विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 9 · तत् त्वम् असि · श्लोक 241-266
किताब का शिखर। वेदान्त का सबसे बड़ा वाक्य, “तत् त्वम् असि”, आप वही है। एक छोटा-सा “आप”, और एक असीम “वह”, गुरु दिखाते हैं कि इन दोनों के बीच की हर परत, असल में, थी ही नहीं।
पहले एक बात
विवेकचूडामणि अपने शिखर पर पहुँचती है। पूरी किताब इसी एक वाक्य की तैयारी थी, “तत् त्वम् असि”, आप वही है। यह चार महावाक्यों में से एक है, छान्दोग्य उपनिषद् से, जहाँ ऋषि उद्दालक यह अपने बेटे श्वेतकेतु से नौ बार कहते हैं।
पर यहाँ एक असली समस्या है, और गुरु उसे छिपाते नहीं। “तत्” यानी ब्रह्म, असीम, सबका कारण, सर्वव्यापक। और “त्वम्” यानी आप, एक छोटा, सीमित, फँसा हुआ-सा जीव। ये दोनों तो आमने-सामने उल्टे लगते हैं! तो “आप वही है” का मतलब क्या?
इस भाग का पहला हिस्सा (241-253) ठीक यही सुलझाता है, बहुत सुंदर तर्क से। फिर बीच में दस श्लोकों की एक लड़ी आती है (254-263), हर एक “ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि” पर बंद होता, हर बार ब्रह्म का एक नया पहलू, और हर बार वही टेक: वह ब्रह्म, आप है, इसे अपने भीतर बसा। इसे एक मंत्र की तरह, एक धड़कन की तरह पढ़िए।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। तीन हिस्से, दो शब्दों का मेल कैसे (241-253), दस-श्लोकी “भावयात्मनि” टेक (254-263), और समापन (264-266)। असली खंभे: 242 (जुगनू और सूरज), 248 (देवदत्त का उदाहरण), 254-263 की पूरी लड़ी। हर श्लोक पर anchor है।
241 · दो शब्द, “तत्” और “त्वम्”
तत्त्वंपदाभ्यामभिधीयमानयोः ब्रह्मात्मनोः शोधितयोर्यदीत्थम् ।
श्रुत्या तयोस्तत्त्वमसीति सम्यग् एकत्वमेव प्रतिपाद्यते मुहुः ॥ 241 ॥
tat-tvaṁ-padābhyām abhidhīyamānayoḥ brahmātmanoḥ śodhitayor yad ittham · śrutyā tayos tat tvam asīti samyag ekatvam eva pratipādyate muhuḥ
शब्दार्थ: तत्-त्वम्-पदाभ्याम् · “तत्” और “त्वम्”, इन दो शब्दों से · अभिधीयमानयोः · कहे जा रहे · ब्रह्म-आत्मनोः शोधितयोः · शुद्ध किए गए ब्रह्म और आत्मा का · श्रुत्या “तत् त्वम् असि” इति · श्रुति “आप वही है” के द्वारा · एकत्वम् एव प्रतिपाद्यते मुहुः · बार-बार बस एकता ही बताई जाती है।
अर्थ: “तत्” और “त्वम्”, इन दो शब्दों से कहे जा रहे, और ठीक से शुद्ध किए गए, ब्रह्म और आत्मा का, श्रुति “तत् त्वम् असि” के द्वारा बार-बार बस एकता ही बताती है।
भावार्थ: गुरु महावाक्य को उसके दो शब्दों में खोल देते हैं। “तत्”, वह, यानी ब्रह्म, सबका मूल। “त्वम्”, आप, यानी आपका आत्मा। और श्रुति का काम बस एक है, यह दिखाना कि ये दोनों एक हैं।
एक शब्द ध्यान देने लायक़ है, “शोधितयोः”, शुद्ध किए गए। दोनों शब्दों को पहले “साफ़” करना पड़ता है, उन पर चढ़ी ग़लत परतें हटानी पड़ती हैं, तभी उनकी एकता दिखती है। अगले श्लोक यही सफ़ाई करेंगे। और “मुहुः”, बार-बार। यह बात एक बार कह कर छोड़ी नहीं जाती; उपनिषद् इसे नौ बार दोहराता है, क्योंकि यह सुनने की नहीं। भीतर बैठने की चीज़ है।
242 · जुगनू और सूरज
ऐक्यं तयोर्लक्षितयोर्न वाच्ययोः निगद्यतेऽन्योन्यविरुद्धधर्मिणोः ।
खद्योतभान्वोरिव राजभृत्ययोः कूपाम्बुराश्योः परमाणुमेर्वोः ॥ 242 ॥
aikyaṁ tayor lakṣitayor na vācyayoḥ nigadyate’nyonya-viruddha-dharmiṇoḥ · khadyota-bhānvor iva rāja-bhṛtyayoḥ kūpāmbu-rāśyoḥ paramāṇu-mervoḥ
शब्दार्थ: ऐक्यं तयोः लक्षितयोः · उन दोनों की एकता, उनके लक्षित (इशारे वाले) अर्थ की · न वाच्ययोः · शब्दशः अर्थ की नहीं · अन्योन्य-विरुद्ध-धर्मिणोः · आपस में उल्टे गुणों वाले · खद्योत-भानु · जुगनू और सूरज · राज-भृत्य · राजा और नौकर · कूप-अम्बु-राशि · कुएँ का पानी और समुद्र · परमाणु-मेरु · एक कण और मेरु पर्वत।
अर्थ: उन दोनों की एकता उनके लक्षित (इशारे वाले) अर्थ की कही जाती है, शब्दशः अर्थ की नहीं। क्योंकि शब्दशः तो वे आपस में उल्टे गुणों वाले हैं, जैसे जुगनू और सूरज, राजा और नौकर, कुएँ का पानी और समुद्र, एक कण और मेरु पर्वत।
भावार्थ: गुरु समस्या को पूरी ईमानदारी से सामने रखते हैं। शब्दों को सीधे-सीधे लो, तो “तत्” और “त्वम्” बिल्कुल उल्टे हैं, और गुरु चार ज़ोरदार जोड़े गिनाते हैं: जुगनू और सूरज, नौकर और राजा, कुएँ का पानी और समुद्र, एक कण और मेरु पर्वत।
तो इन उल्टे जोड़ों को “एक” कैसे कहें? चाबी एक शब्द में है, “लक्षित”, इशारे वाला अर्थ। शब्द के दो अर्थ होते हैं, सीधा (वाच्य) और इशारे वाला (लक्ष्य)। सीधे अर्थ में जुगनू और सूरज अलग हैं, एक नन्हा, एक विशाल। पर अगर दोनों के “इशारे वाले अर्थ” को देखें, दोनों में जो “रोशनी” है, वह तत्व, तो वह एक ही है, बस मात्रा अलग। “तत् त्वम् असि” शरीर-मन वाले छोटे “आप” की बात नहीं कर रहा; वह उस “आप” के भीतर की रोशनी, चेतना, की बात कर रहा है। और वह रोशनी, और ब्रह्म की रोशनी, एक ही है।
243 · विरोध, सिर्फ़ उपाधि का
तयोर्विरोधोऽयमुपाधिकल्पितो न वास्तवः कश्चिदुपाधिरेषः ।
ईशस्य माया महदादिकारणं जीवस्य कार्यं शृणु पञ्चकोशम् ॥ 243 ॥
tayor virodho’yam upādhi-kalpito na vāstavaḥ kaścid upādhir eṣaḥ · īśasya māyā mahad-ādi-kāraṇaṁ jīvasya kāryaṁ śṛṇu pañca-kośam
शब्दार्थ: तयोः विरोधः उपाधि-कल्पितः · उन दोनों का विरोध उपाधि से गढ़ा हुआ · न वास्तवः · असली नहीं · ईशस्य माया · ईश्वर की उपाधि, माया · महद्-आदि-कारणं · महत् आदि का कारण · जीवस्य कार्यं पञ्च-कोशम् · जीव की उपाधि, कार्य-रूप पाँच कोश।
अर्थ: उन दोनों का यह विरोध उपाधि से गढ़ा हुआ है, असली नहीं। और ये उपाधियाँ हैं, ईश्वर की उपाधि माया (महत् आदि का कारण), और जीव की उपाधि कार्य-रूप पाँच कोश, यह सुन।
भावार्थ: गुरु विरोध की जड़ बता देते हैं, वह “उपाधि-कल्पित” है, उपाधि से गढ़ा हुआ। और दो उपाधियाँ गिनाते हैं।
“तत्” (ब्रह्म) “ईश्वर” दिखता है क्योंकि उस पर एक उपाधि चढ़ी है, माया, सारी सृष्टि का कारण। “त्वम्” (आत्मा) “जीव” दिखता है क्योंकि उस पर एक उपाधि चढ़ी है, पाँच कोश। दोनों उपाधियाँ हटा दो, और जो बचता है, दोनों जगह वही एक है। यह श्लोक 242 की “रोशनी” वाली बात को और साफ़ कर देता है: फ़र्क ख़ुद रोशनी में नहीं। उस पर चढ़े आवरण में है।
244 · राजा और सिपाही
एतावुपाधी परजीवयोस्तयोः सम्यङ्निरासे न परो न जीवः ।
राज्यं नरेन्द्रस्य भटस्य खेटक् तयोरपोहे न भटो न राजा ॥ 244 ॥
etāv upādhī para-jīvayos tayoḥ samyaṅ-nirāse na paro na jīvaḥ · rājyaṁ narendrasya bhaṭasya kheṭak tayor apohe na bhaṭo na rājā
शब्दार्थ: एतौ उपाधी पर-जीवयोः · ये दो उपाधियाँ, पर (ब्रह्म) और जीव की · सम्यक्-निरासे · ठीक से हटा देने पर · न परः न जीवः · न पर रहता है, न जीव · राज्यं नरेन्द्रस्य · राजा की उपाधि, राज्य · भटस्य खेटकः · सिपाही की उपाधि, ढाल · तयोः अपोहे न भटः न राजा · दोनों हट जाएँ तो न सिपाही, न राजा।
अर्थ: ये दो उपाधियाँ हैं, पर (ब्रह्म) और जीव की। इन्हें ठीक से हटा देने पर न “पर” रहता है, न “जीव”। राजा की उपाधि है उसका राज्य, सिपाही की उपाधि है उसकी ढाल। दोनों हट जाएँ, तो न सिपाही बचता है, न राजा, बस दो इंसान।
भावार्थ: यह श्लोक 242 के “राजा और नौकर” जोड़े को पूरा खोल देता है, और यह एक बेहद सुंदर तस्वीर है।
एक राजा और एक सिपाही, कितने अलग। पर वे “राजा” और “सिपाही” क्यों हैं? राजा अपने राज्य, सिंहासन, मुकुट की वजह से। सिपाही अपनी वर्दी, ढाल की वजह से। अब कल्पना कीजिए, दोनों से उनकी ये चीज़ें ले लो। मुकुट हटा, ढाल हटी। अब क्या बचा? दो इंसान, और इंसान के नाते, दोनों बराबर, दोनों एक जैसे। “राजा-पन” और “सिपाही-पन” उनमें नहीं थे; वे बस उधार की उपाधियाँ थीं। ठीक यही “तत्” और “त्वम्” के साथ है। माया हटी, पाँच कोश हटे, न “ईश्वर” बचा, न “जीव।” बस एक शुद्ध चेतना, दोनों जगह एक।
245 · श्रुति ख़ुद दोनों को नकारती है
अथात आदेश इति श्रुतिः स्वयं निषेधति ब्रह्मणि कल्पितं द्वयम् ।
श्रुतिप्रमाणानुगृहीतबोधात् तयोर्निरासः करणीय एव ॥ 245 ॥
athāta ādeśa iti śrutiḥ svayaṁ niṣedhati brahmaṇi kalpitaṁ dvayam · śruti-pramāṇānugṛhīta-bodhāt tayor nirāsaḥ karaṇīya eva
शब्दार्थ: “अथ अतः आदेशः” इति श्रुतिः · “अब इसलिए यह उपदेश”, यह श्रुति-वचन (नेति-नेति वाला) · स्वयं निषेधति · ख़ुद नकार देती है · ब्रह्मणि कल्पितं द्वयम् · ब्रह्म में गढ़ी हुई दोनों उपाधियाँ · श्रुति-प्रमाण-अनुगृहीत-बोधात् · श्रुति-प्रमाण से पुष्ट बोध से · तयोः निरासः करणीयः एव · दोनों का हटाना करना ही चाहिए।
अर्थ: “अब इसलिए यह उपदेश”, ऐसा कहती श्रुति (बृहदारण्यक का नेति-नेति वाला वचन) ख़ुद ब्रह्म में गढ़ी हुई दोनों उपाधियों को नकार देती है। इसलिए, श्रुति-प्रमाण से पुष्ट बोध के सहारे, उन दोनों को हटा देना ही चाहिए।
भावार्थ: गुरु अपनी बात के लिए श्रुति को गवाह बनाते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध “नेति-नेति” वचन, “यह नहीं। यह नहीं”, ख़ुद यही काम करता है: ब्रह्म पर चढ़ी हर परत को एक-एक कर के नकारता जाता है।
यानी जो काम गुरु कर रहे हैं, दोनों उपाधियाँ हटाना, वह कोई नई बात नहीं; श्रुति ख़ुद यही करती है। और एक शब्द ज़रूरी है, “करणीयः एव”, करना ही चाहिए। यह सिर्फ़ समझने की बात नहीं; उपाधियाँ हटाना एक काम है, जो शिष्य को ख़ुद करना है, बार-बार, हर परत के बारे में साफ़ देख कर “यह मैं नहीं।”
246 · दृश्य को हटा कर, फिर वह एक
नेदं नेदं कल्पितत्वान्न सत्यं रज्जुदृष्टव्यालवत्स्वप्नवच्च ।
इत्थं दृश्यं साधुयुक्त्या व्यपोह्य ज्ञेयः पश्चादेकभावस्तयोर्यः ॥ 246 ॥
nedaṁ nedaṁ kalpitatvān na satyaṁ rajju-dṛṣṭa-vyālavat svapnavac ca · itthaṁ dṛśyaṁ sādhu-yuktyā vyapohya jñeyaḥ paścād eka-bhāvas tayor yaḥ
शब्दार्थ: न इदं न इदं · “यह नहीं। यह नहीं” · कल्पितत्वात् न सत्यम् · गढ़ा हुआ होने से सच नहीं · रज्जु-दृष्ट-व्याल-वत् · रस्सी पर दिखे साँप की तरह · स्वप्न-वत् · सपने की तरह · दृश्यं साधु-युक्त्या व्यपोह्य · दृश्य को अच्छे तर्क से हटा कर · ज्ञेयः पश्चात् एक-भावः तयोः · फिर दोनों का एक-भाव जानना चाहिए।
अर्थ: “यह नहीं। यह नहीं”, गढ़ा हुआ होने से यह सच नहीं। जैसे रस्सी पर दिखा साँप, जैसे सपना। इस तरह दृश्य को अच्छे तर्क से हटा कर, फिर उन दोनों का जो एक-भाव है, उसे जानना चाहिए।
भावार्थ: गुरु पूरी विधि को दो कदमों में रख देते हैं। पहला कदम, “हटाना।” हर दिखने वाली चीज़ के बारे में, सच्चे विवेक से, यह देख लेना, “यह गढ़ा हुआ है, यह असली नहीं”, रस्सी के साँप की तरह, सपने की तरह।
दूसरा कदम, “पश्चात्”, उसके बाद। जब सारा दृश्य हट जाए, तब जो बचे, उस “एक-भाव” को जानना। ध्यान दीजिए क्रम, पहले हटाना, फिर जानना। यह नेति-नेति का सार है: आप सीधे ब्रह्म को “पकड़” नहीं सकते; आप बस वह सब हटा सकते हैं जो ब्रह्म नहीं। और जब सब हट जाए, जो रह जाता है, वही वह है। मूर्तिकार पत्थर से वही हटाता है जो मूर्ति नहीं।
247 · न पूरा छोड़ना, न पूरा रखना
ततस्तु तौ लक्षणया सुलक्ष्यौ तयोरखण्डैकरसत्वसिद्धये ।
नालं जहत्या न तथाजहत्या किन्तूभयार्थात्मिकयैव भाव्यम् ॥ 247 ॥
tatas tu tau lakṣaṇayā su-lakṣyau tayor akhaṇḍaika-rasatva-siddhaye · nālaṁ jahatyā na tathājahatyā kintūbhayārthātmikayaiva bhāvyam
शब्दार्थ: तौ लक्षणया सु-लक्ष्यौ · वे दोनों लक्षणा (इशारे) से अच्छी तरह समझे जाते हैं · अखण्ड-एक-रसत्व-सिद्धये · उनकी अखंड एकता सिद्ध करने के लिए · न अलं जहत्या · न पूरी तरह छोड़ने वाली लक्षणा से काम चलता है · न अजहत्या · न बिल्कुल कुछ न छोड़ने वाली से · उभय-अर्थ-आत्मिकया एव भाव्यम् · दोनों अर्थ वाली लक्षणा से ही समझना चाहिए।
अर्थ: उन दोनों (“तत्” और “त्वम्”) को लक्षणा से ठीक समझा जाता है, उनकी अखंड एकता सिद्ध करने के लिए। न पूरी तरह छोड़ने वाली लक्षणा से काम चलता है, न बिल्कुल कुछ न छोड़ने वाली से, बल्कि दोनों अर्थों को सँभालने वाली लक्षणा से ही।
भावार्थ: यह श्लोक थोड़ा तकनीकी है, पर इसका दिल सरल है। शब्दों के “इशारे वाले अर्थ” (लक्षणा) को निकालने के तीन तरीक़े हैं, और गुरु बीच वाला चुनते हैं।
एक, “जहत्” लक्षणा: शब्द का सीधा अर्थ पूरा छोड़ दो। दूसरा, “अजहत्” लक्षणा: कुछ भी मत छोड़ो। दोनों यहाँ काम नहीं आते। तीसरा, “भाग-त्याग” लक्षणा: शब्द के अर्थ का एक हिस्सा छोड़ो, एक रखो। “तत् त्वम् असि” में, “आप” शब्द का जो हिस्सा “शरीर-मन-छोटा जीव” है, उसे छोड़ दो; जो हिस्सा “चेतना” है, उसे रखो। उसी तरह “वह” का “दूर का ईश्वर” हिस्सा छोड़ो, “चेतना” हिस्सा रखो। दोनों का बचा हुआ हिस्सा, चेतना, एक ही निकलता है। अगला श्लोक यह एक प्यारे उदाहरण से समझाएगा।
248 · “यह वही देवदत्त है”
स देवदत्तोऽयमितीह चैकता विरुद्धधर्मांशमपास्य कथ्यते ।
यथा तथा तत्त्वमसीतिवाक्ये विरुद्धधर्मानुभयत्र हित्वा ॥ 248 ॥
sa devadatto’yam itīha caikatā viruddha-dharmāṁśam apāsya kathyate · yathā tathā tat tvam asīti vākye viruddha-dharmān ubhayatra hitvā
शब्दार्थ: “सः देवदत्तः अयम्” इति · “वह देवदत्त, यह है”, ऐसा कहने में · एकता विरुद्ध-धर्म-अंशम् अपास्य कथ्यते · विरोधी गुणों वाला हिस्सा हटा कर एकता कही जाती है · यथा तथा · जैसे (वैसे ही) · “तत् त्वम् असि” इति वाक्ये · “तत् त्वम् असि” वाक्य में · विरुद्ध-धर्मान् उभयत्र हित्वा · दोनों ओर के विरोधी गुण छोड़ कर।
अर्थ: “वह देवदत्त, यह है”, ऐसा कहने में, विरोधी गुणों वाला हिस्सा हटा कर ही एकता कही जाती है। ठीक वैसे ही “तत् त्वम् असि” वाक्य में, दोनों ओर के विरोधी गुण छोड़ कर (एकता समझी जाती है)।
भावार्थ: यह वह उदाहरण है जो पूरी बात को एक झटके में साफ़ कर देता है, और यह रोज़ का है।
मान लीजिए आप किसी देवदत्त को बरसों पहले, किसी और शहर में, जवानी में मिले थे। आज आप उसे यहाँ, इस शहर में, बूढ़ा देखते हैं। आप कहते हैं, “अरे, यह वही देवदत्त है!” अब रुकिए, “वह देवदत्त” (पुराना, वहाँ, जवान) और “यह देवदत्त” (अब, यहाँ, बूढ़ा), समय अलग, जगह अलग, उम्र अलग। फिर भी आप दोनों को “एक” कहते हैं। कैसे? आप अपने आप, बिना सोचे, विरोधी हिस्से (समय, जगह, उम्र) हटा देते हैं, और जो बचता है, वही एक व्यक्ति, उसे पहचान लेते हैं। “तत् त्वम् असि” ठीक यही माँगता है: “आप” से समय-जगह-शरीर का हिस्सा हटाओ, “वह” से दूरी-विशालता का हिस्सा हटाओ, और जो बचता है, वही एक चेतना, “अरे, यह तो वही है!”
249 · सौ महावाक्य, एक ही बात
संलक्ष्य चिन्मात्रतया सदात्मनोः अखण्डभावः परिचीयते बुधैः ।
एवं महावाक्यशतेन कथ्यते ब्रह्मात्मनोरैक्यमखण्डभावः ॥ 249 ॥
saṁlakṣya cin-mātratayā sad-ātmanoḥ akhaṇḍa-bhāvaḥ paricīyate budhaiḥ · evaṁ mahā-vākya-śatena kathyate brahmātmanor aikyam akhaṇḍa-bhāvaḥ
शब्दार्थ: संलक्ष्य चिन्-मात्रतया · सिर्फ़ चेतना-रूप में पहचान कर · सद्-आत्मनोः अखण्ड-भावः · सद् और आत्मा का अखंड एक-भाव · परिचीयते बुधैः · ज्ञानी जान लेते हैं · महावाक्य-शतेन · सौ महावाक्यों से · ब्रह्म-आत्मनोः ऐक्यम् · ब्रह्म और आत्मा की एकता।
अर्थ: सिर्फ़ “चेतना-रूप” में पहचान कर, सद् और आत्मा के अखंड एक-भाव को ज्ञानी जान लेते हैं। इस तरह सौ महावाक्यों से ब्रह्म और आत्मा की एकता, उनका अखंड एक-भाव, कहा जाता है।
भावार्थ: गुरु पहले हिस्से (तर्क वाला) को समेटते हैं। दोनों, “तत्” और “त्वम्”, में जो साझा है, वह है “चिन्-मात्रता”, बस चेतना-होना। उसी एक धागे से दोनों एक हो जाते हैं।
और एक प्यारी बात, “महावाक्य-शतेन”, सौ महावाक्यों से। उपनिषदों में बस “तत् त्वम् असि” अकेला महावाक्य नहीं। “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ब्रह्म हूँ), “प्रज्ञानं ब्रह्म” (चेतना ब्रह्म है), “अयम् आत्मा ब्रह्म” (यह आत्मा ब्रह्म है), और ऐसे कई। गुरु कहते हैं, ये सब, सौ अलग-अलग वाक्य, आख़िर में एक ही बात कहते हैं: ब्रह्म और आपका आत्मा, दो नहीं। सौ रास्ते, एक ही दरवाज़ा।
250 · “ब्रह्म मैं हूँ”, साफ़ बुद्धि से जान
अस्थूलमित्येतदसन्निरस्य सिद्धं स्वतो व्योमवदप्रतर्क्यम् ।
अतो मृषामात्रमिदं प्रतीतं जहीहि यत्स्वात्मतया गृहीतम्
ब्रह्माहमित्येव विशुद्धबुद्ध्या विद्धि स्वमात्मानमखण्डबोधम् ॥ 250 ॥
asthūlam ity etad asan nirasya siddhaṁ svato vyomavad apratarkyam · ato mṛṣā-mātram idaṁ pratītaṁ jahīhi yat svātmatayā gṛhītam · brahmāham ity eva viśuddha-buddhyā viddhi svam ātmānam akhaṇḍa-bodham
शब्दार्थ: “अस्थूलम्” इति असत् निरस्य · “स्थूल नहीं” आदि कह कर असत् को हटा कर · सिद्धं स्वतः · अपने आप सिद्ध · व्योम-वत् अप्रतर्क्यम् · आकाश की तरह, तर्क से परे · मृषा-मात्रम् इदं प्रतीतं जहीहि · इस झूठे दिखावे को छोड़ दे · यत् स्व-आत्मतया गृहीतम् · जो “मेरा आत्मा” समझ कर पकड़ा है · “ब्रह्म अहम्” इति विशुद्ध-बुद्ध्या विद्धि · “मैं ब्रह्म हूँ”, साफ़ बुद्धि से जान।
अर्थ: “स्थूल नहीं। सूक्ष्म नहीं”, ऐसे कह कर असत् को हटा देने पर, [ब्रह्म] अपने आप सिद्ध है, आकाश की तरह, तर्क से परे। इसलिए, इस झूठे दिखावे को छोड़ दे, जिसे तूने “मेरा आत्मा” समझ कर पकड़ रखा है। “मैं ब्रह्म हूँ”, साफ़ बुद्धि से अपने आत्मा को अखंड बोध जान।
भावार्थ: गुरु बृहदारण्यक का “अस्थूलम्, अनणु” वाला वर्णन याद दिलाते हैं, ब्रह्म न स्थूल है, न सूक्ष्म, न यह, न वह। हर “यह नहीं” के बाद, ब्रह्म “अपने आप सिद्ध” रह जाता है, आकाश की तरह। आकाश को कोई “बनाता” नहीं; उसे साबित नहीं करना पड़ता; जब बाक़ी सब हट जाए, आकाश बस होता है।
और फिर गुरु एक सीधा आदेश देते हैं, दो हिस्सों में। एक, “छोड़ दे” वह झूठा “मैं” जिसे तूने आत्मा समझ रखा है (शरीर-मन वाला)। दो, “जान”, “ब्रह्म अहम्”, मैं ब्रह्म हूँ। यह “अहं ब्रह्मास्मि” है, “तत् त्वम् असि” का आईने वाला रूप, गुरु “आप वही है” कहते हैं, और शिष्य भीतर से “मैं वही हूँ” जानता है।
251 · सब कुछ बस सत् है, आप वही है
मृत्कार्यं सकलं घटादि सततं मृन्मात्रमेवाहितं तद्वत्सज्जनितं सदात्मकमिदं सन्मात्रमेवाखिलम् ।
यस्मान्नास्ति सतः परं किमपि तत्सत्यं स आत्मा स्वयं तस्मात्तत्त्वमसि प्रशान्तममलं ब्रह्माद्वयं यत्परम् ॥ 251 ॥
mṛt-kāryaṁ sakalaṁ ghaṭādi satataṁ mṛn-mātram evāhitaṁ tadvat saj-janitaṁ sad-ātmakam idaṁ san-mātram evākhilam · yasmān nāsti sataḥ paraṁ kim api tat satyaṁ sa ātmā svayaṁ tasmāt tat tvam asi praśāntam amalaṁ brahmādvayaṁ yat param
शब्दार्थ: मृत्-कार्यं घट-आदि मृन्-मात्रम् एव · घड़ा आदि मिट्टी का काम, बस मिट्टी ही है · सत्-जनितम् इदं सत्-आत्मकम् · सत् से जन्मा यह सब सत्-रूप ही · सत्-मात्रम् एव अखिलम् · सब कुछ बस सत् ही · न अस्ति सतः परं किमपि · सत् से परे कुछ नहीं · तत् सत्यं स आत्मा स्वयम् · वही सत्य, वही ख़ुद आत्मा · तत्त्वमसि · आप वही है।
अर्थ: घड़ा आदि मिट्टी का काम है, और हमेशा बस मिट्टी ही है। वैसे ही सत् से जन्मा यह सब सत्-रूप ही है, सब कुछ बस सत् ही। क्योंकि सत् से परे कुछ है ही नहीं। वही सत्य है, वही ख़ुद आत्मा है, इसलिए, आप वही है, वह शांत, निर्मल, अद्वितीय परम ब्रह्म।
भावार्थ: यहाँ से तीन श्लोक “तत् त्वम् असि” को पूरी ताक़त से दोहराते हैं। और देखिए, गुरु फिर मिट्टी-घड़े पर लौटते हैं (भाग 8, श्लोक 228)।
तर्क की एक साफ़ सीढ़ी: घड़ा बस मिट्टी है। उसी तरह, हर चीज़ जो “सत्” (ब्रह्म) से जन्मी, वह बस सत् ही है। और चूँकि सत् के परे कुछ है ही नहीं। तो “सत्” ही अकेला सत्य है, और वही आपका आत्मा है। और इसीलिए, “तत् त्वम् असि।” गौर कीजिए कैसे यह वाक्य अब एक सूखी घोषणा नहीं। एक तर्क का फल है: सब सत् है → सत् ही आत्मा है → इसलिए आप वही है। और श्लोक का अंत चार कोमल शब्दों पर, शांत, निर्मल, अद्वितीय, परम। वह “आप” कोई डरावनी असीमता नहीं; वह एक शांत, साफ़ घर है।
252 · जागते का संसार भी सपने जैसा, आप वही है
निद्राकल्पितदेशकालविषयज्ञात्रादि सर्वं यथा मिथ्या तद्वदिहापि जाग्रति जगत्स्वाज्ञानकार्यत्वतः ।
यस्मादेवमिदं शरीरकरणप्राणाहमाद्यप्यसत् तस्मात्तत्त्वमसि प्रशान्तममलं ब्रह्माद्वयं यत्परम् ॥ 252 ॥
nidrā-kalpita-deśa-kāla-viṣaya-jñātrādi sarvaṁ yathā mithyā tadvad ihāpi jāgrati jagat svājñāna-kāryatvataḥ · yasmād evam idaṁ śarīra-karaṇa-prāṇāham-ādy apy asat tasmāt tat tvam asi praśāntam amalaṁ brahmādvayaṁ yat param
शब्दार्थ: निद्रा-कल्पित-देश-काल-विषय-ज्ञातृ-आदि · नींद (सपने) में गढ़े जगह, समय, विषय, जानने वाला आदि · यथा मिथ्या · जैसे झूठे · तद्वत् इह जाग्रति जगत् · वैसे ही यहाँ जागते में यह जगत · स्व-अज्ञान-कार्यत्वतः · अपने ही अज्ञान का काम होने से · शरीर-करण-प्राण-अहम्-आदि अपि असत् · शरीर, इन्द्रिय, प्राण, अहंकार आदि भी असत् · तत्त्वमसि · आप वही है।
अर्थ: सपने में गढ़े जगह, समय, विषय, और जानने वाला, जैसे सब झूठे होते हैं, वैसे ही यहाँ जागते में भी यह जगत, अपने ही अज्ञान का काम होने से, [झूठा] है। और चूँकि इस तरह शरीर, इन्द्रिय, प्राण, अहंकार आदि भी असत् हैं, इसलिए, आप वही है, वह शांत, निर्मल, अद्वितीय परम ब्रह्म।
भावार्थ: “तत् त्वम् असि” का दूसरा दोहराव, और अब रास्ता दूसरी तरफ़ से। श्लोक 251 ने कहा था “सब सत् है, इसलिए आप सत् है।” यह श्लोक कहता है “सब असत् है (जो असत् दिखता है), इसलिए आप वह है जो बचता है।”
दलील सपने वाली है (भाग 8, श्लोक 234 की याद)। सपने में एक पूरी दुनिया थी, जगह, समय, चीज़ें, और एक “मैं” जो उन्हें जान रहा था। जागे, तो वह पूरा “जानने वाला मैं” भी झूठा निकला। गुरु कहते हैं, यह जागती दुनिया भी वैसी ही है, और इसमें यह शरीर-इन्द्रिय-प्राण वाला “मैं” भी सपने के उस झूठे “मैं” जैसा है। तो जब यह छोटा “मैं” भी हट गया, तो असली “आप” क्या बचा? वही, शांत, निर्मल, अद्वितीय। और आप वही है।
253 · सपने की दुनिया, जाग कर कहाँ गई
यत्र भ्रान्त्या कल्पितं तद्विवेके तत्तन्मात्रं नैव तस्माद्विभिन्नम् ।
स्वप्ने नष्टं स्वप्नविश्वं विचित्रं स्वस्माद्भिन्नं किन्नु दृष्टं प्रबोधे ॥ 253 ॥
yatra bhrāntyā kalpitaṁ tad-viveke tat tan-mātraṁ naiva tasmād vibhinnam · svapne naṣṭaṁ svapna-viśvaṁ vicitraṁ svasmād bhinnaṁ kin nu dṛṣṭaṁ prabodhe
शब्दार्थ: यत्र भ्रान्त्या कल्पितं · जिस (आधार) पर भ्रम से कुछ गढ़ा गया · तद्-विवेके · उसका विवेक होने पर · तत् तद्-मात्रम् एव · वह बस वही (आधार) है · न तस्मात् विभिन्नम् · उससे अलग नहीं · स्वप्ने नष्टं स्वप्न-विश्वं · सपने में बना सपने का संसार, जो ख़त्म हुआ · स्वस्मात् भिन्नं किन्नु दृष्टं प्रबोधे · क्या वह जाग कर अपने से अलग कहीं दिखा।
अर्थ: जिस आधार पर भ्रम से कुछ गढ़ा जाता है, विवेक होने पर वह बस वही आधार निकलता है, उससे अलग कुछ नहीं। सपने में बना वह भाँति-भाँति का सपने-संसार, जो जागते ही ख़त्म हुआ, क्या वह जाग कर अपने से अलग कहीं दिखा?
भावार्थ: गुरु एक बेहद सुंदर सवाल पूछते हैं, और इसका जवाब हर कोई अपने अनुभव से जानता है।
रात भर एक लंबा, भरा-पूरा सपना देखा, लोग, जगहें, घटनाएँ। आँख खुली, सपना ख़त्म। अब सवाल: वह पूरा सपने-संसार “गया” कहाँ? क्या वह कहीं बाहर, आपसे अलग, “ख़त्म होने” चला गया? नहीं। वह कहीं गया ही नहीं। क्योंकि वह कभी आपसे अलग था ही नहीं। वह आपके अपने मन से बना था, आपका ही था, और जागते ही वह सिर्फ़ “आप” में लौट आया, या यूँ कहिए, पता चला वह हमेशा “आप” ही था। गुरु कहते हैं, यह जागती दुनिया भी ऐसी ही है। जब असली जाग (ज्ञान) आती है, तो यह संसार कहीं “नष्ट” नहीं होता, बस पता चलता है कि वह ब्रह्म से अलग था ही नहीं। वह ब्रह्म ही था।
254 · वह ब्रह्म, आप है (1)
जातिनीतिकुलगोत्रदूरगं नामरूपगुणदोषवर्जितम् ।
देशकालविषयातिवर्ति यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 254 ॥
jāti-nīti-kula-gotra-dūragaṁ nāma-rūpa-guṇa-doṣa-varjitam · deśa-kāla-viṣayātivarti yad brahma tat tvam asi bhāvayātmani
शब्दार्थ: जाति-नीति-कुल-गोत्र-दूरगं · जाति, आचार, कुल, गोत्र से बहुत दूर · नाम-रूप-गुण-दोष-वर्जितम् · नाम, रूप, गुण, दोष से रहित · देश-काल-विषय-अतिवर्ति · जगह, समय, विषय से परे · यद् ब्रह्म तत् त्वम् असि भावय आत्मनि · जो ब्रह्म है, वह आप है, इसे अपने भीतर बसा।
अर्थ: जो जाति, आचार, कुल, गोत्र से बहुत दूर है; नाम, रूप, गुण, दोष से रहित; जगह, समय और विषय से परे, जो ब्रह्म है, वह आप है। इसे अपने भीतर बसा।
भावार्थ: यहाँ से दस श्लोकों की एक लड़ी शुरू होती है, हर एक ब्रह्म का एक पहलू बताता है, और हर एक उसी एक टेक पर बंद होता है: “ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि”, वह ब्रह्म आप है, इसे भीतर बसा। इस लड़ी को एक मंत्र की तरह, एक धड़कन की तरह पढ़िए।
और देखिए पहला श्लोक किस बात से शुरू होता है, जाति, कुल, गोत्र। ये वही “पहचानें” हैं जिनका बोझ हम ज़िंदगी भर ढोते हैं। गुरु पहली ही टेक में कह देते हैं, असली “आप” इन सबसे “बहुत दूर” है। और एक प्यारा शब्द, “भावय”, सिर्फ़ “जान” नहीं। “बसा।” यह सिर को दी गई जानकारी नहीं; इसे भीतर, बार-बार, बसने देना है।
255 · वह ब्रह्म, आप है (2)
यत्परं सकलवागगोचरं गोचरं विमलबोधचक्षुषः ।
शुद्धचिद्घनमनादि वस्तु यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 255 ॥
yat paraṁ sakala-vāg-agocaraṁ gocaraṁ vimala-bodha-cakṣuṣaḥ · śuddha-cid-ghanam anādi vastu yad brahma tat tvam asi bhāvayātmani
शब्दार्थ: सकल-वाक्-अगोचरं · सारी वाणी की पकड़ से परे · गोचरं विमल-बोध-चक्षुषः · निर्मल बोध की आँख का विषय · शुद्ध-चित्-घनम् · शुद्ध चेतना से ठोस भरा · अनादि वस्तु · आदि-रहित तत्व।
अर्थ: जो सर्वोच्च है, सारी वाणी की पकड़ से परे, फिर भी निर्मल बोध की आँख का विषय; जो शुद्ध चेतना से ठोस भरा, आदि-रहित तत्व है, वह ब्रह्म आप है। इसे अपने भीतर बसा।
भावार्थ: इस श्लोक में एक सुंदर विरोधाभास है, ब्रह्म “वाणी की पकड़ से परे” है, फिर भी “निर्मल बोध की आँख का विषय” है।
यानी ब्रह्म को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता, बखाना नहीं जा सकता, पर अनुभव किया जा सकता है। फ़र्क वही है जो “शहद के बारे में पढ़ने” और “शहद चखने” में है। और फिर वही शब्द जो शिष्य के पुराने ख़ालीपन-वाले डर का जवाब है, “चित्-घन”, चेतना से ठोस भरा। आप एक ख़ाली “कुछ नहीं” नहीं हो; आप एक भरा-पूरा, आदि-रहित, शुद्ध चेतन तत्व हो।
256 · वह ब्रह्म, आप है (3)
षड्भिरूर्मिभिरयोगि योगिहृद् भावितं न करणैर्विभावितम् ।
बुद्ध्यवेद्यमनवद्यमस्ति यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 256 ॥
ṣaḍbhir ūrmibhir ayogi yogi-hṛd bhāvitaṁ na karaṇair vibhāvitam · buddhy-avedyam anavadyam asti yad brahma tat tvam asi bhāvayātmani
शब्दार्थ: षड्भिः ऊर्मिभिः अयोगि · छह लहरों से न जुड़ने वाला · योगि-हृद् भावितं · योगियों के हृदय में अनुभव किया हुआ · न करणैः विभावितम् · इन्द्रियों से न जाना जाने वाला · बुद्धि-अवेद्यम् · बुद्धि की पकड़ से परे · अनवद्यम् · निर्दोष।
अर्थ: जो छह लहरों से नहीं जुड़ता, योगियों के हृदय में अनुभव किया जाता है, इन्द्रियों से नहीं जाना जाता, बुद्धि की पकड़ से परे है, और निर्दोष है, वह ब्रह्म आप है। इसे अपने भीतर बसा।
भावार्थ: “छह लहरें”, यह एक ख़ास सूची है: भूख, प्यास (शरीर की दो), शोक, मोह (मन की दो), और बुढ़ापा, मृत्यु (समय की दो)। यानी हर वह चीज़ जो हमें सताती है, हिलाती है, घटाती है।
गुरु कहते हैं, असली “आप” इन छहों लहरों से “अयोगी” है, इनसे जुड़ता ही नहीं। समुद्र की सतह पर लहरें उठती-गिरती रहती हैं, पर गहराई का पानी अडोल रहता है। आप वह गहराई हैं। भूख, शोक, बुढ़ापा, ये लहरें सतह पर खेलती रहें, असली आप अछूता। और यह इन्द्रियों या बुद्धि से नहीं। सिर्फ़ “हृदय में अनुभव” से जाना जाता है।
257 · वह ब्रह्म, आप है (4)
भ्रान्तिकल्पितजगत्कलाश्रयं स्वाश्रयं च सदसद्विलक्षणम् ।
निष्कलं निरुपमानवद्धि यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 257 ॥
bhrānti-kalpita-jagat-kalāśrayaṁ svāśrayaṁ ca sad-asad-vilakṣaṇam · niṣkalaṁ nirupamānavad dhi yad brahma tat tvam asi bhāvayātmani
शब्दार्थ: भ्रान्ति-कल्पित-जगत्-कला-आश्रयं · भ्रम से गढ़े जगत के हिस्सों का आधार · स्व-आश्रयं · ख़ुद अपना आधार · सत्-असत्-विलक्षणम् · सत् और असत् दोनों से अलग · निष्कलं · हिस्सों से रहित · निरुपमानवत् · जिसकी कोई उपमा नहीं।
अर्थ: जो भ्रम से गढ़े इस जगत के सारे हिस्सों का आधार है, ख़ुद अपना आधार है, सत् और असत् दोनों से अलग, हिस्सों से रहित, और जिसकी कोई उपमा नहीं। वह ब्रह्म आप है। इसे अपने भीतर बसा।
भावार्थ: दो शब्द इस श्लोक के दिल हैं, “स्व-आश्रय” और “निरुपमान।”
“स्व-आश्रय”, ख़ुद अपना आधार। दुनिया की हर चीज़ किसी और पर टिकी है, घड़ा मिट्टी पर, लहर समुद्र पर, सपना मन पर। पर ब्रह्म किसी पर नहीं टिका; वह ख़ुद सबका आधार है, और उसका अपना आधार वह ख़ुद है। यह उसे “असली” बनाता है, वही जो अपने बल पर खड़ा हो (भाग 2 की विवेक वाली बात)। और “निरुपमान”, जिसकी कोई उपमा नहीं। यह बात ईमानदार है: इस पूरी किताब ने ब्रह्म के लिए दर्जनों उपमाएँ दीं, आकाश, सूरज, समुद्र, पर हर उपमा आख़िर में कम पड़ती है, क्योंकि ब्रह्म जैसा “दूसरा” कुछ है ही नहीं। उपमा तभी बने जब दो चीज़ें हों।
258 · वह ब्रह्म, आप है (5)
जन्मवृद्धिपरिणत्यपक्षय व्याधिनाशनविहीनमव्ययम् ।
विश्वसृष्ट्यवविघातकारणं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 258 ॥
janma-vṛddhi-pariṇaty-apakṣaya vyādhi-nāśana-vihīnam avyayam · viśva-sṛṣṭy-ava-vighāta-kāraṇaṁ brahma tat tvam asi bhāvayātmani
शब्दार्थ: जन्म-वृद्धि-परिणति-अपक्षय-व्याधि-नाशन-विहीनम् · जन्म, बढ़ना, बदलना, घटना, बीमारी, नाश, इन छह से रहित · अव्ययम् · अविनाशी · विश्व-सृष्टि-अव-विघात-कारणं · विश्व की रचना, पालन, संहार का कारण।
अर्थ: जो जन्म, बढ़ना, बदलना, घटना, बीमारी, नाश, इन छह विकारों से रहित है, अविनाशी है, और विश्व की रचना, पालन और संहार का कारण है, वह ब्रह्म आप है। इसे अपने भीतर बसा।
भावार्थ: “छह विकार”, यह एक और सूची है, हर शरीर वाली चीज़ के छह पड़ाव: जन्म लेना, बढ़ना, बदलना, ढलना, बीमार पड़ना, मिट जाना। यह हर वस्तु की कहानी है, और इसीलिए हर वस्तु अनित्य है।
गुरु कहते हैं, असली “आप” इन छहों से बाहर है। आप जन्मे नहीं। आप मिटोगे नहीं; बीच की चार चीज़ें भी आपको छूती नहीं। ये छह शरीर के साथ होते हैं, “आप” इन्हें देखता है। और साथ में एक बड़ी बात, वही ब्रह्म पूरे विश्व का कारण है। यानी जो आपके भीतर अचल साक्षी है, वही बाहर सारी सृष्टि का स्रोत है। छोटा और बड़ा, एक ही।
259 · वह ब्रह्म, आप है (6)
अस्तभेदमनपास्तलक्षणं निस्तरङ्गजलराशिनिश्चलम् ।
नित्यमुक्तमविभक्तमूर्ति यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 259 ॥
asta-bhedam anapāsta-lakṣaṇaṁ nis-taraṅga-jala-rāśi-niścalam · nitya-muktam avibhakta-mūrti yad brahma tat tvam asi bhāvayātmani
शब्दार्थ: अस्त-भेदम् · सारे भेद जिसमें अस्त हो गए · अनपास्त-लक्षणं · जिसका असली स्वरूप कभी नहीं छूटता · निस्तरङ्ग-जल-राशि-निश्चलम् · बिना लहर के जल-राशि की तरह अचल · नित्य-मुक्तम् · सदा मुक्त · अविभक्त-मूर्ति · बिना टुकड़ों वाला।
अर्थ: जिसमें सारे भेद अस्त हो गए, जिसका असली स्वरूप कभी नहीं छूटता, जो बिना लहर के जल-राशि की तरह अचल है, सदा मुक्त है, और बिना टुकड़ों वाला है, वह ब्रह्म आप है। इसे अपने भीतर बसा।
भावार्थ: सबसे सुंदर तस्वीर इस लड़ी की, “निस्तरङ्ग-जल-राशि”, बिना लहर के पानी की विशाल राशि। एक ऐसे समुद्र की कल्पना कीजिए जिस पर एक भी लहर नहीं। बिल्कुल शांत, बिल्कुल अचल, काँच जैसा।
दो शब्द ख़ास हैं। “अस्त-भेद”, सारे भेद डूब गए। हमारी पूरी दुनिया भेदों की है, मैं/आप, यह/वह, अपना/पराया। ब्रह्म वह जगह है जहाँ ये सारी रेखाएँ घुल जाती हैं। और “नित्य-मुक्त”, सदा मुक्त। यह बेहद ज़रूरी है: आपको मुक्त “होना” नहीं है; आप सदा से मुक्त “हो।” बंधन एक ग़लतफ़हमी थी। यह श्लोक मुक्ति को भविष्य से उठा कर वर्तमान में रख देता है, आप पहले से, हमेशा से, मुक्त हो।
260 · वह ब्रह्म, आप है (7)
एकमेव सदनेककारणं कारणान्तरनिरास्यकारणम् ।
कार्यकारणविलक्षणं स्वयं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 260 ॥
ekam eva sad aneka-kāraṇaṁ kāraṇāntara-nirāsya-kāraṇam · kārya-kāraṇa-vilakṣaṇaṁ svayaṁ brahma tat tvam asi bhāvayātmani
शब्दार्थ: एकम् एव सत् · बस एक ही सत् · अनेक-कारणं · अनेक का कारण · कारण-अन्तर-निरास्य-कारणम् · जिसका कोई और कारण नहीं · कार्य-कारण-विलक्षणं स्वयं · कार्य और कारण, दोनों से अलग, स्वयं।
अर्थ: जो बस एक ही सत् है, अनेक का कारण, और जिसका अपना कोई दूसरा कारण नहीं; जो कार्य और कारण, दोनों से अलग, स्वयं है, वह ब्रह्म आप है। इसे अपने भीतर बसा।
भावार्थ: गुरु यहाँ एक गहरी बात कहते हैं, ब्रह्म “कारणों की शृंखला” से बाहर है।
हम हर चीज़ का एक कारण ढूँढते हैं, यह उससे हुआ, वह किसी और से, और वह किसी और से… एक अंतहीन सीढ़ी। ब्रह्म वह जगह है जहाँ यह सीढ़ी रुकती है: वह “अनेक का कारण” है, पर उसका ख़ुद कोई कारण नहीं। और गहरी बात, वह “कार्य-कारण दोनों से अलग” है। ब्रह्म इस पूरे कारण-कार्य के खेल का हिस्सा ही नहीं; वह वह परदा है जिस पर यह पूरा खेल चलता है। और वह परदा, आप है। आप कारणों की किसी कड़ी में बँधे नहीं हो; आप उस पूरी कड़ी के साक्षी हैं।
261 · वह ब्रह्म, आप है (8)
निर्विकल्पकमनल्पमक्षरं यत्क्षराक्षरविलक्षणं परम् ।
नित्यमव्ययसुखं निरञ्जनं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 261 ॥
nirvikalpakam analpam akṣaraṁ yat kṣarākṣara-vilakṣaṇaṁ param · nityam avyaya-sukhaṁ nirañjanaṁ brahma tat tvam asi bhāvayātmani
शब्दार्थ: निर्विकल्पकम् · बिना भेद-विकल्प के · अनल्पम् · छोटा नहीं (असीम) · अक्षरं · अविनाशी · क्षर-अक्षर-विलक्षणं · नाशवान और अविनाशी, दोनों से अलग · अव्यय-सुखं · कभी न घटने वाला सुख · निरञ्जनं · निर्मल।
अर्थ: जो बिना भेद-विकल्प के है, छोटा नहीं (असीम), अविनाशी; जो नाशवान और अविनाशी, दोनों से परे, सर्वोच्च है; जो नित्य है, कभी न घटने वाला सुख है, और निर्मल है, वह ब्रह्म आप है। इसे अपने भीतर बसा।
भावार्थ: इस श्लोक में एक प्यारा शब्द-समूह है, “अव्यय-सुखम्”, कभी न घटने वाला सुख।
दुनिया का हर सुख “व्यय” होता है, ख़र्च हो जाता है, घट जाता है, ख़त्म हो जाता है। एक मनचाही चीज़ मिली, सुख आया, फिर वह फीका पड़ा, फिर अगली चीज़ की तलाश। यह सुख का “व्यय” होना ही हमारी पूरी दौड़ है। गुरु कहते हैं, असली “आप” एक ऐसा सुख है जो कभी घटता नहीं। ख़र्च नहीं होता। यह बाहर से नहीं आता, इसलिए बाहर के साथ जाता भी नहीं। आप सुख “पाते” नहीं। आप कभी न घटने वाला सुख “हो।”
262 · वह ब्रह्म, आप है (9)
यद्विभाति सदनेकधा भ्रमान् नामरूपगुणविक्रियात्मना ।
हेमवत्स्वयमविक्रियं सदा ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 262 ॥
yad vibhāti sad anekadhā bhramān nāma-rūpa-guṇa-vikriyātmanā · hemavat svayam avikriyaṁ sadā brahma tat tvam asi bhāvayātmani
शब्दार्थ: यद् विभाति सत् अनेकधा भ्रमात् · जो सत्, भ्रम से, अनेक रूपों में दिखता है · नाम-रूप-गुण-विक्रिया-आत्मना · नाम, रूप, गुण, बदलाव के रूप में · हेम-वत् स्वयम् अविक्रियं सदा · सोने की तरह, ख़ुद हमेशा अविकारी।
अर्थ: जो सत्, भ्रम से, अनेक रूपों में, नाम, रूप, गुण, बदलाव के रूप में, दिखता है, पर ख़ुद हमेशा अविकारी रहता है, सोने की तरह, वह ब्रह्म आप है। इसे अपने भीतर बसा।
भावार्थ: एक नई, बेहद सटीक उपमा, सोना। एक सुनार के पास जाइए, वहाँ अँगूठियाँ, हार, कंगन, मूर्तियाँ। दर्जनों अलग-अलग चीज़ें, अलग नाम, अलग आकार, अलग दाम।
पर असल में वहाँ “कितनी” चीज़ें हैं? एक, सोना। हर गहना बस सोना है, एक नाम-रूप में ढला हुआ। गहने बनते-बिगड़ते रहते हैं, पर सोना ज्यों का त्यों, “अविकारी।” गुरु कहते हैं, यह पूरा संसार ऐसा ही है। अनगिनत चीज़ें, अनगिनत नाम, पर असल में सब एक ही “सोना”, एक ही ब्रह्म, अनेक रूपों में ढला। और वह सोना, आप है। आप संसार के किसी एक गहने नहीं हो; आप वह सोना हैं जो हर गहने में है।
263 · वह ब्रह्म, आप है (10)
यच्चकास्त्यनपरं परात्परं प्रत्यगेकरसमात्मलक्षणम् ।
सत्यचित्सुखमनन्तमव्ययं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 263 ॥
yac cakāsty anaparaṁ parāt paraṁ pratyag-eka-rasam ātma-lakṣaṇam · satya-cit-sukham anantam avyayaṁ brahma tat tvam asi bhāvayātmani
शब्दार्थ: यद् चकास्ति · जो चमकता है · अनपरं · जिससे आगे कुछ नहीं · परात् परं · ऊँचे से भी ऊँचा · प्रत्यग्-एक-रसम् · भीतर का एक रस · आत्म-लक्षणम् · आत्मा की पहचान · सत्य-चित्-सुखम् अनन्तम् अव्ययं · सत्य-चेतन-सुख, अनंत, अविनाशी।
अर्थ: जो चमकता है, जिससे आगे कुछ नहीं। जो ऊँचे से भी ऊँचा है, भीतर का एक रस, आत्मा की पहचान; जो सत्य-चेतन-सुख है, अनंत, अविनाशी, वह ब्रह्म आप है। इसे अपने भीतर बसा।
भावार्थ: दस-श्लोकी टेक का आख़िरी श्लोक, और यह सबसे ऊँचे शब्दों पर बंद होता है, “सत्य-चित्-सुख”, यानी सत्-चित्-आनंद। होना, जानना, और आनंद, तीनों एक साथ।
और एक प्यारा शब्द, “प्रत्यग्-एक-रस।” “प्रत्यक्” यानी भीतर वाला, सबसे क़रीब का; “एक-रस” यानी एक ही स्वाद, बिना दरार। यह दस श्लोकों की लड़ी हर बार ब्रह्म को “वहाँ”, असीम, अनंत, सर्वोच्च, बता कर, हर बार उसे “यहाँ” ले आती है: “आप है, इसे भीतर बसा।” विशाल और निकट, एक साथ। और दसवीं बार वही टेक, अब वह सिर में नहीं। धड़कन में बैठ चुकी होनी चाहिए। अब, बाक़ी तीन श्लोक बताते हैं, इसका करना क्या है।
264 · हथेली के पानी की तरह साफ़
उक्तमर्थमिममात्मनि स्वयं भावयेत्प्रथितयुक्तिभिर्धिया ।
संशयादिरहितं कराम्बुवत् तेन तत्त्वनिगमो भविष्यति ॥ 264 ॥
uktam artham imam ātmani svayaṁ bhāvayet prathita-yuktibhir dhiyā · saṁśayādi-rahitaṁ karāmbuvat tena tattva-nigamo bhaviṣyati
शब्दार्थ: उक्तम् अर्थम् इमम् आत्मनि स्वयं भावयेत् · इस कहे हुए अर्थ को अपने भीतर ख़ुद बसाए · प्रथित-युक्तिभिः धिया · जानी-मानी युक्तियों से, बुद्धि से · संशय-आदि-रहितं कर-अम्बु-वत् · संशय आदि से रहित, हथेली के पानी की तरह (साफ़) · तत्त्व-निगमः भविष्यति · तत्व का निश्चय हो जाएगा।
अर्थ: इस कहे हुए अर्थ को साधक अपने भीतर, ख़ुद, जानी-मानी युक्तियों और बुद्धि से बसाए, संशय आदि से रहित, हथेली पर रखे पानी की तरह साफ़। उससे तत्व का निश्चय हो जाएगा।
भावार्थ: गुरु एक प्यारी उपमा देते हैं, “कर-अम्बु”, हथेली पर रखा पानी। हथेली में थोड़ा पानी लो, वह एकदम साफ़, सीधा सामने, हर बूँद दिखती हुई। कोई धुँधलापन नहीं। कोई शक नहीं।
आत्म-ज्ञान भी ऐसा ही साफ़ हो सकता है, और होना चाहिए। और दो शब्द ज़रूरी हैं। “स्वयम्”, ख़ुद। गुरु ने सब समझा दिया, पर अब “बसाना” शिष्य को ख़ुद है (भाग 3 की बात, सिरदर्द कोई और हटाए, भूख ख़ुद मिटानी पड़ती है)। और “युक्तिभिः”, तर्क से। यह अंध-श्रद्धा नहीं; इसे अपनी बुद्धि से, जाँच कर, इतना साफ़ कर लेना है कि कोई संशय न बचे।
265 · सेना के बीच राजा को पहचानना
संबोधमात्रं परिशुद्धतत्त्वं विज्ञाय सङ्घे नृपवच्च सैन्ये ।
तदाश्रयः स्वात्मनि सर्वदा स्थितो विलापय ब्रह्मणि विश्वजातम् ॥ 265 ॥
saṁbodha-mātraṁ pariśuddha-tattvaṁ vijñāya saṅghe nṛpavac ca sainye · tad-āśrayaḥ svātmani sarvadā sthito vilāpaya brahmaṇi viśva-jātam
शब्दार्थ: संबोध-मात्रं परिशुद्ध-तत्त्वं · सिर्फ़ चेतना, परम शुद्ध तत्व · विज्ञाय · जान कर · सङ्घे नृप-वत् सैन्ये · सेना की भीड़ में राजा की तरह · तद्-आश्रयः स्व-आत्मनि सर्वदा स्थितः · उसी का आश्रय ले कर सदा अपने आत्मा में स्थित · विलापय ब्रह्मणि विश्व-जातम् · विश्व-भर को ब्रह्म में घोल दे।
अर्थ: जैसे सेना की भीड़ में राजा को (अलग) पहचाना जाता है, वैसे ही [कोशों की भीड़ में] सिर्फ़ चेतना, परम शुद्ध तत्व, को जान कर, उसी का आश्रय ले कर सदा अपने आत्मा में स्थित रह, और इस पूरे विश्व को ब्रह्म में घोल दे।
भावार्थ: एक सुंदर उपमा, सेना में राजा। एक विशाल सेना खड़ी है, हज़ारों सिपाही, घोड़े, हाथी, झंडे। उस पूरी भीड़ में राजा को कैसे पहचानें? वह वहीं, बीच में, उन्हीं के बीच खड़ा है, पर एक सधी नज़र उसे बाक़ी सबसे अलग पहचान लेती है।
आपके भीतर भी एक “भीड़” है, पाँच कोश, इन्द्रियाँ, विचार, भाव, लगातार की हलचल। और उस पूरी भीड़ के बीच, चुपचाप, “राजा” खड़ा है, शुद्ध चेतना, साक्षी। काम है, उस भीड़ में राजा को पहचान लेना, और फिर “उसी का आश्रय” लेना। और जब वहाँ टिक जाएँ, तो आख़िरी काम, “विश्व-भर को ब्रह्म में घोल दो।” यानी अब बाहर जो भी देखो, उसे अलग, टुकड़ों में मत देखो; हर चीज़ को उसी एक ब्रह्म में घुलते देखो।
266 · गुफ़ा में बस जाएँ, फिर लौटना नहीं
बुद्धौ गुहायां सदसद्विलक्षणं ब्रह्मास्ति सत्यं परमद्वितीयम् ।
तदात्मना योऽत्र वसेद्गुहायां पुनर्न तस्याङ्गगुहाप्रवेशः ॥ 266 ॥
buddhau guhāyāṁ sad-asad-vilakṣaṇaṁ brahmāsti satyaṁ param advitīyam · tad-ātmanā yo’tra vased guhāyāṁ punar na tasyāṅga-guhā-praveśaḥ
शब्दार्थ: बुद्धौ गुहायां · बुद्धि की गुफ़ा में · सत्-असत्-विलक्षणं · सत्-असत् से परे · ब्रह्म अस्ति सत्यं परम्-अद्वितीयम् · ब्रह्म है, सत्य, परम, अद्वितीय · तद्-आत्मना यः अत्र वसेत् गुहायां · उसी रूप में जो इस गुफ़ा में बस जाता है · पुनः न तस्य अङ्ग-गुहा-प्रवेशः · उसका फिर शरीर रूपी गुफ़ा में प्रवेश नहीं।
अर्थ: बुद्धि की गुफ़ा में, सत् और असत् दोनों से परे, ब्रह्म है, सत्य, परम, अद्वितीय। उसी रूप में जो इस गुफ़ा में बस जाता है, उसका फिर शरीर रूपी गुफ़ा में प्रवेश नहीं होता।
भावार्थ: यह भाग 9 का समापन है, और यह एक प्यारे शब्द-खेल पर बंद होता है, “गुफ़ा।”
दो गुफ़ाएँ हैं। एक, “बुद्धि की गुफ़ा”, वह भीतरी, शांत जगह जहाँ ब्रह्म पहले से बसा है। दूसरी, “शरीर की गुफ़ा”, यानी एक नया जन्म, एक नई देह। गुरु कहते हैं: जो पहली गुफ़ा में, ब्रह्म-रूप में, बस जाता है, उसे फिर दूसरी गुफ़ा में नहीं घुसना पड़ता। यानी जो अपने असली घर में लौट आया, उसे फिर किराए के मकान नहीं बदलने पड़ते।
यह “तत् त्वम् असि” वाले पूरे भाग का फल है। महावाक्य सुना, समझा, बुद्धि से साफ़ किया, दस बार “भावयात्मनि” से भीतर बसाया, और अब उसी में “बस” जाना है। पर एक सवाल बचा रहता है, और गुरु उसे जानते हैं: समझ तो आ गई, पर पुरानी आदतें, “मैं कर्ता, मैं भोक्ता” वाली, वे अब भी ज़ोर मारती हैं। अगला भाग ठीक उसी का इलाज है: वासना का पतला होना, और अहंकार को आख़िरी विदाई।
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना: भाग 10 · वासना का क्षय, महावाक्य समझ में आ गया, पर एक बात बची है। पुरानी आदतें, “मैं ही करता हूँ, मैं ही भोगता हूँ”, समझ के बाद भी ज़ोर मारती रहती हैं। गुरु बताते हैं कि उन वासनाओं को, और अहंकार को, आख़िरी विदाई कैसे दें।
और एक सवाल जेब में रखिए: दस बार वह टेक आई, “ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि”, वह ब्रह्म आप है, इसे भीतर बसा। आज एक पल, किसी शांत क्षण में, बस एक बार धीरे से अपने भीतर कहिए, “तत् त्वम् असि।” और सुनिए कि भीतर कुछ हिलता है क्या।