विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 17 · शिष्य का स्तोत्र, “नमो नमस्ते” से “अहं ब्रह्म” तक · श्लोक 486-519
शिष्य अब रुकता नहीं। पहले गुरु को नमन, फिर एक के बाद एक “अहम्” घोषणाएँ, असंग, अनंग, अलिंग, अभंग; अकर्ता, अभोक्ता, अविकार; नारायण, नर-कान्तक, पुर-अंतक, ईश। बादल आकाश को नहीं छूते, घड़े के धर्म दीये को नहीं। और मुझे विकार नहीं। अंत में फिर गुरु को, “महा-स्वप्न से जगा कर तूने मुझे बचाया।”
पहले एक बात
भाग 16 में शिष्य के पहले उद्गार सुनाई दिए, “बुद्धिर्विनष्टा, गलिता प्रवृत्तिः।” अब वही धारा बहती रहती है, पर एक नया रंग ले लेती है। पहले गुरु को नमन, चार-पाँच श्लोक तक। फिर अचानक एक झरना फूट पड़ता है, “असंगो अहम्, अनंगो अहम्, अलिंगो अहम्, अभंगुरः…” एक के बाद एक। शिष्य अब रुक नहीं रहा, वह “अहम् ब्रह्म” को हर कोण से कह रहा है।
और इस बहाव में, बीच-बीच में, उपमाएँ आती हैं, बादल आकाश को नहीं छूते, घड़े के धर्म दीये को नहीं। परछाई पुरुष को नहीं। इस सब के अंत में, फिर गुरु की ओर मुड़ कर, “हे गुरुदेव, माया से बने महा-स्वप्न में मैं अहंकार-व्याघ्र से सताया जा रहा था। तूने मुझे जगा कर बचाया।” यह एक शिष्य का सबसे ईमानदार धन्यवाद है, अद्वैत में बैठे रह कर भी।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। तीन हिस्से, गुरु को पहला नमन और कृतार्थ-घोषणा (486-488), “अहं ब्रह्म” की मूसलाधार घोषणाएँ + विकार-तर्क (489-516), और गुरु को अंतिम नमन (517-519)। असली खंभे: 488 (धन्योऽहम्), 489-490 (असंगो-अकर्ता शृंखला), 494 (नारायण-शिव-ईश “अहम्”), 496 (विश्व-तरंगें मेरे सुख-समुद्र में), 499 (आकाश-आदित्य-अहार्य-अम्भोधि चार उपमाएँ), 518 (महा-स्वप्न से जगा कर बचाया)।
486 · नमो नमस्ते गुरवे, महात्मा, विमुक्त-संग, सद्-उत्तम
नमो नमस्ते गुरवे महात्मने विमुक्तसङ्गाय सदुत्तमाय ।
नित्याद्वयानन्दरसस्वरूपिणे भूम्ने सदापारदयाम्बुधाम्ने ॥ 486 ॥
namo namas te gurave mahātmane vimukta-saṅgāya sad-uttamāya · nityādvayānanda-rasa-svarūpiṇe bhūmne sadāpāra-dayāmbu-dhāmne
शब्दार्थ: नमो नमस्ते गुरवे महात्मने · आपको नमन-नमन, गुरुदेव, महात्मा · विमुक्त-सङ्गाय सद्-उत्तमाय · विमुक्त-संग, सद्-उत्तम · नित्य-अद्वय-आनन्द-रस-स्वरूपिणे · नित्य-अद्वय-आनंद-रस-स्वरूप · भूम्ने सदा-अपार-दया-अम्बु-धाम्ने · असीम, सदा अपार दया-समुद्र के धाम।
अर्थ: नमन-नमन आपको, हे गुरुदेव, महात्मा, विमुक्त-संग, सद्-उत्तम; नित्य-अद्वय-आनंद-रस-स्वरूप; असीम, सदा अपार दया-समुद्र के धाम।
भावार्थ: “नमो नमस्ते”, दो बार नमन। यह एक का दोहराव नहीं। दिल का दो-बार झुकना है।
और गुरु के लिए छह विशेषण, महात्मा, विमुक्त-संग, सद्-उत्तम, नित्य-अद्वय-आनंद-रस-स्वरूप, भूम्ने (असीम), अपार-दया-अम्बु-धाम। हर विशेषण एक स्वीकार है। गुरु जो दे चुका, उसके लिए कोई “धन्यवाद” शब्द काफ़ी नहीं। बस यही नमन, और यह वर्णन।
487 · आपकी कटाक्ष-चन्द्रिका से, भव-ताप शांत, आत्म-पद क्षण में मिला
यत्कटाक्षशशिसान्द्रचन्द्रिका पातधूतभवतापजश्रमः ।
प्राप्तवानहमखण्डवैभवा नन्दमात्मपदमक्षयं क्षणात् ॥ 487 ॥
yat-kaṭākṣa-śaśi-sāndra-candrikā pāta-dhūta-bhava-tāpa-ja-śramaḥ · prāptavān aham akhaṇḍa-vaibhavā-nandam ātma-padam akṣayaṁ kṣaṇāt
शब्दार्थ: यद्-कटाक्ष-शशि-सान्द्र-चन्द्रिका-पात-धूत-भव-ताप-ज-श्रमः · जिसकी कटाक्ष की चन्द्र-घनी-चाँदनी के पात से भव-ताप से उपजी थकान धोई · प्राप्तवान् अहम् अखण्ड-वैभव-आनन्दम् · मैंने पाया अखंड-वैभव-आनंद · आत्म-पदम् अक्षयं क्षणात् · अक्षय आत्म-पद, क्षण में।
अर्थ: आपकी जिस कटाक्ष की चन्द्र-घनी-चाँदनी के पात से भव-ताप से उपजी थकान धुल गई, मैंने अखंड-वैभव-आनंद, अक्षय आत्म-पद, क्षण में पाया।
भावार्थ: शिष्य एक काव्य-उपमा देता है, गुरु का “कटाक्ष” (हल्की-सी नज़र) चाँदनी की तरह है, घनी चाँदनी।
और “भव-ताप”, संसार की तपन, एक थकाने वाली गर्मी थी। चाँदनी पड़ी, और तपन कम हो गई। और इस “धुलाई” के साथ, “क्षण में” अखंड-वैभव-आनंद और अक्षय आत्म-पद। यह कितनी जल्दी है, क्षण में! यह कह रहा है कि गुरु की पूरी कृपा एक नज़र भर है, पर वह नज़र साधक के लिए सब बदल देती है।
488 · धन्योऽहम्, कृतकृत्योऽहम्, विमुक्तोऽहम्, पूर्णोऽहम्
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं विमुक्तोऽहं भवग्रहात् ।
नित्यानन्दस्वरूपोऽहं पूर्णोऽहं त्वदनुग्रहात् ॥ 488 ॥
dhanyo’haṁ kṛta-kṛtyo’haṁ vimukto’haṁ bhava-grahāt · nityānanda-svarūpo’haṁ pūrṇo’haṁ tvad-anugrahāt
शब्दार्थ: धन्यः अहं कृत-कृत्यः अहम् · धन्य हूँ, कृत-कृत्य हूँ · विमुक्तः अहं भव-ग्रहात् · संसार-पकड़ से विमुक्त हूँ · नित्य-आनन्द-स्वरूपः अहं पूर्णः अहम् · नित्य-आनंद-स्वरूप हूँ, पूर्ण हूँ · त्वद्-अनुग्रहात् · आपकी कृपा से।
अर्थ: मैं धन्य हूँ, कृत-कृत्य हूँ, संसार-पकड़ से विमुक्त हूँ; नित्य-आनंद-स्वरूप हूँ, पूर्ण हूँ, आपकी कृपा से।
भावार्थ: शिष्य पाँच “अहम्”, और हर एक एक स्थिति। यह बहुत प्यारा है, और बहुत संगीतमय।
धन्य (भाग्यशाली), कृत-कृत्य (जो काम था, हो गया), विमुक्त (पकड़ ख़त्म), नित्य-आनंद-स्वरूप, पूर्ण। और अंत में, “त्वद्-अनुग्रहात्”, आपकी कृपा से। यानी यह सब “मैंने पाया” नहीं। “आपने दिया।” यह विनम्रता-और-गौरव का सुंदर मेल है।
489 · असंगो, अनंगो, अलिंगो, अभंग; प्रशांत, अनंत, अमल, चिरन्तन
असङ्गोऽहमनङ्गोऽहमलिङ्गोऽहमभङ्गुरः ।
प्रशान्तोऽहमनन्तोऽहममलोऽहं चिरन्तनः ॥ 489 ॥
asaṅgo’ham anaṅgo’ham aliṅgo’ham abhaṅguraḥ · praśānto’ham ananto’ham amalo’haṁ cirantanaḥ
शब्दार्थ: असङ्गः अहम् अनङ्गः अहम् अलिङ्गः अहम् अभङ्गुरः · असंग, अनंग (देह-रहित), अलिंग (चिह्न-रहित), अभंग (टूटने-योग्य नहीं) · प्रशान्तः अहम् अनन्तः अहम् अमलः अहं चिरन्तनः · प्रशांत, अनंत, अमल (दाग-रहित), चिरन्तन।
अर्थ: असंग हूँ, देह-रहित हूँ, चिह्न-रहित हूँ, अभंग हूँ; प्रशांत हूँ, अनंत हूँ, अमल हूँ, चिरन्तन हूँ।
भावार्थ: आठ “अहम्”, एक के बाद एक, मानो एक मंत्र बना रहे हों।
आठ शब्द हर तरफ़ से “मैं नहीं हूँ” वाली पुरानी छोटी पहचान को तोड़ते हैं। ये कोई थोपी हुई पहचान नहीं। यह असली है, बस अब तक छिपी थी। शिष्य अब हर रूप में अपने को कह रहा है, हर शब्द एक “हाँ।”
490 · अकर्ता, अभोक्ता, अविकार, अक्रिय; शुद्ध-बोध, केवल, सदाशिव
अकर्ताहमभोक्ताहमविकारोऽहमक्रियः ।
शुद्धबोधस्वरूपोऽहं केवलोऽहं सदाशिवः ॥ 490 ॥
akartāham abhoktāham avikāro’ham akriyaḥ · śuddha-bodha-svarūpo’haṁ kevalo’haṁ sadāśivaḥ
शब्दार्थ: अकर्ता अहम् अभोक्ता अहम् अविकारः अहम् अक्रियः · अकर्ता, अभोक्ता, अविकार, अक्रिय · शुद्ध-बोध-स्वरूपः अहं केवलः अहं सदाशिवः · शुद्ध-बोध-स्वरूप, केवल, सदाशिव।
अर्थ: अकर्ता हूँ, अभोक्ता हूँ, अविकार हूँ, अक्रिय हूँ; शुद्ध-बोध-स्वरूप हूँ, केवल हूँ, सदाशिव हूँ।
भावार्थ: सात और “अहम्।” शिष्य अब रुकता नहीं। बहता ही जाता है।
और एक नया, ऊँचा शब्द, “सदाशिव।” यानी “हमेशा का शिव।” यह ईश्वर के सबसे ऊँचे रूपों में एक है, सब-कल्याण-स्वरूप, सबसे परे। शिष्य कह रहा है, मैं वही हूँ। यह कोई अहंकार नहीं। यह आत्मा का असली रूप कहने की हिम्मत है।
491 · द्रष्टा-वक्ता-कर्ता-भोक्ता से विभिन्न, नित्य-निरन्तर-निष्क्रिय
द्रष्टुः श्रोतुर्वक्तुः कर्तुर्भोक्तुर्विभिन्न एवाहम् ।
नित्यनिरन्तरनिष्क्रियनिःसीमासङ्गपूर्णबोधात्मा ॥ 491 ॥
draṣṭuḥ śrotur vaktuḥ kartur bhoktur vibhinna evāham · nitya-nirantara-niṣkriya-niḥsīmāsaṅga-pūrṇa-bodhātmā
शब्दार्थ: द्रष्टुः श्रोतुः वक्तुः कर्तुः भोक्तुः विभिन्नः एव अहम् · द्रष्टा, श्रोता, वक्ता, कर्ता, भोक्ता, इन सब से विभिन्न ही मैं · नित्य-निरन्तर-निष्क्रिय-निःसीम-असङ्ग-पूर्ण-बोध-आत्मा · नित्य, निरंतर, निष्क्रिय, निःसीम, असंग, पूर्ण-बोध-आत्मा।
अर्थ: द्रष्टा, श्रोता, वक्ता, कर्ता, भोक्ता, इन सब से विभिन्न ही मैं; नित्य, निरंतर, निष्क्रिय, निःसीम, असंग, पूर्ण-बोध-आत्मा।
भावार्थ: शिष्य एक बहुत बारीक बात कहता है, मैं उन सब “मैं-वालों” से अलग हूँ, जो हम आम तौर पर मानते हैं।
“मैं देख रहा हूँ”, यह जो “मैं” है, वह नहीं। “मैं बोल रहा हूँ”, यह “मैं” भी नहीं। ये सब फ़ंक्शन हैं, और उनके पीछे एक “करता” है, पर असली “मैं” इन सब से “विभिन्न।” यह एक कदम और गहरा है, अद्वैत का सूक्ष्मतम बिंदु।
492 · “मैं यह नहीं। वह नहीं”, दोनों का अवभासक, परम-शुद्ध, अद्वितीय
नाहमिदं नाहमदोऽप्युभयोरवभासकं परं शुद्धम् ।
बाह्याभ्यन्तरशून्यं पूर्णं ब्रह्माद्वितीयमेवाहम् ॥ 492 ॥
nāham idaṁ nāham ado’py ubhayor avabhāsakaṁ paraṁ śuddham · bāhyābhyantara-śūnyaṁ pūrṇaṁ brahmādvitīyam evāham
शब्दार्थ: न अहं इदं न अहं अदः · मैं “यह” नहीं। मैं “वह” भी नहीं · अपि उभयोः अवभासकं परं शुद्धम् · बल्कि दोनों का अवभासक, परम-शुद्ध · बाह्य-आभ्यन्तर-शून्यं पूर्णं · बाहर-भीतर के भेद से शून्य, पूर्ण · ब्रह्म-अद्वितीयम् एव अहम् · ब्रह्म-अद्वितीय ही मैं।
अर्थ: मैं “यह” नहीं। मैं “वह” भी नहीं; बल्कि दोनों का अवभासक, परम-शुद्ध। बाहर-भीतर के भेद से शून्य, पूर्ण, ब्रह्म-अद्वितीय ही मैं।
भावार्थ: शिष्य उपनिषदों की प्रसिद्ध “नेति-नेति” विधि को अपनाता है, यह नहीं। वह नहीं।
पर सिर्फ़ “नहीं” से नहीं रुकता, आगे जा कर “अवभासक” कहता है। यानी मैं इन दोनों का “दिखाने वाला” हूँ। बिना मेरे, “यह” और “वह” भी दिखें नहीं। यह आत्मा का सबसे ऊँचा वर्णन है, सब पदार्थों का अंतिम साक्षी, बिना ख़ुद किसी पदार्थ बने।
493 · अनुपम, अनादि-तत्व; “आप-मैं-यह-वह” कल्पना से दूर
निरुपममनादितत्त्वं त्वमहमिदमद इति कल्पनादूरम् ।
नित्यानन्दैकरसं सत्यं ब्रह्माद्वितीयमेवाहम् ॥ 493 ॥
nirupamam anādi-tattvaṁ tvam aham idam ada iti kalpanā-dūram · nityānandaika-rasaṁ satyaṁ brahmādvitīyam evāham
शब्दार्थ: निरुपमम् अनादि-तत्त्वं · अनुपम, अनादि-तत्व · “त्वम् अहम् इदम् अदः” इति कल्पना-दूरम् · “आप, मैं, यह, वह”, इस कल्पना से दूर · नित्य-आनन्द-एक-रसं सत्यं · नित्य-आनंद-एक-रस, सत्य · ब्रह्म-अद्वितीयम् एव अहम् · ब्रह्म-अद्वितीय ही मैं।
अर्थ: अनुपम, अनादि-तत्व; “आप, मैं, यह, वह”, इस कल्पना से दूर; नित्य-आनंद-एक-रस, सत्य, ब्रह्म-अद्वितीय ही मैं।
भावार्थ: शिष्य चारों सर्वनाम पकड़ता है, “आप-मैं-यह-वह।” ये चार ही हमारी पूरी भाषा बनाते हैं।
और कहता है, यह सब “कल्पना” है, मेरे असली रूप से दूर। मैं इन चारों से पहले का, इन सबको चलाने वाला हूँ, पर इनमें से कोई नहीं। यह व्याकरण का भी अतिक्रमण है, भाषा जहाँ रुकती है, वहाँ से शुरू।
494 · नारायण, नर-कान्तक, पुर-अंतक, पुरुष-ईश, अखंड बोध, अशेष साक्षी
नारायणोऽहं नरकान्तकोऽहं पुरान्तकोऽहं पुरुषोऽहमीशः ।
अखण्डबोधोऽहमशेषसाक्षी निरीश्वरोऽहं निरहं च निर्ममः ॥ 494 ॥
nārāyaṇo’haṁ naraka-antako’haṁ pura-antako’haṁ puruṣo’ham īśaḥ · akhaṇḍa-bodho’ham aśeṣa-sākṣī nir-īśvaro’haṁ nir-ahaṁ ca nir-mamaḥ
शब्दार्थ: नारायणः अहं नरक-अन्तकः अहं पुरान्तकः अहं पुरुषः अहम् ईशः · नारायण, नरक-अंतक (विष्णु), पुर-अंतक (शिव), पुरुष-ईश हूँ · अखण्ड-बोधः अहम् अशेष-साक्षी · अखंड-बोध हूँ, अशेष का साक्षी · निरीश्वरः अहं निरहं च निर्ममः · निरीश्वर (किसी ऊँचे ईश्वर से रहित), निरहं, निर्मम।
अर्थ: मैं नारायण हूँ, नरक-अंतक (विष्णु) हूँ, पुर-अंतक (शिव) हूँ, पुरुष-ईश हूँ; अखंड-बोध हूँ, अशेष का साक्षी; निरीश्वर हूँ, निरहं हूँ, निर्मम हूँ।
भावार्थ: यह बहुत हिम्मत वाला श्लोक है। शिष्य अब हर देवता का नाम ले कर, “अहम्” कहता है।
नारायण, विष्णु, शिव, परम-पुरुष-ईश, सब। यह “अहंकार” नहीं। यह “अद्वैत” है। ये सब देव-रूप एक ही ब्रह्म के रूप हैं, और शिष्य उस ब्रह्म से जुड़ चुका है। और साथ ही “निरीश्वर”, “कोई और ऊँचा ईश्वर नहीं।” और “निरह-निर्मम”, कोई “मैं-मेरा” नहीं। यह सब साथ, ख़ाली अहंकार नहीं। असली बोध।
495 · सब प्राणियों में मैं ही, भोक्ता, भोग्य, स्वयं ही सब
सर्वेषु भूतेष्वहमेव संस्थितो ज्ञानात्मनान्तर्बहिराश्रयः सन् ।
भोक्ता च भोग्यं स्वयमेव सर्वं यद्यत्पृथग्दृष्टमिदन्तया पुरा ॥ 495 ॥
sarveṣu bhūteṣv aham eva saṁsthito jñānātmanāntar-bahir-āśrayaḥ san · bhoktā ca bhogyaṁ svayam eva sarvaṁ yad yat pṛthag-dṛṣṭam idantayā purā
शब्दार्थ: सर्वेषु भूतेषु अहम् एव संस्थितः · सब प्राणियों में मैं ही स्थित · ज्ञान-आत्मना अन्तर्-बहिर्-आश्रयः सन् · ज्ञान-आत्मा से अंदर-बाहर का आश्रय हो कर · भोक्ता च भोग्यं स्वयम् एव सर्वं · भोक्ता और भोग्य भी स्वयं ही सब · यद् यद् पृथक्-दृष्टम् इदन्तया पुरा · जो-जो पहले “यह” के रूप में अलग दिखा।
अर्थ: सब प्राणियों में मैं ही स्थित हूँ, ज्ञान-आत्मा से अंदर-बाहर का आश्रय हो कर। भोक्ता और भोग्य, सब स्वयं ही, मैं ही, जो भी पहले “यह” के रूप में अलग दिखता था।
भावार्थ: शिष्य गीता की एक प्रसिद्ध भाषा बोलता है, “सब प्राणियों में मैं ही।” यह कृष्ण ने अर्जुन को कहा था; अब शिष्य ख़ुद यह स्थिति अनुभव से कह रहा है।
और सबसे प्यारी बात, “भोक्ता और भोग्य भी मैं ही।” यानी जो खाने वाला, वही जो खाया जा रहा है। दो-दो “मैं” नहीं; एक ही “मैं,” दो रूप। पुरानी “यह वहाँ है, मैं यहाँ हूँ” वाली दूरी अब नहीं।
496 · मेरे अखंड-सुख-समुद्र में, माया-वायु से विश्व-तरंगें
मय्यखण्डसुखाम्भोधौ बहुधा विश्ववीचयः ।
उत्पद्यन्ते विलीयन्ते मायामारुतविभ्रमात् ॥ 496 ॥
mayy akhaṇḍa-sukhāmbho-dhau bahudhā viśva-vīcayaḥ · utpadyante vilīyante māyā-māruta-vibhramāt
शब्दार्थ: मयि अखण्ड-सुख-अम्भोधौ · मुझ अखंड-सुख-समुद्र में · बहुधा विश्व-वीचयः · अनेक प्रकार की विश्व-तरंगें · उत्पद्यन्ते विलीयन्ते · उठती और विलीन होती · माया-मारुत-विभ्रमात् · माया-वायु के विभ्रम से।
अर्थ: मुझ अखंड-सुख-समुद्र में, अनेक प्रकार की विश्व-तरंगें उठती और विलीन होती हैं, माया-वायु के विभ्रम से।
भावार्थ: यह एक अद्भुत तस्वीर है। शिष्य ख़ुद को “अखंड-सुख-समुद्र” कहता है, एक विशाल, स्थिर समुद्र।
और उस पर “विश्व-तरंगें”, सब-कुछ-वाली लहरें, उठती और गिरती हैं। पर समुद्र वैसा का वैसा। और तरंगें कैसे? “माया-मारुत-विभ्रम”, माया-वायु के विभ्रम से। यानी वायु एक भ्रम है, और लहरें भी; पर समुद्र असली। एक काव्य-छवि में पूरा अद्वैत समा गया।
497 · स्थूल-आदि भाव मुझ में कल्पित, जैसे काल में युग-वर्ष-ऋतु
स्थुलादिभावा मयि कल्पिता भ्रमाद् आरोपितानुस्फुरणेन लोकैः ।
काले यथा कल्पकवत्सरायणर्त्वादयो निष्कलनिर्विकल्पे ॥ 497 ॥
sthūlādi-bhāvā mayi kalpitā bhramād āropitānusphuraṇena lokaiḥ · kāle yathā kalpaka-vatsarāyaṇartv-ādayo niṣkala-nirvikalpe
शब्दार्थ: स्थूल-आदि-भावाः मयि कल्पिताः भ्रमाद् · स्थूल आदि भाव मुझ में भ्रम से कल्पित · आरोपित-अनुस्फुरणेन लोकैः · आरोपित स्फुरण से लोगों द्वारा · काले यथा कल्पक-वत्सर-अयन-ऋतु-आदयः · जैसे काल में कल्प-वर्ष-अयन-ऋतु आदि · निष्कल-निर्विकल्पे · निष्कल-निर्विकल्प में।
अर्थ: स्थूल आदि (कारण-सूक्ष्म-स्थूल) भाव मुझ में भ्रम से कल्पित हैं, आरोपित स्फुरण से लोगों द्वारा। जैसे निष्कल-निर्विकल्प काल में कल्प, वर्ष, अयन, ऋतु आदि (कल्पित हैं)।
भावार्थ: शिष्य एक प्यारी उपमा देता है, काल और उसके बँटवारे।
असली काल “निष्कल-निर्विकल्प” है, कोई बँटवारा नहीं। पर हम उसमें कल्प, वर्ष, अयन (छह-महीने), ऋतु, महीने, दिन, सब बाँटते हैं। ये बँटवारे काल में नहीं। हमारी सुविधा के लिए। उसी तरह, “स्थूल-सूक्ष्म-कारण” शरीर, ये बँटवारे भी असल आत्मा में नहीं; हमारी सुविधा के लिए।
498 · आरोपित, आश्रय को दूषित नहीं करता; मरीचिका-पानी ऊसर ज़मीन को नहीं भिगोता
आरोपितं नाश्रयदूषकं भवेत् कदापि मूढैरतिदोषदूषितैः ।
नार्द्रिकरोत्यूषरभूमिभागं मरीचिकावारि महाप्रवाहः ॥ 498 ॥
āropitaṁ nāśraya-dūṣakaṁ bhavet kadāpi mūḍhair ati-doṣa-dūṣitaiḥ · nārdrī-karoty ūṣara-bhūmi-bhāgaṁ marīcikā-vāri mahā-pravāhaḥ
शब्दार्थ: आरोपितं न आश्रय-दूषकं भवेत् कदापि · आरोपित आश्रय को दूषित कभी नहीं करता · मूढैः अति-दोष-दूषितैः · अति-दोष-दूषित मूढों द्वारा [भले ही] · न आर्द्री-करोति ऊषर-भूमि-भागं · ऊसर भूमि-भाग को नहीं भिगोता · मरीचिका-वारि महा-प्रवाहः · मरीचिका-पानी का महाप्रवाह।
अर्थ: आरोपित अपने आश्रय को कभी दूषित नहीं करता, चाहे अति-दोष-दूषित मूढ़ कुछ भी कहें। मरीचिका के पानी का महाप्रवाह भी ऊसर भूमि-भाग को नहीं भिगोता।
भावार्थ: शिष्य एक तीखी, सटीक उपमा देता है, मरीचिका का पानी।
मरीचिका में कितना भी पानी “दिखे,” ऊसर भूमि गीली नहीं होती। क्यों? क्योंकि पानी असली नहीं। बस दिख रहा है। उसी तरह, मेरे (आत्मा-आश्रय) पर जो भी “विकार” आरोपित दिखें, सुख, दुख, क्रोध, काम, वे मुझे “गीला” नहीं करते। क्योंकि वे आरोपित हैं, असली नहीं।
499 · आकाश, आदित्य, अहार्य, अम्भोधि, चार उपमाओं में मैं
आकाशवल्लेपविदूरगोऽहं आदित्यवद्भास्यविलक्षणोऽहम् ।
अहार्यवन्नित्यविनिश्चलोऽहं अम्भोधिवत्पारविवर्जितोऽहम् ॥ 499 ॥
ākāśa-val lepa-vidūra-go’ham āditya-vad bhāsya-vilakṣaṇo’ham · ahārya-van nitya-viniścalo’ham ambho-dhi-vat pāra-vivarjito’ham
शब्दार्थ: आकाश-वत् लेप-विदूर-गः अहम् · आकाश की तरह लेप से दूर रहने वाला मैं · आदित्य-वद् भास्य-विलक्षणः अहम् · सूर्य की तरह भास्य से विलक्षण · अहार्य-वत् नित्य-विनिश्चलः अहम् · पर्वत की तरह नित्य-निश्चल · अम्भोधि-वत् पार-विवर्जितः अहम् · समुद्र की तरह पार-रहित।
अर्थ: आकाश की तरह लेप से दूर मैं; सूर्य की तरह भास्य (दिखने वाले) से विलक्षण मैं; पर्वत की तरह नित्य-निश्चल मैं; समुद्र की तरह पार-रहित मैं।
भावार्थ: शिष्य चार उपमाएँ देता है, चार बड़ी, ज़मीनी चीज़ें, आकाश, सूर्य, पर्वत, समुद्र।
हर उपमा एक गुण के लिए, असंगता (आकाश), विलक्षणता (सूर्य), अचलता (पर्वत), असीमता (समुद्र)। ये चारों मिल कर एक आत्मा-चित्र खींचते हैं, विशाल, मुक्त, स्थिर, अनंत। और सबसे प्यारी बात, ये चारों रोज़ हम सब देखते हैं, बस अपनी आँख से नहीं देखते।
500 · आकाश का बादल से जैसा संबंध नहीं। मेरा देह से नहीं
न मे देहेन संबन्धो मेघेनेव विहायसः ।
अतः कुतो मे तद्धर्मा जाक्रत्स्वप्नसुषुप्तयः ॥ 500 ॥
na me dehena sambandho meghenaiva vihāyasaḥ · ataḥ kuto me tad-dharmā jāgrat-svapna-suṣuptayaḥ
शब्दार्थ: न मे देहेन संबन्धः · मेरा देह से सम्बन्ध नहीं · मेघेन इव विहायसः · जैसे बादल का आकाश से नहीं · अतः कुतः मे तद्-धर्माः · इसलिए कहाँ से मेरे उसके धर्म · जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तयः · जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति।
अर्थ: जैसे बादल का आकाश से कोई सच्चा सम्बन्ध नहीं। वैसे मेरा देह से नहीं। तो उसके धर्म, जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति, कहाँ से मेरे?
भावार्थ: बादल आकाश में दिखता है, पर आकाश का बादल नहीं। और बादल आकाश को “बदलता” नहीं। आकाश हमेशा साफ़ रहता है।
मेरा देह से रिश्ता भी ऐसा ही है। देह “मुझ में” दिखता है, पर मेरा हिस्सा नहीं। तो जागृति-स्वप्न-सुषुप्ति, ये तीनों देह-मन के धर्म, मेरे कहाँ? देखो, देह जागे या सोए, मैं वही रहता हूँ। यह एक छोटी, पर बहुत सूक्ष्म कसौटी है।
501 · उपाधि आती है, उपाधि जाती है, मैं कुल-पर्वत की तरह स्थिर
उपाधिरायाति स एव गच्छति स एव कर्माणि करोति भुङ्क्ते ।
स एव जीर्यन्म्रियते सदाहं कुलाद्रिवन्निश्चल एव संस्थितः ॥ 501 ॥
upādhir āyāti sa eva gacchati sa eva karmāṇi karoti bhuṅkte · sa eva jīryan mriyate sadāhaṁ kulādri-van niścala eva saṁsthitaḥ
शब्दार्थ: उपाधिः आयाति · उपाधि आती · सः एव गच्छति · वही जाती · सः एव कर्माणि करोति भुङ्क्ते · वही कर्म करती और भोगती · सः एव जीर्यन् म्रियते · वही बूढ़ी होती, मरती · सदा अहं कुल-अद्रि-वत् निश्चलः एव संस्थितः · मैं सदा कुल-पर्वत की तरह निश्चल स्थित।
अर्थ: उपाधि आती है, वही जाती है; वही कर्म करती और भोगती है; वही बूढ़ी होती और मरती है। मैं तो सदा कुल-पर्वत की तरह निश्चल स्थित हूँ।
भावार्थ: शिष्य एक प्यारा शब्द देता है, “कुल-अद्रि।” यानी “कुल-पर्वत”, परम्परागत में हिमालय जैसे महान पर्वत।
पर्वत के पास सब आते-जाते हैं, मेघ, नदियाँ, यात्री, ऋतुएँ। पर पर्वत? वहीं, हज़ारों साल से। आता-जाता उपाधि का खेल है, “मैं जवान हूँ,” “मैं बूढ़ा हूँ,” “मैंने यह किया”, सब उपाधि के। मैं तो पर्वत-स्थिर। यह एक रोज़ की, मुक्ति-देती दृष्टि है।
502 · प्रवृत्ति-निवृत्ति मेरी नहीं। व्योम-सम पूर्ण कैसे चेष्टा करे
न मे प्रवृत्तिर्न च मे निवृत्तिः सदैकरूपस्य निरंशकस्य ।
एकात्मको यो निविडो निरन्तरो व्योमेव पूर्णः स कथं नु चेष्टते ॥ 502 ॥
na me pravṛttir na ca me nivṛttiḥ sadaika-rūpasya nir-aṁśakasya · ekātmako yo niviḍo nirantaro vyomeva pūrṇaḥ sa kathaṁ nu ceṣṭate
शब्दार्थ: न मे प्रवृत्तिः न च मे निवृत्तिः · मेरी प्रवृत्ति नहीं। मेरी निवृत्ति नहीं · सदा-एक-रूपस्य निरंशकस्य · सदा एक-रूप, बिना अंश · एक-आत्मकः यः निविडः निरन्तरः · एक-आत्मक, निविड़ (घना), निरंतर · व्योम-इव पूर्णः · आकाश की तरह पूर्ण · सः कथं नु चेष्टते · वह क्यों चेष्टा करे।
अर्थ: मेरी न प्रवृत्ति, न निवृत्ति, मैं सदा एक-रूप, अंश-रहित। एक-आत्मक, निविड़, निरंतर, आकाश की तरह पूर्ण, वह क्यों चेष्टा करे?
भावार्थ: शिष्य एक प्यारा सवाल पूछता है, आकाश “कुछ करता” है क्या?
आकाश हमेशा वैसा है, कुछ करने की उसको ज़रूरत नहीं। उसमें सब हो रहा है, पर वह ख़ुद कुछ नहीं कर रहा। मेरा भी रूप ऐसा है। “मैं कर रहा हूँ” वाला सब उपाधि का है, मेरा कुछ नहीं। न प्रवृत्ति, न निवृत्ति, दोनों ही उपाधि-स्तर पर।
503 · इन्द्रिय-चेत-विकार-आकृति रहित, पुण्य-पाप कहाँ; श्रुति “अनन्वागत” कहती है
पुण्यानि पापानि निरिन्द्रियस्य निश्चेतसो निर्विकृतेर्निराकृतेः ।
कुतो ममाखण्डसुखानुभूतेः ब्रूते ह्यनन्वागतमित्यपि श्रुतिः ॥ 503 ॥
puṇyāni pāpāni nir-indriyasya niś-cetaso nir-vikṛter nir-ākṛteḥ · kuto mamākhaṇḍa-sukhānubhūteḥ brūte hy ananvāgatam ity api śrutiḥ
शब्दार्थ: पुण्यानि पापानि निर्-इन्द्रियस्य · पुण्य-पाप, इन्द्रिय-रहित को · निःचेतसः निर्विकृतेः निराकृतेः · चेत-रहित, विकार-रहित, आकृति-रहित · कुतः मम अखण्ड-सुख-अनुभूतेः · कहाँ मेरे, अखंड-सुख-अनुभूति वाले के · ब्रूते हि “अनन्वागतम्” इति अपि श्रुतिः · श्रुति “अनन्वागत” (पीछे लगा नहीं) कहती है।
अर्थ: इन्द्रिय-रहित, चेत-रहित, विकार-रहित, आकृति-रहित, मेरे लिए, जो अखंड-सुख-अनुभूति वाला हूँ, पुण्य-पाप कहाँ? श्रुति भी कहती है, “अनन्वागत” (पीछे नहीं लगता)।
भावार्थ: शिष्य श्रुति-शब्द “अनन्वागत” (बृहदारण्यक) को संदर्भ देता है, आत्मा पर पुण्य-पाप “नहीं लगते।”
क्यों? क्योंकि पुण्य-पाप तभी “लगते” हैं जब कोई “करे।” और करना तभी होता है जब इन्द्रियाँ-चेत-विकार-आकृति हो। मेरे पास इनमें से कुछ नहीं। तो पुण्य-पाप किस पर बैठें? यह कर्म-शृंखला के बंधन से असली मुक्ति है।
504 · परछाई को छुआ गर्म-ठंडा-सुष्ठु-दुष्ठु, पुरुष को नहीं छूता
छायया स्पृष्टमुष्णं वा शीतं वा सुष्ठु दुःष्ठु वा ।
न स्पृशत्येव यत्किंचित्पुरुषं तद्विलक्षणम् ॥ 504 ॥
chāyayā spṛṣṭam uṣṇaṁ vā śītaṁ vā suṣṭhu duḥṣṭhu vā · na spṛśaty eva yat-kiṁcit puruṣaṁ tad-vilakṣaṇam
शब्दार्थ: छायया स्पृष्टम् उष्णं वा शीतं वा · परछाई को छुआ गर्म या ठंडा · सुष्ठु दुःष्ठु वा · अच्छा या बुरा · न स्पृशति एव यत्-किंचित् · कुछ भी नहीं छूता · पुरुषं तद्-विलक्षणम् · उस [परछाई से] विलक्षण पुरुष को।
अर्थ: परछाई को छुई हुई गर्मी या ठंडी, अच्छाई या बुराई, कुछ भी, उस [परछाई से] विलक्षण पुरुष को नहीं छूती।
भावार्थ: शिष्य एक छोटी पर बहुत बारीक उपमा देता है। एक आदमी की परछाई पर सूरज पड़े, परछाई गर्म हो जाए?
परछाई को कुछ “होता ही नहीं”, वह तो छाया भर है। और अगर परछाई पर किसी ने कीचड़ डाला, क्या आदमी मैला होंगे? नहीं। शरीर “परछाई-जैसा” है। उस पर जो भी पड़े, सुख, दुख, अपमान, सम्मान, असली “मैं” (जो परछाई से विलक्षण है) उसे नहीं छूता।
505 · साक्षी पर साक्ष्य-धर्म नहीं। घर-धर्म दीये पर नहीं
न साक्षिणं साक्ष्यधर्माः संस्पृशन्ति विलक्षणम् ।
अविकारमुदासीनं गृहधर्माः प्रदीपवत् ॥ 505 ॥
na sākṣiṇaṁ sākṣya-dharmāḥ saṁspṛśanti vilakṣaṇam · avikāram udāsīnaṁ gṛha-dharmāḥ pradīpa-vat
शब्दार्थ: न साक्षिणं साक्ष्य-धर्माः · साक्षी को साक्ष्य-धर्म · संस्पृशन्ति विलक्षणम् · नहीं छूते, विलक्षण को · अविकारम् उदासीनं · अविकार, उदासीन · गृह-धर्माः प्रदीप-वत् · घर-धर्म दीये की तरह।
अर्थ: साक्षी को साक्ष्य-धर्म नहीं छूते, वह विलक्षण, अविकार, उदासीन है। जैसे घर के धर्म दीये को नहीं छूते।
भावार्थ: शिष्य फिर एक प्यारी रोज़ की उपमा देता है, एक कमरे में दीया जलता है।
उस दीये की रोशनी में लोग खाते-पीते हैं, हँसते-लड़ते हैं, सब करते हैं। पर क्या उन सब “धर्मों” (कामों) का दीये पर कोई असर? कोई नहीं। दीया बस जलता रहता है। साक्षी ऐसा ही दीया है। उसकी “रोशनी” में सब-कुछ होता है, पर कोई धर्म उसे नहीं छूता।
506 · रवि-कर्म-साक्षी, अग्नि-दाह-नियामक, रस्सी-आरोपित-संग, मेरा कूटस्थ चिद-आत्मा
रवेर्यथा कर्मणि साक्षिभावो वन्हेर्यथा दाहनियामकत्वम् ।
रज्जोर्यथारोपितवस्तुसङ्गः तथैव कूटस्थचिदात्मनो मे ॥ 506 ॥
raver yathā karmaṇi sākṣi-bhāvo vanher yathā dāha-niyāmakatvam · rajjor yathāropita-vastu-saṅgaḥ tathaiva kūṭa-stha-cidātmano me
शब्दार्थ: रवेः यथा कर्मणि साक्षि-भावः · सूर्य का जैसे कर्म में साक्षी-भाव · वन्हेः यथा दाह-नियामकत्वम् · आग का जैसे दाह-नियामकत्व · रज्जोः यथा आरोपित-वस्तु-सङ्गः · रस्सी का जैसे आरोपित वस्तु से संग · तथा एव कूट-स्थ-चिद्-आत्मनः मे · वैसे ही मेरे कूट-स्थ-चिद्-आत्मा का।
अर्थ: जैसे सूर्य का कर्म में साक्षी-भाव, जैसे आग का दाह-नियामकत्व, जैसे रस्सी का आरोपित वस्तु (साँप) से संग, वैसे ही मेरे कूट-स्थ-चिद्-आत्मा का [संग]।
भावार्थ: शिष्य तीन उपमाएँ देता है, एक के बाद एक। हर एक एक खास तरह का “अ-संग” बताती है।
सूर्य रोज़ की सब चीज़ें “देखता” है, पर उनमें “कर्ता” नहीं। आग जलाती है, पर वह “जला रहा है” नहीं कहती; यह उसका स्वभाव-नियम है। और रस्सी पर साँप “दिखता” है, पर रस्सी साँप से नहीं जुड़ी, वह तो रस्सी ही है। मेरी आत्मा का “संग” भी इन तीनों जैसा है, दिखता है, पर असली नहीं।
507 · कर्ता-कारयिता-भोक्ता-भोजयिता-द्रष्टा-दर्शयिता, कुछ नहीं; मैं स्वयं-ज्योति, अनुपम
कर्तापि वा कारयितापि नाहं भोक्तापि वा भोजयितापि नाहम् ।
द्रष्टापि वा दर्शयितापि नाहं सोऽहं स्वयंज्योतिरनीदृगात्मा ॥ 507 ॥
kartāpi vā kārayitāpi nāhaṁ bhoktāpi vā bhojayitāpi nāham · draṣṭāpi vā darśayitāpi nāhaṁ so’haṁ svayaṁ-jyotir anīdṛg-ātmā
शब्दार्थ: कर्ता अपि वा कारयिता अपि न अहम् · न कर्ता, न करवाने वाला · भोक्ता अपि वा भोजयिता अपि न अहम् · न भोक्ता, न भोग कराने वाला · द्रष्टा अपि वा दर्शयिता अपि न अहम् · न द्रष्टा, न दिखाने वाला · सः अहं स्वयं-ज्योतिः अनीदृग्-आत्मा · वही मैं, स्वयं-ज्योति, अनुपम-आत्मा।
अर्थ: न मैं कर्ता हूँ, न करवाने वाला; न भोक्ता, न भोग कराने वाला; न द्रष्टा, न दिखाने वाला। वही मैं, स्वयं-ज्योति, अनुपम-आत्मा।
भावार्थ: शिष्य छह नकार देता है, तीन जोड़ियों में। हर जोड़ी: “करने वाला” और “करवाने वाला।”
आम तौर पर हम सोचते हैं, “मैं कर्ता नहीं, पर कर्म तो किसी से तो करवाता हूँ।” शिष्य कहता है, दोनों नहीं। कर्म-संबंध की हर परत को काट देता है। और जो बचा, “स्वयं-ज्योति, अनुपम-आत्मा।” यानी अपनी रोशनी ख़ुद, और किसी के जैसा नहीं।
508 · उपाधि चली, परछाई हिली, मूढ़ “मैं कर्ता, मैं भोक्ता” कहते
चलत्युपाधौ प्रतिबिम्बलौल्यम् अउपाधिकं मूढधियो नयन्ति ।
स्वबिम्बभूतं रविवद्विनिष्क्रियं कर्तास्मि भोक्तास्मि हतोऽस्मि हेति ॥ 508 ॥
calaty upādhau prati-bimba-laulyam aupādhikaṁ mūḍha-dhiyo nayanti · sva-bimba-bhūtaṁ ravi-vad viniṣkriyaṁ kartāsmi bhoktāsmi hato’smi heti
शब्दार्थ: चलति उपाधौ · उपाधि के चलने पर · प्रति-बिम्ब-लौल्यम् औपाधिकं · प्रतिबिंब की चंचलता उपाधि की · मूढ-धियः नयन्ति · मूढ़-बुद्धि लोग ले जाते (मान लेते) · स्व-बिम्ब-भूतं रवि-वद् विनिष्क्रियं · ख़ुद-बिम्ब, सूर्य की तरह निष्क्रिय · “कर्ता अस्मि, भोक्ता अस्मि, हतः अस्मि”, हे इति · “मैं कर्ता, मैं भोक्ता, मैं मारा गया”, हाय।
अर्थ: उपाधि चलने पर, प्रतिबिंब की चंचलता उपाधि की होती है। पर मूढ़-बुद्धि लोग, उसे, जो ख़ुद-बिम्ब, सूर्य की तरह निष्क्रिय है, पर डाल देते हैं: “मैं कर्ता, मैं भोक्ता, मैं मारा गया, हाय!”
भावार्थ: शिष्य एक प्यारी, ज़मीनी उपमा देता है, पानी में सूरज की परछाई।
पानी हिले, परछाई हिले। पानी देखने वाला सोच सकता है, “सूरज हिल रहा है।” पर सूरज? वह वहीं स्थिर है, हज़ारों मील दूर। मूढ़-बुद्धि लोग, उपाधि की हलचल को आत्मा पर डाल देते हैं, “मैं कर रहा हूँ, मैं भोग रहा हूँ, मुझे चोट लगी।” और “हे” शब्द एक हाय भरी आवाज़ है, मानो दर्द हो रहा हैं।
509 · पानी हो या ज़मीन, जड़ देह लुढ़के; मैं नहीं लिपटता
जले वापि स्थले वापि लुठत्वेष जडात्मकः ।
नाहं विलिप्ये तद्धर्मैर्घटधर्मैर्नभो यथा ॥ 509 ॥
jale vāpi sthale vāpi luṭhatv eṣa jaḍātmakaḥ · nāhaṁ vilipye tad-dharmair ghaṭa-dharmair nabho yathā
शब्दार्थ: जले वा अपि स्थले वा अपि · पानी में हो या ज़मीन पर · लुठतु एषः जड-आत्मकः · यह जड़ देह लुढ़के · न अहं विलिप्ये तद्-धर्मैः · मैं उसके धर्मों से नहीं लिप्त होता · घट-धर्मैः नभः यथा · जैसे घड़े के धर्मों से आकाश नहीं।
अर्थ: यह जड़-आत्मक देह पानी में हो या ज़मीन पर, लुढ़के। मैं उसके धर्मों से लिप्त नहीं होता, जैसे घड़े के धर्मों से आकाश नहीं।
भावार्थ: शिष्य फिर आकाश-घड़े वाली पुरानी उपमा लाता है, पर यहाँ नई सीधाई के साथ।
देह को “जड़” कहता है, एक जड़ चीज़, जैसे एक पत्थर। वह जहाँ भी लुढ़के, पानी, ज़मीन, बिस्तर, कुर्सी, मुझे क्या? घड़ा फूटे या पूरा रहे, आकाश को कोई फ़र्क नहीं। यह बहुत आज़ाद कर देने वाली बात है। हमारी रोज़ की चिंताएँ देह के इर्द-गिर्द घूमती हैं, “मैं ठीक से बैठा हूँ?” “मेरा शरीर कैसा है?” शिष्य कहता है, कोई जड़ है, उसे क्या परवाह।
510 · कर्ता-भोक्ता-खल-मत्त-जड़-बद्ध-मुक्त, बुद्धि के विकल्प, मुझ में नहीं
कर्तृत्वभोक्तृत्वखलत्वमत्तता जडत्वबद्धत्वविमुक्ततादयः ।
बुद्धेर्विकल्पा न तु सन्ति वस्तुतः स्वस्मिन् परे ब्रह्मणि केवलेऽद्वये ॥ 510 ॥
kartṛtva-bhoktṛtva-khalatva-mattatā jaḍatva-baddhatva-vimuktatādayaḥ · buddher vikalpā na tu santi vastutaḥ svasmin pare brahmaṇi kevale’dvaye
शब्दार्थ: कर्तृत्व-भोक्तृत्व-खलत्व-मत्तता · कर्ता-भाव, भोक्ता-भाव, खल-भाव, मतवाला-भाव · जडत्व-बद्धत्व-विमुक्तता-आदयः · जड़ता, बद्धता, विमुक्तता आदि · बुद्धेः विकल्पाः · बुद्धि के विकल्प · न तु सन्ति वस्तुतः · वस्तुतः नहीं हैं · स्वस्मिन् परे ब्रह्मणि केवले अद्वये · अपने में, परम-ब्रह्म में, केवल-अद्वय में।
अर्थ: कर्ता-भाव, भोक्ता-भाव, खल-भाव, मतवाला-भाव, जड़ता, बद्धता, विमुक्तता, ये सब बुद्धि के विकल्प हैं; वस्तुतः अपने केवल-अद्वय परम-ब्रह्म में नहीं हैं।
भावार्थ: शिष्य एक बहुत ज़रूरी बात कहता है, “बद्धता” और “मुक्तता” भी “विकल्प” हैं।
हम सोचते हैं, “मैं बद्ध हूँ, मुझे मुक्त होना है।” पर असली में दोनों ही “बुद्धि के विकल्प” हैं, आत्मा में नहीं। आत्मा तो शुरू से ही मुक्त-असंग। तो “बंधन-मोक्ष” का पूरा खेल बुद्धि-स्तर पर ही है। यह वेदान्त की सबसे ऊँची, और सबसे चौंकाने वाली बात है।
511 · प्रकृति के दश-शत-सहस्र विकार, असंग चित् पर क्या; बादल आकाश को नहीं छूते
सन्तु विकाराः प्रकृतेर्दशधा शतधा सहस्रधा वापि ।
किं मेऽसङ्गचितस्तैर्न घनः क्वचिदम्बरं स्पृशति ॥ 511 ॥
santu vikārāḥ prakṛter daśadhā śatadhā sahasradhā vāpi · kiṁ me’saṅga-citas tair na ghanaḥ kvacid ambaraṁ spṛśati
शब्दार्थ: सन्तु विकाराः प्रकृतेः · प्रकृति के विकार हों · दशधा शतधा सहस्रधा वा अपि · दस-तरह, सौ-तरह, हज़ार-तरह · किं मे असङ्ग-चितः तैः · मुझ असंग-चित् को उनसे क्या · न घनः क्वचिद् अम्बरं स्पृशति · बादल कभी आकाश को नहीं छूता।
अर्थ: प्रकृति के विकार हों, दस-तरह, सौ-तरह, हज़ार-तरह। मुझ असंग-चित् को उनसे क्या? बादल कभी आकाश को नहीं छूता।
भावार्थ: शिष्य एक ज़ोरदार बात कहता है, “हों जितने भी हों।” प्रकृति के विकार हज़ारों हों, लाखों हों, मेरा क्या।
क्योंकि मैं “असंग-चित्” हूँ। बादल आकाश के “नीचे” तैरते हैं, पर कभी आकाश को नहीं “छूते।” बादल और आकाश एक तल पर हैं ही नहीं। आप (असंग-चित्) और प्रकृति-विकार भी एक तल पर नहीं। तो “छूना” की बात कहाँ।
512 · अव्यक्त से स्थूल तक, आभास-मात्र; ब्रह्म-अद्वैत वही मैं
अव्यक्तादिस्थूलपर्यन्तमेतत् विश्व यत्राभासमात्रं प्रतीतम् ।
व्योमप्रख्यं सूक्ष्ममाद्यन्तहीनं ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमस्मि ॥ 512 ॥
avyaktādi-sthūla-paryantam etat viśva yatrābhāsa-mātraṁ pratītam · vyoma-prakhyaṁ sūkṣmam ādy-anta-hīnaṁ brahmādvaitaṁ yat tad evāham asmi
शब्दार्थ: अव्यक्त-आदि-स्थूल-पर्यन्तम् एतद् विश्वम् · अव्यक्त से ले कर स्थूल तक यह विश्व · यत्र आभास-मात्रं प्रतीतम् · जिसमें आभास-मात्र दिखता · व्योम-प्रख्यं सूक्ष्मम् आदि-अन्त-हीनं · आकाश-जैसा, सूक्ष्म, आदि-अंत-रहित · ब्रह्म-अद्वैतं यद् तद् एव अहम् अस्मि · ब्रह्म-अद्वैत जो, वही मैं हूँ।
अर्थ: अव्यक्त (प्रकृति) से ले कर स्थूल (सबसे मोटा) तक, यह विश्व जिसमें आभास-मात्र दिखता है; आकाश-जैसा, सूक्ष्म, आदि-अंत-रहित, वही ब्रह्म-अद्वैत मैं हूँ।
भावार्थ: शिष्य एक नया refrain शुरू करता है, “ब्रह्म-अद्वैतं यद् तद् एव अहम् अस्मि।” यह अगले दो श्लोकों में भी लौटेगा।
और एक बेहद महत्वपूर्ण कथन, “विश्व जिसमें आभास-मात्र दिखता है।” यानी विश्व ब्रह्म पर “आभास” की तरह दिखता है, उसमें असली कुछ नहीं। बाक़ी सब वही ब्रह्म।
513 · सर्वाधार, सर्व-वस्तु-प्रकाश, सर्वाकार, सर्वग, सर्व-शून्य, वही मैं
सर्वाधारं सर्ववस्तुप्रकाशं सर्वाकारं सर्वगं सर्वशून्यम् ।
नित्यं शुद्धं निश्चलं निर्विकल्पं ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमस्मि ॥ 513 ॥
sarvādhāraṁ sarva-vastu-prakāśaṁ sarvākāraṁ sarva-gaṁ sarva-śūnyam · nityaṁ śuddhaṁ niścalaṁ nirvikalpaṁ brahmādvaitaṁ yat tad evāham asmi
शब्दार्थ: सर्व-आधारं सर्व-वस्तु-प्रकाशं · सब का आधार, सब वस्तुओं का प्रकाश · सर्व-आकारं सर्व-गं सर्व-शून्यम् · सर्वाकार, सर्वग, सर्व-शून्य · नित्यं शुद्धं निश्चलं निर्विकल्पं · नित्य, शुद्ध, निश्चल, निर्विकल्प · ब्रह्म-अद्वैतं यद् तद् एव अहम् अस्मि · ब्रह्म-अद्वैत जो, वही मैं।
अर्थ: सब का आधार, सब वस्तुओं का प्रकाश; सर्वाकार, सर्वग, सर्व-शून्य; नित्य, शुद्ध, निश्चल, निर्विकल्प, वही ब्रह्म-अद्वैत मैं हूँ।
भावार्थ: शिष्य एक प्यारा विरोधाभास देता है, “सर्वाकार” (सब-रूप वाला) और “सर्व-शून्य” (सब-शून्य) एक साथ।
हर रूप में दिखता है, पर ख़ुद किसी रूप का नहीं। हर जगह व्याप्त, पर किसी जगह बँधा नहीं। ये दोनों एक साथ, अद्वैत की एक ख़ास बात। और “सर्व-वस्तु-प्रकाश”, सब चीज़ों का प्रकाश। यानी हर चीज़ की दिखने की क्षमता मेरी (ब्रह्म की) रोशनी से।
514 · सब माया-विशेष से निरस्त, प्रत्यक्-रूप, प्रत्यय से अगम्य, वही मैं
यत्प्रत्यस्ताशेषमायाविशेषं प्रत्यग्रूपं प्रत्ययागम्यमानम् ।
सत्यज्ञानानन्तमानन्दरूपं ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमस्मि ॥ 514 ॥
yat pratyastāśeṣa-māyā-viśeṣaṁ pratyag-rūpaṁ pratyayāgamyamānam · satya-jñānānantam ānanda-rūpaṁ brahmādvaitaṁ yat tad evāham asmi
शब्दार्थ: यद् प्रत्यस्त-अशेष-माया-विशेषं · जिसमें सब माया-विशेष ख़ारिज · प्रत्यग्-रूपं प्रत्यय-अगम्यमानम् · प्रत्यक्-रूप, प्रत्यय (विचार) से अगम्य · सत्य-ज्ञान-अनन्तम् आनन्द-रूपं · सत्य-ज्ञान-अनंत, आनंद-रूप · ब्रह्म-अद्वैतं यद् तद् एव अहम् अस्मि · ब्रह्म-अद्वैत जो, वही मैं।
अर्थ: जिसमें सब माया-विशेष ख़ारिज है; जो प्रत्यक्-रूप (भीतर का) है, प्रत्यय (विचार) से अगम्य; सत्य-ज्ञान-अनंत-आनंद-रूप, वही ब्रह्म-अद्वैत मैं हूँ।
भावार्थ: “सत्य-ज्ञान-अनंत-आनंद”, यह तैत्तिरीय उपनिषद की प्रसिद्ध परिभाषा है। शिष्य उसे “मैं” कह कर अपनाता है।
और “प्रत्यय-अगम्य”, विचारों से नहीं पकड़ा जा सकता। यानी बैठ कर “सोच” से इसे पाने की कोशिश व्यर्थ। यह तो “प्रत्यक्-रूप”, सबसे भीतर, है, जहाँ विचार पहुँचते ही नहीं।
515 · निष्क्रिय, अविकार, निष्कल, निराकृति; निर्विकल्प, नित्य, निरालंब, निर्द्वय
निष्क्रियोऽस्म्यविकारोऽस्मि निष्कलोऽस्मि निराकृतिः ।
निर्विकल्पोऽस्मि नित्योऽस्मि निरालम्बोऽस्मि निर्द्वयः ॥ 515 ॥
niṣkriyo’smy avikāro’smi niṣkalo’smi nirākṛtiḥ · nirvikalpo’smi nityo’smi nirālambo’smi nirdvayaḥ
शब्दार्थ: निष्क्रियः अस्मि अविकारः अस्मि निष्कलः अस्मि निराकृतिः · निष्क्रिय, अविकार, निष्कल, निराकृति · निर्विकल्पः अस्मि नित्यः अस्मि निरालम्बः अस्मि निर्द्वयः · निर्विकल्प, नित्य, निरालंब, निर्द्वय।
अर्थ: निष्क्रिय हूँ, अविकार हूँ, निष्कल हूँ, निराकृति हूँ; निर्विकल्प हूँ, नित्य हूँ, निरालंब हूँ, निर्द्वय हूँ।
भावार्थ: आठ “निर्”, एक के बाद एक। शिष्य एक बार फिर मंत्र-शैली में कहता है।
हर “निर्” एक चीज़ “नहीं है” को बताता है, पर मिल कर, एक खुली-खुली आत्मा का चित्र खींचते हैं। और सबसे प्यारा है “निरालंब”, किसी का सहारा नहीं चाहिए। यह आत्म-निर्भरता की एक बहुत ऊँची झलक है।
516 · सर्वात्मक, सर्व, सर्वातीत, अद्वय, केवल अखंड बोध, आनंद निरंतर
सर्वात्मकोऽहं सर्वोऽहं सर्वातीतोऽहमद्वयः ।
केवलाक्षण्डबोधोऽहमानन्दोऽहं निरन्तरः ॥ 516 ॥
sarvātmako’haṁ sarvo’haṁ sarvātīto’ham advayaḥ · kevalākhaṇḍa-bodho’ham ānando’haṁ nirantaraḥ
शब्दार्थ: सर्व-आत्मकः अहं सर्वः अहं · सर्वात्मक, सर्व · सर्व-अतीतः अहम् अद्वयः · सर्वातीत, अद्वय · केवल-अखण्ड-बोधः अहम् · केवल-अखंड-बोध · आनन्दः अहं निरन्तरः · आनंद, निरंतर।
अर्थ: सर्वात्मक हूँ, सर्व हूँ, सर्वातीत हूँ, अद्वय हूँ; केवल-अखंड-बोध हूँ, निरंतर आनंद हूँ।
भावार्थ: शिष्य की लंबी “अहम्”-घोषणाओं की यह आख़िरी श्रृंखला है। तीन “सर्व” साथ, सर्वात्मक, सर्व, सर्वातीत।
“सर्वात्मक”, सब का आत्मा। “सर्व”, सब-कुछ। “सर्वातीत”, सब के पार। तीनों एक साथ। हर चीज़ का अंदरूनी कोर, साथ ही पूरा बाहरी फैलाव, साथ ही उन सब से परे। यह “मैं” वही, पुराने छोटे “मैं” से असीम-असीम बड़ा।
517 · आपकी कृपा से स्वाराज्य-साम्राज्य मिला, श्री गुरु को नमन
स्वाराज्यसाम्राज्यविभूतिरेषा भवत्कृपाश्रीमहिमप्रसादात् ।
प्राप्ता मया श्रीगुरवे महात्मने नमो नमस्तेऽस्तु पुनर्नमोऽस्तु ॥ 517 ॥
svārājya-sāmrājya-vibhūtir eṣā bhavat-kṛpā-śrī-mahima-prasādāt · prāptā mayā śrī-gurave mahātmane namo namas te’stu punar namo’stu
शब्दार्थ: स्वाराज्य-साम्राज्य-विभूतिः एषा · यह स्वराज्य-साम्राज्य-विभूति · भवत्-कृपा-श्री-महिम-प्रसादात् · आपकी कृपा-श्री-महिमा-प्रसाद से · प्राप्ता मया · मुझे मिली · श्री-गुरवे महात्मने नमो नमस्ते अस्तु पुनः नमः अस्तु · श्री-गुरु महात्मा को नमन-नमन, फिर नमन।
अर्थ: यह स्वराज्य-साम्राज्य-विभूति मुझे आपकी कृपा-श्री-महिमा-प्रसाद से मिली। श्री-गुरु महात्मा को नमन-नमन, और फिर नमन।
भावार्थ: शिष्य की लंबी “अहम्” शृंखला के बाद, फिर गुरु की ओर मुड़ता है। यह बहुत प्यारा है, सबसे ऊँची आत्म-स्थापना के बाद भी, सबसे पहले नमन।
“स्वराज्य-साम्राज्य”, अपने ऊपर पूरा अधिकार, और पूरी विभूति। यह कोई बाहरी राज्य नहीं। असली राज्य। और इसका सब “क्रेडिट” गुरु को। “नमो नमस्ते अस्तु पुनः नमः अस्तु”, दो बार नमन, फिर एक बार और। कोई “धन्यवाद” काफ़ी नहीं।
518 · महा-स्वप्न में, अहंकार-व्याघ्र से सताए हुए मुझे, तूने जगा कर बचाया
महास्वप्ने मायाकृतजनिजरामृत्युगहने भ्रमन्तं क्लिश्यन्तं बहुलतरतापैरनुदिनम् ।
अहंकारव्याघ्रव्यथितमिममत्यन्तकृपया प्रबोध्य प्रस्वापात्परमवितवान्मामसि गुरो ॥ 518 ॥
mahā-svapne māyā-kṛta-jani-jarā-mṛtyu-gahane bhramantaṁ kliśyantaṁ bahula-tara-tāpair anu-dinam · ahaṁkāra-vyāghra-vyathitam imam atyanta-kṛpayā prabodhya prasvāpāt param avitavān mām asi guro
शब्दार्थ: महा-स्वप्ने माया-कृत-जनि-जरा-मृत्यु-गहने · महा-स्वप्न में, माया-कृत जन्म-जरा-मृत्यु के घने जंगल में · भ्रमन्तं क्लिश्यन्तं · भटकते, क्लेश पाते · बहुल-तर-तापैः अनुदिनम् · बहुत-सी तपनों से रोज़-रोज़ · अहंकार-व्याघ्र-व्यथितम् इमम् · इस अहंकार-बाघ से सताए को · अत्यन्त-कृपया · अत्यंत कृपा से · प्रबोध्य प्रस्वापात् · नींद से जगा कर · परम् अवितवान् माम् असि गुरो · हे गुरु, मेरी रक्षा की।
अर्थ: महा-स्वप्न में, माया-कृत जन्म-जरा-मृत्यु के घने जंगल में भटकते, बहुत-सी तपनों से रोज़-रोज़ क्लेश पाते, अहंकार-बाघ से सताए हुए, मुझे अत्यंत कृपा से नींद से जगा कर, हे गुरु, तूने मेरी रक्षा की।
भावार्थ: यह शिष्य के स्तोत्र का सबसे काव्य-भरा, सबसे भावनात्मक श्लोक है। एक पूरी तस्वीर बनती है।
“महा-स्वप्न” में जीव, माया-कृत जन्म-जरा-मृत्यु के “घने जंगल” में भटकता है। हर तरफ़ “तपनें”, दुख, बीमारी, हार, अपमान। और बीच में एक “व्याघ्र” (बाघ), “अहंकार।” बाघ रोज़ शिकार करता है, साधक के टुकड़े कर रहा है। और गुरु? कोई “उपदेश” देने नहीं आया, आया साधक को जगाने। नींद टूटी, जंगल खुल गया, बाघ ग़ायब। यह छवि एक पूरी “मुक्ति-कथा” है।
519 · नमस्ते सदा-एक को, गुरुराज, आप “विश्व-रूप” से चमकता है
नमस्तस्मै सदैकस्मै कस्मैचिन्महसे नमः ।
यदेतद्विश्वरूपेण राजते गुरुराज ते ॥ 519 ॥
namas tasmai sadaikasmai kasmaicin mahase namaḥ · yad etad viśva-rūpeṇa rājate guru-rāja te
शब्दार्थ: नमः तस्मै सदा-एकस्मै · नमन उसे, जो सदा-एक · कस्मैचित् महसे नमः · किसी अनुपम महिमा को नमन · यद् एतद् विश्व-रूपेण राजते · जो यह विश्व-रूप से चमकता · गुरु-राज ते · हे गुरु-राज, आपका।
अर्थ: उसे नमन, जो सदा-एक है; किसी अनुपम महिमा को नमन; जो यह विश्व-रूप से चमकता है, हे गुरु-राज, [यह] आपका।
भावार्थ: शिष्य के स्तोत्र का यह अंतिम श्लोक है। और सबसे रहस्यमयी।
“सदा-एक”, जो हमेशा एक है। “कस्मैचित् महसे”, किसी (अनिर्वचनीय) महिमा को। यानी जिसका नाम नहीं ले सकते, उसको नमन। और सबसे प्यारी पंक्ति, “जो यह विश्व-रूप से चमकता है, हे गुरु-राज, यह आपका।” यानी पूरा विश्व ही गुरु का रूप है। बाहर जो भी दिखता है, वह गुरु। और इस तरह, शिष्य अपने स्तोत्र को सबसे ऊँची ऊँचाई पर ख़त्म करता है, गुरु को व्यक्ति से ऊपर उठा कर, विश्व-रूप के रूप में देख कर।
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना: भाग 18, गुरु फिर बोलते हैं। “ब्रह्म-प्रत्यय-संतति” से जगत देख, सर्व अवस्थाओं में। फिर ज्ञानी की रोज़ की चाल, किसी जगह मूढ़ दिखता, किसी जगह राजा-जैसा, किसी जगह बच्चा-जैसा, किसी जगह भूत-जैसा। और एक पंक्ति: “क्व चित् मूढ़ः, विद्वान् क्व चित्।”
और एक काम जेब में रखिए: श्लोक 518, “अहंकार-व्याघ्र-व्यथितम् इमम्।” अपनी ज़िंदगी में देखिए, कौनसा “अहंकार-बाघ” आपको रोज़ सता रहा है? नाम लीजिए, “मैं ख़ास हूँ” वाला बाघ? “मैं अकेला सही हूँ” वाला? “मुझे और चाहिए” वाला? पहचान, आधी लड़ाई जीत।