विवेकचूडामणि
भाग 12 · समाधि, हृदय की गाँठ खुलती है · श्लोक 329-366
अहंकार और प्रमाद की चेतावनी के बाद अब वह विधि आती है जिससे साधना पूरी होती है, समाधि। मन की वह गहरी एकाग्रता जो धीरे-धीरे हृदय की अज्ञान-गाँठ खोल देती है, और जिसमें ब्रह्म-तत्त्व अपने-आप निर्मल झलकता है।
पहले एक बात
भाग 11 का स्वर चेतावनी का था, कि सीढ़ी पर रखी गेंद कभी भी लुढ़क सकती है। भाग 12 में गुरु एक सकारात्मक विधि सौंपते हैं, समाधि। यह मन की वह गहरी एकाग्रता है जिसमें देखने वाला और देखी जाने वाली वस्तु, दोनों एक हो रहते हैं।

यहीं वेदान्त की प्रसिद्ध तिकड़ी आती है, श्रवण, मनन और निदिध्यासन (श्लोक 364)। गुरु तौल भी बता देते हैं, श्रवण से सौ गुना श्रेष्ठ मनन, और मनन से लाख गुना श्रेष्ठ निदिध्यासन। हर पायदान पर गहराई बढ़ती जाती है।
और अंत में, श्लोक 353 पर, अज्ञान की हृदय-ग्रन्थि खुलती है। यह उपनिषदों की एक चिर-परिचित छवि है, हृदय में बँधी अज्ञान की एक गाँठ। निर्विकल्प समाधि वही धीमी, धैर्यवान उँगली है जो इसे खोल देती है, और जो साक्षात्कार होता है, वह अद्वैत का साक्षात्कार है।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। तीन हिस्से हैं, संकल्प का त्याग और बाह्य-निरोध (329-340), विवेक और समाधि की विधि (341-352), और निर्विकल्प समाधि (353-366)। मुख्य खंभे, 333 (आत्म-दृष्टि में स्थिति), 344 (दृग्-दृश्य का दूध-पानी जैसा विभाजन), 353 (हृदय-गाँठ का खुलना), 364 (श्रवण-मनन-निदिध्यासन)। हर क्लस्टर पर पहले बात, फिर मूल श्लोक।
गुरु एक सीधी आज्ञा से आरंभ करते हैं, संकल्प को छोड़ दो। संकल्प, अर्थात् मन की वह निरंतर बुनती हलचल, हमें यह चाहिए, ऐसा होना चाहिए, हम यह करेंगे। यही हर अनर्थ की जड़ है। और इसी के साथ एक गहरी बात जुड़ती है, जीवन्मुक्त और विदेह-मुक्त, दोनों एक ही केवल-स्थिति में हैं। मुक्ति देह छूटने की प्रतीक्षा नहीं करती, वह अभी इसी जीवन में संभव है। बृहदारण्यक की वह प्रसिद्ध वाणी यहीं गूँजती है, जहाँ रत्ती भर भी द्वैत भासे, वहीं भय जन्म ले लेता है। तभी गुरु एक तीखी सच्चाई जोड़ देते हैं, ज्ञानी होना भी कवच नहीं। एक क्षण का प्रमाद हो, और मन अनंत ब्रह्म में अणु भर भी भेद देख ले, तो भय वहीं उपस्थित। मुक्ति एक बार अर्जित कर के भुला देने वाली उपलब्धि नहीं, यह हर क्षण नवीन रहने वाली जीवित दृष्टि है।
329 · 330
संकल्पं वर्जयेत्तस्मात्सर्वानर्थस्य कारणम् ।
जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहे स च केवलः यत्किंचित्पश्यतो भेदं भयं ब्रूते यजुःश्रुतिः ॥ 329 ॥
यदा कदा वापि विपश्चिदेष ब्रह्मण्यनन्तेऽप्यणुमात्रभेदम् ।
पश्यत्यथामुष्य भयं तदैव यद्वीक्षितं भिन्नतया प्रमादात् ॥ 330 ॥
अब गुरु एक सटीक उपमा देते हैं, चोर की। चोर जानता है कि चोरी वर्जित है, हर ओर से उसे रोका गया है, फिर भी करता है, और उसका प्रतिफल निरंतर दुख रहता है, पकड़े जाने का भय, दंड। ठीक वैसे ही, श्रुति, स्मृति और सैकड़ों तर्कों से वर्जित इस दृश्य संसार में जो “यह मैं हूँ” वाली बुद्धि बना लेता है, वह दुख पर दुख पाता रहता है। यही उपमा अपने दूसरे पक्ष में भी आती है। ईमानदार निर्भय रहता है, सम्मानित; चोर सदा छिपा, सदा भयभीत, अंततः पकड़ा जाता है। अभिसंधान, अर्थात् जिस ओर मन को निरंतर जोड़ा जाए, सत्य की ओर जोड़ें तो अपनी असली महिमा प्रकट होती है, मिथ्या की ओर जोड़ें तो अंत में नष्ट होते हैं। यह कोई धार्मिक दंड नहीं, यह सहज नियम है, जिस ओर ध्यान, उसी ओर पहचान।
331 · 332
श्रुतिस्मृतिन्यायशतैर्निषिद्धे दृश्येऽत्र यः स्वात्ममतिं करोति ।
उपैति दुःखोपरि दुःखजातं निषिद्धकर्ता स मलिम्लुचो यथा ॥ 331 ॥
सत्याभिसंधानरतो विमुक्तो महत्त्वमात्मीयमुपैति नित्यम् ।
मिथ्याभिसन्धानरतस्तु नश्येद् दृष्टं तदेतद्यदचौरचौरयोः ॥ 332 ॥
अब गुरु एक स्पष्ट निर्देश देते हैं और साथ ही एक कोमल आश्वासन। यति असत् का अनुसंधान, जो बंधन का कारण है, छोड़ कर, “हम स्वयं ही वह हैं”, इस आत्म-दृष्टि में ही टिके। और यह कोई रूखा बलिदान नहीं, यह सुख देती है; अपने अनुभव से, अविद्या के कार्य रूप जो दुख प्रतीत होता है, उसे हर भी लेती है। फिर एक सीधा कारण-परिणाम, जिस ओर ध्यान, उसी ओर वासना। बाहर ध्यान दें, तो बाह्य वस्तुओं की और-और चाह; हर देखना एक नई वासना का बीज बो देता है। इसलिए विवेक से इसे जान कर, बाह्य को छोड़ कर, निरंतर स्व-आत्म-अनुसंधान करते रहें। और इसका फल एक चार-कड़ी वाली शृंखला में खुलता है, बाह्य रुका, मन प्रसन्न हुआ, परमात्मा दिखा, बंधन टूटा। जल थम जाए, तो चंद्रमा उसमें स्वयं स्पष्ट झलकने लगता है, यही मनः-प्रसाद है।
333 · 334 · 335
यतिरसदनुसन्धिं बन्धहेतुं विहाय स्वयमायामहमस्मीत्यात्मदृष्ट्यैव तिष्ठेत् ।
सुखयति ननु निष्ठा ब्रह्मणि स्वानुभूत्या हरति परमविद्याकार्यदुःखं प्रतीतम् ॥ 333 ॥
बाह्यानुसन्धिः परिवर्धयेत्फलं दुर्वासनामेव ततस्ततोऽधिकाम् ।
ज्ञात्वा विवेकैः परिहृत्य बाह्यं स्वात्मानुसन्धिं विदधीत नित्यम् ॥ 334 ॥
बाह्ये निरुद्धे मनसः प्रसन्नता मनःप्रसादे परमात्मदर्शनम् ।
तस्मिन्सुदृष्टे भवबन्धनाशो बहिर्निरोधः पदवी विमुक्तेः ॥ 335 ॥
अब गुरु एक चुभता प्रश्न पूछते हैं, जो असली समस्या दिखा देता है। कौन विवेकी, श्रुति को प्रमाण मानने वाला, परमार्थ को देखने वाला, जानते हुए भी असत् का सहारा लेगा, जो उसके अपने पतन का कारण है, बालक की तरह? बालक आग छूता है, जलता है, फिर भी अगली बार छू लेता है, क्योंकि उसकी समझ टिकती नहीं। मुमुक्षु को यह बालकपन छोड़ना है। साथ ही एक निश्चित तर्क आता है, देह-संसक्ति और मुक्ति, दोनों एक साथ नहीं रह सकतीं। सोता हुआ उसी क्षण जागा हुआ नहीं हो सकता, जागा हुआ सोता नहीं; दो भिन्न अवस्थाएँ, भिन्न गुणों पर टिकीं। तो “हम आधे मुक्त हैं, थोड़ी देह-पहचान शेष है”, ऐसा सोचना ही असंगत है। मुक्त वही है जो भीतर-बाहर, स्थिर-गतिमान, सबमें अपना आत्मा देखे और सबका आधार भी आत्मा देखे, सब उपाधियाँ छोड़ कर, अखंड-रूप में स्थित।
336 · 337 · 338
कः पण्डितः सन्सदसद्विवेकी श्रुतिप्रमाणः परमार्थदर्शी ।
जानन्हि कुर्यादसतोऽवलम्बं स्वपातहेतोः शिशुवन्मुमुक्षुः ॥ 336 ॥
देहादिसंसक्तिमतो न मुक्तिः मुक्तस्य देहाद्यभिमत्यभावः ।
सुप्तस्य नो जागरणं न जाग्रतः स्वप्नस्तयोर्भिन्नगुणाश्रयत्वात् ॥ 337 ॥
अन्तर्बहिः स्वं स्थिरजङ्गमेषु ज्ञात्वात्मनाधारतया विलोक्य ।
त्यक्ताखिलोपाधिरखण्डरूपः पूर्णात्मना यः स्थित एष मुक्तः ॥ 338 ॥
अब गुरु मुक्ति की कुंजी एक शब्द में दे देते हैं, सर्वात्म-भाव। सब में अपना आत्मा देखना, अपने आत्मा को सबका आत्मा देखना, इससे बढ़ कर बंधन-मुक्ति का कोई कारण नहीं। और यह आता कैसे है, दृश्य-अग्रह से, दिखती वस्तुओं को न पकड़ने से। यहाँ एक सूक्ष्म बात है, दृश्य का निषेध नहीं, बस उसे न पकड़ना; पकड़ ढीली हो, तो दीवारें घुलने लगती हैं। पर गुरु एक सच्चा प्रश्न भी उठाते हैं, यह अग्रहण उसके लिए कैसे संभव हो, जो “हम देह हैं” में टिका हो, बाह्य अनुभवों में डूबा हो, निरंतर कुछ-न-कुछ करता रहे? यह तो उन तत्त्व-ज्ञानियों के लिए है, जिन्होंने सब धर्म-कर्म-विषय त्याग दिए हों, जो नित्य आत्म-निष्ठा में हों, जो सदा-आनंद चाहते हों। और इसे यत्न से, आत्मा में ही करना है, अपने-आप नहीं होता।
339 · 340
सर्वात्मना बन्धविमुक्तिहेतुः सर्वात्मभावान्न परोऽस्ति कश्चित् ।
दृश्याग्रहे सत्युपपद्यतेऽसौ सर्वात्मभावोऽस्य सदात्मनिष्ठया ॥ 339 ॥
दृश्यस्याग्रहणं कथं नु घटते देहात्मना तिष्ठतो बाह्यार्थानुभवप्रसक्तमनसस्तत्तत्क्रियां कुर्वतः ।
संन्यस्ताखिलधर्मकर्मविषयैर्नित्यात्मनिष्ठापरैः तत्त्वज्ञैः करणीयमात्मनि सदानन्देच्छुभिर्यत्नतः ॥ 340 ॥
अब गुरु असली विधि देते हैं, समाधि। श्रवण और मनन बुद्धि को तैयार करते हैं, पर अंतिम साक्षात्कार के लिए मन की वह गहरी एकाग्रता चाहिए जिसमें “हम” और “वह” का भेद घुल जाए; बृहदारण्यक की “शान्तो दान्त” वाली वाणी इसी की साक्षी है। साथ ही एक सच्ची बात, अहंकार सहसा नहीं मरता, क्योंकि वासनाएँ अनगिनत जन्मों की हैं, जड़ें गहरी हैं; उपाय निर्विकल्प समाधि की वह अचल अवस्था है जो धीरे-धीरे अभ्यास से पकती है। और भीतर का चित्र भी गुरु खोल देते हैं, पहले आवरण-शक्ति आत्मा को ढक देती है, फिर “हम यह हैं” वाली अहं-बुद्धि उभरती है, और उसी से जुड़ कर विक्षेप-शक्ति राग, क्रोध, लोभ से पुरुष को इधर-उधर फेंकती है। दोनों मिल कर एक पूरा बंदीगृह रच देती हैं।
341 · 342 · 343
सर्वात्मसिद्धये भिक्षोः कृतश्रवणकर्मणः ।
समाधिं विदधात्येषा शान्तो दान्त इति श्रुतिः ॥ 341 ॥
आरूढशक्तेरहमो विनाशः कर्तुं न शक्य सहसापि पण्डितैः ।
ये निर्विकल्पाख्यसमाधिनिश्चलाः तानन्तरानन्तभवा हि वासनाः ॥ 342 ॥
अहंबुद्ध्यैव मोहिन्या योजयित्वावृतेर्बलात् ।
विक्षेपशक्तिः पुरुषं विक्षेपयति तद्गुणैः ॥ 343 ॥
अब गुरु एक मनोहर उपमा देते हैं, दूध और पानी की स्पष्ट छँटाई। हंस मिले हुए दूध-पानी में से दूध छाँट लेता है; वैसे ही दृग् (द्रष्टा, आत्मा) और दृश्य (देखी जाने वाली दुनिया) हमारे अनुभव में घुले हुए हैं, और विवेक की वही हंस-दृष्टि इन्हें अलग कर देती है। यह छँटाई स्फुट हो जाए, तो आवरण स्वयं टूट जाता है, और आवरण टूटे तो विक्षेप भी स्वयं थम जाता है, मूल कटी, शाखा गिरी। यही सम्यक्-विवेक माया-निर्मित मोह-बंधन को काट देता है, और एक बार कटे तो “फिर संसार नहीं”। पर-अवर एकत्व की वह अग्नि अविद्या के घने वन को बीजों समेत जला डालती है, जैसे वन में आग लगे तो कुछ नहीं बचता जो फिर अंकुरित हो सके। तो अद्वैत-भाव में पहुँचे हुए के लिए संसरण का बीज कहाँ बचेगा।
344 · 345 · 346
विक्षेपशक्तिविजयो विषमो विधातुं निःशेषमावरणशक्तिनिवृत्त्यभावे ।
दृग्दृश्ययोः स्फुटपयोजलवद्विभागे नश्येत्तदावरणमात्मनि च स्वभावात् निःसंशयेन भवति प्रतिबन्धशून्यो विक्षेपणं नहिं तदा यदि चेन्मृषार्थे ॥ 344 ॥
सम्यग्विवेकः स्फुटबोधजन्यो विभज्य दृग्दृश्यपदार्थतत्त्वम् ।
छिनत्ति मायाकृतमोहबन्धं यस्माद्विमुक्तस्तु पुनर्न संसृतिः ॥ 345 ॥
परावरैकत्वविवेकवन्हिः दहत्यविद्यागहनं ह्यशेषम् ।
किं स्यात्पुनः संसरणस्य बीजं अद्वैतभावं समुपेयुषोऽस्य ॥ 346 ॥
अब गुरु तीन कड़ियों में पूरी मुक्ति का चित्र देते हैं, सम्यक्-दर्शन, मिथ्या-ज्ञान का नाश, और दुख की निवृत्ति; हर कड़ी से अगली स्वयं आती है, और दुख की निवृत्ति कुछ करने से नहीं, बस आवरण और मिथ्या-ज्ञान के हटने का ही दूसरा नाम है। यही रस्सी-साँप के दृष्टांत में दिखता है। अँधेरे में रस्सी साँप लगती है; फिर रस्सी का सम्यक् विज्ञान, स्पष्ट देख लेना कि यह तो रस्सी है, और उसी एक क्षण में तीनों काम हो जाते हैं, आवरण (अँधेरा) हटा, मिथ्या-ज्ञान (साँप-बुद्धि) नष्ट, और उससे जन्मा भय चला गया। तो बंधन-मुक्ति का कर्म बस यही है, वस्तु का तत्त्व स्पष्ट देख लेना। और यह भी समझ लें, जैसे तपा लोहा अग्नि-सा भासता है पर अग्नि नहीं, वैसे ही बुद्धि आत्मा (सत्) से जुड़ कर जागरूक भासती है, पर चेतना आत्मा की है, बुद्धि की नहीं; इसी झूठी जागरूकता से दृग्-दृश्य का पूरा खेल खड़ा होता है, और भ्रम, स्वप्न, मनोरथ में बुद्धि एक पूरी मिथ्या दुनिया रच लेती है।
347 · 348 · 349
आवरणस्य निवृत्तिर्भवति हि सम्यक्पदार्थदर्शनतः ।
मिथ्याज्ञानविनाशस्तद्विक्षेपजनितदुःखनिवृत्तिः ॥ 347 ॥
एतत्त्रितयं दृष्टं सम्यग्रज्जुस्वरूपविज्ञानात् ।
तस्माद्वस्तुसतत्त्वं ज्ञातव्यं बन्धमुक्तये विदुषा ॥ 348 ॥
अयोऽग्नियोगादिव सत्समन्वयान् मात्रादिरूपेण विजृम्भते धीः ।
तत्कार्यमेतद्द्वितयं यतो मृषा दृष्टं भ्रमस्वप्नमनोरथेषु ॥ 349 ॥
अब गुरु असली और मिथ्या में भेद की एक सरल कसौटी देते हैं, जो क्षण भर में बदल जाए वह असली नहीं, जो कभी न बदले वही असली। अहंकार बदलता है, मन बदलता है, शरीर बदलता है, संसार बदलता है, सब क्षणभंगुर, इसलिए सब असत्; पर आत्मा कभी अन्यथा नहीं होती, आप वह हैं जो हर बदलाव को देखता है। और फिर आत्मा की एक पूर्ण परिभाषा आती है, हर शब्द एक खंभा है, नित्य (कभी न बदलने वाला), अद्वय (दूसरा नहीं), अखंड (बिना दरार), चित्-एक-रूप (बस चेतना), बुद्धि आदि का साक्षी जो स्वयं देखा नहीं जाता, सत्-असत् से विलक्षण, “मैं” शब्द के पीछे का असली अर्थ, प्रत्यक्, सदा-आनंद-घन। यह आप हैं, हर शब्द आपकी ओर संकेत है। और पूरी विधि तीन चरणों में बँध जाती है, विभाजन, निश्चय, ज्ञान; फिर ज्ञानी स्वयं ही शांत हो जाता है, शांति को अर्जित नहीं किया जाता, वह सही कर्म के पीछे अपने-आप चली आती है, समझ और मुक्ति एक ही हो जाती हैं।
350 · 351 · 352
ततो विकाराः प्रकृतेरहंमुखा देहावसाना विषयाश्च सर्वे ।
क्षणेऽन्यथाभावितया ह्यमीषाम् असत्त्वमात्मा तु कदापि नान्यथा ॥ 350 ॥
नित्याद्वयाखण्डचिदेकरूपो बुद्ध्यादिसाक्षी सदसद्विलक्षणः ।
अहंपदप्रत्ययलक्षितार्थः प्रत्यक्सदानन्दघनः परात्मा ॥ 351 ॥
इत्थं विपश्चित्सदसद्विभज्य निश्चित्य तत्त्वं निजबोधदृष्ट्या ।
ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डबोधं तेभ्यो विमुक्तः स्वयमेव शाम्यति ॥ 352 ॥
अब वह श्लोक आता है जिस पर पूरा भाग ठहरता है। हम मानते हैं अज्ञान सिर में है, बौद्धिक है; उपनिषद् कहते हैं नहीं, वह हृदय में बँधी एक गाँठ है। गाँठ बल लगाने से नहीं खुलती, धीरे, धैर्य से, सूई की नोक से खुलती है, और निर्विकल्प समाधि वही सूई है; उससे अद्वैत-आत्म-दर्शन होता है, दो-नहीं का अनुभव, और उसी के साथ गाँठ खुल जाती है। और गुरु पूरे संसार के विभाजन को तीन शब्दों में रख देते हैं, “वह, मैं, यह”; यही तीन-शब्दों वाला खाँचा हमारे संसार-अनुभव का ढाँचा है, पर यह बुद्धि का दोष है, असली नहीं। स्वस्थ बुद्धि एक देखती है, रोगी बुद्धि तीन। समाधि वही औषधि है, और जब वह उदित हो, तो हर यह-वह का खाँचा विलय हो जाता है, बस एक शेष रहता है, बिना नाम, बिना खाँचे के।
353 · 354
अज्ञानहृदयग्रन्थेर्निःशेषविलयस्तदा ।
समाधिनाविकल्पेन यदाद्वैतात्मदर्शनम् ॥ 353 ॥
त्वमहमिदमितीयं कल्पना बुद्धिदोषात् प्रभवति परमात्मन्यद्वये निर्विशेषे ।
प्रविलसति समाधावस्य सर्वो विकल्पो विलयनमुपगच्छेद्वस्तुतत्त्वावधृत्या ॥ 354 ॥
अब गुरु जीवन्मुक्त यति का एक पूर्ण और भरा-पूरा चित्र देते हैं, और देखिए उसमें कितनी सरलता और कितना सुख है। चार गुण, शांत (मन निर्मल), दान्त (इन्द्रियाँ संयत), उपरत (विषयों से लौटा), क्षांति-युक्त (क्षमावान); यही गुण, साथ में नित्य समाधि और सर्वात्म-भाव का अनुभव; फिर अविद्या के अँधेरे से जन्मे विकल्प जल जाते हैं, और यति ब्रह्म-रूप में, निष्क्रिय और निर्विकल्प हो कर, सुख से रहता है। पर गुरु एक तीखी बात भी कहते हैं, केवल बात करने वाले मुक्त नहीं। मुक्ति परोक्ष कथा से, सुनी-सुनाई बात से नहीं आती; मुक्त वही है जिसने इन्द्रियों को, चित्त को, और सबसे आवश्यक, अपने “मैं” को भी चित्-आत्मा में पूर्ण रूप से घोल लिया हो।
355 · 356
शान्तो दान्तः परमुपरतः क्षान्तियुक्तः समाधिं कुर्वन्नित्यं कलयति यतिः स्वस्य सर्वात्मभावम् ।
तेनाविद्यातिमिरजनितान्साधु दग्ध्वा विकल्पान् ब्रह्माकृत्या निवसति सुखं निष्क्रियो निर्विकल्पः ॥ 355 ॥
समाहिता ये प्रविलाप्य बाह्यं श्रोत्रादि चेतः स्वमहं चिदात्मनि ।
त एव मुक्ता भवपाशबन्धैः नान्ये तु पारोक्ष्यकथाभिधायिनः ॥ 356 ॥
अब गुरु एक गहरी बात कहते हैं, आत्मा स्वयं कभी भिन्न नहीं होती, वह बस उपाधि के कारण भिन्न-भिन्न भासती है, और उपाधि हटे तो स्वयं ही केवल हो जाती है। तो कर्म आत्मा को ठीक करना नहीं, वह तो पहले से ठीक है, बस उपाधि का विलय करना है, और उसका मार्ग निरंतर समान समाधि-निष्ठा है; समाधि कोई कभी-कभार वाली वस्तु नहीं रह जाती, वह जीने का ढंग बन जाती है। और इसके लिए गुरु एक पुरानी छवि लाते हैं, कीट और भ्रमर की। भ्रमर एक कीट को पकड़ कर अपने घर में बंद कर लेता है, बार-बार उसके पास आता है, और भय में, उसी का ध्यान करते-करते कीट स्वयं भ्रमर बन जाता है; जिस पर एकाग्रता से ध्यान दें, वही बन जाते हैं। वैसे ही योगी, दूसरी क्रियाओं का लगाव छोड़ कर, एक-निष्ठा से परमात्म-तत्त्व का ध्यान कर के, उसी को पा लेता है। बँटा ध्यान बँटा फल देता है, एक ध्यान ही एक होने का मार्ग है।
357 · 358 · 359
उपाधिभेदात्स्वयमेव भिद्यते चोपाध्यपोहे स्वयमेव केवलः ।
तस्मादुपाधेर्विलयाय विद्वान् वसेत्सदाकल्पसमाधिनिष्ठया ॥ 357 ॥
सति सक्तो नरो याति सद्भावं ह्येकनिष्ठया ।
कीटको भ्रमरं ध्यायन् भ्रमरत्वाय कल्पते ॥ 358 ॥
क्रियान्तरासक्तिमपास्य कीटको ध्यायन्नलित्वं ह्यलिभावमृच्छति ।
तथैव योगी परमात्मतत्त्वं ध्यात्वा समायाति तदेकनिष्ठया ॥ 359 ॥
अब गुरु एक चेतावनी देते हैं, परमात्म-तत्त्व अति-सूक्ष्म है, स्थूल दृष्टि से, मोटी सतही समझ से इसे पकड़ा नहीं जा सकता; जो अत्यंत सूक्ष्म हो उसके लिए अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि चाहिए, अति-सूक्ष्म वृत्ति वाली समाधि और अति-शुद्ध बुद्धि। तर्क-वितर्क की हलचल इसे पकड़ नहीं पाती, बस मन की अत्यंत बारीक, निर्मल अवस्था में यह झलकता है। और गुरु एक सुंदर उपमा जोड़ते हैं, सोने की शुद्धि की। कच्चा सोना मलिन होता है, उसे पुट-पाक में बार-बार तपा कर शुद्ध किया जाता है, मल जल जाता है, असली सोना शेष रहता है; वैसे ही मन पर सत्त्व-रजस्-तमस् का मल चढ़ा है, ध्यान वही अग्नि है जो इसे जलाती है, और जो शेष रहता है वह आत्मा से अलग नहीं। और फिर एक प्यारा शब्द आता है, पक्वम् मनः, पका मन; निरंतर अभ्यास से मन फल की तरह पकता है, और पक कर बिना किसी बल के ब्रह्म में लीन हो जाता है, जैसे पका फल वृक्ष से अपने-आप गिर जाता है। उसी लीन होने में निर्विकल्प समाधि खुलती है, कोई “यह करूँ या वह” नहीं, बस एक रस, अद्वय-आनंद।
360 · 361 · 362
अतीव सूक्ष्मं परमात्मतत्त्वं न स्थूलदृष्ट्या प्रतिपत्तुमर्हति ।
समाधिनात्यन्तसुसूक्ष्मवृत्या ज्ञातव्यमार्यैरतिशुद्धबुद्धिभिः ॥ 360 ॥
यथा सुवर्णं पुटपाकशोधितं त्यक्त्वा मलं स्वात्मगुणं समृच्छति ।
तथा मनः सत्त्वरजस्तमोमलं ध्यानेन सन्त्यज्य समेति तत्त्वम् ॥ 361 ॥
निरन्तराभ्यासवशात्तदित्थं पक्वं मनो ब्रह्मणि लीयते यदा ।
तदा समाधिः सविकल्पवर्जितः स्वतोऽद्वयानन्दरसानुभावकः ॥ 362 ॥
अब गुरु निर्विकल्प समाधि का फल बताते हैं, और एक सुंदर शब्द है, अयत्नतः, बिना यत्न के। पहले स्वरूप को जानने में यत्न लगता था, विवेक, अभ्यास, समाधि; पर समाधि के बाद स्वरूप का प्रकाशन बिना यत्न के होता है, हर समय, हर स्थान, भीतर और बाहर। सारी वासनाओं की गाँठ कट जाती है, सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं, और करने को कुछ शेष नहीं रहता। फिर वह प्रसिद्ध तौल आती है, श्रवण से सौ गुना श्रेष्ठ मनन, मनन से लाख गुना श्रेष्ठ निदिध्यासन, और अनंत गुना श्रेष्ठ निर्विकल्प समाधि, जहाँ ध्यान करने वाला भी शेष नहीं रहता। यह सीढ़ी हर ऊपरी पायदान पर गहराई बढ़ाती जाती है, और श्रवण पर रुक जाना अधूरापन है। यही कारण है कि गुरु जोर देते हैं, ब्रह्म-तत्त्व स्फुट और निश्चित रूप से केवल निर्विकल्प समाधि से जाना जाता है; मन चल रहा हो, हलचल में हो, तो हर ज्ञान दूसरे विचारों से मिला-जुला रहेगा, जैसे हिलते पात्र में प्रतिबिंब टूट-टूट जाता है।
363 · 364 · 365
समाधिनानेन समस्तवासना ग्रन्थेर्विनाशोऽखिलकर्मनाशः ।
अन्तर्बहिः सर्वत एव सर्वदा स्वरूपविस्फूर्तिरयत्नतः स्यात् ॥ 363 ॥
श्रुतेः शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि ।
निदिध्यासं लक्षगुणमनन्तं निर्विकल्पकम् ॥ 364 ॥
निर्विकल्पकसमाधिना स्फुटं ब्रह्मतत्त्वमवगम्यते ध्रुवम् ।
नान्यथा चलतया मनोगतेः प्रत्ययान्तरविमिश्रितं भवेत् ॥ 365 ॥
और इसी सीधे आदेश पर भाग 12 बंद होता है। तीन बातें गुरु जोड़ देते हैं, इन्द्रिय-संयम, शांत मन, और भीतर का रुख; ये तीनों मिल कर समाधि की भूमि बनाते हैं। और इसमें “निरंतर” शब्द जुड़ा है, कभी-कभार नहीं, अविरल, यह जीने का ढंग बन जाए। कर्म का फल भी स्पष्ट है, सत्-एकत्व के एक अवलोकन से अनादि अविद्या से बने अँधेरे का विध्वंस हो जाए। मार्ग लंबा है, पर सीधा।
366
अतः समाधत्स्व यतेन्द्रियः सन् निरन्तरं शान्तमनाः प्रतीचि ।
विध्वंसय ध्वान्तमनाद्यविद्यया कृतं सदेकत्वविलोकनेन ॥ 366 ॥
आगे का क्रम
सीधा अगला पन्ना, भाग 13, योग के अंग और वैराग्य के दो पंख। समाधि की विधि अब और स्फुट होती है, और वैराग्य को मुक्ति-शिखर तक चढ़ने के दो पंखों में से एक बताया जाता है।
श्लोक 364 श्रवण से सौ गुना मनन, मनन से लाख गुना निदिध्यासन कहता है। यही क्रम साधना की कसौटी है, सुनने पर ठहर जाना नहीं, मनन और निदिध्यासन तक चलते रहना।