विवेकचूडामणि
भाग 17 · शिष्य का स्तोत्र, “नमो नमस्ते” से “अहं ब्रह्म” तक · श्लोक 486-519
शिष्य अब रुकता नहीं। पहले गुरु को नमन, फिर एक के बाद एक “अहम्” घोषणाएँ, असंग, अनंग, अलिंग, अभंग; अकर्ता, अभोक्ता, अविकार; नारायण, नर-कान्तक, पुर-अंतक, ईश। बादल आकाश को नहीं छूते, घड़े के धर्म दीये को नहीं। और हमें विकार नहीं। अंत में फिर गुरु को, “महा-स्वप्न से जगा कर आपने हमें बचाया।”
भाग 16 में शिष्य के पहले उद्गार सुनाई दिए थे। अब वही धारा बहती चली आती है, पर एक नया रंग ले कर। पहले शिष्य अपना सिर गुरु के चरणों में झुकाता है, और कहता है, आपको नमन और फिर नमन, हे गुरुदेव, हे महात्मा। आप विमुक्त-संग हैं, सत्-पुरुषों में उत्तम हैं, नित्य-अद्वय-आनंद-रस के स्वरूप हैं, असीम हैं, और सदा अपार रहने वाले दया-समुद्र के धाम हैं। यह “नमो नमस्ते” एक का दोहराव नहीं, यह दिल का दो बार झुकना है। गुरु जो दे चुके, उसके लिए कोई एक शब्द काफ़ी नहीं पड़ता, बस यही नमन और यही वर्णन शेष रह जाता है।

486
नमो नमस्ते गुरवे महात्मने विमुक्तसङ्गाय सदुत्तमाय ।
नित्याद्वयानन्दरसस्वरूपिणे भूम्ने सदापारदयाम्बुधाम्ने ॥ 486 ॥
फिर शिष्य एक काव्य-उपमा रखता है। आपकी जिस तिरछी नज़र की घनी चाँदनी पड़ी, उसी से संसार की तपन से उपजी सारी थकान धुल गई, और क्षण-भर में हमने अखंड-वैभव-आनंद वाला अक्षय आत्म-पद पा लिया। गुरु का कटाक्ष, उनकी हल्की-सी एक दृष्टि, चाँदनी की तरह है। भव-ताप एक थकाने वाली गर्मी थी, चाँदनी पड़ी और वह तपन ठंडी हो गई। और कितनी जल्दी, क्षण में! गुरु की पूरी कृपा एक नज़र भर है, पर वह नज़र साधक के लिए सब कुछ पलट देती है। इसी कृपा से शिष्य अगली साँस में कहता है, हम धन्य हैं, हमारा करने योग्य काम पूरा हुआ, हम संसार की पकड़ से छूट गए, हम नित्य-आनंद-स्वरूप हैं, हम पूर्ण हैं, और यह सब आपकी कृपा से। पाँच “अहम्” हैं और हर एक एक स्थिति है। पर अंत में “आपकी कृपा से”, यानी यह “हमने पाया” नहीं, “आपने दिया।” विनम्रता और गौरव का यह सुंदर मेल है।
487 · 488
यत्कटाक्षशशिसान्द्रचन्द्रिका पातधूतभवतापजश्रमः ।
प्राप्तवानहमखण्डवैभवा नन्दमात्मपदमक्षयं क्षणात् ॥ 487 ॥
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं विमुक्तोऽहं भवग्रहात् ।
नित्यानन्दस्वरूपोऽहं पूर्णोऽहं त्वदनुग्रहात् ॥ 488 ॥
अब अचानक एक झरना फूट पड़ता है। शिष्य रुकता नहीं, वह एक के बाद एक अपने को ही कहता चला जाता है। हम असंग हैं, हम देह-रहित हैं, हम चिह्न-रहित हैं, हम अभंग हैं; हम प्रशांत हैं, अनंत हैं, निर्मल हैं, चिरन्तन हैं। आठ “अहम्” मानो एक मंत्र बन रहे हों, और हर शब्द हर ओर से उस पुरानी, छोटी पहचान को छील देता है। यह पहचान कहीं से थोपी हुई नहीं, यह आत्मा का अपना स्वरूप है, जो अब तक उपाधि के नीचे ढका था और अब खुल कर सामने आ रहा है। और धारा बहती ही रहती है, हम अकर्ता हैं, अभोक्ता हैं, अविकार हैं, अक्रिय हैं; हम शुद्ध-बोध-स्वरूप हैं, केवल हैं, सदाशिव हैं। यह “सदाशिव”, हमेशा का शिव, सब-कल्याण-स्वरूप, सबसे परे। शिष्य कह रहा है, हम वही हैं। यह अहंकार नहीं, यह आत्मा का असली रूप कहने की हिम्मत है।
489 · 490
असङ्गोऽहमनङ्गोऽहमलिङ्गोऽहमभङ्गुरः ।
प्रशान्तोऽहमनन्तोऽहममलोऽहं चिरन्तनः ॥ 489 ॥
अकर्ताहमभोक्ताहमविकारोऽहमक्रियः ।
शुद्धबोधस्वरूपोऽहं केवलोऽहं सदाशिवः ॥ 490 ॥
फिर एक बहुत बारीक बात आती है। हम उन सब “मैं-वालों” से अलग हैं, जिन्हें हम आम तौर पर अपना मान लेते हैं। द्रष्टा, श्रोता, वक्ता, कर्ता, भोक्ता, इन सबसे विभिन्न ही हम हैं; नित्य, निरंतर, निष्क्रिय, निःसीम, असंग, पूर्ण-बोध हमारी आत्मा है। “हम देख रहे हैं”, यह जो “हम” है, वह नहीं। “हम बोल रहे हैं”, यह “हम” भी नहीं। ये सब क्रियाएँ हैं, और इनके पीछे एक करने वाला मान लिया जाता है, पर असली “हम” इन सबसे परे का है। और शिष्य उपनिषदों की प्रसिद्ध नेति-नेति विधि उठाता है, हम “यह” नहीं, हम “वह” भी नहीं; बल्कि दोनों के अवभासक हैं, परम-शुद्ध हैं, बाहर-भीतर के भेद से शून्य, पूर्ण, ब्रह्म-अद्वितीय ही हम हैं। केवल “नहीं” पर रुकता नहीं, आगे जा कर कहता है, इन दोनों को दिखाने वाले हम ही हैं, हमारे बिना “यह” और “वह” दिखें ही नहीं।
491 · 492
द्रष्टुः श्रोतुर्वक्तुः कर्तुर्भोक्तुर्विभिन्न एवाहम् ।
नित्यनिरन्तरनिष्क्रियनिःसीमासङ्गपूर्णबोधात्मा ॥ 491 ॥
नाहमिदं नाहमदोऽप्युभयोरवभासकं परं शुद्धम् ।
बाह्याभ्यन्तरशून्यं पूर्णं ब्रह्माद्वितीयमेवाहम् ॥ 492 ॥
अब शिष्य भाषा की भी सीमा छू लेता है। हम अनुपम हैं, अनादि-तत्व हैं; “आप, हम, यह, वह”, इस कल्पना से दूर हैं; नित्य-आनंद-एक-रस, सत्य, ब्रह्म-अद्वितीय ही हम हैं। ये चार सर्वनाम ही हमारी पूरी भाषा बनाते हैं, और शिष्य कहता है, यह सब कल्पना है, हमारे असली रूप से दूर। हम इन चारों से पहले के हैं, इन सबको चलाने वाले हैं, पर इनमें से कोई नहीं। और फिर सबसे हिम्मत वाला श्लोक आता है, हर देवता का नाम ले कर “अहम्”। हम नारायण हैं, नरक-अंतक हैं, पुर-अंतक हैं, पुरुष-ईश हैं; अखंड-बोध हैं, अशेष के साक्षी हैं; निरीश्वर हैं, निरह हैं, निर्मम हैं। विष्णु, शिव, परम-पुरुष-ईश, सब। यह अहंकार नहीं, यह अद्वैत है, क्योंकि ये सब देव-रूप एक ही ब्रह्म के रूप हैं, और शिष्य उस ब्रह्म से जुड़ चुका है। साथ ही “निरीश्वर”, कोई और ऊँचा ईश्वर नहीं; और “निरह-निर्मम”, कोई “मैं-मेरा” नहीं।
493 · 494
निरुपममनादितत्त्वं त्वमहमिदमद इति कल्पनादूरम् ।
नित्यानन्दैकरसं सत्यं ब्रह्माद्वितीयमेवाहम् ॥ 493 ॥
नारायणोऽहं नरकान्तकोऽहं पुरान्तकोऽहं पुरुषोऽहमीशः ।
अखण्डबोधोऽहमशेषसाक्षी निरीश्वरोऽहं निरहं च निर्ममः ॥ 494 ॥
अब शिष्य गीता की प्रसिद्ध भाषा बोलता है। सब प्राणियों में हम ही स्थित हैं, ज्ञान-आत्मा से अंदर-बाहर का आश्रय हो कर। भोक्ता और भोग्य, दोनों स्वयं हम ही हैं, जो भी पहले “यह” के रूप में अलग दिखता था। जो खाने वाला है, वही जो खाया जा रहा है। दो-दो “मैं” नहीं, एक ही “मैं” के दो रूप; पुरानी “वह वहाँ है, हम यहाँ हैं” वाली दूरी अब बची नहीं। और फिर एक अद्भुत तस्वीर बनती है। हम अखंड-सुख के समुद्र हैं, और हम में माया-वायु के विभ्रम से अनेक प्रकार की विश्व-तरंगें उठती और विलीन होती रहती हैं। विशाल, स्थिर समुद्र, और उस पर सब-कुछ-वाली लहरें उठतीं-गिरतीं, पर समुद्र वैसा का वैसा। वायु एक भ्रम है, और लहरें भी; पर समुद्र असली। एक ही काव्य-छवि में पूरा अद्वैत समा जाता है।
495 · 496
सर्वेषु भूतेष्वहमेव संस्थितो ज्ञानात्मनान्तर्बहिराश्रयः सन् ।
भोक्ता च भोग्यं स्वयमेव सर्वं यद्यत्पृथग्दृष्टमिदन्तया पुरा ॥ 495 ॥
मय्यखण्डसुखाम्भोधौ बहुधा विश्ववीचयः ।
उत्पद्यन्ते विलीयन्ते मायामारुतविभ्रमात् ॥ 496 ॥
फिर काल की एक प्यारी उपमा आती है। स्थूल आदि सब भाव हम में भ्रम से कल्पित हैं, लोगों के आरोपित स्फुरण से; जैसे निष्कल और निर्विकल्प काल में कल्प, वर्ष, अयन, ऋतु आदि कल्पित हैं। असली काल का कोई बँटवारा नहीं, पर हम उसमें कल्प, वर्ष, छह-महीने के अयन, ऋतु, महीने, दिन, सब बाँट देते हैं, अपनी सुविधा के लिए। उसी तरह स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीर के बँटवारे भी असल आत्मा में नहीं हैं। और इस पर एक तीखी उपमा, मरीचिका का पानी। आरोपित अपने आश्रय को कभी दूषित नहीं करता, चाहे अति-दोष से भरे मूढ़ कुछ भी कहें; मरीचिका के पानी का बड़ा-से-बड़ा प्रवाह भी ऊसर भूमि को नहीं भिगोता। मरीचिका में कितना भी पानी दिखे, ज़मीन गीली नहीं होती, क्योंकि वह पानी असली नहीं। उसी तरह आत्मा पर जो भी विकार आरोपित दिखें, सुख, दुख, क्रोध, काम, वे उसे गीला नहीं करते।
497 · 498
स्थुलादिभावा मयि कल्पिता भ्रमाद् आरोपितानुस्फुरणेन लोकैः ।
काले यथा कल्पकवत्सरायणर्त्वादयो निष्कलनिर्विकल्पे ॥ 497 ॥
आरोपितं नाश्रयदूषकं भवेत् कदापि मूढैरतिदोषदूषितैः ।
नार्द्रिकरोत्यूषरभूमिभागं मरीचिकावारि महाप्रवाहः ॥ 498 ॥
अब चार बड़ी, ज़मीनी उपमाएँ एक साथ आती हैं। आकाश की तरह हम लेप से दूर रहने वाले हैं; सूर्य की तरह दिखने वाली हर वस्तु से विलक्षण हैं; पर्वत की तरह नित्य-निश्चल हैं; समुद्र की तरह पार-रहित हैं। आकाश, सूर्य, पर्वत, समुद्र, हर उपमा एक गुण के लिए, असंगता, विलक्षणता, अचलता, असीमता। ये चारों मिल कर एक आत्मा-चित्र खींचते हैं, विशाल, मुक्त, स्थिर, अनंत; और ये चारों हम रोज़ देखते हैं, बस अपनी आँख से नहीं देखते। फिर एक छोटी पर बहुत सूक्ष्म कसौटी। जैसे बादल का आकाश से कोई सच्चा संबंध नहीं, वैसे हमारा देह से नहीं; तो उसके धर्म, जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति, हमारे कहाँ से? बादल आकाश में दिखता है, पर आकाश का बादल नहीं, और बादल आकाश को बदलता भी नहीं। देह “हम में” दिखता है, पर हमारा हिस्सा नहीं; देह जागे या सोए, हम वही रहते हैं।
499 · 500
आकाशवल्लेपविदूरगोऽहं आदित्यवद्भास्यविलक्षणोऽहम् ।
अहार्यवन्नित्यविनिश्चलोऽहं अम्भोधिवत्पारविवर्जितोऽहम् ॥ 499 ॥
न मे देहेन संबन्धो मेघेनेव विहायसः ।
अतः कुतो मे तद्धर्मा जाक्रत्स्वप्नसुषुप्तयः ॥ 500 ॥
फिर एक प्यारा शब्द आता है, कुल-पर्वत, हिमालय जैसा कोई महान पर्वत। उपाधि आती है, वही जाती है; वही कर्म करती और भोगती है; वही बूढ़ी होती और मरती है। हम तो सदा कुल-पर्वत की तरह निश्चल खड़े हैं। पर्वत के पास सब आते-जाते हैं, मेघ, नदियाँ, यात्री, ऋतुएँ, पर पर्वत वहीं, हज़ारों साल से। “हम जवान हैं”, “हम बूढ़े हैं”, “हमने यह किया”, यह सब उपाधि का आता-जाता खेल है। और इसी से शिष्य एक प्यारा सवाल पूछता है, आकाश कुछ करता है क्या? हमारी न प्रवृत्ति है, न निवृत्ति, क्योंकि हम सदा एक-रूप और अंश-रहित हैं; जो एक-आत्मक, घना, निरंतर और आकाश की तरह पूर्ण हो, वह भला चेष्टा क्यों करे? आकाश में सब हो रहा है, पर वह ख़ुद कुछ नहीं कर रहा। “हम कर रहे हैं” वाला सब उपाधि-स्तर पर है, हमारा कुछ नहीं।
501 · 502
उपाधिरायाति स एव गच्छति स एव कर्माणि करोति भुङ्क्ते ।
स एव जीर्यन्म्रियते सदाहं कुलाद्रिवन्निश्चल एव संस्थितः ॥ 501 ॥
न मे प्रवृत्तिर्न च मे निवृत्तिः सदैकरूपस्य निरंशकस्य ।
एकात्मको यो निविडो निरन्तरो व्योमेव पूर्णः स कथं नु चेष्टते ॥ 502 ॥
अब शिष्य श्रुति की गवाही लाता है। इंद्रिय-रहित, चेत-रहित, विकार-रहित, आकृति-रहित हम, जो अखंड-सुख की अनुभूति वाले हैं, हम पर पुण्य-पाप कहाँ से बैठें? श्रुति भी तो कहती है, “अनन्वागत”, पीछे लगता नहीं। पुण्य-पाप तभी लगते हैं जब कोई करे, और करना तभी होता है जब इंद्रियाँ, चेत, विकार और आकृति हों; हमारे पास इनमें से कुछ नहीं। और इसे समझाने को एक बारीक उपमा, परछाई। परछाई को छुई हुई गर्मी हो या ठंडक, अच्छाई हो या बुराई, कुछ भी, उस परछाई से विलक्षण पुरुष को नहीं छूती। आदमी की परछाई पर सूरज पड़े, परछाई गर्म नहीं होती; उस पर कोई कीचड़ डाले, आदमी मैला नहीं होता। शरीर परछाई-जैसा है, उस पर जो भी पड़े, सुख, दुख, अपमान, सम्मान, असली “हम” उसे नहीं छूता। ठीक वैसे ही, साक्षी को साक्ष्य के धर्म नहीं छूते, वह विलक्षण, अविकार, उदासीन है, जैसे घर के सब काम दीये को नहीं छूते। दीये की रोशनी में लोग खाते-पीते, हँसते-लड़ते हैं, पर दीया बस जलता रहता है।
503 · 504 · 505
पुण्यानि पापानि निरिन्द्रियस्य निश्चेतसो निर्विकृतेर्निराकृतेः ।
कुतो ममाखण्डसुखानुभूतेः ब्रूते ह्यनन्वागतमित्यपि श्रुतिः ॥ 503 ॥
छायया स्पृष्टमुष्णं वा शीतं वा सुष्ठु दुःष्ठु वा ।
न स्पृशत्येव यत्किंचित्पुरुषं तद्विलक्षणम् ॥ 504 ॥
न साक्षिणं साक्ष्यधर्माः संस्पृशन्ति विलक्षणम् ।
अविकारमुदासीनं गृहधर्माः प्रदीपवत् ॥ 505 ॥
अब तीन उपमाएँ एक के बाद एक आती हैं, हर एक एक खास तरह का अ-संग बताती है। जैसे सूर्य का कर्म में बस साक्षी-भाव होता है, जैसे आग का दाह-नियामकत्व, जैसे रस्सी का उस पर आरोपित वस्तु से संग, वैसे ही हमारे कूटस्थ चिद-आत्मा का संग है। सूर्य रोज़ की सब चीज़ें देखता है, पर उनमें कर्ता नहीं; आग जलाती है, पर “हम जला रहे हैं” नहीं कहती, यह उसका स्वभाव-नियम है; रस्सी पर साँप दिखता है, पर रस्सी साँप से जुड़ी नहीं, वह तो रस्सी ही है। फिर शिष्य छह नकार देता है, तीन जोड़ियों में। न हम कर्ता हैं, न करवाने वाले; न भोक्ता, न भोग कराने वाले; न द्रष्टा, न दिखाने वाले; वही हम हैं, स्वयं-ज्योति, अनुपम-आत्मा। कर्म-संबंध की हर परत कट जाती है, और जो बचता है वह अपनी रोशनी ख़ुद है, किसी और के जैसा नहीं।
506 · 507
रवेर्यथा कर्मणि साक्षिभावो वन्हेर्यथा दाहनियामकत्वम् ।
रज्जोर्यथारोपितवस्तुसङ्गः तथैव कूटस्थचिदात्मनो मे ॥ 506 ॥
कर्तापि वा कारयितापि नाहं भोक्तापि वा भोजयितापि नाहम् ।
द्रष्टापि वा दर्शयितापि नाहं सोऽहं स्वयंज्योतिरनीदृगात्मा ॥ 507 ॥
अब पानी में सूरज की परछाई वाली एक ज़मीनी उपमा आती है। उपाधि के हिलने पर प्रतिबिंब की चंचलता उपाधि की होती है, पर मूढ़-बुद्धि लोग उसे, जो ख़ुद मूल-बिम्ब और सूर्य की तरह निष्क्रिय है, उस पर डाल देते हैं, “हम कर्ता हैं, हम भोक्ता हैं, हाय, हम मारे गए।” पानी हिले तो परछाई हिले, और देखने वाला सोच सकता है, सूरज हिल रहा है; पर सूरज तो हज़ारों मील दूर वहीं स्थिर है। वही “हाय” भरी आवाज़, मानो दर्द हो रहा हो, उपाधि की हलचल को आत्मा पर डाल देती है। और इसी पर एक और सीधा वाक्य, यह जड़ देह पानी में लुढ़के या ज़मीन पर, हम उसके धर्मों से नहीं लिपटते, जैसे घड़े के धर्मों से आकाश नहीं लिपटता। देह एक जड़ चीज़ है, पत्थर की तरह; वह जहाँ भी लुढ़के, हमें क्या? घड़ा फूटे या पूरा रहे, आकाश को कोई फ़र्क नहीं।
508 · 509
चलत्युपाधौ प्रतिबिम्बलौल्यम् अउपाधिकं मूढधियो नयन्ति ।
स्वबिम्बभूतं रविवद्विनिष्क्रियं कर्तास्मि भोक्तास्मि हतोऽस्मि हेति ॥ 508 ॥
जले वापि स्थले वापि लुठत्वेष जडात्मकः ।
नाहं विलिप्ये तद्धर्मैर्घटधर्मैर्नभो यथा ॥ 509 ॥
अब एक बहुत ज़रूरी, और चौंका देने वाली बात आती है। कर्ता-भाव, भोक्ता-भाव, खल-भाव, मतवाला-भाव, जड़ता, बद्धता, विमुक्तता, ये सब बुद्धि के विकल्प हैं; अपने केवल-अद्वय परम-ब्रह्म में वस्तुतः ये हैं ही नहीं। हम सोचते हैं, “हम बद्ध हैं, हमें मुक्त होना है”, पर असल में बंधन और मुक्ति, दोनों ही बुद्धि के विकल्प हैं, आत्मा में नहीं; आत्मा तो शुरू से ही मुक्त और असंग है। और इसी टेक पर शिष्य ज़ोर से कहता है, प्रकृति के विकार हों, दस-तरह, सौ-तरह, हज़ार-तरह, हम असंग-चित् को उनसे क्या? बादल कभी आकाश को नहीं छूता। बादल आकाश के नीचे तैरते हैं, पर उसे छूते नहीं; बादल और आकाश एक ही तल पर हैं ही नहीं। असंग-चित् और प्रकृति-विकार भी एक तल पर नहीं, तो छूने की बात कहाँ?
510 · 511
कर्तृत्वभोक्तृत्वखलत्वमत्तता जडत्वबद्धत्वविमुक्ततादयः ।
बुद्धेर्विकल्पा न तु सन्ति वस्तुतः स्वस्मिन् परे ब्रह्मणि केवलेऽद्वये ॥ 510 ॥
सन्तु विकाराः प्रकृतेर्दशधा शतधा सहस्रधा वापि ।
किं मेऽसङ्गचितस्तैर्न घनः क्वचिदम्बरं स्पृशति ॥ 511 ॥
अब शिष्य एक नई टेक उठाता है, जो अगले तीन श्लोकों में बार-बार लौटती है, “वही ब्रह्म-अद्वैत हम हैं।” अव्यक्त से ले कर स्थूल तक यह पूरा विश्व, जिसमें केवल आभास-मात्र दिखता है, और जो आकाश-जैसा, सूक्ष्म, आदि-अंत-रहित है, वही ब्रह्म-अद्वैत हम हैं। विश्व ब्रह्म पर आभास की तरह दिखता है, उसमें असली कुछ नहीं, बाक़ी सब वही ब्रह्म। फिर एक प्यारा विरोधाभास आता है, जो सब का आधार है, सब वस्तुओं का प्रकाश है, सर्वाकार है, सर्वग है, और सर्व-शून्य भी है; नित्य, शुद्ध, निश्चल, निर्विकल्प, वही ब्रह्म-अद्वैत हम हैं। हर रूप में दिखता है, पर ख़ुद किसी रूप का नहीं; हर जगह व्याप्त, पर किसी जगह बँधा नहीं। और जिसमें सब माया-विशेष ख़ारिज हैं, जो भीतर का प्रत्यक्-रूप है, विचार से अगम्य, सत्य-ज्ञान-अनंत-आनंद-रूप, वही ब्रह्म-अद्वैत हम हैं। बैठ कर सोच से इसे पाने की कोशिश व्यर्थ है, यह तो सबसे भीतर है, जहाँ विचार पहुँचते ही नहीं।
512 · 513 · 514
अव्यक्तादिस्थूलपर्यन्तमेतत् विश्व यत्राभासमात्रं प्रतीतम् ।
व्योमप्रख्यं सूक्ष्ममाद्यन्तहीनं ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमस्मि ॥ 512 ॥
सर्वाधारं सर्ववस्तुप्रकाशं सर्वाकारं सर्वगं सर्वशून्यम् ।
नित्यं शुद्धं निश्चलं निर्विकल्पं ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमस्मि ॥ 513 ॥
यत्प्रत्यस्ताशेषमायाविशेषं प्रत्यग्रूपं प्रत्ययागम्यमानम् ।
सत्यज्ञानानन्तमानन्दरूपं ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमस्मि ॥ 514 ॥
अब घोषणाओं की आख़िरी श्रृंखला आती है, फिर मंत्र-शैली में। हम निष्क्रिय हैं, अविकार हैं, निष्कल हैं, निराकृति हैं; निर्विकल्प हैं, नित्य हैं, निरालंब हैं, निर्द्वय हैं। आठ “निर्”, हर एक एक चीज़ का न होना बताता है, पर मिल कर एक खुली-खुली आत्मा का चित्र खींच देते हैं; और सबसे प्यारा है “निरालंब”, किसी का सहारा नहीं चाहिए। फिर इसी धारा का अंतिम छोर, हम सर्वात्मक हैं, सर्व हैं, सर्वातीत हैं, अद्वय हैं; केवल-अखंड-बोध हैं, निरंतर आनंद हैं। तीन “सर्व” एक साथ, सब का आत्मा, सब-कुछ, और सब के पार। हर चीज़ का अंदरूनी कोर, साथ ही पूरा बाहरी फैलाव, साथ ही उन सबसे परे। यह “हम” वही है, पुराने छोटे “हम” से असीम-असीम बड़ा।
515 · 516
निष्क्रियोऽस्म्यविकारोऽस्मि निष्कलोऽस्मि निराकृतिः ।
निर्विकल्पोऽस्मि नित्योऽस्मि निरालम्बोऽस्मि निर्द्वयः ॥ 515 ॥
सर्वात्मकोऽहं सर्वोऽहं सर्वातीतोऽहमद्वयः ।
केवलाक्षण्डबोधोऽहमानन्दोऽहं निरन्तरः ॥ 516 ॥
इतनी ऊँची आत्म-स्थापना के बाद भी, शिष्य सबसे पहले फिर गुरु की ओर मुड़ता है। यह स्वराज्य और साम्राज्य की विभूति हमें आपकी कृपा, श्री और महिमा के प्रसाद से मिली है; श्री-गुरु महात्मा को नमन और नमन, और फिर नमन। कोई बाहरी राज्य नहीं, अपने ही स्वरूप का असली राज्य, और इसका सारा श्रेय गुरु को; दो बार नमन, फिर एक बार और, क्योंकि कोई एक शब्द काफ़ी नहीं पड़ता। और फिर पूरे स्तोत्र का सबसे भावनात्मक श्लोक आता है। महा-स्वप्न में, माया-कृत जन्म-जरा-मृत्यु के घने जंगल में भटकते, बहुत-सी तपनों से रोज़-रोज़ क्लेश पाते, अहंकार-बाघ से सताए हुए हमें, अत्यंत कृपा से नींद से जगा कर, हे गुरुदेव, आपने बचा लिया। जीव महा-स्वप्न में जन्म-जरा-मृत्यु के घने जंगल में भटकता है, हर तरफ़ तपनें, दुख, बीमारी, हार, अपमान; और बीच में अहंकार का एक बाघ रोज़ शिकार करता है। गुरु कोई उपदेश देने नहीं आए, वे आए साधक को जगाने; नींद टूटी, जंगल खुल गया, बाघ ग़ायब।
517 · 518
स्वाराज्यसाम्राज्यविभूतिरेषा भवत्कृपाश्रीमहिमप्रसादात् ।
प्राप्ता मया श्रीगुरवे महात्मने नमो नमस्तेऽस्तु पुनर्नमोऽस्तु ॥ 517 ॥
महास्वप्ने मायाकृतजनिजरामृत्युगहने भ्रमन्तं क्लिश्यन्तं बहुलतरतापैरनुदिनम् ।
अहंकारव्याघ्रव्यथितमिममत्यन्तकृपया प्रबोध्य प्रस्वापात्परमवितवान्मामसि गुरो ॥ 518 ॥
और अंत में, सबसे रहस्यमयी श्लोक। उसे नमन, जो सदा-एक है; किसी अनिर्वचनीय महिमा को नमन; जो यह विश्व-रूप से चमकता है, हे गुरु-राज, यह सब आपका ही है। जिसका नाम तक नहीं लिया जा सकता, उस अनुपम महिमा को नमन; और सबसे प्यारी पंक्ति यही, कि जो विश्व-रूप से चमक रहा है, वह सब गुरु का रूप है। बाहर जो भी दिखता है, वह गुरु। इस तरह शिष्य अपने स्तोत्र को सबसे ऊँची ऊँचाई पर ले जा कर समाप्त करता है, गुरु को एक व्यक्ति से ऊपर उठा कर, विश्व-रूप के रूप में देख कर।
519
नमस्तस्मै सदैकस्मै कस्मैचिन्महसे नमः ।
यदेतद्विश्वरूपेण राजते गुरुराज ते ॥ 519 ॥
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना: भाग 18, गुरु फिर बोलते हैं। “ब्रह्म-प्रत्यय-संतति” से जगत देख, सर्व अवस्थाओं में। फिर ज्ञानी की रोज़ की चाल, किसी जगह मूढ़ दिखता, किसी जगह राजा-जैसा, किसी जगह बच्चा-जैसा, किसी जगह भूत-जैसा। और एक पंक्ति: “क्व चित् मूढ़ः, विद्वान् क्व चित्।”
इस पूरे स्तोत्र का केंद्र-बिंदु श्लोक 518 में है, “अहंकार-व्याघ्र-व्यथितम् इमम्।” अहंकार एक व्याघ्र की तरह है, जो माया-कृत महा-स्वप्न के घने जंगल में जीव को रोज़-रोज़ सताता रहता है, “हम ख़ास हैं”, “हम ही सही हैं”, “हमें और चाहिए”, हर रूप में। गुरु उपदेश-मात्र नहीं देते, वे नींद ही तोड़ देते हैं; नींद टूटते ही जंगल और व्याघ्र, दोनों का कोई आधार नहीं बचता।