भाग 6 · पंच-कोश (1)

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 6 · पाँच कोश · पहली तीन परतें, अन्न, प्राण, मन · श्लोक 146-183

तालाब का पानी साफ़ है, पर ऊपर काई की परतें जम गई हैं, और पानी दिखता ही नहीं। आपके और आपके असली स्वरूप के बीच ऐसी ही पाँच परतें हैं। गुरु अब उन्हें एक-एक कर के हटाते हैं।

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पहले एक बात

विवेकचूडामणि की सबसे मशहूर विधि अब शुरू होती है, पंच-कोश विवेक, यानी पाँच परतों को छील कर असली स्वरूप तक पहुँचना।

तस्वीर सीधी है, और गुरु ख़ुद देते हैं: एक तालाब का पानी अपने आप में साफ़ है। पर ऊपर काई की परतें जम गई हैं। अब पानी दिखता नहीं। काई दिखती है। पानी गंदा नहीं हुआ; वह बस ढक गया। बस काई हटाओ, साफ़ पानी अपने आप सामने।

आपके साथ ठीक यही है। आपका असली स्वरूप, सत्-चित्-आनंद, कभी मैला नहीं हुआ। पर उस पर पाँच परतें (कोश) जमी हैं: अन्नमय (शरीर), प्राणमय (ऊर्जा), मनोमय (मन), विज्ञानमय (बुद्धि), और आनंदमय। यह भाग पहली तीन परतें छीलता है। हर परत के साथ गुरु एक ही सवाल पूछते हैं, “क्या यह आप हैं?”, और हर बार जवाब आता है, “नहीं। यह भी एक परत है।”

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। तीन कोश तीन झुंडों में हैं, अन्नमय (154-164), प्राणमय (165-166), मनोमय (167-183)। मनोमय वाला झुंड सबसे बड़ा है, क्योंकि मन ही असली खिलाड़ी है। असली खंभे: 149-150 (काई और पानी), 169 (मन ही अविद्या है), 172 (बंधन भी मन, मोक्ष भी मन)। हर श्लोक पर anchor है।

146 · बंधन, पुराना, पर अनादि नहीं अमर

अज्ञानमूलोऽयमनात्मबन्धो नैसर्गिकोऽनादिरनन्त ईरितः ।
जन्माप्ययव्याधिजरादिदुःख प्रवाहपातं जनयत्यमुष्य ॥ 146 ॥

ajñāna-mūlo’yam anātma-bandho naisargiko’nādir ananta īritaḥ · janmāpyaya-vyādhi-jarādi-duḥkha pravāha-pātaṁ janayaty amuṣya

शब्दार्थ: अज्ञान-मूलः · अज्ञान जिसकी जड़ है · अनात्म-बन्धः · अनात्मा से बंधन · नैसर्गिकः · स्वाभाविक-सा लगता · अनादिः · आदि-रहित · जन्म-अप्यय-व्याधि-जरा-दुःख · जन्म, मृत्यु, बीमारी, बुढ़ापे का दुख · प्रवाह-पातं जनयति · बहता हुआ झरना बना देता है।

अर्थ: यह अनात्मा वाला बंधन, जिसकी जड़ अज्ञान है, स्वाभाविक-सा, आदि-रहित कहा गया है, और यह जन्म, मृत्यु, बीमारी, बुढ़ापे आदि के दुख की एक बहती धारा पैदा करता रहता है।

भावार्थ: गुरु बंधन की बात समेटते हैं, और एक बारीक बात कहते हैं। बंधन “अनादि” है, यानी इसका कोई शुरुआती बिंदु नहीं ढूँढा जा सकता; यह हमेशा से ऐसा ही चला आ रहा लगता है। यह सुन कर निराशा हो सकती है, “जो हमेशा से है, वह कैसे जाएगा?”

पर ध्यान दीजिए, गुरु कहते हैं “अनादि”, पर “अनंत” (न ख़त्म होने वाला) नहीं। एक रात कितनी भी लंबी हो, उसका कोई “पहला पल” आप नहीं बता सकते, पर सुबह होते ही वह ख़त्म ज़रूर हो जाती है। बंधन अनादि है, अमर नहीं। उसकी जड़ बस एक चीज़ है, अज्ञान। और जड़ कटे, तो पेड़ गिरता है।

147 · सिर्फ़ विवेक की तलवार

नास्त्रैर्न शस्त्रैरनिलेन वन्हिना छेत्तुं न शक्यो न च कर्मकोटिभिः ।
विवेकविज्ञानमहासिना विना धातुः प्रसादेन शितेन मञ्जुना ॥ 147 ॥

nāstrair na śastrair anilena vanhinā chettuṁ na śakyo na ca karma-koṭibhiḥ · viveka-vijñāna-mahāsinā vinā dhātuḥ prasādena śitena mañjunā

शब्दार्थ: न अस्त्रैः न शस्त्रैः · न फेंके जाने वाले हथियारों से, न हाथ के हथियारों से · न अनिलेन वन्हिना · न हवा से, न आग से · न कर्म-कोटिभिः · न करोड़ों कर्मों से · विवेक-विज्ञान-महा-असिना · विवेक-विज्ञान की महान तलवार से · धातुः प्रसादेन · विधाता की कृपा से · शितेन मञ्जुना · तेज़ और सुंदर।

अर्थ: इस बंधन को न किसी हथियार से काटा जा सकता है, न हवा से, न आग से, न करोड़ों कर्मों से, सिर्फ़ विवेक-विज्ञान की उस महान तलवार से, जो विधाता की कृपा से तेज़ और सुंदर हुई हो।

भावार्थ: गुरु बंधन काटने का एकमात्र औज़ार बताते हैं, और देखिए वे क्या-क्या ख़ारिज करते हैं, हथियार, आग, हवा, और “करोड़ों कर्म।”

क्यों कर्म नहीं काट सकते? क्योंकि बंधन एक भौतिक चीज़ नहीं। एक ग़लतफ़हमी है (श्लोक 137-138, रस्सी-साँप)। और ग़लतफ़हमी को कोई हथौड़ा नहीं तोड़ सकता; उसे सिर्फ़ साफ़ देख लेना मिटाता है। इसलिए हथियार सिर्फ़ एक, “विवेक की तलवार।” और एक प्यारा शब्द, गुरु इसे “मञ्जु”, सुंदर कहते हैं। यह तलवार काटती है, पर हिंसा से नहीं; वह उजाले की तरह काटती है, सुंदरता से।

148 · रास्ते की एक छोटी सी रूपरेखा

श्रुतिप्रमाणैकमतेः स्वधर्म निष्ठा तयैवात्मविशुद्धिरस्य ।
विशुद्धबुद्धेः परमात्मवेदनं तेनैव संसारसमूलनाशः ॥ 148 ॥

śruti-pramāṇaika-mateḥ sva-dharma niṣṭhā tayaivātma-viśuddhir asya · viśuddha-buddheḥ paramātma-vedanaṁ tenaiva saṁsāra-samūla-nāśaḥ

शब्दार्थ: श्रुति-प्रमाण-एक-मतेः · श्रुति को प्रमाण मानने वाले की · स्व-धर्म-निष्ठा · अपने धर्म में निष्ठा · आत्म-विशुद्धिः · मन की सफ़ाई · विशुद्ध-बुद्धेः · निर्मल बुद्धि वाले को · परमात्म-वेदनं · परमात्मा का ज्ञान · संसार-समूल-नाशः · संसार का जड़ समेत नाश।

अर्थ: श्रुति को प्रमाण मानने वाले की अपने धर्म में निष्ठा होती है; उसी से उसके मन की सफ़ाई होती है। निर्मल बुद्धि वाले को परमात्मा का ज्ञान होता है; और उसी से संसार का जड़ समेत नाश।

भावार्थ: गुरु एक छोटी सी, साफ़ कारण-शृंखला देते हैं, पूरे रास्ते का नक्शा, एक श्लोक में। निष्ठा → मन की सफ़ाई → ज्ञान → संसार का अंत।

हर कदम अगले को संभव बनाता है। और गौर कीजिए, यह बीच का कदम, “मन की सफ़ाई।” यह एक पुल है: अच्छे काम और निष्ठा सीधे मुक्ति नहीं देते, पर वे मन साफ़ करते हैं; और साफ़ मन में ही ज्ञान का बीज उग पाता है (भाग 1, श्लोक 11 की याद)। यह श्लोक एक भरोसा देता है: रास्ता उलझा हुआ नहीं है; वह एक सीधी सीढ़ी है।

149 · काई के नीचे का पानी

कोशैरन्नमयाद्यैः पञ्चभिरात्मा न संवृतो भाति ।
निजशक्तिसमुत्पन्नैः शैवालपटलैरिवाम्बु वापीस्थम् ॥ 149 ॥

kośair anna-mayādyaiḥ pañcabhir ātmā na saṁvṛto bhāti · nija-śakti-samutpannaiḥ śaivāla-paṭalair ivāmbu vāpī-stham

शब्दार्थ: कोशैः अन्नमय-आद्यैः पञ्चभिः · अन्नमय आदि पाँच कोशों से · आत्मा संवृतः न भाति · आत्मा ढका हुआ साफ़ नहीं दिखता · निज-शक्ति-समुत्पन्नैः · अपनी ही शक्ति से उपजे · शैवाल-पटलैः इव · काई की परतों की तरह · अम्बु वापी-स्थम् · तालाब में पड़े पानी को।

अर्थ: अन्नमय आदि पाँच कोशों से ढका हुआ आत्मा साफ़ नहीं दिखता, ठीक जैसे अपनी ही (तालाब की) शक्ति से उपजी काई की परतों से ढका तालाब का पानी।

भावार्थ: यह पूरे भाग की केंद्रीय तस्वीर है, और इसका हर हिस्सा कुछ कहता है।

एक, पानी ढका है, गंदा नहीं। आत्मा कभी मैली नहीं होती; वह बस नज़र से ओझल हो जाती है। दो, काई “अपनी ही शक्ति से उपजी।” यानी ये पाँच कोश कोई बाहर से आई मुसीबत नहीं; वे उसी तालाब की उपज हैं, उसी जीवन का हिस्सा। और तीन, काई हटाई जा सकती है।बस ऊपर की परतें हटानी हैं। यह पूरे भाग की विधि है, और यह राहत भरी है, काम जोड़ने का नहीं। हटाने का है।

150 · काई हटाओ, पानी सामने

तच्छैवालापनये सम्यक्सलिलं प्रतीयते शुद्धम् ।
तृष्णासन्तापहरं सद्यः सौख्यप्रदं परं पुंसः ॥ 150 ॥

tac chaivālāpanaye samyak salilaṁ pratīyate śuddham · tṛṣṇā-santāpa-haraṁ sadyaḥ saukhya-pradaṁ paraṁ puṁsaḥ

शब्दार्थ: तत्-शैवाल-अपनये · उस काई के हटाने पर · सम्यक् सलिलं प्रतीयते शुद्धम् · साफ़ पानी ठीक से दिखने लगता है · तृष्णा-सन्ताप-हरं · प्यास और ताप मिटाने वाला · सद्यः सौख्य-प्रदं परं · तुरंत परम सुख देने वाला।

अर्थ: उस काई के हटते ही साफ़ पानी ठीक से दिखने लगता है, प्यास और ताप मिटाने वाला, मनुष्य को तुरंत परम सुख देने वाला।

भावार्थ: श्लोक 149 ने समस्या दिखाई, श्लोक 150 हल का फल बताता है, और एक शब्द ख़ास है: “सद्यः”, तुरंत।

काई हटाने में मेहनत और समय लग सकता है। पर जिस पल वह हटी, पानी “तुरंत” दिख जाता है, कोई इंतज़ार नहीं। आत्म-ज्ञान ऐसा ही है। काई हटाने का काम, विवेक, साधना, धीरे-धीरे चलता है। पर पहचान, जब होती है, अचानक होती है। और वह पानी क्या करता है? “प्यास और ताप मिटाता है।” यानी जिस सुख-शांति के लिए आप ज़िंदगी भर बाहर भटके, वह काई के नीचे, पहले से, आपका अपना, बस उघड़ने के इंतज़ार में।

151 · पाँचों हटने पर, शुद्ध आत्मा

पञ्चानामपि कोशानामपवादे विभात्ययं शुद्धः ।
नित्यानन्दैकरसः प्रत्यग्रूपः परः स्वयंज्योतिः ॥ 151 ॥

pañcānām api kośānām apavāde vibhāty ayaṁ śuddhaḥ · nityānandaika-rasaḥ pratyag-rūpaḥ paraḥ svayaṁ-jyotiḥ

शब्दार्थ: पञ्चानां कोशानाम् अपवादे · पाँचों कोशों के निषेध पर · विभाति अयं शुद्धः · यह शुद्ध आत्मा चमक उठता है · नित्य-आनन्द-एक-रसः · नित्य आनंद का एक रस · प्रत्यग्-रूपः · भीतर का स्वरूप · स्वयं-ज्योतिः · ख़ुद-प्रकाश।

अर्थ: पाँचों कोशों के निषेध पर यह शुद्ध आत्मा चमक उठता है, नित्य आनंद का एक रस, भीतर का स्वरूप, सर्वोच्च, ख़ुद-प्रकाश।

भावार्थ: गुरु पहले ही बता देते हैं कि छीलने के अंत में क्या मिलेगा, ताकि शिष्य पूरे सफ़र भर उस लक्ष्य को सामने रख सके।

एक शब्द पर रुकिए, “अपवाद”, निषेध। कोशों को “तोड़ना” या “नष्ट करना” नहीं। बस “निषेध” करना, यानी हर एक के बारे में साफ़-साफ़ देख लेना कि “यह मैं नहीं हूँ।” शरीर रहेगा, मन रहेगा, बुद्धि रहेगी, गुरु इन्हें मिटाने को नहीं कह रहे। बस इनके साथ की ग़लत पहचान को छोड़ना है। और जो बचता है, “नित्य आनंद का एक रस।” यह सूखी चेतना नहीं; यह आनंद है।

152 · विवेक, और आनंद

आत्मानात्मविवेकः कर्तव्यो बन्धमुक्तये विदुषा ।
तेनैवानन्दी भवति स्वं विज्ञाय सच्चिदानन्दम् ॥ 152 ॥

ātmānātma-vivekaḥ kartavyo bandha-muktaye viduṣā · tenaivānandī bhavati svaṁ vijñāya sac-cid-ānandam

शब्दार्थ: आत्म-अनात्म-विवेकः कर्तव्यः · आत्मा और अनात्मा का विवेक करना चाहिए · बन्ध-मुक्तये विदुषा · बंधन से छूटने के लिए, ज्ञानी द्वारा · तेन एव आनन्दी भवति · उसी से आनंदमय हो जाता है · स्वं विज्ञाय सत्-चित्-आनन्दम् · अपने को सत्-चित्-आनंद जान कर।

अर्थ: बंधन से छूटने के लिए ज्ञानी को आत्मा और अनात्मा का विवेक करना चाहिए। उसी से वह आनंदमय हो जाता है, अपने आप को सत्-चित्-आनंद जान कर।

भावार्थ: किताब का नाम, विवेकचूडामणि, इस श्लोक में फिर साफ़ हो जाता है। पूरी विधि एक शब्द में है: विवेक, यानी आत्मा और अनात्मा में फ़र्क कर पाना।

और गुरु एक प्यारी बात जोड़ते हैं, विवेक का फल सिर्फ़ “मुक्ति” नहीं। “आनंदी हो जाना” है। यह कोई ठंडा, बौद्धिक छँटाई का काम नहीं। एक-एक परत हटाने के साथ एक हल्कापन आता है, एक ख़ुशी। और आख़िर में जो मिलता है, वह तीन-में-एक है: सत् (होना), चित् (जानना), आनंद। आप सिर्फ़ “हो” नहीं; आप जानते भी हैं, और आनंद भी हो।

153 · मूँज से सींक निकालना

मुञ्जादिषीकामिव दृश्यवर्गात् प्रत्यञ्चमात्मानमसङ्गमक्रियम् ।
विविच्य तत्र प्रविलाप्य सर्वं तदात्मना तिष्ठति यः स मुक्तः ॥ 153 ॥

muñjād iṣīkām iva dṛśya-vargāt pratyañcam ātmānam asaṅgam akriyam · vivicya tatra pravilāpya sarvaṁ tad-ātmanā tiṣṭhati yaḥ sa muktaḥ

शब्दार्थ: मुञ्जात् इषीकाम् इव · मूँज घास से सींक की तरह · दृश्य-वर्गात् · देखी जाने वाली चीज़ों के समूह से · प्रत्यञ्चम् आत्मानम् · भीतर के आत्मा को · असङ्गम् अक्रियम् · असंग, क्रिया-रहित · विविच्य · अलग कर के · तत्र प्रविलाप्य सर्वं · सब कुछ उसी में घोल कर · तद्-आत्मना तिष्ठति · उसी रूप में ठहर जाता है।

अर्थ: मूँज घास से सींक निकालने की तरह, देखी जाने वाली सब चीज़ों के समूह से भीतर के आत्मा को, असंग, क्रिया-रहित, अलग कर के, और फिर सब कुछ उसी में घोल कर, जो उसी रूप में ठहर जाता है, वह मुक्त है।

भावार्थ: गुरु पूरी विधि एक रोज़ की तस्वीर में रख देते हैं, मूँज और सींक। मूँज एक घास है, और उसके भीतर एक पतली, मुलायम सींक होती है। उसे निकालने के लिए ज़ोर नहीं लगाते, धीरे से, ध्यान से, खींचते हैं, और सींक साफ़, अलग बाहर आ जाती है।

आत्म-विवेक ऐसा ही है। “दृश्य-वर्ग”, यानी जो भी देखा जा सकता है, से “देखने वाले” को धीरे, ध्यान से अलग करना। और दो शब्द उस सींक को पहचानने की कुंजी हैं, “असंग” (अछूता) और “अक्रिय” (कुछ न करने वाला)। जो भी जुड़ता है, बँधता है, करता है, वह घास है। सींच वह है जो बस देखता है, अछूता।

154 · अन्नमय कोश, अन्न से बना शरीर

देहोऽयमन्नभवनोऽन्नमायास्तु कोशः चान्नेन जीवति विनश्यति तद्विहीनः ।
त्वक्चर्ममांसरुधिरास्थिपुरीषराशिः नायं स्वयं भवितुमर्हति नित्यशुद्धः ॥ 154 ॥

deho’yam anna-bhavano’nna-mayāstu kośaḥ cānnena jīvati vinaśyati tad-vihīnaḥ · tvak-carma-māṁsa-rudhirāsthi-purīṣa-rāśiḥ nāyaṁ svayaṁ bhavitum arhati nitya-śuddhaḥ

शब्दार्थ: देहः अन्न-भवनः · शरीर अन्न से बना · अन्नमयः कोशः · अन्नमय कोश · अन्नेन जीवति विनश्यति तद्-विहीनः · अन्न से जीता है, बिना अन्न के मिट जाता है · त्वक्-चर्म-मांस-रुधिर-अस्थि-पुरीष-राशिः · चमड़ी, त्वचा, मांस, ख़ून, हड्डी, मल का ढेर · न अयं नित्य-शुद्धः स्वयं भवितुम् अर्हति · यह नित्य-शुद्ध आत्मा नहीं हो सकता।

अर्थ: यह शरीर अन्न से बना है, अन्नमय कोश; यह अन्न से जीता है, और अन्न के बिना मिट जाता है। चमड़ी, मांस, ख़ून, हड्डी, मल का यह ढेर, यह नित्य-शुद्ध आत्मा नहीं हो सकता।

भावार्थ: पहली परत, अन्नमय कोश, यानी यह स्थूल शरीर। और नाम ही पूरी बात कह देता है: “अन्न-मय”, अन्न से बना। यह शरीर एक चलती-फिरती चीज़ है जो अन्न से बनती है, अन्न से चलती है।

और गुरु एक सीधा तर्क देते हैं, जो अन्न पर इतना निर्भर हो, जो अन्न के बिना मिट जाए, वह “नित्य-शुद्ध” आत्मा कैसे हो सकता है? आत्मा को कुछ नहीं चाहिए; यह शरीर हर तीन घंटे में रोटी माँगता है। जो चीज़ इतनी मोहताज है, वह आपका वह स्वरूप नहीं हैं सकती जो हमेशा, अपने आप, पूर्ण है।

155 · पहले नहीं था, बाद में नहीं

पूर्वं जनेरधिमृतेरपि नायमस्ति जातक्षणः क्षणगुणोऽनियतस्वभावः ।
नैको जडश्च घटवत्परिदृश्यमानः स्वात्मा कथं भवति भावविकारवेत्ता ॥ 155 ॥

pūrvaṁ janer adhi mṛter api nāyam asti jāta-kṣaṇaḥ kṣaṇa-guṇo’niyata-svabhāvaḥ · naiko jaḍaś ca ghaṭavat paridṛśyamānaḥ svātmā kathaṁ bhavati bhāva-vikāra-vettā

शब्दार्थ: पूर्वं जनेः मृतेः अधि अपि न अस्ति · जन्म से पहले, मृत्यु के बाद नहीं रहता · जात-क्षणः क्षण-गुणः · पल भर में जन्मा, क्षण-भर के गुण वाला · अनियत-स्वभावः · बदलता स्वभाव · न एकः जडः · न एक, और जड़ · घट-वत् परिदृश्यमानः · घड़े की तरह देखा जाता · भाव-विकार-वेत्ता · हलचलों का जानने वाला।

अर्थ: यह शरीर जन्म से पहले नहीं था, मृत्यु के बाद नहीं रहेगा; यह पल भर में जन्मा, क्षण-भर के गुणों वाला, बदलते स्वभाव वाला है; यह न एक है, और जड़ है, घड़े की तरह देखा जाता है। फिर यह हलचलों का जानने वाला आत्मा कैसे हो सकता है?

भावार्थ: गुरु शरीर की जाँच और गहरी कर देते हैं, और कई बिंदुओं से उसे “अनात्मा” साबित करते हैं।

सबसे ज़ोरदार आख़िरी पंक्ति है, शरीर “घड़े की तरह देखा जाता है।” यानी शरीर एक “जानी जाने वाली” चीज़ है, बाहर की किसी वस्तु जैसी। आप अपने हाथ को देख सकते हैं, अपने शरीर को महसूस कर सकते हैं, मतलब वह “देखी जाने वाली” चीज़ है। और जो देखा जाता है, वह देखने वाला नहीं हो सकता। शरीर जड़ है (उसमें अपनी चेतना नहीं); आप चेतन हैं। शरीर बदलता है; आप वह हैं जो बदलाव को देखता है। पहली परत यहाँ साफ़ अलग हो गई।

156 · अंग कटे, फिर भी जीवन

पाणिपादादिमान्देहो नात्मा व्यङ्गेऽपि जीवनात् ।
तत्तच्छक्तेरनाशाच्च न नियम्यो नियामकः ॥ 156 ॥

pāṇi-pādādimān deho nātmā vyaṅge’pi jīvanāt · tat-tac-chakter anāśāc ca na niyamyo niyāmakaḥ

शब्दार्थ: पाणि-पाद-आदिमान् देहः · हाथ-पैर आदि वाला शरीर · न आत्मा · आत्मा नहीं · व्यङ्गे अपि जीवनात् · अंग कटने पर भी जीवन रहने से · तत्-तत्-शक्तेः अनाशात् · उन-उन शक्तियों के नष्ट न होने से · न नियम्यः नियामकः · नियंत्रित होने वाला नियंत्रक नहीं हो सकता।

अर्थ: हाथ-पैर आदि वाला यह शरीर आत्मा नहीं। क्योंकि कोई अंग कट जाने पर भी जीवन बना रहता है, और उन शक्तियों का नाश नहीं होता। और जो ख़ुद नियंत्रित होता है, वह नियंत्रक नहीं हो सकता।

भावार्थ: गुरु एक बहुत व्यावहारिक तर्क देते हैं। मान लीजिए किसी का एक हाथ या पैर नहीं रहा। क्या वह “कम” इंसान हो गया? क्या उसका जीवन, उसकी चेतना, उसका “मैं” कुछ घटा? नहीं। इंसान पूरा का पूरा वहीं है।

तो “मैं” शरीर के किसी हिस्से में नहीं, वरना हिस्सा जाने से “मैं” भी घटता। और आख़िरी पंक्ति का तर्क सुंदर है: शरीर “नियम्य” है, नियंत्रित किया जाने वाला। आप हाथ उठाने को कहते हैं, हाथ उठता है। तो शरीर सेवक है। और सेवक मालिक नहीं हो सकता। आप वह हैं जो आदेश देता है, जिसे चलाया नहीं जाता।

157 · शरीर का साक्षी

देहतद्धर्मतत्कर्मतदवस्थादिसाक्षिणः ।
सत एव स्वतःसिद्धं तद्वैलक्षण्यमात्मनः ॥ 157 ॥

deha-tad-dharma-tat-karma-tad-avasthādi-sākṣiṇaḥ · sata eva svataḥ-siddhaṁ tad-vailakṣaṇyam ātmanaḥ

शब्दार्थ: देह-तद्-धर्म-तद्-कर्म-तद्-अवस्था-आदि-साक्षिणः · शरीर, उसके धर्म, उसके काम, उसकी अवस्थाओं का साक्षी · सतः एव · जो हमेशा है · स्वतः-सिद्धं · अपने आप सिद्ध · तद्-वैलक्षण्यम् आत्मनः · आत्मा का उससे अलग होना।

अर्थ: शरीर, उसके धर्मों, उसके कामों, उसकी अवस्थाओं, इन सबका जो साक्षी है, और जो हमेशा रहता है, उस आत्मा का इन सबसे अलग होना अपने आप सिद्ध है।

भावार्थ: गुरु एक बेहद सरल, और अचूक तर्क रखते हैं, जो किसी चीज़ का साक्षी है, वह उस चीज़ से अलग ही होंगे।

एक गवाह और जिस घटना की वह गवाही दे रहा है, दोनों एक नहीं हो सकते। आप अपने शरीर की गवाही देते हैं, “मेरा शरीर थका है”, “मेरा शरीर बदल रहा है।” यह कह पाना ही साबित कर देता है कि आप शरीर से अलग हैं, क्योंकि आप उसे “देख” रहे हैं। और इसे साबित करने के लिए कोई बड़ी दलील नहीं चाहिए; गुरु कहते हैं यह “स्वतः-सिद्ध” है, अपने आप साफ़, बस ध्यान देने भर की बात।

158 · हड्डियों का ढेर, जानने वाला कैसे

शल्यराशिर्मांसलिप्तो मलपूर्णोऽतिकश्मलः ।
कथं भवेदयं वेत्ता स्वयमेतद्विलक्षणः ॥ 158 ॥

śalya-rāśir māṁsa-lipto mala-pūrṇo’ti-kaśmalaḥ · kathaṁ bhaved ayaṁ vettā svayam etad-vilakṣaṇaḥ

शब्दार्थ: शल्य-राशिः · हड्डियों का ढेर · मांस-लिप्तः · मांस से सना · मल-पूर्णः अति-कश्मलः · मल से भरा, बहुत मलिन · कथं भवेत् अयं वेत्ता · यह जानने वाला कैसे हो सकता है · स्वयम् एतद्-विलक्षणः · जो ख़ुद इससे अलग है।

अर्थ: हड्डियों का यह ढेर, मांस से सना, मल से भरा, बहुत मलिन, यह “जानने वाला” कैसे हो सकता है, जो ख़ुद इससे बिल्कुल अलग है?

भावार्थ: गुरु फिर शरीर का वही रूखा, ईमानदार वर्णन देते हैं (भाग 4, श्लोक 87 की तरह)। और फिर वही ज़रूरी बात, यह नफ़रत सिखाने को नहीं।

यह एक दवा है, शरीर के साथ की हमारी हद से ज़्यादा पहचान की दवा। हम अपने शरीर को “मैं” मान कर उससे इतने जुड़े होते हैं कि उसके बुढ़ापे, बीमारी, बदलाव, हर चीज़ का बोझ ढोते हैं। गुरु एक रूखी नज़र दे कर वह जकड़न ढीली करते हैं। और सवाल का दिल यह है: चेतना, जानने की शक्ति, और एक भौतिक ढेर, दो बिल्कुल अलग जातियों की चीज़ें हैं। मांस “जान” नहीं सकता। तो जो जानता है, वह मांस से अलग कुछ और ही है।

159 · मूढ़ और विचारशील

त्वङ्मांसमेदोऽस्थिपुरीषराशा वहंमतिं मूढजनः करोति ।
विलक्षणं वेत्ति विचारशीलो निजस्वरूपं परमार्थ भूतम् ॥ 159 ॥

tvaṅ-māṁsa-medo’sthi-purīṣa-rāśā v ahaṁ-matiṁ mūḍha-janaḥ karoti · vilakṣaṇaṁ vetti vicāra-śīlo nija-svarūpaṁ paramārtha bhūtam

शब्दार्थ: त्वक्-मांस-मेदः-अस्थि-पुरीष-राशौ · चमड़ी, मांस, चर्बी, हड्डी, मल के ढेर में · अहम्-मतिं मूढजनः करोति · मूढ़ इंसान “मैं” की समझ बना लेता है · विलक्षणं वेत्ति विचार-शीलः · विचारशील उसे अलग जानता है · निज-स्वरूपं परमार्थ-भूतम् · अपना असली स्वरूप, परम सच।

अर्थ: चमड़ी, मांस, चर्बी, हड्डी, मल के इस ढेर में मूढ़ इंसान “मैं” की समझ बना लेता है। पर विचारशील इंसान अपने असली स्वरूप को, परम सच को, इससे बिल्कुल अलग जानता है।

भावार्थ: गुरु दो तरह के इंसान आमने-सामने रखते हैं, “मूढ़जन” और “विचारशील।” और इन दोनों के बीच का फ़र्क कोई बुद्धि का, पढ़ाई का फ़र्क नहीं।

फ़र्क सिर्फ़ एक है, विचार। मूढ़ इंसान ने एक बार, बिना जाँचे, शरीर को “मैं” मान लिया, और बस वहीं रुक गया। विचारशील इंसान ने रुक कर पूछा, “क्या यह सच में मैं हूँ?”, और जाँच कर देखा कि नहीं। दोनों के पास वही शरीर है; फ़र्क सिर्फ़ इस एक ठहरे हुए सवाल का है। और यही पूरी किताब का न्योता है, मूढ़ता से बाहर निकलने का रास्ता विद्वत्ता नहीं। बस एक ईमानदार जाँच है।

160 · तीन तरह के “मैं”

देहोऽहमित्येव जडस्य बुद्धिः देहे च जीवे विदुषस्त्वहंधीः ।
विवेकविज्ञानवतो महात्मनो ब्रह्माहमित्येव मतिः सदात्मनि ॥ 160 ॥

deho’ham ity eva jaḍasya buddhiḥ dehe ca jīve viduṣas tv ahaṁ-dhīḥ · viveka-vijñānavato mahātmano brahmāham ity eva matiḥ sad-ātmani

शब्दार्थ: देहः अहम् इति जडस्य बुद्धिः · “शरीर ही मैं”, जड़-बुद्धि वाले की समझ · देहे जीवे विदुषः अहं-धीः · “शरीर में बसा जीव मैं”, विद्वान की समझ · विवेक-विज्ञानवतः महात्मनः · विवेक-ज्ञान वाले महात्मा की · ब्रह्म अहम् इति मतिः सद्-आत्मनि · “मैं ब्रह्म हूँ”, सद्-आत्मा में समझ।

अर्थ: “शरीर ही मैं हूँ”, यह जड़-बुद्धि वाले की समझ है। “शरीर में बसा जीव मैं हूँ”, यह विद्वान की समझ है। और “मैं ब्रह्म हूँ”, यह विवेक-ज्ञान वाले महात्मा की समझ है, सद्-आत्मा में टिकी हुई।

भावार्थ: यह श्लोक एक प्यारा नक्शा है, समझ के तीन दर्जे, एक सीढ़ी।

सबसे नीचे: “मैं शरीर हूँ।” यह सबसे मोटी पहचान, बस मांस-हड्डी तक सीमित। बीच में: “मैं शरीर के भीतर बसा एक जीव हूँ”, यह बेहतर है, पर अब भी एक छोटा, अलग, घिरा हुआ “मैं” है, संसार में फँसा हुआ। और सबसे ऊपर: “मैं ब्रह्म हूँ”, असीम, मुक्त, सबका सार। यह नक्शा क्यों ज़रूरी है? क्योंकि यह दिखाता है कि “मैं” को समझने का सिर्फ़ एक तरीक़ा नहीं। और जहाँ ज़्यादातर लोग रुक जाते हैं (पहला या दूसरा दर्जा), वहाँ से ऊपर एक और सीढ़ी है। पूरी किताब उसी आख़िरी पायदान तक ले जाने का काम है।

161 · “इस ढेर में ‘मैं’ छोड़ दे”

अत्रात्मबुद्धिं त्यज मूढबुद्धे त्वङ्मांसमेदोऽस्थिपुरीषराशौ ।
सर्वात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे कुरुष्व शान्ति परमां भजस्व ॥ 161 ॥

atrātma-buddhiṁ tyaja mūḍha-buddhe tvaṅ-māṁsa-medo’sthi-purīṣa-rāśau · sarvātmani brahmaṇi nirvikalpe kuruṣva śānti paramāṁ bhajasva

शब्दार्थ: अत्र आत्म-बुद्धिं त्यज · इसमें “आत्मा” वाली समझ छोड़ दे · मूढ-बुद्धे · हे मूढ़-बुद्धि वाले · त्वक्-मांस-मेदः-अस्थि-पुरीष-राशौ · चमड़ी-मांस-चर्बी-हड्डी-मल के ढेर में · सर्व-आत्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे · सबके आत्मा, निर्विकल्प ब्रह्म में · कुरुष्व शान्ति परमां भजस्व · परम शांति कर, उसे भज।

अर्थ: हे मूढ़-बुद्धि वाले, चमड़ी-मांस-चर्बी-हड्डी-मल के इस ढेर में “आत्मा” वाली समझ छोड़ दे। और सबके आत्मा, निर्विकल्प ब्रह्म में परम शांति पा, उसे भज।

भावार्थ: गुरु यहाँ शिष्य को सीधा, और थोड़ा कड़ा, संबोधन करते हैं, “मूढ़-बुद्धे।” पर इस कड़ाई में प्रेम है। यह उस माँ की डाँट जैसी है जो बच्चे को आग के पास से खींच लेती है।

और देखिए श्लोक का संतुलन, पहली पंक्ति “छोड़ दे” (शरीर वाली पहचान), दूसरी पंक्ति “पा ले” (ब्रह्म वाली शांति)। यह सिर्फ़ इनकार नहीं है; एक चीज़ छोड़ी जाती है ताकि दूसरी, असली चीज़ के लिए जगह बने। और गुरु शरीर-त्याग नहीं कह रहे, “आत्म-बुद्धि” त्यागने को कह रहे हैं, यानी शरीर को “मैं” मानना। शरीर रहे, बस उसके माथे से “मैं” का ठप्पा उतर जाए।

162 · जब तक यह भ्रम है, मुक्ति की बात ही नहीं

देहेन्द्रियादावसति भ्रमोदितां विद्वानहं तां न जहाति यावत् ।
तावन्न तस्यास्ति विमुक्तिवार्ताप्य् अस्त्वेष वेदान्तनयान्तदर्शी ॥ 162 ॥

dehendriyādāv asati bhramoditāṁ vidvān ahaṁ tāṁ na jahāti yāvat · tāvan na tasyāsti vimukti-vārtāpy astv eṣa vedānta-nayānta-darśī

शब्दार्थ: देह-इन्द्रिय-आदौ असति · असत् शरीर-इन्द्रिय आदि में · भ्रम-उदितां “अहं” तां · भ्रम से उठी “मैं” वाली समझ · विद्वान् न जहाति यावत् · विद्वान जब तक नहीं छोड़ता · तावत् न विमुक्ति-वार्ता अपि · तब तक मुक्ति की बात तक नहीं · वेदान्त-नय-अन्त-दर्शी अस्तु अपि · चाहे वह वेदान्त का पूरा पारखी क्यों न हो।

अर्थ: असत् शरीर-इन्द्रिय आदि में भ्रम से उठी “मैं” वाली समझ को विद्वान जब तक नहीं छोड़ता, तब तक उसके लिए मुक्ति की बात तक नहीं। चाहे वह वेदान्त के पूरे तर्क-मार्ग का पारखी ही क्यों न हो।

भावार्थ: गुरु एक बेहद ज़रूरी, और चुभने वाली बात कहते हैं, और यह ख़ास तौर पर एक पढ़े-लिखे, समझदार पाठक के लिए है।

आप वेदान्त के सारे तर्क जान सकते हैं, सारे श्लोक समझा सकते हैं, “वेदान्त-नय-अन्त-दर्शी”, और फिर भी, अगर भीतर “मैं यह शरीर हूँ” वाला भ्रम बैठा है, तो मुक्ति की “बात तक नहीं।” यह भाग 3 की दवा वाली बात की गूँज है (श्लोक 62), “दवा” बोलने से बीमारी नहीं जाती। ज्ञान सिर में जमा हो, और जीवन में “मैं शरीर हूँ” वाला डर-राग ज्यों का त्यों चले, तो वह ज्ञान काम नहीं आया। गुरु बार-बार यहीं लौटते हैं: समझना और जीना, दो अलग चीज़ें हैं।

163 · छाया, प्रतिबिंब, सपने का शरीर

छायाशरीरे प्रतिबिम्बगात्रे यत्स्वप्नदेहे हृदि कल्पिताङ्गे ।
यथात्मबुद्धिस्तव नास्ति काचिज् जीवच्छरीरे च तथैव मास्तु ॥ 163 ॥

chāyā-śarīre pratibimba-gātre yat svapna-dehe hṛdi kalpitāṅge · yathātma-buddhis tava nāsti kācij jīvac-charīre ca tathaiva māstu

शब्दार्थ: छाया-शरीरे · छाया वाले शरीर में · प्रतिबिम्ब-गात्रे · आईने के प्रतिबिंब में · स्वप्न-देहे · सपने के शरीर में · हृदि कल्पित-अङ्गे · कल्पना में गढ़े शरीर में · यथा आत्म-बुद्धिः तव न अस्ति · जैसे आपकी “यह मैं हूँ” वाली समझ नहीं · जीवत्-शरीरे तथा एव मा अस्तु · जीते शरीर में भी वैसे ही न हो।

अर्थ: अपनी छाया में, आईने के प्रतिबिंब में, सपने के शरीर में, या कल्पना में गढ़े शरीर में, जैसे आपकी “यह मैं हूँ” वाली समझ नहीं होती, वैसे ही इस जीते-जागते शरीर में भी न हो।

भावार्थ: यह एक बेहद चतुर श्लोक है। गुरु चार “शरीर” गिनाते हैं जिन्हें आप कभी “मैं” नहीं मानते, आपकी छाया, आईने में आपका प्रतिबिंब, सपने में आपका शरीर, और कल्पना में गढ़ी कोई आकृति।

ये चारों आपके जैसे दिखते हैं, पर आप इनसे ज़रा भी नहीं जुड़ते, कोई आपकी छाया पर पैर रख दे तो आपको चोट नहीं लगती। आप जानते हैं वे “आप नहीं” हैं। और गुरु बस इतना कहते हैं, यही साफ़ नज़र इस जीते-जागते शरीर पर भी डाल दो। एकमात्र फ़र्क यह है कि यह शरीर ज़्यादा “ठोस” लगता है। पर गुरु का इशारा है, वह ठोसपन भी एक डिग्री भर का फ़र्क है, जात का नहीं। यह शरीर भी, आख़िर में, एक “दिखने वाली” आकृति है, जिससे आप जुड़े नहीं।

164 · देह-आत्म-बुद्धि, दुख का बीज

देहात्मधीरेव नृणामसद्धियां जन्मादिदुःखप्रभवस्य बीजम् ।
यतस्ततस्त्वं जहि तां प्रयत्नात् त्यक्ते तु चित्ते न पुनर्भवाशा ॥ 164 ॥

dehātma-dhīr eva nṛṇām asad-dhiyāṁ janmādi-duḥkha-prabhavasya bījam · yatas tatas tvaṁ jahi tāṁ prayatnāt tyakte tu citte na punar-bhavāśā

शब्दार्थ: देह-आत्म-धीः एव · “शरीर ही आत्मा” वाली समझ ही · नृणाम् असद्-धियां · ग़लत समझ वाले लोगों की · जन्म-आदि-दुःख-प्रभवस्य बीजम् · जन्म आदि दुख के पैदा होने का बीज · जहि तां प्रयत्नात् · उसे प्रयत्न से नष्ट कर · त्यक्ते चित्ते · मन के छूट जाने पर · न पुनर्भव-आशा · फिर जन्म की आशंका नहीं।

अर्थ: “शरीर ही आत्मा है”, यह समझ ही, ग़लत बुद्धि वाले लोगों के जन्म आदि सारे दुख के पैदा होने का बीज है। इसलिए आप प्रयत्न से इसे नष्ट कर, मन के छूट जाने पर फिर जन्म की आशंका नहीं रहती।

भावार्थ: गुरु अन्नमय कोश वाले हिस्से को बंद करते हैं, और एक शब्द पर पूरा ज़ोर डालते हैं, “बीज।”

एक बीज छोटा होता है, पर उसमें पूरा पेड़ छिपा होता है। गुरु कहते हैं, “मैं शरीर हूँ” यह छोटी सी समझ ही वह बीज है जिससे जन्म-मृत्यु-दुख का पूरा पेड़ उगता है (श्लोक 145 की याद)। और इसमें एक उम्मीद छिपी है: अगर पूरी समस्या एक ही बीज से उगी है, तो उस एक बीज को निकाल देने भर से पूरा पेड़ सूख जाएगा। समस्या जब इतनी एक-जगह हो, तो हल भी एक-जगह हो जाता है। पहली परत यहाँ छिल गई, अन्नमय कोश पीछे छूटा।

165 · प्राणमय कोश, ऊर्जा की परत

कर्मेन्द्रियैः पञ्चभिरञ्चितोऽयं प्राणो भवेत्प्राणमायास्तु कोशः ।
येनात्मवानन्नमयोऽनुपूर्णः प्रवर्ततेऽसौ सकलक्रियासु ॥ 165 ॥

karmendriyaiḥ pañcabhir añcito’yaṁ prāṇo bhavet prāṇa-mayāstu kośaḥ · yenātmavān anna-mayo’nupūrṇaḥ pravartate’sau sakala-kriyāsu

शब्दार्थ: कर्म-इन्द्रियैः पञ्चभिः अञ्चितः · पाँच कर्म-इन्द्रियों से जुड़ा · अयं प्राणः प्राणमयः कोशः · यह प्राण, प्राणमय कोश · येन अन्नमयः अनुपूर्णः · जिससे अन्नमय कोश भर कर · प्रवर्तते सकल-क्रियासु · सब कामों में लग जाता है।

अर्थ: पाँच कर्म-इन्द्रियों से जुड़ा यह प्राण, प्राणमय कोश है। इसी से भर कर अन्नमय कोश सब कामों में लगने योग्य हो जाता है।

भावार्थ: दूसरी परत, प्राणमय कोश, यानी जीवन-ऊर्जा की परत। और गुरु इसका काम साफ़ बता देते हैं, यह वह ऊर्जा है जो शरीर को “जीवित” बनाती है।

एक तस्वीर: एक कठपुतली बेजान पड़ी है। डोरियाँ खिंचती हैं, और वह “जीवंत” हो उठती है, चलती, हिलती, काम करती। प्राण शरीर के लिए वही डोरी-शक्ति है। अन्नमय कोश (शरीर) अकेला तो बस मांस-हड्डी का ढेर है; प्राण उसमें भर कर उसे काम-काज के लायक़ बनाता है। यह पहली परत से सूक्ष्म है, पर गुरु अगले श्लोक में दिखाएँगे कि यह भी “आप” नहीं।

166 · प्राण भी आत्मा नहीं

नैवात्मापि प्राणमयो वायुविकारो गन्तागन्ता वायुवदन्तर्बहिरेषः ।
यस्मात्किंचित्क्वापि न वेत्तीष्टमनिष्टं स्वं वान्यं वा किंचन नित्यं परतन्त्रः ॥ 166 ॥

naivātmāpi prāṇa-mayo vāyu-vikāro gantāgantā vāyuvad antar-bahir eṣaḥ · yasmāt kiṁcit kvāpi na vettīṣṭam aniṣṭaṁ svaṁ vānyaṁ vā kiṁcana nityaṁ para-tantraḥ

शब्दार्थ: न एव आत्मा प्राणमयः · प्राणमय आत्मा नहीं · वायु-विकारः · हवा का एक रूप · गन्ता-आगन्ता वायु-वत् · हवा की तरह आता-जाता · अन्तर्-बहिः · भीतर-बाहर · न वेत्ति इष्टम् अनिष्टं · अच्छा-बुरा नहीं जानता · नित्यं परतन्त्रः · हमेशा दूसरे के अधीन।

अर्थ: प्राणमय कोश भी आत्मा नहीं। यह तो हवा का एक रूप है, जो हवा की तरह भीतर-बाहर आता-जाता रहता है। क्योंकि यह न कभी, न कहीं अच्छा-बुरा जानता है, न अपने को, न दूसरे को, और हमेशा दूसरे के अधीन रहता है।

भावार्थ: गुरु प्राण को एक सीधे तर्क से “अनात्मा” साबित करते हैं, प्राण “जानता” नहीं।

प्राण एक ऊर्जा है, बस। वह साँस की तरह भीतर-बाहर बहती रहती है, पर उसमें कोई जागरूकता नहीं। वह यह नहीं जानती कि क्या अच्छा, क्या बुरा; वह ख़ुद को भी नहीं जानती। पर “आप” तो जानते हैं। आप जागरूक हैं। और गुरु एक और बात जोड़ते हैं, प्राण “परतन्त्र” है, दूसरे के अधीन। साँस अपने आप चलती है, किसी और व्यवस्था के तहत। जो ख़ुद किसी और के बस में है, वह आपका वह स्वरूप नहीं हैं सकता जो स्वतंत्र है। दूसरी परत छिल गई।

167 · मनोमय कोश, मन की परत

ज्ञानेन्द्रियाणि च मनश्च मनोमायाः स्यात् कोशो ममाहमिति वस्तुविकल्पहेतुः ।
संज्ञादिभेदकलनाकलितो बलीयांस् तत्पूर्वकोशमभिपूर्य विजृम्भते यः ॥ 167 ॥

jñānendriyāṇi ca manaś ca mano-mayāḥ syāt kośo mamāham iti vastu-vikalpa-hetuḥ · saṁjñādi-bheda-kalanā-kalito balīyāṁs tat-pūrva-kośam abhipūrya vijṛmbhate yaḥ

शब्दार्थ: ज्ञान-इन्द्रियाणि च मनः · ज्ञान-इन्द्रियाँ और मन · मनोमयः कोशः · मनोमय कोश · मम-अहम् इति वस्तु-विकल्प-हेतुः · “मेरा-मैं” और चीज़ों के भेद का कारण · संज्ञा-आदि-भेद-कलना · नाम आदि के भेद बनाने वाला · बलीयान् · ज़्यादा बलवान · तत्-पूर्व-कोशम् अभिपूर्य विजृम्भते · पिछले कोश को भर कर फैल जाता है।

अर्थ: ज्ञान-इन्द्रियाँ और मन मिल कर मनोमय कोश है, “मेरा, मैं” और चीज़ों के भेद का कारण, नाम आदि के भेद बनाने वाला, ज़्यादा बलवान, जो पिछले कोश को भर कर फैल जाता है।

भावार्थ: तीसरी परत, मनोमय कोश, यानी मन। और यहाँ से सबसे लंबा झुंड शुरू होता है, क्योंकि गुरु जानते हैं, मन ही असली खिलाड़ी है।

एक शब्द ख़ास है, “बलीयान्”, ज़्यादा बलवान। शरीर और प्राण से यह परत कहीं ज़्यादा ताक़तवर है। और इसका असली काम? “मम-अहम्”, “मेरा, मैं।” मन ही वह कारख़ाना है जहाँ हर पल “मैं” और “मेरा” गढ़ा जाता है, जहाँ दुनिया अलग-अलग नामों और भेदों में बँटती है। पिछली दो परतें छीलना आसान था; यह तीसरी असली चुनौती है।

168 · मन, एक यज्ञ-अग्नि

पञ्चेन्द्रियैः पञ्चभिरेव होतृभिः प्रचीयमानो विषयाज्यधारया ।
जाज्वल्यमानो बहुवासनेन्धनैः मनोमयाग्निर्दहति प्रपञ्चम् ॥ 168 ॥

pañcendriyaiḥ pañcabhir eva hotṛbhiḥ pracīyamāno viṣayājya-dhārayā · jājvalyamāno bahu-vāsanendhanaiḥ mano-mayāgnir dahati prapañcam

शब्दार्थ: पञ्च-इन्द्रियैः होतृभिः · पाँच इन्द्रियों रूपी होता (यज्ञ करने वालों) से · प्रचीयमानः विषय-आज्य-धारया · विषय रूपी घी की धारा से बढ़ता हुआ · बहु-वासना-इन्धनैः जाज्वल्यमानः · बहुत सी वासनाओं रूपी ईंधन से धधकता · मनोमय-अग्निः दहति प्रपञ्चम् · मनोमय-अग्नि संसार को जलाती है।

अर्थ: पाँच इन्द्रियों रूपी होताओं से बढ़ती, विषय रूपी घी की धारा से बढ़ती, और बहुत सी वासनाओं रूपी ईंधन से धधकती, यह मनोमय-अग्नि संसार को जलाती रहती है।

भावार्थ: गुरु मन को एक यज्ञ-अग्नि की तरह दिखाते हैं, और हर हिस्सा एक भीतरी चीज़ है, एक सुंदर, और थोड़ी डराने वाली तस्वीर।

पाँच इन्द्रियाँ वे पुजारी हैं जो आग में आहुति डालते रहते हैं। आहुति क्या? “विषय रूपी घी”, हर देखी, सुनी, चखी चीज़ आग में घी की तरह पड़ती है। और ईंधन? “वासनाएँ”, हमारी जमा इच्छाएँ, आदतें। ज़रा सोचिए, एक आग जिसमें इन्द्रियाँ लगातार घी डाल रही हैं, और वासनाओं की लकड़ियाँ नीचे जल रही हैं। ऐसी आग कभी बुझती नहीं। बस बढ़ती जाती है। यही बेचैन मन है, एक ऐसी आग जो ख़ुद को लगातार जलाए रखती है।

169 · मन ही अविद्या है

न ह्यस्त्यविद्या मनसोऽतिरिक्ता मनो ह्यविद्या भवबन्धहेतुः ।
तस्मिन्विनष्टे सकलं विनष्टं विजृम्भितेऽस्मिन्सकलं विजृम्भते ॥ 169 ॥

na hy asty avidyā manaso’tiriktā mano hy avidyā bhava-bandha-hetuḥ · tasmin vinaṣṭe sakalaṁ vinaṣṭaṁ vijṛmbhite’smin sakalaṁ vijṛmbhate

शब्दार्थ: न अस्ति अविद्या मनसः अतिरिक्ता · मन से अलग कोई अविद्या नहीं · मनः हि अविद्या · मन ही अविद्या है · भव-बन्ध-हेतुः · संसार-बंधन का कारण · तस्मिन् विनष्टे सकलं विनष्टं · वह नष्ट होने पर सब नष्ट · विजृम्भिते सकलं विजृम्भते · वह फैलने पर सब फैलता है।

अर्थ:मन ही अविद्या है, संसार-बंधन का कारण। वह नष्ट होने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है; वह फैलने पर सब कुछ फैल जाता है।

भावार्थ: यह मनोमय कोश वाले हिस्से का सबसे ज़ोरदार श्लोक है। अब तक “अविद्या”, “माया”, ये कुछ रहस्यमयी, बाहरी शक्तियाँ लग सकती थीं। गुरु यहाँ उनका मुखौटा उतार देते हैं: अविद्या कोई दूर की चीज़ नहीं। “मन ही अविद्या है।”

यह एक तरफ़ डराने वाली बात है, दूसरी तरफ़ बेहद मुक्त करने वाली। डराने वाली, क्योंकि समस्या इतनी पास है, हमारे अपने मन में। मुक्त करने वाली, क्योंकि इसका मतलब है कि लड़ाई किसी अनजान, बाहरी राक्षस से नहीं; वह यहीं, हाथ की पहुँच में है। और गुरु एक चाबी दे देते हैं, मन नष्ट हो (यानी शांत, थमा हुआ हो), तो पूरा संसारी फैलाव सिमट जाता है; मन फैले, तो पूरा संसार फैल जाता है। काम की जगह एक ही है, मन।

170 · सपने की तरह, जागते में भी

स्वप्नेऽर्थशून्ये सृजति स्वशक्त्या भोक्त्रादिविश्वं मन एव सर्वम् ।
तथैव जाग्रत्यपि नो विशेषः तत्सर्वमेतन्मनसो विजृम्भणम् ॥ 170 ॥

svapne’rtha-śūnye sṛjati sva-śaktyā bhoktrādi-viśvaṁ mana eva sarvam · tathaiva jāgraty api no viśeṣaḥ tat sarvam etan manaso vijṛmbhaṇam

शब्दार्थ: स्वप्ने अर्थ-शून्ये · सपने में, जहाँ बाहर कुछ नहीं · सृजति स्व-शक्त्या · अपनी शक्ति से रच लेता है · भोक्तृ-आदि-विश्वं मनः एव · भोक्ता आदि पूरा संसार, मन ही · तथा एव जाग्रति अपि नो विशेषः · वैसे ही जागते में भी, कोई फ़र्क नहीं · मनसः विजृम्भणम् · मन का फैलाव।

अर्थ: सपने में, जहाँ बाहर कुछ नहीं होता, मन ही अपनी शक्ति से भोक्ता आदि पूरा संसार रच लेता है। और जागते में भी ठीक वैसे ही, कोई फ़र्क नहीं। यह सब मन का ही फैलाव है।

भावार्थ: गुरु एक हिम्मत वाली बात कहते हैं, और सपने को सबूत बना कर। सपने के बारे में सोचिए, वहाँ एक पूरी दुनिया होती है, लोग, जगहें, घटनाएँ, डर, ख़ुशी। और बाहर? कुछ भी नहीं। मन ने अकेले, अपनी शक्ति से, वह पूरी दुनिया खड़ी की।

अब गुरु एक चौंकाने वाला कदम उठाते हैं, “जागते में भी, कोई फ़र्क नहीं।” यानी जिस तरह सपने की दुनिया मन का फैलाव थी, उसी तरह यह जागती दुनिया का अनुभव भी, बहुत हद तक, मन का ही फैलाव है। यह कह कर गुरु यह नहीं कह रहे कि बाहर कुछ है ही नहीं। वे कह रहे हैं कि जो ठोस, अंतिम “संसार” आपको दिखता है, उसका इतना बड़ा हिस्सा मन की रचना है, कि उसे वैसा ही अंतिम सच मान बैठना एक भूल है। यह बेचैन कर सकता है, और वही इसका मक़सद है।

171 · गहरी नींद का सबूत

सुषुप्तिकाले मनसि प्रलीने नैवास्ति किंचित्सकलप्रसिद्धेः ।
अतो मनःकल्पितेव पुंसः संसार एतस्य न वस्तुतोऽस्ति ॥ 171 ॥

suṣupti-kāle manasi pralīne naivāsti kiṁcit sakala-prasiddheḥ · ato manaḥ-kalpiteva puṁsaḥ saṁsāra etasya na vastuto’sti

शब्दार्थ: सुषुप्ति-काले मनसि प्रलीने · गहरी नींद में, मन के लीन हो जाने पर · न एव अस्ति किंचित् · कुछ नहीं रहता · सकल-प्रसिद्धेः · सबके अनुभव से · मनः-कल्पिता एव · मन की गढ़ी हुई ही · संसारः न वस्तुतः अस्ति · संसार सच में नहीं।

अर्थ: गहरी नींद में, जब मन लीन हो जाता है, तब कुछ नहीं रहता, यह सबका जाना हुआ अनुभव है। इससे साफ़ है, मनुष्य का संसार मन का ही गढ़ा हुआ है, वह सच में (अपने आप) नहीं।

भावार्थ: गुरु श्लोक 170 की बात को एक रोज़ के, अचूक सबूत से पक्का करते हैं, गहरी नींद।

तर्क सीधा है: जागते में, मन सक्रिय है, और पूरा संसार है। सपने में, मन सक्रिय है, और एक संसार है। पर गहरी नींद में, मन लीन हो जाता है, और संसार? बिल्कुल नहीं। आपकी नौकरी, आपकी समस्याएँ, आपका पूरा संसार, गहरी नींद में रत्ती भर मौजूद नहीं था। अब सोचिए, अगर संसार सच में, अपने बल पर, “वहाँ” होता, तो आपके सोने भर से वह ग़ायब क्यों हैं जाता? वह ग़ायब होता है क्योंकि वह मन के साथ बँधा है। मन गया, संसार गया। यह बंधन की पूरी समस्या को मन तक समेट देता है, और यही राहत है।

172 · बंधन भी मन, मोक्ष भी मन

वायुनानीयते मेधः पुनस्तेनैव नीयते ।
मनसा कल्प्यते बन्धो मोक्षस्तेनैव कल्प्यते ॥ 172 ॥

vāyunānīyate medhaḥ punas tenaiva nīyate · manasā kalpyate bandho mokṣas tenaiva kalpyate

शब्दार्थ: वायुना आनीयते मेघः · हवा से बादल लाया जाता है · पुनः तेन एव नीयते · फिर उसी से हटाया जाता है · मनसा कल्प्यते बन्धः · मन से बंधन गढ़ा जाता है · मोक्षः तेन एव कल्प्यते · मोक्ष भी उसी से।

अर्थ: हवा ही बादल लाती है, और फिर वही हवा उसे हटा देती है। वैसे ही, मन ही बंधन गढ़ता है, और मोक्ष भी उसी मन से गढ़ा जाता है।

भावार्थ: एक बेहद संतुलित, और राहत भरा श्लोक। श्लोक 169 ने कहा था “मन ही अविद्या है”, सुन कर लग सकता है कि मन एक दुश्मन है, जिसे मिटाना है।

यह श्लोक उस तस्वीर को ठीक कर देता है, हवा और बादल वाली उपमा से। वही हवा बादल लाती है (आसमान ढक देती है), और वही हवा बादल को उड़ा भी देती है (आसमान खोल देती है)। हवा बुरी नहीं। सब इस पर निर्भर कि वह किस दिशा बहे। मन भी ऐसा ही है। बाहर की ओर बहता मन बंधन बुनता है; भीतर की ओर मुड़ा वही मन मुक्ति की ओर ले जाता है। तो काम मन को मारना नहीं। उसका रुख़ मोड़ना है। और यह कर पाना अपने ही हाथ में है।

173 · वही मन बाँधता है, वही छुड़ाता है

देहादिसर्वविषये परिकल्प्य रागं बध्नाति तेन पुरुषं पशुवद्गुणेन ।
वैरस्यमत्र विषवत्सुवुधाय पश्चाद् एनं विमोचयति तन्मन एव बन्धात् ॥ 173 ॥

dehādi-sarva-viṣaye parikalpya rāgaṁ badhnāti tena puruṣaṁ paśuvad guṇena · vairasyam atra viṣavat su-vudhāya paścād enaṁ vimocayati tan-mana eva bandhāt

शब्दार्थ: देह-आदि-सर्व-विषये रागं परिकल्प्य · शरीर आदि सब विषयों में राग गढ़ कर · बध्नाति पुरुषं पशु-वत् गुणेन · पुरुष को जानवर की तरह रस्सी से बाँधता है · वैरस्यम् विष-वत् · विरक्ति, ज़हर जैसी · सु-वुधाय · समझदार के लिए · पश्चात् विमोचयति बन्धात् · बाद में बंधन से छुड़ा देता है।

अर्थ: शरीर आदि सब विषयों में राग गढ़ कर, मन उसी राग रूपी रस्सी से पुरुष को जानवर की तरह बाँध देता है। और बाद में, समझदार के लिए, उन्हीं विषयों में ज़हर जैसी विरक्ति गढ़ कर, वही मन उसे बंधन से छुड़ा भी देता है।

भावार्थ: गुरु श्लोक 172 की बात को एक ठोस तस्वीर में रखते हैं। मन एक रस्सी बनाता है, “राग”, लगाव। और उस रस्सी से वह इंसान को बाँध देता है, “पशु-वत्”, जैसे एक जानवर खूँटे से बँधा होता है।

पर वही मन, समझदार इंसान में, उल्टा भी कर सकता है। वह उन्हीं विषयों में एक विरक्ति, एक “यह ठीक नहीं” वाला भाव गढ़ देता है, और रस्सी अपने आप ढीली पड़ने लगती है। ध्यान दीजिए, दोनों काम वही एक मन करता है। बँधना और छूटना, दोनों एक ही जगह तय होते हैं। तो अगर आप बँधे महसूस करते हैं, तो वह जगह जहाँ काम करना है, साफ़ है, और वह आपसे दूर नहीं। आपका अपना मन है।

174 · मलिन मन बाँधता, शुद्ध मन छुड़ाता

तस्मान्मनः कारणमस्य जन्तोः बन्धस्य मोक्षस्य च वा विधाने ।
बन्धस्य हेतुर्मलिनं रजोगुणैः मोक्षस्य शुद्धं विरजस्तमस्कम् ॥ 174 ॥

tasmān manaḥ kāraṇam asya jantoḥ bandhasya mokṣasya ca vā vidhāne · bandhasya hetur malinaṁ rajo-guṇaiḥ mokṣasya śuddhaṁ virajas-tamaskam

शब्दार्थ: मनः कारणम् · मन ही कारण · बन्धस्य मोक्षस्य च · बंधन और मोक्ष, दोनों का · बन्धस्य हेतुः मलिनं रजो-गुणैः · रजोगुण से मलिन मन, बंधन का कारण · मोक्षस्य शुद्धं विरजः-तमस्कम् · रजस-तमस से रहित शुद्ध मन, मोक्ष का।

अर्थ: इसलिए, इस जीव के बंधन और मोक्ष, दोनों के विधान में मन ही कारण है। रजोगुण से मलिन मन बंधन का कारण है; और रजस-तमस से रहित शुद्ध मन मोक्ष का।

भावार्थ: गुरु बात को एक साफ़ निष्कर्ष पर ले आते हैं, और एक व्यावहारिक कुंजी देते हैं। मन दो तरह का होता है: मलिन और शुद्ध।

मलिन मन, रजोगुण से भरा, यानी बेचैन, दौड़ता, राग-द्वेष से रँगा। यह बाँधता है। शुद्ध मन, रजस और तमस से धुला हुआ, यानी थमा हुआ, साफ़, शांत। यह छुड़ाता है। यह एक राहत भरी बात है: मन को मारना नहीं है (वह हो भी नहीं सकता), उसे साफ़ करना है। एक गंदे शीशे और साफ़ शीशे का फ़र्क। शीशा वही रहता है; बस मैल हटता है। और साफ़ शीशे में ही आत्मा का प्रतिबिंब दिखता है (भाग 4, श्लोक 117)।

175 · विवेक और वैराग्य, पहले इन्हें पक्का करो

विवेकवैराग्यगुणातिरेकाच् छुद्धत्वमासाद्य मनो विमुक्त्यै ।
भवत्यतो बुद्धिमतो मुमुक्षोस् ताभ्यां दृढाभ्यां भवितव्यमग्रे ॥ 175 ॥

viveka-vairāgya-guṇātirekāc chuddhatvam āsādya mano vimuktyai · bhavaty ato buddhimato mumukṣos tābhyāṁ dṛḍhābhyāṁ bhavitavyam agre

शब्दार्थ: विवेक-वैराग्य-गुण-अतिरेकात् · विवेक और वैराग्य की प्रचुरता से · शुद्धत्वम् आसाद्य मनः · मन शुद्धता पा कर · विमुक्त्यै भवति · मुक्ति का साधन बन जाता है · बुद्धिमतः मुमुक्षोः · बुद्धिमान मुमुक्षु को · ताभ्यां दृढाभ्यां भवितव्यम् अग्रे · उन दोनों को पहले पक्का करना चाहिए।

अर्थ: विवेक और वैराग्य की प्रचुरता से मन शुद्धता पा कर मुक्ति का साधन बन जाता है। इसलिए, बुद्धिमान मुमुक्षु को सबसे पहले इन दोनों को पक्का करना चाहिए।

भावार्थ: गुरु एक व्यावहारिक सलाह देते हैं, और भाग 2 की याद दिलाते हैं। मन कैसे शुद्ध होंगे? दो चीज़ों से, विवेक (असली-नक़ली का फ़र्क) और वैराग्य (नक़ली से पकड़ ढीली होना)।

और एक शब्द ज़रूरी है, “अग्रे”, सबसे पहले। यह क्रम मायने रखता है। बहुत लोग सीधे ध्यान, समाधि, ऊँची साधनाओं में कूदना चाहते हैं, पर अगर मन अभी मलिन है, रजस से भरा, तो वे साधनाएँ टिकेंगी नहीं। पहले विवेक और वैराग्य से मन को साफ़ करो; फिर बाक़ी सब अपने आप सधने लगता है। नींव पहले, इमारत बाद में।

176 · मन, एक बड़ा बाघ

मनो नाम महाव्याघ्रो विषयारण्यभूमिषु ।
चरत्यत्र न गच्छन्तु साधवो ये मुमुक्षवः ॥ 176 ॥

mano nāma mahā-vyāghro viṣayāraṇya-bhūmiṣu · caraty atra na gacchantu sādhavo ye mumukṣavaḥ

शब्दार्थ: मनः नाम महा-व्याघ्रः · मन नाम का एक बड़ा बाघ · विषय-अरण्य-भूमिषु चरति · विषयों के जंगल में घूमता है · अत्र न गच्छन्तु · वहाँ न जाएँ · साधवः ये मुमुक्षवः · वे साधक जो मुमुक्षु हैं।

अर्थ: मन नाम का एक बड़ा बाघ विषयों के जंगल में घूमता रहता है। जो साधक मुमुक्षु हैं, वे वहाँ न जाएँ।

भावार्थ: एक छोटा, तेज़, यादगार श्लोक, और एक चेतावनी। गुरु एक तस्वीर देते हैं: विषयों का एक जंगल है, और उसमें एक बाघ घूम रहा है, और वह बाघ “मन” है।

यह उपमा एक बहुत व्यावहारिक बात कहती है। एक बाघ खुले मैदान में उतना ख़तरनाक नहीं; पर अपने जंगल में, अपनी ज़मीन पर, वह सबसे ताक़तवर होता है। मन भी ऐसा ही है, विषयों के बीच, इन्द्रिय-सुखों के माहौल में, वह सबसे बेक़ाबू होता है। तो गुरु एक सीधी सलाह देते हैं, मुमुक्षु ऐसे माहौल में जान-बूझ कर मत जाएँ। यह कमज़ोरी मानना नहीं है; यह समझदारी है। अभी जब मन सध रहा है, उसे उसकी सबसे ताक़तवर ज़मीन पर मत ले जाएँ।

177 · मन ही सब भेद रचता है

मनः प्रसूते विषयानशेषान् स्थूलात्मना सूक्ष्मतया च भोक्तुः ।
शरीरवर्णाश्रमजातिभेदान् गुणक्रियाहेतुफलानि नित्यम् ॥ 177 ॥

manaḥ prasūte viṣayān aśeṣān sthūlātmanā sūkṣmatayā ca bhoktuḥ · śarīra-varṇāśrama-jāti-bhedān guṇa-kriyā-hetu-phalāni nityam

शब्दार्थ: मनः प्रसूते विषयान् अशेषान् · मन सारे विषय जन्म देता है · स्थूल-आत्मना सूक्ष्मतया · स्थूल रूप में और सूक्ष्म रूप में · शरीर-वर्ण-आश्रम-जाति-भेदान् · शरीर, वर्ण, आश्रम, जाति के भेद · गुण-क्रिया-हेतु-फलानि · गुण, क्रिया, कारण, फल।

अर्थ: मन ही भोक्ता के लिए सारे विषयों को जन्म देता है, स्थूल रूप में और सूक्ष्म रूप में। शरीर, वर्ण, आश्रम, जाति के सारे भेद, और गुण, क्रिया, कारण, फल, सब हमेशा मन ही रचता है।

भावार्थ: गुरु एक बेहद गहरी बात कहते हैं, हमारी ज़्यादातर दुनिया “भेदों” की दुनिया है, और वे सारे भेद मन की रचना हैं।

देखिए सूची में क्या है, शरीर, वर्ण, आश्रम, जाति। ये सब “अलग-अलग खाने” हैं जिनमें हम दुनिया को, और ख़ुद को, बाँट कर रखते हैं। गुरु कहते हैं, ये बँटवारे किसी अंतिम सच का हिस्सा नहीं; ये मन के बनाए हुए हैं। यह एक मुक्त कर देने वाली बात है। जिस “पहचान” के बोझ से हम दबे रहते हैं, मैं यह जाति, यह दर्जा, यह श्रेणी, उसका इतना बड़ा हिस्सा मन की एक बना-बनाई व्यवस्था है, न कि वह जो आप सच में हैं। असली “आप” इन सब खानों से परे हो।

178 · मन असंग चेतना को भरमा देता है

असङ्गचिद्रूपममुं विमोह्य देहेन्द्रियप्राणगुणैर्निबद्ध्य ।
अहंममेति भ्रमायात्यजस्रं मनः स्वकृत्येषु फलोपभुक्तिषु ॥ 178 ॥

asaṅga-cid-rūpam amuṁ vimohya dehendriya-prāṇa-guṇair nibaddhya · aham-mameti bhramāyāty ajasraṁ manaḥ sva-kṛtyeṣu phalopabhuktiṣu

शब्दार्थ: असङ्ग-चित्-रूपम् अमुं विमोह्य · इस असंग चेतना-स्वरूप को भरमा कर · देह-इन्द्रिय-प्राण-गुणैः निबद्ध्य · शरीर-इन्द्रिय-प्राण के गुणों से बाँध कर · अहम्-मम इति भ्रमायाति · “मैं-मेरा” के भ्रम में डाल देता है · अजस्रं · लगातार · स्व-कृत्येषु फल-उपभुक्तिषु · अपने कामों और उनके फलों के भोग में।

अर्थ: इस असंग चेतना-स्वरूप (आत्मा) को भरमा कर, शरीर-इन्द्रिय-प्राण के गुणों से बाँध कर, मन इसे “मैं-मेरा” के भ्रम में डाल देता है, लगातार, अपने कामों और उनके फलों के भोग में।

भावार्थ: गुरु पूरी समस्या को एक वाक्य में रख देते हैं, और बारीकी देखिए। आत्मा “असंग” है, अछूती, बँधी हुई नहीं। तो वह बँधी कैसी दिखती है?

मन उसे “भरमा” देता है। यह कोई असली ज़ंजीर नहीं डालता, असली चेतना को बाँधा ही नहीं जा सकता। यह बस एक भ्रम पैदा करता है, “मैं यह शरीर हूँ, ये मेरे काम हैं, यह मेरा फल है।” और बस इस भ्रम-भर से, असीम आत्मा अपने आप को एक छोटे, बँधे, काम करते-फल भोगते जीव की तरह अनुभव करने लगती है। असली ज़ंजीर नहीं। एक उधार की कहानी। और कहानी जिस पल झूठी पहचानी गई, उसी पल टूट जाती है।

179 · अध्यास, एक थोपी हुई पहचान

अध्यासदोषात्पुरुषस्य संसृतिः अध्यासबन्धस्त्वमुनैव कल्पितः ।
रजस्तमोदोषवतोऽविवेकिनो जन्मादिदुःखस्य निदानमेतत् ॥ 179 ॥

adhyāsa-doṣāt puruṣasya saṁsṛtiḥ adhyāsa-bandhas tv amunaiva kalpitaḥ · rajas-tamo-doṣavato’vivekino janmādi-duḥkhasya nidānam etat

शब्दार्थ: अध्यास-दोषात् · अध्यास (थोपने) के दोष से · पुरुषस्य संसृतिः · पुरुष का संसार-चक्र · अध्यास-बन्धः अमुना एव कल्पितः · अध्यास का बंधन इसी (मन) से गढ़ा गया · रजस्-तमस्-दोषवतः अविवेकिनः · रजस-तमस के दोष वाले, विवेकहीन का · जन्म-आदि-दुःखस्य निदानम् · जन्म आदि दुख का मूल कारण।

अर्थ: अध्यास के दोष से पुरुष का संसार-चक्र चलता है; अध्यास का यह बंधन इसी मन से गढ़ा गया है। रजस-तमस के दोष वाले विवेकहीन इंसान के जन्म आदि दुख का यही मूल कारण है।

भावार्थ: एक शब्द यहाँ चाबी है, और यह पूरे अद्वैत का केंद्रीय शब्द है, “अध्यास।” अध्यास का मतलब है, एक चीज़ को दूसरी पर “थोप देना”, ग़लती से एक को दूसरा समझ लेना।

फिर रस्सी-साँप। साँप रस्सी पर “थोपा” गया, अध्यास। सीप पर चाँदी की चमक “थोपी” गई, अध्यास। और हमारा सबसे बड़ा अध्यास? आत्मा पर शरीर-मन को थोप देना, असीम, मुक्त चेतना पर एक छोटे, बँधे “मैं” की कहानी थोप देना। और गुरु साफ़ कहते हैं, यह थोपना मन का काम है। तो बंधन कोई असली चीज़ नहीं; वह एक “थोपी हुई” पहचान है। और थोपी हुई चीज़ हटाई जा सकती है।

180 · मन ही अविद्या, हवा और बादल

अतः प्राहुर्मनोऽविद्यां पण्डितास्तत्त्वदर्शिनः ।
येनैव भ्राम्यते विश्वं वायुनेवाभ्रमण्डलम् ॥ 180 ॥

ataḥ prāhur mano’vidyāṁ paṇḍitās tattva-darśinaḥ · yenaiva bhrāmyate viśvaṁ vāyunevābhra-maṇḍalam

शब्दार्थ: अतः प्राहुः मनः अविद्यां · इसलिए मन को अविद्या कहते हैं · पण्डिताः तत्त्व-दर्शिनः · तत्व देखने वाले विद्वान · येन एव भ्राम्यते विश्वं · जिससे ही पूरा विश्व घुमाया जाता है · वायुना इव अभ्र-मण्डलम् · हवा से बादलों के समूह की तरह।

अर्थ: इसलिए तत्व देखने वाले विद्वान मन को ही अविद्या कहते हैं, जिससे पूरा विश्व घुमाया जाता है, ठीक जैसे हवा से बादलों का समूह।

भावार्थ: गुरु श्लोक 169 की बात, “मन ही अविद्या है”, फिर दोहराते हैं, और अब एक तस्वीर के साथ: हवा और बादल।

आसमान देखिए, बादल इधर-उधर तैरते, घूमते, बदलते रहते हैं। और यह सारा घुमाव-फिराव? हवा करती है। बादल अपने आप नहीं घूमते; हवा उन्हें चलाती है। गुरु कहते हैं, यह पूरा “विश्व”, यह सारा संसारी फैलाव-हलचल, मन की हवा से घूमता है। यह बार-बार दोहराना क्यों? क्योंकि यह एक आदत तोड़ता है। हम सोचते हैं समस्याएँ “बाहर” हैं, हालात, लोग, क़िस्मत। गुरु धीरे-धीरे, बार-बार, उँगली एक ही जगह घुमा देते हैं, मन। और यह निराशा की बात नहीं; यह राहत है, क्योंकि मन आपकी पहुँच में है।

181 · मन साफ़, तो मुक्ति हथेली में

तन्मनःशोधनं कार्यं प्रयत्नेन मुमुक्षुणा ।
विशुद्धे सति चैतस्मिन्मुक्तिः करफलायते ॥ 181 ॥

tan-manaḥ-śodhanaṁ kāryaṁ prayatnena mumukṣuṇā · viśuddhe sati caitasmin muktiḥ kara-phalāyate

शब्दार्थ: तत्-मनः-शोधनं कार्यं · उस मन की सफ़ाई करनी चाहिए · प्रयत्नेन मुमुक्षुणा · मुमुक्षु को प्रयत्न से · विशुद्धे सति एतस्मिन् · यह पूरी तरह शुद्ध हो जाने पर · मुक्तिः कर-फलायते · मुक्ति हथेली के फल जैसी हो जाती है।

अर्थ: इसलिए मुमुक्षु को प्रयत्न से उस मन की सफ़ाई करनी चाहिए। यह पूरी तरह शुद्ध हो जाने पर, मुक्ति हथेली पर रखे फल जैसी (सहज, साफ़ दिखती) हो जाती है।

भावार्थ: गुरु मनोमय कोश वाले हिस्से को एक उम्मीद भरी, साफ़ बात पर समेटते हैं, और एक प्यारी उपमा देते हैं: “कर-फल”, हथेली पर रखा फल।

हथेली पर रखा फल, उससे ज़्यादा साफ़, ज़्यादा क़रीब, ज़्यादा सीधा-सीधा हाथ में, क्या होंगे? कोई शक नहीं। कोई दूरी नहीं। कोई संदेह नहीं। गुरु कह रहे हैं, मुक्ति कोई दूर की, धुँधली, “शायद कभी” वाली चीज़ नहीं। मन एक बार सच में साफ़ हो जाए, तो मुक्ति उतनी ही साफ़, उतनी ही पास, उतनी ही निश्चित हो जाती है। सारा काम बस एक जगह है, मन की सफ़ाई। वह हो जाए, बाक़ी अपने आप।

182 · रजस को कैसे झाड़ें

मोक्षैकसक्त्या विषयेषु रागं निर्मूल्य संन्यस्य च सर्वकर्म ।
सच्छ्रद्धया यः श्रवणादिनिष्ठो रजःस्वभावं स धुनोति बुद्धेः ॥ 182 ॥

mokṣaika-saktyā viṣayeṣu rāgaṁ nirmūlya saṁnyasya ca sarva-karma · sac-chraddhayā yaḥ śravaṇādi-niṣṭho rajaḥ-svabhāvaṁ sa dhunoti buddheḥ

शब्दार्थ: मोक्ष-एक-सक्त्या · मोक्ष में अकेले लगाव से · विषयेषु रागं निर्मूल्य · विषयों में राग जड़ समेत उखाड़ कर · संन्यस्य च सर्व-कर्म · और सब कर्म छोड़ कर · सत्-श्रद्धया श्रवण-आदि-निष्ठः · सच्ची श्रद्धा से श्रवण आदि में लगा हुआ · रजः-स्वभावं स धुनोति बुद्धेः · बुद्धि के रजस-स्वभाव को झाड़ देता है।

अर्थ: मोक्ष में ही लगाव रख कर, विषयों का राग जड़ समेत उखाड़ कर, सब कर्म छोड़ कर, और सच्ची श्रद्धा से श्रवण आदि में लगा हुआ, जो ऐसा करता है, वह बुद्धि के रजस-स्वभाव को झाड़ देता है।

भावार्थ: गुरु एक व्यावहारिक नुस्ख़ा देते हैं, रजस (वह बेचैन, दौड़ता गुण) को कैसे झाड़ें।

“धुनोति” शब्द प्यारा है, झाड़ देना, जैसे कपड़े से धूल झाड़ते हैं। रजस कोई गहरी, स्थायी चीज़ नहीं। वह जमी हुई धूल है, और झाड़ी जा सकती है। और कैसे? एक तरफ़, विषयों का राग उखाड़ना। दूसरी तरफ़, श्रवण-मनन में लगना। यानी एक हाथ से पुरानी धूल हटाओ, दूसरे हाथ से नई, साफ़ दिशा दो। और सबसे ऊपर एक चीज़, “मोक्ष-एक-सक्ति”, सिर्फ़ एक चीज़ की चाह। जब मन की सारी बिखरी चाहें सिमट कर एक बन जाती हैं, तो रजस का बिखराव अपने आप थमने लगता है।

183 · मनोमय भी आत्मा नहीं

मनोमयो नापि भवेत्परात्मा ह्याद्यन्तवत्त्वात्परिणामिभावात् ।
दुःखात्मकत्वाद्विषयत्वहेतोः द्रष्टा हि दृश्यात्मतया न दृष्टः ॥ 183 ॥

mano-mayo nāpi bhavet parātmā hy ādy-antavattvāt pariṇāmi-bhāvāt · duḥkhātmakatvād viṣayatva-hetoḥ draṣṭā hi dṛśyātmatayā na dṛṣṭaḥ

शब्दार्थ: मनोमयः न अपि भवेत् परात्मा · मनोमय भी परम आत्मा नहीं · आदि-अन्तवत्त्वात् · आदि-अंत वाला होने से · परिणामि-भावात् · बदलते रहने से · दुःख-आत्मकत्वात् · दुख-स्वभाव होने से · विषयत्व-हेतोः · विषय (जानी जाने वाली चीज़) होने से · द्रष्टा दृश्य-आत्मतया न दृष्टः · देखने वाला, देखी जाने वाली चीज़ के रूप में नहीं देखा जाता।

अर्थ: मनोमय कोश भी परम आत्मा नहीं। क्योंकि इसका आदि-अंत है, यह बदलता रहता है, यह दुख-स्वभाव वाला है, और यह एक विषय (जानी जाने वाली चीज़) है। क्योंकि देखने वाला कभी देखी जाने वाली चीज़ के रूप में नहीं देखा जाता।

भावार्थ: तीसरी परत भी छिल जाती है। गुरु मन को “अनात्मा” साबित करने के लिए चार साफ़ कारण देते हैं, और चौथा सबसे गहरा है।

मन का आदि-अंत है (नींद में थम जाता है)। मन बदलता है (पल-पल नया भाव)। मन दुख-स्वभाव वाला है। और चौथा, “द्रष्टा दृश्य-आत्मतया न दृष्टः”, देखने वाला कभी देखी जाने वाली चीज़ नहीं हो सकता। और यहीं असली कुंजी है: आप अपने मन को “देख” सकते हैं। आप कह सकते हैं “मेरा मन आज बेचैन है”, “मेरा मन शांत है।” यह कह पाना ही साबित कर देता है कि मन एक “दृश्य” है, और आप उसके “द्रष्टा।” मन भी, आख़िर में, घड़े जैसा है, जाना जाता है। और जो जानता है, वह मन से परे है। अब आधा सफ़र हो चुका, तीन परतें पीछे। आगे दो और बाक़ी हैं: बुद्धि, और आनंद।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना: भाग 7 · पाँच कोश का दूसरा भाग, बुद्धि और आनंद की परतें। यहाँ शिष्य एक बहुत ज़रूरी सवाल भी उठाता है: अगर बंधन अनादि है, तो वह कभी ख़त्म कैसे होंगे? और गुरु उसका जवाब देते हैं।

और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 172 कहता है, बंधन भी मन गढ़ता है, मोक्ष भी मन। आज एक पल देखिए जहाँ आपका मन किसी चीज़ में “राग की रस्सी” बुन रहा था। बस उसे बुनते हुए देख लेना, वही, उल्टी दिशा में, पहली गाँठ खोलना है।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, verbatim।

स्थायी URL: /vivekachudamani/panch-kosha-1/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-22