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भाग 9 · तत्त्वमसि

विवेकचूडामणि

भाग 9 · तत् त्वम् असि · श्लोक 241-266

एक छोटा-सा “आप” यहाँ बैठा है, और एक असीम “वह” दूर कहीं फैला है। गुरु इन दोनों के बीच की एक-एक परत उठा कर रख देते हैं, और दिखाते हैं कि वे परतें वस्तुतः कभी थीं ही नहीं। शेष रहता है केवल एक वाक्य, “तत् त्वम् असि”, आप वही है।

26 श्लोक · पढ़ने का समय लगभग 34 मिनट · पहले पढ़ें: भाग 8 · साक्षी, और ब्रह्म · आगे-पीछे: विवेकचूडामणि मुख्य पृष्ठ

पहले एक बात

यहाँ विवेकचूडामणि अपने शिखर पर पहुँचती है। अब तक का सारा विवेक इसी एक वाक्य की भूमिका था, “तत् त्वम् असि”, आप वही है। यह चार महावाक्यों में से एक है, छान्दोग्य उपनिषद् से, जहाँ ऋषि उद्दालक इसे अपने पुत्र श्वेतकेतु से नौ बार कहते हैं।

एक प्रश्न यहाँ स्वाभाविक रूप से उठता है, और गुरु उसे छिपाते नहीं। “तत्” अर्थात् ब्रह्म, असीम, सबका कारण, सर्वव्यापक। और “त्वम्” अर्थात् आप, एक सीमित, बद्ध-सा प्रतीत होता जीव। शब्दशः देखें तो दोनों परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं। तब “आप वही है” का तात्पर्य क्या है।

इस भाग का पहला अंश (241-253) इसी को सूक्ष्म तर्क से सुलझाता है। फिर बीच में दस श्लोकों की एक लड़ी आती है (254-263), हर एक “ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि” पर समाप्त होता, हर बार ब्रह्म का एक नया पक्ष, और हर बार वही टेक: वह ब्रह्म, आप है, इसे अपने भीतर बसाइए। इस लड़ी को एक मंत्र की भाँति पढ़िए।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। तीन अंश हैं, दो शब्दों का मेल कैसे होता है (241-253), दस-श्लोकी “भावयात्मनि” टेक (254-263), और समापन (264-266)। मुख्य श्लोक: 242 (जुगनू और सूर्य), 248 (देवदत्त का दृष्टान्त), और 254-263 की पूरी लड़ी।

गुरु महावाक्य को सीधे उसके दो पदों में खोल देते हैं। “तत्”, अर्थात् ब्रह्म, सबका मूल। “त्वम्”, अर्थात् आपका अपना आत्मा। और श्रुति का एकमात्र प्रयोजन यही है, बार-बार यह दिखाना कि ये दोनों एक ही हैं। एक शब्द यहाँ ध्यान देने योग्य है, “शोधितयोः”, शुद्ध किए गए। दोनों पदों को पहले शुद्ध करना होता है, उन पर चढ़ी भ्रान्त परतें हटानी होती हैं, तभी उनकी एकता प्रकट होती है। और “मुहुः”, बार-बार। उपनिषद् इसे नौ बार दोहराता है, क्योंकि यह केवल सुनने की वस्तु नहीं, भीतर बैठने की वस्तु है।

241 · दो शब्द, “तत्” और “त्वम्”

तत्त्वंपदाभ्यामभिधीयमानयोः ब्रह्मात्मनोः शोधितयोर्यदीत्थम् ।
श्रुत्या तयोस्तत्त्वमसीति सम्यग् एकत्वमेव प्रतिपाद्यते मुहुः ॥ 241 ॥

अब गुरु उस कठिनाई को पूरी स्पष्टता से सामने रख देते हैं। पदों का सीधा अर्थ लें तो “तत्” और “त्वम्” परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं, और वे चार जोड़े गिनाते हैं, जुगनू और सूर्य, सेवक और राजा, कूप का जल और समुद्र, एक नन्हा अणु और मेरु पर्वत। इन विरुद्ध जोड़ों की एकता का मर्म एक शब्द में है, लक्ष्य अर्थ। पद के दो अर्थ होते हैं, सीधा और इंगित। सीधे अर्थ में जुगनू और सूर्य भिन्न हैं, एक नन्हा, एक विशाल। किन्तु दोनों के भीतर जो प्रकाश है, वह तत्त्व एक ही है, केवल मात्रा भिन्न। “तत् त्वम् असि” शरीर-मन वाले सीमित “आप” का कथन नहीं, वह उस “आप” के भीतर के प्रकाश का कथन है, और वह प्रकाश तथा ब्रह्म का प्रकाश एक ही है।

242 · जुगनू और सूरज

ऐक्यं तयोर्लक्षितयोर्न वाच्ययोः निगद्यतेऽन्योन्यविरुद्धधर्मिणोः ।
खद्योतभान्वोरिव राजभृत्ययोः कूपाम्बुराश्योः परमाणुमेर्वोः ॥ 242 ॥

फिर गुरु इस विरोध की जड़ बता देते हैं, वह गढ़ा हुआ है, उपाधि से कल्पित। और वे दो उपाधियाँ गिनाते हैं। “तत्” ब्रह्म “ईश्वर” प्रतीत होता है क्योंकि उस पर एक उपाधि है, माया, समस्त सृष्टि का कारण। “त्वम्” आत्मा “जीव” प्रतीत होता है क्योंकि उस पर एक उपाधि है, कार्य-रूप पाँच कोश। दोनों उपाधियाँ हट जाएँ, और जो शेष रहे, दोनों स्थलों पर वही एक है। भेद स्वयं प्रकाश में नहीं, उस पर चढ़े आवरण में है। इसी को गुरु राजा और सिपाही के दृष्टान्त से पूरा खोल देते हैं। एक राजा और एक सिपाही में कितना अन्तर दिखता है। किन्तु राजा अपने राज्य, सिंहासन, मुकुट के कारण राजा है, और सिपाही अपनी वर्दी, ढाल के कारण सिपाही। दोनों से ये वस्तुएँ हटा दी जाएँ, मुकुट हटे, ढाल हटी, तो शेष रहते हैं दो मनुष्य, और मनुष्य के नाते दोनों समान। ठीक यही माया और पाँच कोश के हटने पर होता है, न “ईश्वर” शेष रहता है, न “जीव”, केवल एक शुद्ध चेतना, दोनों स्थलों पर एक।

243 · विरोध, सिर्फ़ उपाधि का

तयोर्विरोधोऽयमुपाधिकल्पितो न वास्तवः कश्चिदुपाधिरेषः ।
ईशस्य माया महदादिकारणं जीवस्य कार्यं शृणु पञ्चकोशम् ॥ 243 ॥

244 · राजा और सिपाही

एतावुपाधी परजीवयोस्तयोः सम्यङ्निरासे न परो न जीवः ।
राज्यं नरेन्द्रस्य भटस्य खेटक् तयोरपोहे न भटो न राजा ॥ 244 ॥

अपने इस कथन के लिए गुरु अब स्वयं श्रुति को साक्षी बना लेते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध “नेति-नेति” वचन, यह नहीं, यह नहीं, ब्रह्म पर चढ़ी हर परत को एक-एक कर निषिद्ध करता जाता है। अर्थात् जो कार्य गुरु कर रहे हैं, दोनों उपाधियों का निरास, वह कोई नई बात नहीं, श्रुति स्वयं यही करती है। और एक पद महत्त्वपूर्ण है, “करना ही चाहिए”। यह केवल समझ लेने की बात नहीं, उपाधियों का निरास एक साधना है, जो साधक को स्वयं करनी है, बार-बार, हर परत के विषय में स्पष्ट विवेक से, यह मैं नहीं। इसी से समस्त विधि दो चरणों में बँध जाती है। पहला चरण, निरास, प्रत्येक दृश्य वस्तु के विषय में सच्चे तर्क से यह देख लेना कि यह कल्पित है, यह वास्तविक नहीं, रज्जु पर दिखे सर्प की भाँति, स्वप्न की भाँति। दूसरा चरण, उसके अनन्तर, जब समस्त दृश्य हट जाए तब जो शेष रहे, उस एक-भाव को जानना। क्रम यही है, पहले निरास, फिर ज्ञान। मूर्तिकार पत्थर से वही हटाता है जो मूर्ति नहीं, और जो शेष रहता है, वही मूर्ति है।

245 · श्रुति ख़ुद दोनों को नकारती है

अथात आदेश इति श्रुतिः स्वयं निषेधति ब्रह्मणि कल्पितं द्वयम् ।
श्रुतिप्रमाणानुगृहीतबोधात् तयोर्निरासः करणीय एव ॥ 245 ॥

246 · दृश्य को हटा कर, फिर वह एक

नेदं नेदं कल्पितत्वान्न सत्यं रज्जुदृष्टव्यालवत्स्वप्नवच्च ।
इत्थं दृश्यं साधुयुक्त्या व्यपोह्य ज्ञेयः पश्चादेकभावस्तयोर्यः ॥ 246 ॥

अब एक शास्त्रीय बात आती है, किन्तु उसका मर्म सरल है। पदों के लक्ष्य अर्थ निकालने की तीन रीतियाँ हैं, और गुरु बीच वाली चुनते हैं। एक, पद का सीधा अर्थ पूर्णतः छोड़ देना। दूसरी, कुछ भी न छोड़ना। दोनों यहाँ उपयुक्त नहीं। तीसरी, पद के अर्थ का एक अंश छोड़ना, एक रखना। “तत् त्वम् असि” में “त्वम्” का जो अंश शरीर-मन-सीमित जीव है, वह छूट जाता है, जो अंश चेतना है, वह रहता है; उसी प्रकार “तत्” का दूरस्थ ईश्वर वाला अंश छूटता है, चेतना वाला अंश रहता है। दोनों का शेष अंश, चेतना, एक ही निकलता है। और यह बात एक सहज दृष्टान्त से एक क्षण में स्पष्ट हो जाती है, जो नित्य के अनुभव का है। किसी देवदत्त से वर्षों पूर्व, किसी अन्य नगर में, युवावस्था में भेंट हुई थी। आज वही देवदत्त यहाँ, इस नगर में, वृद्ध दिखता है, और तत्क्षण कहा जाता है, यह तो वही देवदत्त है। काल भिन्न, स्थान भिन्न, अवस्था भिन्न, फिर भी दोनों एक ही कहे जाते हैं। बुद्धि स्वतः, बिना प्रयास, विरुद्ध अंश को छोड़ देती है, और जो शेष रहता है, वही एक व्यक्ति, उसे पहचान लेती है। “तत् त्वम् असि” ठीक यही करता है, “त्वम्” से काल-स्थान-शरीर का अंश हटता है, “तत्” से दूरी-विशालता का अंश हटता है, और जो शेष रहती है, वही एक चेतना, यह तो वही है।

247 · न पूरा छोड़ना, न पूरा रखना

ततस्तु तौ लक्षणया सुलक्ष्यौ तयोरखण्डैकरसत्वसिद्धये ।
नालं जहत्या न तथाजहत्या किन्तूभयार्थात्मिकयैव भाव्यम् ॥ 247 ॥

248 · “यह वही देवदत्त है”

स देवदत्तोऽयमितीह चैकता विरुद्धधर्मांशमपास्य कथ्यते ।
यथा तथा तत्त्वमसीतिवाक्ये विरुद्धधर्मानुभयत्र हित्वा ॥ 248 ॥

इसी के साथ गुरु पहले अंश को समेट लेते हैं। “तत्” और “त्वम्”, दोनों में जो साधारण है, वह है केवल चेतन-होना, और उसी एक तत्त्व से दोनों अभिन्न हो जाते हैं। ज्ञानी इसी को पहचान कर सद् और आत्मा के अखंड एक-भाव को जान लेते हैं। और एक मार्मिक संकेत यहाँ है, सौ महावाक्यों से। उपनिषदों में केवल “तत् त्वम् असि” अकेला महावाक्य नहीं, “अहं ब्रह्मास्मि” मैं ब्रह्म हूँ, “प्रज्ञानं ब्रह्म” चेतना ब्रह्म है, “अयम् आत्मा ब्रह्म” यह आत्मा ब्रह्म है, और ऐसे अनेक। गुरु कहते हैं, ये समस्त वाक्य अन्ततः एक ही बात कहते हैं, ब्रह्म और आपका आत्मा अभिन्न हैं। फिर गुरु बृहदारण्यक का “अस्थूलम्, अनणु” वाला वर्णन स्मरण कराते हैं, ब्रह्म न स्थूल है, न सूक्ष्म, न यह, न वह। हर “यह नहीं” के अनन्तर, ब्रह्म स्वतः सिद्ध शेष रहता है, आकाश के समान। आकाश को कोई रचता नहीं, उसे सिद्ध नहीं करना पड़ता, जब शेष सब हट जाता है, आकाश बस होता है। और तब गुरु सीधा उपदेश देते हैं, दो अंशों में, पहला, उस मिथ्या “मैं” को छोड़िए जिसे आत्मा मान रखा है, और दूसरा, “ब्रह्म अहम्”, मैं ब्रह्म हूँ, यह जानिए। गुरु कहते हैं आप वही है, और शिष्य भीतर से जानता है, मैं वही हूँ।

249 · सौ महावाक्य, एक ही बात

संलक्ष्य चिन्मात्रतया सदात्मनोः अखण्डभावः परिचीयते बुधैः ।
एवं महावाक्यशतेन कथ्यते ब्रह्मात्मनोरैक्यमखण्डभावः ॥ 249 ॥

250 · “ब्रह्म मैं हूँ”, साफ़ बुद्धि से जान

अस्थूलमित्येतदसन्निरस्य सिद्धं स्वतो व्योमवदप्रतर्क्यम् ।
अतो मृषामात्रमिदं प्रतीतं जहीहि यत्स्वात्मतया गृहीतम्
ब्रह्माहमित्येव विशुद्धबुद्ध्या विद्धि स्वमात्मानमखण्डबोधम् ॥ 250 ॥

अब तीन श्लोक “तत् त्वम् असि” को पूर्ण बल से दोहराते हैं। गुरु फिर मिट्टी और घड़े पर लौट आते हैं। घड़ा केवल मिट्टी है, और सदा मिट्टी ही रहता है। उसी प्रकार, जो भी सत् ब्रह्म से उत्पन्न हुआ, वह केवल सत् ही है, और सत् से परे कुछ है ही नहीं। अतः सत् ही एकमात्र सत्य है, और वही आपका आत्मा है, इसीलिए, आप वही है। यह वाक्य कोई शुष्क घोषणा नहीं, एक तर्क का फल है, सब सत् है, सत् ही आत्मा है, इसलिए आप वही है। और श्लोक चार कोमल पदों पर समाप्त होता है, शान्त, निर्मल, अद्वितीय, परम। वह “आप” कोई भयप्रद असीमता नहीं, वह एक शान्त, निर्मल आश्रय है।

251 · सब कुछ बस सत् है, आप वही है

मृत्कार्यं सकलं घटादि सततं मृन्मात्रमेवाहितं तद्वत्सज्जनितं सदात्मकमिदं सन्मात्रमेवाखिलम् ।
यस्मान्नास्ति सतः परं किमपि तत्सत्यं स आत्मा स्वयं तस्मात्तत्त्वमसि प्रशान्तममलं ब्रह्माद्वयं यत्परम् ॥ 251 ॥

अब वही वाक्य दूसरी दिशा से आता है। पहले सत् की ओर से सिद्धि थी, सब सत् है, इसलिए आप सत् है। अब असत् के निषेध की ओर से। युक्ति स्वप्न की है। स्वप्न में एक समूचा संसार था, स्थान, काल, वस्तुएँ, और एक “मैं” जो उन्हें जान रहा था। जागने पर वह समूचा जानने वाला “मैं” भी मिथ्या निकला। गुरु कहते हैं, यह जाग्रत संसार भी वैसा ही है, और इसमें यह शरीर-इन्द्रिय-प्राण वाला “मैं” भी स्वप्न के उस मिथ्या “मैं” के समान है। जब यह सीमित “मैं” भी हट जाता है, तब असली “आप” क्या शेष रहता है, वही शान्त, निर्मल, अद्वितीय। और आप वही है। इसी को गुरु एक सूक्ष्म प्रश्न से और गहरा कर देते हैं। रात-भर एक लम्बा, भरा-पूरा स्वप्न रहा, मनुष्य, स्थान, घटनाएँ। आँख खुली, स्वप्न समाप्त। तब वह समूचा स्वप्न-संसार गया कहाँ। क्या वह कहीं बाहर, द्रष्टा से पृथक्, समाप्त होने चला गया। नहीं, वह कहीं गया ही नहीं, क्योंकि वह कभी द्रष्टा से पृथक् था ही नहीं, वह उसी के मन से रचा था, और जागते ही केवल अपने अधिष्ठान में लौट आया। यह जाग्रत संसार भी ऐसा ही है। जब वास्तविक जागृति आती है, तो यह संसार कहीं नष्ट नहीं होता, केवल यह प्रकट होता है कि वह ब्रह्म से पृथक् था ही नहीं, वह ब्रह्म ही था।

252 · जागते का संसार भी सपने जैसा, आप वही है

निद्राकल्पितदेशकालविषयज्ञात्रादि सर्वं यथा मिथ्या तद्वदिहापि जाग्रति जगत्स्वाज्ञानकार्यत्वतः ।
यस्मादेवमिदं शरीरकरणप्राणाहमाद्यप्यसत् तस्मात्तत्त्वमसि प्रशान्तममलं ब्रह्माद्वयं यत्परम् ॥ 252 ॥

253 · सपने की दुनिया, जाग कर कहाँ गई

यत्र भ्रान्त्या कल्पितं तद्विवेके तत्तन्मात्रं नैव तस्माद्विभिन्नम् ।
स्वप्ने नष्टं स्वप्नविश्वं विचित्रं स्वस्माद्भिन्नं किन्नु दृष्टं प्रबोधे ॥ 253 ॥

अब दस श्लोकों की एक लड़ी आरम्भ होती है, हर एक ब्रह्म का एक पक्ष कहता है, और हर एक उसी टेक पर समाप्त होता है, वह ब्रह्म आप है, इसे भीतर बसाइए। इस लड़ी को एक मंत्र की भाँति पढ़िए। पहला श्लोक जिन वस्तुओं से आरम्भ होता है, वे हैं जाति, कुल, गोत्र, वही पहचानें जिनका भार जीवन-भर वहन किया जाता है, और गुरु पहली ही टेक में कह देते हैं, असली “आप” इन सबसे बहुत दूर है। एक पद यहाँ मार्मिक है, “भावय”, जो केवल जानने की नहीं, भीतर बसाने की क्रिया है। यह बुद्धि को दी गई सूचना नहीं, इसे भीतर, बार-बार, बसने देना है। दूसरे श्लोक में एक सूक्ष्म रहस्य है, ब्रह्म वाणी की पकड़ से परे है, फिर भी निर्मल बोध की आँख का विषय है, अर्थात् ब्रह्म को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता, किन्तु उसका अनुभव हो सकता है। और वही पद जो शिष्य के पूर्व के शून्यता-भय का उत्तर है, “चित्-घन”, चेतना से सघन। आत्मा कोई रिक्त शून्य नहीं, वह एक परिपूर्ण, आदि-रहित, शुद्ध चेतन तत्त्व है।

254 · वह ब्रह्म, आप है (1)

जातिनीतिकुलगोत्रदूरगं नामरूपगुणदोषवर्जितम् ।
देशकालविषयातिवर्ति यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 254 ॥

255 · वह ब्रह्म, आप है (2)

यत्परं सकलवागगोचरं गोचरं विमलबोधचक्षुषः ।
शुद्धचिद्घनमनादि वस्तु यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 255 ॥

आगे गुरु छह ऊर्मियों की एक निश्चित सूची उठाते हैं, भूख और प्यास, प्राण की दो; शोक और मोह, मन की दो; बुढ़ापा और मृत्यु, शरीर की दो। अर्थात् वह सब जो जीव को व्यथित करता, विचलित करता, क्षीण करता है। गुरु कहते हैं, असली “आप” इन छहों ऊर्मियों से अछूता है, इनसे जुड़ता ही नहीं। समुद्र की सतह पर लहरें उठती-गिरती रहती हैं, किन्तु गहराई का जल अचल रहता है, और आत्मा वही गहराई है। ये ऊर्मियाँ सतह पर खेलती रहें, असली आप इनसे अस्पर्श रहता है, और यह तत्त्व इन्द्रियों या बुद्धि से नहीं, केवल हृदय के अनुभव से जाना जाता है। फिर दो और गहरे पद आते हैं, स्वयं अपना आधार, और जिसकी कोई उपमा नहीं। संसार की हर वस्तु किसी अन्य पर आश्रित है, घड़ा मिट्टी पर, तरंग समुद्र पर, स्वप्न मन पर। किन्तु ब्रह्म किसी पर आश्रित नहीं, वह स्वयं सबका आधार है, और उसका अपना आधार वह स्वयं है। और इस समस्त ग्रन्थ ने ब्रह्म के लिए अनेक उपमाएँ दीं, आकाश, सूर्य, समुद्र, किन्तु हर उपमा अन्ततः अपर्याप्त रह जाती है, क्योंकि ब्रह्म जैसा कोई द्वितीय है ही नहीं, और उपमा तभी सम्भव है जब दो वस्तुएँ हों।

256 · वह ब्रह्म, आप है (3)

षड्भिरूर्मिभिरयोगि योगिहृद् भावितं न करणैर्विभावितम् ।
बुद्ध्यवेद्यमनवद्यमस्ति यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 256 ॥

257 · वह ब्रह्म, आप है (4)

भ्रान्तिकल्पितजगत्कलाश्रयं स्वाश्रयं च सदसद्विलक्षणम् ।
निष्कलं निरुपमानवद्धि यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 257 ॥

आगे गुरु छह विकारों की एक और सूची गिनाते हैं, प्रत्येक देहधारी वस्तु के छह पड़ाव, जन्म लेना, बढ़ना, बदलना, घटना, रोगग्रस्त होना, नष्ट होना। यह हर वस्तु का क्रम है, और इसीलिए हर वस्तु अनित्य है। गुरु कहते हैं, असली “आप” इन छहों से परे है, वह न जन्म लेता है, न नष्ट होता है, बीच के चार विकार भी उसे स्पर्श नहीं करते; ये छह शरीर के साथ घटित होते हैं, और “आप” इन्हें देखता है। साथ में एक गम्भीर बात, वही ब्रह्म समस्त विश्व का कारण है, अर्थात् जो भीतर अचल साक्षी है, वही बाहर समस्त सृष्टि का स्रोत है, अणु और विराट् दोनों एक ही। फिर इस लड़ी की सबसे मनोहर उपमा आती है, बिना तरंग की विशाल जल-राशि, एक ऐसा समुद्र जिस पर एक भी लहर नहीं, नितान्त शान्त, नितान्त अचल, काँच के समान। और दो पद विशेष हैं। सारे भेद जिसमें अस्त हो गए, हमारा सारा व्यवहार भेदों का है, मैं और आप, यह और वह, अपना और पराया, और ब्रह्म वही स्थिति है जहाँ ये समस्त रेखाएँ विलीन हो जाती हैं। और सदा मुक्त, यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, मुक्त होना भविष्य की बात नहीं, आत्मा सदा से मुक्त है, बन्धन एक भ्रान्ति मात्र था। यह श्लोक मुक्ति को भविष्य से उठा कर वर्तमान में रख देता है, आप पहले से, सदा से, मुक्त हैं।

258 · वह ब्रह्म, आप है (5)

जन्मवृद्धिपरिणत्यपक्षय व्याधिनाशनविहीनमव्ययम् ।
विश्वसृष्ट्यवविघातकारणं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 258 ॥

259 · वह ब्रह्म, आप है (6)

अस्तभेदमनपास्तलक्षणं निस्तरङ्गजलराशिनिश्चलम् ।
नित्यमुक्तमविभक्तमूर्ति यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 259 ॥

अब गुरु एक गम्भीर बात कहते हैं, ब्रह्म कारणों की शृंखला से बाहर है। बुद्धि हर वस्तु का एक कारण खोजती है, यह उससे हुआ, वह किसी और से, और वह किसी और से, एक अनन्त सीढ़ी। ब्रह्म वही स्थिति है जहाँ यह सीढ़ी विश्राम पाती है, वह अनेक का कारण है, किन्तु उसका स्वयं कोई कारण नहीं, और इससे भी गहन, वह कार्य और कारण दोनों से अलग है। ब्रह्म इस समस्त कार्य-कारण के व्यापार का अंश ही नहीं, वह वह अधिष्ठान है जिस पर यह समस्त व्यापार प्रतीत होता है, और वह अधिष्ठान, आप है। आगे एक मार्मिक पद आता है, कभी न घटने वाला सुख। संसार का हर सुख क्षीण होता है, समाप्त होता है, कोई इष्ट वस्तु मिली, सुख आया, फिर वह फीका पड़ा, फिर अगली वस्तु की खोज, और सुख का यही व्यय होना ही समस्त दौड़ का मूल है। गुरु कहते हैं, असली “आप” एक ऐसा सुख है जो कभी क्षीण नहीं होता, यह बाहर से नहीं आता, इसलिए बाहर के साथ जाता भी नहीं, आत्मा सुख को पाती नहीं, आत्मा स्वयं वह कभी न घटने वाला सुख है।

260 · वह ब्रह्म, आप है (7)

एकमेव सदनेककारणं कारणान्तरनिरास्यकारणम् ।
कार्यकारणविलक्षणं स्वयं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 260 ॥

261 · वह ब्रह्म, आप है (8)

निर्विकल्पकमनल्पमक्षरं यत्क्षराक्षरविलक्षणं परम् ।
नित्यमव्ययसुखं निरञ्जनं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 261 ॥

अब एक नई, अत्यन्त सटीक उपमा आती है, स्वर्ण। एक स्वर्णकार के यहाँ अनेक वस्तुएँ हैं, अँगूठियाँ, हार, कंगन, प्रतिमाएँ, भिन्न नाम, भिन्न आकार, भिन्न मूल्य। किन्तु वस्तुतः वहाँ कितनी वस्तुएँ हैं, एक ही, स्वर्ण। हर आभूषण केवल स्वर्ण है, एक नाम-रूप में ढला हुआ, आभूषण बनते-बिगड़ते रहते हैं, किन्तु स्वर्ण ज्यों का त्यों, अविकारी। गुरु कहते हैं, यह समस्त संसार ऐसा ही है, अगणित वस्तुएँ, अगणित नाम, किन्तु वस्तुतः सब एक ही स्वर्ण, एक ही ब्रह्म, अनेक रूपों में ढला। और वह स्वर्ण, आप है, आप संसार के किसी एक आभूषण नहीं, आप वह स्वर्ण हैं जो हर आभूषण में है। और तब दस-श्लोकी टेक अपने सर्वोच्च पदों पर समाप्त होती है, सत्-चित्-सुख, अर्थात् सत्-चित्-आनन्द, होना, जानना और आनन्द, तीनों एक साथ। एक और मार्मिक पद यहाँ है, भीतर का एक रस, सबसे समीप का, अखण्ड। यह लड़ी हर बार ब्रह्म को असीम, अनन्त, सर्वोच्च बता कर, हर बार उसे समीप ले आती है, आप है, इसे भीतर बसाइए। विराट् और निकट, एक साथ। और दसवीं बार वही टेक, जो अब केवल बुद्धि में नहीं, अन्तर में बैठ चुकी है।

262 · वह ब्रह्म, आप है (9)

यद्विभाति सदनेकधा भ्रमान् नामरूपगुणविक्रियात्मना ।
हेमवत्स्वयमविक्रियं सदा ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 262 ॥

263 · वह ब्रह्म, आप है (10)

यच्चकास्त्यनपरं परात्परं प्रत्यगेकरसमात्मलक्षणम् ।
सत्यचित्सुखमनन्तमव्ययं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ 263 ॥

अब शेष तीन श्लोक बताते हैं कि इस सबका आचरण क्या है। गुरु एक सुन्दर उपमा देते हैं, हथेली पर रखा जल। हथेली में लिया थोड़ा-सा जल एकदम स्वच्छ होता है, सीधे सामने, हर बूँद दिखती हुई, कोई धुँधलापन नहीं, कोई संशय नहीं। आत्म-ज्ञान भी ऐसा ही निर्मल हो सकता है, और होना चाहिए। दो पद यहाँ महत्त्वपूर्ण हैं, स्वयं और युक्ति। गुरु ने सब समझा दिया, किन्तु अब उस अर्थ को भीतर बसाना शिष्य को स्वयं ही है, औषधि कोई और दे दे, पर भूख स्वयं ही मिटानी पड़ती है। और यह अन्ध-श्रद्धा नहीं, इसे अपनी बुद्धि से, परीक्षण कर, इतना निर्मल कर लेना है कि कोई संशय शेष न रहे।

264 · हथेली के पानी की तरह साफ़

उक्तमर्थमिममात्मनि स्वयं भावयेत्प्रथितयुक्तिभिर्धिया ।
संशयादिरहितं कराम्बुवत् तेन तत्त्वनिगमो भविष्यति ॥ 264 ॥

फिर एक और सुन्दर उपमा आती है, सेना में राजा। एक विशाल सेना खड़ी है, सहस्रों सैनिक, अश्व, गज, ध्वजाएँ, और उस समूची भीड़ में राजा की पहचान कैसे हो। वह वहीं, उन्हीं के बीच खड़ा है, फिर भी एक सधी दृष्टि उसे सबसे अलग पहचान लेती है। भीतर भी एक ऐसी ही भीड़ है, पाँच कोश, इन्द्रियाँ, विचार, भाव, निरन्तर की हलचल, और उस समूची भीड़ के बीच, मौन, राजा खड़ा है, शुद्ध चेतना, साक्षी। साधना यही है, उस भीड़ में राजा को पहचान लेना, फिर उसी का आश्रय लेना, और जब वहाँ स्थिति दृढ़ हो जाए, तब अन्तिम कार्य, समस्त विश्व को ब्रह्म में विलीन कर देना, अर्थात् अब बाहर जो कुछ भी दिखे, उसे पृथक् खण्डों में न देख कर, हर वस्तु को उसी एक ब्रह्म में विलीन होते देखना। और यही भाग 9 का समापन है, जो एक सूक्ष्म पद-योजना पर समाप्त होता है, गुफ़ा। दो गुफ़ाएँ हैं, एक, बुद्धि की गुफ़ा, वह आन्तरिक शान्त स्थान जहाँ ब्रह्म पहले से स्थित है, और दूसरी, शरीर की गुफ़ा, अर्थात् एक नया जन्म, एक नई देह। गुरु कहते हैं, जो पहली गुफ़ा में, ब्रह्म-रूप में, बस जाता है, उसे फिर दूसरी गुफ़ा में प्रवेश नहीं करना पड़ता, जो अपने स्वस्वरूप में लौट आया, उसे फिर देह-देह भटकना नहीं पड़ता। यह “तत् त्वम् असि” वाले समस्त भाग का फल है, महावाक्य सुना, समझा, बुद्धि से निर्मल किया, दस बार “भावयात्मनि” से भीतर बसाया, और अब उसी में स्थित हो जाना है।

265 · सेना के बीच राजा को पहचानना

संबोधमात्रं परिशुद्धतत्त्वं विज्ञाय सङ्घे नृपवच्च सैन्ये ।
तदाश्रयः स्वात्मनि सर्वदा स्थितो विलापय ब्रह्मणि विश्वजातम् ॥ 265 ॥

266 · गुफ़ा में बस जाएँ, फिर लौटना नहीं

बुद्धौ गुहायां सदसद्विलक्षणं ब्रह्मास्ति सत्यं परमद्वितीयम् ।
तदात्मना योऽत्र वसेद्गुहायां पुनर्न तस्याङ्गगुहाप्रवेशः ॥ 266 ॥

आगे का क्रम

अगला पृष्ठ भाग 10 है, वासना का क्षय। महावाक्य समझ में आ जाने पर भी एक बात शेष रहती है। पुरानी वासनाएँ, “मैं ही करता हूँ, मैं ही भोगता हूँ”, ज्ञान के अनन्तर भी बल लगाती रहती हैं। गुरु बताते हैं कि उन वासनाओं को, और अहंकार को, अन्तिम विदा किस प्रकार दी जाती है।

दस बार वह टेक आई, “ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि”, वह ब्रह्म आप है, इसे भीतर बसाइए। यही इस भाग का सार है, इसे एक मन्त्र की भाँति भीतर बसने देना।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, यथावत्।

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अन्तिम बार देखा गया: 2026-05-22

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