विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 16 · गुरु का अंतिम वाक्य, शिष्य का जागरण · श्लोक 471-485
गुरु का संक्षेप, “वेदान्त-सिद्धान्त” बस इतना: ब्रह्म ही जीव, ब्रह्म ही जगत; अखंड-रूप में स्थिति ही मोक्ष। और शिष्य? वह कुछ देर निश्चल हुआ, समाधि में डूबा, उठा, और बोला, “किं वा कियद् वा सुखम् अस्ति अपारम्”। क्या कहूँ, कितना सुख है।
पहले एक बात
अब तक की पूरी यात्रा, सम्पादन से शुरू, यम-नियम, श्रवण, मनन, निदिध्यासन, पंच-कोश, साक्षी, तत्वमसि, वासना-क्षय, अहंकार-नाश, समाधि, योग, वैराग्य, अद्वैत-निर्णय, जीवन्मुक्ति, कर्म-त्रय। यह सब कहाँ ले जाता है? एक छोटी, साफ़ बात पर। गुरु इस भाग में वही बात कहते हैं, आठ श्लोकों में।
“वेदान्त-सिद्धान्त-निरुक्ति”, पूरे वेदान्त का सार बस इतना: ब्रह्म ही जीव, ब्रह्म ही जगत; अखंड-रूप में स्थिति ही मोक्ष। और बस। फिर एक चुप्पी पड़ती है। शिष्य कुछ नहीं बोलता। कुछ देर समाधि में रहता है। और जब उठता है, तो वह पहला वाक्य जो उससे निकलता है, विवेकचूडामणि का सबसे प्यारा अंश है: “बुद्धिर्विनष्टा गलिता प्रवृत्तिः।” बुद्धि गई, प्रवृत्ति गल गई। क्या जानूँ, कितना सुख है, अपार!
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। तीन हिस्से, गुरु का संक्षेप-वाक्य (471-478), शिष्य का मौन-समाधि-जागरण (479-480), और शिष्य का पहला उद्गार (481-485)। असली खंभे: 472 (“भवान् अपि”, आप भी), 474 (अन्तःसिद्धा स्वानुभूति प्रमाण), 478 (वेदान्त-सिद्धान्त-निरुक्ति), 481 (बुद्धिर्विनष्टा), 482 (पर-ब्रह्म-अम्बुधि-वैभव)।
471 · निरस्त-राग, विनिरस्त-भोग, महान यतियों ने तत्व जान कर परम निर्वृति
निरस्तरागा विनिरस्तभोगाः शान्ताः सुदान्ता यतयो महान्तः ।
विज्ञाय तत्त्वं परमेतदन्ते प्राप्ताः परां निर्वृतिमात्मयोगात् ॥ 471 ॥
nirasta-rāgā vinirasta-bhogāḥ śāntāḥ su-dāntā yatayo mahāntaḥ · vijñāya tattvaṁ param etad ante prāptāḥ parāṁ nirvṛtim ātma-yogāt
शब्दार्थ: निरस्त-रागाः विनिरस्त-भोगाः · राग और भोग जिनसे निकल चुके · शान्ताः सु-दान्ताः यतयः महान्तः · शांत, सुदान्त, महान यति · विज्ञाय तत्त्वं परम् एतद् अन्ते · इस परम-तत्व को जान कर, अंत में · प्राप्ताः परां निर्वृतिम् आत्म-योगात् · आत्म-योग से परम निर्वृति पाते हैं।
अर्थ: राग और भोग से निकल चुके, शांत, सुदान्त, महान यति, इस परम-तत्व को जान कर, अंत में, आत्म-योग से परम निर्वृति (शांति) पाते हैं।
भावार्थ: गुरु एक संक्षिप्त वर्णन से शुरू करते हैं, महान यति किस तरह के होते हैं, और वे कहाँ पहुँचते हैं।
चार गुण, राग-मुक्त, भोग-मुक्त, शांत, सुदान्त (अच्छी तरह संयमी)। और एक फल, परम निर्वृति। यह कोई अधूरी निर्वृति नहीं। “परम।” यानी इससे ऊँचा कुछ नहीं। और रास्ता, आत्म-योग। यह श्लोक यह संकेत है कि गुरु अब अपने अंतिम वाक्य पर आ रहे हैं, एक उपलब्धि का वर्णन, ताकि शिष्य उसे अपना सके।
472 · भवान् अपि, आप भी विचार कर, मोह मिटा, मुक्त-कृतार्थ-प्रबुद्ध हो
भवानपीदं परतत्त्वमात्मनः स्वरूपमानन्दघनं विचार्य ।
विधूय मोहं स्वमनःप्रकल्पितं मुक्तः कृतार्थो भवतु प्रबुद्धः ॥ 472 ॥
bhavān apīdaṁ para-tattvam ātmanaḥ svarūpam ānanda-ghanaṁ vicārya · vidhūya mohaṁ sva-manaḥ-prakalpitaṁ muktaḥ kṛtārtho bhavatu prabuddhaḥ
शब्दार्थ: भवान् अपि इदं परतत्त्वम् · आप भी इस परम-तत्व को · आत्मनः स्वरूपम् आनन्द-घनं विचार्य · आत्मा का स्वरूप, आनंद-घन, विचार कर · विधूय मोहं स्व-मनः-प्रकल्पितं · अपने मन के बनाए मोह को झाड़ कर · मुक्तः कृतार्थः भवतु प्रबुद्धः · मुक्त, कृतार्थ, प्रबुद्ध हो जा।
अर्थ: आप भी इस परम-तत्व को, जो आत्मा का स्वरूप है, आनंद-घन है, विचार कर। अपने मन के बनाए मोह को झाड़ कर, मुक्त, कृतार्थ, प्रबुद्ध हो जा।
भावार्थ: “भवान् अपि”, आप भी। एक छोटा शब्द, पर पूरा वज़न।
अब तक गुरु ने “महान यति,” “तत्त्व-वेत्ता,” “जीवन्मुक्त”, दूसरों की बात की। अब सीधे शिष्य की ओर मुड़ कर, “आप भी।” यानी यह उपलब्धि कोई दूर का सपना नहीं। यह आपके लिए ही है। और तीन शब्द साथ, “मुक्त, कृतार्थ, प्रबुद्ध।” तीनों एक साथ, एक ही फल। यह आदेश नहीं। आशीर्वाद है।
473 · समाधि से, स्थिर बोध-चक्षु से देख, फिर विकल्प नहीं
समाधिना साधुविनिश्चलात्मना पश्यात्मतत्त्वं स्फुटबोधचक्षुषा ।
निःसंशयं सम्यगवेक्षितश्चेच् छ्रुतः पदार्थो न पुनर्विकल्प्यते ॥ 473 ॥
samādhinā sādhu-viniścalātmanā paśyātma-tattvaṁ sphuṭa-bodha-cakṣuṣā · niḥsaṁśayaṁ samyag avekṣitaś cec chrutaḥ padārtho na punar vikalpyate
शब्दार्थ: समाधिना साधु-विनिश्चल-आत्मना · समाधि से, ठीक से निश्चल हुए आत्मा से · पश्य आत्म-तत्त्वं स्फुट-बोध-चक्षुषा · आत्म-तत्व को देख, स्फुट बोध-चक्षु से · निःसंशयं सम्यग् अवेक्षितः चेद् · निःसंशय, अच्छी तरह देखा गया · श्रुतः पदार्थः न पुनः विकल्प्यते · सुना पदार्थ फिर विकल्प में नहीं आता।
अर्थ: समाधि से, ठीक से निश्चल हुए आत्मा से, स्फुट बोध-चक्षु से, आत्म-तत्व को देख। एक बार निःसंशय, अच्छी तरह देखा गया सुना हुआ पदार्थ, फिर विकल्प में नहीं आता।
भावार्थ: गुरु एक प्यारी बात कहते हैं, एक बार अगर “ठीक से” देख लिया, तो फिर “विकल्प” (शक) उठता ही नहीं।
आज तक शिष्य ने श्रुति-वचन सुने (“श्रुतः पदार्थ”); पर बस सुनने से शक मिटते नहीं। शक मिटाने के लिए “स्फुट बोध-चक्षु” चाहिए, साफ़ अनुभव की आँख। समाधि उस आँख को देती है। और तब, जो सुना था, वह “दिख” जाता है, और फिर वापस शक नहीं उठते।
474 · शास्त्र, युक्ति, गुरु, और अंतःसिद्धा स्वानुभूति, प्रमाण
स्वस्याविद्याबन्धसंबन्धमोक्षात् सत्यज्ञानानन्दरूपात्मलब्धौ ।
शास्त्रं युक्तिर्देशिकोक्तिः प्रमाणं चान्तःसिद्धा स्वानुभूतिः प्रमाणम् ॥ 474 ॥
svasyāvidyā-bandha-sambandha-mokṣāt satya-jñānānanda-rūpātma-labdhau · śāstraṁ yuktir deśikoktiḥ pramāṇaṁ cāntaḥ-siddhā svānubhūtiḥ pramāṇam
शब्दार्थ: स्वस्य अविद्या-बन्ध-संबन्ध-मोक्षात् · अपनी अविद्या-बंधन-संबंध से मुक्ति में · सत्य-ज्ञान-आनन्द-रूप-आत्म-लब्धौ · सत्य-ज्ञान-आनंद-रूप आत्म-प्राप्ति में · शास्त्रं युक्तिः देशिक-उक्तिः प्रमाणं · शास्त्र, युक्ति, गुरु-वचन, प्रमाण · च अन्तः-सिद्धा स्वानुभूतिः प्रमाणम् · और भीतर सिद्ध स्वानुभूति प्रमाण।
अर्थ: अपनी अविद्या-बंधन के संबंध से मुक्ति, और सत्य-ज्ञान-आनंद-रूप आत्म-प्राप्ति में, शास्त्र, युक्ति, गुरु-वचन प्रमाण हैं; और भीतर सिद्ध स्वानुभूति भी प्रमाण है।
भावार्थ: गुरु एक चार-तरफ़ा प्रमाण-व्यवस्था देते हैं, और सबसे ऊँचे को अंत में रखते हैं।
शास्त्र, युक्ति (तर्क), देशिक-उक्ति (गुरु का कथन), ये तीन बाहरी प्रमाण हैं। और चौथा, सबसे क़ीमती, “अन्तःसिद्धा स्वानुभूति।” यानी भीतर पकी हुई अपनी अनुभूति। बाहरी तीन भीतर के एक तक ले जाते हैं, पर असली प्रमाण यही है। यह वेदान्त की एक बहुत बारीक, खुली दृष्टि है, कोई “अंध-श्रद्धा” नहीं। अनुभव ज़रूरी।
475 · बंध, मोक्ष, तृप्ति, चिंता, आरोग्य, क्षुधा, सब अपने आप वेद्य
बन्धो मोक्षश्च तृप्तिश्च चिन्तारोग्यक्षुदादयः ।
स्वेनैव वेद्या यज्ज्ञानं परेषामानुमानिकम् ॥ 475 ॥
bandho mokṣaś ca tṛptiś ca cintārogya-kṣud-ādayaḥ · svenaiva vedyā yaj jñānaṁ pareṣām ānumānikam
शब्दार्थ: बन्धः मोक्षः च तृप्तिः च · बंध, मोक्ष और तृप्ति · चिन्ता-आरोग्य-क्षुद्-आदयः · चिंता, आरोग्य, भूख आदि · स्वेन एव वेद्याः · अपने ही द्वारा वेद्य · यद्-ज्ञानं परेषाम् आनुमानिकम् · दूसरों का ज्ञान अनुमानिक।
अर्थ: बंध, मोक्ष, तृप्ति, चिंता, आरोग्य, भूख, आदि अपने ही द्वारा वेद्य (अनुभव-योग्य) हैं; दूसरों का ज्ञान [इनके बारे में] बस अनुमानिक है।
भावार्थ: गुरु एक प्यारी रोज़ की मिसाल देते हैं, भूख, चिंता, स्वस्थता।
आप भूखे हैं, तो यह आप ही जानते हैं। डॉक्टर देख कर बस अंदाज़ा लगा सकता है। आप चिंतित हैं, तो यह भी आप ही जानते हैं। बंध और मोक्ष भी ऐसे ही “अंदर” वाली बातें हैं। दूसरे देख कर “अंदाज़ा” लगा सकते हैं, पर जान सिर्फ़ आप सकते हैं। तो अपनी मुक्ति का अनुभव अपनी ज़िम्मेदारी है, किसी और से प्रमाण नहीं माँगा जा सकता।
476 · गुरु-श्रुति बस तटस्थ बताते, ईश्वर-अनुगृहीत प्रज्ञा से तर
तटस्थिता बोधयन्ति गुरवः श्रुतयो यथा ।
प्रज्ञयैव तरेद्विद्वानीश्वरानुगृहीतया ॥ 476 ॥
taṭa-sthitā bodhayanti guravaḥ śrutayo yathā · prajñayaiva tared vidvān īśvarānugṛhītayā
शब्दार्थ: तट-स्थिताः बोधयन्ति गुरवः श्रुतयः · किनारे खड़े गुरु और श्रुति बताते · यथा · जिस तरह · प्रज्ञया एव तरेद् विद्वान् · प्रज्ञा से ही विद्वान तरता · ईश्वर-अनुगृहीतया · ईश्वर से अनुगृहीत।
अर्थ: गुरु और श्रुति किनारे खड़े बस बताते हैं। विद्वान तो ईश्वर-अनुगृहीत प्रज्ञा से ही [संसार-नदी को] तरता है।
भावार्थ: “तट-स्थिताः”, किनारे खड़े। यह बहुत प्यारी, और बेहद नम्र तस्वीर है।
गुरु और श्रुति नदी के किनारे खड़े हैं, और रास्ता दिखा रहे हैं: “यहाँ से तरो।” पर तरना? वह आपको ख़ुद करना है। और एक छोटा शब्द, “ईश्वर-अनुगृहीतया”, कहता है कि अपनी प्रज्ञा भी अकेली नहीं। ईश्वर की कृपा से जागती है। यह विनम्रता और आत्म-निर्भरता का एक सुंदर संतुलन है।
477 · अपनी अनुभूति से अखंडित आत्मा जान, आत्मा में बस
स्वानुभूत्या स्वयं ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डितम् ।
संसिद्धः संमुखं तिष्ठेन्निर्विकल्पात्मनात्मनि ॥ 477 ॥
svānubhūtyā svayaṁ jñātvā svam ātmānam akhaṇḍitam · saṁsiddhaḥ saṁmukhaṁ tiṣṭhen nirvikalpātmanātmani
शब्दार्थ: स्वानुभूत्या स्वयं ज्ञात्वा · स्वानुभूति से ख़ुद जान कर · स्वम् आत्मानम् अखण्डितम् · अपनी अखंडित आत्मा · संसिद्धः संमुखं तिष्ठेद् · पूर्ण-सिद्ध हो कर सामने बैठे · निर्विकल्प-आत्मना आत्मनि · निर्विकल्प-आत्मा से आत्मा में।
अर्थ: स्वानुभूति से ख़ुद अपनी अखंडित आत्मा को जान कर, पूर्ण-सिद्ध हो कर, निर्विकल्प-आत्मा के रूप में आत्मा में सामने (दृढ़) बैठे।
भावार्थ: गुरु एक छोटा, साफ़ निर्देश देते हैं, “अपनी आत्मा में सामने बैठ।”
“सम्मुखम् तिष्ठेद्”, सामने बैठे। यानी अब आत्मा से नज़र हटाने का काम नहीं। सीधी, सामने, स्थिर। और “निर्विकल्प-आत्मना”, किसी विकल्प के बिना। बस एक, आत्मा। इस एक पंक्ति में बैठने की पूरी कला है।
478 · वेदान्त-सिद्धान्त, ब्रह्म ही जीव, ब्रह्म ही जगत; अखंड-स्थिति मोक्ष
वेदान्तसिद्धान्तनिरुक्तिरेषा ब्रह्मैव जीवः सकलं जगच्च ।
अखण्डरूपस्थितिरेव मोक्षो ब्रह्माद्वितीये श्रुतयः प्रमाणम् ॥ 478 ॥
vedānta-siddhānta-niruktir eṣā brahmaiva jīvaḥ sakalaṁ jagac ca · akhaṇḍa-rūpa-sthitir eva mokṣo brahmādvitīye śrutayaḥ pramāṇam
शब्दार्थ: वेदान्त-सिद्धान्त-निरुक्तिः एषा · यह वेदान्त-सिद्धान्त की निरुक्ति · ब्रह्म एव जीवः सकलं जगत् च · ब्रह्म ही जीव और सकल जगत · अखण्ड-रूप-स्थितिः एव मोक्षः · अखंड-रूप में स्थिति ही मोक्ष · ब्रह्म-अद्वितीये श्रुतयः प्रमाणम् · ब्रह्म के अद्वितीय होने पर श्रुतियाँ प्रमाण।
अर्थ: यह वेदान्त-सिद्धान्त की निरुक्ति है, ब्रह्म ही जीव है, ब्रह्म ही सकल जगत है, अखंड-रूप में स्थिति ही मोक्ष है। ब्रह्म के अद्वितीय होने पर श्रुतियाँ प्रमाण हैं।
भावार्थ: यह गुरु का अंतिम वाक्य है, और शायद विवेकचूडामणि का सबसे संक्षिप्त सार। “वेदान्त-सिद्धान्त-निरुक्तिः”, पूरे वेदान्त का सार।
तीन वाक्य, और वेदान्त पूरा: (1) ब्रह्म ही जीव। (2) ब्रह्म ही जगत। (3) अखंड-स्थिति ही मोक्ष। बस। न और कुछ चाहिए। और प्रमाण? “श्रुतयः प्रमाणम्”, श्रुतियाँ। यह गुरु का अंतिम शब्द है। अब चुप्पी।
479 · इस तरह गुरु-वचन, श्रुति-प्रमाण, आत्म-युक्ति से जान, शिष्य आत्म-निष्ठ निश्चल हो गया
इति गुरुवचनाच्छ्रुतिप्रमाणात् परमवगम्य सतत्त्वमात्मयुक्त्या ।
प्रशमितकरणः समाहितात्मा क्वचिदचलाकृतिरात्मनिष्ठतोऽभूत् ॥ 479 ॥
iti guru-vacanāc chruti-pramāṇāt param avagamya sa-tattvam ātma-yuktyā · praśamita-karaṇaḥ samāhitātmā kvacid acalākṛtir ātma-niṣṭhato’bhūt
शब्दार्थ: इति गुरु-वचनात् श्रुति-प्रमाणात् · इस तरह गुरु-वचन से, श्रुति-प्रमाण से · परम् अवगम्य सतत्त्वम् · परम-तत्व को जान कर · आत्म-युक्त्या · आत्म-युक्ति से · प्रशमित-करणः समाहित-आत्मा · इन्द्रियाँ शांत, आत्मा समाहित · क्वचित् अचल-आकृतिः आत्म-निष्ठतः अभूत् · कहीं अचल-आकृति, आत्म-निष्ठ हो गया।
अर्थ: इस तरह गुरु-वचन से, श्रुति-प्रमाण से, आत्म-युक्ति से, परम-तत्व को जान कर, इन्द्रियाँ शांत, आत्मा समाहित, शिष्य कहीं अचल-आकृति, आत्म-निष्ठ हो गया।
भावार्थ: कथा-शैली में बदलाव, अब “इति” से कथा शुरू होती है। तीन प्रमाण साथ काम करते हैं: गुरु-वचन, श्रुति, आत्म-युक्ति।
और शिष्य? वह बोलता नहीं। पूछता नहीं। बस, “अचल-आकृति।” मूर्ति की तरह। इन्द्रियाँ शांत, आत्मा समाहित। यह वह क्षण है, जो विवेकचूडामणि की पूरी यात्रा का चरम है।
480 · कुछ काल ब्रह्म में मन रख, फिर परम-आनंद से उठ कर बोला
किंचित्कालं समाधाय परे ब्रह्मणि मानसम् ।
उत्थाय परमानन्दादिदं वचनमब्रवीत् ॥ 480 ॥
kiṁcit-kālaṁ samādhāya pare brahmaṇi mānasam · utthāya paramānandād idaṁ vacanam abravīt
शब्दार्थ: किंचित्-कालं समाधाय · कुछ काल समाधान कर · परे ब्रह्मणि मानसम् · परम-ब्रह्म में मन · उत्थाय परम-आनन्दात् · परम-आनंद से उठ कर · इदं वचनम् अब्रवीत् · यह वचन कहा।
अर्थ: कुछ काल मन को परम-ब्रह्म में समाधान कर के, परम-आनंद से उठ कर, [शिष्य ने] यह वचन कहा।
भावार्थ: गुरु ने अंतिम बात कही। शिष्य कुछ देर समाधि में रहा। और जब उठा, “परम-आनंद” से। यह क्षण विवेकचूडामणि का सबसे प्यारा क्षण है।
आम तौर पर लोग कुछ सुनने के बाद तुरंत “हाँ-नहीं” बोलते हैं। यहाँ शिष्य “कुछ काल” चुप रहा, समाधि में डूब कर। और जब उठा, तो आनंद के साथ। यह नमूना है, कैसे एक गहरी बात को धारण करना है। तुरंत बोलना नहीं। पहले डूबना, फिर बोलना।
481 · बुद्धिर्विनष्टा, गलिता प्रवृत्तिः, क्या जानूँ, कितना सुख है, अपार!
बुद्धिर्विनष्टा गलिता प्रवृत्तिः ब्रह्मात्मनोरेकतयाधिगत्या ।
इदं न जानेऽप्यनिदं न जाने किं वा कियद्वा सुखमस्त्यपारम् ॥ 481 ॥
buddhir vinaṣṭā galitā pravṛttiḥ brahmātmanor ekatayādhi-gatyā · idaṁ na jāne’py anidaṁ na jāne kiṁ vā kiyad vā sukham asty apāram
शब्दार्थ: बुद्धिः विनष्टा गलिता प्रवृत्तिः · बुद्धि नष्ट हो गई, प्रवृत्ति गल गई · ब्रह्म-आत्मनोः एकतया अधिगत्या · ब्रह्म-आत्मा की एकता के बोध से · इदं न जाने अपि अनिदं न जाने · “यह” नहीं जानता, “यह नहीं” भी नहीं जानता · किं वा कियद् वा सुखम् अस्ति अपारम् · क्या, कितना, सुख है, अपार!
अर्थ: बुद्धि नष्ट हो गई, प्रवृत्ति गल गई, ब्रह्म-आत्मा की एकता के बोध से। “यह” नहीं जानता, “यह नहीं” भी नहीं जानता। क्या, कितना, सुख अपार है!
भावार्थ: यह विवेकचूडामणि का सबसे यादगार, सबसे प्यारा श्लोक है। शिष्य का पहला वचन। हर शब्द में एक टूटी हुई, बहती हुई आवाज़, एक ऐसे आदमी की, जो अभी-अभी जागा हो।
“बुद्धिर्विनष्टा”, बुद्धि नष्ट। “गलिता प्रवृत्तिः”, प्रवृत्ति गल गई। यानी जो “मैं यह करूँ, मैं वह सोचूँ” की पुरानी मशीन थी, वह अब नहीं। “इदं न जाने”, “यह” क्या है, नहीं जानता। “अनिदं न जाने”, “यह नहीं” क्या है, वह भी नहीं जानता। यानी सब विभाजन गायब। और बस एक बात बची, “किं वा कियद् वा सुखम् अस्ति अपारम्।” क्या कहूँ, कितना कहूँ, सुख अपार है। यह दर्शन नहीं। यह नमूना है, कि एक सच्चा आत्म-बोध कैसा सुनाई देता है।
482 · वाणी-मन के पार, परब्रह्म-समुद्र, मेरा मन उसके अंश-अंश-लव में लीन
वाचा वक्तुमशक्यमेव मनसा मन्तुं न वा शक्यते स्वानन्दामृतपूरपूरितपरब्रह्माम्बुधेर्वैभवम् ।
अम्भोराशिविशीर्णवार्षिकशिलाभावं भजन्मे मनो यस्यांशांशलवे विलीनमधुनानन्दात्मना निर्वृतम् ॥ 482 ॥
vācā vaktum aśakyam eva manasā mantuṁ na vā śakyate svānandāmṛta-pūra-pūrita-para-brahmāmbudher vaibhavam · ambho-rāśi-viśīrṇa-vārṣika-śilā-bhāvaṁ bhajan me mano yasyāṁśāṁśa-lave vilīnam adhunānandātmanā nirvṛtam
शब्दार्थ: वाचा वक्तुम् अशक्यम् एव · वाणी से कहा नहीं जा सकता · मनसा मन्तुं न वा शक्यते · मन से सोचा भी नहीं जा सकता · स्वानन्द-अमृत-पूर-पूरित-परब्रह्म-अम्बुधेः वैभवम् · स्वानंद-अमृत से भरे परब्रह्म-समुद्र का वैभव · अम्भो-राशि-विशीर्ण-वार्षिक-शिला-भावं भजन् · पानी-राशि में घुलते वार्षिक ओले की तरह · मे मनः · मेरा मन · यस्य अंश-अंश-लवे विलीनम् · जिसके अंश-अंश-लव में विलीन · अधुना आनन्द-आत्मना निर्वृतम् · अब आनंद-आत्मा से शांत।
अर्थ: वाणी से जो कहा नहीं जा सकता, मन से सोचा भी नहीं जा सकता, स्वानंद-अमृत से भरे परब्रह्म-समुद्र का वह वैभव। मेरा मन, पानी-राशि में घुलते वार्षिक ओले की तरह, उसके अंश के अंश के लव में विलीन हो कर, अब आनंद-आत्मा से शांत है।
भावार्थ: शिष्य एक अद्भुत उपमा देता है, “अम्भो-राशि-विशीर्ण-वार्षिक-शिला-भावम्।” मानसून के एक ओले की तरह, जो पानी की बड़ी राशि में गिर कर घुल जाता है।
ओला कहाँ गया? पानी हो गया। “मेरा” अस्तित्व नहीं। बस पानी। शिष्य का मन वैसा ही है, परब्रह्म-समुद्र के “अंश-अंश-लव” (एक छोटे से अंश के छोटे से अंश के एक टुकड़े) में डूब कर, ख़ुद ख़त्म। और “वैभव”, पूरे समुद्र का वैभव, इतना है कि वाणी से कहा नहीं जा सकता, मन से सोचा नहीं जा सकता। बस अनुभव बचा है। यह उपमा वेदान्त की काव्यात्मक चूड़ी है।
483 · कहाँ गया, किसने ले लिया, कहाँ लीन, यह जगत?
क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत् ।
अधुनैव मया दृष्टं नास्ति किं महदद्भुतम् ॥ 483 ॥
kva gataṁ kena vā nītaṁ kutra līnam idaṁ jagat · adhunaiva mayā dṛṣṭaṁ nāsti kiṁ mahad-adbhutam
शब्दार्थ: क्व गतं केन वा नीतं · कहाँ गया, किसने ले लिया · कुत्र लीनम् इदं जगत् · कहाँ लीन यह जगत · अधुना एव मया दृष्टं नास्ति · अभी ही मेरे द्वारा देखा गया था, अब नहीं · किं महद्-अद्भुतम् · कितना महाद्भुत।
अर्थ: कहाँ गया, किसने ले लिया, कहाँ लीन हो गया, यह जगत? अभी ही मेरे द्वारा देखा गया था, अब नहीं। कितना महाद्भुत!
भावार्थ: शिष्य एक बच्चे की तरह बोलता है, आँखें खुली रखे। “अभी तो था, गया कहाँ?”
यह वह क्षण है जब “अद्वैत” बौद्धिक नहीं। अनुभव है। पूरा जगत “गायब” हो गया है, किसी कोने में नहीं। किसी ने उठाया भी नहीं। बस “विलीन” हो गया। यह कथन एक मासूम, हैरान-भरा है। और “महद्-अद्भुतम्”, कितना महाद्भुत! बस यही शब्द बचा है।
484 · क्या त्याज्य, क्या ग्राह्य, ब्रह्म-महार्णव में कोई फ़र्क नहीं
किं हेयं किमुपादेयं किमन्यत्किं विलक्षणम् ।
अखण्डानन्दपीयूषपूर्णे ब्रह्ममहार्णवे ॥ 484 ॥
kiṁ heyaṁ kim upādeyaṁ kim anyat kiṁ vilakṣaṇam · akhaṇḍānanda-pīyūṣa-pūrṇe brahma-mahārṇave
शब्दार्थ: किं हेयं किम् उपादेयम् · क्या त्याज्य, क्या ग्राह्य · किम् अन्यत् किम् विलक्षणम् · क्या अलग, क्या विभिन्न · अखण्ड-आनन्द-पीयूष-पूर्णे · अखंड-आनंद-अमृत से भरे · ब्रह्म-महा-अर्णवे · ब्रह्म-महासमुद्र में।
अर्थ: अखंड-आनंद-अमृत से भरे ब्रह्म-महासमुद्र में, क्या त्याज्य, क्या ग्राह्य, क्या अलग, क्या विभिन्न?
भावार्थ: शिष्य चार सवाल पूछता है, जिनका कोई जवाब नहीं। क्योंकि सब “एक” हो गया।
आम तौर पर हमारी ज़िंदगी इन चार के इर्द-गिर्द घूमती है, क्या त्यागूँ, क्या लूँ, “मेरा” और “और का” क्या अलग, क्या ख़ास। पर जब “ब्रह्म-महार्णव” में सब घुल जाए, तो ये सवाल अपने आप गायब। यह मुक्ति की एक बहुत सटीक झलक है।
485 · कुछ नहीं देखता, कुछ नहीं सुनता, कुछ नहीं जानता, स्व-आनंद से विलक्षण
न किंचिदत्र पश्यामि न शृणोमि न वेद्म्यहम् ।
स्वात्मनैव सदानन्दरूपेणास्मि विलक्षणः ॥ 485 ॥
na kiṁcid atra paśyāmi na śṛṇomi na vedmy aham · svātmanaiva sadānanda-rūpeṇāsmi vilakṣaṇaḥ
शब्दार्थ: न किंचिद् अत्र पश्यामि · यहाँ कुछ नहीं देखता · न शृणोमि न वेद्मि अहम् · न सुनता, न जानता मैं · स्व-आत्मना एव सदा-आनन्द-रूपेण · स्व-आत्मा से ही, सदा-आनंद-रूप · अस्मि विलक्षणः · विलक्षण (अलग) हूँ।
अर्थ: यहाँ कुछ नहीं देखता, कुछ नहीं सुनता, कुछ नहीं जानता मैं। स्व-आत्मा से ही, सदा-आनंद-रूप, विलक्षण हूँ।
भावार्थ: शिष्य तीन इन्द्रिय-कर्मों का त्याग बताता है, देखना, सुनना, जानना। ये सब अब “नहीं” हैं।
यानी इन्द्रियाँ शायद चल रही हैं, पर जो “मैं देख रहा हूँ,” “मैं सुन रहा हूँ”, वह “मैं” वहाँ नहीं। बस “स्व-आत्मा” बचा है, सदा-आनंद-रूप। और “विलक्षण”, सब “देखने-सुनने-जानने” से अलग। यह आत्म-बोध की अंतिम झलक है, इस उद्गार का अंत। और अगले श्लोकों में शिष्य गुरु को प्रणाम करता है, कथा का अगला मोड़।
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना: भाग 17, शिष्य का गुरु को नमन-स्तोत्र। फिर एक के बाद एक “अहं ब्रह्म” की घोषणाएँ, असंग, अनंग, अलिंग, अभंग, प्रशांत, अनंत, अमल, चिरन्तन; अकर्ता, अभोक्ता, अविकार, अक्रिय; नारायण, नर-कान्तक, पुर-अंतक, सब “अहम्।” फिर माया-वायु से उठती जगत-तरंगें मेरे अखंड-सुख-समुद्र में।
और एक काम जेब में रखिए: श्लोक 481, “बुद्धिर्विनष्टा, गलिता प्रवृत्तिः… किं वा कियद् वा सुखम् अस्ति अपारम्।” इसे आज एक बार धीरे-धीरे, ज़ोर से पढ़िए, और देखिए, क्या एक छोटी सी झलक भी मिलती है। मिले या न मिले, यह पंक्ति याद रखने योग्य है।