Lulla Family

भाग 4 · अनात्म का खंडन

विवेकचूडामणि

भाग 4 · अनात्मा, शरीर, मन और माया · श्लोक 72-123

शिष्य ने पूछा था, अनात्मा क्या है, आत्मा क्या है। गुरु सबसे ठोस सिरे से उत्तर आरम्भ करते हैं, यह शरीर। फिर परत-दर-परत, इन्द्रियाँ, मन, प्राण, माया, हर एक को आँख में आँख डाल कर देखते हैं और कहते हैं, यह आप नहीं हैं, इसे एक ओर रख दीजिए।

52 श्लोक · पाठ-काल लगभग 60 मिनट · पूर्व भाग: भाग 3 · गुरु की शरण · विवेकचूडामणि मुख्य पृष्ठ

गुरु अब शिष्य के प्रश्न का मूल उत्तर आरम्भ करते हैं। आत्मा क्या है, यह सीधे बताने से पहले वे दिखाते हैं कि आत्मा क्या नहीं है। एक-एक वस्तु उठाते हैं, ठहर कर परखते हैं, और एक ओर रख देते हैं। इसी विधि को नेति-नेति कहते हैं, यह नहीं, यह भी नहीं। जैसे मूर्तिकार पत्थर से वही हटाता है जो मूर्ति नहीं है, और जो शेष रहता है वही मूर्ति है। और आरम्भ वे सबसे ठोस, सबसे जानी-पहचानी वस्तु से करते हैं, यह शरीर। आरम्भ कोई काव्य नहीं, केवल एक सूची है। मज्जा, हड्डी, चर्बी, मांस, ख़ून, चमड़ी, और पैर, जाँघ, छाती, बाँह, पीठ, सिर, इन्हीं अंगों-उपांगों से यह शरीर बना है। हम इसी को मैं मान कर इससे लिपटे रहते हैं, इसीलिए गुरु पहले इसे इसके अवयवों में खोल कर रख देते हैं, ताकि जिसे अब तक मैं कहते आए हैं, उसे एक बार रुक कर, स्वच्छ दृष्टि से देख लिया जाए।

72 · यह शरीर, किससे बना

मज्जास्थिमेदःपलरक्तचर्म त्वगाह्वयैर्धातुभिरेभिरन्वितम् ।
पादोरुवक्षोभुजपृष्ठमस्तकैः अङ्गैरुपाङ्गैरुपयुक्तमेतत् ॥ 72 ॥

फिर गुरु इस शरीर को एक नाम देते हैं, मोह का अड्डा, वह जगह जहाँ से सारी ग़लतफ़हमी आरम्भ होती है। मैं, अर्थात मैं यह शरीर हूँ, और मेरा, अर्थात मेरा घर, मेरा परिवार, मेरी वस्तुएँ, इन दोनों की जड़ यहीं है। एक बार शरीर को मैं मान लेने पर मेरा का पूरा संसार अपने आप खड़ा हो जाता है। साथ ही गुरु एक और सूत्र छेड़ देते हैं, यह स्थूल शरीर पाँच सूक्ष्म तत्वों से बना है, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। और यही पाँच तत्व आपस के अंशों से मिल कर स्थूल बन जाते हैं, और शरीर का कारण बनते हैं। इतना ही नहीं, इन्हीं की मात्राएँ पाँच विषय, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध, बन कर भोक्ता के सुख के लिए सामने आ खड़ी होती हैं। एक गहरी बात इसमें छिपी है, शरीर और संसार, देखने वाला और देखा जाने वाला, दोनों एक ही कच्चे माल से बने हैं, दोनों ही अनात्मा हैं।

73 · मैं और मेरा का अड्डा

अहंममेतिप्रथितं शरीरं मोहास्पदं स्थूलमितीर्यते बुधैः ।
नभोनभस्वद्दहनाम्बुभूमयः सूक्ष्माणि भूतानि भवन्ति तानि ॥ 73 ॥

74 · तत्व, शरीर, और पाँच विषय

परस्परांशैर्मिलितानि भूत्वा स्थूलानि च स्थूलशरीरहेतवः ।
मात्रास्तदीया विषया भवन्ति शब्दादयः पञ्च सुखाय भोक्तुः ॥ 74 ॥

अब गुरु एक चलती-फिरती छवि देते हैं। जो मूढ़ इन विषयों में बँधे हैं, वे विषयों से नहीं, राग की उस मोटी रस्सी से बँधे हैं, जिसे क़ाबू करना बहुत कठिन है। दोष ध्वनि, रूप या स्वाद में नहीं, वे तो केवल हैं; बन्धन उस पकड़ में है जो हम उन पर बना लेते हैं। और जो इस रस्सी से बँधा है, वह स्वयं को स्वतंत्र अनुभव करते हुए भी, अपने ही कर्म रूपी दूत के हाथों तेज़ी से, ऊपर-नीचे, खींचा-धकेला जाता रहता है। फिर गुरु भाग का सबसे यादगार हिसाब रखते हैं। पाँच जानवर, हर एक केवल एक ही इन्द्रिय की कमज़ोरी से मारा जाता है। हिरण शिकारी के संगीत पर खिंच आता है, हाथी स्पर्श के लोभ में फँसता है, पतंगा रूप की चमक पर जल मरता है, मछली स्वाद के लोभ में काँटे पर आ जाती है, और भौंरा गन्ध में मग्न हो कर फूल में बन्द हो जाता है। हर एक को एक ही इन्द्रिय ले डूबी; और मनुष्य के पास तो पाँचों खुली हैं।

75 · राग की रस्सी

य एषु मूढा विषयेषु बद्धा रागोरुपाशेन सुदुर्दमेन ।
आयान्ति निर्यान्त्यध ऊर्ध्वमुच्चैः स्वकर्मदूतेन जवेन नीताः ॥ 75 ॥

76 · पाँच जानवर, एक-एक इन्द्रिय

शब्दादिभिः पञ्चभिरेव पञ्च पञ्चत्वमापुः स्वगुणेन बद्धाः ।
कुरङ्गमातङ्गपतङ्गमीन भृङ्गा नरः पञ्चभिरञ्चितः किम् ॥ 76 ॥

यह भय जगाने को नहीं, जागृति के लिए कहा गया है। गुरु एक तीखी तुलना आगे रखते हैं, इन्द्रिय-विषय अपनी हानि में काले साँप के ज़हर से भी तेज़ है। साँप का विष तभी मारता है जब वह शरीर में पहुँचे, पिया या डसा जाए, उसकी एक सीमा है। पर विषय तो उसे भी मार देता है जो इसे केवल आँख से देख ले। एक वस्तु दिखी, मन में चाह जाग उठी, खिंचाव बन गया, और विषय ने बिना छुए अपना काम कर दिया। यही उसे अधिक घातक बनाता है, वह दूर से, चुपके से काम करता है। इसीलिए गुरु अगली बात बड़ी हिम्मत से कहते हैं, विषयों की चाह के उस बड़े फंदे से जो छूट गया, केवल वही मुक्ति का पात्र है, चाहे कोई छहों शास्त्रों का जानकार ही क्यों न हो। साधक की प्रगति का माप यह नहीं कि कितना पढ़ा-समझा गया, बल्कि यह कि भीतर की पकड़ कितनी ढीली हुई।

77 · विषय, ज़हर से भी तेज़

दोषेण तीव्रो विषयः कृष्णसर्पविषादपि ।
विषं निहन्ति भोक्तारं द्रष्टारं चक्षुषाप्ययम् ॥ 77 ॥

78 · जो विषय-इच्छा से छूटा, वही पात्र

विषयाशामहापाशाद्यो विमुक्तः सुदुस्त्यजात् ।
स एव कल्पते मुक्त्यै नान्यः षट्शास्त्रवेद्यपि ॥ 78 ॥

पर वैराग्य ऊपरी हुआ तो काम न आएगा। गुरु एक कँपा देने वाला चित्र देते हैं। जिनका वैराग्य बस क्षणिक है, ऐसे मुमुक्षु जब संसार-समुद्र पार करने को तत्पर होते हैं, तो चाह का मगरमच्छ बीच में ही उनका गला पकड़ कर, ज़ोर से वापस खींच कर डुबो देता है। आरम्भ में रुक जाना अलग बात है, पर आधा मार्ग तय कर के, छिपी चाह के हाथों वापस खिंच जाना, यही वह जाल है जिससे गुरु सावधान कर रहे हैं। और तुरंत वे हल भी देते हैं। वही मगरमच्छ, पर अब एक तलवार के साथ। जिसने उस विषय-मगरमच्छ को गहरे वैराग्य की तलवार से मार दिया, वह बिना किसी रुकावट के संसार-समुद्र पार चला जाता है। भय और भरोसा, गुरु दोनों साथ देते हैं।

79 · ऊपरी वैराग्य, और बीच में डूबना

आपातवैराग्यवतो मुमुक्षून् भवाब्धिपारं प्रतियातुमुद्यतान् ।
आशाग्रहो मज्जयतेऽन्तराले निगृह्य कण्ठे विनिवर्त्य वेगात् ॥ 79 ॥

80 · वैराग्य की तलवार

विषयाख्यग्रहो येन सुविरक्त्यसिना हतः ।
स गच्छति भवाम्भोधेः पारं प्रत्यूहवर्जितः ॥ 80 ॥

अब गुरु दो मार्ग आमने-सामने रख देते हैं, और एक सच्चे शिक्षक की भाँति हर एक के अन्त में एक छोटी मुहर लगा देते हैं। पहला, विषयों का टेढ़ा मार्ग, मलिन मन के साथ, जहाँ हर पग पर मृत्यु सामने आती है, यह जान लें। दूसरा, हितैषी, सज्जन और गुरु के वचन से, अपने विवेक के साथ, जहाँ फल अवश्य मिलता है, इसे सत्य मान लें। दूसरे मार्ग में दो वस्तुएँ साथ हैं, बाहर का मार्गदर्शन और भीतर का विवेक, दोनों हाथ में हाथ डाले। और फिर एक सीधी, व्यावहारिक सलाह, यदि सचमुच मोक्ष की चाह है तो विषयों को विष की तरह बहुत दूर से ही त्याग दें, और सन्तोष, दया, क्षमा, सरलता, शान्ति, संयम को अमृत की तरह सदा आदर से अपना लें। इन छह गुणों में एक भी चमकदार उपलब्धि नहीं, ये सब रोज़मर्रा के सहज गुण हैं, जिन्हें आज, अभी अपनाया जा सकता है।

81 · दो रास्ते

विषमविषयमार्गैर्गच्छतोऽनच्छबुद्धेः प्रतिपदमभियातो मृत्युरप्येष विद्धि ।
हितसुजनगुरुक्त्या गच्छतः स्वस्य युक्त्या प्रभवति फलसिद्धिः सत्यमित्येव विद्धि ॥ 81 ॥

82 · ज़हर छोड़ो, अमृत पियो

मोक्षस्य कांक्षा यदि वै तवास्ति त्यजातिदूराद्विषयान्विषं यथा ।
पीयूषवत्तोषदयाक्षमार्जव प्रशान्तिदान्तीर्भज नित्यमादरात् ॥ 82 ॥

फिर गुरु एक तीखी, पर सोचने लायक़ बात कहते हैं। हर पल का असली काम है, अनादि अज्ञान से बने बंधन से छूटना; इसे छोड़ कर जो केवल शरीर के पालन-पोषण में ही लगा रहता है, वह अपने आप को ही मार डालता है, क्योंकि यह शरीर तो किसी और के काम का है। शरीर एक औज़ार है, साधन है, मंज़िल नहीं, सवारी है। और भूल यह है कि सवारी की इतनी देखभाल में लग जाएँ कि सफ़र ही भूल जाएँ। गुरु शरीर की उपेक्षा नहीं कहते, वे उसमें डूब जाने को मना करते हैं। और एक डरावनी तस्वीर भी देते हैं, जो शरीर के पोषण में ही लगा रहते हुए आत्मा को पाना चाहता है, वह मगरमच्छ को लकड़ी समझ कर, उसे पकड़ कर नदी पार करने निकलता है। शरीर से चिपके रहना और साथ-साथ आत्मा को भी पाना, ये परस्पर विरुद्ध दिशाएँ हैं; साधक उसी का सहारा ले रहा होता है जो उसे डुबोएगा।

83 · असली काम छोड़ कर शरीर पालना

अनुक्षणं यत्परिहृत्य कृत्यं अनाद्यविद्याकृतबन्धमोक्षणम् ।
देहः परार्थोऽयममुष्य पोषणे यः सज्जते स स्वमनेन हन्ति ॥ 83 ॥

84 · मगरमच्छ को लकड़ी समझना

शरीरपोषणार्थी सन् य आत्मानं दिदृक्षति ।
ग्राहं दारुधिया धृत्वा नदि तर्तुं स गच्छति ॥ 84 ॥

यहाँ गुरु एक शब्द को नई परिभाषा देते हैं, महामृत्यु। हम मृत्यु से डरते हैं, शरीर के छूट जाने से। पर गुरु कहते हैं, साधक के लिए असली महामृत्यु शरीर आदि में मोह है; जिसने इस मोह को पूरी तरह जीत लिया, वही मुक्ति-पद का अधिकारी है। शरीर का छूटना तो सबका होता है, वह कोई आध्यात्मिक पराजय नहीं; पर मैं यह शरीर हूँ वाली भ्रान्ति में पूरा जीवन बिता देना, वह मृत्यु है जो जीते-जी हो जाती है। इसीलिए गुरु सीधा आदेश देते हैं, शरीर, पत्नी, सन्तान आदि में जो मोह है उस महामृत्यु को जीत लें, जिसे जीत कर मुनि विष्णु के परम पद पर पहुँचते हैं। यहाँ एक बात स्पष्ट रखनी आवश्यक है, गुरु प्रेम त्यागने को नहीं कह रहे। मोह वह भ्रान्त समीकरण है कि मेरा होना इन सम्बन्धों पर टिका है, इनके बिना मैं कुछ नहीं। उस जकड़न को जीतना अपनों से दूर जाना नहीं, बल्कि उन्हें और स्वच्छ, और निर्भय प्रेम कर पाना है।

85 · मोह, असली महामृत्यु

मोह एव महामृत्युर्मुमुक्षोर्वपुरादिषु ।
मोहो विनिर्जितो येन स मुक्तिपदमर्हति ॥ 85 ॥

86 · इस मोह को जीत लो

मोहं जहि महामृत्युं देहदारसुतादिषु ।
यं जित्वा मुनयो यान्ति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ 86 ॥

अब गुरु शरीर की वही सूची फिर देते हैं, पर इस बार थोड़े और रूखेपन से। चमड़ी, मांस, ख़ून, नस, चर्बी, मज्जा, हड्डी से भरा, मल-मूत्र से भरा, यह स्थूल शरीर साधारण है, बखानने लायक़ नहीं। यह नफ़रत सिखाने को नहीं, एक ख़ास बीमारी की दवा है, शरीर के प्रति हमारा अंध-मोह, हमारी हद से ज़्यादा सजावट और चिंता; एक रूखी, ईमानदार नज़र वह मोह तोड़ देती है। फिर गुरु एक व्यवस्था खोलते हैं, हर शरीर के साथ एक अवस्था जुड़ी है। पंचीकृत स्थूल तत्वों से, पुराने कर्म के कारण, यह स्थूल शरीर बना, आत्मा का भोग-स्थान, और इसकी अवस्था जागृत है, क्योंकि यहीं स्थूल चीज़ों का अनुभव होता है। शरीर को भोग-आयतन कहा है, अनुभव करने का एक मकान। आप किराएदार हैं, मकान नहीं।

87 · शरीर, एक साफ़ नज़र

त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमेदोमज्जास्थिसंकुलम् ।
पूर्णं मूत्रपुरीषाभ्यां स्थूलं निन्द्यमिदं वपुः ॥ 87 ॥

88 · स्थूल शरीर और जागृत अवस्था

पञ्चीकृतेभ्यो भूतेभ्यः स्थूलेभ्यः पूर्वकर्मणा ।
समुत्पन्नमिदं स्थूलं भोगायतनमात्मनः
अवस्था जागरस्तस्य स्थूलार्थानुभवो यतः ॥ 88 ॥

जागृत अवस्था वह समय है जब स्थूल शरीर सबसे आगे होता है। बाहरी इन्द्रियों से, माला, चंदन और अनेक रूपों में, स्थूल चीज़ों का उपभोग जीव स्वयं करता है, इसलिए इस शरीर की प्रमुखता जागृत अवस्था में है। एक बात ध्यान देने योग्य है, जीव यह उपभोग मूक दर्शक की तरह नहीं, स्वयं इस खेल में उतर कर करता है; यह आगे मर्म पर लगेगी, जब गुरु बताएँगे कि असली आत्मा इस सबसे परे, केवल साक्षी है। फिर एक राहत भरी उपमा, पुरुष का सारा बाहरी संसार-जीवन जिस पर टिका है, इस स्थूल देह को वैसा ही जानिए जैसे गृहस्थ का घर। समझदार व्यक्ति अपने घर से प्रेम करते हुए भी जानता है कि वह घर नहीं है। शरीर भी ऐसा ही है, बाहरी जीवन का ठिकाना, पर आत्मा नहीं।

89 · जागते में, बाहर की दुनिया

बाह्येन्द्रियैः स्थूलपदार्थसेवां स्रक्चन्दनस्त्र्यादिविचित्ररूपाम् ।
करोति जीवः स्वयमेतदात्मना तस्मात्प्रशस्तिर्वपुषोऽस्य जागरे ॥ 89 ॥

90 · शरीर, गृहस्थ का घर

सर्वापि बाह्यसंसारः पुरुषस्य यदाश्रयः ।
विद्धि देहमिदं स्थूलं गृहवद्गृहमेधिनः ॥ 90 ॥

स्थूल शरीर वाला हिस्सा गुरु एक बेहद मुक्त कर देने वाली बात से समाप्त करते हैं। जन्म, बुढ़ापा, मृत्यु; मोटापा आदि; बचपन-जवानी की अवस्थाएँ; वर्ण-आश्रम के नियम; तरह-तरह की बीमारियाँ; और आदर, अपमान, सम्मान, यह पूरी सूची शरीर के धर्म हैं, आपके नहीं। इन सबको हम अपने साथ हुआ मानते हैं, मैं बूढ़ा हो रहा हूँ, मेरा अपमान हुआ। गुरु कहते हैं, ये सब उस घर के साथ होते हैं, घर में रहने वाले के साथ नहीं। वृद्धावस्था शरीर को आती है, अपमान उस सामाजिक पहचान को लगता है जो शरीर से जुड़ी है। यदि यह बात सचमुच भीतर बैठ जाए, कि ये मेरे साथ नहीं, इसके साथ हो रहे हैं, तो जीवन का आधा बोझ अपने आप उतर जाता है।

91 · ये सब शरीर के धर्म हैं

स्थूलस्य संभवजरामरणानि धर्माः स्थौल्यादयो बहुविधाः शिशुताद्यवस्थाः ।
वर्णाश्रमादिनियमा बहुधामयाः स्युः पूजावमानबहुमानमुखा विशेषाः ॥ 91 ॥

स्थूल शरीर एक ओर रख कर गुरु अगली, बारीक परत खोलते हैं, सूक्ष्म शरीर। और उसका पहला हिस्सा हैं दस इन्द्रियाँ। कान, त्वचा, आँख, नाक, जीभ, ये पाँच ज्ञान की इन्द्रियाँ हैं, क्योंकि ये विषयों को जानती हैं; और वाणी, हाथ, पैर, गुदा, जननेन्द्रिय, ये पाँच कर्म की इन्द्रियाँ हैं, क्योंकि ये कर्मों में लगी रहती हैं। एक सरल विभाजन है, पाँच भीतर समाचार लाती हैं, पाँच बाहर क्रिया भेजती हैं। पर गुरु यह सूची याद कराने को नहीं बना रहे, वे नेति-नेति चला रहे हैं, ये दस इन्द्रियाँ भी आत्मा नहीं हैं, ये केवल उपकरण हैं जिन्हें आत्मा प्रयोग करती है।

92 · दस इन्द्रियाँ

बुद्धीन्द्रियाणि श्रवणं त्वगक्षि घ्राणं च जिव्हा विषयावबोधनात् ।
वाक्पाणिपादा गुदमप्युपस्थः कर्मेन्द्रियाणि प्रवणेन कर्मसु ॥ 92 ॥

अब गुरु अंतःकरण खोलते हैं, हमारा भीतरी यंत्र, जिसे हम सबसे ज़्यादा मैं मानते हैं। और वे इसे एक नहीं, चार कामों में बाँट देते हैं, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त, हर एक अपने-अपने काम से। मन वह है जो निरन्तर चाहता है, फिर सन्देह करता है, यह करूँ कि वह; और बुद्धि वह है जो ठहर कर निश्चय करती है, यह उचित है। फिर बाक़ी दो, इन सबमें अभिमान के कारण मैं कहने वाला अहंकार है, जो मन की चाह पर मैंने चाहा और बुद्धि के निश्चय पर मैंने तय किया का दावा ठोक देता है; और अपने मतलब की चीज़ बार-बार ढूँढते रहने के गुण से चित्त है, मन का वह हिस्सा जो पसंद, यादें और लगाव बार-बार सामने लाता रहता है। गुरु एक-एक को नाम दे कर असल में इस मैं को, जिसे हम एक ठोस चीज़ समझते हैं, उसके पुर्ज़ों में खोल कर दिखा रहे हैं। जो पुर्ज़ों से बना है, वह आख़िरी मैं नहीं हो सकता।

93 · अंतःकरण, मन और बुद्धि

निगद्यतेऽन्तःकरणं मनोधीः अहंकृतिश्चित्तमिति स्ववृत्तिभिः ।
मनस्तु संकल्पविकल्पनादिभिः बुद्धिः पदार्थाध्यवसायधर्मतः ॥ 93 ॥

94 · अहंकार और चित्त

अत्राभिमानादहमित्यहंकृतिः ।
स्वार्थानुसन्धानगुणेन चित्तम् ॥ 94 ॥

सूक्ष्म शरीर का तीसरा हिस्सा है प्राण, जीवन-ऊर्जा। और गुरु एक प्यारी बात कहते हैं, प्राण असल में एक ही है; वह अपने अलग-अलग कामों से ही पाँच रूप ले लेता है, प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान, जैसे सोना एक है पर अँगूठी, हार, कंगन बन जाता है, और पानी एक है पर लहर, भँवर, बूँद बन जाता है। फिर गुरु सूक्ष्म शरीर के सारे हिस्से एक साथ बाँध देते हैं, और एक सुंदर शब्द देते हैं, पुर्यष्टक, आठ का नगर। पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, पाँच सूक्ष्म तत्व, अंतःकरण, अज्ञान, इच्छा और कर्म, इन्हीं आठ चीज़ों का यह नगर सूक्ष्म शरीर कहलाता है। नगर में बहुत कुछ होता है, गलियाँ, बाज़ार, लोग, हलचल, पर नगर अपने आप में कोई एक व्यक्ति नहीं होता। यही सूक्ष्म शरीर एक पूरा बसा हुआ नगर है, और हम इसी को सबसे गहराई से मैं मानते हैं; गुरु इसे नगर कह कर एक संकेत करते हैं, आप इस नगर के निवासी हैं, यह नगर स्वयं नहीं।

95 · एक प्राण, पाँच काम

प्राणापानव्यानोदानसमाना भवत्यसौ प्राणः ।
स्वयमेव वृत्तिभेदाद्विकृतिभेदात्सुवर्णसलिलादिवत् ॥ 95 ॥

96 · पुर्यष्टक, आठ का नगर

वागादि पञ्च श्रवणादि पञ्च प्राणादि पञ्चाभ्रमुखानि पञ्च ।
बुद्ध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहुः ॥ 96 ॥

अब एक शब्द चाबी बन जाता है, उपाधि, एक उधार की पहचान, ऊपर से चढ़ी हुई परत। गुरु कहते हैं, सुनिए, यह सूक्ष्म नाम वाला लिंग-शरीर अपंचीकृत तत्वों से बना है, वासनाओं सहित है, कर्म-फल भुगताता है, और अपने ही अज्ञान के कारण यह आत्मा की एक अनादि उपाधि है। एक साफ़ स्फटिक के पास लाल फूल रख दें तो वह लाल दिखने लगता है, पर वह लाल होता नहीं, बस लालिमा उधार ले रहा है; फूल हटते ही स्फटिक फिर साफ़। इसी उपाधि के कारण निर्मल आत्मा बँधी, दुखी, छोटी दिखने लगती है, पर एक राहत भी है, यह उपाधि केवल एक न-जानने से है, यानी जानते ही फूल हट जाता है। और जैसे स्थूल शरीर का साथी जागृत अवस्था थी, सूक्ष्म शरीर का साथी है स्वप्न। स्वप्न में बाहर कुछ नहीं होता; बुद्धि अकेले, जागने के समय की जमा वासनाओं से, अपने ही अंश से एक पूरी दुनिया रच लेती है। यह रोज़ का सबूत है कि मन कितनी ठोस-सी दिखती दुनिया रच सकता है, और एक सवाल छोड़ जाता है, अगर मन रात में यह कर सकता है, तो दिन की यह जागृत दुनिया कितनी अलग है।

97 · सूक्ष्म शरीर, आत्मा की एक उपाधि

इदं शरीरं शृणु सूक्ष्मसंज्ञितं लिङ्गं त्वपञ्चीकृतसंभवम् ।
सवासनं कर्मफलानुभावकं स्वाज्ञानतोऽनादिरुपाधिरात्मनः ॥ 97 ॥

98 · स्वप्न, सूक्ष्म शरीर की अवस्था

स्वप्नो भवत्यस्य विभक्त्यवस्था स्वमात्रशेषेण विभाति यत्र ।
स्वप्ने तु बुद्धिः स्वयमेव जाग्रत् कालीननानाविधवासनाभिः ॥ 98 ॥

अब तक गुरु ने केवल अनात्मा गिनाया था। पहली बार, उस ढेर के बीच से, असली आप की एक झलक देते हैं, और दो शब्द उस झलक को थाम लेते हैं, साक्षी और असंग। यह परम आत्मा कर्ता आदि का भाव ले कर जहाँ स्वयं चमकता दिखता है, वह बुद्धि भर की उपाधि वाला, सबका साक्षी है, और कर्मों के लेश-मात्र से भी नहीं लिपटता, क्योंकि वह असंग है, अछूता। सिनेमा के परदे पर आग लगती है, बाढ़ आती है, पर परदा न जलता है, न भीगता है। असली आप वही परदा हो, मन में जो भी कर्म, सुख, दुख चलें, वह साक्षी अछूता रहता है। और गुरु इसी बात को एक रोज़ की तस्वीर में रख देते हैं, बढ़ई और उसका औज़ार। यह पूरा सूक्ष्म शरीर चेतन आत्मा-पुरुष के सब कामों का औज़ार है, ठीक जैसे बढ़ई के लिए बसूला। बसूला घिसता है, उस पर निशान पड़ते हैं, पर बढ़ई न घिसता है, न निशान खाता है। औज़ार के काम औज़ार के, चलाने वाले के नहीं; इसीलिए आत्मा असंग है।

99 · साक्षी, अछूता रहता है

कर्त्रादिभावं प्रतिपद्य राजते यत्र स्वयं भाति ह्ययं परात्मा ।
धीमात्रकोपाधिरशेषसाक्षी न लिप्यते तत्कृतकर्मलेशैः
यस्मादसङ्गस्तत एव कर्मभिः न लिप्यते किंचिदुपाधिना कृतैः ॥ 99 ॥

100 · बढ़ई का औज़ार

सर्वव्यापृतिकरणं लिङ्गमिदं स्याच्चिदात्मनः पुंसः ।
वास्यादिकमिव तक्ष्णस्तेनैवात्मा भवत्यसङ्गोऽयम् ॥ 100 ॥

अब गुरु इस असंगता को एक-एक करके लागू कर के दिखाते हैं। अंधापन, कमज़ोर दिखना, तेज़ देखना, ये आँख की अच्छी या ख़राब हालत के धर्म हैं; वैसे ही बहरापन, गूँगापन आदि कान आदि के धर्म हैं, जानने वाली आत्मा के नहीं। आँख दुर्बल है तो यह उपकरण की बात है, उपकरण चलाने वाले की नहीं; धुँधले शीशे से धुँधला प्रतिबिम्ब आता है, पर देखने वाले की दृष्टि धुँधली नहीं हुई। फिर वही बात प्राण पर, साँस लेना-छोड़ना, जँभाई, छींक, स्राव, और अंत में प्राण का निकल जाना, ज्ञानी इन सब क्रियाओं को प्राण के काम कहते हैं; और भूख तथा प्यास भी प्राण के ही धर्म हैं। असली आप वे हैं जो भूख को जानता है, जो भूख का अनुभव साक्षी की तरह देखता है। शरीर की हर कमी, हर रोग, वृद्धावस्था का हर धुँधलापन, और सबसे ज़मीनी, सबसे ज़ोरदार शारीरिक माँग तक, आख़िर में एक उपकरण की हलचल है, जिसे आप देख रहे हैं।

101 · अंधापन आँख का धर्म है, आपका नहीं

अन्धत्वमन्दत्वपटुत्वधर्माः सौगुण्यवैगुण्यवशाद्धि चक्षुषः ।
बाधिर्यमूकत्वमुखास्तथैव श्रोत्रादिधर्मा न तु वेत्तुरात्मनः ॥ 101 ॥

102 · भूख-प्यास प्राण के धर्म हैं

उच्छ्वासनिःश्वासविजृम्भणक्षुत् प्रस्यन्दनाद्युत्क्रमणादिकाः क्रियाः ।
प्राणादिकर्माणि वदन्ति तज्ञाः प्राणस्य धर्मावशनापिपासे ॥ 102 ॥

अब एक और शब्द सब कुछ खोल देता है, आभास, यानी परावर्तन, उधार की रोशनी। यह अंतःकरण इन आँख आदि इन्द्रियों में और शरीर में, मैं के अभिमान के साथ रहता है, पर उसकी अपनी कोई रोशनी नहीं, वह उधार की, परावर्तित रोशनी से जागरूक दिखता है। चाँद रात में चमकता है, पर उसकी अपनी कोई रोशनी नहीं, वह सूरज की रोशनी उधार ले कर चमकता है। अंतःकरण ठीक ऐसा ही है, वह मैं, मैं करता है, जीवंत लगता है, पर उसकी अपनी कोई चेतना नहीं, वह आत्मा की चेतना उधार ले कर जागरूक दिखता है। और इसी उधार की रोशनी से अहंकार अपना असली काम करता है, वह मैं करता हूँ, मैं भोगता हूँ का अभिमान करता है, और सत्व आदि गुणों के योग से जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाएँ भोगता है। यहीं पूरा फँसाव है, असली आप साक्षी हो, असंग हो, बढ़ई हो, पर अहंकार वह पुर्ज़ा है जो साक्षी की कुर्सी पर बैठ कर मैं कर्ता हूँ का झंडा गाड़ देता है। बढ़ई का काम बसूले ने हड़प लिया।

103 · अंतःकरण, उधार की रोशनी से

अन्तःकरणमेतेषु चक्षुरादिषु वर्ष्मणि ।
अहमित्यभिमानेन तिष्ठत्याभासतेजसा ॥ 103 ॥

104 · अहंकार, कर्ता और भोक्ता

अहंकारः स विज्ञेयः कर्ता भोक्ताभिमान्ययम् ।
सत्त्वादिगुणयोगेन चावस्थात्रयमश्नुते ॥ 104 ॥

फिर गुरु एक बहुत बड़ी बात बहुत शांति से कह देते हैं, सुख और दुख भी आपके नहीं हैं। विषय अनुकूल हों तो अहंकार सुखी, प्रतिकूल हों तो दुखी; सुख और दुख उसी अहंकार के धर्म हैं, सदा-आनंद आत्मा के नहीं। जो चीज़ ऊपर-नीचे बदलती है, वह किसी बदलने वाली चीज़ का गुण है, पर असली आत्मा सदानन्द है, एक थिर आनंद जो बदलता नहीं। और गुरु इससे भी गहरे जाते हैं, कोई विषय आत्मा के लिए ही प्यारा होता है, अपने आप में प्यारा नहीं, क्योंकि सबको स्वभाव से सबसे प्यारी आत्मा ही है। उपनिषद् की वह मशहूर बात इसके पीछे है, पति पत्नी को पति के लिए नहीं, अपने ही स्व के लिए प्यारा है। हर चीज़ को हम इसलिए चाहते हैं कि वह हमारे होने को कुछ देती लगती है; तो सबसे प्यारा आप ख़ुद हो, और अगर वह आप सबसे प्यारी चीज़ है, तो वह स्वभाव से आनंद ही होगी। इसीलिए आत्मा सदा-आनंद है, इसे कभी दुख नहीं होता। हम आनंद बाहर ढूँढते हैं, गुरु कहते हैं वह आपका अपना स्वभाव है।

105 · सुख-दुख, किसके धर्म

विषयाणामानुकूल्ये सुखी दुःखी विपर्यये ।
सुखं दुःखं च तद्धर्मः सदानन्दस्य नात्मनः ॥ 105 ॥

106 · सबसे प्यारा, आत्मा

आत्मार्थत्वेन हि प्रेयान्विषयो न स्वतः प्रियः ।
स्वत एव हि सर्वेषामात्मा प्रियतमो यतः
तत आत्मा सदानन्दो नास्य दुःखं कदाचन ॥ 106 ॥

आत्मा सदा-आनंद है, इसका सबूत क्या? गुरु एक बहुत सीधा, रोज़ का सबूत देते हैं, गहरी नींद। गहरी, सपने-रहित नींद में कोई विषय नहीं, कोई वस्तु नहीं, कुछ पाया नहीं; फिर भी सुबह उठ कर हर कोई कहता है, बहुत अच्छी नींद आई। वह आनंद कहाँ से आया, जब बाहर कुछ था ही नहीं? गुरु कहते हैं, वह आनंद आत्मा का अपना है; जब मन और इन्द्रियाँ थम जाती हैं, बाहरी सब हट जाता है, तब जो बचता है वही आनंद है, और इसे श्रुति, प्रत्यक्ष अनुभव, परम्परा और अनुमान, सभी पुष्ट करते हैं। हर रात, हर इंसान, अनजाने, अपने सदा-आनंद स्वरूप को छू कर लौटता है, बस उसे पहचानता नहीं। अब, माया वाला हिस्सा आरम्भ होता है।

107 · गहरी नींद का सबूत

यत्सुषुप्तौ निर्विषय आत्मानन्दोऽनुभूयते ।
श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं च जाग्रति ॥ 107 ॥

गुरु अब अनात्मा की आख़िरी, और सबसे सूक्ष्म परत खोलते हैं, माया। एक बात पहले समझिए, माया का मतलब जादू या धोखा-धड़ी नहीं। यह अव्यक्त नाम वाली, परमेश्वर की शक्ति, अनादि अविद्या, तीन गुणों वाली, सर्वोच्च शक्ति है, जिससे यह सारा जगत जन्म लेता है, और जो केवल अपने कामों से, तेज़ बुद्धि से ही अनुमान की जा सकती है। बिजली को आपने कभी देखा नहीं, पर पंखा घूमता है, बल्ब जलता है, तो आप जानते हैं वह है; माया ऐसी ही है, रचने वाली शक्ति जो ख़ुद हमेशा परदे के पीछे रहती है। और इसका रूप ऐसा है कि हर बात कह कर तुरंत काट देनी पड़ती है, माया न सत् है, न असत्, न दोनों; न भिन्न है, न अभिन्न; न अंगों वाली, न बिना अंगों की; इसका रूप शब्दों में बखाना ही नहीं जा सकता। माया सत् नहीं, क्योंकि ज्ञान होते ही मिट जाती है; पर असत् भी नहीं, क्योंकि यह पूरा अनुभव होता दिख रहा है। वह सपने जैसी है, देखते वक़्त पूरा असली, जाग कर पता चलता है था ही नहीं। ऐसी चीज़ को कोई एक साफ़ खाँचा नहीं दिया जा सकता, इसीलिए अनिर्वचनीय।

108 · माया, अव्यक्त शक्ति

अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्तिः अनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा ।
कार्यानुमेया सुधियैव माया यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते ॥ 108 ॥

109 · माया, न यह, न वह

सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो ।
साङ्गाप्यनङ्गा ह्युभयात्मिका नो महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा ॥ 109 ॥

पर गुरु एक बड़ी राहत देते हैं, माया अनिर्वचनीय भले हो, वह नष्ट होने वाली है। शुद्ध, अद्वय ब्रह्म के बोध से माया वैसे ही मिट जाती है जैसे रस्सी के दिख जाने से साँप का भ्रम; ब्रह्म का बोध हुआ, माया ग़ायब। और साथ ही एक नई बात आरम्भ होती है, माया के तीन गुण, रजस, तमस और सत्व, जो अपने प्रसिद्ध कामों से पहचाने जाते हैं। ये तीन रंग हैं जिनसे माया हर चीज़ रँगती है, और यह कोई सूखा वर्गीकरण नहीं, अपने ही मन को पहचानने का एक औज़ार है। पहला गुण रजस, और इसकी शक्ति का नाम है विक्षेप, यानी फेंकना, बिखेरना, इधर-उधर उछालना। रजस वह बेचैनी है जो मन को टिकने नहीं देती, एक काम ख़त्म नहीं हुआ कि अगला, एक इच्छा पूरी नहीं हुई कि दूसरी। और गुरु एक बारीक बात जोड़ते हैं, राग और दुख जैसे मन के सारे विकार इसी से जन्म लेते हैं; यानी हमारी ज़्यादातर बेचैनी कोई बाहरी समस्या नहीं, एक भीतरी गुण का काम है।

110 · ज्ञान से मिटती है, और इसके तीन गुण

शुद्धाद्वयब्रह्मविभोधनाश्या सर्पभ्रमो रज्जुविवेकतो यथा ।
रजस्तमःसत्त्वमिति प्रसिद्धा गुणास्तदीयाः प्रथितैः स्वकार्यैः ॥ 110 ॥

111 · रजस, विक्षेप की शक्ति

विक्षेपशक्ती रजसः क्रियात्मिका यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ।
रागादयोऽस्याः प्रभवन्ति नित्यं दुःखादयो ये मनसो विकाराः ॥ 111 ॥

फिर गुरु रजस की पूरी सूची सामने रख देते हैं, इच्छा, क्रोध, लोभ, दिखावा, ईर्ष्या, अहंकार, जलन, द्वेष, ये भयानक राजसिक धर्म हैं; और चूँकि मनुष्य की सारी दौड़-भाग इन्हीं से चलती है, इसलिए रजस बंधन का कारण है। यह सूची असहज करती है, क्योंकि यह जानी-पहचानी है, ये कोई दूर के राक्षस नहीं, रोज़, हमारे भीतर, आते-जाते रहते हैं। पर गुरु इन्हें गिना कर शर्मिंदा नहीं कर रहे, एक नक्शा दे रहे हैं, ताकि अगली बार भीतर क्रोध या जलन उठे तो एक नई नज़र बन सके, यह मैं नहीं हूँ, यह रजस का काम है, एक गुण की हलचल। और यही नज़र एक दूरी बना देती है, आप विकार में डूबे नहीं रहते, उसे पहचान कर देखने लगते हैं।

112 · रजस के काम, और बंधन

कामः क्रोधो लोभदम्भाद्यसूया अहंकारेर्ष्यामत्सराद्यास्तु घोराः ।
धर्मा एते राजसाः पुम्प्रवृत्तिः यस्मादेषा तद्रजो बन्धहेतुः ॥ 112 ॥

दूसरा गुण तमस, और इसकी शक्ति का नाम है आवरण, यानी ढक देना; जिससे कोई चीज़ कुछ और ही दिखने लगती है, और यही मनुष्य के संसार-चक्र का मूल कारण है, और विक्षेप-शक्ति के सक्रिय होने का भी कारण। फिर वही रस्सी-साँप। पहले अँधेरे ने रस्सी को ढका, उसका असली रूप दिखना बंद, फिर उस ढकी जगह पर मन ने साँप फेंक दिया; आवरण पहले, विक्षेप बाद में, पहले असली ढकता है तभी नक़ली उभरता है। और गुरु एक डराने वाली, ईमानदार बात कहते हैं, तेज़ बुद्धि तमस के ख़िलाफ़ कवच नहीं; कोई कितना भी बुद्धिमान, विद्वान, चतुर हो, अगर तमस ने उसे चाट लिया तो बार-बार साफ़ समझाए जाने पर भी नहीं समझता, भ्रम से थोपी चीज़ को ही सही मान बैठता है। यह घबराने को नहीं, विनम्र करने को कहा गया है, मैं तो समझदार हूँ, मुझे सब समझ आ जाएगा, यह अकड़ ख़ुद तमस का एक रूप है; असली समझ के लिए तेज़ दिमाग़ नहीं, खुला और विनम्र मन चाहिए।

113 · तमस, आवरण की शक्ति

एषावृतिर्नाम तमोगुणस्य शक्तिर्मया वस्त्ववभासतेऽन्यथा ।
सैषा निदानं पुरुषस्य संसृतेः विक्षेपशक्तेः प्रवणस्य हेतुः ॥ 113 ॥

114 · तमस, बड़े ज्ञानी को भी चूका देता है

प्रज्ञावानपि पण्डितोऽपि चतुरोऽप्यत्यन्तसूक्ष्मात्मदृग् व्यालीढस्तमसा न वेत्ति बहुधा संबोधितोऽपि स्फुटम् ।
भ्रान्त्यारोपितमेव साधु कलयत्यालम्बते तद्गुणान् हन्तासौ प्रबला दुरन्ततमसः शक्तिर्महत्यावृतिः ॥ 114 ॥

गुरु आवरण-शक्ति के चार रूप भी गिनाते हैं, और ये अपने ही मन में पहचाने जा सकते हैं, सोच ही न पाना, उल्टा सोचना, संभव ही न मानना, और लगातार शक में रहना; यह आवरण जिससे जुड़ जाए उसे छोड़ती नहीं, और विक्षेप-शक्ति उसे लगातार सताती रहती है। ये चारों आत्म-ज्ञान के रास्ते की रुकावटें हैं, और गुरु एक तस्वीर देते हैं कि दोनों शक्तियाँ साथ कैसे काम करती हैं, आवरण आपको अँधेरे में जकड़े रखती है, और विक्षेप उस अँधेरे में डर, बेचैनी, राग-द्वेष से लगातार सताती है; एक पकड़ कर रखती है, दूसरी मारती है। फिर गुरु तमस के रोज़मर्रा वाले रूप गिनाते हैं, अज्ञान, आलस्य, जड़ता, नींद, लापरवाही, मूर्खता; इनसे जुड़ा इंसान कुछ नहीं जानता, सोते हुए की तरह, या खंभे की तरह खड़ा रहता है। रजस की पहचान बेचैनी थी, तमस की पहचान एक भारी सुस्ती है। खंभा होता तो है, पर उसमें कोई जान नहीं, कोई जागरूकता नहीं; यह डराने को नहीं, एक आईना है, और इसमें अपने को थोड़ा पहचान लेना ही उस नींद से जागने की पहली अंगड़ाई है।

115 · आवरण और विक्षेप, साथ-साथ सताते हैं

अभावना वा विपरीतभावना असंभावना विप्रतिपत्तिरस्याः ।
संसर्गयुक्तं न विमुञ्चति ध्रुवं विक्षेपशक्तिः क्षपयत्यजस्रम् ॥ 115 ॥

116 · तमस के बाक़ी रूप

अज्ञानमालस्यजडत्वनिद्रा प्रमादमूढत्वमुखास्तमोगुणाः ।
एतैः प्रयुक्तो नहि वेत्ति किंचिन् निद्रालुवत्स्तम्भवदेव तिष्ठति ॥ 116 ॥

तीसरा गुण सत्व, और गुरु एक प्यारी, बारीक बात कहते हैं। सत्व पानी की तरह शुद्ध है, यह वह गुण है जो शांति, समझ, अच्छाई लाता है; पर सत्व भी आख़िर एक गुण ही है, माया का ही हिस्सा, और रजस-तमस से मिल कर वह भी संसार-यात्रा का ही कारण बन जाता है। उसकी एक ख़ास भूमिका है, सत्व इतना साफ़ है कि उसमें आत्मा का प्रतिबिंब साफ़ पड़ता है, और वह सूरज की तरह सारी जड़ चीज़ों को रोशन करता है, जैसे साफ़ पानी में चाँद। तमस गंदला पानी है, प्रतिबिंब दिखता ही नहीं; सत्व साफ़ पानी है, प्रतिबिंब साफ़ दिखता है। इसलिए सत्व रास्ते का सबसे अच्छा साथी है, पर आख़िरी पड़ाव नहीं, आगे पानी से ही ऊपर उठना है, असली चाँद तक।

117 · सत्व, साफ़ पानी, पर अकेला नहीं

सत्त्वं विशुद्धं जलवत्तथापि ताभ्यां मिलित्वा सरणाय कल्पते ।
यत्रात्मबिम्बः प्रतिबिम्बितः सन् प्रकाशयत्यर्क इवाखिलं जडम् ॥ 117 ॥

गुरु सत्व के दो दर्जे बताते हैं। पहला, मिश्र सत्व, थोड़ी रजस-तमस की मिलावट वाला, और इसके फल कितने सुन्दर हैं, विनम्रता, यम-नियम, श्रद्धा, भक्ति, मुक्ति की चाह, दैवी सम्पदा, और असत् से मुँह मोड़ना। मुमुक्षता, अर्थात मुक्ति की तड़प तक, यहीं मिश्र सत्व में गिनी गई है, यानी मार्ग पर चलने की चाह भी एक गुण का फल है; हमारी अच्छाई भी हमारी अपनी उपलब्धि नहीं, एक स्वच्छ होते मन का स्वाभाविक पुष्प है। दूसरा, ऊँचा दर्जा, विशुद्ध सत्व, बिना मिलावट का, और इसके फल और गहरे हैं, निर्मल प्रसन्नता, अपने स्वरूप का अनुभव, परम शांति, तृप्ति, हर्ष, और परमात्मा में स्थिरता, जिससे साधक सदा-आनंद का रस पा लेता है। मिश्र सत्व के फल रास्ते पर चलने वाले गुण थे, शुद्ध सत्व के फल मंज़िल के क़रीब वाले; एक तैयारी है, दूसरा पहुँचना। पर शुद्ध सत्व भी आख़िरी सीढ़ी ही है, मंज़िल का दरवाज़ा, मंज़िल नहीं; साफ़ पानी में चाँद का सबसे साफ़ प्रतिबिंब, पर असली चाँद अब भी ऊपर है।

118 · मिले हुए सत्व के गुण

मिश्रस्य सत्त्वस्य भवन्ति धर्माः त्वमानिताद्या नियमा यमाद्याः ।
श्रद्धा च भक्तिश्च मुमुक्षता च दैवी च सम्पत्तिरसन्निवृत्तिः ॥ 118 ॥

119 · शुद्ध सत्व के गुण

विशुद्धसत्त्वस्य गुणाः प्रसादः स्वात्मानुभूतिः परमा प्रशान्तिः ।
तृप्तिः प्रहर्षः परमात्मनिष्ठा यया सदानन्दरसं समृच्छति ॥ 119 ॥

अब गुरु तीसरा और अन्तिम शरीर बताते हैं, कारण-शरीर। तीन गुणों से बना यह अव्यक्त आत्मा का कारण-शरीर कहलाता है, और इसकी अलग अवस्था सुषुप्ति, गहरी नींद है, जहाँ सारी इन्द्रियाँ और बुद्धि की हलचल लीन हो जाती है। कारण इसलिए, क्योंकि यह बाक़ी दोनों शरीरों का बीज है; गहरी नींद में स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीर सिमट जाते हैं, पर मिटते नहीं, एक बीज-रूप में बचे रहते हैं और सुबह फिर खुल जाते हैं। हर तरह की जानकारी का थम जाना, और बुद्धि का बस बीज-रूप में बचे रहना, यही सुषुप्ति है, और इसका सबूत है वह सबकी जानी हुई बात, मुझे नींद में कुछ पता नहीं था। पर एक क्षण ठहर कर देखें, यदि नींद में सचमुच कुछ नहीं था, कोई था ही नहीं, तो यह मुझे पता नहीं था किसने जाना? किसी को तो उस शून्यता में उपस्थित रहना पड़ा होगा, ताकि वह उठ कर उसकी साक्षी दे सके; वही साक्षी, जो नींद के रिक्तपन में भी जागता रहा, असली आत्मा है। नींद में शरीर सोया, मन सोया, पर एक चेतना जागती रही, अन्यथा उस नींद को जाना किसने।

120 · कारण शरीर और सुषुप्ति

अव्यक्तमेतत्त्रिगुणैर्निरुक्तं तत्कारणं नाम शरीरमात्मनः ।
सुषुप्तिरेतस्य विभक्त्यवस्था प्रलीनसर्वेन्द्रियबुद्धिवृत्तिः ॥ 120 ॥

121 · मुझे कुछ पता नहीं था

सर्वप्रकारप्रमितिप्रशान्तिः बीजात्मनावस्थितिरेव बुद्धेः ।
सुषुप्तिरेतस्य किल प्रतीतिः किंचिन्न वेद्मीति जगत्प्रसिद्धेः ॥ 121 ॥

अब आता है वह श्लोक जो एक झाड़ू है। गुरु ने श्लोक 72 से ले कर अब तक एक-एक चीज़ उठाई, जाँची, और आप नहीं हो कह कर रखी, शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, अहंकार, तीनों गुण, माया। अब वे सबको एक ढेर में समेट देते हैं, शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, अहंकार आदि; सब विकार, विषय, सुख आदि; आकाश आदि तत्व; पूरा विश्व, अव्यक्त माया तक, यह सब अनात्मा है। शिष्य ने भाग 3 में पूछा था, अनात्मा क्या है, यह उसका पूरा, स्पष्ट उत्तर है; और दायरा कितना विस्तृत है, केवल शरीर-मन नहीं, पूरा विश्व, अव्यक्त तक। हर वह वस्तु जिसका अनुभव किया जा सकता है, जिसे जाना जा सकता है, वह सब अनात्मा है, क्योंकि आत्मा वह है जो जानती है, और जानने वाला कभी जानी हुई वस्तु नहीं हो सकता। और भाग के अन्त में गुरु इस पूरी अनात्मा को एक अन्तिम, स्मरणीय उपमा दे देते हैं, मरुस्थल की मरीचिका। मरीचिका में जल दिखता है, आँखों को सचमुच चमक दिखती है, पर वहाँ जल होता नहीं; न पूर्णतया है, न पूर्णतया नहीं है, ठीक वही अनिर्वचनीय बात। गुरु यह नहीं कह रहे कि संसार का अनुभव नहीं होता, वे कह रहे हैं कि इसे वह ठोस, अन्तिम सत्य न माना जाए जो यह प्रतीत होती है। और एक स्निग्ध बात इसमें छिपी है, गुरु कहते हैं, आप जान लें; ढेर एक ओर रख दिया गया, और गुरु शिष्य को सीधे सम्बोधित करते हैं।

122 · यह सब, अनात्मा

देहेन्द्रियप्राणमनोऽहमादयः सर्वे विकारा विषयाः सुखादयः ।
व्योमादिभूतान्यखिलं न विश्वं अव्यक्तपर्यन्तमिदं ह्यनात्मा ॥ 122 ॥

123 · एक मरीचिका

माया मायाकार्यं सर्वं महदादिदेहपर्यन्तम् ।
असदिदमनात्मतत्त्वं विद्धि त्वं मरुमरीचिकाकल्पम् ॥ 123 ॥

अगला भाग, भाग 5, आत्मा का स्वरूप। चार भागों तक गुरु ने केवल यह कहा कि आप यह नहीं हैं। अब, पहली बार, वे सीधे बताते हैं कि आप क्या हैं। जो साक्षी अब तक झलकता रहा, उसका पूरा चित्र खुलता है।

श्लोक 121 की वह बात साथ रहे, गहरी नींद में भी कोई जागता रहा, अन्यथा मुझे कुछ पता नहीं था किसने जाना। उसी साक्षी की ओर अगला भाग ले चलता है।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, यथावत।

स्थायी URL: /vivekachudamani/anatma/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-22

English