भाग 18 · गुरु फिर बोलते

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 18 · गुरु फिर बोलते, ज्ञानी की चाल, मौन, अनियम · श्लोक 520-545

शिष्य को जागा हुआ, प्रबुद्ध-तत्व, प्रमुदित-हृदय देख कर गुरु फिर बोले। हर अवस्था में ब्रह्म-प्रत्यय-संतति से जगत देख। शून्यों में कौन रमे जब अपार आनंद मिला। और ज्ञानी की रोज़ की चाल, किसी जगह मूढ़, किसी जगह राजा, किसी जगह बच्चा, किसी जगह पिशाच।

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पहले एक बात

शिष्य के लंबे, बहते स्तोत्र के बाद, गुरु फिर बोलते हैं। उन्होंने शिष्य को देखा, “नतम्” (झुका), “प्रबुद्ध-तत्व” (जागा), “प्रमुदित-हृदय” (दिल खिला)। और तब, “पुनः इदम् आह वचः परं महात्मा”, महान आत्मा (गुरु) ने एक “परम” (सबसे ऊँचा) वचन कहा।

यह “परम” वचन क्या है? बस यह, अब इस तरह जिओ। हर अवस्था में, सब-कुछ-में, ब्रह्म ही देखो। दूसरा आनंद-स्रोत खोजो ही मत। और रोज़ की चाल कैसी हो? कोई नियम नहीं। बैठो, चलो, खाओ, सोओ, जब-जो ठीक लगे। ज्ञानी कभी मूढ़-जैसा दिखता है, कभी राजा-जैसा, कभी बच्चा-जैसा, कभी पिशाच-जैसा। यही उसका असली निशान, कोई एक “साँचा” नहीं।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। तीन हिस्से, गुरु का पुनरारंभ और “सब ब्रह्म देखो” का परम-वचन (520-527), ज्ञानी का अनियम-स्वातंत्र्य (528-535), और ज्ञानी की रोज़ की रंगारंग चाल (536-545)। असली खंभे: 521 (ब्रह्म-प्रत्यय-संतति), 522 (पूर्ण चन्द्र की रोशनी में चित्र-चन्द्र क्यों देखो), 528 (चलते-बैठे-लेटे, इच्छा से ज़िंदगी), 538 (निगमान्त-वीथि में खेल), 542 (कहीं मूढ़, कहीं विद्वान, कहीं अजगर-वत् कहीं पात्र-वत्)।

520 · इस तरह नतम् को देख, प्रबुद्ध-तत्व, प्रमुदित-हृदय, गुरु फिर बोले

इति नतमवलोक्य शिष्यवर्यं समधिगतात्मसुखं प्रबुद्धतत्त्वम् ।
प्रमुदितहृदयं स देशिकेन्द्रः पुनरिदमाह वचः परं महात्मा ॥ 520 ॥

iti natam avalokya śiṣya-varyaṁ samadhi-gatātma-sukhaṁ prabuddha-tattvam · pramudita-hṛdayaṁ sa deśika-indraḥ punar idam āha vacaḥ paraṁ mahātmā

शब्दार्थ: इति नतम् अवलोक्य शिष्य-वर्यं · इस तरह झुके श्रेष्ठ शिष्य को देख कर · समधिगत-आत्म-सुखं प्रबुद्ध-तत्त्वम् · आत्म-सुख पाया हुआ, प्रबुद्ध-तत्व · प्रमुदित-हृदयं · प्रसन्न-हृदय · सः देशिक-इन्द्रः · वह देशिक-इंद्र (श्रेष्ठ गुरु) · पुनः इदम् आह वचः परं महात्मा · फिर यह परम-वचन कहा महात्मा ने।

अर्थ: इस तरह झुके श्रेष्ठ शिष्य को, आत्म-सुख पाए हुए, प्रबुद्ध-तत्व, प्रसन्न-हृदय, देख कर, वह देशिक-इंद्र (श्रेष्ठ गुरु), महात्मा, फिर यह परम-वचन कहा।

भावार्थ: कथा का एक प्यारा मोड़। गुरु को कुछ “जोड़ने” की ज़रूरत नहीं। शिष्य “जागा हुआ” है।

पर अब भी कुछ बात बाक़ी है, “परम-वचन।” यह वह बात है, जो “जागे हुए” के लिए है, जीने का तरीक़ा। और देख लें, गुरु के लिए तीन विशेषण: “देशिक-इन्द्र” (श्रेष्ठ गुरु), “महात्मा” (महान आत्मा)। और शिष्य के लिए तीन: नतम्, समाधि-प्राप्त, प्रमुदित-हृदय। पाँच-पाँच विशेषण, दोनों एक संतुलन में।

521 · ब्रह्म-प्रत्यय-संतति, सब अवस्थाओं में ब्रह्म ही देख

ब्रह्मप्रत्ययसन्ततिर्जगदतो ब्रह्मैव तत्सर्वतः पश्याध्यात्मदृशा प्रशान्तमनसा सर्वास्ववस्थास्वपि ।
रूपादन्यदवेक्षितं किमभितश्चक्षुष्मतां दृश्यते तद्वद्ब्रह्मविदः सतः किमपरं बुद्धेर्विहारास्पदम् ॥ 521 ॥

brahma-pratyaya-santatir jagad ato brahmaiva tat sarvataḥ paśyādhyātma-dṛśā praśānta-manasā sarvāsv avasthāsv api · rūpād anyad avekṣitaṁ kim abhitaś cakṣuṣmatāṁ dṛśyate tadvad brahma-vidaḥ sataḥ kim aparaṁ buddher vihārāspadam

शब्दार्थ: ब्रह्म-प्रत्यय-सन्ततिः जगत् · जगत ब्रह्म-प्रत्ययों की एक सन्तति · अतः ब्रह्म एव तत् सर्वतः पश्य · इसलिए सब ब्रह्म ही देख, हर तरफ़ · अध्यात्म-दृशा प्रशान्त-मनसा · अध्यात्म-दृष्टि से, प्रशांत-मन से · सर्वासु अवस्थासु अपि · सब अवस्थाओं में भी · रूपात् अन्यद् अवेक्षितं किम् अभितः · रूप के सिवा क्या और कुछ देखा जाता · चक्षुष्मतां दृश्यते · आँख वालों को · तद्-वद् ब्रह्म-विदः सतः किम् अपरं बुद्धेः विहार-आस्पदम् · वैसे ब्रह्म-वेत्ता की बुद्धि के लिए और क्या विहार-स्थल।

अर्थ: जगत ब्रह्म-प्रत्ययों की एक सन्तति है, इसलिए सब ब्रह्म ही, हर तरफ़, देख, अध्यात्म-दृष्टि से, प्रशांत-मन से, सब अवस्थाओं में भी। आँख वालों को “रूप” के सिवा क्या और दिखता है? वैसे ही ब्रह्म-वेत्ता की बुद्धि का और क्या विहार-स्थल हो सकता है?

भावार्थ: गुरु एक प्यारी, ज़मीनी उपमा देते हैं, आँख वाला आदमी हर तरफ़ बस “रूप” ही देखता है।

उसकी आँख और कुछ देख ही नहीं सकती, हर चीज़ “रूप” है। उसी तरह, ब्रह्म-वेत्ता की बुद्धि को बस “ब्रह्म” ही दिखे, और कुछ देख ही नहीं सकती। पुराने सब “और-और” गायब। यह कोई थोपी हुई दृष्टि नहीं। यह जागे हुए की स्वाभाविक दृष्टि है।

522 · पर-आनंद छोड़ कर शून्यों में कौन रमे, पूर्ण चन्द्र हो तो चित्र-चन्द्र क्यों देखे

कस्तां परानन्दरसानुभूति मृत्सृज्य शून्येषु रमेत विद्वान् ।
चन्द्रे महाल्हादिनि दीप्यमाने चित्रेन्दुमालोकयितुं क इच्छेत् ॥ 522 ॥

kas tāṁ parānanda-rasānubhūti mṛtsṛjya śūnyeṣu rameta vidvān · candre mahālhādini dīpyamāne citrendum ālokayituṁ ka icchet

शब्दार्थ: कः तां पर-आनन्द-रस-अनुभूति मृत्सृज्य · कौन उस परम-आनंद-रस-अनुभूति को छोड़ कर · शून्येषु रमेत विद्वान् · विद्वान शून्यों में रमेगा · चन्द्रे महा-आल्हादिनि दीप्यमाने · चन्द्र महा-आल्हादक, चमकता हैं तो · चित्र-इन्दुम् आलोकयितुं कः इच्छेत् · चित्र-चन्द्र देखने का कौन इच्छुक होंगे।

अर्थ: कौन विद्वान उस परम-आनंद-रस-अनुभूति को छोड़ कर शून्यों में रमेगा? जब महा-आल्हादक चन्द्र चमकता हैं, तो कौन चित्र-चन्द्र देखने का इच्छुक होंगे?

भावार्थ: गुरु एक बेहद प्यारी उपमा देते हैं, असली चन्द्र और कागज़ का चन्द्र।

एक रात, असली चन्द्र आसमान में पूरा है, महा-आल्हादक, चमकता। कौन उस वक़्त एक कागज़ के “चित्र-चन्द्र” को देखेगा? बेवक़ूफ़ ही। उसी तरह, एक बार पर-आनंद-रस मिल गया, तो छोटे “विषय-सुख”, पैसा, सम्मान, खाना, ये सब “चित्र-चन्द्र” हो जाते हैं। न देखने योग्य, न चाहने योग्य।

523 · असत्-पदार्थ-अनुभव से तृप्ति या दुख-हानि नहीं। सद्-आत्म-निष्ठा में सुख से रह

असत्पदार्थानुभवेन किंचिन् न ह्यस्ति तृप्तिर्न च दुःखहानिः ।
तदद्वयानन्दरसानुभूत्या तृप्तः सुखं तिष्ठ सदात्मनिष्ठया ॥ 523 ॥

asat-padārthānubhavena kiṁcin na hy asti tṛptir na ca duḥkha-hāniḥ · tad advayānanda-rasānubhūtyā tṛptaḥ sukhaṁ tiṣṭha sad-ātma-niṣṭhayā

शब्दार्थ: असत्-पदार्थ-अनुभवेन किंचिद् न तृप्तिः · असत्-पदार्थ के अनुभव से कुछ तृप्ति नहीं · न च दुःख-हानिः · और न दुख-हानि · तद् अद्वय-आनन्द-रस-अनुभूत्या · उस अद्वय-आनंद-रस-अनुभूति से · तृप्तः सुखं तिष्ठ · तृप्त, सुख से रह · सद्-आत्म-निष्ठया · सद्-आत्म-निष्ठा से।

अर्थ: असत्-पदार्थ के अनुभव से कुछ तृप्ति नहीं। और न दुख-हानि। उस अद्वय-आनंद-रस-अनुभूति से तृप्त, सद्-आत्म-निष्ठा से सुख से रह।

भावार्थ: गुरु एक रोज़ की कसौटी देते हैं, असत्-पदार्थ क्या करता है, क्या नहीं?

नहीं करता, तृप्ति, और न दुख-हानि। यानी न तो असली संतुष्टि, न दुख से बचाव। तो उसकी पीछे क्यों दौड़ना? जब असली तृप्ति-स्रोत मिल चुका, अद्वय-आनंद, तो वहीं बस। और “सुख से रह”, एक सीधा आदेश, बिना ज़्यादा शब्दों के।

524 · हर तरह स्वयं को देख, स्व-अद्वय मानता; स्व-आनंद भोगता हुआ समय बिता

स्वमेव सर्वथा पश्यन्मन्यमानः स्वमद्वयम् ।
स्वानन्दमनुभुञ्जानः कालं नय महामते ॥ 524 ॥

svam eva sarvathā paśyan manyamānaḥ svam advayam · svānandam anubhuñjānaḥ kālaṁ naya mahā-mate

शब्दार्थ: स्वम् एव सर्वथा पश्यन् · हर तरह स्वयं को ही देखता हुआ · मन्यमानः स्वम् अद्वयम् · स्वयं को अद्वय मानता हुआ · स्व-आनन्दम् अनुभुञ्जानः · स्व-आनंद का भोग करता · कालं नय महा-मते · हे महा-मति, समय बिता।

अर्थ: हर तरह स्वयं को ही देखता हुआ, स्वयं को अद्वय मानता हुआ, स्व-आनंद का भोग करता हुआ, हे महा-मति, समय बिता।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी पंक्ति देते हैं, “कालं नय”, समय बिता।

यह “कुछ करो” नहीं। “बस इस तरह जिओ।” और तीन गुण साथ, सब में स्वयं देखो, स्वयं को अद्वय मानो, स्व-आनंद में रहो। बस इसी में दिन गुज़रें। और “महा-मते”, एक प्यारा संबोधन, “हे महा-बुद्धि वाले।” अब शिष्य “मूढ़” नहीं। गुरु उसको “महा-मति” कहते हैं।

525 · निर्विकल्प में विकल्पना? आकाश में नगर-कल्पना, पर-शांति पा कर मौन भज

अखण्डबोधात्मनि निर्विकल्पे विकल्पनं व्योम्नि पुरप्रकल्पनम् ।
तदद्वयानन्दमयात्मना सदा शान्तिं परामेत्य भजस्व मौनम् ॥ 525 ॥

akhaṇḍa-bodhātmani nirvikalpe vikalpanaṁ vyomni pura-prakalpanam · tad advayānanda-mayātmanā sadā śāntiṁ parām etya bhajasva maunam

शब्दार्थ: अखण्ड-बोध-आत्मनि निर्विकल्पे विकल्पनं · अखंड-बोध-आत्मा, निर्विकल्प में विकल्पना · व्योम्नि पुर-प्रकल्पनम् · आकाश में नगर-कल्पना · तद् अद्वय-आनन्द-मय-आत्मना सदा · उस अद्वय-आनंद-मय आत्मा से सदा · शान्तिं परां एत्य · परम-शांति पा कर · भजस्व मौनम् · मौन भज।

अर्थ: अखंड-बोध-आत्मा, निर्विकल्प में, “विकल्पना”, मानो आकाश में नगर-कल्पना है। उस अद्वय-आनंद-मय आत्मा से सदा परम-शांति पा कर, मौन को भज।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी उपमा देते हैं, “आकाश में नगर।” क्या आकाश में नगर बना सकते हैं? नहीं। यह एक असंभव कल्पना है।

वैसे ही, “निर्विकल्प” आत्मा में “विकल्प” (यह-वह की बात) डालना भी असंभव कल्पना। तो उसे मत डालो। और बस “मौन भजो।” मौन यानी सिर्फ़ बोलना नहीं। मन का भी मौन, विचारों का भी मौन। यह वेदान्त की एक प्यारी, गहरी सलाह है।

526 · तूष्णीम-अवस्था, परम-उपशांति, ब्रह्म-वेत्ता का अद्वय-आनंद-सुख

तूष्णीमवस्था परमोपशान्तिः बुद्धेरसत्कल्पविकल्पहेतोः ।
ब्रह्मात्मन ब्रह्मविदो महात्मनो यत्राद्वयानन्दसुखं निरन्तरम् ॥ 526 ॥

tūṣṇīm-avasthā paramopaśāntiḥ buddher asat-kalpa-vikalpa-hetoḥ · brahmātmana brahma-vido mahātmano yatrādvayānanda-sukhaṁ nirantaram

शब्दार्थ: तूष्णीम्-अवस्था परम-उपशान्तिः · तूष्णीम् (मौन) अवस्था परम-उपशांति · बुद्धेः असत्-कल्प-विकल्प-हेतोः · असत्-कल्प विकल्पों की हेतु बुद्धि की · ब्रह्म-आत्मना ब्रह्म-विदः महात्मनः · ब्रह्म-आत्मा के रूप में, ब्रह्म-वेत्ता महात्मा का · यत्र अद्वय-आनन्द-सुखं निरन्तरम् · जहाँ अद्वय-आनंद-सुख निरंतर।

अर्थ: तूष्णीम् (मौन) अवस्था बुद्धि की, जो असत्-कल्प विकल्पों की हेतु है, परम-उपशांति है। ब्रह्म-वेत्ता महात्मा को, ब्रह्म-आत्मा के रूप में, इसी में अद्वय-आनंद-सुख निरंतर है।

भावार्थ: गुरु एक सूक्ष्म बात कहते हैं, बुद्धि “असत्-कल्प विकल्पों” का स्रोत है,उसकी कल्पना वहीं से उठती है।

तो बुद्धि की “तूष्णीम् अवस्था”, चुप्पी, ही परम-उपशांति है। जब बुद्धि चुप, तब झूठी कल्पनाएँ बंद। और तब असली, अद्वय-आनंद-सुख, निरंतर बहता है।

527 · निर्वासन-मौन से बढ़ कर कोई सुख नहीं। स्व-आत्म-स्वरूप जान चुका के लिए

नास्ति निर्वासनान्मौनात्परं सुखकृदुत्तमम् ।
विज्ञातात्मस्वरूपस्य स्वानन्दरसपायिनः ॥ 527 ॥

nāsti nir-vāsanān maunāt paraṁ sukha-kṛd uttamam · vijñātātma-svarūpasya svānanda-rasa-pāyinaḥ

शब्दार्थ: न अस्ति निर्वासनात् मौनात् · निर्वासन (वासना-रहित) मौन से · परं सुख-कृत् उत्तमम् · बढ़ कर कोई उत्तम सुख-कारी नहीं · विज्ञात-आत्म-स्वरूपस्य · आत्म-स्वरूप जान चुके का · स्व-आनन्द-रस-पायिनः · स्व-आनंद-रस पीने वाले का।

अर्थ: आत्म-स्वरूप जान चुके, स्व-आनंद-रस पीने वाले के लिए, निर्वासन (वासना-रहित) मौन से बढ़ कर कोई उत्तम सुख-कारी नहीं।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी शर्त वाला कथन देते हैं, मौन का सुख, ख़ास तौर पर ज्ञानी के लिए, सबसे ऊँचा है।

“निर्वासन” शब्द ज़रूरी है, वासना भरा मौन तो बस “बाहर का मौन” है, “अंदर का” शोर भरा। पर वासना-रहित मौन, वहाँ अंदर भी शांति। और इस मौन का सुख वह जानता है जो “स्व-आनंद-रस पीने वाला” है। बाहर वालों के लिए मौन बोरियत हो सकती है; उनके लिए, यह असली शराब है।

528 · चलते, बैठे, लेटे, जैसे इच्छा, वैसे बसे; आत्म-रामी सदा मुनि

गच्छंस्तिष्ठन्नुपविशञ्छयानो वान्यथापि वा ।
यथेच्छया वेसेद्विद्वानात्नारामः सदा मुनिः ॥ 528 ॥

gacchaṁs tiṣṭhann upaviśañ chayāno vānyathāpi vā · yathecchayā vased vidvān ātma-rāmaḥ sadā muniḥ

शब्दार्थ: गच्छन् तिष्ठन् उपविशन् शयानः वा अन्यथा अपि वा · चलते, बैठे, लेटे, या कोई और तरह · यथा-इच्छया वसेद् विद्वान् · इच्छा के अनुसार रहे विद्वान · आत्म-रामः सदा मुनिः · आत्म-रामी, सदा मुनि।

अर्थ: चलते, बैठे, लेटे, या किसी और तरह, विद्वान इच्छा के अनुसार रहे, आत्म-रामी, सदा मुनि।

भावार्थ: गुरु एक बहुत खुली बात कहते हैं, कोई आसन-नियम नहीं।

“यथा-इच्छया”, जैसी इच्छा हो। यानी कुछ ख़ास “ध्यान-मुद्रा” नहीं। कोई “उत्तम समय” नहीं। कोई “उत्तर-मुख” नहीं। चलो, बैठो, लेटो, जो भी। पर एक चीज़ हमेशा, “आत्म-राम।” आत्मा में रमना। बाहरी चाल कैसी भी, अंदर का बसना एक।

529 · देश, काल, आसन, दिशा, यम, कोई अपेक्षा नहीं; तत्व-सिद्ध का स्व-वेदन क्यों नियम-अधीन

न देशकालासनदिग्यमादि लक्ष्याद्यपेक्षाप्रतिबद्धवृत्तेः ।
संसिद्धतत्त्वस्य महात्मनोऽस्ति स्ववेदने का नियमाद्यवस्था ॥ 529 ॥

na deśa-kālāsana-dig-yamādi lakṣyādy-apekṣā-pratibaddha-vṛtteḥ · saṁsiddha-tattvasya mahātmano’sti sva-vedane kā niyamādy-avasthā

शब्दार्थ: न देश-काल-आसन-दिग्-यम-आदि · देश, काल, आसन, दिशा, यम आदि · लक्ष्य-आदि-अपेक्षा-प्रतिबद्ध-वृत्तेः · लक्ष्य आदि की अपेक्षा से बँधी वृत्ति नहीं · संसिद्ध-तत्त्वस्य महात्मनः अस्ति · संसिद्ध-तत्व, महात्मा को है · स्व-वेदने का नियम-आदि-अवस्था · स्व-वेदन में कौन नियम-अवस्था।

अर्थ: देश, काल, आसन, दिशा, यम, आदि लक्ष्य की अपेक्षा से उसकी वृत्ति बँधी नहीं। संसिद्ध-तत्व, महात्मा को, स्व-वेदन में कौनसी नियम-अवस्था (टिक सकती)?

भावार्थ: गुरु एक मुक्त-कर-देने वाला सवाल पूछते हैं, अपनी आत्मा को “जानने” के लिए कौनसा नियम चाहिए?

दूसरों को जानने के लिए, चाहे लोग, चाहे वस्तुएँ, कुछ नियम लगते हैं। पर अपनी आत्मा? वह तो “स्व-वेदन” है, सबसे पास, सबसे साफ़। बाहर के सब नियम, देश-काल-आसन-दिशा-यम, यहाँ क्या करें? वह तो हमेशा-पहले-से जानी हुई है।

530 · “यह घड़ा है”, कौनसा नियम; प्रमाण-सुष्ठुत्व हो, तो पदार्थ-धी अपने आप

घटोऽयमिति विज्ञातुं नियमः कोऽन्ववेक्षते ।
विना प्रमाणसुष्ठुत्वं यस्मिन् सति पदार्थधीः ॥ 530 ॥

ghaṭo’yam iti vijñātuṁ niyamaḥ ko’nvavekṣate · vinā pramāṇa-suṣṭhutvaṁ yasmin sati padārtha-dhīḥ

शब्दार्थ: घटः अयम् इति विज्ञातुं · “यह घड़ा है”, यह जानने के लिए · नियमः कः अनुवेक्षते · कौनसा नियम लागू होता · विना प्रमाण-सुष्ठुत्वं · प्रमाण-सुष्ठुत्व (अच्छाई) के सिवा · यस्मिन् सति पदार्थ-धीः · जिसके होने पर पदार्थ-बुद्धि।

अर्थ: “यह घड़ा है”, यह जानने के लिए कौनसा नियम लागू होता है? बस प्रमाण-सुष्ठुत्व, जिसके होने पर पदार्थ-बुद्धि (स्वयं) हो जाती है।

भावार्थ: गुरु एक रोज़ की मिसाल देते हैं, घड़ा देखने के लिए क्या चाहिए? बस अच्छी आँख और रोशनी। फिर “यह घड़ा है” अपने आप हैं जाता है।

कोई “देश-काल-दिशा” नहीं। कोई “व्रत-नियम” नहीं। प्रमाण ठीक हो, तो जान हो जाती है। आत्म-ज्ञान भी ऐसा ही है। प्रमाण (गुरु-श्रुति-अनुभूति) ठीक हो, तो आत्म-बुद्धि अपने आप।

531 · यह आत्मा नित्य-सिद्ध, प्रमाण हो तो भासित; न देश, न काल, न शुद्धि चाहिए

अयमात्मा नित्यसिद्धः प्रमाणे सति भासते ।
न देशं नापि कालं न शुद्धिं वाप्यपेक्षते ॥ 531 ॥

ayam ātmā nitya-siddhaḥ pramāṇe sati bhāsate · na deśaṁ nāpi kālaṁ na śuddhiṁ vāpy apekṣate

शब्दार्थ: अयम् आत्मा नित्य-सिद्धः · यह आत्मा नित्य-सिद्ध · प्रमाणे सति भासते · प्रमाण होने पर भासित · न देशं न अपि कालं न शुद्धिं वा अपि अपेक्षते · न देश, न काल, न शुद्धि की अपेक्षा।

अर्थ: यह आत्मा नित्य-सिद्ध है; प्रमाण होने पर भासित होती है। न देश, न काल, न शुद्धि की अपेक्षा करती है।

भावार्थ: गुरु एक बहुत आज़ाद कर देने वाली बात कहते हैं, आत्म-ज्ञान के लिए कोई “तैयारी” नहीं चाहिए।

आत्मा हमेशा “सिद्ध” है, हमेशा वहाँ है। बस “प्रमाण” चाहिए, और वह प्रमाण क्या? गुरु-वचन, श्रुति, अपनी अनुभूति। शुद्धि, देश, काल, ये बाहरी क्रियाओं के लिए। आत्म-बोध इन सब से परे है, कहीं भी, कभी भी, किसी भी हालत में।

532 · “मैं देवदत्त”, निरपेक्ष ज्ञान; वैसे ही ब्रह्म-वेत्ता का “ब्रह्म अहम्”

देवदत्तोऽहमित्येतद्विज्ञानं निरपेक्षकम् ।
तद्वद्ब्रह्मविदोऽप्यस्य ब्रह्माहमिति वेदनम् ॥ 532 ॥

devadatto’ham ity etad vijñānaṁ nirapekṣakam · tadvad brahma-vido’py asya brahmāham iti vedanam

शब्दार्थ: देवदत्तः अहम् इति एतद् विज्ञानं · “मैं देवदत्त हूँ”, यह विज्ञान · निरपेक्षकम् · निरपेक्ष (किसी की अपेक्षा नहीं) · तद्-वद् ब्रह्म-विदः अपि अस्य ब्रह्म अहम् इति वेदनम् · वैसे ही ब्रह्म-वेत्ता का भी “ब्रह्म मैं हूँ” वेदन।

अर्थ: “मैं देवदत्त हूँ”, यह विज्ञान निरपेक्ष है (किसी और चीज़ की अपेक्षा नहीं)। वैसे ही, ब्रह्म-वेत्ता का “ब्रह्म मैं हूँ”, यह वेदन।

भावार्थ: गुरु एक बहुत रोज़ की मिसाल देते हैं। आप जानते हैं, “मैं देवदत्त हूँ” (अपना नाम)। इसके लिए क्या चाहिए?

कुछ नहीं। न दर्पण, न दूसरों की पुष्टि, न कुछ। बस आपको हमेशा से पता है। उसी तरह, “ब्रह्म मैं हूँ” का बोध, किसी की मोहर नहीं चाहिए। बस “हाँ, यह मैं हूँ।” यह तुलना बहुत प्यारी है, आत्म-ज्ञान को कोई दूर का रहस्य नहीं। एक “अपने नाम” जैसी सीधी बात।

533 · जिसके तेज से सूर्य-जैसा पूरा जगत भासित, उसको कौन भासित करे

भानुनेव जगत्सर्वं भासते यस्य तेजसा ।
अनात्मकमसत्तुच्छं किं नु तस्यावभासकम् ॥ 533 ॥

bhānuneva jagat sarvaṁ bhāsate yasya tejasā · anātmakam asat-tucchaṁ kiṁ nu tasyāvabhāsakam

शब्दार्थ: भानुना इव जगत् सर्वं भासते यस्य तेजसा · सूर्य की तरह पूरा जगत जिसके तेज से भासित · अनात्मकम् असत्-तुच्छं किं नु तस्य अवभासकम् · अनात्मक, असत्-तुच्छ, उसको क्या भासित करे।

अर्थ: जिसके तेज से, सूर्य की तरह, पूरा जगत भासित होता है, अनात्मक, असत्-तुच्छ क्या उसको भासित करे?

भावार्थ: गुरु एक प्यारा सवाल पूछते हैं, सूर्य को कौन रोशन करे?

दीये से सूर्य देखो, हास्यास्पद। सूर्य की रोशनी से दीया दिखता है। उसी तरह, आत्मा के तेज से पूरा जगत दिखता है। तो जगत आत्मा को कैसे “दिखाए”? बल्कि उल्टा, आत्मा से जगत दिखता है। आत्मा को “साबित” करने की कोशिश पहले से ही उल्टी है।

534 · वेद, शास्त्र, पुराण, सब प्राणी, जिससे अर्थ-वान; उस विज्ञाता को क्या प्रकाश करे

वेदशास्त्रपुराणानि भूतानि सकलान्यपि ।
येनार्थवन्ति तं किन्नु विज्ञातारं प्रकाशयेत् ॥ 534 ॥

veda-śāstra-purāṇāni bhūtāni sakalāny api · yenārtha-vanti taṁ kin nu vijñātāraṁ prakāśayet

शब्दार्थ: वेद-शास्त्र-पुराणानि · वेद, शास्त्र, पुराण · भूतानि सकलानि अपि · सब प्राणी भी · येन अर्थवन्ति · जिससे अर्थ-वान · तं किं नु विज्ञातारं प्रकाशयेत् · उस विज्ञाता को क्या प्रकाशित करे।

अर्थ: वेद, शास्त्र, पुराण, सब प्राणी, जिससे अर्थ-वान बनते हैं, उस विज्ञाता को क्या प्रकाशित करे?

भावार्थ: गुरु एक बहुत गहरी बात कहते हैं, वेद-शास्त्र-पुराण भी “अर्थवान” तभी, जब उन्हें “जानने वाला” हो।

शास्त्र पन्नों में पड़ा है, कौन उसे अर्थ देता है? पढ़ने वाला। पढ़ने वाले के बिना, शास्त्र बस स्याही। उसी तरह, सब प्राणी, सब वस्तुएँ “अर्थवान” हैं क्योंकि कोई “विज्ञाता” है। और वह विज्ञाता, मूल आत्मा, को कौन अर्थ देगा? कोई नहीं। वह ख़ुद-सिद्ध।

535 · यह स्वयं-ज्योति, अनंत-शक्ति, अप्रमेय, सकल-अनुभूति, विमुक्त-बंध, ब्रह्म-वित्-उत्तमोत्तम

एष स्वयंज्योतिरनन्तशक्तिः आत्माप्रमेयः सकलानुभूतिः ।
यमेव विज्ञाय विमुक्तबन्धो जयत्ययं ब्रह्मविदुत्तमोत्तमः ॥ 535 ॥

eṣa svayaṁ-jyotir ananta-śaktiḥ ātmāprameyaḥ sakalānubhūtiḥ · yam eva vijñāya vimukta-bandho jayaty ayaṁ brahma-vid-uttamottamaḥ

शब्दार्थ: एषः स्वयं-ज्योतिः अनन्त-शक्तिः · यह स्वयं-ज्योति, अनंत-शक्ति · आत्मा अप्रमेयः सकल-अनुभूतिः · आत्मा अप्रमेय, सकल-अनुभूति · यम् एव विज्ञाय विमुक्त-बन्धः · जिसे जान कर विमुक्त-बंध · जयति अयं ब्रह्म-विद्-उत्तमोत्तमः · यह ब्रह्म-वेत्ता उत्तमोत्तम विजयी।

अर्थ: यह स्वयं-ज्योति, अनंत-शक्ति, अप्रमेय, सकल-अनुभूति वाला आत्मा, जिसे जान कर विमुक्त-बंध, यह ब्रह्म-वेत्ता उत्तमोत्तम विजयी होता है।

भावार्थ: गुरु एक प्यारा शब्द देते हैं, “ब्रह्म-वित्-उत्तमोत्तम।” यानी “ब्रह्म-जानने वालों में भी श्रेष्ठ का श्रेष्ठ।”

यह बहुत ऊँचा दर्जा है। साधारण साधक, अच्छा साधक, ब्रह्म-जानने वाला, और सबसे ऊपर, “उत्तमोत्तम।” यह वह है, जो अनंत-शक्ति वाली, अप्रमेय आत्मा को जान कर बंधन से मुक्त हो गया। “जयति”, विजयी होता है। यह आख़िरी विजय है।

536 · न खिद्यता, न विषयों से प्रमुदित, न जुड़ता, न विरक्त, स्व में क्रीड़ा-नंद

न खिद्यते नो विषयैः प्रमोदते न सज्जते नापि विरज्यते च ।
स्वस्मिन्सदा क्रीडति नन्दति स्वयं निरन्तरानन्दरसेन तृप्तः ॥ 536 ॥

na khidyate no viṣayaiḥ pramodate na sajjate nāpi virajyate ca · svasmin sadā krīḍati nandati svayaṁ nirantarānanda-rasena tṛptaḥ

शब्दार्थ: न खिद्यते नो विषयैः प्रमोदते · न खिन्न होता, न विषयों से ख़ुश · न सज्जते न अपि विरज्यते च · न जुड़ता, न विरक्त होता · स्वस्मिन् सदा क्रीडति नन्दति स्वयं · स्व में सदा क्रीड़ा करता, ख़ुद नंदता · निरन्तर-आनन्द-रसेन तृप्तः · निरंतर-आनंद-रस से तृप्त।

अर्थ: न खिन्न होता, न विषयों से ख़ुश; न जुड़ता, न विरक्त। स्व में सदा क्रीड़ा करता, ख़ुद नंदता, निरंतर-आनंद-रस से तृप्त।

भावार्थ: गुरु ज्ञानी का एक प्यारा चित्र देते हैं, चार नकार और दो स्वीकार।

नकार: खिन्न नहीं। ख़ुश नहीं। जुड़ता नहीं। विरक्त भी नहीं। चारों एक साथ, एक बहुत खुली, हल्की स्थिति। और स्वीकार: स्व में क्रीड़ा, स्व में नंद। यानी अंदर बस खेल और ख़ुशी। बाहर के “उतार-चढ़ाव” से कोई असर नहीं।

537 · भूख-देह-व्यथा छोड़ बच्चा वस्तु से खेलता; वैसे विद्वान निर्मम-निरह सुखी

क्षुधां देहव्यथां त्यक्त्वा बालः क्रीडति वस्तुनिः ।
तथैव विद्वान् रमते निर्ममो निरहं सुखी ॥ 537 ॥

kṣudhāṁ deha-vyathāṁ tyaktvā bālaḥ krīḍati vastuniḥ · tathaiva vidvān ramate nirmamo niraham sukhī

शब्दार्थ: क्षुधां देह-व्यथां त्यक्त्वा · भूख और देह-व्यथा छोड़ कर · बालः क्रीडति वस्तुनिः · बच्चा खिलौने से खेलता · तथा एव विद्वान् रमते · वैसे विद्वान रमता · निर्ममः निरहं सुखी · निर्मम, निरह, सुखी।

अर्थ: भूख और देह-व्यथा छोड़ कर बच्चा खिलौने से खेलता है। वैसे ही विद्वान रमता है, निर्मम, निरह, सुखी।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी, रोज़ की उपमा देते हैं, खिलौने में डूबा बच्चा।

बच्चा भूखा हो, थका हो, पर जब खेल में लगा, सब “भूल जाता।” वह खेल में पूरा बसा हुआ। ज्ञानी ऐसा ही है, आत्म-रस में डूबा, “मेरा-मैं” वाला कुछ नहीं याद, बस सुखी। बच्चे की मासूम तल्लीनता और ज्ञानी की आत्म-तल्लीनता, एक ही चीज़, बस अलग स्तर पर।

538 · चिन्ता-शून्य भिक्षा, नदी का पानी, श्मशान-वन में नींद; ब्रह्म में क्रीड़ा

चिन्ताशून्यमदैन्यभैक्षमशनं पानं सरिद्वारिषु स्वातन्त्र्येण निरङ्कुशा स्थितिरभीर्निद्रा श्मशाने वने ।
वस्त्रं क्षालनशोषणादिरहितं दिग्वास्तु शय्या मही संचारो निगमान्तवीथिषु विदां क्रीडा परे ब्रह्मणि ॥ 538 ॥

cintā-śūnyam adainya-bhaikṣam aśanaṁ pānaṁ sarid-vāriṣu svātantryeṇa niraṅkuśā sthitir abhīr nidrā śmaśāne vane · vastraṁ kṣālana-śoṣaṇādi-rahitaṁ dig-vāstu śayyā mahī saṁcāro nigamānta-vīthiṣu vidāṁ krīḍā pare brahmaṇi

शब्दार्थ: चिन्ता-शून्यम् अदैन्य-भैक्षम् अशनम् · चिन्ता-शून्य, बिना दीनता वाली भिक्षा से भोजन · पानं सरिद्-वारिषु · पीना नदी के पानी से · स्वातन्त्र्येण निरंकुशा स्थितिः · स्वतंत्रता से बिना अंकुश की स्थिति · अभीः निद्रा श्मशाने वने · निडर नींद श्मशान-वन में · वस्त्रं क्षालन-शोषण-आदि-रहितं · वस्त्र धोने-सुखाने आदि से रहित · दिग्-वा अस्तु शय्या मही · दिशाएँ ही [वस्त्र] हों या नहीं। बिस्तर ज़मीन · संचारः निगमान्त-वीथिषु · विचरण वेदान्त-गलियों में · विदां क्रीडा परे ब्रह्मणि · ज्ञानियों की क्रीड़ा परम-ब्रह्म में।

अर्थ: चिन्ता-शून्य, बिना दीनता वाली भिक्षा से भोजन; पीना नदी के पानी से; स्वतंत्रता से बिना अंकुश की स्थिति; निडर नींद श्मशान-वन में; वस्त्र धोने-सुखाने आदि से रहित, दिशाएँ ही वस्त्र, या नहीं; बिस्तर ज़मीन; विचरण वेदान्त-गलियों में, ज्ञानियों की क्रीड़ा परम-ब्रह्म में।

भावार्थ: यह श्लोक ज्ञानी की रोज़ की ज़िंदगी का सबसे जीवंत चित्र है, सात-आठ छोटे ब्रश-स्ट्रोक्स।

भिक्षा बिना दीनता, पानी नदी से, सोना श्मशान में बिना डर, बिस्तर ज़मीन, वस्त्र शायद नहीं। घूमना वेदांत-गलियों में। और इस सब के बीच, “ब्रह्म में क्रीड़ा।” यह कोई “बेचारगी” नहीं। असली स्वतंत्रता। और एक बहुत प्यारा शब्द, “निगमान्त-वीथिषु”, वेदान्त की गलियों में घूमता है। यानी वेदांत उसकी रोज़ की चहल-पहल है।

539 · विमान पर बैठ, परेच्छा से बच्चे की तरह विषय भोगता, अव्यक्त-लिंग आत्म-वेत्ता

विमानमालम्ब्य शरीरमेतद् भुनक्त्यशेषान्विषयानुपस्थितान् ।
परेच्छया बालवदात्मवेत्ता योऽव्यक्तलिङ्गोऽननुषक्तबाह्यः ॥ 539 ॥

vimānam ālambya śarīram etad bhunakty aśeṣān viṣayān upasthitān · parecchayā bālavad ātma-vettā yo’vyakta-liṅgo’nanuṣakta-bāhyaḥ

शब्दार्थ: विमानम् आलम्ब्य शरीरम् एतद् · विमान (वाहन) की तरह इस शरीर का सहारा ले कर · भुनक्ति अशेषान् विषयान् उपस्थितान् · सामने आए सब विषय भोगता · परेच्छया बाल-वद् आत्म-वेत्ता · दूसरों की इच्छा से बच्चे की तरह आत्म-वेत्ता · यः अव्यक्त-लिङ्गः अननुषक्त-बाह्यः · जो अव्यक्त-लिंग, बाह्य से अनासक्त।

अर्थ: शरीर का विमान (वाहन) की तरह सहारा ले कर, सामने आए सब विषयों को आत्म-वेत्ता दूसरों की इच्छा से, बच्चे की तरह, भोगता है, जो अव्यक्त-लिंग है, बाह्य से अनासक्त।

भावार्थ: गुरु एक नई उपमा देते हैं, शरीर एक “विमान” (वाहन)।

आप विमान में बैठते हैं, वह आपको ले जाता है। पर आप “विमान” नहीं हैं, बस सवारी कर रहे हैं। ज्ञानी का शरीर ऐसा ही, सवारी, ख़ुद नहीं। और “अव्यक्त-लिंग”, कोई बाहरी निशान नहीं। यानी देख कर पहचाना न जाए कि “यह ज्ञानी है।” वह आम-सा दिखता है, पर अंदर बहुत अलग।

540 · दिगम्बर, साम्बर, त्वग्-अम्बर, चिद्-अम्बर; उन्मत्त-वत्, बाल-वत्, पिशाच-वत्

दिगम्बरो वापि च साम्बरो वा त्वगम्बरो वापि चिदम्बरस्थः ।
उन्मत्तवद्वापि च बालवद्वा पिशाचवद्वापि चरत्यवन्याम् ॥ 540 ॥

dig-ambaro vāpi ca sāmbaro vā tvag-ambaro vāpi cid-ambara-sthaḥ · unmatta-vad vāpi ca bāla-vad vā piśāca-vad vāpi caraty avanyām

शब्दार्थ: दिग्-अम्बरः वा अपि च साम्बरः वा · दिग-अम्बर (दिशाएँ ही वस्त्र) हो या वस्त्र पहने · त्वग्-अम्बरः वा अपि चिद्-अम्बर-स्थः · चमड़ी ही वस्त्र हो, या चिद्-अम्बर में स्थित · उन्मत्त-वत् वा अपि बाल-वत् वा · उन्मत्त की तरह, बच्चे की तरह · पिशाच-वत् वा अपि चरति अवन्याम् · पिशाच की तरह, धरती पर विचरता।

अर्थ: दिग-अम्बर (दिशाएँ ही वस्त्र) हो, या वस्त्र पहने, या चमड़ी ही वस्त्र, या चिद्-अम्बर (चित्-आकाश) में स्थित। उन्मत्त की तरह, बच्चे की तरह, या पिशाच की तरह, धरती पर विचरता है।

भावार्थ: गुरु ज्ञानी की कई “वेश-भूषाएँ” बताते हैं, सब अलग-अलग।

कोई वस्त्र पहने, कोई नहीं; कोई शांत, कोई उन्मत्त-जैसा; कोई बच्चा-जैसा, कोई पिशाच-जैसा। यह कोई “साँचा” नहीं। हर ज्ञानी का अपना तरीक़ा। बाहर देख कर पहचान नहीं सकते। पर अंदर, “चिद्-अम्बर में स्थित।” बस यह बात असली है। यह वेदांत की एक बहुत मुक्त-कर-देने वाली, बिना-मानक की दृष्टि है।

541 · कामना से निष्काम-रूप, अकेला घूमता; स्व-आत्म से सदा तुष्ट

कामान्निष्कामरूपी संश्चरत्येकचारो मुनिः ।
स्वात्मनैव सदा तुष्टः स्वयं सर्वात्मना स्थितः ॥ 541 ॥

kāmān niṣkāma-rūpī saṁś caraty eka-cāro muniḥ · svātmanaiva sadā tuṣṭaḥ svayaṁ sarvātmanā sthitaḥ

शब्दार्थ: कामात् निष्काम-रूपी सन् · कामना से निष्काम-रूप होते हुए · चरति एक-चारः मुनिः · अकेला घूमता मुनि · स्व-आत्मना एव सदा तुष्टः · स्व-आत्मा से ही सदा तुष्ट · स्वयं सर्व-आत्मना स्थितः · ख़ुद सर्व-आत्मा के रूप में स्थित।

अर्थ: कामना से निष्काम-रूप, अकेला घूमता मुनि, स्व-आत्मा से ही सदा तुष्ट; ख़ुद सर्व-आत्मा के रूप में स्थित।

भावार्थ: गुरु एक प्यारा विरोधाभास देते हैं, “अकेला” चलते हुए भी “सर्व-आत्मा।”

बाहर अकेला घूमता है, अंदर सब का अंतर है। और काम कैसे? “निष्काम-रूप।” यानी जो भी , बिना “मुझे यह चाहिए” के। चाहिए नहीं। फिर भी आता है, प्रारब्ध के सहारे। और सदा-तुष्ट, स्व-आत्मा ही उसकी तृप्ति है।

542 · कहीं मूढ़, कहीं विद्वान; कहीं राजा-विभव, कहीं भ्रांत; कहीं पात्र, कहीं अवमत, सतत-परम-आनंद से सुखी

क्वचिन्मूढो विद्वान् क्वचिदपि महाराजविभवः क्वचिद्भ्रान्तः सौम्यः क्वचिदजगराचारकलितः ।
क्वचित्पात्रीभूतः क्वचिदवमतः क्वाप्यविदितः चरत्येवं प्राज्ञः सततपरमानन्दसुखितः ॥ 542 ॥

kvacin mūḍho vidvān kvacid api mahā-rāja-vibhavaḥ kvacid bhrāntaḥ saumyaḥ kvacid ajagarācāra-kalitaḥ · kvacit pātrī-bhūtaḥ kvacid avamataḥ kvāpy aviditaḥ caraty evaṁ prājñaḥ satata-paramānanda-sukhitaḥ

शब्दार्थ: क्व चित् मूढः विद्वान् क्व चित् अपि · कहीं मूढ़, कहीं विद्वान · महा-राज-विभवः क्व चित् · कहीं महा-राजा-विभव · भ्रान्तः सौम्यः क्व चित् · कहीं भ्रांत, सौम्य · अजगर-आचार-कलितः क्व चित् · कहीं अजगर-आचार (निश्चल पड़े रहना) · पात्री-भूतः क्व चित् · कहीं पात्र (पूज्य) · अवमतः क्व चित् · कहीं अवमत · अविदितः क्व अपि · कहीं अज्ञात · चरति एवं प्राज्ञः सतत-परम-आनन्द-सुखितः · इस तरह घूमता प्राज्ञ, सतत परम-आनंद से सुखी।

अर्थ: कहीं मूढ़, कहीं विद्वान; कहीं महा-राजा-विभव; कहीं भ्रांत, सौम्य; कहीं अजगर-आचार (निश्चल पड़े रहना); कहीं पात्र, कहीं अवमत, कहीं अज्ञात, इस तरह प्राज्ञ घूमता है, सतत परम-आनंद से सुखी।

भावार्थ: यह विवेकचूडामणि का एक सबसे यादगार श्लोक है, आठ “क्व चित्”, “कहीं तो, कहीं तो।”

ज्ञानी की ज़िंदगी एक रूप नहीं। आज कोई जगह वह “मूढ़” दिखता है, कल “विद्वान।” आज “राजा” लग रहा, कल “अजगर की तरह निश्चल।” आज “पूज्य,” कल “तिरस्कृत।” यह सब उसकी “अनुपस्थिति” है, “मुझे यह बनना है” वाली पकड़ नहीं। और इस सब के बीच, “सतत परम-आनंद से सुखी।” बाहर के रंग बदलते रहते हैं; अंदर एक ही।

543 · निर्धन फिर भी संतुष्ट, अकेला फिर भी महा-बल, नित्य-तृप्त भी अभुक्त, असम सम-दर्शी

निर्धनोऽपि सदा तुष्टोऽप्यसहायो महाबलः ।
नित्यतृप्तोऽप्यभुञ्जानोऽप्यसमः समदर्शनः ॥ 543 ॥

nirdhano’pi sadā tuṣṭo’py asahāyo mahā-balaḥ · nitya-tṛpto’py abhuñjāno’py asamaḥ sama-darśanaḥ

शब्दार्थ: निर्धनः अपि सदा तुष्टः · निर्धन हो कर भी सदा तुष्ट · असहायः अपि महा-बलः · असहाय हो कर भी महा-बल · नित्य-तृप्तः अपि अभुञ्जानः · नित्य-तृप्त हो कर भी न खाने वाला · अपि असमः सम-दर्शनः · असम हो कर भी सम-दर्शी।

अर्थ: निर्धन हो कर भी सदा तुष्ट; असहाय हो कर भी महा-बल; नित्य-तृप्त हो कर भी न खाने वाला; असम हो कर भी सम-दर्शी।

भावार्थ: गुरु चार सुंदर विरोधाभास देते हैं, हर एक ज्ञानी की ख़ास “स्थिति” बताता है।

निर्धन-तुष्ट: पैसा नहीं। फिर भी तृप्ति। असहाय-महा-बल: कोई साथी नहीं। फिर भी सबसे ताक़तवर। नित्य-तृप्त-अभुक्त: खाने पर निर्भर नहीं। असम-सम-दर्शी: जैसी ज़मीन पर कुछ नहीं। फिर भी सब को एक देखता है। ये सब आम तर्क के परे हैं, पर ज्ञानी में सहज।

544 · करते भी अकर्ता, फल भोगते भी अभोक्ता, शरीरी भी अशरीर, परिच्छिन्न भी सर्वग

अपि कुर्वन्नकुर्वाणश्चाभोक्ता फलभोग्यपि ।
शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः ॥ 544 ॥

api kurvann a-kurvāṇaś cābhoktā phala-bhogy api · śarīry apy a-śarīry eṣa paricchinno’pi sarva-gaḥ

शब्दार्थ: अपि कुर्वन् अकुर्वाणः · करते हुए भी अकर्ता · च अभोक्ता फल-भोगी अपि · और फल-भोगी हो कर भी अभोक्ता · शरीरी अपि अशरीरी एषः · शरीरी हो कर भी अशरीरी यह · परिच्छिन्नः अपि सर्व-गः · परिच्छिन्न (सीमित) हो कर भी सर्व-गामी।

अर्थ: करते हुए भी अकर्ता; फल भोगते हुए भी अभोक्ता; शरीरी हो कर भी अशरीरी; परिच्छिन्न हो कर भी सर्व-गामी।

भावार्थ: चार और विरोधाभास। यहाँ शिष्य ने पहले ही 491 में कहा था “द्रष्टा-कर्ता-भोक्ता से विभिन्न”, अब गुरु उसी बात को रोज़ की ज़ुबान में रखते हैं।

क्रिया करता हुआ दिखता है, पर “करता” नहीं। शरीर है, पर “शरीरी” नहीं। यह दोहरापन कोई “धोखा” नहीं। यह सच है। बाहर एक स्तर पर सब हो रहा, अंदर दूसरे स्तर पर कुछ नहीं। ज्ञानी दोनों स्तरों पर साथ है।

545 · अशरीर सदा सत्, ब्रह्म-वित् को प्रिय-अप्रिय, शुभ-अशुभ नहीं छूते

अशरीरं सदा सन्तमिमं ब्रह्मविदं क्वचित् ।
प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे ॥ 545 ॥

a-śarīraṁ sadā santam imaṁ brahma-vidaṁ kvacit · priyāpriye na spṛśatas tathaiva ca śubhāśubhe

शब्दार्थ: अशरीरं सदा सन्तम् इमं ब्रह्म-विदं क्व चित् · इस ब्रह्म-वेत्ता को, जो सदा अशरीर है · प्रिय-अप्रिये न स्पृशतः · प्रिय-अप्रिय नहीं छूते · तथा एव च शुभ-अशुभे · वैसे ही शुभ-अशुभ।

अर्थ: इस ब्रह्म-वेत्ता को, जो सदा अशरीर है, प्रिय-अप्रिय कहीं नहीं छूते, वैसे ही शुभ-अशुभ।

भावार्थ: गुरु एक संक्षिप्त, सटीक बात कहते हैं, “सदा अशरीर।”

यानी देह तो दिखता है, पर वह अपने को “देह” नहीं मानता, हमेशा। और इसलिए, प्रिय-अप्रिय, शुभ-अशुभ, ये दो जोड़े उसको नहीं छूते। क्योंकि छूने के लिए “देह” चाहिए, और देह तो वहाँ है ही नहीं। मानने में। यह ज्ञानी की रोज़ की बुनियाद है।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला और आख़िरी पन्ना: भाग 19, देह-त्याग, ज्ञान-अग्नि, “घटे नष्टे” (घड़ा फूटा, आकाश आकाश ही) टेक, क्षीर-क्षीरे (दूध में दूध) टेक। फिर बंधन-मोक्ष भी कल्पना, सब कुछ नहीं। “न निरोधो न उत्पत्तिः, न बद्धो न साधकः, न मुमुक्षुः न वै मुक्तः।” और अंत में, “शंकर-भारती विजयते।”

और एक काम जेब में रखिए: श्लोक 542, “क्व चित् मूढः, विद्वान् क्व चित्।” अपनी ज़िंदगी देखिए, आप कितने “रूप” बदलते हैं रोज़? और हर रूप में कोई “मैं ऐसा हूँ” वाली पकड़? पकड़ कम हो, हर रूप में आप एक हैं, पर हर रूप में अलग। यह असली स्वतंत्रता है।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, verbatim।

स्थायी URL: /vivekachudamani/guru-phir/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-23