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भाग 16 · गुरु का अंतिम वाक्य, शिष्य का जागरण

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 16 · गुरु का अंतिम वाक्य, शिष्य का जागरण · श्लोक 471-485

गुरु पूरे वेदान्त का सार थोड़े-से शब्दों में रख देते हैं, ब्रह्म ही जीव, ब्रह्म ही जगत, अखंड-रूप में स्थिति ही मोक्ष। फिर एक मौन। शिष्य कुछ देर समाधि में डूबा रहता है, उठता है, और जो पहला वाक्य कहता है वह यही है, “किं वा कियद् वा सुखम् अस्ति अपारम्”, क्या कहें, कितना सुख है, अपार।

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अब तक की पूरी यात्रा, संयम से आरंभ, फिर श्रवण, मनन, निदिध्यासन, पंच-कोश, साक्षी, तत्त्वमसि, समाधि, जीवन्मुक्ति, यह सब एक छोटी, साफ़ बात पर आ कर ठहरती है। गुरु अब अपने अंतिम वाक्य की ओर आ रहे हैं, और पहले वे एक उपलब्धि का चित्र रखते हैं, जिसे शिष्य अपना सके। महान यति कैसे होते हैं, और वे कहाँ पहुँचते हैं। राग से निकल चुके, भोग से निकल चुके, शांत, भली प्रकार संयमी। ऐसे यति इस परम-तत्व को जान कर, अंत में, आत्म-योग से वह निर्वृति पाते हैं जिससे ऊँचा और कुछ नहीं।

471

निरस्तरागा विनिरस्तभोगाः शान्ताः सुदान्ता यतयो महान्तः ।
विज्ञाय तत्त्वं परमेतदन्ते प्राप्ताः परां निर्वृतिमात्मयोगात् ॥ 471 ॥

और इसी क्षण गुरु सीधे शिष्य की ओर मुड़ते हैं। “भवान् अपि”, आप भी। एक छोटा-सा शब्द, पर पूरा वज़न इसी में है। अब तक महान यति की, तत्त्व-वेत्ता की, जीवन्मुक्त की बात होती रही, मानो वह कोई और हो। अब गुरु कहते हैं, यह उपलब्धि कोई दूर का सपना नहीं, आप ही के लिए है। आप भी इस परम-तत्व को, जो आत्मा का अपना स्वरूप है, जो आनंद-घन है, विचार कर के, अपने ही मन के रचे मोह को झाड़ दें, और मुक्त, कृतार्थ, प्रबुद्ध हो जाएँ। यह आदेश नहीं, आशीर्वाद है। पर विचार किस आँख से हो, यह भी गुरु बता देते हैं। समाधि से, भली प्रकार निश्चल हुए चित्त से, स्फुट बोध-चक्षु से आत्म-तत्व को देखें। अब तक शिष्य ने श्रुति-वचन सुने हैं, पर केवल सुनने से संशय मिटते नहीं; जो एक बार निःसंशय हो कर भली प्रकार देख लिया जाए, वह पदार्थ फिर विकल्प में नहीं आता।

472 · 473

भवानपीदं परतत्त्वमात्मनः स्वरूपमानन्दघनं विचार्य ।
विधूय मोहं स्वमनःप्रकल्पितं मुक्तः कृतार्थो भवतु प्रबुद्धः ॥ 472 ॥
समाधिना साधुविनिश्चलात्मना पश्यात्मतत्त्वं स्फुटबोधचक्षुषा ।
निःसंशयं सम्यगवेक्षितश्चेच् छ्रुतः पदार्थो न पुनर्विकल्प्यते ॥ 473 ॥

फिर गुरु एक चार-तरफ़ा प्रमाण-व्यवस्था रखते हैं, और सबसे ऊँचे को अंत में छोड़ देते हैं। अपनी अविद्या-बंधन से मुक्ति में, और सत्य-ज्ञान-आनंद-रूप आत्मा की प्राप्ति में, शास्त्र प्रमाण है, युक्ति प्रमाण है, गुरु का वचन प्रमाण है, और इन सबके बाद भीतर पकी हुई अपनी अनुभूति भी प्रमाण है, और वही सबसे मूल्यवान है। बाहरी तीनों भीतर के एक तक ले जाते हैं, पर असली प्रमाण यही अंतःसिद्ध स्वानुभूति है। इसे गुरु रोज़मर्रा के अनुभव से समझाते हैं। बंध, मोक्ष, तृप्ति, चिंता, स्वस्थता, भूख, ये सब अपने ही द्वारा जाने जाते हैं। आप भूखे हैं तो यह आप ही जानते हैं, दूसरा देख कर केवल अनुमान कर सकता है; आप चिंतित हैं तो यह भी आप ही जानते हैं। बंध और मोक्ष भी ऐसी ही भीतर की बातें हैं, इसलिए अपनी मुक्ति का अनुभव अपना ही दायित्व है, किसी और से उसका प्रमाण नहीं माँगा जा सकता।

474 · 475

स्वस्याविद्याबन्धसंबन्धमोक्षात् सत्यज्ञानानन्दरूपात्मलब्धौ ।
शास्त्रं युक्तिर्देशिकोक्तिः प्रमाणं चान्तःसिद्धा स्वानुभूतिः प्रमाणम् ॥ 474 ॥
बन्धो मोक्षश्च तृप्तिश्च चिन्तारोग्यक्षुदादयः ।
स्वेनैव वेद्या यज्ज्ञानं परेषामानुमानिकम् ॥ 475 ॥

तब गुरु एक अत्यंत नम्र चित्र रखते हैं। गुरु और श्रुति नदी के किनारे खड़े हैं, और रास्ता दिखाते हैं, यहाँ से तरिए। पर तरना तो स्वयं को ही पड़ता है; विद्वान अपनी ही प्रज्ञा से उस संसार-नदी को पार करता है, और वह प्रज्ञा भी अकेली नहीं जागती, ईश्वर की कृपा से जागती है। यह विनम्रता और आत्म-निर्भरता का सुंदर संतुलन है। और फिर एक छोटा, स्वच्छ निर्देश। अपनी ही अनुभूति से अपनी अखंडित आत्मा को स्वयं जान कर, पूर्ण-सिद्ध हो कर, किसी विकल्प के बिना, केवल एक आत्मा के रूप में, उसी आत्मा में सम्मुख, सीधे, दृढ़ स्थित रहें। इस एक पंक्ति में स्थित होने की पूरी कला है।

476 · 477

तटस्थिता बोधयन्ति गुरवः श्रुतयो यथा ।
प्रज्ञयैव तरेद्विद्वानीश्वरानुगृहीतया ॥ 476 ॥
स्वानुभूत्या स्वयं ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डितम् ।
संसिद्धः संमुखं तिष्ठेन्निर्विकल्पात्मनात्मनि ॥ 477 ॥

और अब गुरु का अंतिम वाक्य आता है, संभवतः पूरे विवेकचूडामणि का सबसे संक्षिप्त सार। यह वेदान्त-सिद्धान्त की निरुक्ति है, तीन वाक्यों में पूरा वेदान्त। ब्रह्म ही जीव है। ब्रह्म ही यह सकल जगत है। अखंड-रूप में स्थिति ही मोक्ष है। और इसका प्रमाण, श्रुतियाँ। इससे आगे और कुछ अपेक्षित नहीं। यह गुरु का अंतिम शब्द है, अब मौन।

478

वेदान्तसिद्धान्तनिरुक्तिरेषा ब्रह्मैव जीवः सकलं जगच्च ।
अखण्डरूपस्थितिरेव मोक्षो ब्रह्माद्वितीये श्रुतयः प्रमाणम् ॥ 478 ॥

यहाँ से शैली बदल जाती है, अब “इति” से कथा का स्वर आरंभ होता है। इस प्रकार गुरु-वचन से, श्रुति-प्रमाण से, और अपनी आत्म-युक्ति से उस परम-तत्व को सतत्त्व जान कर शिष्य की इन्द्रियाँ शांत पड़ गईं, चित्त समाहित हो गया, और वह कहीं किसी अचल प्रतिमा-सा, आत्म-निष्ठ हो कर ठहर गया। वह बोलता नहीं, पूछता नहीं। यही वह क्षण है जो इस पूरी यात्रा का शिखर है। कुछ काल अपने मन को परम-ब्रह्म में टिका कर वह डूबा रहा, और फिर परम-आनंद से उठ कर उसने यह पहला वचन कहा। प्रायः लोग कुछ सुनते ही हाँ या नहीं कह देते हैं; यहाँ शिष्य पहले डूबा, फिर बोला।

479 · 480

इति गुरुवचनाच्छ्रुतिप्रमाणात् परमवगम्य सतत्त्वमात्मयुक्त्या ।
प्रशमितकरणः समाहितात्मा क्वचिदचलाकृतिरात्मनिष्ठतोऽभूत् ॥ 479 ॥
किंचित्कालं समाधाय परे ब्रह्मणि मानसम् ।
उत्थाय परमानन्दादिदं वचनमब्रवीत् ॥ 480 ॥

और जो पहला वाक्य निकला, वही इस ग्रंथ का सबसे कोमल अंश है। बुद्धि नष्ट हो गई, प्रवृत्ति गल गई, ब्रह्म और आत्मा की एकता के बोध से। “मैं यह करूँ, मैं वह सोचूँ” का जो पुराना यंत्र चला करता था, वह अब नहीं रहा। “यह” क्या है, नहीं जानता; “यह नहीं” क्या है, वह भी नहीं जानता; समस्त विभाजन लुप्त। और बची केवल एक बात, क्या कहें, कितना कहें, सुख अपार है। फिर शिष्य एक अद्भुत उपमा देता है। स्वानंद-अमृत से भरे उस परब्रह्म-समुद्र का वैभव वाणी से कहा नहीं जा सकता, मन से सोचा भी नहीं जा सकता। वर्षा का एक ओला जैसे जल की विशाल राशि में गिर कर घुल जाए, वैसे ही उसका मन उस समुद्र के अंश के अंश के एक कण में विलीन हो कर, अब आनंद-रूप में शांत है। ओला कहाँ गया, जल हो गया; उसका अपना अस्तित्व नहीं रहा।

481 · 482

बुद्धिर्विनष्टा गलिता प्रवृत्तिः ब्रह्मात्मनोरेकतयाधिगत्या ।
इदं न जानेऽप्यनिदं न जाने किं वा कियद्वा सुखमस्त्यपारम् ॥ 481 ॥
वाचा वक्तुमशक्यमेव मनसा मन्तुं न वा शक्यते स्वानन्दामृतपूरपूरितपरब्रह्माम्बुधेर्वैभवम् ।
अम्भोराशिविशीर्णवार्षिकशिलाभावं भजन्मे मनो यस्यांशांशलवे विलीनमधुनानन्दात्मना निर्वृतम् ॥ 482 ॥

अब शिष्य एक शिशु की भाँति, आँखें खोले, विस्मय से भर कर बोलता है। यह जगत कहाँ गया, किसने इसे ले लिया, कहाँ लीन हो गया? अभी-अभी तो इसे अपनी ही आँखों से देखा था, और अब कहीं नहीं। कितना महाद्भुत! यही वह क्षण है जब अद्वैत बौद्धिक नहीं रहता, अनुभव बन जाता है। पूरा जगत किसी कोने में नहीं छिपा, किसी ने उठाया भी नहीं, बस विलीन हो गया। और जब अखंड-आनंद-अमृत से भरे इस ब्रह्म-महासमुद्र में सब घुल गया, तो वे चार प्रश्न ही लुप्त हो जाते हैं जिनके इर्द-गिर्द जीवन घूमा करता है, अब क्या त्याज्य है, क्या ग्राह्य, क्या कोई और है, क्या कुछ विलक्षण है।

483 · 484

क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत् ।
अधुनैव मया दृष्टं नास्ति किं महदद्भुतम् ॥ 483 ॥
किं हेयं किमुपादेयं किमन्यत्किं विलक्षणम् ।
अखण्डानन्दपीयूषपूर्णे ब्रह्ममहार्णवे ॥ 484 ॥

और इस उद्गार का अंतिम स्वर। यहाँ अब कुछ नहीं देखता, कुछ नहीं सुनता, कुछ नहीं जानता। इन्द्रियाँ शायद अब भी चल रही हों, पर जो “मैं देख रहा हूँ”, “मैं सुन रहा हूँ”, वह “मैं” वहाँ नहीं रहा। केवल अपना आत्मा बचा है, सदा-आनंद-रूप, और देखने-सुनने-जानने से परे, विलक्षण। यह आत्म-बोध की अंतिम झलक है, और यहीं शिष्य का यह पहला वचन पूरा होता है।

485

न किंचिदत्र पश्यामि न शृणोमि न वेद्म्यहम् ।
स्वात्मनैव सदानन्दरूपेणास्मि विलक्षणः ॥ 485 ॥

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना भाग 17 है, शिष्य का गुरु को नमन-स्तोत्र। फिर एक के बाद एक “अहं ब्रह्म” की घोषणाएँ, असंग, अनंग, अलिंग, अभंग, प्रशांत, अनंत, अमल, चिरन्तन, अकर्ता, अभोक्ता, अविकार, अक्रिय, नारायण, नर-कान्तक, पुर-अंतक, सब “अहम्।” फिर माया-वायु से उठती जगत-तरंगें मेरे अखंड-सुख-समुद्र में।

श्लोक 481 स्मरण में रखने योग्य है, “बुद्धिर्विनष्टा, गलिता प्रवृत्तिः… किं वा कियद् वा सुखम् अस्ति अपारम्।” इसे एक बार धीरे-धीरे पढ़ें, और देखें कि क्या एक छोटी-सी झलक भी उतरती है। उतरे या न उतरे, यह पंक्ति साथ रहने योग्य है।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, यथावत्।

स्थायी URL: /vivekachudamani/guru-shishya-jagaran/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-23

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