ 273 ॥

jalādi-saṁsarga-vaśāt prabhūta durgandha-dhūta-agaru-divya-vāsanā · saṁgharṣaṇenaiva vibhāti samyag vidhūyamāne sati bāhya-gandhe

शब्दार्थ: जल-आदि-संसर्ग-वशात् · पानी आदि के संपर्क से · प्रभूत दुर्गन्ध-धूत · बहुत बुरी गंध से ढका · अगरु-दिव्य-वासना · अगर (चंदन-कुल) की दिव्य सुगंध · संघर्षणेन एव विभाति · रगड़ से ही प्रकट होती है · विधूयमाने बाह्य-गन्धे · बाहरी गंध हटने पर।

अर्थ: पानी आदि के संपर्क से बहुत बुरी गंध से ढके अगर (चंदन-वर्ग) की भीतरी दिव्य सुगंध, रगड़ से ही, और बाहरी गंध के हटने पर, ठीक से प्रकट होती है।

भावार्थ: यह एक सुंदर, ज़मीनी उपमा है। अगर एक क़ीमती सुगंधित लकड़ी है, पर वह बरसों पानी में पड़ी रही, तो ऊपर से उसमें एक भयानक बदबू आ गई। अब, अगर आपको पता ही न हैं कि वह अगर की लकड़ी है, तो आप उसे बदबू वाली लकड़ी समझ कर फेंक देंगे।

पर अगर कोई जानकार उसे रगड़े, बार-बार, ध्यान से, तो ऊपर की पानी वाली बदबू हटने लगती है, और भीतर की मूल, दिव्य सुगंध आने लगती है। गुरु कहते हैं, आपके भीतर भी ऐसी ही एक मूल “दिव्य सुगंध” है, आत्मा का अपना स्वभाव। पर ऊपर वासनाओं की “बदबू” (समाज, शरीर, शास्त्र वाली) चढ़ गई है। अगला श्लोक यह उपमा खोलेगा।

274 · भीतर की चंदन-सुगंध

अन्तःश्रितानन्तदूरन्तवासना धूलीविलिप्ता परमात्मवासना ।
प्रज्ञातिसंघर्षणतो विशुद्धा प्रतीयते चन्दनगन्धवत्स्फुटम् ॥ 274 ॥

antaḥ-śritānanta-dūranta-vāsanā dhūlī-viliptā paramātma-vāsanā · prajñāti-saṁgharṣaṇato viśuddhā pratīyate candana-gandhavat sphuṭam

शब्दार्थ: अन्तः-श्रित-अनन्त-दुरन्त-वासना-धूली-विलिप्ता · भीतर बैठी अनगिनत, हटाने में कठिन वासनाओं की धूल से सनी · परमात्म-वासना · परमात्मा वाली मूल सुगंध · प्रज्ञ-अति-संघर्षणतः · प्रज्ञा की भारी रगड़ से · विशुद्धा प्रतीयते · शुद्ध होकर प्रकट होती है · चन्दन-गन्ध-वत् स्फुटम् · चंदन की सुगंध की तरह साफ़।

अर्थ: भीतर बैठी अनगिनत, हटाने में कठिन वासनाओं की धूल से सनी हुई परमात्मा वाली मूल सुगंध, प्रज्ञा की भारी रगड़ से शुद्ध हो कर, चंदन की सुगंध की तरह साफ़ प्रकट हो जाती है।

भावार्थ: उपमा अब साफ़ हो जाती है। दो शब्द ख़ास हैं।

“दुरन्त-वासना”, हटाने में कठिन वासनाएँ। गुरु ईमानदार हैं, यह आसान काम नहीं। वासनाएँ ज़िद्दी हैं, बार-बार वापस आती हैं। और “प्रज्ञ-अति-संघर्षण”, प्रज्ञा (तेज़ बुद्धि, साफ़ समझ) की “भारी रगड़।” चंदन की लकड़ी को थोड़ा-सा रगड़ने से सुगंध नहीं आती; “अति-संघर्षण” चाहिए, लगातार, जोर लगा कर। आत्म-ज्ञान का काम वैसा ही है: रोज़, बार-बार, थोड़े-थोड़े विवेक की रगड़, और एक दिन भीतर की चंदन-सुगंध साफ़ निकल आती है। काम कठिन है, पर असंभव नहीं। और मूल सुगंध हमेशा से वहीं थी, बस उघड़ने के इंतज़ार में।

275 · अनात्मा-वासनाओं का जाल हटे

अनात्मवासनाजालैस्तिरोभूतात्मवासना ।
नित्यात्मनिष्ठया तेषां नाशे भाति स्वयं स्फुटम् ॥ 275 ॥

anātma-vāsanā-jālais tirobhūtātma-vāsanā · nityātma-niṣṭhayā teṣāṁ nāśe bhāti svayaṁ sphuṭam

शब्दार्थ: अनात्म-वासना-जालैः · अनात्मा वाली वासनाओं के जाल से · तिरोभूत-आत्म-वासना · ढकी हुई आत्म-वासना · नित्य-आत्म-निष्ठया · सदा आत्मा में टिकाव से · तेषां नाशे · उनके नष्ट होने पर · भाति स्वयं स्फुटम् · अपने आप साफ़ चमक उठती है।

अर्थ: अनात्मा वाली वासनाओं के जाल से ढकी हुई आत्म-वासना, सदा आत्मा में टिकाव से उन वासनाओं के नष्ट होने पर, अपने आप साफ़ चमक उठती है।

भावार्थ: गुरु एक राहत भरी बात कहते हैं, आत्म-वासना (आत्मा की ओर का सहज खिंचाव) आपके भीतर हमेशा से है। बस अनात्मा-वासनाओं के जाल ने उसे ढका हुआ है।

तो काम क्या है? नई आत्म-वासना “उगानी” नहीं। पुराने जाल हटने देना। और जब वे हटते हैं, तो आत्म-वासना “अपने आप, साफ़” चमक उठती है। उसे चमकाने की मेहनत नहीं करनी पड़ती; वह बस उघड़ने का इंतज़ार कर रही थी। यह बेहद मुक्त करने वाला है, आपको आध्यात्मिक नहीं “बनना”, आप पहले से वही हो; बस आड़े आ रही चीज़ें हटनी हैं।

276 · मन भीतर बसे, बाहरी वासनाएँ छूटें

यथा यथा प्रत्यगवस्थितं मनः तथा तथा मुञ्चति बाह्यवासनाम् ।
निःशेषमोक्षे सति वासनानां आत्मानुभूतिः प्रतिबन्धशून्या ॥ 276 ॥

yathā yathā pratyag-avasthitaṁ manaḥ tathā tathā muñcati bāhya-vāsanām · niḥśeṣa-mokṣe sati vāsanānām ātmānubhūtiḥ pratibandha-śūnyā

शब्दार्थ: यथा यथा प्रत्यग्-अवस्थितं मनः · जैसे-जैसे मन भीतर टिकता जाता · तथा तथा मुञ्चति बाह्य-वासनाम् · वैसे-वैसे बाहरी वासनाओं को छोड़ता जाता · निःशेष-मोक्षे सति वासनानां · वासनाओं के पूरी तरह छूटने पर · आत्म-अनुभूतिः प्रतिबन्ध-शून्या · आत्म-अनुभव बिना रुकावट के।

अर्थ: जैसे-जैसे मन भीतर टिकता जाता है, वैसे-वैसे बाहरी वासनाओं को छोड़ता जाता है। और जब वासनाएँ पूरी तरह छूट जाती हैं, तो आत्म-अनुभव बिना रुकावट के होता है।

भावार्थ: गुरु एक प्यारा, धीरे-धीरे का सिद्धांत देते हैं। यह कोई एक-झटके वाली बात नहीं। “यथा यथा… तथा तथा”, जैसे-जैसे, वैसे-वैसे।

एक तस्वीर: एक हाथ में दो चीज़ें, एक तरफ़ “भीतर का टिकाव”, दूसरी तरफ़ “बाहर की पकड़।” जैसे-जैसे एक भारी होती है, दूसरी हल्की होती जाती है। आपको बाहरी वासनाओं को “तोड़ना” नहीं, बस भीतर थोड़ा-थोड़ा टिकते जाएँ, और वे अपने आप ढीली होती जाएँगी। यह ज़ोर-ज़बरदस्ती का काम नहीं; यह संतुलन का काम है। और जब बाहर वाला पलड़ा शून्य पर पहुँचता है, तब आत्म-अनुभव “बिना रुकावट”, कोई दीवार नहीं। कोई परदा नहीं।

277 · स्वाध्यासापनयं कुरु (1), आत्मा में टिक

स्वात्मन्येव सदा स्थित्वा मनो नश्यति योगिनः ।
वासनानां क्षयश्चातः स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ 277 ॥

svātmany eva sadā sthitvā mano naśyati yoginaḥ · vāsanānāṁ kṣayaś cātaḥ svādhyāsāpanayaṁ kuru

शब्दार्थ: स्व-आत्मनि एव सदा स्थित्वा · अपने आत्मा में ही सदा ठहर कर · मनः नश्यति योगिनः · योगी का मन नष्ट हो जाता है · वासनानां क्षयः · वासनाओं का क्षय · अतः स्वाध्यासापनयं कुरु · इसलिए, अपनी ग़लत पहचान हटाने का काम कर।

अर्थ: अपने आत्मा में ही सदा ठहर कर, योगी का मन नष्ट हो जाता है। और इससे ही वासनाओं का क्षय होता है, इसलिए, अपनी ग़लत पहचान हटाने का काम कर।

भावार्थ: यहाँ से नौ श्लोकों की एक टेक शुरू होती है, हर एक “स्वाध्यासापनयं कुरु”, अपनी ग़लत पहचान हटाने का काम कर, पर बंद होता। इसे एक मंत्र की तरह पढ़िए, हर बार एक नए कोण से वही पुकार।

पहला कोण: आत्मा में टिकना। एक प्यारा क्रम है, आत्मा में टिको, मन शांत/नष्ट होंगे (मन अपनी हलचलों में मरता है, अपनी सजगता में नहीं), वासनाएँ अपने आप क्षय होंगी। तीनों एक साथ नहीं हैं सकते; पहले एक, फिर दूसरा, फिर तीसरा। काम सिर्फ़ पहले कदम का है, आत्मा में टिकना। बाक़ी अपने आप होंगे।

278 · स्वाध्यासापनयं कुरु (2), सत्व का सहारा

तमो द्वाभ्यां रजः सत्त्वात्सत्त्वं शुद्धेन नश्यति ।
तस्मात्सत्त्वमवष्टभ्य स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ 278 ॥

tamo dvābhyāṁ rajaḥ sattvāt sattvaṁ śuddhena naśyati · tasmāt sattvam avaṣṭabhya svādhyāsāpanayaṁ kuru

शब्दार्थ: तमः द्वाभ्यां · तमस को (बाक़ी) दो (रजस-सत्व) से (मिटाया जाता) · रजः सत्त्वात् · रजस को सत्व से · सत्त्वं शुद्धेन नश्यति · सत्व को शुद्ध (चेतना) से · सत्त्वम् अवष्टभ्य · सत्व का सहारा ले कर · स्वाध्यासापनयं कुरु ।

अर्थ: तमस को (रजस और सत्व) दोनों से (मिटाया जाता है), रजस को सत्व से, और सत्व को शुद्ध (चेतना) से। इसलिए सत्व का सहारा ले कर, अपनी ग़लत पहचान हटाने का काम कर।

भावार्थ: गुरु तीन गुणों की एक “ऊपर की ओर सीढ़ी” बताते हैं। सबसे नीचे तमस (आलस्य, सुस्ती), उससे ऊपर रजस (बेचैनी, दौड़ना), उससे ऊपर सत्व (शांति, साफ़पन)। हर ऊपरी गुण नीचे वाले को मिटाता है।

तो काम का क्रम है: पहले तमस (आलस) को रजस+सत्व से हटाओ, कुछ करो, साफ़ रहो। फिर रजस (बेचैनी) को सत्व से हटाओ, स्थिर हो जाएँ। और आख़िर में सत्व को भी शुद्ध चेतना (आत्मा) से पार करो, सत्व अच्छा है, पर वह भी एक “गुण” है, अंत नहीं। बीच में रहते हुए सत्व का “सहारा” लो, पर रुको वहाँ नहीं। और यह पूरा क्रम चलाते हुए, स्वाध्यासापनयं कुरु।

279 · स्वाध्यासापनयं कुरु (3), प्रारब्ध है, शरीर सँभले

प्रारब्धं पुष्यति वपुरिति निश्चित्य निश्चलः ।
धैर्यमालम्ब्य यत्नेन स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ 279 ॥

prārabdhaṁ puṣyati vapur iti niścitya niścalaḥ · dhairyam ālambya yatnena svādhyāsāpanayaṁ kuru

शब्दार्थ: प्रारब्धं पुष्यति वपुः · प्रारब्ध इस शरीर को पाल लेगा · इति निश्चित्य निश्चलः · ऐसा निश्चय कर के, अडिग हो कर · धैर्यम् आलम्ब्य यत्नेन · धीरज ले कर, यत्न से · स्वाध्यासापनयं कुरु।

अर्थ: “प्रारब्ध (पुराने कर्म) इस शरीर को पाल लेगा”, ऐसा निश्चय कर के, अडिग हो कर, धीरज ले कर, यत्न से, अपनी ग़लत पहचान हटाने का काम कर।

भावार्थ: यह श्लोक एक ज़रूरी, बहुत व्यावहारिक चिंता का जवाब देता है: “अगर मैं ख़ुद को सिर्फ़ आत्मा मानूँ, शरीर की चिंता न करूँ, तो शरीर का क्या होंगे?”

गुरु एक भरोसा देते हैं, “प्रारब्ध पुष्यति वपुः”, प्रारब्ध शरीर को पाल लेगा। यानी जो पुराने कर्म आपके साथ इस जन्म तक आए हैं, वे शरीर का इंतज़ाम कर लेंगे। आपको शरीर की “चिंता” से मुक्ति है। यह आलसी होने का न्योता नहीं। शरीर का सामान्य काम चलता रहेगा; बस “मुझे ही सब करना है” वाला डर हट जाए। और इस भरोसे के साथ, “धीरज” और “यत्न”, दोनों साथ, अपने अध्यास को हटाते जाएँ।

280 · स्वाध्यासापनयं कुरु (4), “मैं जीव नहीं। ब्रह्म हूँ”

नाहं जीवः परं ब्रह्मेत्यतद्व्यावृत्तिपूर्वकम् ।
वासनावेगतः प्राप्तस्वाध्यासापनयं कुरु ॥ 280 ॥

nāhaṁ jīvaḥ paraṁ brahmety atad-vyāvṛtti-pūrvakam · vāsanā-vegataḥ prāpta-svādhyāsāpanayaṁ kuru

शब्दार्थ: न अहं जीवः परं ब्रह्म · “मैं जीव नहीं। मैं परम ब्रह्म हूँ” · इति अ-तद्-व्यावृत्ति-पूर्वकम् · “वह नहीं” इस निषेध के साथ · वासना-वेगतः प्राप्त · वासना के वेग से उठी · स्वाध्यासापनयं कुरु।

अर्थ: “मैं जीव नहीं। मैं परम ब्रह्म हूँ”, “जो नहीं” उस निषेध के साथ, वासना के वेग से उठी अपनी ग़लत पहचान को हटाने का काम कर।

भावार्थ: गुरु एक बहुत व्यावहारिक तकनीक देते हैं, द्विध्रुवी-स्मरण। हर बार जब “मैं जीव हूँ” वाली वासना उठे (और वह उठती रहेगी), उसे दो हिस्सों में काटो: पहला, “मैं यह नहीं” (अ-तद्-व्यावृत्ति), दूसरा, “मैं ब्रह्म हूँ” (अहम् ब्रह्म)।

यह नकारात्मक और सकारात्मक, दोनों एक साथ। सिर्फ़ नकारना ख़ालीपन बनाता है; सिर्फ़ “मैं ब्रह्म” बोलना एक नई पहचान का दिखावा बन सकता है। दोनों साथ, एक रोज़, एक हर पल वाला अभ्यास। और गुरु एक ईमानदार शब्द जोड़ देते हैं, “वासना-वेगतः”, वासना के वेग से। वासनाएँ वेग से आती हैं, अचानक; आपका जवाब भी उतना ही तैयार होना चाहिए।

281 · स्वाध्यासापनयं कुरु (5), तीन से जान

श्रुत्या युक्त्या स्वानुभूत्या ज्ञात्वा सार्वात्म्यमात्मनः ।
क्वचिदाभासतः प्राप्तस्वाध्यासापनयं कुरु ॥ 281 ॥

śrutyā yuktyā svānubhūtyā jñātvā sārvātmyam ātmanaḥ · kvacid ābhāsataḥ prāpta-svādhyāsāpanayaṁ kuru

शब्दार्थ: श्रुत्या युक्त्या स्व-अनुभूत्या · श्रुति, युक्ति, और अपने अनुभव से · ज्ञात्वा सार्वात्म्यम् आत्मनः · आत्मा की सब-में-व्यापकता जान कर · क्वचित् आभासतः प्राप्त · कहीं भी आभास से आई · स्वाध्यासापनयं कुरु।

अर्थ: श्रुति, युक्ति, और अपने अनुभव से, आत्मा की सब-में-व्यापकता जान कर, कहीं भी आभास से आ जाने वाली अपनी ग़लत पहचान को हटाने का काम कर।

भावार्थ: गुरु ज्ञान के तीन प्रमाण गिनाते हैं, और तीनों ज़रूरी हैं, एक भी काफ़ी नहीं।

“श्रुति”, शास्त्र-वचन। “युक्ति”, तर्क, अपनी बुद्धि से जाँच। “स्व-अनुभूति”, ख़ुद का अनुभव। बस श्रुति से चलो, तो अंध-विश्वास; बस तर्क से, तो सूखी बौद्धिकता; बस अनुभव से, तो भ्रम। तीनों साथ हों, शास्त्र कहे, तर्क पुष्ट करे, और अनुभव गवाही दे, तभी “सार्वात्म्य” (आत्मा हर जगह है) सच में जाना जाता है। और यह जान कर भी, कहीं-कहीं “आभास” से पुरानी पहचान लौट आती है, हर बार उसे हटाओ।

282 · स्वाध्यासापनयं कुरु (6), एक में ही

अनादानविसर्गाभ्यामीषन्नास्ति क्रिया मुनेः ।
तदेकनिष्ठया नित्यं स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ 282 ॥

anādāna-visargābhyām īṣan nāsti kriyā muneḥ · tad-eka-niṣṭhayā nityaṁ svādhyāsāpanayaṁ kuru

शब्दार्थ: अनादान-विसर्गाभ्याम् · न लेने और न छोड़ने से · ईषत् न अस्ति क्रिया मुनेः · मुनि की क्रिया रत्ती भर नहीं · तद्-एक-निष्ठया नित्यं · उसी एक में टिक कर सदा · स्वाध्यासापनयं कुरु।

अर्थ: न लेने और न छोड़ने से, मुनि की क्रिया रत्ती भर नहीं रहती। उसी एक (आत्मा) में टिक कर, सदा, अपनी ग़लत पहचान हटाने का काम कर।

भावार्थ: गुरु एक बेहद बारीक बात कहते हैं, “न लेना, न छोड़ना।”

ज़्यादातर अध्यात्म दो ध्रुवों के बीच डोलता है, “इसे पाओ” (लेना) और “इसे छोड़ो” (विसर्जन)। पर असली मुनि दोनों के बीच ठहर जाता है, न दौड़ कर कुछ हासिल करना है, न ज़ोर लगा कर कुछ धकेलना है। बस “तद्-एक-निष्ठा”, उस एक (आत्मा) में टिकाव। यह सबसे ऊँचा अभ्यास है, और सबसे विरोधाभासी: सबसे बड़ा “काम” है कुछ भी न करना, सिर्फ़ टिकना। और इस टिकाव में, अध्यास अपने आप हटने लगता है।

283 · स्वाध्यासापनयं कुरु (7), महावाक्य की पकड़

तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थब्रह्मात्मैकत्वबोधतः ।
ब्रह्मण्यात्मत्वदार्ढ्याय स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ 283 ॥

tat-tvam-asy-ādi-vākyottha-brahmātmaikatva-bodhataḥ · brahmaṇy ātmatva-dārḍhyāya svādhyāsāpanayaṁ kuru

शब्दार्थ: “तत् त्वम् असि” आदि वाक्य से उठे · ब्रह्म-आत्म-एकत्व-बोधतः · ब्रह्म-आत्मा की एकता के बोध से · ब्रह्मणि आत्मत्व-दार्ढ्याय · ब्रह्म में अपनी आत्मा-पहचान को पक्का करने के लिए · स्वाध्यासापनयं कुरु।

अर्थ: “तत् त्वम् असि” आदि महावाक्यों से उठे ब्रह्म-आत्मा-एकत्व के बोध के सहारे, ब्रह्म में अपनी “आत्मा-पहचान” को पक्का करने के लिए, अपनी ग़लत पहचान हटाने का काम कर।

भावार्थ: गुरु महावाक्य को सीधे एक काम के औज़ार में बदल देते हैं। “तत् त्वम् असि”, समझ ली गई बात, को सिर पर बैठा कर मत रखो; उसे काम पर लगाओ।

“दार्ढ्य”, पक्कापन। महावाक्य का बोध हुआ, अब उसे “पक्का” करना है, बार-बार, हर रोज़, हर अध्यास के मौक़े पर। जब भी पुरानी पहचान उठे, याद आए, “नहीं। तत् त्वम् असि।” और यह दोहराव सूखा रटना नहीं। हर बार वह बोध ताज़ा होता जाता है, और एक दिन वह “पक्का” हो जाता है, इतना कि पुरानी पहचान को उठने की जगह ही नहीं मिलती।

284 · स्वाध्यासापनयं कुरु (8), पूरे विलय तक

अहंभावस्य देहेऽस्मिन्निःशेषविलयावधि ।
सावधानेन युक्तात्मा स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ 284 ॥

ahaṁ-bhāvasya dehe’smin niḥśeṣa-vilayāvadhi · sāvadhānena yuktātmā svādhyāsāpanayaṁ kuru

शब्दार्थ: अहं-भावस्य देहे अस्मिन् · इस शरीर में “मैं” वाले भाव का · निःशेष-विलय-अवधि · पूरी तरह विलय हो जाने की हद तक · सावधानेन युक्त-आत्मा · सावधानी से, सधे मन से · स्वाध्यासापनयं कुरु।

अर्थ: इस शरीर में “मैं” वाले भाव के पूरी तरह विलय हो जाने तक, सावधानी से, सधे मन से, अपनी ग़लत पहचान हटाने का काम कर।

भावार्थ: गुरु बहुत साफ़ कह देते हैं कि कब तक यह काम चलेगा, “निःशेष-विलय-अवधि”, रत्ती भर भी न बचे, तब तक।

यह एक चेतावनी भी है, और एक भरोसा भी। चेतावनी, काम बीच में मत छोड़ना; “थोड़ी समझ आ गई” से रुक मत जाना; पूरी तरह जब तक “मैं यह शरीर हूँ” वाला कण भर भी न बचे, तब तक काम जारी। और भरोसा, यह एक “अंतिम” है; अंतहीन नहीं। एक दिन वह “विलय” पूरा होता है। और शब्द “सावधानेन”, सावधानी से। यह कोई कठोर अनुशासन नहीं। एक नर्म जागरूकता है। आँख खुली, मन साफ़, ध्यान वहीं, और काम होता रहे।

285 · स्वाध्यासापनयं कुरु (9), जब तक जीव-जगत दिखता है

प्रतीतिर्जीवजगतोः स्वप्नवद्भाति यावता ।
तावन्निरन्तरं विद्वन्स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ 285 ॥

pratītir jīva-jagatoḥ svapnavad bhāti yāvatā · tāvan nirantaraṁ vidvan svādhyāsāpanayaṁ kuru

शब्दार्थ: प्रतीतिः जीव-जगतोः · जीव और जगत की प्रतीति · स्वप्न-वत् भाति यावत् · सपने की तरह जब तक दिखती है · तावत् निरन्तरं विद्वन् · तब तक लगातार, हे विद्वान · स्वाध्यासापनयं कुरु।

अर्थ: जब तक जीव और जगत की प्रतीति सपने की तरह दिखती रहती है, तब तक लगातार, हे विद्वान, अपनी ग़लत पहचान हटाने का काम कर।

भावार्थ: टेक का नौवाँ और आख़िरी श्लोक, और यहाँ गुरु एक कसौटी देते हैं, काम कब पूरा है, कैसे जानें।

जब तक जीव और जगत “सपने की तरह” भी दिखते हैं, यानी उन्हें असली अनुभव के स्तर पर भी कुछ अलगाव से देखा जा रहा है, तब तक काम जारी। केवल जब वह “दिखना” भी हट जाए, जब जीव-जगत और ब्रह्म में कोई दरार न बचे, तब काम पूरा। यह बहुत ऊँची कसौटी है, पर ईमानदार। और एक प्यारा संबोधन, “विद्वन्”, हे विद्वान। गुरु अपने शिष्य को बौद्धिक मान कर बात कर रहे हैं, उसकी समझ पर भरोसा कर के। नौ बार वही टेक, नौ कोणों से, और एक बार आख़िर में, बस नियम के साथ: रुकना नहीं।

286 · नींद, गपशप, आवाज़, किसी को मौक़ा नहीं

निद्राया लोकवार्तायाः शब्दादेरपि विस्मृतेः ।
क्वचिन्नावसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि ॥ 286 ॥

nidrāyā loka-vārtāyāḥ śabdāder api vismṛteḥ · kvacin nāvasaraṁ dattvā cintayātmānam ātmani

शब्दार्थ: निद्रायाः लोक-वार्तायाः · नींद की, गपशप की · शब्द-आदेः · आवाज़ आदि की · अपि विस्मृतेः · और भूल जाने की · क्वचित् न अवसरं दत्त्वा · कहीं मौक़ा न दे कर · चिन्तय आत्मानम् आत्मनि · आत्मा को आत्मा में ही चिंतन कर।

अर्थ: नींद, गपशप, आवाज़ आदि का सहारा ले कर भूल जाने का, कहीं भी मौक़ा न दे कर, आत्मा को अपने ही भीतर चिंतन कर।

भावार्थ: गुरु एक व्यावहारिक चेतावनी देते हैं, चार बातों से सावधान रहो: नींद (आलस), गपशप (समाज में बह जाना), बाहरी आवाज़ें (मन के बहाव), और सबसे ख़तरनाक, “विस्मृति” (भूल जाना)।

विस्मृति सबसे चालाक है, अचानक एक पल आता है, और बात भीतर से उठ जाती है, फिर कुछ देर तक याद नहीं आती। फिर वही पुरानी पहचान चलने लगती है। गुरु कहते हैं, कहीं “मौक़ा न दे” इन चारों को। यह तीखा है, पर वजह है, एक बार ज़ंजीर का एक छल्ला ढीला होने दो, पूरी ज़ंजीर बँधने लगती है। और “आत्मा को आत्मा में चिंतन” करो, कोई बाहरी ध्यान-वस्तु नहीं। बस आत्मा अपने आप में।

287 · यह शरीर, चांडाल की तरह दूर रख

मातापित्रोर्मलोद्भूतं मलमांसमायां वपुः ।
त्यक्त्वा चाण्डालवद्दूरं ब्रह्मीभूय कृती भव ॥ 287 ॥

mātā-pitror malodbhūtaṁ mala-māṁsa-māyāṁ vapuḥ · tyaktvā cāṇḍālavad dūraṁ brahmī-bhūya kṛtī bhava

शब्दार्थ: माता-पित्रोः मल-उद्भूतं · माँ-बाप के मल (मलिन तत्वों) से उपजा · मल-मांस-मायां वपुः · मल और मांस वाला यह शरीर · त्यक्त्वा चाण्डाल-वत् दूरं · चांडाल की तरह दूर छोड़ कर · ब्रह्मी-भूय कृती भव · ब्रह्म-रूप हो कर कृतार्थ बन।

अर्थ: माँ-बाप के मल से उपजे, मल और मांस वाले इस शरीर को, चांडाल की तरह दूर छोड़ कर, ब्रह्म-रूप हो कर कृतार्थ बन।

भावार्थ: यह श्लोक सबसे तीखे शब्दों में से कुछ इस्तेमाल करता है, “चाण्डाल-वत्”, चांडाल की तरह। यह आज की संवेदना में कठोर लगता है, और इसे ठीक से समझना ज़रूरी है।

गुरु शरीर से “नफ़रत” नहीं सिखा रहे, न ही किसी जाति-समूह को नीचा दिखा रहे, “चांडाल-वत्” यहाँ बस “उस चीज़ की तरह जिसे आप पारंपरिक रूप से दूर रखते हो” का संकेत है, उस ज़माने की भाषा में। असली बात पकड़िए: शरीर के साथ की हद से ज़्यादा पहचान को छोड़ना, उसे “मैं” मानना बंद करना। और दूसरी पंक्ति में संतुलन, “ब्रह्मी-भूय कृती भव”, ब्रह्म-रूप हो कर कृतार्थ बन। तो काम सिर्फ़ छोड़ना नहीं। कहीं और बसना भी। और “कृती” शब्द प्यारा है, कृत-कृत्य, जिसका काम पूरा हो गया, जो सफल हुआ।

288 · घटाकाश का महाकाश में

घटाकाशं महाकाश इवात्मानं परात्मनि ।
विलाप्याखण्डभावेन तूष्णीं भव सदा मुने ॥ 288 ॥

ghaṭākāśaṁ mahākāśa ivātmānaṁ parātmani · vilāpyākhaṇḍa-bhāvena tūṣṇīṁ bhava sadā mune

शब्दार्थ: घट-आकाशं महा-आकाशे इव · घड़े का आकाश जैसे महा-आकाश में · आत्मानं परात्मनि · आत्मा को परम-आत्मा में · विलाप्य अखण्ड-भावेन · अखंड भाव से घोल कर · तूष्णीं भव सदा मुने · हे मुनि, सदा शांत हो।

अर्थ: जैसे घड़े का आकाश महा-आकाश में [घुल जाता है], वैसे ही अपने आत्मा को परम-आत्मा में अखंड भाव से घोल कर, हे मुनि, सदा शांत हो।

भावार्थ: भाग 5 (श्लोक 134) में आई घड़े-आकाश की तस्वीर यहाँ अपने पूरे रंग में लौटती है। एक घड़ा है, उसके भीतर थोड़ा “घड़े का आकाश” है, सीमित, घड़े के आकार का। बाहर असीम “महा-आकाश” है।

दोनों आकाश असल में एक हैं, घड़ा एक झूठी दीवार है। घड़ा फूटे, या आप बस उस दीवार को “देखना” बंद करो, और भीतर वाला आकाश बाहर वाले में “घुल” जाता है, या यूँ कहो, पता चलता है वह कभी अलग था ही नहीं। आपको ख़ुद को कुछ “बनना” नहीं है; बस यह झूठी दीवार छोड़नी है, और आप महा-आकाश में हैं, असल में हमेशा से थे। और गुरु एक प्यारा अंत देते हैं, “तूष्णीं भव”, चुप हो जा। शब्द ख़त्म, सिद्धांत ख़त्म, बस वह विशाल मौन।

289 · ब्रह्मांड भी, पिंडांड भी, छोड़ दो

स्वप्रकाशमधिष्ठानं स्वयंभूय सदात्मना ।
ब्रह्माण्डमपि पिण्डाण्डं त्यज्यतां मलभाण्डवत् ॥ 289 ॥

sva-prakāśam adhiṣṭhānaṁ svayaṁ-bhūya sad-ātmanā · brahmāṇḍam api piṇḍāṇḍaṁ tyajyatāṁ mala-bhāṇḍavat

शब्दार्थ: स्व-प्रकाशम् अधिष्ठानं · ख़ुद-प्रकाश आधार · स्वयं-भूय सद्-आत्मना · सद्-आत्मा रूप में स्वयं हो कर · ब्रह्माण्डम् अपि पिण्ड-अण्डं · ब्रह्मांड को भी, पिंडांड (शरीर) को भी · त्यज्यतां मल-भाण्ड-वत् · मैल के बर्तन की तरह छोड़ दे।

अर्थ: ख़ुद-प्रकाश आधार बन, सद्-आत्मा रूप में स्वयं हो कर, ब्रह्मांड और इस पिंडांड (शरीर) को, मैल के बर्तन की तरह छोड़ दे।

भावार्थ: गुरु एक बेहद मज़बूत बात कहते हैं, सिर्फ़ शरीर (पिंडांड) नहीं। “ब्रह्मांड भी” छोड़ दो।

यह चौंकाने वाला है, क्योंकि अब तक छोड़ने की बात बस “अनात्मा” की थी। पर ध्यान दीजिए, गुरु ब्रह्मांड और शरीर, दोनों को “मल-बर्तन” कह कर एक साथ रख देते हैं। यानी जिसे हम “बड़ा” (ब्रह्मांड) और “छोटा” (शरीर) मान कर अलग-अलग करते हैं, वे एक ही “अनात्मा” के दो आकार हैं। दोनों छूटें, और “ख़ुद-प्रकाश आधार” बन जाएँ। यह कोई दार्शनिक छँटाई नहीं। यह सबसे साहसी कदम है। न ख़ुद को “इस छोटे शरीर” में, न “इस विशाल ब्रह्मांड” में पहचानो। आप वह हैं जिसमें ये दोनों आते-जाते हैं।

290 · केवल हो जा

चिदात्मनि सदानन्दे देहारूढामहंधियम् ।
निवेश्य लिङ्गमुत्सृज्य केवलो भव सर्वदा ॥ 290 ॥

cid-ātmani sadānande dehārūḍhām ahaṁ-dhiyam · niveśya liṅgam utsṛjya kevalo bhava sarvadā

शब्दार्थ: चित्-आत्मनि सदानन्दे · चित्-आत्मा सदानन्द में · देह-आरूढाम् अहं-धियम् · शरीर पर चढ़ी “मैं” वाली बुद्धि · निवेश्य · बसा कर · लिङ्गम् उत्सृज्य · सूक्ष्म-शरीर की पहचान को त्याग कर · केवलः भव सर्वदा · सदा “केवल” बन।

अर्थ: चित्-आत्मा सदानन्द में शरीर पर चढ़ी “मैं” वाली बुद्धि को बसा कर, सूक्ष्म-शरीर की पहचान को त्याग कर, सदा “केवल” हो जा।

भावार्थ: एक शब्द इस श्लोक का सब कुछ है, “केवल।” केवल का मतलब है: अकेला, बिना किसी और के, बिना दूसरे के, शुद्ध।

यह अकेलापन (loneliness) नहीं। अद्वैत की एकत्व-स्थिति है। जब “मैं शरीर हूँ” वाली बुद्धि चित्-आत्मा (सदानन्द) में जा कर बस जाए, और सूक्ष्म शरीर (लिंग) से भी “मैं”-संबंध छूट जाए, तब जो बचता है, वह “केवल” है। कोई द्वैत नहीं। कोई “मैं और कोई और” नहीं। बस एक। यह अद्वैत वेदान्त का सबसे अंतिम शब्द है, और इसी से सांख्य-योग का “कैवल्य” (मुक्ति) जुड़ता है।

291 · दर्पण में नगर, और “वह मैं हूँ”

यत्रैष जगदाभासो दर्पणान्तः पुरं यथा ।
तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ 291 ॥

yatraiṣa jagad-ābhāso darpaṇāntaḥ puraṁ yathā · tad brahmāham iti jñātvā kṛta-kṛtyo bhaviṣyasi

शब्दार्थ: यत्र एष जगद्-आभासः · जिसमें यह जगत-आभास · दर्पण-अन्तः पुरं यथा · दर्पण के भीतर नगर की तरह · “तत् ब्रह्म अहम्” इति ज्ञात्वा · “वह ब्रह्म मैं हूँ” जान कर · कृत-कृत्यः भविष्यसि · कृत-कृत्य हो जाएगा।

अर्थ: जिसमें यह जगत-आभास दर्पण के भीतर नगर की तरह [दिखता है], “वह ब्रह्म मैं हूँ”, ऐसा जान कर आप कृत-कृत्य हैं जाएगा।

भावार्थ: एक अनोखी उपमा, दर्पण में बसा नगर। एक बड़े दर्पण में एक पूरा शहर दिखता है, पेड़, मकान, लोग। पर दर्पण के “भीतर” क्या है? कुछ नहीं। दर्पण बस एक सतह है, और शहर वहाँ “लगता” है।

गुरु कहते हैं, यह पूरा जगत-आभास उसी एक “दर्पण” पर दिखता है, और वह दर्पण ब्रह्म है। और “वह ब्रह्म मैं हूँ”, जान लेने पर आप “कृत-कृत्य”, काम पूरा। इस तस्वीर की सुंदरता यह है कि दर्पण को नगर “गंदा” नहीं करता, नगर के बदलने से दर्पण नहीं बदलता, और नगर वहाँ “होते हुए भी” वहाँ नहीं होता। आप वह दर्पण हैं, सब इसमें दिखे, पर आप अछूते।

292 · अभिनेता का वेश उतारना

यत्सत्यभूतं निजरूपमाद्यं चिदद्वयानन्दमरूपमक्रियम् ।
तदेत्य मिथ्यावपुरुत्सृजेत शैलूषवद्वेषमुपात्तमात्मनः ॥ 292 ॥

yat satya-bhūtaṁ nija-rūpam ādyaṁ cid-advayānandam arūpam akriyam · tad etya mithyā-vapur utsṛjeta śailūṣavad veṣam upāttam ātmanaḥ

शब्दार्थ: सत्य-भूतं निज-रूपम् आद्यं · सत्य-रूप, अपना मूल रूप · चित्-अद्वय-आनन्दम् · चेतन-अद्वय-आनंद · अरूपम् अक्रियम् · निराकार, क्रिया-रहित · तत् एत्य · उसमें पहुँच कर · मिथ्या-वपुः उत्सृजेत · झूठे शरीर को छोड़ दे · शैलूष-वत् वेषम् उपात्तम् · अभिनेता की तरह अपने पर लिए वेश को।

अर्थ: जो सत्य-रूप है, अपना मूल रूप, चेतन-अद्वय-आनंद, निराकार, क्रिया-रहित, उसमें पहुँच कर, झूठे शरीर को छोड़ दे, जैसे अभिनेता अपने पर लिया हुआ वेश उतार देता है।

भावार्थ: एक बेहद सुंदर उपमा, अभिनेता।

एक अच्छा अभिनेता मंच पर पूरी तरह किरदार में डूब जाता है, राजा बनता है तो राजा, भिखारी बनता है तो भिखारी। पर पर्दे के पीछे जा कर वह वेश उतार देता है, और याद रख लेता है कि “मैं अभिनेता हूँ, वह सिर्फ़ एक भूमिका थी।” गुरु कहते हैं, आपका यह शरीर एक वेश है, एक भूमिका। उसे ईमानदारी से निभाओ, पर मंच पीछे छोड़ने पर, असली स्वरूप में पहुँच कर, उसे अभिनेता की तरह उतार दो। यह बात मृत्यु के डर पर सीधा वार करती है: मृत्यु तो बस वेश उतरना है, आपका कुछ नहीं जाता।

293 · क्षणिक “मैं”, सब कुछ कैसे जानेगा

सर्वात्मना दृश्यमिदं मृषैव नैवाहमर्थः क्षणिकत्वदर्शनात् ।
जानाम्यहं सर्वमिति प्रतीतिः कुतोऽहमादेः क्षणिकस्य सिध्येत् ॥ 293 ॥

sarvātmanā dṛśyam idaṁ mṛṣaiva naivāham-arthaḥ kṣaṇikatva-darśanāt · jānāmy ahaṁ sarvam iti pratītiḥ kuto’hamādeḥ kṣaṇikasya sidhyet

शब्दार्थ: सर्वात्मना दृश्यम् इदं मृषा एव · पूरी तरह यह दृश्य झूठा ही है · न एव अहम्-अर्थः · “मैं” का जो अर्थ ([पुराना समझा हुआ]) था, वह नहीं · क्षणिकत्व-दर्शनात् · क्षणिक होने के दर्शन से · “जानामि अहं सर्वम्” इति प्रतीतिः · “मैं सब जानता हूँ”, यह अनुभव · कुतः अहम्-आदेः क्षणिकस्य · कैसे क्षणिक “मैं” आदि का होंगे।

अर्थ: पूरी तरह यह दृश्य झूठा ही है, और न ही [शरीर वाला] “मैं” का अर्थ असली है, क्योंकि वह क्षणिक दिखता है। “मैं सब जानता हूँ”, यह अनुभव कैसे क्षणिक “मैं” आदि का होंगे?

भावार्थ: गुरु एक तीखा तार्किक सबूत देते हैं असली “मैं” का। शरीर/मन वाला “मैं” क्षणिक है, हर पल बदलता है, हर रात नींद में थमता है, मरने पर ख़त्म।

पर “मैं सब जानता हूँ”, “मैं वही हूँ जो कल था, आज हूँ”, ये अनुभव हैं, और ये क्षणिक “मैं” के नहीं हो सकते, क्योंकि क्षणिक चीज़ “सब” को कैसे जानेगी, या समय के पार अपनी पहचान कैसे रखेगी? तो कोई गहरा, अक्षणिक “मैं” ज़रूर है, और वही असली है।

294 · सुषुप्ति में भी जो था

अहंपदार्थस्त्वहमादिसाक्षी नित्यं सुषुप्तावपि भावदर्शनात् ।
ब्रूते ह्यजो नित्य इति श्रुतिः स्वयं तत्प्रत्यगात्मा सदसद्विलक्षणः ॥ 294 ॥

ahaṁ-padārthas tv aham-ādi-sākṣī nityaṁ suṣuptāv api bhāva-darśanāt · brūte hy ajo nitya iti śrutiḥ svayaṁ tat pratyag-ātmā sad-asad-vilakṣaṇaḥ

शब्दार्थ: अहं-पदार्थः अहम्-आदि-साक्षी · “मैं” का असली अर्थ, “मैं” आदि का साक्षी · नित्यं सुषुप्तौ अपि भाव-दर्शनात् · सुषुप्ति में भी, उसकी मौजूदगी से, नित्य · ब्रूते “अजः नित्यः” इति श्रुतिः · श्रुति कहती है “अजन्मा, नित्य” · तत् प्रत्यग्-आत्मा सद्-असद्-विलक्षणः · वह प्रत्यग्-आत्मा सत्-असत् दोनों से अलग।

अर्थ: “मैं” का असली अर्थ है, “मैं” आदि का साक्षी; और वह नित्य है, क्योंकि सुषुप्ति में भी उसकी मौजूदगी है। श्रुति ख़ुद कहती है, “अजन्मा, नित्य।” वह प्रत्यग्-आत्मा सत् और असत्, दोनों से अलग है।

भावार्थ: श्लोक 293 की दलील आगे, और गुरु एक रोज़ का सबूत देते हैं: गहरी नींद (भाग 4, श्लोक 121; भाग 8, श्लोक 234 की याद)।

गहरी नींद में “अहंकार” वाला छोटा “मैं” थम जाता है। पर “कोई” वहाँ रहा, वरना सुबह “मुझे अच्छी नींद आई” किसने जाना? वह “कोई”, साक्षी, असली “मैं”, सुषुप्ति में भी मौजूद था। और इसी वजह से वह “नित्य” है, अमर है। श्रुति ने इसे “अजः नित्यः” कहा। इसे ख़ुद ही, हर रात, सिद्ध करते हैं।

295 · बदलाव का जानने वाला, स्वयं अबदला

विकारिणां सर्वविकारवेत्ता नित्याविकारो भवितुं समर्हति ।
मनोरथस्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटं पुनः पुनर्दृष्टमसत्त्वमेतयोः ॥ 295 ॥

vikāriṇāṁ sarva-vikāra-vettā nityāvikāro bhavituṁ samarhati · manoratha-svapna-suṣuptiṣu sphuṭaṁ punaḥ punar dṛṣṭam asattvam etayoḥ

शब्दार्थ: विकारिणां सर्व-विकार-वेत्ता · बदलने वालों के सारे बदलावों का जानने वाला · नित्य-अविकारः भवितुं समर्हति · नित्य अविकारी ही हो सकता है · मनोरथ-स्वप्न-सुषुप्तिषु · दिवास्वप्न, सपना, सुषुप्ति में · पुनः पुनः दृष्टम् असत्त्वम् एतयोः · इन दोनों (“मैं” और जगत) का असत्त्व बार-बार देखा गया है।

अर्थ: बदलने वालों के सारे बदलावों का जानने वाला, नित्य अविकारी ही हो सकता है। और दिवास्वप्न, सपना, सुषुप्ति में, इन दोनों (“मैं” और जगत) का असत्त्व बार-बार देखा गया है।

भावार्थ: गुरु एक तार्किक सिद्धांत देते हैं, एक नदी के बहाव को देखने के लिए, देखने वाला किनारे पर खड़ा होना चाहिए। अगर देखने वाला ख़ुद बहता हैं, तो वह “बहाव” को नहीं देख पाएगा।

सारे बदलाव, मन, शरीर, संसार, एक नदी हैं। इन्हें “देखने वाला” कोई स्थिर है, अबदला है, वरना देख नहीं पाता। यही असली “मैं” है। और रोज़ के तीन अनुभव, दिवास्वप्न (मन में बने काल्पनिक दृश्य), सपना, और गहरी नींद, हर एक में “छोटा मैं” और “जगत” की पकड़ ढीली होती है, और साक्षी फिर भी रहता है। तो असली “मैं” मिल चुका है, हर रोज़, हर रात।

296 · मांस-पिंड में अभिमान छोड़

अतोऽभिमानं त्यज मांसपिण्डे पिण्डाभिमानिन्यपि बुद्धिकल्पिते ।
कालत्रयाबाध्यमखण्डबोधं ज्ञात्वा स्वमात्मानमुपैहि शान्तिम् ॥ 296 ॥

ato’bhimānaṁ tyaja māṁsa-piṇḍe piṇḍābhimāniny api buddhi-kalpite · kāla-trayābādhyam akhaṇḍa-bodhaṁ jñātvā svam ātmānam upaihi śāntim

शब्दार्थ: अभिमानं त्यज मांस-पिण्डे · इस मांस-पिंड में अभिमान छोड़ · पिण्ड-अभिमानिनि अपि बुद्धि-कल्पिते · और पिंड-अभिमान वाली, बुद्धि से गढ़ी (अहं-भावना) में भी · काल-त्रय-अबाध्यम् अखण्ड-बोधं · तीनों कालों में न मिटने वाला, अखंड बोध · ज्ञात्वा स्वम् आत्मानम् उपैहि शान्तिम् · अपने आत्मा को जान कर, शांति पा।

अर्थ: इसलिए इस मांस-पिंड में अभिमान छोड़, और जो पिंड पर अभिमान करती है, उस बुद्धि-कल्पित अहं-भावना में भी। तीनों कालों में न मिटने वाले अखंड बोध को, अपने आत्मा को जान कर, शांति पा।

भावार्थ: गुरु एक बहुत बारीक बात करते हैं, दो परतों में अभिमान छोड़ना है।

एक परत, मांस-पिंड (शरीर) में। यह आसान दिखती है, पर ज़िद्दी है। दूसरी, गहरी परत, “जो पिंड पर अभिमान करती है, वह बुद्धि-कल्पित अहं-भावना।” यानी “मैं यह शरीर हूँ” वाली समझ ख़ुद बुद्धि की एक रचना है, और उस रचना से भी अभिमान छोड़ना है। बस शरीर से नहीं। उस “मैं हूँ शरीर” वाली पहचान बनाने वाली प्रक्रिया से भी। यह दूसरी परत ज़्यादा सूक्ष्म है। और यह जान कर, “त्रिकाल-अबाध्य अखंड बोध”, तीनों कालों में न मिटने वाले अखंड बोध को, असली “मैं” को जान, शांति आती है।

297 · सब पहचानें छोड़, अखंड सुख हो जा

त्यजाभिमानं कुलगोत्रनाम रूपाश्रमेष्वार्द्रशवाश्रितेषु ।
लिङ्गस्य धर्मानपि कर्तृतादिंस् त्यक्ता भवाखण्डसुखस्वरूपः ॥ 297 ॥

tyajābhimānaṁ kula-gotra-nāma rūpāśrameṣv ārdra-śavāśriteṣu · liṅgasya dharmān api kartṛtādiṁs tyaktvā bhavākhaṇḍa-sukha-svarūpaḥ

शब्दार्थ: त्यज अभिमानं कुल-गोत्र-नाम · कुल, गोत्र, नाम में अभिमान छोड़ · रूप-आश्रमेषु · रूप, आश्रम में · आर्द्र-शव-आश्रितेषु · “गीले शव” (शरीर) पर टिकी इन सब चीज़ों में · लिङ्गस्य धर्मान् अपि · सूक्ष्म-शरीर के धर्म भी · कर्तृता-आदिन् त्यक्त्वा · कर्तापन आदि छोड़ कर · भव अखण्ड-सुख-स्वरूपः · अखंड-सुख-स्वरूप बन जा।

अर्थ: कुल, गोत्र, नाम, रूप, आश्रम में अभिमान छोड़, ये सब “गीले शव” (शरीर) पर टिकी पहचानें हैं। सूक्ष्म-शरीर के धर्म, कर्तापन आदि, भी छोड़ कर, अखंड-सुख-स्वरूप बन जा।

भावार्थ: यह भाग 10 का समापन है, और एक तीखा, साफ़ शब्द है, “आर्द्र-शव”, गीला शव। यह शरीर। शव से उठती धारणाएँ, कुल, गोत्र, नाम, रूप, आश्रम, सब झूठी हैं, क्योंकि उनकी बुनियाद यह “शव” है।

यह कठोर बात है, और गुरु यहाँ जान-बूझ कर एक झटका देते हैं। हम पूरी ज़िंदगी कुल, जाति, नाम, सम्मान, पद बचाने में बिता देते हैं, और ये सब जिस “गीले शव” (एक दिन सच में जो शव हो जाएगा) पर टिके हैं, वह ख़ुद हमारा असली “मैं” नहीं। और सूक्ष्म शरीर वाला “कर्तापन” भी छोड़, “मैं ही करता हूँ” वाला भाव। यह सब छोड़ कर आप “अखंड-सुख-स्वरूप”, बिना दरार का सुख, हो जाएँ। अगला भाग बताएगा कि जिसने यह कर लिया, वह जीवन्मुक्त कैसा दिखता है।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना: भाग 11 · जीवन्मुक्ति, पुरानी पहचान छूट गई, वासनाएँ पतली हो गईं, अध्यास हट गया। तो अब वह इंसान कैसा दिखता है, जो “जीते-जी मुक्त” है? गुरु एक बहुत सुंदर चित्र खींचते हैं।

और एक सवाल जेब में रखिए: नौ बार वही टेक आई, “स्वाध्यासापनयं कुरु।” आज एक “अध्यास” पकड़िए, एक पहचान जिसे आप अनजाने में “मैं” मानते हैं (पेशा, रिश्ता, उपलब्धि, कोई भी)। एक पल के लिए उसे थोड़ा पीछे रखिए, और देखिए कि उसके पीछे कौन है।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, verbatim।

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आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-22