विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 13 · योग, वैराग्य, और “भेद कहाँ” · श्लोक 367-407
समाधि की विधि अब और साफ़, योग के पहले द्वार, वैराग्य और बोध दो पंख, अनात्म-चिंतन छोड़ कर आत्म-चिंतन। और बीच में एक टेक: निर्विकार, निराकार, निर्विशेष में, भेद कहाँ?
पहले एक बात
भाग 12 की समाधि-विधि अब और बारीक होती है। यह भाग चार साँसों में बहता है। पहली, योग के पहले द्वार (वाक्-निरोध, अपरिग्रह, अकेलापन)। दूसरी, वैराग्य और बोध, मुक्ति के दो पंख, दोनों के बिना उड़ान नहीं। तीसरी, अनात्म-चिंतन छोड़ो, आत्म-चिंतन शुरू करो; एक-एक उपाधि छोड़ कर महाकाश की तरह असीम बनो।
और चौथी, सबसे प्यारी, बीच में एक टेक उभरती है: “निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः”, जो निर्विकार है, निराकार है, निर्विशेष है, उसमें भेद कहाँ? यह सवाल चार बार लौटता है (श्लोक 399-402), हर बार एक नए कोण से, और हर बार वही उत्तर: कहाँ।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। चार हिस्से, योग के द्वार + दो पंख (367-376), अभ्यास की विधि (377-386), विश्व-ही-आत्मा और स्वयं-ब्रह्मा (387-397), समाधि और “भेद कहाँ” टेक (398-407)। असली खंभे: 374 (वैराग्य-बोध दो पंख), 384 (महाकाश की तरह), 388 (स्वयं ब्रह्मा-विष्णु-इंद्र-शिव), 399-402 (भिदा कुतः टेक)। हर श्लोक पर anchor है।
367 · योग का पहला द्वार
योगस्य प्रथमद्वारं वाङ्निरोधोऽपरिग्रहः ।
निराशा च निरीहा च नित्यमेकान्तशीलता ॥ 367 ॥
yogasya prathama-dvāraṁ vāṅ-nirodho’parigrahaḥ · nirāśā ca nirīhā ca nityam ekānta-śīlatā
शब्दार्थ: योगस्य प्रथम-द्वारं · योग का पहला द्वार · वाक्-निरोधः · वाणी का संयम · अपरिग्रहः · अपरिग्रह (न जमा करना) · निराशा · इच्छाहीनता · निरीहा · चेष्टा-हीनता · नित्यम् एकान्त-शीलता · नित्य एकांत-प्रिय रहना।
अर्थ: योग का पहला द्वार है, वाणी का संयम, अपरिग्रह, इच्छाहीनता, चेष्टा-हीनता, और नित्य एकांत-प्रिय रहना।
भावार्थ: गुरु योग की एक चाबी जैसी सूची देते हैं, पाँच गुण जो योग के “पहले द्वार” खोलते हैं।
देखिए ये सब “रोकने” वाले गुण हैं, कम बोलना, कम जमा करना, कम चाहना, कम चेष्टा, ज़्यादा एकांत। आज की दुनिया इनके बिल्कुल उल्टा कहती है, बोलो, जमा करो, चाहो, करो, सबके साथ रहो। गुरु कह रहे हैं, पहला कदम है: कम करो। मन के पाँच “बाहर वाले” चैनल, ये पाँच ही हैं, और जब ये कम होते हैं, ऊर्जा भीतर मुड़ने लगती है।
368 · चित्त-निरोध, एकमात्र काम
एकान्तस्थितिरिन्द्रियोपरमणे हेतुर्दमश्चेतसः संरोधे करणं शमेन विलयं यायादहंवासना ।
तेनानन्दरसानुभूतिरचला ब्राह्मी सदा योगिनः तस्माच्चित्तनिरोध एव सततं कार्यः प्रयत्नो मुनेः ॥ 368 ॥
ekānta-sthitir indriyoparamaṇe hetur damaś cetasaḥ saṁrodhe karaṇaṁ śamena vilayaṁ yāyād ahaṁ-vāsanā · tenānanda-rasānubhūtir acalā brāhmī sadā yoginas tasmāc citta-nirodha eva satataṁ kāryaḥ prayatno muneḥ
शब्दार्थ: एकान्त-स्थितिः इन्द्रिय-उपरमणे हेतुः · एकांत-स्थिति इन्द्रियों के थमने का कारण · दमः चेतसः संरोधे करणम् · दम चित्त के संरोध का करण · शमेन विलयं यायात् अहं-वासना · शम से अहं-वासना विलय में जाती है · तेन आनन्द-रस-अनुभूतिः अचला ब्राह्मी · उससे ब्राह्मी आनंद-रस का अचल अनुभव · चित्त-निरोधः एव सततं कार्यः प्रयत्नः मुनेः · इसलिए चित्त-निरोध ही मुनि का लगातार किया जाने वाला प्रयत्न।
अर्थ: एकांत-स्थिति इन्द्रियों के थमने का कारण है; दम चित्त के संरोध का साधन; शम से अहं-वासना विलय हो जाती है; और उससे योगी को ब्राह्मी आनंद-रस का अचल अनुभव। इसलिए चित्त-निरोध ही मुनि का लगातार किया जाने वाला एकमात्र प्रयत्न है।
भावार्थ: गुरु पूरी योग-विधि को एक श्रृंखला में रख देते हैं, और निष्कर्ष पर लाते हैं: चित्त-निरोध। यानी मन की हलचलों का थमना।
क्रम सुंदर है: एकांत → इन्द्रियाँ थमें → दम मिले → चित्त संरोध हो → अहं-वासना विलय → आनंद-रस का अचल अनुभव। एक के बाद एक, स्वाभाविक। और गुरु अंत में दो-टूक कह देते हैं, मुनि का “एक ही” काम है: चित्त-निरोध। बाक़ी सब उसी के लिए। पतंजलि की प्रसिद्ध परिभाषा, “योगः चित्त-वृत्ति-निरोधः”, यहाँ गूँजती है।
369 · वाणी-बुद्धि-साक्षी, एक-एक कर के पूर्ण आत्मा में
वाचं नियच्छात्मनि तं नियच्छ बुद्धौ धियं यच्छ च बुद्धिसाक्षिणि ।
तं चापि पूर्णात्मनि निर्विकल्पे विलाप्य शान्तिं परमां भजस्व ॥ 369 ॥
vācaṁ niyacchātmani taṁ niyaccha buddhau dhiyaṁ yaccha ca buddhi-sākṣiṇi · taṁ cāpi pūrṇātmani nirvikalpe vilāpya śāntiṁ paramāṁ bhajasva
शब्दार्थ: वाचं नियच्छ आत्मनि · वाणी को मन में रोक · तं नियच्छ बुद्धौ · मन को बुद्धि में रोक · धियं यच्छ बुद्धि-साक्षिणि · बुद्धि को बुद्धि-साक्षी (आत्मा) में रोक · तं चापि पूर्ण-आत्मनि निर्विकल्पे विलाप्य · उसे भी पूर्ण-आत्मा, निर्विकल्प में घोल कर · शान्तिं परमां भजस्व · परम शांति को भज।
अर्थ: वाणी को मन में रोक, मन को बुद्धि में रोक, बुद्धि को बुद्धि-साक्षी (आत्मा) में रोक। फिर उस [साक्षी] को भी पूर्ण-आत्मा, निर्विकल्प में घोल कर, परम शांति को भज।
भावार्थ: यह एक बेहद सुंदर, चार-कदम वाली विधि है। हर कदम पर एक स्तर को अगले ऊपरी स्तर में “रोक” कर शांत करना। यह कठोपनिषद् और गीता की प्रसिद्ध विधि की गूँज है।
तस्वीर: एक नदी समुद्र में मिलती है, समुद्र पूरे जल-संग्रह में, वह आख़िर में मूल जल-तत्व में। वाणी → मन → बुद्धि → साक्षी → पूर्ण-आत्मा। हर स्तर पर एक पर्दा हटता है, हर बार सूक्ष्मतर। और अंत में, “शान्तिं परमां भजस्व”, परम शांति को भज। यह कोई दर्शन नहीं। एक रोज़ का अभ्यास है।
370 · जिस उपाधि से जुड़ी वृत्ति, वैसा बनता है
देहप्राणेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिभिरुपाधिभिः ।
यैर्यैर्वृत्तेःसमायोगस्ततद्भावोऽस्य योगिनः ॥ 370 ॥
deha-prāṇendriya-mano-buddhy-ādibhir upādhibhiḥ · yair yair vṛtteḥ samāyogas tat-tad-bhāvo’sya yoginaḥ
शब्दार्थ: देह-प्राण-इन्द्रिय-मनो-बुद्धि-आदिभिः उपाधिभिः · देह, प्राण, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि उपाधियों से · यैः यैः वृत्तेः समायोगः · जिन-जिन से वृत्ति का संयोग · तत्-तद्-भावः अस्य योगिनः · वैसा-वैसा भाव योगी का।
अर्थ: देह, प्राण, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, जिन-जिन उपाधियों से योगी की वृत्ति का संयोग होता है, वैसा-वैसा भाव उसका हो जाता है।
भावार्थ: गुरु एक ज़रूरी मनोवैज्ञानिक सिद्धांत बताते हैं, मन जिस उपाधि से जुड़ता है, उसी का रूप ले लेता है।
मन शरीर से जुड़ा, “मैं शरीर हूँ।” प्राण से जुड़ा, “मैं भूखा हूँ।” मन से जुड़ा, “मैं उदास हूँ।” बुद्धि से जुड़ा, “मैं समझदार हूँ।” हर बार वही मन, हर बार एक नई “मैं” वाली पहचान। तो काम है: इन उपाधियों से वृत्ति का संयोग छुड़ाओ। अगला श्लोक उसका फल बताएगा।
371 · संयोग टूटे, सब उपराम में सुख
तन्निवृत्त्या मुनेः सम्यक्सर्वोपरमणं सुखम् ।
संदृश्यते सदानन्दरसानुभवविप्लवः ॥ 371 ॥
tan-nivṛttyā muneḥ samyak sarvoparamaṇaṁ sukham · saṁdṛśyate sadānanda-rasānubhava-viplavaḥ
शब्दार्थ: तत्-निवृत्त्या · उसकी निवृत्ति से · मुनेः सम्यक् सर्व-उपरमणं सुखम् · मुनि का सब के थमने में सुख · संदृश्यते · दिखता है · सदा-आनन्द-रस-अनुभव-विप्लवः · सदा-आनंद-रस के अनुभव की बाढ़।
अर्थ: उस (उपाधि-संयोग) की निवृत्ति से, मुनि को सब-कुछ-थमने का सुख होता है, सदा-आनंद-रस के अनुभव की एक बाढ़ दिखती है।
भावार्थ: गुरु एक प्यारा शब्द देते हैं, “विप्लव”, बाढ़। आम तौर पर बाढ़ डराने वाली होती है। पर यहाँ यह आनंद की बाढ़ है, रुकती नहीं। थमती नहीं। बस बहती जाती है।
और रास्ता? “सर्व-उपरमणम्”, सब कुछ थम जाए। यह आज की दुनिया के बिल्कुल उल्टा है, हम चाहते हैं और-और-और। गुरु कहते हैं, सब थम जाए, और तब असली बाढ़, आनंद की, अपने आप आती है। काम जोड़ने का नहीं। थमने देने का है।
372 · विरक्त ही, अंदर-बाहर के त्याग में सक्षम
अन्तस्त्यागो बहिस्त्यागो विरक्तस्यैव युज्यते ।
त्यजत्यन्तर्बहिःसङ्गं विरक्तस्तु मुमुक्षया ॥ 372 ॥
antas-tyāgo bahis-tyāgo viraktasyaiva yujyate · tyajaty antar-bahiḥ-saṅgaṁ viraktas tu mumukṣayā
शब्दार्थ: अन्तः-त्यागः बहिः-त्यागः · अंदर का त्याग, बाहर का त्याग · विरक्तस्य एव युज्यते · विरक्त के लिए ही संभव · त्यजति अन्तर्-बहिः-सङ्गं विरक्तः · विरक्त अंदर-बाहर का संग छोड़ता है · मुमुक्षया · मुक्ति की इच्छा से।
अर्थ: अंदर का त्याग और बाहर का त्याग, दोनों विरक्त के लिए ही संभव हैं। विरक्त मुक्ति की इच्छा से अंदर-बाहर के संग को छोड़ता है।
भावार्थ: गुरु एक बारीक बात कहते हैं, असली त्याग दो परतों में होता है: बाहर का (विषयों से) और अंदर का (अहं, मम-भाव से)।
और दोनों, विरक्त ही कर सकता है। यानी जिसके भीतर एक प्रेम जाग गया हैं, मुक्ति का प्रेम, वही ये दोनों त्याग सहज कर सकता है। ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं। जैसे एक चीज़ की चाह जाग जाए, बाक़ी सब अपने आप फीका पड़ता है, कुछ “छोड़ने” की मेहनत नहीं करनी पड़ती।
373 · ब्रह्म-निष्ठित विरक्त, बाहरी और भीतरी दोनों
बहिस्तु विषयैः सङ्गं तथान्तरहमादिभिः ।
विरक्त एव शक्नोति त्यक्तुं ब्रह्मणि निष्ठितः ॥ 373 ॥
bahis tu viṣayaiḥ saṅgaṁ tathāntar aham-ādibhiḥ · virakta eva śaknoti tyaktuṁ brahmaṇi niṣṭhitaḥ
शब्दार्थ: बहिः विषयैः सङ्गं · बाहर विषयों से संग · तथा अन्तः अहम्-आदिभिः · वैसे ही अंदर “मैं” आदि से · विरक्तः एव शक्नोति त्यक्तुं · विरक्त ही छोड़ सकता है · ब्रह्मणि निष्ठितः · ब्रह्म में निष्ठा रखने वाला।
अर्थ: बाहर विषयों से संग, और अंदर “मैं” आदि से संग, विरक्त ही, ब्रह्म में निष्ठित, इसे छोड़ सकता है।
भावार्थ: गुरु श्लोक 372 की बात साफ़ करते हैं, दोनों तरह के “संग” के नाम लेते हैं।
बाहरी संग, विषयों के साथ। यह दिखता है, और लोग छोड़ने की कोशिश करते हैं। पर भीतरी संग, “मैं”, “मेरा” वाली पकड़, यह छिपा हुआ है, और इसे छोड़ना सबसे मुश्किल। दोनों को छोड़ने के लिए दो चीज़ें चाहिए: विरक्ति (पकड़ ढीली होना) और ब्रह्म-निष्ठा (दूसरी जगह बस जाना)। दोनों साथ, तभी काम पूरा।
374 · वैराग्य और बोध, दो पंख
वैराग्यबोधौ पुरुषस्य पक्षिवत् पक्षौ विजानीहि विचक्षण त्वम् ।
विमुक्तिसौधाग्रलताधिरोहणं ताभ्यां विना नान्यतरेण सिध्यति ॥ 374 ॥
vairāgya-bodhau puruṣasya pakṣivat pakṣau vijānīhi vicakṣaṇa tvam · vimukti-saudhāgra-latādhirohaṇaṁ tābhyāṁ vinā nānyatareṇa sidhyati
शब्दार्थ: वैराग्य-बोधौ · वैराग्य और बोध · पुरुषस्य पक्षि-वत् पक्षौ · पक्षी के दो पंखों की तरह · विजानीहि विचक्षण त्वम् · चतुर आप जान · विमुक्ति-सौध-अग्र-लता-अधिरोहणं · मुक्ति-महल के शीर्ष की लता पर चढ़ना · ताभ्यां विना · इन दोनों के बिना · न अन्यतरेण सिध्यति · सिर्फ़ एक से नहीं होता।
अर्थ: वैराग्य और बोध, हे चतुर, इन्हें मनुष्य के पक्षी-जैसे दो पंख जान। मुक्ति-महल के शीर्ष की लता पर चढ़ाई इन दोनों के बिना, सिर्फ़ एक से, नहीं होती।
भावार्थ: यह विवेकचूडामणि की सबसे प्यारी, सबसे यादगार उपमाओं में से है, पक्षी के दो पंख। एक पक्षी एक पंख से नहीं उड़ता; दोनों चाहिए, और दोनों मज़बूत।
वैराग्य अकेला, एक ठंडा त्याग बन सकता है, उदास, बेजान। बोध अकेला, सूखी बौद्धिक समझ बन सकती है, बिना जिए। दोनों साथ, असली उड़ान। और “विमुक्ति-सौध-अग्र-लता”, मुक्ति-महल के शिखर की लता, कितनी सुंदर तस्वीर। मुक्ति एक महल है, उसका शीर्ष ऊँचा है, और वहाँ चढ़ने के लिए दोनों पंख चाहिए। यह श्लोक हर साधक के लिए एक आईना है: आपके दोनों पंख कैसे हैं?
375 · वैराग्य → समाधि → प्रबोध → मुक्ति → सुख
अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः समाहितस्यैव दृढप्रबोधः ।
प्रबुद्धतत्त्वस्य हि बन्धमुक्तिः मुक्तात्मनो नित्यसुखानुभूतिः ॥ 375 ॥
atyanta-vairāgyavataḥ samādhiḥ samāhitasyaiva dṛḍha-prabodhaḥ · prabuddha-tattvasya hi bandha-muktiḥ muktātmano nitya-sukhānubhūtiḥ
शब्दार्थ: अत्यन्त-वैराग्यवतः समाधिः · अत्यंत वैराग्य वाले को समाधि · समाहितस्य एव दृढ-प्रबोधः · समाहित को ही दृढ़ प्रबोध · प्रबुद्ध-तत्त्वस्य बन्ध-मुक्तिः · प्रबुद्ध-तत्व वाले को बंधन-मुक्ति · मुक्त-आत्मनः नित्य-सुख-अनुभूतिः · मुक्त-आत्मा को नित्य-सुख-अनुभूति।
अर्थ: अत्यंत वैराग्य वाले को ही समाधि; समाहित को ही दृढ़ प्रबोध; प्रबुद्ध-तत्व वाले को बंधन-मुक्ति; और मुक्त-आत्मा को नित्य-सुख-अनुभूति।
भावार्थ: गुरु एक साफ़ कारण-शृंखला देते हैं, हर कड़ी अगली के लिए ज़रूरी।
तेज़ वैराग्य → समाधि → दृढ़ प्रबोध → बंधन-मुक्ति → नित्य-सुख। पाँच कड़ियाँ, और हर एक अगली का दरवाज़ा। और सबसे नीचे की कड़ी ज़्यादातर साधकों के लिए सबसे बड़ा रोड़ा है, अत्यंत वैराग्य। तो काम भी वहीं शुरू होना है। वैराग्य कमज़ोर हो, तो समाधि नहीं। और बाक़ी सब रुक जाता है।
376 · वैराग्य से बढ़ कर सुख का जनक कुछ नहीं
वैराग्यान्न परं सुखस्य जनकं पश्यामि वश्यात्मनः तच्चेच्छुद्धतरात्मबोधसहितं स्वाराज्यसाम्राज्यधुक् ।
एतद्द्वारमजस्रमुक्तियुवतेर्यस्मात्त्वमस्मात्परं सर्वत्रास्पृहया सदात्मनि सदा प्रज्ञां कुरु श्रेयसे ॥ 376 ॥
vairāgyān na paraṁ sukhasya janakaṁ paśyāmi vaśyātmanaḥ tac cec chuddhatarātma-bodha-sahitaṁ svārājya-sāmrājya-dhuk · etad dvāram ajasra-mukti-yuvater yasmāt tvam asmāt paraṁ sarvatrāspṛhayā sad-ātmani sadā prajñāṁ kuru śreyase
शब्दार्थ: वैराग्यात् न परं सुखस्य जनकम् · वैराग्य से बढ़ कर सुख का जनक नहीं · वश्य-आत्मनः · आत्म-संयमी के लिए · तत् चेत् शुद्धतर-आत्म-बोध-सहितं · वह अगर शुद्ध-आत्म-बोध सहित · स्वाराज्य-साम्राज्य-धुक् · स्व-राज्य का साम्राज्य देता है · एतद् द्वारम् अजस्र-मुक्ति-युवतेः · यह अजस्र मुक्ति-युवती का द्वार · सर्वत्र अस्पृहया सद्-आत्मनि सदा प्रज्ञां कुरु श्रेयसे · हर जगह अस्पृहा से, सद्-आत्मा में सदा प्रज्ञा कर, श्रेयस के लिए।
अर्थ: आत्म-संयमी के लिए वैराग्य से बढ़ कर सुख का जनक मैं नहीं देखता। और वह अगर शुद्ध-आत्म-बोध के साथ हो, तो स्व-राज्य का साम्राज्य दे देता है। यही अजस्र मुक्ति-युवती का द्वार है, इसलिए आप, हर जगह अस्पृहा से, सद्-आत्मा में सदा प्रज्ञा कर, श्रेयस के लिए।
भावार्थ: गुरु एक बेहद उत्तेजक बात कहते हैं, “वैराग्य से बढ़ कर सुख का जनक मैं नहीं देखता।” यानी वैराग्य त्याग की बात नहीं। सुख की बात है।
एक तस्वीर: एक राजा अपनी इच्छाओं का गुलाम है, वह “स्व-राज्य” नहीं चला रहा, इच्छाएँ चला रही हैं। पर एक विरक्त, जो किसी चीज़ का गुलाम नहीं। वह “स्व-राज्य का साम्राज्य” चलाता है। यह असली राज्य है। और “मुक्ति-युवती”, गुरु मुक्ति को एक प्रेमिका कहते हैं, जिसका दरवाज़ा वैराग्य है। प्यारी, उदार बात।
377 · आशा छिंद्धि, विषय ज़हर हैं
आशां छिन्द्धि विषोपमेषु विषयेष्वेषैव मृत्योः कृतिस् त्यक्त्वा जातिकुलाश्रमेष्वभिमतिं मुञ्चातिदूरात्क्रियाः ।
देहादावसति त्यजात्मधिषणां प्रज्ञां कुरुष्वात्मनि त्वं द्रष्टास्यमनोऽसि निर्द्वयपरं ब्रह्मासि यद्वस्तुतः ॥ 377 ॥
āśāṁ chinddhi viṣopameṣu viṣayeṣv eṣaiva mṛtyoḥ kṛtis tyaktvā jāti-kulāśrameṣv abhimatiṁ muñcāti-dūrāt kriyāḥ · dehādāv asati tyajātma-dhiṣaṇāṁ prajñāṁ kuruṣvātmani tvaṁ draṣṭāsy amano’si nirdvaya-paraṁ brahmāsi yad vastutaḥ
शब्दार्थ: आशां छिन्द्धि विष-उपमेषु विषयेषु · ज़हर-जैसे विषयों में आशा काट · एषा एव मृत्योः कृतिः · यही मृत्यु का काम · त्यक्त्वा जाति-कुल-आश्रमेषु अभिमतिं · जाति-कुल-आश्रम में अभिमान छोड़ कर · मुञ्च अति-दूरात् क्रियाः · क्रियाओं को बहुत दूर से छोड़ · देह-आदौ असति त्यज आत्म-धिषणां · अनित्य देह आदि में आत्म-समझ छोड़ · प्रज्ञां कुरुष्व आत्मनि त्वं द्रष्टा असि अ-मनः असि · आत्मा में प्रज्ञा कर, आप द्रष्टा है, अ-मन है · निर्द्वय-परं ब्रह्म असि यद्-वस्तुतः · वस्तुतः निर्द्वय परम-ब्रह्म है।
अर्थ: ज़हर-जैसे विषयों में आशा काट डाल, यही मृत्यु का काम है। जाति-कुल-आश्रम में अभिमान छोड़ कर, क्रियाओं को बहुत दूर से छोड़ दे। अनित्य देह आदि में आत्म-समझ छोड़, आत्मा में प्रज्ञा कर, आप द्रष्टा है, अ-मन है, वस्तुतः निर्द्वय परम-ब्रह्म है।
भावार्थ: गुरु एक पूरी, संक्षिप्त शिक्षा एक श्लोक में देते हैं, और चार सीधे आदेश: आशा काट, अभिमान छोड़, क्रियाएँ दूर रख, देह में आत्म-समझ त्याग।
और फिर तीन शब्दों में पूरी पहचान बता देते हैं, “त्वं द्रष्टा असि, अ-मनः असि, निर्द्वय-परं ब्रह्म असि।” आप द्रष्टा है, मन से परे है, परम-ब्रह्म है। तीन कोणों से एक ही सच, और यह आप “वस्तुतः” (असल में) हो, न कि “बनना है।”
378 · लक्ष्य ब्रह्म पर मन, ब्रह्मानंद-रस पी
लक्ष्ये ब्रह्मणि मानसं दृढतरं संस्थाप्य बाह्येन्द्रियं स्वस्थाने विनिवेश्य निश्चलतनुश्चोपेक्ष्य देहस्थितिम् ।
ब्रह्मात्मैक्यमुपेत्य तन्मायातया चाखण्डवृत्त्यानिशं ब्रह्मानन्दरसं पिबात्मनि मुदा शून्यैः किमन्यैर्भृशम् ॥ 378 ॥
lakṣye brahmaṇi mānasaṁ dṛḍhataraṁ saṁsthāpya bāhyendriyaṁ sva-sthāne viniveśya niścala-tanuś copekṣya deha-sthitim · brahmātmaikyam upetya tan-māyatayā cākhaṇḍa-vṛttyā aniśaṁ brahmānanda-rasaṁ pibātmani mudā śūnyaiḥ kim anyair bhṛśam
शब्दार्थ: लक्ष्ये ब्रह्मणि मानसं दृढतरं संस्थाप्य · लक्ष्य ब्रह्म पर मन को मज़बूती से बैठा कर · बाह्य-इन्द्रियं स्व-स्थाने विनिवेश्य · बाह्य-इन्द्रियों को उनकी जगह बिठा कर · निश्चल-तनुः च उपेक्ष्य देह-स्थितिम् · निश्चल शरीर के साथ देह-स्थिति की उपेक्षा कर · ब्रह्म-आत्म-ऐक्यम् उपेत्य तन्-मायतया · ब्रह्म-आत्मा एकता पा कर उसी रूप से · अखण्ड-वृत्त्या अनिशं · अखंड-वृत्ति से लगातार · ब्रह्म-आनन्द-रसं पिब आत्मनि मुदा · आत्मा में ब्रह्मानंद-रस ख़ुशी से पी · शून्यैः किम् अन्यैः भृशम् · ख़ाली बाक़ियों से क्या बहुत।
अर्थ: लक्ष्य ब्रह्म पर मन को मज़बूती से बैठा कर, बाह्य-इन्द्रियों को उनकी जगह में बिठा कर, निश्चल शरीर के साथ देह-स्थिति की उपेक्षा कर, ब्रह्म-आत्मा एकता पा कर उसी रूप से अखंड-वृत्ति से लगातार, आत्मा में ब्रह्मानंद-रस ख़ुशी से पी। बाक़ी ख़ाली चीज़ों से क्या मतलब?
भावार्थ: गुरु एक पूरी ध्यान-प्रक्रिया देते हैं, और सबसे प्यारा है आख़िरी आदेश: “ब्रह्मानन्द-रसं पिब आत्मनि मुदा”, आत्मा में ब्रह्मानंद-रस ख़ुशी से पी।
यह त्याग की भाषा नहीं। पीने की भाषा है। ब्रह्म एक रस है, जो आत्मा के भीतर बहता है। अभी तक आप बाहर के “ख़ाली” रस पीते रहे, पैसा, सम्मान, सुख। अब इस असली रस को पियो। और अंत में एक मीठी अवहेलना, “शून्यैः किम् अन्यैः भृशम्”, उन ख़ाली बाक़ियों से क्या मतलब? जब असली शराब मिल गई, नक़ली की क्या ज़रूरत।
379 · अनात्म-चिंतन छोड़, आत्म-चिंतन पकड़
अनात्मचिन्तनं त्यक्त्वा कश्मलं दुःखकारणम् ।
चिन्तयात्मानमानन्दरूपं यन्मुक्तिकारणम् ॥ 379 ॥
anātma-cintanaṁ tyaktvā kaśmalaṁ duḥkha-kāraṇam · cintayātmānam ānanda-rūpaṁ yan mukti-kāraṇam
शब्दार्थ: अनात्म-चिन्तनं त्यक्त्वा · अनात्म-चिंतन छोड़ कर · कश्मलं दुःख-कारणम् · जो मलिन और दुख का कारण · चिन्तय आत्मानम् आनन्द-रूपं · आत्मा का चिंतन कर, आनंद-रूप · यद् मुक्ति-कारणम् · जो मुक्ति का कारण।
अर्थ: अनात्म-चिंतन को छोड़, जो मलिन है, दुख का कारण है। आत्मा का चिंतन कर, जो आनंद-रूप है, और जो मुक्ति का कारण है।
भावार्थ: गुरु एक सीधा बदलाव बताते हैं, एक चिंतन से दूसरे में स्विच करो। मन तो वैसे भी हमेशा कुछ न कुछ सोचता है; काम है, सोचने की दिशा बदलना।
अनात्म-चिंतन, दुनिया, लोग, समस्याएँ, चीज़ें, मलिन, दुख-दायी। आत्म-चिंतन, असली “मैं”, आनंद-स्वरूप, मुक्ति-दायी। बस ध्यान का रुख़ बदलो। यह न करना नहीं है; यह कुछ करना है, पर बेहतर चीज़।
380 · यह स्वयं-ज्योति विज्ञान-कोश को लक्ष्य बना
एष स्वयंज्योतिरशेषसाक्षी विज्ञानकोशो विलसत्यजस्रम् ।
लक्ष्यं विधायैनमसद्विलक्षणम् अखण्डवृत्त्यात्मतयानुभावय ॥ 380 ॥
eṣa svayaṁ-jyotir aśeṣa-sākṣī vijñāna-kośo vilasaty ajasram · lakṣyaṁ vidhāyainam asad-vilakṣaṇam akhaṇḍa-vṛttyātmatayānubhāvaya
शब्दार्थ: एषः स्वयं-ज्योतिः अशेष-साक्षी · यह ख़ुद-प्रकाश सबका साक्षी · विज्ञान-कोशः विलसति अजस्रम् · विज्ञान-कोश में अनवरत खिलता है · लक्ष्यं विधाय एनम् असद्-विलक्षणम् · इसे लक्ष्य बना कर, असत् से अलग · अखण्ड-वृत्त्या आत्मतया अनुभावय · अखंड-वृत्ति से, आत्म-रूप में अनुभव कर।
अर्थ: यह ख़ुद-प्रकाश, सबका साक्षी, विज्ञान-कोश में अनवरत खिलता है। इसे लक्ष्य बना, असत् से अलग, अखंड-वृत्ति से, आत्म-रूप में, अनुभव कर।
भावार्थ: गुरु एक प्यारी बात कहते हैं, आत्मा कोई दूर की चीज़ नहीं। वह विज्ञान-कोश (बुद्धि की परत) में पहले से “खिलती” है, हर समय।
तो उसे ढूँढना नहीं। बस उसकी ओर लक्ष्य बनाना है। और “अखंड-वृत्ति”, बिना दरार वाली वृत्ति। यानी मन की वह एकाग्र, बिना टूटे बहती धारा, जिसमें “मैं वह हूँ” का बोध एकरस बना रहे। यह ध्यान का चरम है।
381 · बिना दूसरे विचार वाली वृत्ति से जान
एतमच्छिन्नया वृत्त्या प्रत्ययान्तरशून्यया ।
उल्लेखयन्विजानीयात्स्वस्वरूपतया स्फुटम् ॥ 381 ॥
etam acchinnayā vṛttyā pratyayāntara-śūnyayā · ullekhayan vijānīyāt sva-svarūpatayā sphuṭam
शब्दार्थ: एतम् अच्छिन्नया वृत्त्या · इसे अनछिन्न वृत्ति से · प्रत्यय-अन्तर-शून्यया · दूसरे विचारों से रहित · उल्लेखयन् विजानीयात् · रेखांकित करते हुए जान · स्व-स्वरूपतया स्फुटम् · अपने स्वरूप के रूप में, स्पष्ट।
अर्थ: इसे, अनछिन्न वृत्ति से, दूसरे विचारों से रहित, रेखांकित करते हुए, अपने स्वरूप के रूप में, स्पष्ट जान।
भावार्थ: गुरु ध्यान की तकनीक थोड़ी और बारीक करते हैं। तीन ज़रूरी शब्द: “अनछिन्न”, “प्रत्यय-अन्तर-शून्य”, “स्फुट”।
अनछिन्न, टूटी हुई नहीं। प्रत्यय-अन्तर-शून्य, दूसरे विचारों से बीच में बँटी हुई नहीं। और स्फुट, साफ़, धुँधली नहीं। यह ध्यान की एक बहुत ख़ास गुणवत्ता है, एक धारा, बिना दरार, बिना मिलावट, और साफ़। और इस धारा में, “मैं वह स्वरूप हूँ” का बोध रेखांकित करते रहो।
382 · आत्मत्व पक्का कर, “मैं” आदि में उदासीन
अत्रात्मत्वं दृढीकुर्वन्नहमादिषु संत्यजन् ।
उदासीनतया तेषु तिष्ठेत्स्फुटघटादिवत् ॥ 382 ॥
atrātmatvaṁ dṛḍhī-kurvann aham-ādiṣu saṁtyajan · udāsīnatayā teṣu tiṣṭhet sphuṭa-ghaṭādivat
शब्दार्थ: अत्र आत्मत्वं दृढी-कुर्वन् · यहाँ आत्मत्व को पक्का करते हुए · अहम्-आदिषु संत्यजन् · “मैं” आदि में [आत्म-भाव] छोड़ते हुए · उदासीनतया तेषु तिष्ठेत् · उनमें उदासीन हो कर रहे · स्फुट-घट-आदि-वत् · सामने पड़े घड़े आदि की तरह।
अर्थ: यहाँ (असली आत्मा में) आत्मत्व को पक्का करते हुए, और “मैं” आदि में [आत्म-भाव] छोड़ते हुए, उनमें उदासीन हो कर रहे, सामने पड़े घड़े की तरह।
भावार्थ: एक प्यारी उपमा, “स्फुट-घट-वत्”, सामने पड़े साफ़ घड़े की तरह।
आप अपने सामने एक घड़ा देखते हैं, वह घड़ा है, साफ़ दिखता है, आप उसके लिए “उदासीन” हैं, न लगाव, न द्वेष, बस “वह वहाँ है।” गुरु कहते हैं, अपने अहंकार, अपने मन, अपनी पुरानी पहचान को भी ऐसे ही देखो। वे हैं, साफ़ दिखती हैं, पर आप उनमें “मैं” नहीं डालते। बस उदासीन देखना।
383 · शुद्ध अंतःकरण साक्षी में बसा, धीरे-धीरे निश्चलता
विशुद्धमन्तःकरणं स्वरूपे निवेश्य साक्षिण्यवबोधमात्रे ।
शनैः शनैर्निश्चलतामुपानयन् पूर्णं स्वमेवानुविलोकयेत्ततः ॥ 383 ॥
viśuddham antaḥkaraṇaṁ svarūpe niveśya sākṣiṇy avabodha-mātre · śanaiḥ śanair niścalatām upānayan pūrṇaṁ svam evānuvilokayet tataḥ
शब्दार्थ: विशुद्धम् अन्तःकरणं स्वरूपे निवेश्य · शुद्ध अंतःकरण को स्वरूप (साक्षी) में बसा कर · साक्षिणि अवबोध-मात्रे · साक्षी में, जो बोध-मात्र है · शनैः शनैः निश्चलतां उपानयन् · धीरे-धीरे निश्चलता ला कर · पूर्णं स्वम् एव अनुविलोकयेत् ततः · फिर पूर्ण-स्व को ही देखे।
अर्थ: शुद्ध अंतःकरण को स्वरूप, साक्षी, जो बोध-मात्र है, में बसा कर, धीरे-धीरे उसमें निश्चलता ला कर, फिर पूर्ण-स्व को ही देखे।
भावार्थ: “शनैः शनैः”, धीरे-धीरे। गुरु एक ज़रूरी बात कहते हैं, निश्चलता ज़बरदस्ती नहीं आती, धीरे-धीरे आती है।
एक तस्वीर: एक हिलता हुआ पानी का बर्तन। आप उसे ज़बरदस्ती थमाने की कोशिश करेंगे, तो और हिलेगा। बस उसे रख दीजिए, कुछ देर में अपने आप शांत हैं जाएगा। मन भी ऐसा ही है। बस उसे साक्षी में बसाते जाओ; निश्चलता अपने आप आती है। और जब आ जाए, “पूर्ण-स्व”, अपना पूरा रूप, दिखने लगता है।
384 · महाकाश की तरह, सब उपाधियों से मुक्त
देहेन्द्रियप्राणमनोऽहमादिभिः स्वाज्ञानकॢप्तैरखिलैरुपाधिभिः ।
विमुक्तमात्मानमखण्डरूपं पूर्णं महाकाशमिवावलोकयेत् ॥ 384 ॥
dehendriya-prāṇa-mano’ham-ādibhiḥ svājñāna-kḷptair akhilair upādhibhiḥ · vimuktam ātmānam akhaṇḍa-rūpaṁ pūrṇaṁ mahākāśam ivāvalokayet
शब्दार्थ: देह-इन्द्रिय-प्राण-मनः-अहम्-आदिभिः · देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, अहंकार आदि · स्व-अज्ञान-कॢप्तैः · अपने अज्ञान से गढ़ी हुई · अखिलैः उपाधिभिः · सब उपाधियों से · विमुक्तम् आत्मानम् अखण्ड-रूपं पूर्णं · मुक्त, अखंड-रूप, पूर्ण आत्मा को · महा-आकाशम् इव अवलोकयेत् · महा-आकाश की तरह देखे।
अर्थ: देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, अहंकार आदि, अपने अज्ञान से गढ़ी हुई सब उपाधियों से मुक्त, अखंड-रूप, पूर्ण आत्मा को महा-आकाश की तरह देखे।
भावार्थ: “महा-आकाश”, विशाल, असीम आकाश। एक प्यारी, मुक्त-कर-देने वाली तस्वीर।
घड़े का आकाश छोटा, सीमित, घड़े के आकार का दिखता है। पर असली में वह महा-आकाश ही है, बस घड़े की दीवारों ने उसे “छोटा” दिखा रखा है। आप भी ऐसे ही हैं, असली में महा-आकाश, बस उपाधियों ने आपको “छोटा मैं” बना रखा है। एक बार उपाधियाँ हटीं, आप वही असीम। और यह बस “देखने” का काम है।
385 · आकाश एक, घड़ों, कुंडों, सुई-मुख से बँधा नहीं
घटकलशकुसूलसूचिमुख्यैः गगनमुपाधिशतैर्विमुक्तमेकम् ।
भवति न विविधं तथैव शुद्धं परमहमादिविमुक्तमेकमेव ॥ 385 ॥
ghaṭa-kalaśa-kusūla-sūci-mukhyaiḥ gaganam upādhi-śatair vimuktam ekam · bhavati na vividhaṁ tathaiva śuddhaṁ param aham-ādi-vimuktam ekam eva
शब्दार्थ: घट-कलश-कुसूल-सूचि-मुख्यैः · घड़ा, कलश, अनाज-भंडार, सुई-मुख आदि · गगनम् उपाधि-शतैः विमुक्तम् एकम् · आकाश सैकड़ों उपाधियों से मुक्त, एक · भवति न विविधं · विविध नहीं होता · तथा एव शुद्धं परम् अहम्-आदि-विमुक्तम् एकम् एव · वैसे ही शुद्ध, परम, “मैं” आदि से मुक्त, एक ही।
अर्थ: घड़ा, कलश, अनाज-भंडार, सुई-मुख, आदि सैकड़ों उपाधियों से मुक्त, आकाश एक है, विविध नहीं होता। वैसे ही शुद्ध, परम, “मैं” आदि से मुक्त, एक ही है।
भावार्थ: गुरु महा-आकाश की उपमा खोलते हैं। आकाश हर जगह है, एक घड़े में भी, एक विशाल अनाज-भंडार में भी, यहाँ तक कि एक सुई की नोक के पास भी। पर “आकाश” विविध नहीं हो जाता; वह एक ही है, अनगिनत आकारों के बावजूद।
आपका शुद्ध आत्म-रूप ऐसा ही है। हर “मैं”, हर शरीर, हर मन, में वह दिखता है, पर वह “बहुत” नहीं है; वह “एक” ही है। आकाश की तरह, एक, बस अलग-अलग कंटेनरों में।
386 · ब्रह्मा से तृण तक, सब उपाधियाँ झूठी
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ता मृषामात्रा उपाधयः ।
ततः पूर्णं स्वमात्मानं पश्येदेकात्मना स्थितम् ॥ 386 ॥
brahmādi-stamba-paryantā mṛṣā-mātrā upādhayaḥ · tataḥ pūrṇaṁ svam ātmānaṁ paśyed ekātmanā sthitam
शब्दार्थ: ब्रह्म-आदि-स्तम्ब-पर्यन्ताः · ब्रह्मा से ले कर तृण तक · मृषा-मात्राः उपाधयः · सब उपाधियाँ बस झूठी · ततः पूर्णं स्वम् आत्मानं · इसलिए पूर्ण-स्व-आत्मा को · पश्येद् एक-आत्मना स्थितम् · एक-आत्मा रूप में स्थित देखे।
अर्थ: ब्रह्मा से ले कर तृण (घास) तक, सब उपाधियाँ बस झूठी हैं। इसलिए पूर्ण-स्व-आत्मा को एक-आत्मा के रूप में स्थित देखे।
भावार्थ: गुरु एक हिम्मत वाली बात कहते हैं, सबसे ऊँचे (ब्रह्मा, सबसे बड़ा देवता) से ले कर सबसे छोटे (तृण, घास का तिनका) तक, हर “उपाधि” बस झूठी है।
यानी ऊँचा-नीचा, बड़ा-छोटा, ये सब उपाधियों के खेल हैं। असल में सब में वही एक आत्मा। यह एक सार्वभौमिक समानता का सिद्धांत है, पर एक बहुत गहरे स्तर पर। समाज में बराबरी की बात अलग है; यहाँ तो हस्तित्व के स्तर पर बराबरी, सब एक ही आत्मा हैं।
387 · रस्सी की तरह, विश्व आत्म-स्वरूप
यत्र भ्रान्त्या कल्पितं तद्विवेके तत्तन्मात्रं नैव तस्माद्विभिन्नम् ।
भ्रान्तेर्नाशे भाति दृष्टाहितत्त्वं रज्जुस्तद्वद्विश्वमात्मस्वरूपम् ॥ 387 ॥
yatra bhrāntyā kalpitaṁ tad-viveke tat-tan-mātraṁ naiva tasmād vibhinnam · bhrānter nāśe bhāti dṛṣṭāhi-tattvaṁ rajjus tadvad viśvam ātma-svarūpam
शब्दार्थ: यत्र भ्रान्त्या कल्पितं तद्-विवेके · जहाँ भ्रम से गढ़ा गया, उसके विवेक से · तत्-तत्-मात्रं न तस्मात् विभिन्नम् · वह बस वही है, उससे भिन्न नहीं · भ्रान्तेः नाशे · भ्रम के नाश पर · भाति दृष्ट-अहि-तत्त्वं रज्जुः · दिखा हुआ साँप-तत्व रस्सी ही दिखता है · तद्-वद् विश्वम् आत्म-स्वरूपम् · वैसे ही विश्व आत्म-स्वरूप।
अर्थ: जहाँ भ्रम से कुछ गढ़ा गया, विवेक से देखने पर वह बस उसी (आधार) मात्र है, उससे अलग नहीं। भ्रम के नाश पर, दिखा हुआ साँप, असल में, रस्सी ही दिखता है। वैसे ही, यह विश्व आत्म-स्वरूप है।
भावार्थ: गुरु फिर वही रस्सी-साँप की तस्वीर लाते हैं, पर अब एक नई परत के साथ।
“साँप” कभी रस्सी से “अलग” था ही नहीं। वह तो रस्सी ही थी, बस ग़लत समझ में। जब भ्रम मिटा, तो साँप “हट” नहीं गया, बस उसकी असली पहचान खुली: रस्सी। उसी तरह,यह ब्रह्म ही है, बस ग़लत पहचान में “विश्व” दिखता है। भ्रम मिटे, और यह “विश्व” ब्रह्म दिखने लगता है। यह जगत मिथ्या वाली बात का सबसे सटीक रूप है।
388 · स्वयं ब्रह्मा, स्वयं विष्णु, स्वयं इंद्र, स्वयं शिव
स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः स्वयमिन्द्रः स्वयं शिवः ।
स्वयं विश्वमिदं सर्वं स्वस्मादन्यन्न किंचन ॥ 388 ॥
svayaṁ brahmā svayaṁ viṣṇuḥ svayam indraḥ svayaṁ śivaḥ · svayaṁ viśvam idaṁ sarvaṁ svasmād anyan na kiṁcana
शब्दार्थ: स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः · स्वयं ब्रह्मा, स्वयं विष्णु · स्वयम् इन्द्रः स्वयं शिवः · स्वयं इंद्र, स्वयं शिव · स्वयं विश्वम् इदं सर्वं · स्वयं ही यह पूरा विश्व · स्वस्मात् अन्यत् न किंचन · ख़ुद से अलग कुछ नहीं।
अर्थ: स्वयं ही ब्रह्मा, स्वयं विष्णु, स्वयं इंद्र, स्वयं शिव। स्वयं ही यह पूरा विश्व, ख़ुद से अलग कुछ नहीं।
भावार्थ: यह विवेकचूडामणि के सबसे ज़बरदस्त, सबसे हिम्मत वाले श्लोकों में से है। चार महान देवता और पूरा विश्व, सब “स्वयं” तुम।
यह कोई अहंकार वाली बात नहीं। यह उसी “अहम् ब्रह्मास्मि” की पूरी, खुली घोषणा है। आप ब्रह्मा हैं, रचने वाला; विष्णु हो, पालने वाला; शिव हो, समेटने वाला; पूरा विश्व हो। क्योंकि सब उसी एक आत्मा के रूप हैं, और आप वही आत्मा हैं। “स्वस्मात् अन्यत् न किंचन”, ख़ुद से अलग कुछ नहीं। यह अद्वैत का सबसे ऊँचा शब्द है।
389 · अंदर-बाहर, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, सब स्वयं
अन्तः स्वयं चापि बहिः स्वयं च स्वयं पुरस्तात्स्वयमेव पश्चात् ।
स्वयं ह्यावाच्यां स्वयमप्युदीच्यां तथोपरिष्टात्स्वयमप्यधस्तात् ॥ 389 ॥
antaḥ svayaṁ cāpi bahiḥ svayaṁ ca svayaṁ purastāt svayam eva paścāt · svayaṁ hy āvācyāṁ svayam apy udīcyāṁ tathopariṣṭāt svayam apy adhastāt
शब्दार्थ: अन्तः स्वयं बहिः स्वयं · अंदर स्वयं, बाहर स्वयं · पुरस्तात् पश्चात् स्वयम् · आगे, पीछे स्वयं · आवाच्यां उदीच्यां स्वयम् · दक्षिण, उत्तर स्वयं · उपरिष्टात् अधस्तात् स्वयम् · ऊपर, नीचे स्वयं।
अर्थ: अंदर स्वयं, बाहर स्वयं; आगे स्वयं, पीछे स्वयं; दक्षिण में स्वयं, उत्तर में स्वयं; ऊपर स्वयं, नीचे स्वयं।
भावार्थ: गुरु पिछले श्लोक का खुलासा करते हैं, स्थान के हर आयाम में “स्वयं।” अंदर-बाहर, आगे-पीछे, उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचे, हर दिशा।
यह छह आयामों का एक मंत्र है, हर तरफ़ देखो, हर तरफ़ तुम। और यह कोई “होगा” नहीं। यह “है।” गुरु आपको यह दृष्टि अभी देते हैं। आँख खुली रखो, और इस श्लोक को मंत्र की तरह पढ़ो, हर बार एक दिशा। धीरे-धीरे यह बोध भीतर बैठेगा।
390 · लहर-फेन-बुलबुले, सब पानी ही
तरङ्गफेनभ्रमबुद्बुदादि सर्वं स्वरूपेण जलं यथा तथा ।
चिदेव देहाद्यहमन्तमेतत् सर्वं चिदेवैकरसं विशुद्धम् ॥ 390 ॥
taraṅga-phena-bhrama-budbudādi sarvaṁ svarūpeṇa jalaṁ yathā tathā · cid eva dehādy-aham-antam etat sarvaṁ cid evaika-rasaṁ viśuddham
शब्दार्थ: तरंग-फेन-भ्रम-बुद्बुद-आदि सर्वं स्वरूपेण जलं · तरंग, फेन, भँवर, बुलबुले, सब स्वरूप से पानी ही · चित् एव देह-आदि-अहम्-अन्तं · चित् ही देह से अहंकार तक · सर्वं चित् एव एक-रसं विशुद्धम् · सब चित् ही, एक-रस, विशुद्ध।
अर्थ: तरंग, फेन, भँवर, बुलबुले, सब स्वरूप से पानी ही हैं। वैसे ही, देह से अहंकार तक, सब चित् (चेतना) ही है, एक-रस, विशुद्ध।
भावार्थ: एक प्यारी, ज़मीनी उपमा, पानी और उसके रूप। एक समुद्र देखिए, वहाँ लहरें, झाग, भँवर, बुलबुले हैं। ये सब अलग-अलग “चीज़ें” लगती हैं, पर असल में सब वही एक पानी है, बस अलग आकारों में।
आपका देह, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार, ये सब वैसे ही हैं। दिखते हैं अलग, अलग-अलग कार्य करते हैं, पर असल में सब “चित्” ही हैं, एक-रस, विशुद्ध चेतना। फेन से डर नहीं लगता; बुलबुले से सम्मान नहीं चाहिए, सब बस पानी हैं। अपने भीतर भी सब बस चित् हैं।
391 · सब बस सत्, मिट्टी से घड़े अलग नहीं
सदेवेदं सर्वं जगदवगतं वाङ्मनसयोः सतोऽन्यन्नास्त्येव प्रकृतिपरसीम्नि स्थितवतः ।
पृथक्किं मृत्स्नायाः कलशघटकुम्भाद्यवगतं वदत्येष भ्रान्तस्त्वमहमिति मायामदिरया ॥ 391 ॥
sad evedaṁ sarvaṁ jagad avagataṁ vāṅ-manasayoḥ sato’nyan nāsty eva prakṛti-para-sīmni sthitavataḥ · pṛthak kiṁ mṛtsnāyāḥ kalaśa-ghaṭa-kumbhādy avagataṁ vadaty eṣa bhrāntas tvam-aham iti māyā-madirayā
शब्दार्थ: सत् एव इदं सर्वं जगत् · यह पूरा जगत सत् ही है · वाक्-मनसयोः सतः अन्यत् न अस्ति · वाणी-मन के [रूप में] भी सत् से अलग कुछ नहीं · प्रकृति-पर-सीम्नि स्थितवतः · प्रकृति के पार की सीमा पर स्थित के लिए · पृथक् किं मृत्स्नायाः कलश-घट-कुम्भ-आदि · क्या मिट्टी से अलग कलश-घड़े-कुंभ आदि · वदति एषः भ्रान्तः · ऐसा कहता है यह भ्रांत · “त्वम्-अहम्” इति माया-मदिरया · “आप-मैं”, माया-मदिरा के नशे में।
अर्थ: यह पूरा जगत सत् ही है। वाणी-मन के दृष्टिकोण से भी, सत् से अलग कुछ नहीं। प्रकृति के पार की सीमा पर खड़े के लिए। क्या मिट्टी से अलग कलश-घड़े-कुंभ हैं? पर भ्रांत व्यक्ति माया-मदिरा के नशे में “आप-मैं” कहता है।
भावार्थ: गुरु फिर मिट्टी-घड़े वाली उपमा लाते हैं, और एक तीखा शब्द जोड़ देते हैं, “माया-मदिरा।” माया एक शराब है, और हम सब उसके नशे में हैं।
नशे में आदमी अजीब-अजीब बातें करता है, उल्टी देखता है। माया-मदिरा के नशे में हम “आप-मैं” का भेद देखते हैं, जो असल में है ही नहीं। नशा उतरे, तो सब एक मिट्टी, सब एक सत्। और एक प्यारी बात, गुरु शास्त्र-तर्क की भाषा में नहीं। एक रोज़ की उपमा में बात कर रहे हैं। नशे में देखी दुनिया असली नहीं होती।
392 · “नान्यद्”, द्वैत हटाने को
क्रियासमभिहारेण यत्र नान्यदिति श्रुतिः ।
ब्रवीति द्वैतराहित्यं मिथ्याध्यासनिवृत्तये ॥ 392 ॥
kriyā-samabhihāreṇa yatra nānyad iti śrutiḥ · bravīti dvaita-rāhityaṁ mithyādhyāsa-nivṛttaye
शब्दार्थ: क्रिया-समभिहारेण · क्रिया (दोहराव) के साथ · “यत्र न अन्यत्” इति श्रुतिः · “जहाँ और कुछ नहीं”, यह श्रुति · ब्रवीति द्वैत-राहित्यं · द्वैत-राहित्य कहती है · मिथ्या-अध्यास-निवृत्तये · झूठे अध्यास की निवृत्ति के लिए।
अर्थ: क्रिया (बार-बार दोहराव) के साथ, “जहाँ और कुछ नहीं”, यह श्रुति-वचन द्वैत-राहित्य की बात कहती है, झूठे अध्यास की निवृत्ति के लिए।
भावार्थ: गुरु एक श्रुति-तकनीक की ओर इशारा करते हैं, “नान्यद्” (और कुछ नहीं) को बार-बार दोहराना।
उपनिषदों में अद्वैत की बात बार-बार आती है, “नेह नानास्ति किंचन” (यहाँ कोई बहु नहीं), “नान्यदस्ति” (और कुछ नहीं है)। यह दोहराव क्यों? क्योंकि हमारी “दूसरा है” वाली पुरानी आदत बहुत मज़बूत है। एक बार सुन कर वह मिटती नहीं। बार-बार, हथौड़े की तरह, “नहीं। दूसरा नहीं”, तब जा कर वह आदत टूटती है। यह शिक्षण की एक गहरी विधि है।
393 · आकाश-जैसा परम-ब्रह्म, और क्या जानना
आकाशवन्निर्मलनिर्विकल्पं निःसीमनिःस्पन्दननिर्विकारम् ।
अन्तर्बहिःशून्यमनन्यमद्वयं स्वयं परं ब्रह्म किमस्ति बोध्यम् ॥ 393 ॥
ākāśavan nirmala-nirvikalpaṁ niḥsīma-niḥspandana-nirvikāram · antar-bahiḥ-śūnyam ananyam advayaṁ svayaṁ paraṁ brahma kim asti bodhyam
शब्दार्थ: आकाश-वत् निर्मल-निर्विकल्पं · आकाश की तरह निर्मल, निर्विकल्प · निःसीम-निःस्पन्दन-निर्विकारम् · निःसीम, निःस्पंदन, निर्विकार · अन्तर्-बहिः-शून्यम् अनन्यम् अद्वयं · अंदर-बाहर के भेद से रहित, अनन्य, अद्वय · स्वयं परं ब्रह्म किम् अस्ति बोध्यम् · स्वयं परम-ब्रह्म है, फिर और क्या जानना?
अर्थ: आकाश की तरह निर्मल, निर्विकल्प; निःसीम, निःस्पंदन, निर्विकार; अंदर-बाहर के भेद से रहित, अनन्य, अद्वय, आप स्वयं परम-ब्रह्म है। फिर और क्या जानना है?
भावार्थ: गुरु पूरा वर्णन देते हैं, और एक हैरानी वाला सवाल छोड़ देते हैं, “किम् अस्ति बोध्यम्”, और क्या जानना है?
यह बहुत प्यारा है। एक बार आपने जान लिया कि “आप स्वयं परम-ब्रह्म है”, तो और जानने को बचा क्या? सब बौद्धिक खोज वहीं ख़त्म होती है। और शब्दों की लड़ी, निर्मल, निर्विकल्प, निःसीम, निःस्पंदन, निर्विकार, अनन्य, अद्वय, हर एक एक छोटी कील है, जो “मैं छोटा हूँ” की धारणा को ढीला करती है।
394 · क्या और कहना, ब्रह्म ही जीव, ब्रह्म ही विश्व
वक्तव्यं किमु विद्यतेऽत्र बहुधा ब्रह्मैव जीवः स्वयं ब्रह्मैतज्जगदाततं नु सकलं ब्रह्माद्वितीयं श्रुतिः ।
ब्रह्मैवाहमिति प्रबुद्धमतयः संत्यक्तबाह्याः स्फुटं ब्रह्मीभूय वसन्ति सन्ततचिदानन्दात्मनैतद्ध्रुवम् ॥ 394 ॥
vaktavyaṁ kim u vidyate’tra bahudhā brahmaiva jīvaḥ svayaṁ brahmaitaj jagad ātataṁ nu sakalaṁ brahmādvitīyaṁ śrutiḥ · brahmaivāham iti prabuddha-matayaḥ saṁtyakta-bāhyāḥ sphuṭaṁ brahmī-bhūya vasanti santata-cid-ānandātmanaitad dhruvam
शब्दार्थ: वक्तव्यं किम् उ विद्यते अत्र बहुधा · यहाँ और बहुत कुछ क्या कहने को है · ब्रह्म एव जीवः स्वयं ब्रह्म एतद् जगत् · ब्रह्म ही जीव, स्वयं ब्रह्म यह जगत · सकलं ब्रह्म-अद्वितीयं श्रुतिः · सब अद्वितीय ब्रह्म, श्रुति · “ब्रह्म एव अहम्” इति प्रबुद्ध-मतयः · “मैं ब्रह्म ही हूँ”, प्रबुद्ध-मन वाले · संत्यक्त-बाह्याः · बाहरी छोड़ कर · स्फुटं ब्रह्मी-भूय वसन्ति · साफ़ ब्रह्म-रूप हो कर रहते हैं · सन्तत-चित्-आनन्द-आत्मना एतद् ध्रुवम् · निरंतर चित्-आनंद-आत्मा से, यह निश्चित।
अर्थ: यहाँ और बहुत कुछ कहने को क्या है? ब्रह्म ही जीव है, स्वयं ब्रह्म ही यह जगत है, सब अद्वितीय ब्रह्म, श्रुति कहती है। “मैं ब्रह्म ही हूँ”, प्रबुद्ध-मन वाले, बाहरी छोड़ कर, साफ़-साफ़ ब्रह्म-रूप हो कर रहते हैं, निरंतर चित्-आनंद-आत्मा से, यह निश्चित है।
भावार्थ: गुरु एक थका-हुआ-सा प्रश्न पूछते हैं, “और क्या कहूँ?” यानी बात ख़त्म हो गई। बस तीन वाक्य बचे: ब्रह्म ही जीव, ब्रह्म ही जगत, ब्रह्म ही “मैं।”
और “प्रबुद्ध-मन” वाले बस इसी एक बात पर टिक कर, बाहर का सब छोड़ कर, “ब्रह्मी-भूय”, ब्रह्म-रूप हो कर, रहते हैं। यह कोई अमूर्त बात नहीं। यह एक जीने का तरीक़ा है। निरंतर चित्-आनंद की धारा में, स्थिर।
395 · मला-माया-कोश में आशा छोड़, ब्रह्म-रूप में बस
जहि मलमायाकोशेऽहंधियोत्थापिताशां प्रसभमनिलकल्पे लिङ्गदेहेऽपि पश्चात् ।
निगमगदितकीर्तिं नित्यमानन्दमूर्तिं स्वयमिति परिचीय ब्रह्मरूपेण तिष्ठ ॥ 395 ॥
jahi mala-māyā-kośe’haṁ-dhiyotthāpitāśāṁ prasabham anila-kalpe liṅga-dehe’pi paścāt · nigama-gadita-kīrtiṁ nityam ānanda-mūrtiṁ svayam iti paricīya brahma-rūpeṇa tiṣṭha
शब्दार्थ: जहि मल-माया-कोशे · छोड़, मल-माया-कोश (अन्नमय) में · अहं-धिया उत्थापिताशां प्रसभम् · “मैं” बुद्धि से उठी आशा को बल से · अनिल-कल्पे लिङ्ग-देहे अपि पश्चात् · हवा-जैसे सूक्ष्म-शरीर में भी, उसके बाद · निगम-गदित-कीर्तिं नित्यम् आनन्द-मूर्तिं · वेद-कीर्तित, नित्य, आनंद-मूर्ति · स्वयम् इति परिचीय ब्रह्म-रूपेण तिष्ठ · “स्वयं”, यह जान कर ब्रह्म-रूप में रह।
अर्थ: मल-माया-कोश (अन्नमय शरीर) में “मैं” बुद्धि से उठी आशा को बल से छोड़; और बाद में हवा-जैसे सूक्ष्म-शरीर में भी। वेद-कीर्तित, नित्य, आनंद-मूर्ति को “स्वयं” जान कर, ब्रह्म-रूप में रह।
भावार्थ: गुरु एक क्रम बताते हैं, पहले स्थूल शरीर से चिपकी आशा छोड़ो (बल से, क्योंकि वह ज़िद्दी है), फिर सूक्ष्म शरीर से चिपकी पकड़ छोड़ो। और जो बचे, वेद-कीर्तित, नित्य, आनंद-मूर्ति, वह “स्वयं” आप है।
“प्रसभम्”, बल से। यह बात स्वीकार करती है कि स्थूल शरीर से लगाव छोड़ना आसान नहीं। कुछ ज़ोर लगाना पड़ता है। पर सूक्ष्म शरीर “अनिल-कल्प”, हवा जैसा, है, उसे छोड़ना तुलना में आसान। दो शरीरों से क्रम से मुक्त, तीसरा (कारण-शरीर) अपने आप।
396 · शव-आकार छोड़, शिव-आकार पहचान
शवाकारं यावद्भजति मनुजस्तावदशुचिः परेभ्यः स्यात्क्लेशो जननमरणव्याधिनिलयः ।
यदात्मानं शुद्धं कलयति शिवाकारमचलम् तदा तेभ्यो मुक्तो भवति हि तदाह श्रुतिरपि ॥ 396 ॥
śavākāraṁ yāvad bhajati manujas tāvad aśuciḥ parebhyaḥ syāt kleśo janana-maraṇa-vyādhi-nilayaḥ · yad ātmānaṁ śuddhaṁ kalayati śivākāram acalam tadā tebhyo mukto bhavati hi tad āha śrutir api
शब्दार्थ: शव-आकारं यावत् भजति मनुजः · जब तक मनुष्य शव-आकार (शरीर) में रमा है · तावत् अशुचिः परेभ्यः स्यात् क्लेशः · तब तक अपवित्र, दूसरों से क्लेश · जनन-मरण-व्याधि-निलयः · जन्म-मृत्यु-बीमारी का घर · यदा आत्मानं शुद्धं कलयति शिव-आकारम् अचलम् · जब आत्मा को शुद्ध, शिव-आकार, अचल अनुभव करता है · तदा तेभ्यः मुक्तः भवति हि तद् आह श्रुतिः अपि · तब उनसे मुक्त होता है, श्रुति भी यही कहती है।
अर्थ: जब तक मनुष्य शव-आकार में रमा है, तब तक अपवित्र, दूसरों से क्लेश पाने वाला, जन्म-मृत्यु-बीमारी का घर है। पर जब आत्मा को शुद्ध, शिव-आकार, अचल अनुभव करता है, तब उनसे मुक्त हो जाता है। श्रुति भी यही कहती है।
भावार्थ: गुरु एक प्यारा शब्द-खेल करते हैं, “शव-आकार” और “शिव-आकार।” एक ही अक्षर का फ़र्क, पर पूरी दुनिया का अंतर।
“शव” यानी मृत शरीर। जब तक “मैं यह शरीर हूँ” मानते हैं, तब तक एक मरते-जीते “शव” से जुड़े हो, अशुचि, क्लेश-ग्रस्त, जन्म-मृत्यु-बीमारी से बँधे। “शिव” यानी कल्याण-मूर्ति। जब “मैं शिव-आकार हूँ” अनुभव करते हैं, अचल, शुद्ध, तो तीनों (जन्म-मृत्यु-बीमारी) से मुक्त। शव से शिव, बस एक अक्षर, एक पहचान का बदलाव।
397 · सब आरोपित आभास हटा कर, पूर्ण, अद्वय, अक्रिय
स्वात्मन्यारोपिताशेषाभासर्वस्तुनिरासतः ।
स्वयमेव परं ब्रह्म पूर्णमद्वयमक्रियम् ॥ 397 ॥
svātmany āropitāśeṣābhāsa-vastu-nirāsataḥ · svayam eva paraṁ brahma pūrṇam advayam akriyam
शब्दार्थ: स्व-आत्मनि आरोपित-अशेष-आभास-वस्तु-निरासतः · अपने आत्मा पर आरोपित सब आभास-वस्तुओं को हटा कर · स्वयम् एव परं ब्रह्म पूर्णम् अद्वयम् अक्रियम् · स्वयं ही परम-ब्रह्म, पूर्ण, अद्वय, अक्रिय।
अर्थ: अपने आत्मा पर आरोपित सब आभास-वस्तुओं को हटा देने पर, आप स्वयं ही परम-ब्रह्म है, पूर्ण, अद्वय, अक्रिय।
भावार्थ: गुरु एक सीधा, संक्षिप्त निष्कर्ष देते हैं। काम बस एक है, आत्मा पर “आरोपित” सब चीज़ें हटा देना।
शरीर, मन, अहंकार, संसार, ये सब आत्मा पर “आरोपित” हैं, जैसे रस्सी पर साँप। बस इन्हें “उतार” दो, और जो बचे, वह है आपका असली रूप: परम-ब्रह्म, पूर्ण (कुछ कम नहीं), अद्वय (दूसरा नहीं), अक्रिय (कुछ करता नहीं)। यह सब “जोड़ने” का काम नहीं। “हटाने” का काम है।
398 · समाहित चित्त-वृत्ति में, कोई विकल्प नहीं
समाहितायां सति चित्तवृत्तौ परात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे ।
न दृश्यते कश्चिदयं विकल्पः प्रजल्पमात्रः परिशिष्यते यतः ॥ 398 ॥
samāhitāyāṁ sati citta-vṛttau parātmani brahmaṇi nirvikalpe · na dṛśyate kaścid ayaṁ vikalpaḥ prajalpa-mātraḥ pariśiṣyate yataḥ
शब्दार्थ: समाहितायां सति चित्त-वृत्तौ · चित्त-वृत्ति समाहित होने पर · परात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे · निर्विकल्प परम-आत्मा-ब्रह्म में · न दृश्यते कश्चिद् अयं विकल्पः · कोई विकल्प नहीं दिखता · प्रजल्प-मात्रः परिशिष्यते यतः · क्योंकि बस बकवास भर बचता है।
अर्थ: चित्त-वृत्ति निर्विकल्प परम-आत्मा-ब्रह्म में समाहित हो जाने पर, कोई विकल्प नहीं दिखता; क्योंकि (विकल्प तब) बस बकवास भर रह जाता है।
भावार्थ: गुरु एक तीखा शब्द देते हैं, “प्रजल्प-मात्र”, बस बकवास भर। समाधि के बाद, अगर कोई “विकल्प” (यह-वह की बात) उठता भी है, तो वह बस बकवास है, असली कुछ नहीं।
एक नशा उतरे, तो नशे में देखी “नीली बिल्लियाँ” बस याद रह जाती हैं, असली कुछ नहीं। समाधि के बाद, “आप-मैं-यह” वाली पुरानी बातें वैसी ही हो जाती हैं, बस आदत की बकबक, असली कुछ नहीं।
399 · निर्विकार, निराकार, निर्विशेष में, भेद कहाँ (1)
असत्कल्पो विकल्पोऽयं विश्वमित्येकवस्तुनि ।
निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥ 399 ॥
asat-kalpo vikalpo’yaṁ viśvam ity eka-vastuni · nirvikāre nirākāre nirviśeṣe bhidā kutaḥ
शब्दार्थ: असत्-कल्पः विकल्पः अयं · यह विकल्प असत् के बराबर · विश्वम् इति एक-वस्तुनि · “विश्व”, इस एक-वस्तु में · निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे · निर्विकार, निराकार, निर्विशेष में · भिदा कुतः · भेद कहाँ।
अर्थ: यह विकल्प (कि “विश्व है”) असत् के बराबर है, एक-वस्तु में। निर्विकार, निराकार, निर्विशेष में, भेद कहाँ?
भावार्थ: यहाँ से चार श्लोकों की एक टेक शुरू होती है, “निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः।” इसे एक धड़कन की तरह पढ़िए।
निर्विकार, जो बदलता नहीं। निराकार, जिसका आकार नहीं। निर्विशेष, जिसका भेद नहीं। ऐसे में “भेद कहाँ?” यह एक हैरानी का सवाल है, मानो गुरु पूछ रहे हों, “आपको भेद कहाँ दिखा?” कोई जगह नहीं जहाँ भेद बैठ सके। पर हम लगातार भेद बना लेते हैं, और गुरु बार-बार, चार बार, यह सवाल दोहराते हैं।
400 · द्रष्टा-दर्शन-दृश्य भाव शून्य, भेद कहाँ (2)
द्रष्टुदर्शनदृश्यादिभावशून्यैकवस्तुनि ।
निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥ 400 ॥
draṣṭu-darśana-dṛśyādi-bhāva-śūnyaika-vastuni · nirvikāre nirākāre nirviśeṣe bhidā kutaḥ
शब्दार्थ: द्रष्टृ-दर्शन-दृश्य-आदि-भाव-शून्य-एक-वस्तुनि · द्रष्टा, दर्शन, दृश्य आदि भावों से शून्य एक-वस्तु में · निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः · निर्विकार, निराकार, निर्विशेष में भेद कहाँ।
अर्थ: द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, आदि के भाव से शून्य एक-वस्तु में, निर्विकार, निराकार, निर्विशेष में, भेद कहाँ?
भावार्थ: टेक दूसरी बार। और इस बार बहुत गहरी बात, द्रष्टा-दर्शन-दृश्य की तिकड़ी से भी शून्य।
आम तौर पर अनुभव की तीन परतें होती हैं, देखने वाला, देखने की क्रिया, देखी जाने वाली चीज़।यह बँटवारा भी एक “विकार” है। ब्रह्म इन तीनों से पहले का है, जहाँ “मैं”, “देखना”, “वह” का कोई फ़र्क ही नहीं। ऐसी जगह में “भेद” कहाँ बैठेगा?
401 · प्रलय-समुद्र की तरह, भेद कहाँ (3)
कल्पार्णव इवात्यन्तपरिपूर्णैकवस्तुनि ।
निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥ 401 ॥
kalpārṇava ivātyanta-paripūrṇaika-vastuni · nirvikāre nirākāre nirviśeṣe bhidā kutaḥ
शब्दार्थ: कल्प-अर्णवे इव अत्यन्त-परिपूर्ण-एक-वस्तुनि · प्रलय-समुद्र की तरह अत्यंत-परिपूर्ण एक-वस्तु में · निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः · निर्विकार, निराकार, निर्विशेष में भेद कहाँ।
अर्थ: प्रलय-समुद्र की तरह अत्यंत-परिपूर्ण एक-वस्तु में, निर्विकार, निराकार, निर्विशेष में, भेद कहाँ?
भावार्थ: टेक तीसरी बार, एक नई तस्वीर, “कल्प-अर्णव”, प्रलय-समुद्र।
प्रलय में, पुराणों के अनुसार, सब कुछ एक विशाल समुद्र में घुल जाता है, कोई जमीन, कोई पहाड़, कोई द्वीप नहीं। बस पानी, हर तरफ़, बिना दरार। उस “अत्यंत-परिपूर्ण” समुद्र में भेद कैसा? ब्रह्म ऐसा ही है, एक अनंत, परिपूर्ण समुद्र, जहाँ कोई किनारा नहीं। कोई दूसरा नहीं।
402 · आग में अँधेरा घुला, भेद कहाँ (4)
तेजसीव तमो यत्र प्रलीनं भ्रान्तिकारणम् ।
अद्वितीये परे तत्त्वे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥ 402 ॥
tejasīva tamo yatra pralīnaṁ bhrānti-kāraṇam · advitīye pare tattve nirviśeṣe bhidā kutaḥ
शब्दार्थ: तेजसि इव तमो यत्र प्रलीनं · आग में अँधेरे की तरह जहाँ विलीन · भ्रान्ति-कारणम् · भ्रम का कारण · अद्वितीये परे तत्त्वे निर्विशेषे भिदा कुतः · अद्वितीय, परम, निर्विशेष तत्व में भेद कहाँ।
अर्थ: जहाँ भ्रम का कारण, आग में अँधेरे की तरह, विलीन हो जाता है, उस अद्वितीय, परम, निर्विशेष तत्व में, भेद कहाँ?
भावार्थ: टेक चौथी और आख़िरी बार, एक प्यारी तस्वीर के साथ, “आग में अँधेरा।”
एक अँधेरा कमरा है। एक मशाल जलाओ, अँधेरा कहाँ गया? वह “विलीन” हो गया, आग में। पर यह तर्क बस एक तरीक़े का है, असल में अँधेरा “कुछ” था ही नहीं। बस रोशनी की कमी थी। उसी तरह, ब्रह्म का प्रकाश हो, और भ्रम (विश्व, भेद, “दूसरा”) विलीन हो जाता है, जैसा कभी था ही नहीं।
403 · सुषुप्ति में सब बराबर, भेद किसने देखा
एकात्मके परे तत्त्वे भेदवार्ता कथं वसेत् ।
सुषुप्तौ सुखमात्रायां भेदः केनावलोकितः ॥ 403 ॥
ekātmake pare tattve bheda-vārtā kathaṁ vaset · suṣuptau sukha-mātrāyāṁ bhedaḥ kenāvalokitaḥ
शब्दार्थ: एक-आत्मके परे तत्त्वे · एक-आत्मक परम-तत्व में · भेद-वार्ता कथं वसेत् · भेद की बात कैसे टिक सकती · सुषुप्तौ सुख-मात्रायां · सुख-मात्र सुषुप्ति में · भेदः केन अवलोकितः · भेद किसने देखा।
अर्थ: एक-आत्मक परम-तत्व में भेद की बात कैसे टिक सकती है? सुख-मात्र सुषुप्ति में, भेद किसने देखा?
भावार्थ: गुरु एक रोज़ का सबूत देते हैं, सुषुप्ति, गहरी नींद। हर रात, गहरी नींद में, हम सब “एक-आत्मक” अनुभव में होते हैं, कोई “दूसरा” नहीं। कोई भेद नहीं। बस सुख।
तो वहाँ, उस अनुभव में, “भेद किसने देखा”? कोई नहीं। यह सबूत है कि अद्वैत असंभव या रहस्यमयी नहीं। हम सब इसे रोज़ रात अनुभव करते हैं। बस अब वही अनुभव जागते हुए भी रखना है।
404 · विश्व नहीं। रस्सी पर साँप कभी न देखा गया
न ह्यस्ति विश्वं परतत्त्वबोधात् सदात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे ।
कालत्रये नाप्यहिरीक्षितो गुणे न ह्यम्बुबिन्दुर्मृगतृष्णिकायाम् ॥ 404 ॥
na hy asti viśvaṁ para-tattva-bodhāt sad-ātmani brahmaṇi nirvikalpe · kāla-traye nāpy ahir īkṣito guṇe na hy ambu-bindur mṛga-tṛṣṇikāyām
शब्दार्थ: न हि अस्ति विश्वं परतत्त्व-बोधात् · विश्व नहीं, परतत्व के बोध से · सद्-आत्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे · सद्-आत्मा-ब्रह्म, निर्विकल्प में · काल-त्रये न अहिः ईक्षितः गुणे · तीनों कालों में रस्सी पर साँप नहीं देखा गया · न हि अम्बु-बिन्दुः मृग-तृष्णिकायाम् · न मरीचिका में पानी की बूँद।
अर्थ: परतत्व के बोध से, सद्-आत्मा-ब्रह्म, निर्विकल्प में, विश्व है ही नहीं। तीनों कालों में रस्सी पर साँप नहीं देखा गया, न मरीचिका में पानी की बूँद।
भावार्थ: गुरु एक बेहद हिम्मत वाली बात कहते हैं, “विश्व नहीं।” पर इसे ठीक से समझिए: यह “परतत्व-बोध के बाद” वाली बात है।
दो उपमाएँ, रस्सी का साँप, और मरीचिका का पानी। दोनों दिखती हैं, पर असल में हैं नहीं। “तीनों कालों में।” यानी न पहले थीं, न अब हैं, न बाद में होंगी। बस भ्रम के समय “दिखीं।” विश्व भी वैसा ही है, अद्वैत-बोध के बाद, यह नहीं रहता; और जब “था”, तब भी असल में था नहीं। बस दिखता रहा।
405 · द्वैत बस माया, सुषुप्ति में अनुभव
मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ।
इति ब्रूते श्रुतिः साक्षात्सुषुप्तावनुभूयते ॥ 405 ॥
māyā-mātram idaṁ dvaitam advaitaṁ paramārthataḥ · iti brūte śrutiḥ sākṣāt suṣuptāv anubhūyate
शब्दार्थ: माया-मात्रम् इदं द्वैतम् · यह द्वैत बस माया है · अद्वैतं परमार्थतः · परमार्थ से अद्वैत · इति ब्रूते श्रुतिः साक्षात् · ऐसा श्रुति सीधे कहती है · सुषुप्तौ अनुभूयते · सुषुप्ति में अनुभव होता है।
अर्थ: यह द्वैत बस माया है; परमार्थ से अद्वैत है। श्रुति सीधे यह कहती है, और सुषुप्ति में यह अनुभव भी होता है।
भावार्थ: गुरु दो सबूत देते हैं, शास्त्र (श्रुति) और अनुभव (सुषुप्ति)। दोनों एक ही बात कहते हैं: अद्वैत असली है, द्वैत बस माया।
यह उपनिषदों की सीधी घोषणा है, “मायामात्रमिदं द्वैतम्”, और हर रात की नींद इसकी पुष्टि करती है। तो अद्वैत बस एक सिद्धांत नहीं। यह आपके रोज़ के अनुभव में बसा है, बस आप पहचानते नहीं।
406 · आरोपित, अधिष्ठान से अलग नहीं
अनन्यत्वमधिष्ठानादारोप्यस्य निरीक्षितम् ।
पण्डितै रज्जुसर्पादौ विकल्पो भ्रान्तिजीवनः ॥ 406 ॥
ananyatvam adhiṣṭhānād āropyasya nirīkṣitam · paṇḍitai rajju-sarpādau vikalpo bhrānti-jīvanaḥ
शब्दार्थ: अनन्यत्वम् अधिष्ठानात् · अधिष्ठान से अनन्यता · आरोप्यस्य निरीक्षितम् · आरोपित की देखी जाती है · पण्डितैः रज्जु-सर्प-आदौ · पंडितों द्वारा, रस्सी-साँप आदि में · विकल्पः भ्रान्ति-जीवनः · विकल्प भ्रम पर जीने वाला।
अर्थ: पंडितों ने रस्सी-साँप आदि में देखा है, आरोपित की अपने अधिष्ठान से अनन्यता। (आरोपित का) विकल्प (भेद) भ्रम पर जीता है।
भावार्थ: गुरु एक ज़रूरी तकनीकी बात कहते हैं, “आरोपित” और “अधिष्ठान” में कोई “अन्यता” नहीं।
“आरोपित”, जो थोपा गया (साँप)। “अधिष्ठान”, जिस पर थोपा गया (रस्सी)।वह तो रस्सी ही है, बस ग़लत नाम में। जब तक भ्रम है, “विकल्प” (साँप-समझ) जीता है; भ्रम मिटा, साँप अधिष्ठान में लौट आता है, या यूँ कहो, पहचाना जाता है कि कभी अलग था ही नहीं। यह सूक्ष्म पर बहुत ज़रूरी बात है।
407 · विकल्प चित्त-मूल, चित्त को परम-आत्मा में समाहित कर
चित्तमूलो विकल्पोऽयं चित्ताभावे न कश्चन ।
अतश्चित्तं समाधेहि प्रत्यग्रूपे परात्मनि ॥ 407 ॥
citta-mūlo vikalpo’yaṁ cittābhāve na kaścana · ataś cittaṁ samādhehi pratyag-rūpe parātmani
शब्दार्थ: चित्त-मूलः विकल्पः अयं · यह विकल्प चित्त-मूल वाला · चित्त-अभावे न कश्चन · चित्त के अभाव में कुछ नहीं · अतः चित्तं समाधेहि · इसलिए चित्त को समाहित कर · प्रत्यग्-रूपे परात्मनि · भीतर के परम-आत्मा में।
अर्थ: यह विकल्प (भेद की समझ) चित्त में जड़ रखता है। चित्त के अभाव में कुछ नहीं। इसलिए चित्त को भीतर के परम-आत्मा में समाहित कर।
भावार्थ: गुरु एक सीधा, व्यावहारिक निष्कर्ष देते हैं और भाग का समापन करते हैं। भेद कहाँ से आता है? चित्त (मन) से। तो भेद हटाने का काम कहाँ है? चित्त को थमाने का।
और कैसे थमाओ? “प्रत्यग्-रूप परम-आत्मा” में समाहित कर के, यानी भीतर के असली स्वरूप में बसा कर। बाहर “भेद कहाँ” की बात करते रहने से कुछ नहीं होगा; बस वहीं काम करो जहाँ भेद उठता है, चित्त में। उसे शांत करो, उसे आत्मा में डालो, सब भेद अपने आप घुलते हैं।
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना: भाग 14, विद्वान हृदय में पूर्ण ब्रह्म को रखता है (तीन-श्लोकी “हृदि कलयति विद्वान्” टेक), जीवन्मुक्ति की प्रसिद्ध परिभाषा (वैराग्य → बोध → उपरति → शांति), और मुक्त-आत्मा का स्वरूप।
और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 374 कहता है, वैराग्य और बोध दो पंख। आज देखिए: कौनसा पंख कमज़ोर है? वैराग्य कम है, या बोध? जो कमज़ोर है, उसे आज थोड़ा सहलाइए।