विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 4 · अनात्मा, शरीर, मन, और माया · श्लोक 72-123
शिष्य ने पूछा था, अनात्मा क्या है, आत्मा क्या है? गुरु सबसे ज़मीनी सिरे से जवाब शुरू करते हैं: यह शरीर। और फिर परत-दर-परत, इन्द्रियाँ, मन, प्राण, माया, हर उस चीज़ को “आप नहीं हो” कह कर एक तरफ़ रख देते हैं।
पहले एक बात
गुरु अब शिष्य के सवाल का असली जवाब शुरू करते हैं, और एक चतुर तरीक़े से। “आत्मा क्या है” यह सीधे बताने के बजाय, वे पहले “आत्मा क्या नहीं है” दिखाते हैं। एक-एक चीज़ उठाते हैं, उसे ध्यान से देखते हैं, और कहते हैं, “यह आप नहीं हैं, यह एक तरफ़ रखो।”
यह तरीक़ा “नेति-नेति” कहलाता है, “यह नहीं। यह नहीं।” इसे एक खेल की तरह खेलिए। मूर्ति बनाने वाला पत्थर से वही हटाता है जो मूर्ति नहीं है; जो बचता है, वही मूर्ति है। इस भाग में गुरु वही कर रहे हैं, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, प्राण, माया, तीनों गुण, एक-एक कर के हटाते जाते हैं।
और भाग के अंत में (श्लोक 123) वे एक झाड़ू मार कर पूरा ढेर समेट देते हैं: यह सब, शरीर से ले कर माया तक, अनात्मा है, रेगिस्तान की मरीचिका जैसा। उसके बाद, भाग 5 में, जो बचेगा वही असली “आप” है।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। यह भाग तीन हिस्सों में बहता है, स्थूल शरीर और विषयों का ख़तरा (72-91), इन्द्रियाँ-मन-प्राण यानी सूक्ष्म शरीर (92-107), और माया, तीन गुण, कारण शरीर (108-123)। असली खंभे: 76 (पाँच जानवर), 99-100 (आत्मा असंग है), 109 (माया, अनिर्वचनीय), 123 (सब अनात्मा है)। हर श्लोक पर anchor है।
72 · यह शरीर, किससे बना
मज्जास्थिमेदःपलरक्तचर्म त्वगाह्वयैर्धातुभिरेभिरन्वितम् ।
पादोरुवक्षोभुजपृष्ठमस्तकैः अङ्गैरुपाङ्गैरुपयुक्तमेतत् ॥ 72 ॥
majjāsthi-medaḥ-pala-rakta-carma tvag-āhvayair dhātubhir ebhir anvitam · pādoru-vakṣo-bhuja-pṛṣṭha-mastakaiḥ aṅgair upāṅgair upayuktam etat
शब्दार्थ: मज्जा-अस्थि-मेदः-पल-रक्त-चर्म-त्वक् · मज्जा, हड्डी, चर्बी, मांस, ख़ून, चमड़ी, त्वचा · धातुभिः अन्वितम् · इन धातुओं से बना · पाद-ऊरु-वक्षः-भुज-पृष्ठ-मस्तकैः · पैर, जाँघ, छाती, बाँह, पीठ, सिर · अङ्ग-उपाङ्गैः उपयुक्तम् · अंगों-उपांगों से युक्त।
अर्थ: यह शरीर मज्जा, हड्डी, चर्बी, मांस, ख़ून, चमड़ी और त्वचा, इन धातुओं से बना है, और पैर, जाँघ, छाती, बाँह, पीठ, सिर, इन अंगों-उपांगों से युक्त है।
भावार्थ: गुरु जवाब की शुरुआत सबसे ठोस, सबसे पहचानी हुई चीज़ से करते हैं, यह शरीर। और देखिए वे कैसे शुरू करते हैं: कोई कविता नहीं। सिर्फ़ एक सूची। हड्डी, मांस, ख़ून, चमड़ी।
यह जान-बूझ कर है। हम शरीर को “मैं” मानते हैं, उससे लिपटे रहते हैं। गुरु पहले उसे उसके हिस्सों में खोल कर रख देते हैं, मानो कह रहे हों, “ध्यान से देखो, यह आख़िर है क्या।” समझ की शुरुआत यहीं से होती है: जिसे “मैं” कहते आए हैं, उसे एक बार ठहर कर, साफ़ नज़र से देख लो।
73 · “मैं और मेरा” का अड्डा
अहंममेतिप्रथितं शरीरं मोहास्पदं स्थूलमितीर्यते बुधैः ।
नभोनभस्वद्दहनाम्बुभूमयः सूक्ष्माणि भूतानि भवन्ति तानि ॥ 73 ॥
aham-mametiprathitaṁ śarīraṁ mohāspadaṁ sthūlam itīryate budhaiḥ · nabho-nabhasvad-dahanāmbu-bhūmayaḥ sūkṣmāṇi bhūtāni bhavanti tāni
शब्दार्थ: अहम्-मम-इति-प्रथितं · “मैं” और “मेरा” से जुड़ा हुआ · मोह-आस्पदं · मोह का अड्डा · स्थूलम् इति ईर्यते · “स्थूल” कहा जाता है · बुधैः · ज्ञानियों द्वारा · नभः-नभस्वत्-दहन-अम्बु-भूमयः · आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी · सूक्ष्माणि भूतानि · सूक्ष्म तत्व।
अर्थ: “मैं” और “मेरा” से जुड़ा यह शरीर, मोह का अड्डा है, ज्ञानी इसे “स्थूल” कहते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ये पाँच सूक्ष्म तत्व हैं।
भावार्थ: गुरु शरीर को एक ख़ास नाम देते हैं, “मोह का अड्डा।” यानी वह जगह जहाँ से सारी ग़लतफ़हमी शुरू होती है।
“मैं” (मैं यह शरीर हूँ) और “मेरा” (मेरा घर, मेरा परिवार, मेरी चीज़ें), इन दोनों की जड़ यहीं है। एक बार आपने शरीर को “मैं” मान लिया, तो “मेरा” की पूरी दुनिया अपने आप खड़ी हैं जाती है। तो काम की पहली ईंट यहीं है। और गुरु साथ में दूसरी बात भी छेड़ देते हैं, यह स्थूल शरीर पाँच सूक्ष्म तत्वों से बना है। अगला श्लोक उसे खोलेगा।
74 · तत्व, शरीर, और पाँच विषय
परस्परांशैर्मिलितानि भूत्वा स्थूलानि च स्थूलशरीरहेतवः ।
मात्रास्तदीया विषया भवन्ति शब्दादयः पञ्च सुखाय भोक्तुः ॥ 74 ॥
paras-parāṁśair militāni bhūtvā sthūlāni ca sthūla-śarīra-hetavaḥ · mātrās tadīyā viṣayā bhavanti śabdādayaḥ pañca sukhāya bhoktuḥ
शब्दार्थ: परस्पर-अंशैः मिलितानि · आपस के अंशों से मिल कर · स्थूलानि भूत्वा · स्थूल बन कर · स्थूल-शरीर-हेतवः · स्थूल शरीर का कारण · मात्राः तदीयाः विषयाः · उनकी मात्राएँ विषय बन जाती हैं · शब्द-आदयः पञ्च · शब्द आदि पाँच · सुखाय भोक्तुः · भोक्ता के सुख के लिए।
अर्थ: ये सूक्ष्म तत्व आपस के अंशों से मिल कर स्थूल बन जाते हैं, और स्थूल शरीर का कारण बनते हैं। और उन्हीं की मात्राएँ पाँच विषय, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, बन जाती हैं, भोक्ता के सुख के लिए।
भावार्थ: गुरु एक प्यारी बात की ओर इशारा करते हैं, शरीर और संसार, दोनों एक ही कच्चे माल से बने हैं।
वही पाँच तत्व जिनसे आपका शरीर बना, उन्हीं से वह सब कुछ बना जिसका आपका शरीर अनुभव करता है, आवाज़ें, छुअन, रूप, स्वाद, गंध। यह एक गहरी, और बाद में काम आने वाली बात है: देखने वाला और देखी जाने वाली दुनिया, दोनों एक ही जाति के हैं। दोनों “अनात्मा” हैं। असली “आप” इस पूरे लेन-देन से बाहर हो।
75 · राग की रस्सी
य एषु मूढा विषयेषु बद्धा रागोरुपाशेन सुदुर्दमेन ।
आयान्ति निर्यान्त्यध ऊर्ध्वमुच्चैः स्वकर्मदूतेन जवेन नीताः ॥ 75 ॥
ya eṣu mūḍhā viṣayeṣu baddhā rāgoru-pāśena su-durdamena · āyānti niryānty adha ūrdhvam uccaiḥ sva-karma-dūtena javena nītāḥ
शब्दार्थ: मूढाः विषयेषु बद्धाः · विषयों में बँधे मूढ़ · राग-उरु-पाशेन · राग की मोटी रस्सी से · सु-दुर्दमेन · जिसे क़ाबू करना बहुत मुश्किल · आयान्ति निर्यान्ति · आते-जाते हैं · अधः ऊर्ध्वम् · नीचे-ऊपर · स्व-कर्म-दूतेन · अपने कर्म रूपी दूत से · जवेन नीताः · तेज़ी से ले जाए जाते।
अर्थ: जो मूढ़ इन विषयों में बँधे हैं, राग की उस मोटी रस्सी से, जिसे क़ाबू करना बहुत मुश्किल है, वे अपने ही कर्म रूपी दूत के हाथों तेज़ी से, नीचे-ऊपर, आते-जाते रहते हैं।
भावार्थ: गुरु एक चलती-फिरती तस्वीर देते हैं। बँधने वाली चीज़ विषय नहीं हैं, “राग” है, उनसे लगाव की रस्सी।
यह एक बारीक, और मुक्त कर देने वाली बात है। दोष आवाज़, रूप, स्वाद में नहीं; वे तो बस हैं। बँधन उस पकड़ में है जो हम उन पर बना लेते हैं। और जो इस रस्सी से बँधा है, वह “स्वतंत्र” महसूस करते हुए भी असल में खींचा-धकेला जा रहा है, ऊपर, नीचे, अपने ही पुराने कर्मों के हाथों। आज़ादी का एहसास, और भीतर एक रस्सी।
76 · पाँच जानवर, एक-एक इन्द्रिय
शब्दादिभिः पञ्चभिरेव पञ्च पञ्चत्वमापुः स्वगुणेन बद्धाः ।
कुरङ्गमातङ्गपतङ्गमीन भृङ्गा नरः पञ्चभिरञ्चितः किम् ॥ 76 ॥
śabdādibhiḥ pañcabhir eva pañca pañcatvam āpuḥ sva-guṇena baddhāḥ · kuraṅga-mātaṅga-pataṅga-mīna bhṛṅgā naraḥ pañcabhir añcitaḥ kim
शब्दार्थ: शब्द-आदिभिः पञ्चभिः · शब्द आदि पाँच विषयों से · पञ्च पञ्चत्वम् आपुः · पाँच जानवर मृत्यु को प्राप्त हुए · स्व-गुणेन बद्धाः · अपने ही एक गुण से बँध कर · कुरङ्ग · हिरण · मातङ्ग · हाथी · पतङ्ग · पतंगा · मीन · मछली · भृङ्ग · भौंरा · नरः पञ्चभिः अञ्चितः किम् · पाँचों से जुड़ा मनुष्य, फिर क्या।
अर्थ: शब्द आदि पाँच विषयों से, अपने ही एक-एक गुण से बँध कर, पाँच जानवर मृत्यु को प्राप्त हुए, हिरण, हाथी, पतंगा, मछली, भौंरा। तो पाँचों से जुड़ा हुआ मनुष्य, उसका क्या होंगे?
भावार्थ: यह भाग का सबसे यादगार श्लोक है, और एक चौंका देने वाला हिसाब। हर जानवर सिर्फ़ एक इन्द्रिय की कमज़ोरी से मारा जाता है:
हिरण, शिकारी के संगीत (शब्द) की ओर खिंच आता है। हाथी, स्पर्श के लालच में फँसता है। पतंगा, रूप (लौ की चमक) पर जल मरता है। मछली, रस (चारे के स्वाद) के लालच में काँटे पर। भौंरा, गंध में मगन हो कर फूल में बंद हो जाता है। हर एक को एक ही इन्द्रिय ले डूबी। और गुरु का सवाल चुभता है: एक जानवर एक से मरता है, और इंसान के पास तो पाँचों खुली हैं। यह डराने को नहीं। जगाने को कहा गया है।
77 · विषय, ज़हर से भी तेज़
दोषेण तीव्रो विषयः कृष्णसर्पविषादपि ।
विषं निहन्ति भोक्तारं द्रष्टारं चक्षुषाप्ययम् ॥ 77 ॥
doṣeṇa tīvro viṣayaḥ kṛṣṇa-sarpa-viṣād api · viṣaṁ nihanti bhoktāraṁ draṣṭāraṁ cakṣuṣāpy ayam
शब्दार्थ: दोषेण तीव्रः · हानि में तेज़ · विषयः · इन्द्रिय-विषय · कृष्ण-सर्प-विषात् अपि · काले साँप के ज़हर से भी · विषं निहन्ति भोक्तारं · ज़हर पीने वाले को मारता है · द्रष्टारं चक्षुषा अपि अयम् · यह तो देखने वाले को भी।
अर्थ: इन्द्रिय-विषय अपनी हानि में काले साँप के ज़हर से भी तेज़ है। ज़हर तो उसी को मारता है जो उसे पीता है; पर यह विषय तो उसे भी मार देता है जो इसे सिर्फ़ आँख से देख ले।
भावार्थ: गुरु एक तीखी तुलना करते हैं, और इसमें एक बारीक फ़र्क है जो ध्यान देने लायक़ है।
साँप का ज़हर तभी मारता है जब शरीर में पहुँचे, पीना पड़े, या काटा जाए। एक सीमा है। पर इन्द्रिय-विषय? गुरु कहते हैं वह सिर्फ़ देख लेने भर से असर कर देता है। एक चीज़ देखी, और मन में चाह जाग गई, एक खिंचाव बन गया, विषय ने अपना काम कर दिया, बिना आपको छुए। यही उसे ज़्यादा ख़तरनाक बनाता है: वह दूर से, चुपके से काम करता है। और इसीलिए “वैराग्य” अगले श्लोकों का इतना ज़रूरी विषय बन जाता है।
78 · जो विषय-इच्छा से छूटा, वही पात्र
विषयाशामहापाशाद्यो विमुक्तः सुदुस्त्यजात् ।
स एव कल्पते मुक्त्यै नान्यः षट्शास्त्रवेद्यपि ॥ 78 ॥
viṣayāśā-mahā-pāśād yo vimuktaḥ su-dustyajāt · sa eva kalpate muktyai nānyaḥ ṣaṭ-śāstra-vedy api
शब्दार्थ: विषय-आशा-महा-पाशात् · विषयों की चाह के बड़े फंदे से · सु-दुस्त्यजात् · जिसे छोड़ना बहुत कठिन · यः विमुक्तः · जो छूट गया · सः एव कल्पते मुक्त्यै · वही मुक्ति का पात्र है · न अन्यः षट्-शास्त्र-वेदी अपि · छहों शास्त्र जानने वाला भी नहीं।
अर्थ: विषयों की चाह के उस बड़े फंदे से, जिसे छोड़ना बहुत कठिन है, जो छूट गया, वही मुक्ति का पात्र है; और कोई नहीं। चाहे वह छहों शास्त्रों का जानकार ही क्यों न हो।
भावार्थ: गुरु एक हिम्मत वाली बात कहते हैं, और भाग 3 की उस चेतावनी को आगे बढ़ाते हैं, विद्वत्ता मुक्ति नहीं दिलाती।
एक तरफ़ रखिए: एक इंसान जो छहों दर्शन-शास्त्र कंठस्थ जानता है। दूसरी तरफ़: एक इंसान जो विषयों की चाह के फंदे से सच में छूट गया है। गुरु कहते हैं, मुक्ति का पात्र दूसरा है, पहला नहीं। यह बात बेचैन करती है, और करनी चाहिए। यह पूछती है: मेरी प्रगति का पैमाना क्या है, मैंने कितना पढ़ा-समझा, या मेरी पकड़ कितनी ढीली हुई?
79 · ऊपरी वैराग्य, और बीच में डूबना
आपातवैराग्यवतो मुमुक्षून् भवाब्धिपारं प्रतियातुमुद्यतान् ।
आशाग्रहो मज्जयतेऽन्तराले निगृह्य कण्ठे विनिवर्त्य वेगात् ॥ 79 ॥
āpāta-vairāgyavato mumukṣūn bhavābdhi-pāraṁ pratiyātum udyatān · āśā-graho majjayate’ntarāle nigṛhya kaṇṭhe vinivartya vegāt
शब्दार्थ: आपात-वैराग्यवतः · ऊपरी, क्षणिक वैराग्य वाले · मुमुक्षून् · मुमुक्षुओं को · भव-अब्धि-पारं प्रतियातुम् उद्यतान् · संसार-समुद्र पार जाने को तत्पर · आशा-ग्रहः · चाह का मगरमच्छ · मज्जयते अन्तराले · बीच में डुबो देता है · निगृह्य कण्ठे · गला पकड़ कर।
अर्थ: जिनका वैराग्य बस ऊपरी, क्षणिक है, ऐसे मुमुक्षु जब संसार-समुद्र पार करने को तत्पर होते हैं, तो चाह का मगरमच्छ उनका गला पकड़ कर, ज़ोर से वापस खींच कर, उन्हें बीच में ही डुबो देता है।
भावार्थ: भाग 2 के मरीचिका वाले श्लोक (30) की याद दिलाता एक चित्र, “आपात-वैराग्य”, ऊपरी वैराग्य।
तस्वीर डरावनी और सटीक है: एक तैराक पूरे जोश से समुद्र पार करने निकलता है। आधे रास्ते में एक मगरमच्छ, “आशा-ग्रह”, चाह का मगरमच्छ, उसका गला पकड़ कर खींच लेता है। यह “बीच में” डूबना सबसे ख़तरनाक है। शुरू में रुक जाना अलग बात; पर आधा सफ़र कर के, छिपी हुई चाह के हाथों वापस खिंच जाना, यही वह जाल है जिससे गुरु आगाह कर रहे हैं। वैराग्य गहरा होना चाहिए, सिर्फ़ ऊपरी जोश नहीं।
80 · वैराग्य की तलवार
विषयाख्यग्रहो येन सुविरक्त्यसिना हतः ।
स गच्छति भवाम्भोधेः पारं प्रत्यूहवर्जितः ॥ 80 ॥
viṣayākhya-graho yena su-virakty-asinā hataḥ · sa gacchati bhavāmbhodheḥ pāraṁ pratyūha-varjitaḥ
शब्दार्थ: विषय-आख्य-ग्रहः · विषय नाम का मगरमच्छ · येन सु-विरक्ति-असिना हतः · जिसने गहरे वैराग्य की तलवार से मार दिया · सः गच्छति भव-अम्भोधेः पारं · वह संसार-समुद्र पार चला जाता है · प्रत्यूह-वर्जितः · बिना किसी रुकावट के।
अर्थ: जिसने विषय नाम के उस मगरमच्छ को गहरे वैराग्य की तलवार से मार दिया, वह बिना किसी रुकावट के संसार-समुद्र पार चला जाता है।
भावार्थ: श्लोक 79 ने डर दिखाया; श्लोक 80 तुरंत हल देता है। वही मगरमच्छ, पर अब एक तलवार के साथ, “सु-विरक्ति”, गहरा वैराग्य।
गुरु एक संतुलन रखते हैं। वे चेतावनी देते हैं, पर निराशा में नहीं छोड़ते। मगरमच्छ असली है, पर हराया जा सकता है। और हथियार वही है जिसकी कमी श्लोक 79 में थी, ऊपरी वैराग्य नहीं। गहरा। “प्रत्यूह-वर्जित”, बिना रुकावट के, यानी जिसके पास यह तलवार है, उसके लिए रास्ता साफ़ है। डर और भरोसा, गुरु दोनों साथ देते हैं।
81 · दो रास्ते
विषमविषयमार्गैर्गच्छतोऽनच्छबुद्धेः प्रतिपदमभियातो मृत्युरप्येष विद्धि ।
हितसुजनगुरुक्त्या गच्छतः स्वस्य युक्त्या प्रभवति फलसिद्धिः सत्यमित्येव विद्धि ॥ 81 ॥
viṣama-viṣaya-mārgair gacchato’naccha-buddheḥ pratipadam abhiyāto mṛtyur apy eṣa viddhi · hita-sujana-guruktyā gacchataḥ svasya yuktyā prabhavati phala-siddhiḥ satyam ity eva viddhi
शब्दार्थ: विषम-विषय-मार्गैः · विषयों के टेढ़े रास्तों से · अनच्छ-बुद्धेः · मैले मन वाले का · प्रतिपदम् · हर कदम पर · मृत्युः अभियातः · मृत्यु सामने आती है · हित-सुजन-गुरु-उक्त्या · हितैषी, सज्जन और गुरु के वचन से · स्वस्य युक्त्या · अपने विवेक से · फल-सिद्धिः प्रभवति · फल मिलता है।
अर्थ: विषयों के टेढ़े रास्तों पर चलने वाले मैले मन वाले के सामने हर कदम पर मृत्यु आती है, यह जान लो। और हितैषी, सज्जन तथा गुरु के वचन से, अपने विवेक से चलने वाले को फल अवश्य मिलता है, इसे सच मान लो।
भावार्थ: गुरु दो रास्ते आमने-सामने रख देते हैं, बहुत साफ़, और एक सच्चे शिक्षक की तरह, हर एक के अंत में एक छोटी मुहर लगा देते हैं: “यह जान लो”, “इसे सच मान लो।”
पहला रास्ता, विषयों का टेढ़ा रास्ता, मैले मन के साथ, हर कदम पर मृत्यु। दूसरा, गुरु और हितैषियों के वचन से, अपने विवेक के साथ, निश्चित फल। ध्यान दीजिए, दूसरे रास्ते में दो चीज़ें साथ हैं: बाहर का मार्गदर्शन (गुरु, सज्जन) और भीतर का विवेक (“स्वस्य युक्त्या”)। न अकेला गुरु काफ़ी, न अकेला अपना सोचना। दोनों, हाथ में हाथ।
82 · ज़हर छोड़ो, अमृत पियो
मोक्षस्य कांक्षा यदि वै तवास्ति त्यजातिदूराद्विषयान्विषं यथा ।
पीयूषवत्तोषदयाक्षमार्जव प्रशान्तिदान्तीर्भज नित्यमादरात् ॥ 82 ॥
mokṣasya kāṅkṣā yadi vai tavāsti tyajātidūrād viṣayān viṣaṁ yathā · pīyūṣavat toṣa-dayā-kṣamārjava praśānti-dāntīr bhaja nityam ādarāt
शब्दार्थ: मोक्षस्य कांक्षा यदि तव अस्ति · अगर आपको मोक्ष की चाह है · त्यज अति-दूरात् विषयान् · विषयों को बहुत दूर से ही छोड़ दे · विषं यथा · ज़हर की तरह · पीयूष-वत् · अमृत की तरह · तोष-दया-क्षमा-आर्जव-प्रशान्ति-दान्तीः भज · संतोष, दया, क्षमा, सरलता, शांति, संयम को अपना · नित्यम् आदरात् · हमेशा, आदर से।
अर्थ: अगर आपको सच में मोक्ष की चाह है, तो विषयों को, ज़हर की तरह, बहुत दूर से ही छोड़ दे। और संतोष, दया, क्षमा, सरलता, शांति, संयम को, अमृत की तरह, हमेशा, आदर से अपना ले।
भावार्थ: गुरु एक सीधी, व्यावहारिक सलाह देते हैं, और दो शब्द उसे यादगार बना देते हैं, “विषं यथा” और “पीयूषवत्”: ज़हर की तरह छोड़, अमृत की तरह अपना।
और गिनाई हुई छह चीज़ें देखिए, संतोष, दया, क्षमा, सरलता, शांति, संयम। इनमें एक भी बड़ी, चमकदार आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं। ये सब रोज़मर्रा के, सीधे-सादे गुण हैं, जिन्हें आज, अभी अपनाया जा सकता है। गुरु अध्यात्म को आसमान से उतार कर आँगन में रख देते हैं: यह रास्ता किसी असाधारण करतब से नहीं। इन छोटे, रोज़ के गुणों से बनता है।
83 · असली काम छोड़ कर शरीर पालना
अनुक्षणं यत्परिहृत्य कृत्यं अनाद्यविद्याकृतबन्धमोक्षणम् ।
देहः परार्थोऽयममुष्य पोषणे यः सज्जते स स्वमनेन हन्ति ॥ 83 ॥
anukṣaṇaṁ yat parihṛtya kṛtyaṁ anādy-avidyā-kṛta-bandha-mokṣaṇam · dehaḥ parārtho’yam amuṣya poṣaṇe yaḥ sajjate sa svam anena hanti
शब्दार्थ: अनुक्षणं परिहृत्य कृत्यं · हर पल का असली काम छोड़ कर · अनादि-अविद्या-कृत-बन्ध-मोक्षणम् · अनादि अज्ञान से बने बंधन से छूटना · देहः परार्थः अयम् · यह शरीर तो दूसरे के काम का है · अमुष्य पोषणे यः सज्जते · इसके पालन में जो लग जाता है · स्वम् अनेन हन्ति · ख़ुद को इससे मार डालता है।
अर्थ: हर पल का असली काम, अनादि अज्ञान से बने बंधन से छूटना, छोड़ कर, जो इस शरीर के पालन-पोषण में ही लगा रहता है (यह शरीर तो किसी और के काम का है), वह इससे अपने आप को ही मार डालता है।
भावार्थ: गुरु एक तीखी, पर सोचने लायक़ बात कहते हैं। शरीर “परार्थ” है, किसी और के काम का। मतलब? शरीर एक औज़ार है, साधन है, आत्म-ज्ञान तक पहुँचने का। वह मंज़िल नहीं। सवारी है।
और भूल यह है: सवारी की इतनी देखभाल में लग जाना कि सफ़र ही भूल जाएँ। गुरु शरीर की उपेक्षा को नहीं कह रहे, सवारी ठीक रखनी ही है। वे “सज्जते” कहते हैं, चिपक जाना, उसी में डूब जाना। पूरी ज़िंदगी बस शरीर को सजाने, खिलाने, बचाने में बीत जाए, और जिसके लिए यह शरीर मिला था वह काम छूट जाए, गुरु इसे फिर “आत्म-हत्या” कहते हैं (भाग 1, श्लोक 4 की याद)।
84 · मगरमच्छ को लकड़ी समझना
शरीरपोषणार्थी सन् य आत्मानं दिदृक्षति ।
ग्राहं दारुधिया धृत्वा नदि तर्तुं स गच्छति ॥ 84 ॥
śarīra-poṣaṇārthī san ya ātmānaṁ didṛkṣati · grāhaṁ dāru-dhiyā dhṛtvā nadi tartuṁ sa gacchati
शब्दार्थ: शरीर-पोषण-अर्थी सन् · शरीर के पोषण में लगा हुआ · यः आत्मानं दिदृक्षति · जो आत्मा को देखना चाहता है · ग्राहं दारु-धिया धृत्वा · मगरमच्छ को लकड़ी समझ कर पकड़ कर · नदि तर्तुं गच्छति · नदी पार करने जाता है।
अर्थ: जो शरीर के पोषण में ही लगा रहते हुए आत्मा को देखना चाहता है, वह मगरमच्छ को लकड़ी समझ कर, उसे पकड़ कर नदी पार करने निकलता है।
भावार्थ: गुरु एक एकदम सटीक, और थोड़ी डरावनी तस्वीर देते हैं। नदी पार करनी हो तो लकड़ी का सहारा लेते हैं, वह तैराता है। पर अँधेरे में किसी ने मगरमच्छ को लकड़ी समझ लिया, और उसी को पकड़ कर पानी में उतर गया।
बात साफ़ है: शरीर से चिपका रहना, और साथ-साथ आत्मा को भी पाना चाहना, यह उल्टी दिशाएँ हैं। आप उसी चीज़ का सहारा ले रहे हैं जो आपको डुबोएगी। गुरु शरीर को “मगरमच्छ” इसलिए नहीं कहते कि शरीर बुरा है, बल्कि इसलिए कि “मैं यह शरीर हूँ” वाली पकड़ ही वह चीज़ है जो नीचे खींचती है। पार जाना है, तो पहचानना होंगे, सहारा कौन है, और बोझ कौन।
85 · मोह, असली महामृत्यु
मोह एव महामृत्युर्मुमुक्षोर्वपुरादिषु ।
मोहो विनिर्जितो येन स मुक्तिपदमर्हति ॥ 85 ॥
moha eva mahā-mṛtyur mumukṣor vapur-ādiṣu · moho vinirjito yena sa mukti-padam arhati
शब्दार्थ: मोहः एव महा-मृत्युः · मोह ही महामृत्यु है · मुमुक्षोः वपुः-आदिषु · मुमुक्षु के लिए, शरीर आदि में · मोहः विनिर्जितः येन · जिसने मोह को पूरी तरह जीत लिया · सः मुक्ति-पदम् अर्हति · वह मुक्ति-पद का अधिकारी है।
अर्थ: शरीर आदि में मोह, यही मुमुक्षु के लिए महामृत्यु है। जिसने इस मोह को पूरी तरह जीत लिया, वही मुक्ति-पद का अधिकारी है।
भावार्थ: गुरु एक शब्द को नई परिभाषा देते हैं, “महामृत्यु।” हम मृत्यु से डरते हैं, शरीर का छूट जाना। गुरु कहते हैं, साधक के लिए असली महामृत्यु वह नहीं। असली महामृत्यु है, “मोह।”
क्यों? क्योंकि शरीर का छूटना तो होंगे ही, सबका होता है, वह कोई आध्यात्मिक हार नहीं। पर मोह, “मैं यह शरीर हूँ” वाली ग़लतफ़हमी में पूरी ज़िंदगी बिता देना, यह वह मृत्यु है जो जीते-जी हो जाती है, और रास्ता ही बंद कर देती है। शरीर का मरना अनिवार्य है; मोह में मरना टाला जा सकता है। और गुरु यही जीतने को कह रहे हैं।
86 · इस मोह को जीत लो
मोहं जहि महामृत्युं देहदारसुतादिषु ।
यं जित्वा मुनयो यान्ति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ 86 ॥
mohaṁ jahi mahā-mṛtyuṁ deha-dāra-sutādiṣu · yaṁ jitvā munayo yānti tad viṣṇoḥ paramaṁ padam
शब्दार्थ: मोहं जहि · मोह को जीत · महा-मृत्युं · महामृत्यु को · देह-दार-सुत-आदिषु · शरीर, पत्नी, संतान आदि में · यं जित्वा · जिसे जीत कर · मुनयः यान्ति · मुनि पहुँचते हैं · विष्णोः परमं पदम् · विष्णु के परम पद पर।
अर्थ: शरीर, पत्नी, संतान आदि में जो मोह है, उस महामृत्यु को जीत लो। जिसे जीत कर मुनि विष्णु के परम पद पर पहुँचते हैं।
भावार्थ: श्लोक 85 ने मोह को महामृत्यु कहा था; श्लोक 86 सीधा आदेश देता है, “जहि”, जीत लो। और दायरा थोड़ा बढ़ा देता है: सिर्फ़ शरीर का मोह नहीं। पत्नी, संतान, अपनों का मोह भी।
यहाँ एक बात साफ़ रखनी ज़रूरी है। गुरु प्रेम छोड़ने को नहीं कह रहे। “मोह” और “प्रेम” अलग चीज़ें हैं। मोह वह ग़लत समीकरण है, “मेरी पहचान, मेरा होना, इन रिश्तों पर टिका है; इनके बिना मैं कुछ नहीं।” यह वह जकड़न है जो डर पैदा करती है। उस जकड़न को जीतना अपनों से दूर जाना नहीं। बल्कि उन्हें और साफ़, और बेख़ौफ़ प्रेम कर पाना है, क्योंकि अब आपका “होना” उन पर टिका नहीं।
87 · शरीर, एक साफ़ नज़र
त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमेदोमज्जास्थिसंकुलम् ।
पूर्णं मूत्रपुरीषाभ्यां स्थूलं निन्द्यमिदं वपुः ॥ 87 ॥
tvaṅ-māṁsa-rudhira-snāyu-medo-majjāsthi-saṅkulam · pūrṇaṁ mūtra-purīṣābhyāṁ sthūlaṁ nindyam idaṁ vapuḥ
शब्दार्थ: त्वक्-मांस-रुधिर-स्नायु-मेदः-मज्जा-अस्थि-संकुलम् · चमड़ी, मांस, ख़ून, नस, चर्बी, मज्जा, हड्डी से भरा · पूर्णं मूत्र-पुरीषाभ्यां · मल-मूत्र से भरा · स्थूलं निन्द्यम् इदं वपुः · यह स्थूल, साधारण शरीर।
अर्थ: चमड़ी, मांस, ख़ून, नस, चर्बी, मज्जा, हड्डी से भरा, मल-मूत्र से भरा, यह स्थूल शरीर साधारण है, बखानने लायक़ नहीं।
भावार्थ: गुरु फिर शरीर की वही सूची देते हैं जो श्लोक 72 में थी, पर इस बार थोड़ा और रूखेपन से। यह जान-बूझ कर है, और इसे ठीक से समझना ज़रूरी है।
गुरु शरीर से नफ़रत नहीं सिखा रहे। वे एक दवा दे रहे हैं, एक ख़ास बीमारी की, शरीर के प्रति हमारा अंध-मोह, हमारी हद से ज़्यादा सजावट, हद से ज़्यादा चिंता। एक रूखी, ईमानदार नज़र वह मोह तोड़ देती है। यह शरीर की निंदा नहीं। उसका सही माप है, न इससे नफ़रत, न इस पर मोहित। बस यह देख लेना कि यह क्या है, ताकि उसे “मैं” मानना बंद हो सके।
88 · स्थूल शरीर और जागृत अवस्था
पञ्चीकृतेभ्यो भूतेभ्यः स्थूलेभ्यः पूर्वकर्मणा ।
समुत्पन्नमिदं स्थूलं भोगायतनमात्मनः
अवस्था जागरस्तस्य स्थूलार्थानुभवो यतः ॥ 88 ॥
pañcīkṛtebhyo bhūtebhyaḥ sthūlebhyaḥ pūrva-karmaṇā · samutpannam idaṁ sthūlaṁ bhogāyatanam ātmanaḥ · avasthā jāgaras tasya sthūlārthānubhavo yataḥ
शब्दार्थ: पञ्चीकृतेभ्यः भूतेभ्यः स्थूलेभ्यः · पंचीकृत स्थूल तत्वों से · पूर्व-कर्मणा · पुराने कर्म से · समुत्पन्नम् इदं स्थूलं · यह स्थूल शरीर बना · भोग-आयतनम् आत्मनः · आत्मा का भोग-स्थान · अवस्था जागरः · इसकी अवस्था जागृत है · स्थूल-अर्थ-अनुभवः यतः · क्योंकि यहाँ स्थूल चीज़ों का अनुभव होता है।
अर्थ: पंचीकृत स्थूल तत्वों से, पुराने कर्म के कारण, यह स्थूल शरीर बना, आत्मा का भोग-स्थान। इसकी अवस्था जागृत है, क्योंकि यहीं स्थूल चीज़ों का अनुभव होता है।
भावार्थ: गुरु अब एक व्यवस्था खोलना शुरू करते हैं, जो भाग के बाक़ी हिस्से में काम आएगी, हर शरीर के साथ एक “अवस्था” जुड़ी है।
स्थूल शरीर का साथी है, जागृत अवस्था। जब आप जागे होते हैं, आप इसी शरीर से, इसी की इन्द्रियों से, बाहर की ठोस दुनिया का अनुभव करते हैं। शरीर को “भोग-आयतन” कहा है, अनुभव करने का एक मकान। यह एक प्यारी बात है: शरीर आप नहीं हैं; वह वह जगह है जहाँ रह कर आप जागृत-दुनिया का अनुभव करते हैं। आप किराएदार हैं, मकान नहीं।
89 · जागते में, बाहर की दुनिया
बाह्येन्द्रियैः स्थूलपदार्थसेवां स्रक्चन्दनस्त्र्यादिविचित्ररूपाम् ।
करोति जीवः स्वयमेतदात्मना तस्मात्प्रशस्तिर्वपुषोऽस्य जागरे ॥ 89 ॥
bāhyendriyaiḥ sthūla-padārtha-sevāṁ srak-candana-stry-ādi-vicitra-rūpām · karoti jīvaḥ svayam etad ātmanā tasmāt praśastir vapuṣo’sya jāgare
शब्दार्थ: बाह्य-इन्द्रियैः · बाहरी इन्द्रियों से · स्थूल-पदार्थ-सेवां · स्थूल चीज़ों का उपभोग · स्रक्-चन्दन-स्त्री-आदि-विचित्र-रूपाम् · माला, चंदन, स्त्री आदि अनेक रूपों में · करोति जीवः · जीव करता है · प्रशस्तिः वपुषः अस्य जागरे · इस शरीर की प्रमुखता जागृत अवस्था में।
अर्थ: बाहरी इन्द्रियों से, माला, चंदन, स्त्री आदि अनेक रूपों में, स्थूल चीज़ों का उपभोग जीव ख़ुद करता है। इसलिए इस शरीर की प्रमुखता जागृत अवस्था में है।
भावार्थ: श्लोक 88 की बात आगे, जागृत अवस्था वह समय है जब स्थूल शरीर “मुख्य” होता है, सबसे आगे होता है।
एक बात गौर कीजिए, गुरु कहते हैं जीव यह उपभोग “स्वयम्” करता है। वह एक मूक दर्शक नहीं; वह ख़ुद इस खेल में उतरा हुआ है। यह बात बाद में चोट करेगी, जब गुरु समझाएँगे कि असली “आप” इस सबसे परे, सिर्फ़ साक्षी हो। अभी गुरु बस तस्वीर साफ़ कर रहे हैं: जागते में, यह शरीर सबसे आगे, और दुनिया से उसका लेन-देन चालू।
90 · शरीर, गृहस्थ का घर
सर्वापि बाह्यसंसारः पुरुषस्य यदाश्रयः ।
विद्धि देहमिदं स्थूलं गृहवद्गृहमेधिनः ॥ 90 ॥
sarvāpi bāhya-saṁsāraḥ puruṣasya yad-āśrayaḥ · viddhi deham idaṁ sthūlaṁ gṛhavad gṛha-medhinaḥ
शब्दार्थ: सर्वा अपि बाह्य-संसारः · सारा बाहरी संसार-जीवन · पुरुषस्य यद्-आश्रयः · जिस पर पुरुष का टिका है · विद्धि देहम् इदं स्थूलं · इस स्थूल देह को जान · गृह-वत् गृह-मेधिनः · गृहस्थ के घर की तरह।
अर्थ: पुरुष का सारा बाहरी संसार-जीवन जिस पर टिका है, इस स्थूल देह को वैसा ही जान, जैसे गृहस्थ का घर।
भावार्थ: एक सीधी, और बहुत राहत भरी उपमा, शरीर एक घर है।
एक गृहस्थ का पूरा बाहरी जीवन उसके घर के इर्द-गिर्द चलता है, वहीं वह रहता है, वहीं से दुनिया से जुड़ता है। पर एक समझदार आदमी अपने घर से प्यार करते हुए भी जानता है कि वह घर नहीं। घर एक जगह है जहाँ वह रहता है। शरीर भी ऐसा ही है, आपके बाहरी जीवन का ठिकाना, पर “आप” नहीं। और यह उपमा गुरु की पुरानी नफ़रत-नहीं वाली बात फिर पक्की करती है: घर का ध्यान रखो, पर उसे ख़ुद मत समझ लो।
91 · ये सब शरीर के धर्म हैं
स्थूलस्य संभवजरामरणानि धर्माः स्थौल्यादयो बहुविधाः शिशुताद्यवस्थाः ।
वर्णाश्रमादिनियमा बहुधामयाः स्युः पूजावमानबहुमानमुखा विशेषाः ॥ 91 ॥
sthūlasya saṁbhava-jarā-maraṇāni dharmāḥ sthaulyādayo bahu-vidhāḥ śiśutādy-avasthāḥ · varṇāśramādi-niyamā bahudhāmayāḥ syuḥ pūjāvamāna-bahu-māna-mukhā viśeṣāḥ
शब्दार्थ: संभव-जरा-मरणानि · जन्म, बुढ़ापा, मृत्यु · स्थौल्य-आदयः · मोटापा आदि · शिशुता-आदि-अवस्थाः · बचपन आदि अवस्थाएँ · वर्ण-आश्रम-आदि-नियमाः · वर्ण-आश्रम के नियम · बहुधा-आमयाः · तरह-तरह की बीमारियाँ · पूजा-अवमान-बहुमान-मुखाः विशेषाः · आदर, अपमान, सम्मान आदि।
अर्थ: जन्म, बुढ़ापा, मृत्यु; मोटापा आदि; बचपन-जवानी आदि अवस्थाएँ; वर्ण-आश्रम के नियम; तरह-तरह की बीमारियाँ; और आदर, अपमान, सम्मान, ये सब स्थूल शरीर के धर्म (गुण) हैं।
भावार्थ: यह स्थूल शरीर वाले हिस्से का समापन है, और गुरु एक बेहद मुक्त कर देने वाली बात कहते हैं, यह पूरी सूची “शरीर के धर्म” हैं, आपके नहीं।
ग़ौर से देखिए सूची में क्या-क्या है: जन्म-मृत्यु, बुढ़ापा, बीमारी, और साथ ही आदर और अपमान। हम सबको “अपने साथ हुआ” मानते हैं, “मैं बूढ़ा हो रहा हूँ”, “मेरा अपमान हुआ”। गुरु कहते हैं, नहीं। ये सब उस घर के साथ होते हैं, घर में रहने वाले के साथ नहीं। बुढ़ापा शरीर को आता है। अपमान उस सामाजिक पहचान को लगता है जो शरीर से जुड़ी है। अगर यह बात सच में बैठ जाए, कि ये “मेरे” साथ नहीं। “इसके” साथ हो रहे हैं, तो ज़िंदगी का आधा बोझ अपने आप उतर जाता है।
92 · दस इन्द्रियाँ
बुद्धीन्द्रियाणि श्रवणं त्वगक्षि घ्राणं च जिव्हा विषयावबोधनात् ।
वाक्पाणिपादा गुदमप्युपस्थः कर्मेन्द्रियाणि प्रवणेन कर्मसु ॥ 92 ॥
buddhīndriyāṇi śravaṇaṁ tvag-akṣi ghrāṇaṁ ca jivhā viṣayāvabodhanāt · vāk-pāṇi-pādā gudam apy upasthaḥ karmendriyāṇi pravaṇena karmasu
शब्दार्थ: बुद्धि-इन्द्रियाणि · ज्ञान की इन्द्रियाँ · श्रवणं त्वक् अक्षि घ्राणं जिव्हा · कान, त्वचा, आँख, नाक, जीभ · विषय-अवबोधनात् · विषयों को जानने के कारण · वाक्-पाणि-पाद-गुदम्-उपस्थः · वाणी, हाथ, पैर, गुदा, जननेन्द्रिय · कर्म-इन्द्रियाणि · कर्म की इन्द्रियाँ · प्रवणेन कर्मसु · कर्मों में लगे रहने के कारण।
अर्थ: कान, त्वचा, आँख, नाक, जीभ, ये पाँच ज्ञान की इन्द्रियाँ हैं, क्योंकि ये विषयों को जानती हैं। वाणी, हाथ, पैर, गुदा, जननेन्द्रिय, ये पाँच कर्म की इन्द्रियाँ हैं, क्योंकि ये कर्मों में लगी रहती हैं।
भावार्थ: स्थूल शरीर एक तरफ़ रख कर, गुरु अब अगली, बारीक परत खोलते हैं, सूक्ष्म शरीर। और उसका पहला हिस्सा हैं दस इन्द्रियाँ।
एक सुंदर, सरल बँटवारा: पाँच इन्द्रियाँ “जानने” की हैं, वे दुनिया से ख़बर भीतर लाती हैं। पाँच “करने” की हैं, वे क्रिया बाहर भेजती हैं। अंदर आने का रास्ता, बाहर जाने का रास्ता। पर ध्यान रखिए, गुरु यह सूची इसलिए नहीं बना रहे कि याद कर लें। वे “नेति-नेति” खेल रहे हैं: ये दस इन्द्रियाँ भी “आप” नहीं हैं। वे औज़ार हैं, जिन्हें “आप” इस्तेमाल करते हैं।
93 · अंतःकरण, मन और बुद्धि
निगद्यतेऽन्तःकरणं मनोधीः अहंकृतिश्चित्तमिति स्ववृत्तिभिः ।
मनस्तु संकल्पविकल्पनादिभिः बुद्धिः पदार्थाध्यवसायधर्मतः ॥ 93 ॥
nigadyate’ntaḥkaraṇaṁ mano-dhīḥ ahaṅkṛtiś cittam iti sva-vṛttibhiḥ · manas tu saṅkalpa-vikalpanādibhiḥ buddhiḥ padārthādhyavasāya-dharmataḥ
शब्दार्थ: निगद्यते अन्तःकरणं · अंतःकरण कहा जाता है · मनः-धीः-अहंकृतिः-चित्तम् · मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त · स्व-वृत्तिभिः · अपने-अपने काम से · संकल्प-विकल्पन-आदिभिः · इच्छा करना, शक करना आदि से · पदार्थ-अध्यवसाय-धर्मतः · चीज़ों का निश्चय करने के गुण से।
अर्थ: अंतःकरण (भीतरी यंत्र) के चार रूप कहे जाते हैं, मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त, अपने-अपने काम के अनुसार। मन वह है जो इच्छा करता है, शक करता है। बुद्धि वह है जो चीज़ों का निश्चय करती है।
भावार्थ: गुरु अब “अंतःकरण” खोलते हैं, हमारा भीतरी यंत्र, जिसे हम सबसे ज़्यादा “मैं” मानते हैं। और वे इसे एक नहीं। चार कामों में बाँट देते हैं।
दो इस श्लोक में: “मन”, जो लगातार चाहता है, फिर शक करता है, फिर दूसरी चीज़ चाहता है (“यह करूँ कि वह?”)। और “बुद्धि”, जो ठहर कर तय करती है (“यह सही है”)। यह बँटवारा अपने आप को देखने का एक औज़ार दे देता है: जब भीतर हलचल हो, पूछिए, यह मन का डोलना है, या बुद्धि का निश्चय? पर असली बात फिर वही है, ये चारों “अंतःकरण” हैं, एक करण यानी औज़ार। और औज़ार चलाने वाला उससे अलग होता है।
94 · अहंकार और चित्त
अत्राभिमानादहमित्यहंकृतिः ।
स्वार्थानुसन्धानगुणेन चित्तम् ॥ 94 ॥
atrābhimānād aham ity ahaṅkṛtiḥ · svārthānusandhāna-guṇena cittam
शब्दार्थ: अत्र अभिमानात् · इसमें अभिमान (अपनेपन) के कारण · अहम् इति अहंकृतिः · “मैं” कहने वाला अहंकार · स्व-अर्थ-अनुसन्धान-गुणेन · अपने मतलब की चीज़ ढूँढने के गुण से · चित्तम् · चित्त।
अर्थ: इन सबमें अभिमान के कारण “मैं” कहने वाला अहंकार है। और अपने मतलब की चीज़ को ढूँढते रहने के गुण से चित्त है।
भावार्थ: अंतःकरण के बाक़ी दो हिस्से। “अहंकार”, वह जो हर चीज़ पर “मैं” का ठप्पा लगाता है। मन ने कुछ चाहा, अहंकार कहता है “मैंने चाहा।” बुद्धि ने तय किया, अहंकार कहता है “मैंने तय किया।” वह सारे काम का दावेदार बन बैठता है।
और “चित्त”, वह जो बार-बार उन्हीं चीज़ों की ओर लौटता है जो “मेरे मतलब” की हैं। आज की भाषा में, मन का वह हिस्सा जो आपकी पसंद, आपकी यादें, आपके लगाव बार-बार सामने लाता रहता है। चारों मिल कर “अंतःकरण” बनाते हैं, और गुरु एक-एक को नाम दे कर असल में एक काम कर रहे हैं: इस “मैं” को, जिसे हम एक ठोस चीज़ समझते हैं, उसके पुर्ज़ों में खोल कर दिखा रहे हैं। जो पुर्ज़ों से बना है, वह आख़िरी “मैं” नहीं हो सकता।
95 · एक प्राण, पाँच काम
प्राणापानव्यानोदानसमाना भवत्यसौ प्राणः ।
स्वयमेव वृत्तिभेदाद्विकृतिभेदात्सुवर्णसलिलादिवत् ॥ 95 ॥
prāṇāpāna-vyānodāna-samānā bhavaty asau prāṇaḥ · svayam eva vṛtti-bhedād vikṛti-bhedāt suvarṇa-salilādivat
शब्दार्थ: प्राण-अपान-व्यान-उदान-समानाः · प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान · भवति असौ प्राणः · यह प्राण बन जाता है · स्वयम् एव वृत्ति-भेदात् · अपने आप, काम के फ़र्क से · विकृति-भेदात् · रूप-भेद से · सुवर्ण-सलिल-आदि-वत् · सोने, पानी आदि की तरह।
अर्थ: यह एक प्राण ही, काम के फ़र्क से, पाँच रूप ले लेता है, प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, जैसे सोना या पानी अलग-अलग रूप ले लेता है।
भावार्थ: सूक्ष्म शरीर का तीसरा हिस्सा, प्राण, यानी जीवन-ऊर्जा। और गुरु एक प्यारी बात कहते हैं: प्राण असल में एक ही है; वह पाँच नाम बस अपने अलग-अलग कामों से पाता है, साँस लेना, छोड़ना, पचाना, और बाक़ी।
उपमा सटीक है, सोना एक है, पर अँगूठी, हार, कंगन बन जाता है; पानी एक है, पर लहर, भँवर, बूँद बन जाता है। यह छोटी सी बात आगे बहुत काम आएगी: एक चीज़, जो कई रूप दिखाती है। पूरी विवेकचूडामणि आख़िर में यही दिखाएगी, एक ही चेतना, अनगिनत रूपों में।
96 · पुर्यष्टक, आठ का नगर
वागादि पञ्च श्रवणादि पञ्च प्राणादि पञ्चाभ्रमुखानि पञ्च ।
बुद्ध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहुः ॥ 96 ॥
vāgādi pañca śravaṇādi pañca prāṇādi pañcābhra-mukhāni pañca · buddhyādy avidyāpi ca kāma-karmaṇī pury-aṣṭakaṁ sūkṣma-śarīram āhuḥ
शब्दार्थ: वाक्-आदि पञ्च · वाणी आदि पाँच (कर्मेन्द्रियाँ) · श्रवण-आदि पञ्च · कान आदि पाँच (ज्ञानेन्द्रियाँ) · प्राण-आदि पञ्च · प्राण आदि पाँच · अभ्र-मुखानि पञ्च · आकाश आदि पाँच (सूक्ष्म तत्व) · बुद्धि-आदि · बुद्धि आदि (अंतःकरण) · अविद्या काम कर्मणी · अज्ञान, इच्छा, कर्म · पुर्यष्टकं · आठ का नगर · सूक्ष्म-शरीरम् आहुः · सूक्ष्म शरीर कहते हैं।
अर्थ: पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, पाँच सूक्ष्म तत्व, अंतःकरण, अज्ञान, इच्छा और कर्म, इस “आठ के नगर” को सूक्ष्म शरीर कहते हैं।
भावार्थ: गुरु सूक्ष्म शरीर के सारे हिस्से एक साथ बाँध देते हैं, और एक सुंदर शब्द देते हैं, “पुर्यष्टक”, आठ चीज़ों का एक नगर।
“नगर” शब्द पर रुकिए। एक नगर में बहुत कुछ होता है, गलियाँ, बाज़ार, लोग, हलचल। पर नगर अपने आप में कोई एक “व्यक्ति” नहीं। यह सूक्ष्म शरीर, हमारा मन, इन्द्रियाँ, ऊर्जा, इच्छाएँ, यादें, एक पूरा बसा-बसाया नगर है, और हम इसी को सबसे गहराई से “मैं” मानते हैं। गुरु इसे “नगर” कह कर एक इशारा कर रहे हैं: आप इस नगर के निवासी हैं, यह नगर ख़ुद नहीं।
97 · सूक्ष्म शरीर, आत्मा की एक उपाधि
इदं शरीरं शृणु सूक्ष्मसंज्ञितं लिङ्गं त्वपञ्चीकृतसंभवम् ।
सवासनं कर्मफलानुभावकं स्वाज्ञानतोऽनादिरुपाधिरात्मनः ॥ 97 ॥
idaṁ śarīraṁ śṛṇu sūkṣma-saṁjñitaṁ liṅgaṁ tv apañcīkṛta-saṁbhavam · sa-vāsanaṁ karma-phalānubhāvakaṁ svājñānato’nādir upādhir ātmanaḥ
शब्दार्थ: सूक्ष्म-संज्ञितं लिङ्गं · सूक्ष्म नाम वाला, लिंग शरीर · अपञ्चीकृत-संभवम् · अपंचीकृत (बिना मिले) तत्वों से बना · स-वासनं · वासनाओं सहित · कर्म-फल-अनुभावकं · कर्म-फल भुगताने वाला · स्व-अज्ञानतः · अपने अज्ञान के कारण · अनादिः उपाधिः आत्मनः · आत्मा की अनादि उपाधि।
अर्थ: सुनो, यह सूक्ष्म नाम वाला, लिंग-शरीर, अपंचीकृत तत्वों से बना है, वासनाओं सहित है, कर्म-फल भुगताता है, और अपने ही अज्ञान के कारण यह आत्मा की एक अनादि उपाधि है।
भावार्थ: एक शब्द यहाँ चाबी है, और यह पूरी विवेकचूडामणि में बार-बार आएगा, “उपाधि।”
उपाधि का मतलब है एक उधार की पहचान, एक ऊपर से चढ़ी हुई परत। एक मिसाल: एक साफ़ स्फटिक के पास लाल फूल रख दो, तो स्फटिक लाल दिखने लगता है, पर वह लाल होता नहीं। वह बस लालिमा “उधार” ले रहा है। फूल हटा लो, स्फटिक फिर साफ़। सूक्ष्म शरीर आत्मा की ऐसी ही “उपाधि” है, एक उधार की पहचान, जिसके कारण निर्मल आत्मा बँधी हुई, दुखी, छोटी दिखने लगती है। और गुरु एक राहत भी देते हैं: यह उपाधि “स्व-अज्ञान” से है, सिर्फ़ एक न-जानने से। यानी जानते ही फूल हट जाता है।
98 · स्वप्न, सूक्ष्म शरीर की अवस्था
स्वप्नो भवत्यस्य विभक्त्यवस्था स्वमात्रशेषेण विभाति यत्र ।
स्वप्ने तु बुद्धिः स्वयमेव जाग्रत् कालीननानाविधवासनाभिः ॥ 98 ॥
svapno bhavaty asya vibhakty-avasthā sva-mātra-śeṣeṇa vibhāti yatra · svapne tu buddhiḥ svayam eva jāgrat kālīna-nānā-vidha-vāsanābhiḥ
शब्दार्थ: स्वप्नः भवति अस्य विभक्ति-अवस्था · स्वप्न इसकी अलग अवस्था है · स्व-मात्र-शेषेण विभाति यत्र · जहाँ बस अपने ही अंश से सब दिखता है · स्वप्ने बुद्धिः स्वयम् एव · स्वप्न में बुद्धि ही ख़ुद · जाग्रत्-कालीन-नाना-विध-वासनाभिः · जागने के समय की तरह-तरह की वासनाओं से।
अर्थ: स्वप्न इस सूक्ष्म शरीर की अलग अवस्था है, जहाँ बस अपने ही अंश से सब कुछ दिखता है। स्वप्न में बुद्धि ही, जागने के समय की तरह-तरह की वासनाओं से, ख़ुद एक पूरी दुनिया रच लेती है।
भावार्थ: जैसे स्थूल शरीर का साथी जागृत अवस्था थी, सूक्ष्म शरीर का साथी है, स्वप्न। और स्वप्न इस पूरी किताब का एक बहुत ताक़तवर औज़ार है।
सपने में एक पूरी दुनिया होती है, लोग, जगहें, घटनाएँ, डर, ख़ुशी। और वह सब किससे बनी? “स्व-मात्र”, सिर्फ़ आपके अपने मन से। बाहर कुछ नहीं था; बुद्धि ने अकेले, अपनी जमा वासनाओं से, पूरा संसार खड़ा कर दिया। यह एक रोज़ का सबूत है इस बात का कि मन कितनी ठोस-सी दिखती दुनिया रच सकता है। और एक सवाल छोड़ देता है, जो आगे काम आएगा: अगर मन रात में यह कर सकता है, तो दिन की यह “जागृत” दुनिया कितनी अलग है?
99 · साक्षी, अछूता रहता है
कर्त्रादिभावं प्रतिपद्य राजते यत्र स्वयं भाति ह्ययं परात्मा ।
धीमात्रकोपाधिरशेषसाक्षी न लिप्यते तत्कृतकर्मलेशैः
यस्मादसङ्गस्तत एव कर्मभिः न लिप्यते किंचिदुपाधिना कृतैः ॥ 99 ॥
kartrādi-bhāvaṁ pratipadya rājate yatra svayaṁ bhāti hy ayaṁ parātmā · dhī-mātrakopādhir aśeṣa-sākṣī na lipyate tat-kṛta-karma-leśaiḥ · yasmād asaṅgas tata eva karmabhiḥ na lipyate kiṁcid upādhinā kṛtaiḥ
शब्दार्थ: कर्तृ-आदि-भावं प्रतिपद्य · कर्ता आदि का भाव ले कर · धी-मात्रक-उपाधिः · बुद्धि भर की उपाधि वाला · अशेष-साक्षी · सबका साक्षी · न लिप्यते कर्म-लेशैः · कर्मों के लेश से भी नहीं लिपटता · असङ्गः · असंग, अछूता।
अर्थ: कर्ता आदि का भाव ले कर जहाँ यह परम आत्मा स्वयं चमकता दिखता है, वह, बुद्धि भर की उपाधि वाला, सबका साक्षी, उन कर्मों के लेश-मात्र से भी नहीं लिपटता। क्योंकि वह असंग है, इसलिए उपाधि के किए किसी भी कर्म से वह नहीं लिपटता।
भावार्थ: गुरु ने अब तक बस अनात्मा गिनाया था। यहाँ पहली बार, उस ढेर के बीच से, असली “आप” की एक झलक देते हैं, और दो शब्द उस झलक को थाम लेते हैं: “साक्षी” और “असंग।”
साक्षी यानी देखने वाला, गवाह, जो होता हुआ देखता है, पर ख़ुद उसमें उतरता नहीं। और “असंग”, अछूता, बिना लिपटा। एक उदाहरण: सिनेमा के परदे पर आग लगती है, बाढ़ आती है, पर परदा न जलता है, न भीगता है। फ़िल्म चलती रहती है, परदा अछूता। असली “आप” वह परदा हो, मन में जो भी कर्म, सुख, दुख चलें, वह साक्षी अछूता रहता है। यह विवेकचूडामणि का दिल है, और गुरु इसे यहाँ बीज की तरह बो देते हैं।
100 · बढ़ई का औज़ार
सर्वव्यापृतिकरणं लिङ्गमिदं स्याच्चिदात्मनः पुंसः ।
वास्यादिकमिव तक्ष्णस्तेनैवात्मा भवत्यसङ्गोऽयम् ॥ 100 ॥
sarva-vyāpṛti-karaṇaṁ liṅgam idaṁ syāc cid-ātmanaḥ puṁsaḥ · vāsyādikam iva takṣṇas tenaivātmā bhavaty asaṅgo’yam
शब्दार्थ: सर्व-व्यापृति-करणं · सब कामों का औज़ार · लिङ्गम् इदं · यह सूक्ष्म शरीर · चित्-आत्मनः पुंसः · चेतन आत्मा-पुरुष का · वास्य-आदिकम् इव तक्ष्णः · बढ़ई के बसूले आदि की तरह · तेन एव आत्मा असङ्गः · इसी से आत्मा असंग है।
अर्थ: यह सूक्ष्म शरीर, चेतन आत्मा-पुरुष के सब कामों का औज़ार है, ठीक जैसे बढ़ई के लिए बसूला आदि औज़ार होते हैं। और इसीलिए यह आत्मा असंग है।
भावार्थ: गुरु श्लोक 99 की बात एक एकदम साफ़, रोज़ की तस्वीर में रख देते हैं, बढ़ई और उसका औज़ार।
एक बढ़ई दिन-भर बसूले से लकड़ी छीलता है। शाम को औज़ार रख देता है। बसूला घिसता है, उस पर निशान पड़ते हैं, पर बढ़ई? बढ़ई न घिसता है, न उस पर निशान पड़ते हैं। वह औज़ार चलाने वाला है, औज़ार नहीं। गुरु कहते हैं: आपका यह पूरा मन-इन्द्रिय-प्राण वाला सूक्ष्म शरीर, वह बसूला है। काम वह करता है, थकता वह है, घिसता वह है। और “आप”, आप बढ़ई हैं। इसीलिए, गुरु कहते हैं, आत्मा असंग है, अछूती। औज़ार के काम औज़ार के, चलाने वाले के नहीं।
101 · अंधापन आँख का धर्म है, आपका नहीं
अन्धत्वमन्दत्वपटुत्वधर्माः सौगुण्यवैगुण्यवशाद्धि चक्षुषः ।
बाधिर्यमूकत्वमुखास्तथैव श्रोत्रादिधर्मा न तु वेत्तुरात्मनः ॥ 101 ॥
andhatva-mandatva-paṭutva-dharmāḥ sauguṇya-vaiguṇya-vaśād dhi cakṣuṣaḥ · bādhirya-mūkatva-mukhās tathaiva śrotrādi-dharmā na tu vettur ātmanaḥ
शब्दार्थ: अन्धत्व-मन्दत्व-पटुत्व-धर्माः · अंधापन, कमज़ोरी, तेज़ी के धर्म · सौगुण्य-वैगुण्य-वशात् · आँख की अच्छी या ख़राब हालत से · चक्षुषः · आँख के · बाधिर्य-मूकत्व-मुखाः · बहरापन, गूँगापन आदि · श्रोत्र-आदि-धर्माः · कान आदि के धर्म · न तु वेत्तुः आत्मनः · जानने वाली आत्मा के नहीं।
अर्थ: अंधापन, कमज़ोर दिखना, तेज़ देखना, ये आँख की अच्छी या ख़राब हालत के धर्म हैं। वैसे ही बहरापन, गूँगापन आदि कान आदि के धर्म हैं, जानने वाली आत्मा के नहीं।
भावार्थ: गुरु एक बेहद सटीक, और राहत भरी बात कहते हैं। आँख कमज़ोर है, ठीक से नहीं दिखता, हम कहते हैं “मुझे ठीक नहीं दिखता।” गुरु कहते हैं: नहीं। यह आँख का धर्म है।
“आप”, असली आप, वह हो जो आँख से देखता है, यानी आँख का इस्तेमाल करता है। अगर आँख कमज़ोर है, तो यह उपकरण की बात है, उपकरण चलाने वाले की नहीं। एक धुँधले कैमरे से धुँधली तस्वीर आती है, पर फ़ोटोग्राफ़र की नज़र धुँधली नहीं हुई। यह सुनने में छोटी बात लगती है, पर इसका असर गहरा है: शरीर की हर कमी, हर बीमारी, हर बुढ़ापे का धुँधलापन, वह उपकरण को है, “आप” को नहीं।
102 · भूख-प्यास प्राण के धर्म हैं
उच्छ्वासनिःश्वासविजृम्भणक्षुत् प्रस्यन्दनाद्युत्क्रमणादिकाः क्रियाः ।
प्राणादिकर्माणि वदन्ति तज्ञाः प्राणस्य धर्मावशनापिपासे ॥ 102 ॥
ucchvāsa-niḥśvāsa-vijṛmbhaṇa-kṣut prasyandanādy-utkramaṇādikāḥ kriyāḥ · prāṇādi-karmāṇi vadanti tajñāḥ prāṇasya dharmāv aśanā-pipāse
शब्दार्थ: उच्छ्वास-निःश्वास · साँस लेना-छोड़ना · विजृम्भण · जँभाई · क्षुत् · छींक/भूख · प्रस्यन्दन · पसीना/स्राव · उत्क्रमण · (प्राण का) निकल जाना · प्राण-आदि-कर्माणि · प्राण आदि के काम · अशना-पिपासे · भूख और प्यास · प्राणस्य धर्मौ · प्राण के धर्म।
अर्थ: साँस लेना-छोड़ना, जँभाई, छींक, स्राव, और (अंत में) प्राण का निकल जाना, ज्ञानी इन सब क्रियाओं को प्राण के काम कहते हैं। और भूख तथा प्यास, ये भी प्राण के धर्म हैं।
भावार्थ: श्लोक 101 ने इन्द्रियों के बारे में कहा था; यह श्लोक प्राण के बारे में वही कहता है। और एक बात ख़ास तौर पर रखी गई है, भूख और प्यास।
यह याद कीजिए, भाग 3 में गुरु ने कहा था (श्लोक 52) कि भूख का दुख कोई और नहीं मिटा सकता। वहाँ बात यह थी कि भूख इतनी भीतरी है। यहाँ गुरु एक और परत जोड़ते हैं: भूख-प्यास भी, आख़िर में, “प्राण के धर्म” हैं, असली “आप” के नहीं। यानी असली आप वह हैं जो भूख को “जानता” है, जो भूख का अनुभव साक्षी की तरह देखता है। यह सूक्ष्म है, पर गहरा, सबसे ज़मीनी, सबसे ज़ोरदार शारीरिक माँग भी, आख़िर में, एक उपकरण की हलचल है, जिसे आप देख रहे हैं।
103 · अंतःकरण, उधार की रोशनी से
अन्तःकरणमेतेषु चक्षुरादिषु वर्ष्मणि ।
अहमित्यभिमानेन तिष्ठत्याभासतेजसा ॥ 103 ॥
antaḥkaraṇam eteṣu cakṣur-ādiṣu varṣmaṇi · aham ity abhimānena tiṣṭhaty ābhāsa-tejasā
शब्दार्थ: अन्तःकरणम् · भीतरी यंत्र · एतेषु चक्षुः-आदिषु वर्ष्मणि · इन आँख आदि में और शरीर में · अहम् इति अभिमानेन · “मैं” के अभिमान के साथ · तिष्ठति · रहता है · आभास-तेजसा · उधार की, परावर्तित रोशनी से।
अर्थ: यह अंतःकरण इन आँख आदि इन्द्रियों में और शरीर में, “मैं” के अभिमान के साथ रहता है, और वह भी, उधार की, परावर्तित रोशनी से।
भावार्थ: एक शब्द यहाँ सब कुछ खोल देता है, “आभास।” आभास यानी परावर्तन, उधार की रोशनी।
एक तस्वीर: चाँद रात में चमकता है, पर उसकी अपनी कोई रोशनी नहीं। वह सूरज की रोशनी उधार ले कर चमकता है। अंतःकरण ठीक ऐसा ही है। वह “मैं, मैं” करता है, जीवंत लगता है, जागरूक लगता है, पर उसकी अपनी कोई चेतना नहीं। वह आत्मा की चेतना उधार ले कर “जागरूक” दिखता है। यह विवेकचूडामणि की एक बेहद ज़रूरी बात है: जिसे हम अपना जागरूक “मैं” समझते हैं, वह असल में चाँद है, असली सूरज (आत्मा) कहीं और है, और सारी रोशनी वहीं से आ रही है।
104 · अहंकार, कर्ता और भोक्ता
अहंकारः स विज्ञेयः कर्ता भोक्ताभिमान्ययम् ।
सत्त्वादिगुणयोगेन चावस्थात्रयमश्नुते ॥ 104 ॥
ahaṅkāraḥ sa vijñeyaḥ kartā bhoktābhimāny ayam · sattvādi-guṇa-yogena cāvasthā-trayam aśnute
शब्दार्थ: अहंकारः सः विज्ञेयः · वह अहंकार जानना चाहिए · कर्ता भोक्ता अभिमानी · “मैं करता हूँ, मैं भोगता हूँ” के अभिमान वाला · सत्त्व-आदि-गुण-योगेन · सत्व आदि गुणों के योग से · अवस्था-त्रयम् अश्नुते · तीनों अवस्थाएँ भोगता है।
अर्थ: वह अहंकार ऐसा जानना चाहिए, जो “मैं करता हूँ, मैं भोगता हूँ” का अभिमान करता है, और सत्व आदि गुणों के योग से तीनों अवस्थाएँ (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति) भोगता है।
भावार्थ: गुरु अहंकार पर वापस आते हैं (श्लोक 94 में परिचय हुआ था), और अब उसका असली काम बताते हैं, वह “कर्ता” और “भोक्ता” बनता है। यानी हर काम पर “मैंने किया” और हर अनुभव पर “मैंने भोगा” का दावा।
और यहीं पूरा फँसाव है। श्लोक 99-100 कह चुके कि असली “आप” साक्षी हो, असंग हो, बढ़ई हो। पर अहंकार वह पुर्ज़ा है जो साक्षी की कुर्सी पर बैठ कर “मैं कर्ता हूँ” का झंडा गाड़ देता है। बढ़ई का काम बसूले ने हड़प लिया। पूरी विवेकचूडामणि का “बंधन” यही एक ग़लत दावा है, और भाग 7 में इसका हल आएगा।
105 · सुख-दुख, किसके धर्म
विषयाणामानुकूल्ये सुखी दुःखी विपर्यये ।
सुखं दुःखं च तद्धर्मः सदानन्दस्य नात्मनः ॥ 105 ॥
viṣayāṇām ānukūlye sukhī duḥkhī viparyaye · sukhaṁ duḥkhaṁ ca tad-dharmaḥ sadānandasya nātmanaḥ
शब्दार्थ: विषयाणाम् आनुकूल्ये · विषयों के अनुकूल होने पर · सुखी · सुखी · विपर्यये दुःखी · प्रतिकूल होने पर दुखी · सुखं दुःखं तद्-धर्मः · सुख-दुख उसी (अहंकार) के धर्म हैं · सदानन्दस्य आत्मनः न · सदा-आनंद आत्मा के नहीं।
अर्थ: विषय अनुकूल हों तो (अहंकार) सुखी, प्रतिकूल हों तो दुखी। सुख और दुख, ये उसी (अहंकार) के धर्म हैं, सदा-आनंद आत्मा के नहीं।
भावार्थ: गुरु एक बहुत बड़ी बात बहुत शांति से कह देते हैं, सुख और दुख आपके नहीं हैं।
यह पहली बार में अजीब लगता है, क्योंकि सुख-दुख से ज़्यादा “अपना” तो कुछ लगता ही नहीं। पर गुरु की बात ध्यान से सुनिए। सुख-दुख ऊपर-नीचे होते रहते हैं, विषय अनुकूल, सुख; प्रतिकूल, दुख। जो चीज़ बदलती है, वह “धर्म” है, किसी बदलने वाली चीज़ का गुण, यानी अहंकार का। पर असली आत्मा “सदानन्द” है, एक थिर आनंद, जो बदलता नहीं। तो जो ऊपर-नीचे होता है वह “आप” नहीं हो सकते। यह बात बंधन नहीं काटती, पर एक दरार डाल देती है, अगली बार जब दुख आए, एक झीनी सी जगह बन सकती है, जहाँ से आप उसे आते देख सको, बजाय उसमें पूरे डूब जाने के।
106 · सबसे प्यारा, आत्मा
आत्मार्थत्वेन हि प्रेयान्विषयो न स्वतः प्रियः ।
स्वत एव हि सर्वेषामात्मा प्रियतमो यतः
तत आत्मा सदानन्दो नास्य दुःखं कदाचन ॥ 106 ॥
ātmārthatvena hi preyān viṣayo na svataḥ priyaḥ · svata eva hi sarveṣām ātmā priyatamo yataḥ · tata ātmā sadānando nāsya duḥkhaṁ kadācana
शब्दार्थ: आत्म-अर्थत्वेन हि प्रेयान् विषयः · विषय आत्मा के लिए ही प्यारा है · न स्वतः प्रियः · अपने आप में प्यारा नहीं · स्वतः एव सर्वेषाम् आत्मा प्रियतमः · आत्मा ही सबको स्वभाव से सबसे प्यारी है · आत्मा सदानन्दः · आत्मा सदा-आनंद है · न अस्य दुःखं कदाचन · इसे कभी दुख नहीं।
अर्थ: कोई विषय आत्मा के लिए ही प्यारा होता है, अपने आप में प्यारा नहीं। क्योंकि आत्मा ही सबको स्वभाव से सबसे प्यारी है। इसलिए आत्मा सदा-आनंद है; इसे कभी दुख नहीं होता।
भावार्थ: गुरु एक गहरी, और जाँच कर देखी जा सकने वाली बात कहते हैं, कोई चीज़ अपने आप में प्यारी नहीं होती; वह “आपके लिए” प्यारी होती है।
उपनिषद् की एक मशहूर बात इसके पीछे है: पति पत्नी को पति के लिए प्यारा नहीं। अपने ही “स्व” के लिए प्यारा है; धन, संतान, सब, सबके पीछे का असली प्रेम “स्व” का प्रेम है। हर चीज़ को हम इसलिए चाहते हैं कि वह हमें, हमारे “होने” को, कुछ देती लगती है। तो सबसे प्यारी चीज़ कोई बाहरी वस्तु नहीं; सबसे प्यारा “आप” ख़ुद हो। और अगर वह “आप”, आत्मा, सबसे प्यारी चीज़ है, तो वह स्वभाव से आनंद ही होगी। हम आनंद बाहर ढूँढते हैं; गुरु कहते हैं वह आपका अपना स्वभाव है।
107 · गहरी नींद का सबूत
यत्सुषुप्तौ निर्विषय आत्मानन्दोऽनुभूयते ।
श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं च जाग्रति ॥ 107 ॥
yat suṣuptau nirviṣaya ātmānando’nubhūyate · śrutiḥ pratyakṣam aitihyam anumānaṁ ca jāgrati
शब्दार्थ: यत् सुषुप्तौ निर्विषये · जो गहरी नींद में, बिना किसी विषय के · आत्म-आनन्दः अनुभूयते · आत्मा का आनंद अनुभव होता है · श्रुतिः प्रत्यक्षम् ऐतिह्यम् अनुमानं · श्रुति, प्रत्यक्ष, परम्परा, अनुमान · जाग्रति · (इसे) पुष्ट करते हैं।
अर्थ: गहरी नींद में, जहाँ कोई विषय नहीं होता, आत्मा का आनंद अनुभव होता है, इसे श्रुति, प्रत्यक्ष अनुभव, परम्परा और अनुमान, सभी पुष्ट करते हैं।
भावार्थ: श्लोक 106 ने कहा था आत्मा सदा-आनंद है। यह सवाल उठ सकता है, सबूत क्या? गुरु एक बहुत सीधा, रोज़ का सबूत देते हैं: गहरी नींद।
गहरी, सपने-रहित नींद में, कोई विषय नहीं। कोई वस्तु नहीं। कुछ “पाया” नहीं। फिर भी सुबह उठ कर हर कोई कहता है “बहुत अच्छी नींद आई।” वह आनंद कहाँ से आया? बाहर तो कुछ था ही नहीं। गुरु कहते हैं, वह आनंद आत्मा का अपना है। जब मन और इन्द्रियाँ थम जाती हैं, बाहरी सब हट जाता है, तब जो बचता है वह आनंद ही है। हर रात, हर इंसान, अनजाने, अपने सदा-आनंद स्वरूप को छू कर लौटता है। बस उसे पहचानता नहीं। अब, माया वाला हिस्सा शुरू होता है।
108 · माया, अव्यक्त शक्ति
अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्तिः अनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा ।
कार्यानुमेया सुधियैव माया यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते ॥ 108 ॥
avyakta-nāmnī parameśa-śaktiḥ anādy-avidyā tri-guṇātmikā parā · kāryānumeyā sudhiyaiva māyā yayā jagat sarvam idaṁ prasūyate
शब्दार्थ: अव्यक्त-नाम्नी · “अव्यक्त” नाम वाली · परमेश-शक्तिः · परमेश्वर की शक्ति · अनादि-अविद्या · अनादि अविद्या · त्रिगुण-आत्मिका · तीन गुणों वाली · कार्य-अनुमेया · अपने कामों से अनुमान की जा सकने वाली · सुधिया एव · बस तेज़ बुद्धि से · यया जगत् प्रसूयते · जिससे यह जगत जन्म लेता है।
अर्थ: “अव्यक्त” नाम वाली, परमेश्वर की शक्ति, अनादि अविद्या, तीन गुणों वाली, सर्वोच्च, यह माया अपने कामों से ही, बस तेज़ बुद्धि से अनुमान की जा सकती है। इसी से यह सारा जगत जन्म लेता है।
भावार्थ: गुरु अब अनात्मा की आख़िरी, और सबसे सूक्ष्म परत खोलते हैं, माया।
एक बात पहले समझिए, माया का मतलब “जादू” या “धोखा-धड़ी” नहीं। यहाँ एक सीधा शब्द काम का है, “कार्य-अनुमेया”, यानी जिसे सीधे देखा नहीं जा सकता, बस उसके कामों से अनुमान लगाया जा सकता है। बिजली को आपने कभी “देखा” नहीं। पर पंखा घूमता है, बल्ब जलता है, तो आप जानते हैं वह है। माया ऐसी ही है, वह रचने वाली शक्ति, जिससे यह पूरा जगत निकलता है, पर जो ख़ुद हमेशा परदे के पीछे रहती है। अगले श्लोक उसे और खोलेंगे।
109 · माया, न यह, न वह
सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो ।
साङ्गाप्यनङ्गा ह्युभयात्मिका नो महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा ॥ 109 ॥
sann āpy asann āpy ubhayātmikā no bhinnāpy abhinnāpy ubhayātmikā no · sāṅgāpy anaṅgā hy ubhayātmikā no mahādbhutānirvacanīya-rūpā
शब्दार्थ: सत् अपि असत् अपि · न सत्, न असत् · उभयात्मिका नो · न दोनों · भिन्ना अभिन्ना · न भिन्न, न अभिन्न · साङ्गा अनङ्गा · न अंगों वाली, न बिना अंगों की · महा-अद्भुत-अनिर्वचनीय-रूपा · बेहद अद्भुत, न बखानी जा सकने वाली।
अर्थ: माया न सत् है, न असत्, न दोनों; न भिन्न है, न अभिन्न, न दोनों; न अंगों वाली है, न बिना अंगों की, न दोनों, इसका रूप बेहद अद्भुत है, शब्दों में बखाना नहीं जा सकता।
भावार्थ: यह एक मशहूर श्लोक है, और पहली बार में सिर घुमा सकता है, हर बात कह कर तुरंत काट दी जाती है। पर इसमें एक गहरी, ईमानदार बात है।
माया “सत्” (पूरी तरह असली) नहीं। क्योंकि ज्ञान होते ही वह मिट जाती है। पर वह “असत्” (बिल्कुल है ही नहीं) भी नहीं। क्योंकि यह पूरा अनुभव होता दिख रहा है, इसे झुठलाया नहीं जा सकता। तो वह क्या है? सपने जैसी। सपना देखते वक़्त पूरा असली लगता है (असत् नहीं); जाग कर पता चलता है वह कभी था ही नहीं (सत् भी नहीं)। ऐसी चीज़ को कोई एक साफ़ खाँचा नहीं दिया जा सकता, इसलिए “अनिर्वचनीय।” गुरु यहाँ कमज़ोरी नहीं दिखा रहे; वे ईमानदारी दिखा रहे हैं। कुछ चीज़ें सच में दो खाँचों के बीच की होती हैं, और उन्हें वैसा ही कहना ही सही है।
110 · ज्ञान से मिटती है, और इसके तीन गुण
शुद्धाद्वयब्रह्मविभोधनाश्या सर्पभ्रमो रज्जुविवेकतो यथा ।
रजस्तमःसत्त्वमिति प्रसिद्धा गुणास्तदीयाः प्रथितैः स्वकार्यैः ॥ 110 ॥
śuddhādvaya-brahma-vibodha-nāśyā sarpa-bhramo rajju-vivekato yathā · rajas tamaḥ sattvam iti prasiddhā guṇās tadīyāḥ prathitaiḥ sva-kāryaiḥ
शब्दार्थ: शुद्ध-अद्वय-ब्रह्म-विबोध-नाश्या · शुद्ध अद्वय ब्रह्म के बोध से नष्ट होने वाली · सर्प-भ्रमः रज्जु-विवेकतः यथा · जैसे रस्सी के विवेक से साँप का भ्रम · रजः तमः सत्त्वम् · रजस, तमस, सत्व · गुणाः तदीयाः · इसके (माया के) गुण · प्रथितैः स्व-कार्यैः · अपने प्रसिद्ध कामों से।
अर्थ: शुद्ध, अद्वय ब्रह्म के बोध से माया नष्ट हो जाती है, जैसे रस्सी के विवेक से साँप का भ्रम। इसके तीन गुण हैं, रजस, तमस, सत्व, जो अपने प्रसिद्ध कामों से पहचाने जाते हैं।
भावार्थ: गुरु एक बड़ी राहत देते हैं, और एक नई बात शुरू करते हैं। राहत पहले, माया अनिर्वचनीय भले हो, पर वह “नष्ट होने वाली” है। और किससे? फिर वही रस्सी-साँप। रस्सी दिख जाए, साँप ग़ायब। ब्रह्म का बोध हो जाए, माया ग़ायब। माया अमर नहीं है; वह बस ज्ञान के उजाले से दूर तक टिकती है।
और नई बात, माया के तीन गुण: रजस, तमस, सत्व। ये तीन रंग हैं जिनसे माया हर चीज़ रँगती है। अगले श्लोक एक-एक को खोलेंगे, और यह कोई सूखा वर्गीकरण नहीं; यह अपने ही मन को पहचानने का एक औज़ार है।
111 · रजस, विक्षेप की शक्ति
विक्षेपशक्ती रजसः क्रियात्मिका यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ।
रागादयोऽस्याः प्रभवन्ति नित्यं दुःखादयो ये मनसो विकाराः ॥ 111 ॥
vikṣepa-śaktī rajasaḥ kriyātmikā yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī · rāgādayo’syāḥ prabhavanti nityaṁ duḥkhādayo ye manaso vikārāḥ
शब्दार्थ: विक्षेप-शक्तिः रजसः · रजस की विक्षेप-शक्ति · क्रिया-आत्मिका · क्रिया के स्वभाव वाली · यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी · जिससे यह पुरानी प्रवृत्ति फैली · राग-आदयः अस्याः प्रभवन्ति · राग आदि इसी से जन्म लेते हैं · दुःख-आदयः मनसः विकाराः · दुख आदि मन के विकार।
अर्थ: रजस की शक्ति “विक्षेप” है, क्रिया के स्वभाव वाली, जिससे यह पुरानी प्रवृत्ति (दौड़-भाग) फैली हुई है। राग आदि, और दुख जैसे मन के सारे विकार, सब इसी से जन्म लेते हैं।
भावार्थ: पहला गुण, रजस। और इसकी शक्ति का नाम है “विक्षेप।” विक्षेप यानी फेंकना, बिखेरना, इधर-उधर उछालना।
रजस को पहचानना आसान है, यह वह बेचैनी है जो मन को टिकने नहीं देती। एक काम ख़त्म नहीं हुआ कि अगला; एक इच्छा पूरी नहीं हुई कि दूसरी। यह लगातार की दौड़-भाग, यह “कुछ करते रहना”, यह रजस है। और गुरु एक बारीक बात जोड़ते हैं, राग (लगाव) और दुख, ये “मन के विकार” इसी से जन्म लेते हैं। यानी हमारी ज़्यादातर बेचैनी कोई बाहरी समस्या नहीं। एक भीतरी गुण का काम है। इसे पहचान लेना ही उससे थोड़ी दूरी बना देता है।
112 · रजस के काम, और बंधन
कामः क्रोधो लोभदम्भाद्यसूया अहंकारेर्ष्यामत्सराद्यास्तु घोराः ।
धर्मा एते राजसाः पुम्प्रवृत्तिः यस्मादेषा तद्रजो बन्धहेतुः ॥ 112 ॥
kāmaḥ krodho lobha-dambhādy-asūyā ahaṅkārerṣyā-matsarādyās tu ghorāḥ · dharmā ete rājasāḥ pum-pravṛttiḥ yasmād eṣā tad rajo bandha-hetuḥ
शब्दार्थ: कामः क्रोधः लोभः दम्भः असूया · इच्छा, क्रोध, लोभ, दिखावा, ईर्ष्या · अहंकार-ईर्ष्या-मत्सर · अहंकार, जलन, द्वेष · घोराः धर्माः राजसाः · ये भयानक राजसिक धर्म · पुम्-प्रवृत्तिः · मनुष्य की दौड़-भाग · रजः बन्ध-हेतुः · रजस बंधन का कारण।
अर्थ: इच्छा, क्रोध, लोभ, दिखावा, ईर्ष्या, अहंकार, जलन, द्वेष, ये भयानक राजसिक धर्म हैं। और चूँकि मनुष्य की सारी दौड़-भाग इन्हीं से चलती है, इसलिए रजस बंधन का कारण है।
भावार्थ: गुरु रजस की पूरी सूची सामने रख देते हैं, इच्छा, क्रोध, लोभ, दिखावा, ईर्ष्या, जलन। यह सूची असहज करती है, क्योंकि यह जानी-पहचानी है। ये कोई दूर के राक्षस नहीं; ये रोज़, हमारे भीतर, आते-जाते रहते हैं।
पर गुरु इन्हें गिना कर शर्मिंदा नहीं कर रहे। वे एक नक्शा दे रहे हैं। जब अगली बार भीतर क्रोध या जलन उठे, तो यह श्लोक एक नई नज़र देता है: “यह मैं नहीं हूँ, यह रजस का काम है, एक गुण की हलचल।” और यह नज़र ख़ुद एक दूरी बना देती है। आप विकार के भीतर डूबे नहीं रहते; आप उसे पहचान कर देखने लगते हैं। और गुरु साफ़ कह देते हैं, यही रजस “बंधन का कारण” है।
113 · तमस, आवरण की शक्ति
एषावृतिर्नाम तमोगुणस्य शक्तिर्मया वस्त्ववभासतेऽन्यथा ।
सैषा निदानं पुरुषस्य संसृतेः विक्षेपशक्तेः प्रवणस्य हेतुः ॥ 113 ॥
eṣāvṛtir nāma tamo-guṇasya śaktir mayā vastv avabhāsate’nyathā · saiṣā nidānaṁ puruṣasya saṁsṛteḥ vikṣepa-śakteḥ pravaṇasya hetuḥ
शब्दार्थ: एषा आवृतिः नाम · इसका नाम आवरण (ढकना) है · तमो-गुणस्य शक्तिः · तमोगुण की शक्ति · वस्तु अवभासते अन्यथा · चीज़ कुछ और ही दिखने लगती है · निदानं पुरुषस्य संसृतेः · मनुष्य के संसार-चक्र का मूल कारण · विक्षेप-शक्तेः हेतुः · विक्षेप-शक्ति का भी कारण।
अर्थ: तमोगुण की शक्ति का नाम “आवरण” है, जिससे कोई चीज़ कुछ और ही दिखने लगती है। यही मनुष्य के संसार-चक्र का मूल कारण है, और विक्षेप-शक्ति के सक्रिय होने का भी कारण।
भावार्थ: दूसरा गुण, तमस। और इसकी शक्ति का नाम है “आवरण”, यानी ढक देना।
फिर रस्सी-साँप। पूरी समस्या दो हिस्सों में है। एक, आवरण: अँधेरे ने रस्सी को “ढक” दिया, उसका असली रूप दिखना बंद। दो, विक्षेप: ढकी हुई जगह पर मन ने “साँप” फेंक दिया। गुरु एक ज़रूरी बात कहते हैं, आवरण पहले है, विक्षेप बाद में। पहले असली ढकता है, तभी नक़ली उभरता है। इसीलिए तमस का यह “ढकना” सबसे गहरी जड़ है, “संसृति का निदान”, संसार-चक्र का मूल कारण। और इसका मतलब यह भी है कि इलाज क्या है: रोशनी। ढकना तो बस रोशनी की कमी है।
114 · तमस, बड़े ज्ञानी को भी चूका देता है
प्रज्ञावानपि पण्डितोऽपि चतुरोऽप्यत्यन्तसूक्ष्मात्मदृग् व्यालीढस्तमसा न वेत्ति बहुधा संबोधितोऽपि स्फुटम् ।
भ्रान्त्यारोपितमेव साधु कलयत्यालम्बते तद्गुणान् हन्तासौ प्रबला दुरन्ततमसः शक्तिर्महत्यावृतिः ॥ 114 ॥
prajñāvān api paṇḍito’pi caturo’py atyanta-sūkṣmātma-dṛg vyālīḍhas tamasā na vetti bahudhā saṁbodhito’pi sphuṭam · bhrāntyāropitam eva sādhu kalayaty ālambate tad-guṇān hantāsau prabalā duranta-tamasaḥ śaktir mahaty āvṛtiḥ
शब्दार्थ: प्रज्ञावान् पण्डितः चतुरः अपि · बुद्धिमान, विद्वान, चतुर होते हुए भी · अत्यन्त-सूक्ष्म-आत्म-दृक् · सूक्ष्म आत्म-दृष्टि वाला · व्यालीढः तमसा · तमस से चाटा हुआ · न वेत्ति बहुधा संबोधितः अपि · बार-बार समझाए जाने पर भी नहीं समझता · भ्रान्ति-आरोपितम् साधु कलयति · भ्रम से थोपी चीज़ को सही मान बैठता है।
अर्थ: कोई कितना भी बुद्धिमान, विद्वान, चतुर हो, सूक्ष्म आत्म-दृष्टि वाला हो, अगर तमस ने उसे चाट लिया, तो वह बार-बार साफ़ समझाए जाने पर भी नहीं समझता; भ्रम से थोपी हुई चीज़ को ही सही मान बैठता है, उसी के गुणों का सहारा लेता है। हाय, यह तमस की आवरण-शक्ति बड़ी प्रबल है।
भावार्थ: गुरु एक ईमानदार, और थोड़ी डराने वाली बात कहते हैं, और यह ख़ास तौर पर एक समझदार पाठक के लिए है।
तेज़ बुद्धि तमस के ख़िलाफ़ कवच नहीं। एक इंसान बहुत होशियार हो सकता है, बहुत पढ़ा-लिखा, और फिर भी, अपनी ही ज़िंदगी की एक बुनियादी बात पर पूरी तरह अंधा। आप यह रोज़ देखते हैं: लोग दुनिया भर के मामलों में चतुर, पर अपने ही एक गहरे भ्रम को बार-बार समझाए जाने पर भी नहीं देख पाते। गुरु क्यों यह कहते हैं? घबराने को नहीं। विनम्र करने को। “मैं तो समझदार हूँ, मुझे यह सब समझ आ ही जाएगा”, यह अकड़ ख़ुद तमस का एक रूप है। असली समझ के लिए तेज़ दिमाग़ नहीं। खुला और विनम्र मन चाहिए।
115 · आवरण और विक्षेप, साथ-साथ सताते हैं
अभावना वा विपरीतभावना असंभावना विप्रतिपत्तिरस्याः ।
संसर्गयुक्तं न विमुञ्चति ध्रुवं विक्षेपशक्तिः क्षपयत्यजस्रम् ॥ 115 ॥
abhāvanā vā viparīta-bhāvanā asaṁbhāvanā vipratipattir asyāḥ · saṁsarga-yuktaṁ na vimuñcati dhruvaṁ vikṣepa-śaktiḥ kṣapayaty ajasram
शब्दार्थ: अभावना · सोच ही न पाना · विपरीत-भावना · उल्टा सोचना · असंभावना · संभव ही न मानना · विप्रतिपत्तिः · शक · अस्याः · इस (आवरण-शक्ति) के काम · संसर्ग-युक्तं न विमुञ्चति · जिससे यह जुड़ी, उसे छोड़ती नहीं · विक्षेप-शक्तिः क्षपयति अजस्रम् · विक्षेप-शक्ति लगातार सताती है।
अर्थ: सोच ही न पाना, उल्टा सोचना, संभव ही न मानना, और शक, ये आवरण-शक्ति के काम हैं। यह जिससे जुड़ जाए, उसे छोड़ती नहीं; और विक्षेप-शक्ति उसे लगातार सताती रहती है।
भावार्थ: गुरु आवरण-शक्ति के चार रूप गिनाते हैं, और यह सूची अपने ही मन में पहचानी जा सकती है। “अभावना”, किसी सच के बारे में सोच ही न पाना, वह दिमाग़ में आता ही नहीं। “विपरीत-भावना”, उसे उल्टा समझ लेना। “असंभावना”, “ऐसा हो ही नहीं सकता” मान लेना। “विप्रतिपत्ति”, लगातार शक में रहना।
ये चारों, एक तरह से, आत्म-ज्ञान के रास्ते की रुकावटें हैं। और गुरु एक तस्वीर देते हैं कि ये दो शक्तियाँ साथ कैसे काम करती हैं: आवरण आपको अँधेरे में जकड़े रखती है (छोड़ती नहीं), और विक्षेप उस अँधेरे में आपको लगातार सताती रहती है (डर, बेचैनी, राग-द्वेष से)। एक पकड़ कर रखती है, दूसरी मारती है। दोनों को पहचानना ही उनकी पकड़ ढीली करने का पहला कदम है।
116 · तमस के बाक़ी रूप
अज्ञानमालस्यजडत्वनिद्रा प्रमादमूढत्वमुखास्तमोगुणाः ।
एतैः प्रयुक्तो नहि वेत्ति किंचिन् निद्रालुवत्स्तम्भवदेव तिष्ठति ॥ 116 ॥
ajñāna-mālasya-jaḍatva-nidrā pramāda-mūḍhatva-mukhās tamo-guṇāḥ · etaiḥ prayukto nahi vetti kiṁcin nidrāluvat stambhavad eva tiṣṭhati
शब्दार्थ: अज्ञान-आलस्य-जडत्व-निद्रा · अज्ञान, आलस्य, जड़ता, नींद · प्रमाद-मूढत्व-मुखाः · लापरवाही, मूर्खता आदि · तमो-गुणाः · तमस के गुण · एतैः प्रयुक्तः · इनसे जुड़ा हुआ · न वेत्ति किंचित् · कुछ नहीं जानता · निद्रालु-वत् स्तम्भ-वत् · सोते हुए की तरह, खंभे की तरह।
अर्थ: अज्ञान, आलस्य, जड़ता, नींद, लापरवाही, मूर्खता, ये तमस के गुण हैं। इनसे जुड़ा हुआ इंसान कुछ नहीं जानता; सोते हुए की तरह, या खंभे की तरह खड़ा रहता है।
भावार्थ: गुरु तमस के रोज़मर्रा वाले रूप गिनाते हैं, आलस्य, जड़ता, नींद-सा भारीपन, लापरवाही। रजस की पहचान बेचैनी थी; तमस की पहचान एक भारी सुस्ती है, एक मंदपन।
“खंभे की तरह खड़ा रहता है”, यह उपमा चुभती है। एक खंभा होता तो है, पर उसमें कोई जान नहीं। कोई हलचल नहीं। कोई जागरूकता नहीं। तमस में डूबा इंसान जीता तो है, पर एक तरह की नींद में, चीज़ें होती रहती हैं, दिन बीतते रहते हैं, और वह कुछ “देखता” नहीं। यह डराने को नहीं कहा गया; यह एक आईना है। और इस आईने में अपने आप को थोड़ा भी पहचान लेना, यही उस नींद से जागने की पहली अंगड़ाई है।
117 · सत्व, साफ़ पानी, पर अकेला नहीं
सत्त्वं विशुद्धं जलवत्तथापि ताभ्यां मिलित्वा सरणाय कल्पते ।
यत्रात्मबिम्बः प्रतिबिम्बितः सन् प्रकाशयत्यर्क इवाखिलं जडम् ॥ 117 ॥
sattvaṁ viśuddhaṁ jalavat tathāpi tābhyāṁ militvā saraṇāya kalpate · yatrātma-bimbaḥ pratibimbitaḥ san prakāśayaty arka ivākhilaṁ jaḍam
शब्दार्थ: सत्त्वं विशुद्धं जल-वत् · सत्व पानी की तरह शुद्ध · ताभ्यां मिलित्वा · उन दोनों (रजस-तमस) से मिल कर · सरणाय कल्पते · संसार-यात्रा का कारण बनता है · आत्म-बिम्बः प्रतिबिम्बितः · आत्मा का प्रतिबिंब पड़ता है · प्रकाशयति अर्कः इव · सूरज की तरह रोशन करता है।
अर्थ: सत्व पानी की तरह शुद्ध है। फिर भी, उन दोनों (रजस और तमस) से मिल कर वह संसार-यात्रा का कारण बन जाता है। इसी सत्व में आत्मा का प्रतिबिंब पड़ता है, और वह सूरज की तरह सारी जड़ चीज़ों को रोशन करता है।
भावार्थ: तीसरा गुण, सत्व। और गुरु एक प्यारी, बारीक बात कहते हैं। सत्व अच्छा है, “पानी की तरह शुद्ध।” यह वह गुण है जो शांति, समझ, अच्छाई लाता है।
पर, और यहीं बारीकी है, सत्व भी आख़िर एक “गुण” ही है, माया का ही हिस्सा। शुद्ध पानी भी, अगर रजस-तमस की मिलावट हो, तो संसार-यात्रा का ही कारण बनता है। तो सत्व मंज़िल नहीं। पर उसकी एक ख़ास भूमिका है, सत्व इतना साफ़ है कि उसमें आत्मा का “प्रतिबिंब” साफ़ पड़ता है, जैसे साफ़ पानी में चाँद। तमस गंदला पानी है, प्रतिबिंब दिखता ही नहीं। सत्व साफ़ पानी है, प्रतिबिंब साफ़ दिखता है। इसलिए सत्व रास्ते का सबसे अच्छा साथी है, पर वह आख़िरी पड़ाव नहीं। आगे, पानी से ही ऊपर उठना है, असली चाँद तक।
118 · मिले हुए सत्व के गुण
मिश्रस्य सत्त्वस्य भवन्ति धर्माः त्वमानिताद्या नियमा यमाद्याः ।
श्रद्धा च भक्तिश्च मुमुक्षता च दैवी च सम्पत्तिरसन्निवृत्तिः ॥ 118 ॥
miśrasya sattvasya bhavanti dharmāḥ tv amānitādyā niyamā yamādyāḥ · śraddhā ca bhaktiś ca mumukṣatā ca daivī ca sampattir asan-nivṛttiḥ
शब्दार्थ: मिश्रस्य सत्त्वस्य धर्माः · मिले हुए सत्व के गुण · अमानिता-आद्याः · विनम्रता आदि · नियमाः यमाः · नियम और यम · श्रद्धा भक्तिः मुमुक्षता · श्रद्धा, भक्ति, मुक्ति की चाह · दैवी सम्पत्तिः · दैवी सम्पदा · असत्-निवृत्तिः · असत् से हटना।
अर्थ: मिले हुए (थोड़ी मिलावट वाले) सत्व के गुण हैं, विनम्रता आदि, यम-नियम, श्रद्धा, भक्ति, मुक्ति की चाह, दैवी सम्पदा, और असत् से मुँह मोड़ना।
भावार्थ: गुरु सत्व के दो दर्जे बताते हैं। यह श्लोक पहले दर्जे का है, “मिश्र सत्व”, यानी थोड़ी रजस-तमस की मिलावट वाला सत्व।
और देखिए इसके फल कितने सुंदर हैं, विनम्रता, श्रद्धा, भक्ति, मुक्ति की चाह, अच्छे संयम। ये वही गुण हैं जिन्हें परम्परा “दैवी सम्पदा” कहती है। ध्यान दीजिए, “मुमुक्षता” (मुक्ति की तड़प) तक यहीं, मिश्र सत्व में, गिनी गई है। यानी रास्ते पर चलने की चाह भी एक “गुण” का फल है। यह विनम्र करने वाली बात है: हमारी अच्छाई भी हमारी अपनी उपलब्धि नहीं। वह एक साफ़ होते मन का स्वाभाविक फूल है।
119 · शुद्ध सत्व के गुण
विशुद्धसत्त्वस्य गुणाः प्रसादः स्वात्मानुभूतिः परमा प्रशान्तिः ।
तृप्तिः प्रहर्षः परमात्मनिष्ठा यया सदानन्दरसं समृच्छति ॥ 119 ॥
viśuddha-sattvasya guṇāḥ prasādaḥ svātmānubhūtiḥ paramā praśāntiḥ · tṛptiḥ praharṣaḥ paramātma-niṣṭhā yayā sadānanda-rasaṁ samṛcchati
शब्दार्थ: विशुद्ध-सत्त्वस्य गुणाः · शुद्ध सत्व के गुण · प्रसादः · निर्मलता, प्रसन्नता · स्व-आत्म-अनुभूतिः · अपने स्वरूप का अनुभव · परमा प्रशान्तिः · परम शांति · तृप्तिः प्रहर्षः · तृप्ति, हर्ष · परमात्म-निष्ठा · परमात्मा में स्थिरता · सदानन्द-रसं समृच्छति · सदा-आनंद का रस पा लेता है।
अर्थ: शुद्ध सत्व के गुण हैं, निर्मल प्रसन्नता, अपने स्वरूप का अनुभव, परम शांति, तृप्ति, हर्ष, और परमात्मा में स्थिरता, जिससे साधक सदा-आनंद का रस पा लेता है।
भावार्थ: सत्व का दूसरा, ऊँचा दर्जा, “विशुद्ध सत्व”, बिना मिलावट का शुद्ध सत्व। और इसके फल पहले दर्जे से भी गहरे हैं।
एक फ़र्क ध्यान देने लायक़ है। मिश्र सत्व (श्लोक 118) के फल थे, श्रद्धा, भक्ति, मुक्ति की चाह, यानी रास्ते पर चलने वाले गुण। शुद्ध सत्व के फल हैं, “स्व-आत्म-अनुभूति” (अपने स्वरूप का अनुभव), परम शांति, तृप्ति, यानी मंज़िल के क़रीब वाले गुण। एक तैयारी है, दूसरा पहुँचना। पर, और गुरु इसे आगे साफ़ करेंगे, शुद्ध सत्व भी आख़िरी सीढ़ी ही है, मंज़िल का दरवाज़ा, मंज़िल नहीं। साफ़ पानी में चाँद का सबसे साफ़ प्रतिबिंब; पर असली चाँद अब भी ऊपर है।
120 · कारण शरीर और सुषुप्ति
अव्यक्तमेतत्त्रिगुणैर्निरुक्तं तत्कारणं नाम शरीरमात्मनः ।
सुषुप्तिरेतस्य विभक्त्यवस्था प्रलीनसर्वेन्द्रियबुद्धिवृत्तिः ॥ 120 ॥
avyaktam etat tri-guṇair niruktaṁ tat kāraṇaṁ nāma śarīram ātmanaḥ · suṣuptir etasya vibhakty-avasthā pralīna-sarvendriya-buddhi-vṛttiḥ
शब्दार्थ: अव्यक्तम् त्रिगुणैः निरुक्तं · तीन गुणों से बना अव्यक्त · कारणं नाम शरीरम् आत्मनः · आत्मा का कारण-शरीर · सुषुप्तिः एतस्य विभक्ति-अवस्था · सुषुप्ति इसकी अलग अवस्था · प्रलीन-सर्व-इन्द्रिय-बुद्धि-वृत्तिः · जहाँ सारी इन्द्रियाँ और बुद्धि की हलचल लीन हो जाती है।
अर्थ: तीन गुणों से बना यह अव्यक्त, आत्मा का “कारण-शरीर” कहलाता है। सुषुप्ति (गहरी नींद) इसकी अलग अवस्था है, जहाँ सारी इन्द्रियाँ और बुद्धि की हलचल लीन हो जाती है।
भावार्थ: गुरु तीसरा और आख़िरी शरीर बताते हैं, कारण-शरीर। याद कीजिए: स्थूल शरीर (श्लोक 88) का साथी जागृत अवस्था थी, सूक्ष्म शरीर (98) का स्वप्न। अब कारण-शरीर का साथी, गहरी नींद, सुषुप्ति।
“कारण” क्यों? क्योंकि यह बाक़ी दोनों शरीरों का बीज है। गहरी नींद में स्थूल और सूक्ष्म, दोनों शरीर “लीन” हो जाते हैं, सिमट जाते हैं, पर मिटते नहीं। वे एक बीज-रूप में बचे रहते हैं, और सुबह फिर खुल जाते हैं। यह तीन शरीरों की पूरी व्यवस्था है, स्थूल, सूक्ष्म, कारण। और गुरु जो कर रहे हैं वह स्पष्ट है: तीनों शरीर गिना दिए, तीनों को “अनात्मा” के खाते में रख दिया। तीनों “आप” नहीं हो।
121 · “मुझे कुछ पता नहीं था”
सर्वप्रकारप्रमितिप्रशान्तिः बीजात्मनावस्थितिरेव बुद्धेः ।
सुषुप्तिरेतस्य किल प्रतीतिः किंचिन्न वेद्मीति जगत्प्रसिद्धेः ॥ 121 ॥
sarva-prakāra-pramiti-praśāntiḥ bījātmanāvasthitir eva buddheḥ · suṣuptir etasya kila pratītiḥ kiṁcin na vedmīti jagat-prasiddheḥ
शब्दार्थ: सर्व-प्रकार-प्रमिति-प्रशान्तिः · हर तरह के ज्ञान का थम जाना · बीज-आत्मना अवस्थितिः बुद्धेः · बुद्धि का बीज-रूप में बचे रहना · सुषुप्तिः एतस्य प्रतीतिः · सुषुप्ति का सबूत · “किंचित् न वेद्मि” इति · “मुझे कुछ पता नहीं था”, यह · जगत्-प्रसिद्धेः · सबकी जानी हुई बात से।
अर्थ: हर तरह की जानकारी का थम जाना, और बुद्धि का बस बीज-रूप में बचे रहना, यही सुषुप्ति है। और इसका सबूत वह सबकी जानी हुई बात है, “मुझे (नींद में) कुछ पता नहीं था।”
भावार्थ: गुरु एक बेहद चतुर बात की ओर इशारा करते हैं, और यह रोज़ के एक वाक्य से शुरू होती है, “मुझे कुछ पता नहीं था।”
गहरी नींद से उठ कर हर कोई यह कहता है। अब ज़रा रुक कर सोचिए: अगर नींद में सच में “कुछ नहीं था”, कोई था ही नहीं। तो यह “मुझे पता नहीं था” किसने जाना? किसी को तो उस “कुछ नहीं” की मौजूदगी में रहना पड़ा होंगे, ताकि वह उठ कर उसकी गवाही दे सके। वह “कोई”, वह साक्षी जो नींद के ख़ालीपन में भी मौजूद था, वही असली “आप” हो। गुरु एक रोज़ के, मामूली वाक्य में आत्मा का सबूत छिपा कर दिखा देते हैं। नींद में शरीर सोया, मन सोया, पर एक चेतना जागती रही, वरना उस नींद को “जाना” किसने?
122 · यह सब, अनात्मा
देहेन्द्रियप्राणमनोऽहमादयः सर्वे विकारा विषयाः सुखादयः ।
व्योमादिभूतान्यखिलं न विश्वं अव्यक्तपर्यन्तमिदं ह्यनात्मा ॥ 122 ॥
dehendriya-prāṇa-mano’ham-ādayaḥ sarve vikārā viṣayāḥ sukhādayaḥ · vyomādi-bhūtāny akhilaṁ na viśvaṁ avyakta-paryantam idaṁ hy anātmā
शब्दार्थ: देह-इन्द्रिय-प्राण-मनः-अहम्-आदयः · शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन, अहंकार आदि · सर्वे विकाराः विषयाः सुख-आदयः · सब विकार, विषय, सुख आदि · व्योम-आदि-भूतानि · आकाश आदि तत्व · अखिलं विश्वं · पूरा विश्व · अव्यक्त-पर्यन्तम् · अव्यक्त (माया) तक · इदं हि अनात्मा · यह सब अनात्मा है।
अर्थ: शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, अहंकार आदि; सब विकार, विषय, सुख आदि; आकाश आदि तत्व; पूरा विश्व, अव्यक्त (माया) तक, यह सब अनात्मा है।
भावार्थ: यह श्लोक एक झाड़ू है। गुरु ने श्लोक 72 से ले कर अब तक एक-एक चीज़ उठाई, जाँची, और “आप नहीं हो” कह कर रखी, शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, अहंकार, तीनों गुण, माया। यह श्लोक उन सबको एक ढेर में समेट देता है, और उस ढेर पर एक नाम लिख देता है: “अनात्मा।”
शिष्य ने भाग 3 में पूछा था, “अनात्मा क्या है?” यह उसका पूरा, साफ़ जवाब है। और देखिए दायरा कितना बड़ा है, सिर्फ़ शरीर-मन नहीं। “पूरा विश्व, अव्यक्त तक।” यानी हर वह चीज़ जिसका आप अनुभव कर सकते हैं, जिसे आप जान सकते हैं, वह सब अनात्मा है। क्यों? क्योंकि “आप” वह हो जो जानता है। और जानने वाला कभी जानी हुई चीज़ नहीं हो सकता।
123 · एक मरीचिका
माया मायाकार्यं सर्वं महदादिदेहपर्यन्तम् ।
असदिदमनात्मतत्त्वं विद्धि त्वं मरुमरीचिकाकल्पम् ॥ 123 ॥
māyā māyā-kāryaṁ sarvaṁ mahad-ādi-deha-paryantam · asad idam anātma-tattvaṁ viddhi tvaṁ maru-marīcikā-kalpam
शब्दार्थ: माया माया-कार्यं सर्वं · माया और माया का सारा काम · महत्-आदि-देह-पर्यन्तम् · महत्-तत्व से ले कर शरीर तक · असत् इदं अनात्म-तत्त्वं · यह असत्, अनात्म-तत्व · विद्धि त्वं · आप जान · मरु-मरीचिका-कल्पम् · रेगिस्तान की मरीचिका जैसा।
अर्थ: माया, और महत्-तत्व से ले कर शरीर तक माया का सारा काम, इस पूरे असत्, अनात्म-तत्व को, आप रेगिस्तान की मरीचिका जैसा जान।
भावार्थ: यह भाग 4 का समापन है, और गुरु पूरी अनात्मा को एक आख़िरी, यादगार उपमा दे देते हैं, रेगिस्तान की मरीचिका।
इस उपमा को ठीक से समझिए, क्योंकि यह बहुत बारीक है। मरीचिका में पानी “दिखता” है,आँखों को सच में चमक दिखती है। पर वहाँ पानी “है” नहीं। यानी मरीचिका न पूरी तरह “है” (वहाँ पानी नहीं), न पूरी तरह “नहीं है” (चमक तो दिखी)। यह ठीक श्लोक 109 की “अनिर्वचनीय” बात है। गुरु यह नहीं कह रहे कि दुनिया का अनुभव नहीं होता, या उसे नकार दो। वे कह रहे हैं, इसे वह ठोस, अंतिम सच मत मानो जो यह दिखती है। और एक प्यारी बात इस श्लोक में छिपी है, गुरु कहते हैं “विद्धि त्वम्”, आप जान। यानी अब, अनात्मा का पूरा सर्वेक्षण ख़त्म हुआ, गुरु शिष्य को सीधे संबोधित करते हैं। ढेर एक तरफ़ रख दिया गया। अगला भाग उस एक चीज़ की बात करेगा जो इस पूरे ढेर से बच जाती है, असली “तुम।”
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना: भाग 5 · आत्मा का स्वरूप, चार भागों तक गुरु ने बस “आप यह नहीं हो” कहा। अब, पहली बार, वे सीधा बताते हैं, “आप यह हैं।” जो साक्षी अब तक झलकता रहा, उसका पूरा चित्र खुलता है।
और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 121 कहता है, गहरी नींद में भी कोई जागता रहा, वरना “मुझे कुछ पता नहीं था” किसने जाना? आज रात सोने से पहले इस सवाल को साथ ले जाइए। और सुबह उठते ही, सबसे पहले विचार से पहले, एक पल के लिए, देखिए कि क्या वहाँ कोई पहले से मौजूद है।