विवेकचूडामणि
भाग 18 · गुरु फिर बोलते, ज्ञानी की चाल, मौन, अनियम · श्लोक 520-545
शिष्य को नत, प्रबुद्ध-तत्व और प्रमुदित-हृदय देख कर गुरु फिर बोले। हर अवस्था में ब्रह्म-प्रत्यय-संतति से जगत देखने का वचन। अपार आनंद पा लेने पर शून्यों में कौन रमे। और ज्ञानी की रोज़ की चाल, कहीं मूढ़, कहीं राजा, कहीं बालक, कहीं पिशाच।
पहले एक बात
शिष्य का लंबा स्तोत्र पूरा हो चुका है। गुरु ने उसे झुका हुआ, जागा हुआ और प्रसन्न-हृदय देखा, और तब उस महात्मा देशिक-इंद्र ने फिर एक परम-वचन कहा। अब कुछ जोड़ने को शेष नहीं रहा था, शिष्य पा चुका था। फिर भी एक बात बची थी, और वह थी जागे हुए के जीने का ढंग।

वह वचन यही है, कि अब इसी तरह स्थित रहे, हर अवस्था में सब में ब्रह्म ही दिखे, और आनंद का दूसरा स्रोत खोजने की कोई आवश्यकता न रहे। रोज़ की चाल का कोई नियम नहीं, बैठना, चलना, खाना, सोना, जिस समय जैसी इच्छा हो। ज्ञानी कहीं मूढ़-सा दिखता है, कहीं राजा-सा, कहीं बालक-सा, कहीं पिशाच-सा। यही उसका सच्चा लक्षण है, किसी एक साँचे में बँधा हुआ नहीं।
इस भाग की रूपरेखा
तीन हिस्से हैं। पहला, गुरु का पुनरारंभ और “सब ब्रह्म देख” का परम-वचन (520-527)। दूसरा, ज्ञानी का अनियम-स्वातंत्र्य (528-535)। तीसरा, ज्ञानी की रोज़ की रंगारंग चाल (536-545)। मुख्य खंभे ये श्लोक हैं, 521 (ब्रह्म-प्रत्यय-संतति), 522 (पूर्ण चन्द्र की रोशनी में चित्र-चन्द्र क्यों देखे), 528 (चलते-बैठे-लेटे, इच्छा से जीवन), 538 (निगमान्त-वीथि में क्रीड़ा), और 542 (कहीं मूढ़, कहीं विद्वान, कहीं अजगर-वत्, कहीं पात्र-वत्)।
इस तरह झुके हुए श्रेष्ठ शिष्य को, जो आत्म-सुख पा चुका, जिसका तत्व जाग उठा और जिसका हृदय प्रसन्न था, उसे देख कर वह महात्मा गुरु फिर बोले। और उनका पहला वचन एक ज़मीनी उपमा से उठता है। जैसे आँख वाले को हर ओर बस रूप ही दिखता है, और कुछ देख ही नहीं सकता, वैसे ही ब्रह्म-वेत्ता की बुद्धि को हर ओर बस ब्रह्म ही दिखता है। जगत तो ब्रह्म-प्रत्ययों की एक सतत धारा भर है, इसलिए प्रशांत मन से, अध्यात्म-दृष्टि से, सब अवस्थाओं में ब्रह्म ही देखना है। और फिर दूसरी उपमा आती है। जब आकाश में पूरा चन्द्र महा-आल्हादक हो कर चमक रहा हो, तब कागज़ पर बने चित्र-चन्द्र को कौन देखना चाहेगा। उसी तरह जिसे एक बार पर-आनंद-रस मिल गया, वह विद्वान भला छोटे-छोटे शून्यों में क्यों रमेगा।
520 · 521 · 522
इति नतमवलोक्य शिष्यवर्यं समधिगतात्मसुखं प्रबुद्धतत्त्वम् ।
प्रमुदितहृदयं स देशिकेन्द्रः पुनरिदमाह वचः परं महात्मा ॥ 520 ॥
ब्रह्मप्रत्ययसन्ततिर्जगदतो ब्रह्मैव तत्सर्वतः पश्याध्यात्मदृशा प्रशान्तमनसा सर्वास्ववस्थास्वपि ।
रूपादन्यदवेक्षितं किमभितश्चक्षुष्मतां दृश्यते तद्वद्ब्रह्मविदः सतः किमपरं बुद्धेर्विहारास्पदम् ॥ 521 ॥
कस्तां परानन्दरसानुभूति मृत्सृज्य शून्येषु रमेत विद्वान् ।
चन्द्रे महाल्हादिनि दीप्यमाने चित्रेन्दुमालोकयितुं क इच्छेत् ॥ 522 ॥
गुरु एक कसौटी रखते हैं। असत्-पदार्थ के अनुभव से न तो असली तृप्ति मिलती है, न दुख की हानि। ऐसी वस्तु के पीछे दौड़ने का कोई अर्थ नहीं, क्योंकि असली तृप्ति-स्रोत तो मिल ही चुका है। इसलिए वचन सीधा है, उस अद्वय-आनंद-रस से तृप्त रह, और सद्-आत्म-निष्ठा में सुख से बैठ। फिर एक स्निग्ध पंक्ति आती है। हर तरह स्वयं को ही देखता हुआ, स्वयं को अद्वय मानता हुआ, अपने ही आनंद का भोग करता हुआ, हे महा-मति, समय बिता। यह कोई कर्तव्य का आदेश नहीं, बस स्थिति का वर्णन है। और संबोधन देखने योग्य है, अब शिष्य मूढ़ नहीं रहा, गुरु उसे महा-मति कह कर पुकारते हैं।
523 · 524
असत्पदार्थानुभवेन किंचिन् न ह्यस्ति तृप्तिर्न च दुःखहानिः ।
तदद्वयानन्दरसानुभूत्या तृप्तः सुखं तिष्ठ सदात्मनिष्ठया ॥ 523 ॥
स्वमेव सर्वथा पश्यन्मन्यमानः स्वमद्वयम् ।
स्वानन्दमनुभुञ्जानः कालं नय महामते ॥ 524 ॥
अब गुरु मौन की ओर मोड़ते हैं। अखंड-बोध-स्वरूप, निर्विकल्प आत्मा में विकल्प डालना वैसा ही है जैसे आकाश में नगर की कल्पना, एक असंभव बात। इसलिए उस अद्वय-आनंद-मय आत्मा से सदा परम-शांति पा कर मौन को ही भज। और यह मौन केवल वाणी का रुकना नहीं। बुद्धि ही तो झूठी कल्पनाओं का स्रोत है, असत्-कल्प विकल्प वहीं से उठते हैं। इसलिए बुद्धि की वह तूष्णीम् अवस्था, उसकी चुप्पी, ही परम-उपशांति है, और ब्रह्म-वेत्ता महात्मा को इसी में अद्वय-आनंद-सुख निरंतर बहता रहता है। एक शब्द यहाँ निर्णायक है, निर्वासन। वासना भरा मौन भीतर शोर भरे रखता है, पर वासना-रहित मौन में भीतर भी शांति होती है, और जो आत्म-स्वरूप जान चुका, स्व-आनंद-रस पीने वाला है, उसके लिए इस मौन से बढ़ कर कोई सुख नहीं।
525 · 526 · 527
अखण्डबोधात्मनि निर्विकल्पे विकल्पनं व्योम्नि पुरप्रकल्पनम् ।
तदद्वयानन्दमयात्मना सदा शान्तिं परामेत्य भजस्व मौनम् ॥ 525 ॥
तूष्णीमवस्था परमोपशान्तिः बुद्धेरसत्कल्पविकल्पहेतोः ।
ब्रह्मात्मन ब्रह्मविदो महात्मनो यत्राद्वयानन्दसुखं निरन्तरम् ॥ 526 ॥
नास्ति निर्वासनान्मौनात्परं सुखकृदुत्तमम् ।
विज्ञातात्मस्वरूपस्य स्वानन्दरसपायिनः ॥ 527 ॥
यहाँ से दूसरा हिस्सा खुलता है, ज्ञानी का अनियम-स्वातंत्र्य। गुरु एक खुली बात कहते हैं। चलते, बैठे, लेटे, या किसी और तरह, विद्वान जैसी इच्छा हो वैसे रहे, क्योंकि वह तो सदा आत्म-रामी मुनि है। कोई विशेष ध्यान-मुद्रा नहीं, कोई उत्तम मुहूर्त नहीं, कोई निश्चित दिशा नहीं, बाहरी चाल चाहे कैसी भी हो, भीतर का बसना एक ही रहता है। और इसका कारण गहरा है। दूसरों को जानने के लिए तो देश, काल, आसन, दिशा, यम जैसे नियम लगते हैं, पर अपनी ही आत्मा का जानना स्व-वेदन है, सबसे निकट, सबसे निर्मल, उसमें कौनसा नियम टिकेगा। जैसे “यह घड़ा है” जानने के लिए बस अच्छी आँख और प्रकाश चाहिए, कोई व्रत-नियम नहीं, वैसे ही आत्मा भी नित्य-सिद्ध है, बस सही प्रमाण मिले तो अपने आप भासित हो जाती है, न देश की अपेक्षा, न काल की, न किसी शुद्धि की।
528 · 529 · 530 · 531
गच्छंस्तिष्ठन्नुपविशञ्छयानो वान्यथापि वा ।
यथेच्छया वेसेद्विद्वानात्नारामः सदा मुनिः ॥ 528 ॥
न देशकालासनदिग्यमादि लक्ष्याद्यपेक्षाप्रतिबद्धवृत्तेः ।
संसिद्धतत्त्वस्य महात्मनोऽस्ति स्ववेदने का नियमाद्यवस्था ॥ 529 ॥
घटोऽयमिति विज्ञातुं नियमः कोऽन्ववेक्षते ।
विना प्रमाणसुष्ठुत्वं यस्मिन् सति पदार्थधीः ॥ 530 ॥
अयमात्मा नित्यसिद्धः प्रमाणे सति भासते ।
न देशं नापि कालं न शुद्धिं वाप्यपेक्षते ॥ 531 ॥
गुरु इस बात को और सहज कर देते हैं। जैसे “मैं देवदत्त हूँ” यह जानने के लिए न दर्पण चाहिए न किसी और की पुष्टि, यह तो निरपेक्ष ज्ञान है, वैसे ही ब्रह्म-वेत्ता का “ब्रह्म मैं हूँ” का वेदन भी किसी की मोहर नहीं माँगता। और फिर वे आत्मा को सिद्ध करने के प्रयास को ही उलटा बता देते हैं। जिसके तेज से सूर्य की तरह पूरा जगत भासित होता है, उस आत्मा को भला कोई अनात्मक, असत्, तुच्छ वस्तु कैसे प्रकाशित करेगी। दीये से सूर्य को नहीं देखा जाता, सूर्य से ही दीया दिखता है। वेद, शास्त्र, पुराण और सब प्राणी भी तभी अर्थवान बनते हैं जब उन्हें जानने वाला कोई हो, तो उस मूल विज्ञाता को कौन अर्थ देगा। यही आत्मा स्वयं-ज्योति है, अनंत-शक्ति, अप्रमेय, सकल-अनुभूति का आधार, और जो इसे जान कर बंधन से मुक्त हो जाता है, वही ब्रह्म-वेत्ताओं में भी उत्तमोत्तम, विजयी होता है।
532 · 533 · 534 · 535
देवदत्तोऽहमित्येतद्विज्ञानं निरपेक्षकम् ।
तद्वद्ब्रह्मविदोऽप्यस्य ब्रह्माहमिति वेदनम् ॥ 532 ॥
भानुनेव जगत्सर्वं भासते यस्य तेजसा ।
अनात्मकमसत्तुच्छं किं नु तस्यावभासकम् ॥ 533 ॥
वेदशास्त्रपुराणानि भूतानि सकलान्यपि ।
येनार्थवन्ति तं किन्नु विज्ञातारं प्रकाशयेत् ॥ 534 ॥
एष स्वयंज्योतिरनन्तशक्तिः आत्माप्रमेयः सकलानुभूतिः ।
यमेव विज्ञाय विमुक्तबन्धो जयत्ययं ब्रह्मविदुत्तमोत्तमः ॥ 535 ॥
अब तीसरा हिस्सा शुरू होता है, ज्ञानी की रोज़ की रंगारंग चाल। पहले गुरु एक चित्र खींचते हैं, चार निषेध और दो स्वीकार। वह न खिन्न होता है, न विषयों से ख़ुश; न किसी से जुड़ता है, न विरक्त। बस स्व में ही सदा क्रीड़ा करता है, स्व में ही नंदता है, निरंतर-आनंद-रस से तृप्त रहता है। फिर एक स्निग्ध उपमा आती है। जैसे बालक भूख और देह की पीड़ा भूल कर खिलौने में डूब जाता है, वैसे ही विद्वान आत्म-रस में रमता है, निर्मम, निरह, सुखी। और इस सबका सबसे जीवंत चित्र अगले श्लोक में है। बिना दीनता के मिली भिक्षा से भोजन, नदी के पानी से प्यास, श्मशान या वन में निडर नींद, ज़मीन ही बिस्तर, वस्त्र शायद कोई नहीं या दिशाएँ ही वस्त्र, और वेदान्त की गलियों में विचरण। इस सबके बीच ज्ञानियों की असली क्रीड़ा परम-ब्रह्म में चलती रहती है।
536 · 537 · 538
न खिद्यते नो विषयैः प्रमोदते न सज्जते नापि विरज्यते च ।
स्वस्मिन्सदा क्रीडति नन्दति स्वयं निरन्तरानन्दरसेन तृप्तः ॥ 536 ॥
क्षुधां देहव्यथां त्यक्त्वा बालः क्रीडति वस्तुनिः ।
तथैव विद्वान् रमते निर्ममो निरहं सुखी ॥ 537 ॥
चिन्ताशून्यमदैन्यभैक्षमशनं पानं सरिद्वारिषु स्वातन्त्र्येण निरङ्कुशा स्थितिरभीर्निद्रा श्मशाने वने ।
वस्त्रं क्षालनशोषणादिरहितं दिग्वास्तु शय्या मही संचारो निगमान्तवीथिषु विदां क्रीडा परे ब्रह्मणि ॥ 538 ॥
गुरु एक नई उपमा देते हैं, शरीर एक वाहन है। ज्ञानी इस शरीर रूपी वाहन का सहारा ले कर सामने आए सब विषयों को बच्चे की तरह, दूसरों की इच्छा से भोग लेता है, पर वह अव्यक्त-लिंग है, बाहर से अनासक्त, कोई चिह्न नहीं जिससे पहचाना जाए कि यह ज्ञानी है। इसीलिए उसका बाहरी रूप एक नहीं रहता। कभी वह दिग्-अम्बर, दिशाएँ ही जिसका वस्त्र, कभी वस्त्र पहने, कभी केवल चमड़ी ओढ़े, पर भीतर सदा चिद्-अम्बर में स्थित। कभी उन्मत्त की तरह, कभी बालक की तरह, कभी पिशाच की तरह धरती पर विचरता है। बाहर से कोई साँचा नहीं, पर भीतर एक ही बात सच है, वह आत्मा में बसा हुआ है। कामना से तो वह निष्काम-रूप हो चुका, अकेला विचरता मुनि, स्व-आत्मा से ही सदा तुष्ट, और स्वयं सर्व-आत्मा के रूप में स्थित।
539 · 540 · 541
विमानमालम्ब्य शरीरमेतद् भुनक्त्यशेषान्विषयानुपस्थितान् ।
परेच्छया बालवदात्मवेत्ता योऽव्यक्तलिङ्गोऽननुषक्तबाह्यः ॥ 539 ॥
दिगम्बरो वापि च साम्बरो वा त्वगम्बरो वापि चिदम्बरस्थः ।
उन्मत्तवद्वापि च बालवद्वा पिशाचवद्वापि चरत्यवन्याम् ॥ 540 ॥
कामान्निष्कामरूपी संश्चरत्येकचारो मुनिः ।
स्वात्मनैव सदा तुष्टः स्वयं सर्वात्मना स्थितः ॥ 541 ॥
अब वह श्लोक आता है जो पूरे भाग का मर्म है, आठ बार “कहीं तो”। किसी जगह वह मूढ़ दिखता है, किसी जगह विद्वान; कहीं महा-राजा-सा विभव लिए, कहीं भ्रांत और सौम्य; कहीं अजगर की तरह निश्चल पड़ा हुआ; कहीं पूज्य पात्र बना हुआ, कहीं तिरस्कृत, कहीं बिलकुल अज्ञात। इस तरह प्राज्ञ घूमता रहता है, और इस सबके बीच सतत परम-आनंद से सुखी रहता है। बाहर के रंग बदलते रहते हैं, भीतर एक ही रहता है, क्योंकि “मुझे यह बनना है” वाली पकड़ उसमें है ही नहीं। और इसी से कई विरोधाभास सहज हो जाते हैं। निर्धन हो कर भी सदा तुष्ट, असहाय हो कर भी महा-बल, नित्य-तृप्त हो कर भी न खाने वाला, और सब से असम हो कर भी सबको सम-दृष्टि से देखने वाला।
542 · 543
क्वचिन्मूढो विद्वान् क्वचिदपि महाराजविभवः क्वचिद्भ्रान्तः सौम्यः क्वचिदजगराचारकलितः ।
क्वचित्पात्रीभूतः क्वचिदवमतः क्वाप्यविदितः चरत्येवं प्राज्ञः सततपरमानन्दसुखितः ॥ 542 ॥
निर्धनोऽपि सदा तुष्टोऽप्यसहायो महाबलः ।
नित्यतृप्तोऽप्यभुञ्जानोऽप्यसमः समदर्शनः ॥ 543 ॥
गुरु इस चित्र को अंतिम दो विरोधाभासों से पूरा करते हैं। वह क्रिया करता हुआ दिखता है, पर भीतर अकर्ता है; फल भोगता हुआ दिखता है, पर भोक्ता नहीं; शरीर रखता है, पर शरीरी नहीं; परिच्छिन्न दिखता है, पर सर्व-गामी है। यह दोहरापन कोई छल नहीं, यही सत्य है, बाहर एक स्तर पर सब हो रहा है, भीतर दूसरे स्तर पर कुछ नहीं हो रहा। और इसकी जड़ एक ही बात में है, यह ब्रह्म-वेत्ता सदा अशरीर है, देह को कभी अपना नहीं मानता। इसीलिए न प्रिय-अप्रिय उसे छूते हैं, न शुभ-अशुभ, क्योंकि छूने के लिए देह चाहिए, और देह तो उसके मानने में है ही नहीं। यही ज्ञानी की रोज़ की बुनियाद है।
544 · 545
अपि कुर्वन्नकुर्वाणश्चाभोक्ता फलभोग्यपि ।
शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः ॥ 544 ॥
अशरीरं सदा सन्तमिमं ब्रह्मविदं क्वचित् ।
प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे ॥ 545 ॥
आगे का पन्ना
सीधा अगला और अंतिम पन्ना भाग 19 है, देह-त्याग, ज्ञान-अग्नि, “घटे नष्टे” (घड़ा फूटने पर आकाश आकाश ही रहता है) की टेक, और क्षीर-क्षीरे (दूध में दूध) की टेक। फिर बंधन और मोक्ष भी कल्पना ठहरते हैं, अंततः कुछ नहीं रहता। “न निरोधो न उत्पत्तिः, न बद्धो न साधकः, न मुमुक्षुः न वै मुक्तः।” और अंत में, “शंकर-भारती विजयते।”
इस भाग का मर्म श्लोक 542 में है, “क्व चित् मूढः, विद्वान् क्व चित्।” ज्ञानी हर रूप में रहता है, फिर भी किसी रूप में “मैं ऐसा हूँ” की पकड़ नहीं रखता। पकड़ का यही अभाव उसकी सच्ची स्वतंत्रता है।