विवेकचूडामणि
भाग 6 · पाँच कोश · पहली तीन परतें, अन्न, प्राण, मन · श्लोक 146-183
तालाब का पानी अपने आप में निर्मल रहता है, पर ऊपर काई की परतें जम जाती हैं, और पानी दिखता ही नहीं। जीव और उसके असली स्वरूप के बीच ऐसी ही पाँच परतें ठहरी रहती हैं। गुरु अब उन्हें एक-एक कर के हटाते हैं।
पहले एक बात
विवेकचूडामणि की सबसे मशहूर विधि अब शुरू होती है, पंच-कोश विवेक, यानी पाँच परतों को छील कर असली स्वरूप तक पहुँचना।

तस्वीर सीधी है, और गुरु ख़ुद देते हैं। तालाब का पानी अपने आप में साफ़ रहता है। ऊपर काई की परतें जम जाती हैं, और पानी दिखना बंद हो जाता है। काई दिखती है। पानी मैला नहीं हुआ, वह बस ढक गया। काई हटते ही साफ़ पानी अपने आप सामने आ जाता है।
जीव के साथ ठीक यही है। उसका असली स्वरूप, सत्-चित्-आनंद, कभी मैला नहीं होता। पर उस पर पाँच परतें (कोश) जमी रहती हैं, अन्नमय (शरीर), प्राणमय (ऊर्जा), मनोमय (मन), विज्ञानमय (बुद्धि), और आनंदमय। यह भाग पहली तीन परतें छीलता है। हर परत के साथ गुरु एक ही प्रश्न रखते हैं, क्या यह आत्मा है, और हर बार उत्तर निकलता है, नहीं, यह भी एक परत है।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। तीन कोश तीन झुंडों में हैं, अन्नमय (154-164), प्राणमय (165-166), मनोमय (167-183)। मनोमय वाला झुंड सबसे बड़ा है, क्योंकि मन ही असली खिलाड़ी है। मुख्य आधार-श्लोक, 149-150 (काई और पानी), 169 (मन ही अविद्या है), 172 (बंधन भी मन, मोक्ष भी मन)। हर श्लोक का अपना संदर्भ-चिह्न है।
गुरु पहले बंधन की बात समेटते हैं, और एक बारीक राहत देते हैं। यह अनात्मा वाला बंधन, जिसकी जड़ अज्ञान है, स्वाभाविक-सा लगता है, और इसका कोई शुरुआती बिंदु ढूँढा नहीं जा सकता; यह जन्म, मृत्यु, बीमारी, बुढ़ापे के दुख की एक बहती धारा पैदा करता रहता है। पर ध्यान दीजिए, गुरु इसे “अनादि” कहते हैं, “अनंत” नहीं। एक रात कितनी भी लंबी हो, उसका पहला पल कोई नहीं बता सकता, फिर भी सुबह होते ही वह ख़त्म हो जाती है। बंधन अनादि है, अमर नहीं। उसकी जड़ बस एक है, अज्ञान।
146 · बंधन, पुराना, पर अनादि नहीं अमर
अज्ञानमूलोऽयमनात्मबन्धो नैसर्गिकोऽनादिरनन्त ईरितः ।
जन्माप्ययव्याधिजरादिदुःख प्रवाहपातं जनयत्यमुष्य ॥ 146 ॥
अब गुरु उस जड़ को काटने का एकमात्र औज़ार बताते हैं, और पहले वे और सब ख़ारिज कर देते हैं। इस बंधन को न किसी फेंके या हाथ के हथियार से काटा जा सकता है, न हवा से, न आग से, न करोड़ों कर्मों से। कर्म इसे इसलिए नहीं काट सकते कि बंधन कोई भौतिक वस्तु नहीं, बस एक ग़लतफ़हमी है, और ग़लतफ़हमी को कोई हथौड़ा नहीं तोड़ता, उसे केवल साफ़ देख लेना मिटाता है। हथियार एक ही है, विवेक-विज्ञान की वह महान तलवार, जो विधाता की कृपा से तेज़ और सुंदर हुई हो। गुरु इसे “मञ्जु”, सुंदर कहते हैं; यह तलवार हिंसा से नहीं, उजाले की तरह काटती है। और फिर वे पूरे रास्ते का नक्शा एक ही श्लोक में रख देते हैं, श्रुति को प्रमाण मानने वाले की अपने धर्म में निष्ठा होती है, उसी से मन की सफ़ाई, निर्मल बुद्धि को परमात्मा का ज्ञान, और उसी ज्ञान से संसार का जड़ समेत नाश। निष्ठा, मन की सफ़ाई, ज्ञान, संसार का अंत, एक सीधी सीढ़ी, और बीच का पुल मन की सफ़ाई है।
147 · सिर्फ़ विवेक की तलवार
नास्त्रैर्न शस्त्रैरनिलेन वन्हिना छेत्तुं न शक्यो न च कर्मकोटिभिः ।
विवेकविज्ञानमहासिना विना धातुः प्रसादेन शितेन मञ्जुना ॥ 147 ॥
148 · रास्ते की एक छोटी सी रूपरेखा
श्रुतिप्रमाणैकमतेः स्वधर्म निष्ठा तयैवात्मविशुद्धिरस्य ।
विशुद्धबुद्धेः परमात्मवेदनं तेनैव संसारसमूलनाशः ॥ 148 ॥
अब पूरे भाग की केंद्रीय तस्वीर आती है। अन्नमय आदि पाँच कोशों से ढका हुआ आत्मा साफ़ नहीं दिखता, ठीक जैसे अपनी ही तालाब की शक्ति से उपजी काई की परतों से ढका वही तालाब का पानी। हर हिस्सा कुछ कहता है, पानी ढका है, मैला नहीं; काई “अपनी ही शक्ति से उपजी”, यानी ये कोश बाहर की मुसीबत नहीं, उसी जीवन की उपज हैं; और काई हटाई जा सकती है। फिर गुरु हल का फल बताते हैं, उस काई के हटते ही साफ़ पानी ठीक से दिखने लगता है, प्यास और ताप मिटाता हुआ, मनुष्य को तुरंत परम सुख देता हुआ। एक शब्द ख़ास है, “सद्यः”, तुरंत। काई हटाने में मेहनत और समय लग सकता है, पर जिस पल वह हटी, पानी तुरंत दिख जाता है। जिस सुख-शांति के लिए जीव जीवन भर बाहर भटकता है, वह काई के नीचे, पहले से, उसका अपना है।
149 · काई के नीचे का पानी
कोशैरन्नमयाद्यैः पञ्चभिरात्मा न संवृतो भाति ।
निजशक्तिसमुत्पन्नैः शैवालपटलैरिवाम्बु वापीस्थम् ॥ 149 ॥
150 · काई हटाओ, पानी सामने
तच्छैवालापनये सम्यक्सलिलं प्रतीयते शुद्धम् ।
तृष्णासन्तापहरं सद्यः सौख्यप्रदं परं पुंसः ॥ 150 ॥
गुरु पहले ही बता देते हैं कि छीलने के अंत में क्या मिलेगा, ताकि शिष्य पूरे सफ़र भर वही लक्ष्य सामने रखे। पाँचों कोशों के निषेध पर यह शुद्ध आत्मा चमक उठता है, नित्य आनंद का एक रस, भीतर का स्वरूप, सर्वोच्च, ख़ुद-प्रकाश। एक शब्द ध्यान खींचता है, “अपवाद”, निषेध; कोशों को तोड़ना नहीं, केवल हर एक के बारे में साफ़ देख लेना कि यह आत्मा नहीं। शरीर रहेगा, मन रहेगा, बुद्धि रहेगी, गुरु इन्हें मिटाने को नहीं कह रहे, केवल इनके साथ की ग़लत पहचान छोड़ने को। इसीलिए वे आगे कहते हैं, बंधन से छूटने के लिए ज्ञानी को आत्मा और अनात्मा का विवेक करना चाहिए; उसी से वह आनंदमय हो जाता है, अपने को सत्-चित्-आनंद जान कर। किताब का नाम यहीं फिर साफ़ होता है, पूरी विधि एक शब्द में है, विवेक। और उसका फल केवल मुक्ति नहीं, “आनंदी हो जाना” भी है। फिर गुरु एक रोज़ की तस्वीर देते हैं, मूँज घास से सींक निकालने की तरह, देखी जाने वाली सब चीज़ों के समूह से भीतर के असंग, क्रिया-रहित आत्मा को धीरे, ध्यान से अलग कर के, और फिर सब कुछ उसी में घोल कर जो उसी रूप में ठहर जाता है, वह मुक्त है। दो शब्द उस सींक को पहचानने की कुंजी हैं, “असंग” (अछूता) और “अक्रिय”; जो भी जुड़ता, बँधता, करता है, वह घास है, सींक वह है जो बस देखता है।
151 · पाँचों हटने पर, शुद्ध आत्मा
पञ्चानामपि कोशानामपवादे विभात्ययं शुद्धः ।
नित्यानन्दैकरसः प्रत्यग्रूपः परः स्वयंज्योतिः ॥ 151 ॥
152 · विवेक, और आनंद
आत्मानात्मविवेकः कर्तव्यो बन्धमुक्तये विदुषा ।
तेनैवानन्दी भवति स्वं विज्ञाय सच्चिदानन्दम् ॥ 152 ॥
153 · मूँज से सींक निकालना
मुञ्जादिषीकामिव दृश्यवर्गात् प्रत्यञ्चमात्मानमसङ्गमक्रियम् ।
विविच्य तत्र प्रविलाप्य सर्वं तदात्मना तिष्ठति यः स मुक्तः ॥ 153 ॥
अब पहली परत खुलती है, अन्नमय कोश, यानी यह स्थूल शरीर, और नाम ही पूरी बात कह देता है, “अन्न-मय”, अन्न से बना। यह शरीर अन्न से जीता है, और अन्न के बिना मिट जाता है; चमड़ी, मांस, ख़ून, हड्डी, मल का यह ढेर नित्य-शुद्ध आत्मा कैसे हो सकता है? जो हर कुछ घंटों में रोटी माँगता हो, वह वह स्वरूप नहीं जो सदा, अपने आप, पूर्ण है। गुरु जाँच और गहरी करते हैं, यह शरीर जन्म से पहले नहीं था, मृत्यु के बाद नहीं रहेगा, पल भर में जन्मा, बदलते स्वभाव वाला, जड़ है, और “घड़े की तरह देखा जाता है।” यही आख़िरी पंक्ति सबसे ज़ोरदार है, जो “देखा” जाता है, वह “देखने वाला” नहीं हो सकता।
154 · अन्नमय कोश, अन्न से बना शरीर
देहोऽयमन्नभवनोऽन्नमायास्तु कोशः चान्नेन जीवति विनश्यति तद्विहीनः ।
त्वक्चर्ममांसरुधिरास्थिपुरीषराशिः नायं स्वयं भवितुमर्हति नित्यशुद्धः ॥ 154 ॥
155 · पहले नहीं था, बाद में नहीं
पूर्वं जनेरधिमृतेरपि नायमस्ति जातक्षणः क्षणगुणोऽनियतस्वभावः ।
नैको जडश्च घटवत्परिदृश्यमानः स्वात्मा कथं भवति भावविकारवेत्ता ॥ 155 ॥
गुरु एक बहुत व्यावहारिक तर्क रखते हैं। हाथ-पैर आदि वाला यह शरीर आत्मा नहीं, क्योंकि कोई अंग कट जाने पर भी जीवन बना रहता है, और उन शक्तियों का नाश नहीं होता; और जो ख़ुद नियंत्रित होता है, वह नियंत्रक नहीं हो सकता। किसी का एक हाथ न रहे तो उसका “मैं” कुछ घटता नहीं, सो “मैं” शरीर के किसी हिस्से में नहीं। शरीर “नियम्य” है, आदेश पाने वाला सेवक, और सेवक स्वामी नहीं हो सकता। फिर एक अचूक बात, शरीर, उसके धर्मों, उसके कामों, उसकी अवस्थाओं, इन सबका जो साक्षी है और जो हमेशा रहता है, उस आत्मा का इन सबसे अलग होना अपने आप सिद्ध है। एक गवाह और जिस घटना की वह गवाही दे, दोनों एक नहीं हो सकते। “मेरा शरीर थका है” कह पाना ही सिद्ध कर देता है कि साक्षी शरीर से अलग है, और यह “स्वतः-सिद्ध” है, बस ध्यान देने भर की बात।
156 · अंग कटे, फिर भी जीवन
पाणिपादादिमान्देहो नात्मा व्यङ्गेऽपि जीवनात् ।
तत्तच्छक्तेरनाशाच्च न नियम्यो नियामकः ॥ 156 ॥
157 · शरीर का साक्षी
देहतद्धर्मतत्कर्मतदवस्थादिसाक्षिणः ।
सत एव स्वतःसिद्धं तद्वैलक्षण्यमात्मनः ॥ 157 ॥
गुरु फिर शरीर का वही रूखा, ईमानदार वर्णन देते हैं। हड्डियों का यह ढेर, मांस से सना, मल से भरा, बहुत मलिन, यह “जानने वाला” कैसे हो सकता है, जो ख़ुद इससे बिल्कुल अलग है? यह नफ़रत सिखाने को नहीं, शरीर के साथ की हद से ज़्यादा पकड़ ढीली करने की दवा है; चेतना और एक भौतिक ढेर, दो बिल्कुल अलग जातियों की चीज़ें हैं, मांस “जान” नहीं सकता। फिर गुरु दो तरह के इंसान आमने-सामने रखते हैं, चमड़ी-मांस-चर्बी-हड्डी-मल के इस ढेर में मूढ़ इंसान “मैं” की समझ बना लेता है, पर विचारशील इंसान अपने असली स्वरूप को, परम सच को, इससे बिल्कुल अलग जानता है। फ़र्क बुद्धि या पढ़ाई का नहीं, सिर्फ़ एक ठहरे हुए सवाल का है, “क्या यह सच में मैं हूँ?”
158 · हड्डियों का ढेर, जानने वाला कैसे
शल्यराशिर्मांसलिप्तो मलपूर्णोऽतिकश्मलः ।
कथं भवेदयं वेत्ता स्वयमेतद्विलक्षणः ॥ 158 ॥
159 · मूढ़ और विचारशील
त्वङ्मांसमेदोऽस्थिपुरीषराशा वहंमतिं मूढजनः करोति ।
विलक्षणं वेत्ति विचारशीलो निजस्वरूपं परमार्थ भूतम् ॥ 159 ॥
अब गुरु समझ के तीन दर्जे एक सीढ़ी की तरह रखते हैं। “शरीर ही मैं”, यह जड़-बुद्धि वाले की समझ; “शरीर में बसा जीव मैं”, यह विद्वान की समझ; और “मैं ब्रह्म हूँ”, यह विवेक-ज्ञान वाले महात्मा की समझ, सद्-आत्मा में टिकी हुई। सबसे नीचे मांस-हड्डी तक सिमटा “मैं”, बीच में एक छोटा, घिरा, संसार में फँसा “मैं”, और सबसे ऊपर असीम, मुक्त, सबका सार। जहाँ ज़्यादातर लोग रुक जाते हैं, वहाँ से ऊपर एक और पायदान है, और पूरी किताब उसी तक ले जाने का काम है। इसी से गुरु शिष्य को सीधा, और कुछ कड़ा, संबोधन करते हैं, हे मूढ़-बुद्धि वाले, चमड़ी-मांस-चर्बी-हड्डी-मल के इस ढेर में “आत्मा” वाली समझ छोड़ दीजिए, और सबके आत्मा, निर्विकल्प ब्रह्म में परम शांति पा कर उसका भजन कीजिए। इस कड़ाई में उस माँ की डाँट का प्रेम है जो बच्चे को आग के पास से खींच लेती है। ध्यान दीजिए, गुरु शरीर-त्याग नहीं, “आत्म-बुद्धि” का त्याग कहते हैं, शरीर रहे, बस उसके माथे से “मैं” का ठप्पा उतर जाए।
160 · तीन तरह के “मैं”
देहोऽहमित्येव जडस्य बुद्धिः देहे च जीवे विदुषस्त्वहंधीः ।
विवेकविज्ञानवतो महात्मनो ब्रह्माहमित्येव मतिः सदात्मनि ॥ 160 ॥
161 · “इस ढेर में ‘मैं’ छोड़ दे”
अत्रात्मबुद्धिं त्यज मूढबुद्धे त्वङ्मांसमेदोऽस्थिपुरीषराशौ ।
सर्वात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे कुरुष्व शान्ति परमां भजस्व ॥ 161 ॥
फिर गुरु एक चुभने वाली बात कहते हैं, ख़ास तौर पर पढ़े-लिखे पाठक के लिए। असत् शरीर-इन्द्रिय आदि में भ्रम से उठी “मैं” वाली समझ को विद्वान जब तक नहीं छोड़ता, तब तक उसके लिए मुक्ति की बात तक नहीं, चाहे वह वेदान्त के पूरे तर्क-मार्ग का पारखी ही क्यों न हो। “औषधि” बोलने भर से रोग नहीं जाता; ज्ञान सिर में जमा रहे और जीवन में “मैं शरीर हूँ” वाला डर-राग ज्यों का त्यों चले, तो वह ज्ञान काम नहीं आया। फिर एक बेहद चतुर श्लोक, अपनी छाया में, आईने के प्रतिबिंब में, सपने के शरीर में, या कल्पना में गढ़े शरीर में, जैसे “यह मैं हूँ” वाली समझ नहीं होती, वैसे ही इस जीते-जागते शरीर में भी न हो। ये चारों जीव जैसे दिखते हैं, पर इनसे ज़रा भी जुड़ाव नहीं होता; एकमात्र अंतर यह कि यह शरीर अधिक “ठोस” लगता है, पर वह ठोसपन मात्रा भर का अंतर है, जाति का नहीं।
162 · जब तक यह भ्रम है, मुक्ति की बात ही नहीं
देहेन्द्रियादावसति भ्रमोदितां विद्वानहं तां न जहाति यावत् ।
तावन्न तस्यास्ति विमुक्तिवार्ताप्य् अस्त्वेष वेदान्तनयान्तदर्शी ॥ 162 ॥
163 · छाया, प्रतिबिंब, सपने का शरीर
छायाशरीरे प्रतिबिम्बगात्रे यत्स्वप्नदेहे हृदि कल्पिताङ्गे ।
यथात्मबुद्धिस्तव नास्ति काचिज् जीवच्छरीरे च तथैव मास्तु ॥ 163 ॥
अब गुरु अन्नमय कोश वाला हिस्सा बंद करते हैं, और पूरा ज़ोर एक शब्द पर डालते हैं, “बीज।” “शरीर ही आत्मा है”, यह समझ ही, ग़लत बुद्धि वाले लोगों के जन्म आदि सारे दुख का बीज है; इसलिए प्रयत्न से इसे नष्ट करना चाहिए, मन के छूट जाने पर फिर जन्म की आशंका नहीं रहती। बीज छोटा होता है, पर उसमें पूरा पेड़ छिपा रहता है; यदि पूरी समस्या एक ही बीज से उगी है, तो उस एक बीज को निकाल देने भर से पूरा पेड़ सूख जाता है। पहली परत यहाँ छिल जाती है, अन्नमय कोश पीछे छूटा।
164 · देह-आत्म-बुद्धि, दुख का बीज
देहात्मधीरेव नृणामसद्धियां जन्मादिदुःखप्रभवस्य बीजम् ।
यतस्ततस्त्वं जहि तां प्रयत्नात् त्यक्ते तु चित्ते न पुनर्भवाशा ॥ 164 ॥
अब दूसरी परत, प्राणमय कोश, यानी जीवन-ऊर्जा की परत। पाँच कर्म-इन्द्रियों से जुड़ा यह प्राण ही वह ऊर्जा है, जिससे भर कर अन्नमय कोश सब कामों में लगने योग्य हो जाता है। एक कठपुतली बेजान पड़ी रहती है, डोरियाँ खिंचती हैं और वह जीवंत हो उठती है; प्राण शरीर के लिए वही डोरी-शक्ति है। पर गुरु तुरंत दिखाते हैं कि यह भी आत्मा नहीं। प्राणमय कोश तो हवा का एक रूप है, जो हवा की तरह भीतर-बाहर आता-जाता रहता है, न कभी अच्छा-बुरा जानता है, न अपने को, न दूसरे को, और हमेशा दूसरे के अधीन रहता है। प्राण “जानता” नहीं, और “परतन्त्र” है, दूसरे के बस में; जो ख़ुद किसी और के अधीन हो, वह वह स्वरूप नहीं जो स्वतंत्र और जागरूक है। दूसरी परत छिल जाती है।
165 · प्राणमय कोश, ऊर्जा की परत
कर्मेन्द्रियैः पञ्चभिरञ्चितोऽयं प्राणो भवेत्प्राणमायास्तु कोशः ।
येनात्मवानन्नमयोऽनुपूर्णः प्रवर्ततेऽसौ सकलक्रियासु ॥ 165 ॥
166 · प्राण भी आत्मा नहीं
नैवात्मापि प्राणमयो वायुविकारो गन्तागन्ता वायुवदन्तर्बहिरेषः ।
यस्मात्किंचित्क्वापि न वेत्तीष्टमनिष्टं स्वं वान्यं वा किंचन नित्यं परतन्त्रः ॥ 166 ॥
अब तीसरी परत, मनोमय कोश, यानी मन, और यहीं से सबसे लंबा झुंड शुरू होता है, क्योंकि मन ही असली खिलाड़ी है। ज्ञान-इन्द्रियाँ और मन मिल कर मनोमय कोश हैं, “मेरा, मैं” और चीज़ों के भेद का कारण, नाम आदि के भेद बनाने वाला, पिछले कोश से कहीं ज़्यादा बलवान, उसे भर कर फैल जाने वाला। मन ही वह कारख़ाना है जहाँ हर पल “मैं” और “मेरा” गढ़ा जाता है। गुरु इसे एक यज्ञ-अग्नि की तरह दिखाते हैं, पाँच इन्द्रियों रूपी होताओं से बढ़ती, विषय रूपी घी की धारा से बढ़ती, और बहुत सी वासनाओं रूपी ईंधन से धधकती यह मनोमय-अग्नि संसार को जलाती रहती है। इन्द्रियाँ वे पुजारी हैं जो आग में आहुति डालती रहती हैं, आहुति हर देखी-सुनी-चखी चीज़, और ईंधन जमा इच्छाएँ; ऐसी आग बुझती नहीं, बढ़ती जाती है। यही बेचैन मन है।
167 · मनोमय कोश, मन की परत
ज्ञानेन्द्रियाणि च मनश्च मनोमायाः स्यात् कोशो ममाहमिति वस्तुविकल्पहेतुः ।
संज्ञादिभेदकलनाकलितो बलीयांस् तत्पूर्वकोशमभिपूर्य विजृम्भते यः ॥ 167 ॥
168 · मन, एक यज्ञ-अग्नि
पञ्चेन्द्रियैः पञ्चभिरेव होतृभिः प्रचीयमानो विषयाज्यधारया ।
जाज्वल्यमानो बहुवासनेन्धनैः मनोमयाग्निर्दहति प्रपञ्चम् ॥ 168 ॥
अब इस झुंड का सबसे ज़ोरदार श्लोक आता है, और अविद्या का मुखौटा उतर जाता है। मन से अलग कोई अविद्या है ही नहीं, मन ही अविद्या है, संसार-बंधन का कारण; वह नष्ट होने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है, वह फैलने पर सब कुछ फैल जाता है। यह एक तरफ़ डराने वाली बात है, समस्या इतनी पास, अपने ही मन में; दूसरी तरफ़ बेहद मुक्त करने वाली, क्योंकि लड़ाई किसी अनजान बाहरी राक्षस से नहीं, यहीं हाथ की पहुँच में है। गुरु इसे सपने से और पक्का करते हैं, सपने में, जहाँ बाहर कुछ नहीं होता, मन ही अपनी शक्ति से भोक्ता आदि पूरा संसार रच लेता है, और जागते में भी ठीक वैसे ही, कोई फ़र्क नहीं, यह सब मन का ही फैलाव है। फिर एक अचूक सबूत, गहरी नींद में, जब मन लीन हो जाता है, तब कुछ नहीं रहता, यह सबका जाना अनुभव है; इससे साफ़ है, मनुष्य का संसार मन का ही गढ़ा हुआ है, अपने आप नहीं। जागते में मन है तो संसार है, सपने में मन है तो एक संसार है, पर गहरी नींद में मन लीन, और संसार बिल्कुल नहीं; जो नींद आते ही ग़ायब हो जाए, वह अपने बल पर “वहाँ” नहीं था, वह मन के साथ बँधा था।
169 · मन ही अविद्या है
न ह्यस्त्यविद्या मनसोऽतिरिक्ता मनो ह्यविद्या भवबन्धहेतुः ।
तस्मिन्विनष्टे सकलं विनष्टं विजृम्भितेऽस्मिन्सकलं विजृम्भते ॥ 169 ॥
170 · सपने की तरह, जागते में भी
स्वप्नेऽर्थशून्ये सृजति स्वशक्त्या भोक्त्रादिविश्वं मन एव सर्वम् ।
तथैव जाग्रत्यपि नो विशेषः तत्सर्वमेतन्मनसो विजृम्भणम् ॥ 170 ॥
171 · गहरी नींद का सबूत
सुषुप्तिकाले मनसि प्रलीने नैवास्ति किंचित्सकलप्रसिद्धेः ।
अतो मनःकल्पितेव पुंसः संसार एतस्य न वस्तुतोऽस्ति ॥ 171 ॥
“मन ही अविद्या है” सुन कर लग सकता है कि मन एक दुश्मन है जिसे मिटाना है, पर गुरु तुरंत उस तस्वीर को संभाल लेते हैं। हवा ही बादल लाती है, और फिर वही हवा उसे हटा देती है; वैसे ही, मन ही बंधन गढ़ता है, और मोक्ष भी उसी मन से गढ़ा जाता है। सब इस पर निर्भर है कि वह किस दिशा बहे, बाहर की ओर बहता मन बंधन बुनता है, भीतर की ओर मुड़ा वही मन मुक्ति की ओर ले जाता है। इसी को गुरु एक ठोस तस्वीर में रखते हैं, शरीर आदि सब विषयों में राग गढ़ कर मन उसी राग रूपी रस्सी से पुरुष को जानवर की तरह बाँध देता है, और बाद में, समझदार के लिए, उन्हीं विषयों में ज़हर जैसी विरक्ति गढ़ कर वही मन उसे बंधन से छुड़ा भी देता है। फिर वे एक साफ़ निष्कर्ष पर आते हैं, इस जीव के बंधन और मोक्ष, दोनों के विधान में मन ही कारण है, रजोगुण से मलिन मन बंधन का कारण है, और रजस-तमस से रहित शुद्ध मन मोक्ष का। तो मन को मारना नहीं है, उसे साफ़ करना है, एक गंदे और एक साफ़ शीशे का फ़र्क; शीशा वही रहता है, बस मैल हटता है, और साफ़ शीशे में ही आत्मा का प्रतिबिंब दिखता है।
172 · बंधन भी मन, मोक्ष भी मन
वायुनानीयते मेधः पुनस्तेनैव नीयते ।
मनसा कल्प्यते बन्धो मोक्षस्तेनैव कल्प्यते ॥ 172 ॥
173 · वही मन बाँधता है, वही छुड़ाता है
देहादिसर्वविषये परिकल्प्य रागं बध्नाति तेन पुरुषं पशुवद्गुणेन ।
वैरस्यमत्र विषवत्सुवुधाय पश्चाद् एनं विमोचयति तन्मन एव बन्धात् ॥ 173 ॥
174 · मलिन मन बाँधता, शुद्ध मन छुड़ाता
तस्मान्मनः कारणमस्य जन्तोः बन्धस्य मोक्षस्य च वा विधाने ।
बन्धस्य हेतुर्मलिनं रजोगुणैः मोक्षस्य शुद्धं विरजस्तमस्कम् ॥ 174 ॥
मन शुद्ध कैसे होंगे? गुरु एक व्यावहारिक सलाह देते हैं। विवेक और वैराग्य की प्रचुरता से मन शुद्धता पा कर मुक्ति का साधन बन जाता है, इसलिए बुद्धिमान मुमुक्षु को सबसे पहले इन दोनों को पक्का करना चाहिए। एक शब्द ज़रूरी है, “अग्रे”, सबसे पहले; बहुत लोग सीधे ऊँची साधनाओं में कूदना चाहते हैं, पर मन अभी रजस से भरा हो तो वे साधनाएँ टिकेंगी नहीं, नींव पहले, इमारत बाद में। फिर एक तेज़, यादगार चेतावनी, मन नाम का एक बड़ा बाघ विषयों के जंगल में घूमता रहता है, जो साधक मुमुक्षु हैं वे वहाँ न जाएँ। बाघ खुले मैदान में उतना ख़तरनाक नहीं, पर अपने जंगल में सबसे ताक़तवर होता है; मन भी इन्द्रिय-सुखों के माहौल में सबसे बेक़ाबू होता है, सो जब मन अभी सध ही रहा है, उसे उसकी सबसे ताक़तवर ज़मीन पर मत ले जाइए।
175 · विवेक और वैराग्य, पहले इन्हें पक्का करो
विवेकवैराग्यगुणातिरेकाच् छुद्धत्वमासाद्य मनो विमुक्त्यै ।
भवत्यतो बुद्धिमतो मुमुक्षोस् ताभ्यां दृढाभ्यां भवितव्यमग्रे ॥ 175 ॥
176 · मन, एक बड़ा बाघ
मनो नाम महाव्याघ्रो विषयारण्यभूमिषु ।
चरत्यत्र न गच्छन्तु साधवो ये मुमुक्षवः ॥ 176 ॥
अब गुरु एक बेहद गहरी बात कहते हैं, जीव की ज़्यादातर दुनिया “भेदों” की दुनिया है, और वे सारे भेद मन की रचना हैं। मन ही भोक्ता के लिए सारे विषयों को जन्म देता है, स्थूल रूप में और सूक्ष्म रूप में, शरीर, वर्ण, आश्रम, जाति के सारे भेद, और गुण, क्रिया, कारण, फल, सब हमेशा मन ही रचता है। ये बँटवारे किसी अंतिम सच का हिस्सा नहीं, मन के बनाए हुए हैं, और यह मुक्त कर देने वाली बात है, जिस पहचान के बोझ से जीव दबा रहता है उसका इतना बड़ा हिस्सा मन की एक बनी-बनाई व्यवस्था है, असली स्वरूप इन सब खानों से परे रहता है। फिर पूरी समस्या एक वाक्य में, इस असंग चेतना-स्वरूप को भरमा कर, शरीर-इन्द्रिय-प्राण के गुणों से बाँध कर, मन इसे “मैं-मेरा” के भ्रम में डाल देता है, लगातार, अपने कामों और उनके फलों के भोग में। आत्मा “असंग” है, अछूती; मन कोई असली ज़ंजीर नहीं डालता, बस एक भ्रम पैदा करता है, और इतने भर से असीम आत्मा अपने को एक छोटे, बँधे जीव की तरह अनुभव करने लगती है, एक उधार की कहानी, जो झूठी पहचानी जाते ही टूट जाती है।
177 · मन ही सब भेद रचता है
मनः प्रसूते विषयानशेषान् स्थूलात्मना सूक्ष्मतया च भोक्तुः ।
शरीरवर्णाश्रमजातिभेदान् गुणक्रियाहेतुफलानि नित्यम् ॥ 177 ॥
178 · मन असंग चेतना को भरमा देता है
असङ्गचिद्रूपममुं विमोह्य देहेन्द्रियप्राणगुणैर्निबद्ध्य ।
अहंममेति भ्रमायात्यजस्रं मनः स्वकृत्येषु फलोपभुक्तिषु ॥ 178 ॥
यहाँ एक शब्द चाबी है, “अध्यास”, पूरे अद्वैत का केंद्रीय शब्द, यानी एक चीज़ को दूसरी पर थोप देना। अध्यास के दोष से पुरुष का संसार-चक्र चलता है, अध्यास का यह बंधन इसी मन से गढ़ा गया है, और रजस-तमस के दोष वाले विवेकहीन इंसान के जन्म आदि दुख का यही मूल कारण है। साँप रस्सी पर थोपा गया, सीप पर चाँदी की चमक थोपी गई, और हमारा सबसे बड़ा अध्यास आत्मा पर शरीर-मन को थोप देना है; यह थोपना मन का काम है, सो बंधन कोई असली चीज़ नहीं, एक थोपी हुई पहचान है, और थोपी हुई चीज़ हटाई जा सकती है। इसी से तत्व देखने वाले विद्वान मन को ही अविद्या कहते हैं, जिससे पूरा विश्व घुमाया जाता है, ठीक जैसे हवा से बादलों का समूह। बादल अपने आप नहीं घूमते, हवा उन्हें चलाती है; यह सारा संसारी फैलाव-हलचल मन की हवा से घूमता है। इसे बार-बार दोहराने का कारण है, यह एक आदत तोड़ता है, मन समस्याओं को “बाहर” मानता रहता है, और गुरु धीरे-धीरे उँगली एक ही जगह घुमा देते हैं, मन पर, और यह निराशा नहीं, राहत है, क्योंकि मन पहुँच के भीतर है।
179 · अध्यास, एक थोपी हुई पहचान
अध्यासदोषात्पुरुषस्य संसृतिः अध्यासबन्धस्त्वमुनैव कल्पितः ।
रजस्तमोदोषवतोऽविवेकिनो जन्मादिदुःखस्य निदानमेतत् ॥ 179 ॥
180 · मन ही अविद्या, हवा और बादल
अतः प्राहुर्मनोऽविद्यां पण्डितास्तत्त्वदर्शिनः ।
येनैव भ्राम्यते विश्वं वायुनेवाभ्रमण्डलम् ॥ 180 ॥
अब गुरु इस झुंड को एक उम्मीद भरी बात पर समेटते हैं। मुमुक्षु को प्रयत्न से उस मन की सफ़ाई करनी चाहिए, और यह पूरी तरह शुद्ध हो जाने पर मुक्ति हथेली पर रखे फल जैसी, सहज और साफ़ दिखती, हो जाती है। हथेली पर रखे फल से अधिक साफ़, अधिक पास, और क्या होगा, कोई दूरी नहीं, कोई संदेह नहीं; मन एक बार सच में साफ़ हो जाए, तो मुक्ति उतनी ही निश्चित हो जाती है। फिर वे रजस को झाड़ने का एक व्यावहारिक नुस्ख़ा देते हैं, मोक्ष में ही लगाव रख कर, विषयों का राग जड़ समेत उखाड़ कर, सब कर्म छोड़ कर, और सच्ची श्रद्धा से श्रवण आदि में लगा हुआ जो ऐसा करता है, वह बुद्धि के रजस-स्वभाव को झाड़ देता है। “धुनोति”, झाड़ देना, जैसे कपड़े से धूल; रजस कोई गहरी, स्थायी चीज़ नहीं, जमी धूल है। एक हाथ से पुरानी धूल हटाइए, दूसरे से श्रवण-मनन की साफ़ दिशा दीजिए, और सबसे ऊपर “मोक्ष-एक-सक्ति”, सिर्फ़ एक चीज़ की चाह; जब बिखरी चाहें सिमट कर एक बन जाती हैं, रजस का बिखराव अपने आप थमने लगता है।
181 · मन साफ़, तो मुक्ति हथेली में
तन्मनःशोधनं कार्यं प्रयत्नेन मुमुक्षुणा ।
विशुद्धे सति चैतस्मिन्मुक्तिः करफलायते ॥ 181 ॥
182 · रजस को कैसे झाड़ें
मोक्षैकसक्त्या विषयेषु रागं निर्मूल्य संन्यस्य च सर्वकर्म ।
सच्छ्रद्धया यः श्रवणादिनिष्ठो रजःस्वभावं स धुनोति बुद्धेः ॥ 182 ॥
और अब तीसरी परत भी छिल जाती है। मनोमय कोश भी परम आत्मा नहीं, क्योंकि इसका आदि-अंत है, यह बदलता रहता है, यह दुख-स्वभाव वाला है, और यह एक विषय है, जानी जाने वाली चीज़; क्योंकि देखने वाला कभी देखी जाने वाली चीज़ के रूप में नहीं देखा जाता। मन का आदि-अंत है, वह नींद में थम जाता है; मन पल-पल बदलता है; मन दुख-स्वभाव वाला है; और चौथा, सबसे गहरा, मन भी “देखा” जाता है। “मेरा मन आज बेचैन है”, “मेरा मन शांत है”, यह कह पाना ही सिद्ध कर देता है कि मन एक “दृश्य” है, और साक्षी उसका “द्रष्टा।” मन भी, आख़िर में, घड़े जैसा है, जाना जाता है, और जो जानता है वह मन से परे है। अब आधा सफ़र हो चुका, तीन परतें पीछे; आगे दो और बाक़ी हैं, बुद्धि, और आनंद।
183 · मनोमय भी आत्मा नहीं
मनोमयो नापि भवेत्परात्मा ह्याद्यन्तवत्त्वात्परिणामिभावात् ।
दुःखात्मकत्वाद्विषयत्वहेतोः द्रष्टा हि दृश्यात्मतया न दृष्टः ॥ 183 ॥
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना, भाग 7 · पाँच कोश का दूसरा भाग, बुद्धि और आनंद की परतें। वहाँ शिष्य एक बहुत ज़रूरी प्रश्न भी उठाता है, यदि बंधन अनादि है, तो वह कभी ख़त्म कैसे होगा। और गुरु उसका उत्तर देते हैं।
श्लोक 172 की बात साथ रहे, बंधन भी मन गढ़ता है, मोक्ष भी मन। जिस पल मन किसी वस्तु में “राग की रस्सी” बुनता दिखे, उसे बुनते हुए देख लेना ही, उल्टी दिशा में, पहली गाँठ का खुलना है।