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भाग 13 · योग, वैराग्य, भेद कहाँ

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 13 · योग, वैराग्य, और “भेद कहाँ” · श्लोक 367-407

समाधि की विधि अब और सूक्ष्म होती है। योग के पहले द्वार, वैराग्य और बोध के दो पंख, अनात्म-चिंतन से आत्म-चिंतन की ओर मोड़। और बीच में एक स्थायी धुन उभरती है, निर्विकार, निराकार, निर्विशेष में, भेद कहाँ।

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पहले एक बात

भाग 12 की समाधि-विधि यहाँ और बारीक होती है। यह भाग चार धाराओं में बहता है। पहली, योग के पहले द्वार, वाक्-निरोध, अपरिग्रह, एकांत। दूसरी, वैराग्य और बोध, मुक्ति के दो पंख, जिनमें से एक के बिना उड़ान संभव नहीं। तीसरी, अनात्म-चिंतन का त्याग और आत्म-चिंतन का आरंभ, एक-एक उपाधि छोड़ते हुए महाकाश-सी असीमता।

और चौथी, बीच में उभरती एक स्थायी धुन, “निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः”, जो निर्विकार है, निराकार है, निर्विशेष है, उसमें भेद कहाँ। यह प्रश्न चार बार लौटता है (श्लोक 399-402), हर बार एक नए कोण से, और हर बार वही उत्तर शेष रहता है, कहीं नहीं।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से, एक धारा की तरह। कथा यहाँ नहीं, पर गुरु का स्वर यहाँ है, और वही स्वर एक-एक श्लोक को अगले से जोड़ता है। हर कुछ श्लोकों से पहले एक छोटी प्रवाह-पंक्ति रखी है, जो आने वाले श्लोकों का भाव पहले ही हाथ में दे देती है। आधार-स्तंभ हैं श्लोक 374 (वैराग्य-बोध के दो पंख), 384 (महाकाश की उपमा), 388 (स्वयं ब्रह्मा-विष्णु-इंद्र-शिव), और 399-402 (भिदा कुतः की धुन)। हर श्लोक अपने आप में एक ठहराव है।

गुरु सबसे पहले योग का पहला द्वार दिखाते हैं, और वह कोई कठिन साधना नहीं, करना कम कर देना है। वाणी का संयम, अपरिग्रह, इच्छाहीनता, चेष्टा-हीनता, और नित्य एकांत-प्रिय रहना, यही पाँच गुण उस द्वार को खोलते हैं। जब मन की ये पाँच बहिर्मुख वृत्तियाँ क्षीण होती हैं, ऊर्जा भीतर मुड़ने लगती है। फिर वे पूरी विधि को एक शृंखला में पिरो देते हैं। एकांत-स्थिति से इन्द्रियाँ थमती हैं, दम चित्त के संरोध का साधन बनता है, शम से अहं-वासना विलीन होती है, और उससे योगी को ब्राह्मी आनंद-रस का अचल अनुभव होता है। निष्कर्ष एक ही है, मुनि का एकमात्र सतत कार्य है चित्त-निरोध, मन की हलचलों का थमना।

367 · 368

योगस्य प्रथमद्वारं वाङ्निरोधोऽपरिग्रहः ।
निराशा च निरीहा च नित्यमेकान्तशीलता ॥ 367 ॥
एकान्तस्थितिरिन्द्रियोपरमणे हेतुर्दमश्चेतसः संरोधे करणं शमेन विलयं यायादहंवासना ।
तेनानन्दरसानुभूतिरचला ब्राह्मी सदा योगिनः तस्माच्चित्तनिरोध एव सततं कार्यः प्रयत्नो मुनेः ॥ 368 ॥

अब वे चित्त-निरोध की एक सूक्ष्म, चार-कदम वाली विधि देते हैं, जो कठोपनिषद् और गीता की गूँज है। वाणी को मन में रोकें, मन को बुद्धि में रोकें, बुद्धि को उसके साक्षी आत्मा में रोकें, और फिर उस साक्षी को भी पूर्ण-आत्मा, निर्विकल्प में घोल कर परम शांति को भजें। जैसे नदी समुद्र में मिलती है, वैसे हर स्तर अपने ऊपरी स्तर में शांत होता जाता है। और इसके पीछे एक मूल नियम है, मन जिस उपाधि से जुड़ता है, उसी का रूप ले लेता है। देह से जुड़े तो “मैं शरीर हूँ”, प्राण से जुड़े तो “मैं भूखा हूँ”, मन से जुड़े तो “मैं उदास हूँ”। हर बार वही मन, हर बार एक नई पहचान। इसलिए कार्य है, इन उपाधियों से वृत्ति का संयोग छुड़ाना। और जब वह संयोग टूटता है, तब सब के उपराम में एक सुख प्रकट होता है, और सदा-आनंद-रस के अनुभव की एक बाढ़ बहने लगती है, जो थमती नहीं। कार्य जोड़ने का नहीं, थमने देने का है।

369 · 370 · 371

वाचं नियच्छात्मनि तं नियच्छ बुद्धौ धियं यच्छ च बुद्धिसाक्षिणि ।
तं चापि पूर्णात्मनि निर्विकल्पे विलाप्य शान्तिं परमां भजस्व ॥ 369 ॥
देहप्राणेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिभिरुपाधिभिः ।
यैर्यैर्वृत्तेःसमायोगस्ततद्भावोऽस्य योगिनः ॥ 370 ॥
तन्निवृत्त्या मुनेः सम्यक्सर्वोपरमणं सुखम् ।
संदृश्यते सदानन्दरसानुभवविप्लवः ॥ 371 ॥

फिर गुरु त्याग की दो परतें खोलते हैं। बाहर का त्याग और भीतर का त्याग, दोनों केवल विरक्त के लिए संभव हैं, और विरक्त यह मुक्ति की इच्छा से करता है, बलपूर्वक नहीं। बाहरी संग विषयों के साथ दिखता है, और लोग उसे छोड़ने का प्रयत्न करते हैं; पर भीतरी संग, “मैं” और “मेरा” की पकड़, छिपी हुई है, और उसका त्याग सबसे कठिन। दोनों को छोड़ने के लिए दो बातें चाहिए, विरक्ति, अर्थात पकड़ का ढीला होना, और ब्रह्म-निष्ठा, अर्थात दूसरी जगह बस जाना। ब्रह्म में निष्ठित विरक्त ही दोनों संग एक साथ छोड़ पाता है।

372 · 373

अन्तस्त्यागो बहिस्त्यागो विरक्तस्यैव युज्यते ।
त्यजत्यन्तर्बहिःसङ्गं विरक्तस्तु मुमुक्षया ॥ 372 ॥
बहिस्तु विषयैः सङ्गं तथान्तरहमादिभिः ।
विरक्त एव शक्नोति त्यक्तुं ब्रह्मणि निष्ठितः ॥ 373 ॥

अब इस भाग की सबसे यादगार उपमा आती है। वैराग्य और बोध, ये मनुष्य के दो पंख हैं, और पक्षी एक पंख से नहीं उड़ता। केवल वैराग्य एक नीरस, उदास त्याग बन सकता है; केवल बोध सूखी बौद्धिक समझ, बिना जिए। दोनों साथ हों, और दोनों सबल, तभी मुक्ति-महल के शिखर की लता पर चढ़ाई संभव है। फिर गुरु इसे एक कारण-शृंखला में बाँधते हैं, अत्यंत वैराग्य से समाधि, समाधि से दृढ़ प्रबोध, प्रबोध से बंधन-मुक्ति, और मुक्ति से नित्य-सुख। हर कड़ी अगली का द्वार है, और सबसे आरंभ की कड़ी, तीव्र वैराग्य, अधिकांश साधकों के लिए सबसे बड़ा अवरोध भी है। और तब वे एक चौंकाने वाली बात कहते हैं, आत्म-संयमी के लिए वैराग्य से बढ़ कर सुख का जनक कुछ नहीं। जो अपनी इच्छाओं का दास है वह स्व-राज्य नहीं चलाता; पर विरक्त, किसी का दास नहीं, स्व-राज्य का साम्राज्य भोगता है। यही अजस्र मुक्ति-युवती का द्वार है, इसलिए हर जगह अस्पृहा रख कर, सद्-आत्मा में सदा प्रज्ञा करें।

374 · 375 · 376

वैराग्यबोधौ पुरुषस्य पक्षिवत् पक्षौ विजानीहि विचक्षण त्वम् ।
विमुक्तिसौधाग्रलताधिरोहणं ताभ्यां विना नान्यतरेण सिध्यति ॥ 374 ॥
अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः समाहितस्यैव दृढप्रबोधः ।
प्रबुद्धतत्त्वस्य हि बन्धमुक्तिः मुक्तात्मनो नित्यसुखानुभूतिः ॥ 375 ॥
वैराग्यान्न परं सुखस्य जनकं पश्यामि वश्यात्मनः तच्चेच्छुद्धतरात्मबोधसहितं स्वाराज्यसाम्राज्यधुक् ।
एतद्द्वारमजस्रमुक्तियुवतेर्यस्मात्त्वमस्मात्परं सर्वत्रास्पृहया सदात्मनि सदा प्रज्ञां कुरु श्रेयसे ॥ 376 ॥

अब गुरु पूरी संक्षिप्त शिक्षा एक ही श्लोक में रख देते हैं। विष-जैसे विषयों में आशा का छेदन करें, यही असल में मृत्यु का काम करना है; जाति-कुल-आश्रम का अभिमान छोड़ें, क्रियाओं को बहुत दूर से त्यागें, अनित्य देह में आत्म-समझ छोड़ें। और तीन शब्दों में पूरी पहचान बता देते हैं, आप द्रष्टा हैं, मन से परे हैं, वस्तुतः निर्द्वय परम-ब्रह्म हैं; यह बनना नहीं, अभी और मूल से यही हैं। फिर एक पूरी ध्यान-प्रक्रिया, जिसका अंतिम निर्देश सबसे मधुर है। लक्ष्य ब्रह्म पर मन को दृढ़ता से बिठा कर, इन्द्रियों को उनके स्थान में रख कर, निश्चल शरीर के साथ देह-स्थिति की उपेक्षा कर, अखंड-वृत्ति से आत्मा में ब्रह्मानंद-रस का प्रसन्नता से पान करें। यह त्याग की भाषा नहीं, पान की भाषा है; और जब मूल आनंद-रस उपलब्ध है, तो उन रिक्त शेष रसों से क्या प्रयोजन।

377 · 378

आशां छिन्द्धि विषोपमेषु विषयेष्वेषैव मृत्योः कृतिस् त्यक्त्वा जातिकुलाश्रमेष्वभिमतिं मुञ्चातिदूरात्क्रियाः ।
देहादावसति त्यजात्मधिषणां प्रज्ञां कुरुष्वात्मनि त्वं द्रष्टास्यमनोऽसि निर्द्वयपरं ब्रह्मासि यद्वस्तुतः ॥ 377 ॥
लक्ष्ये ब्रह्मणि मानसं दृढतरं संस्थाप्य बाह्येन्द्रियं स्वस्थाने विनिवेश्य निश्चलतनुश्चोपेक्ष्य देहस्थितिम् ।
ब्रह्मात्मैक्यमुपेत्य तन्मायातया चाखण्डवृत्त्यानिशं ब्रह्मानन्दरसं पिबात्मनि मुदा शून्यैः किमन्यैर्भृशम् ॥ 378 ॥

यहाँ गुरु पूरे भाग का मोड़ बताते हैं, अनात्म-चिंतन से आत्म-चिंतन की ओर। मन तो सदा कुछ न कुछ सोचता ही रहता है; कार्य सोचने की दिशा बदलना है। संसार, लोग, समस्याएँ, वस्तुएँ, यह सब अनात्म-चिंतन है, मलिन और दुख-दायी; और असली “मैं”, आनंद-स्वरूप, मुक्ति-दायी, यही आत्म-चिंतन है। और गुरु मार्मिक बात कहते हैं, आत्मा कोई दूर की वस्तु नहीं। वह स्वयं-ज्योति, सबका साक्षी, विज्ञान-कोश में पहले से, हर समय, अनवरत प्रकाशित है। उसे ढूँढना नहीं, केवल उसे लक्ष्य बना कर, असत् से विलक्षण, अखंड-वृत्ति से आत्म-रूप में अनुभव करना है। और यह वृत्ति तीन लक्षणों वाली हो, अनछिन्न, अन्य प्रत्ययों से रहित, और स्फुट; इसी अटूट, बिना मिलावट, स्पष्ट धारा में “मैं वही स्वरूप हूँ” का बोध सतत रेखांकित होता रहे।

379 · 380 · 381

अनात्मचिन्तनं त्यक्त्वा कश्मलं दुःखकारणम् ।
चिन्तयात्मानमानन्दरूपं यन्मुक्तिकारणम् ॥ 379 ॥
एष स्वयंज्योतिरशेषसाक्षी विज्ञानकोशो विलसत्यजस्रम् ।
लक्ष्यं विधायैनमसद्विलक्षणम् अखण्डवृत्त्यात्मतयानुभावय ॥ 380 ॥
एतमच्छिन्नया वृत्त्या प्रत्ययान्तरशून्यया ।
उल्लेखयन्विजानीयात्स्वस्वरूपतया स्फुटम् ॥ 381 ॥

अब अभ्यास और सूक्ष्म होता है। असली आत्मा में आत्मत्व को दृढ़ करते हुए, और “मैं” आदि में आत्म-भाव छोड़ते हुए, उनमें उदासीन हो कर रहें, ठीक सामने पड़े स्पष्ट घड़े की तरह; वह दिखता है, पर उसके प्रति न लगाव, न द्वेष, केवल “वह वहाँ है”। अपने अहंकार, अपने मन, अपनी पुरानी पहचान को भी ऐसे ही देखें। फिर शुद्ध अंतःकरण को उसके स्वरूप, अर्थात बोध-मात्र साक्षी, में बसा कर धीरे-धीरे निश्चलता लाएँ, और तब पूर्ण-स्व को ही देखें। यह “शनैः शनैः”, धीरे-धीरे होता है। हिलते जल के पात्र को बलपूर्वक थमाएँ तो वह और हिलता है; केवल रख दें, तो वह स्वयं शांत हो जाता है। मन भी ऐसा ही है, साक्षी में बसते-बसते निश्चलता अपने आप आती है, और तब पूरा रूप प्रकट होने लगता है।

382 · 383

अत्रात्मत्वं दृढीकुर्वन्नहमादिषु संत्यजन् ।
उदासीनतया तेषु तिष्ठेत्स्फुटघटादिवत् ॥ 382 ॥
विशुद्धमन्तःकरणं स्वरूपे निवेश्य साक्षिण्यवबोधमात्रे ।
शनैः शनैर्निश्चलतामुपानयन् पूर्णं स्वमेवानुविलोकयेत्ततः ॥ 383 ॥

अब गुरु एक उदार, मुक्तिदायी उपमा देते हैं, महाकाश। देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, अहंकार, ये सब अज्ञान से गढ़ी उपाधियाँ हैं; इन सबसे मुक्त, अखंड, पूर्ण आत्मा को विशाल आकाश की तरह देखें। घड़े का आकाश छोटा प्रतीत होता है, पर असल में वह महाकाश ही है, घड़े की दीवारों ने उसे छोटा दिखा रखा है; आत्मा भी असल में महाकाश है, उपाधियों ने उसे “छोटा मैं” बना रखा है। और आकाश एक ही है, चाहे घड़े में हो, अनाज-कोठार में, या सुई की नोक के पास, अनगिनत आकारों के बीच भी वह विविध नहीं होता, एक ही रहता है। शुद्ध आत्म-रूप ऐसा ही, हर “मैं” में प्रकट, पर अनेक नहीं, एक। यहाँ तक कि ब्रह्मा से ले कर घास के तिनके तक, हर उपाधि केवल मिथ्या है; ऊँचा-नीचा, बड़ा-छोटा, सब उपाधियों के खेल। अस्तित्व के स्तर पर सब एक ही आत्मा हैं।

384 · 385 · 386

देहेन्द्रियप्राणमनोऽहमादिभिः स्वाज्ञानकॢप्तैरखिलैरुपाधिभिः ।
विमुक्तमात्मानमखण्डरूपं पूर्णं महाकाशमिवावलोकयेत् ॥ 384 ॥
घटकलशकुसूलसूचिमुख्यैः गगनमुपाधिशतैर्विमुक्तमेकम् ।
भवति न विविधं तथैव शुद्धं परमहमादिविमुक्तमेकमेव ॥ 385 ॥
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ता मृषामात्रा उपाधयः ।
ततः पूर्णं स्वमात्मानं पश्येदेकात्मना स्थितम् ॥ 386 ॥

अब रस्सी-साँप की पुरानी उपमा एक नई परत के साथ लौटती है। जहाँ भ्रम से कुछ गढ़ा गया, विवेक से देखने पर वह केवल अपने आधार-मात्र है, उससे भिन्न नहीं। साँप कभी रस्सी से अलग था ही नहीं, वह रस्सी ही थी, केवल विपरीत समझ में; भ्रम मिटा तो साँप “हटा” नहीं, उसकी असली पहचान खुली। उसी तरह यह विश्व आत्म-स्वरूप ही है। और तब गुरु का सबसे प्रबल उद्घोष आता है, आप स्वयं ही ब्रह्मा हैं, स्वयं विष्णु, स्वयं इंद्र, स्वयं शिव, स्वयं ही यह पूरा विश्व, स्वयं से भिन्न कुछ नहीं। यह अहंकार की घोषणा नहीं, यह “अहम् ब्रह्मास्मि” का खुला उद्घोष है, रचयिता, पालक, संहारक, और पूरा विश्व, सब उसी एक आत्मा के रूप, और आप वही आत्मा। फिर वे इसे स्थान के हर आयाम में बिखेर देते हैं, अंदर स्वयं, बाहर स्वयं, आगे-पीछे स्वयं, उत्तर-दक्षिण स्वयं, ऊपर-नीचे स्वयं; हर ओर वही एक, और यह कोई भविष्य की बात नहीं, यह वर्तमान सत्य है।

387 · 388 · 389

यत्र भ्रान्त्या कल्पितं तद्विवेके तत्तन्मात्रं नैव तस्माद्विभिन्नम् ।
भ्रान्तेर्नाशे भाति दृष्टाहितत्त्वं रज्जुस्तद्वद्विश्वमात्मस्वरूपम् ॥ 387 ॥
स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः स्वयमिन्द्रः स्वयं शिवः ।
स्वयं विश्वमिदं सर्वं स्वस्मादन्यन्न किंचन ॥ 388 ॥
अन्तः स्वयं चापि बहिः स्वयं च स्वयं पुरस्तात्स्वयमेव पश्चात् ।
स्वयं ह्यावाच्यां स्वयमप्युदीच्यां तथोपरिष्टात्स्वयमप्यधस्तात् ॥ 389 ॥

अब गुरु जल की एक सरल, ठोस उपमा लाते हैं। समुद्र में लहर, झाग, भँवर, बुलबुले, ये सब अलग-अलग वस्तुएँ प्रतीत होती हैं, पर स्वरूप से सब वही एक जल है। वैसे ही देह से ले कर अहंकार तक सब चित् ही है, एक-रस, विशुद्ध; फेन से भय नहीं, बुलबुले से सम्मान की अपेक्षा नहीं, भीतर भी सब केवल चित् हैं। फिर मिट्टी-घड़े की उपमा, एक तीखे शब्द के साथ। यह पूरा जगत सत् ही है, और जैसे मिट्टी से कलश-घड़े-कुंभ भिन्न नहीं, वैसे सत् से कुछ भिन्न नहीं; पर भ्रांत व्यक्ति “माया-मदिरा” के नशे में “आप-मैं” का भेद कहता है। नशे में मनुष्य विपरीत देखता है; नशा उतरे तो सब एक मिट्टी, सब एक सत्। और यही कारण है कि श्रुति “नान्यद्”, और कुछ नहीं, बार-बार दोहराती है। “दूसरा है” वाली पुरानी आदत बहुत प्रबल है, एक बार सुन कर नहीं मिटती; इसी से बार-बार, मिथ्या अध्यास की निवृत्ति तक, यह दोहराव चलता है।

390 · 391 · 392

तरङ्गफेनभ्रमबुद्बुदादि सर्वं स्वरूपेण जलं यथा तथा ।
चिदेव देहाद्यहमन्तमेतत् सर्वं चिदेवैकरसं विशुद्धम् ॥ 390 ॥
सदेवेदं सर्वं जगदवगतं वाङ्मनसयोः सतोऽन्यन्नास्त्येव प्रकृतिपरसीम्नि स्थितवतः ।
पृथक्किं मृत्स्नायाः कलशघटकुम्भाद्यवगतं वदत्येष भ्रान्तस्त्वमहमिति मायामदिरया ॥ 391 ॥
क्रियासमभिहारेण यत्र नान्यदिति श्रुतिः ।
ब्रवीति द्वैतराहित्यं मिथ्याध्यासनिवृत्तये ॥ 392 ॥

अब वर्णन शिखर पर पहुँचता है। आकाश की तरह निर्मल, निर्विकल्प, निःसीम, निःस्पंदन, निर्विकार, अंदर-बाहर के भेद से रहित, अनन्य, अद्वय, आप स्वयं परम-ब्रह्म हैं, फिर और क्या जानना शेष है। विशेषणों की यह लड़ी हर “मैं छोटा हूँ” की धारणा को ढीला करती जाती है, और एक बार यह जान लिया कि आप स्वयं परम-ब्रह्म हैं, तो समस्त बौद्धिक खोज वहीं समाप्त। गुरु मानो थक कर पूछते हैं, और बहुत कुछ कहने को क्या रह गया; केवल तीन वाक्य, ब्रह्म ही जीव, ब्रह्म ही जगत, ब्रह्म ही “मैं”। प्रबुद्ध-मति वाले इसी एक बात पर टिक कर, बाह्य सब छोड़ कर, ब्रह्म-रूप हो कर रहते हैं, निरंतर चित्-आनंद की धारा में स्थिर। यह अमूर्त बात नहीं, जीने का एक तरीका है।

393 · 394

आकाशवन्निर्मलनिर्विकल्पं निःसीमनिःस्पन्दननिर्विकारम् ।
अन्तर्बहिःशून्यमनन्यमद्वयं स्वयं परं ब्रह्म किमस्ति बोध्यम् ॥ 393 ॥
वक्तव्यं किमु विद्यतेऽत्र बहुधा ब्रह्मैव जीवः स्वयं ब्रह्मैतज्जगदाततं नु सकलं ब्रह्माद्वितीयं श्रुतिः ।
ब्रह्मैवाहमिति प्रबुद्धमतयः संत्यक्तबाह्याः स्फुटं ब्रह्मीभूय वसन्ति सन्ततचिदानन्दात्मनैतद्ध्रुवम् ॥ 394 ॥

अब गुरु एक क्रम बताते हैं, परत-दर-परत पकड़ छोड़ने का। पहले स्थूल शरीर, मल-माया-कोश, से चिपकी “मैं”-आशा को बल से छोड़ें, क्योंकि वह दुराग्रही है; फिर वायु-जैसे सूक्ष्म शरीर से चिपकी पकड़ भी छोड़ें, जिसका त्याग तुलना में सरल है। और जो शेष रहे, वेद-कीर्तित, नित्य, आनंद-मूर्ति, उसी को “स्वयं” जान कर ब्रह्म-रूप में स्थित हों। फिर एक मार्मिक शब्द-संगति आती है, “शव” और “शिव”, एक अक्षर का अंतर, पर पूरे संसार का अंतर। जब तक मनुष्य “मैं यह शरीर हूँ” मान कर शव-आकार में रमा है, तब तक अपवित्र, क्लेश-ग्रस्त, जन्म-मृत्यु-व्याधि का घर; पर जब आत्मा को शुद्ध, शिव-आकार, अचल अनुभव करता है, तब इन तीनों से मुक्त। और कार्य केवल इतना, आत्मा पर आरोपित सब आभास-वस्तुएँ, जैसे रस्सी पर साँप, उतार देना; जो शेष रहे वही असली रूप है, परम-ब्रह्म, पूर्ण, अद्वय, अक्रिय। यह जोड़ने का नहीं, हटाने का कार्य है।

395 · 396 · 397

जहि मलमायाकोशेऽहंधियोत्थापिताशां प्रसभमनिलकल्पे लिङ्गदेहेऽपि पश्चात् ।
निगमगदितकीर्तिं नित्यमानन्दमूर्तिं स्वयमिति परिचीय ब्रह्मरूपेण तिष्ठ ॥ 395 ॥
शवाकारं यावद्भजति मनुजस्तावदशुचिः परेभ्यः स्यात्क्लेशो जननमरणव्याधिनिलयः ।
यदात्मानं शुद्धं कलयति शिवाकारमचलम् तदा तेभ्यो मुक्तो भवति हि तदाह श्रुतिरपि ॥ 396 ॥
स्वात्मन्यारोपिताशेषाभासर्वस्तुनिरासतः ।
स्वयमेव परं ब्रह्म पूर्णमद्वयमक्रियम् ॥ 397 ॥

अब समाधि की बात लौटती है, और इसके बाद वह स्थायी धुन आरंभ होगी। जब चित्त-वृत्ति निर्विकल्प परम-आत्मा-ब्रह्म में समाहित हो जाती है, तब कोई “विकल्प”, कोई यह-वह की बात, दिखती ही नहीं; यदि उठती भी है तो केवल वाग्जाल भर, असली कुछ नहीं। जैसे नशा उतरने पर नशे की आकृतियाँ केवल स्मृति-मात्र रह जाती हैं, वैसे समाधि के पश्चात “आप-मैं-यह” वाली बातें केवल आदत की बकबक रह जाती हैं। और यहीं से चार श्लोकों की एक धड़कन शुरू होती है, “निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः”। पहली बार, “विश्व है” वाला यह विकल्प एक-वस्तु में असत् के समान है; जो निर्विकार है, जो बदलता नहीं, जो निराकार है, जिसका आकार नहीं, जो निर्विशेष है, जिसमें भेद नहीं, उसमें भेद बैठने की जगह कहाँ है। यह विस्मय का प्रश्न है, और फिर भी जीव निरंतर भेद रच लेता है, इसी से गुरु इसे बार-बार दोहराते हैं।

398 · 399

समाहितायां सति चित्तवृत्तौ परात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे ।
न दृश्यते कश्चिदयं विकल्पः प्रजल्पमात्रः परिशिष्यते यतः ॥ 398 ॥
असत्कल्पो विकल्पोऽयं विश्वमित्येकवस्तुनि ।
निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥ 399 ॥

धुन दूसरी बार लौटती है, और एक गहरी परत खोलती है। अनुभव की तीन परतें होती हैं, देखने वाला, देखने की क्रिया, और देखी जाने वाली वस्तु; यह त्रिपुटी भी एक विकार है। ब्रह्म इन तीनों से पूर्व का है, जहाँ “मैं”, “देखना”, और “वह” का कोई अंतर ही नहीं, तो ऐसी जगह में भेद कहाँ बैठेगा। तीसरी बार एक नई उपमा आती है, प्रलय-समुद्र; पुराणों के अनुसार प्रलय में सब कुछ एक विशाल समुद्र में घुल जाता है, न भूमि, न पर्वत, न द्वीप, केवल जल, हर ओर, बिना दरार, और ऐसे अत्यंत-परिपूर्ण समुद्र में भेद कैसा। और चौथी, अंतिम बार, अग्नि में अंधकार की उपमा; अंधकार-पूर्ण कक्ष में मशाल जलाएँ तो अंधकार अग्नि में “विलीन” हो जाता है, पर असल में वह “कुछ” था ही नहीं, केवल प्रकाश का अभाव था। उसी तरह ब्रह्म का प्रकाश होने पर भ्रम विलीन हो जाता है, मानो कभी था ही नहीं।

400 · 401 · 402

द्रष्टुदर्शनदृश्यादिभावशून्यैकवस्तुनि ।
निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥ 400 ॥
कल्पार्णव इवात्यन्तपरिपूर्णैकवस्तुनि ।
निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥ 401 ॥
तेजसीव तमो यत्र प्रलीनं भ्रान्तिकारणम् ।
अद्वितीये परे तत्त्वे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥ 402 ॥

धुन के बाद गुरु एक रोज़ का प्रमाण रखते हैं, गहरी निद्रा। एक-आत्मक परम-तत्व में भेद की बात कैसे टिके; हर रात्रि, सुख-मात्र सुषुप्ति में, जीव “एक-आत्मक” अनुभव में रहता है, कोई दूसरा नहीं, कोई भेद नहीं, केवल सुख, और वहाँ भेद किसने देखा। कोई नहीं। यह प्रमाण है कि अद्वैत असंभव या रहस्यमय नहीं, यह अनुभव तो हर रात्रि होता है; बस वही अनुभव अब जागते हुए भी स्थिर रखना है। फिर एक साहसी वचन, “विश्व नहीं”, पर इसका भाव ठीक से समझना है, यह परतत्व-बोध के पश्चात वाली बात है। दो उपमाएँ, रस्सी का साँप और मृगतृष्णा का जल; दोनों दिखते हैं, पर तीनों कालों में हैं ही नहीं, न पहले, न अब, न आगे, केवल भ्रम के समय “दिखे”। विश्व भी वैसा ही, बोध के पश्चात नहीं रहता, और जब “था” तब भी असल में था नहीं, केवल प्रतीत होता रहा।

403 · 404

एकात्मके परे तत्त्वे भेदवार्ता कथं वसेत् ।
सुषुप्तौ सुखमात्रायां भेदः केनावलोकितः ॥ 403 ॥
न ह्यस्ति विश्वं परतत्त्वबोधात् सदात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे ।
कालत्रये नाप्यहिरीक्षितो गुणे न ह्यम्बुबिन्दुर्मृगतृष्णिकायाम् ॥ 404 ॥

अब गुरु भाग का समापन दो प्रमाणों और एक व्यावहारिक निष्कर्ष पर लाते हैं। पहले शास्त्र और अनुभव, दोनों एक ही बात कहते हैं, यह द्वैत केवल माया है, परमार्थ से अद्वैत; श्रुति यह प्रत्यक्ष कहती है, और हर रात्रि की सुषुप्ति इसका अनुभव भी कराती है। इसलिए अद्वैत केवल सिद्धांत नहीं, रोज़ के अनुभव में बसा है, बस पहचान में नहीं आता। फिर एक तकनीकी पर अनिवार्य बात, आरोपित अपने अधिष्ठान से अनन्य है; पंडितों ने रस्सी-साँप में यही देखा, साँप तो रस्सी ही है, केवल विपरीत नाम में, और जब तक भ्रम है तब तक यह विकल्प भ्रम पर ही जीता है, भ्रम मिटते ही पहचाना जाता है कि कभी भिन्न था ही नहीं। और अंत में सीधा निष्कर्ष, यह भेद कहाँ से आता है, चित्त से; चित्त के अभाव में कुछ नहीं रहता। तो कार्य “भेद कहाँ” की बाहरी चर्चा में नहीं, वहीं है जहाँ भेद उठता है, चित्त में। चित्त को भीतर के परम-आत्मा में समाहित कर दें, सब भेद अपने आप घुल जाते हैं।

405 · 406 · 407

मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ।
इति ब्रूते श्रुतिः साक्षात्सुषुप्तावनुभूयते ॥ 405 ॥
अनन्यत्वमधिष्ठानादारोप्यस्य निरीक्षितम् ।
पण्डितै रज्जुसर्पादौ विकल्पो भ्रान्तिजीवनः ॥ 406 ॥
चित्तमूलो विकल्पोऽयं चित्ताभावे न कश्चन ।
अतश्चित्तं समाधेहि प्रत्यग्रूपे परात्मनि ॥ 407 ॥

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना, भाग 14, जिसमें विद्वान हृदय में पूर्ण ब्रह्म को धारण करता है (तीन-श्लोकी “हृदि कलयति विद्वान्” धुन), जीवन्मुक्ति की प्रसिद्ध परिभाषा (वैराग्य, बोध, उपरति, शांति), और मुक्त-आत्मा का स्वरूप।

और एक प्रश्न मन में रखें, श्लोक 374 कहता है, वैराग्य और बोध दो पंख हैं। आज विचार करें, कौन-सा पंख दुर्बल है, वैराग्य या बोध, और जो दुर्बल है, उसे आज थोड़ा बल दें।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, verbatim।

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आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-23

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