विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 12 · समाधि, हृदय की गाँठ खुलती है · श्लोक 329-366
अहंकार और प्रमाद की चेतावनी पीछे। अब असली विधि, समाधि। एक ऐसी एकाग्रता जो धीरे-धीरे “अज्ञान-हृदय-ग्रन्थि” खोल देती है, और जिसमें ब्रह्म-तत्व अपने आप साफ़ झलकने लगता है।
पहले एक बात
भाग 11 का स्वर चेतावनी का था, गिरने से बचो, गेंद सीढ़ी पर है। भाग 12 का स्वर बदल जाता है। यहाँ गुरु एक सकारात्मक विधि देते हैं, समाधि। यानी मन की वह गहरी एकाग्रता, जिसमें “देखने वाला” और “देखी जाने वाली चीज़”, दोनों एक हो जाते हैं।
यहाँ एक प्रसिद्ध तिकड़ी आती है, श्रवण, मनन, निदिध्यासन (श्लोक 364)। सुनो, सोचो, और गहराई से ध्याओ। और गुरु एक प्यारी बात कहते हैं: मनन सुनने से सौ गुना श्रेष्ठ, और निदिध्यासन मनन से लाख गुना। यानी रास्ता ऊपर की ओर जाता है, हर पायदान पर गहराई बढ़ती है।
और अंत में, श्लोक 353, “अज्ञान-हृदय-ग्रन्थि” खुलती है। यह उपनिषदों की एक प्यारी छवि है: हृदय में बँधी अज्ञान की एक गाँठ। समाधि वह उँगली है जो धीरे-धीरे उसे खोल देती है। और जब वह खुले, समाधि निर्विकल्प हो जाती है, तो जो साक्षात्कार होता है, वह बस अद्वैत है।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से। तीन हिस्से, संकल्प छोड़ो, बाहर रोको (329-340), विवेक और समाधि की विधि (341-352), और निर्विकल्प समाधि (353-366)। असली खंभे: 333 (आत्म-दृष्टि में टिको), 344 (दृग्-दृश्य का दूध-पानी जैसा भेद), 353 (हृदय-गाँठ खुलना), 364 (श्रवण-मनन-निदिध्यासन)। हर श्लोक पर anchor है।
329 · संकल्प छोड़ो, हर मुसीबत की जड़
संकल्पं वर्जयेत्तस्मात्सर्वानर्थस्य कारणम् ।
जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहे स च केवलः यत्किंचित्पश्यतो भेदं भयं ब्रूते यजुःश्रुतिः ॥ 329 ॥
saṅkalpaṁ varjayet tasmāt sarvānarthasya kāraṇam · jīvato yasya kaivalyaṁ videhe sa ca kevalaḥ yat kiṁcit paśyato bhedaṁ bhayaṁ brūte yajuḥ-śrutiḥ
शब्दार्थ: संकल्पं वर्जयेत् · संकल्प (मन की हलचल/इच्छा-कल्पना) को छोड़ दे · सर्व-अनर्थस्य कारणम् · हर मुसीबत का कारण · जीवतः यस्य कैवल्यं · जिसे जीते-जी कैवल्य · विदेहे स च केवलः · विदेह में भी वही केवल · यत्किंचित् भेदं पश्यतः भयम् · जो रत्ती भर भी भेद देखता है, उसे भय · यजुः-श्रुतिः · यजुर्वेद की श्रुति कहती है।
अर्थ: इसलिए संकल्प को छोड़ दे, वह हर मुसीबत की जड़ है। जिसे जीते-जी कैवल्य मिल गया, उसे विदेह (देह छूटने पर) में भी वही केवल-स्थिति है। जो रत्ती भर भी भेद देखता है, उसके लिए भय है, यह यजुर्वेद की श्रुति कहती है।
भावार्थ: गुरु एक सीधी आज्ञा से शुरू करते हैं, “संकल्पं वर्जयेत्।” संकल्प यानी मन की वह हलचल जो “मैं यह करूँगा, मुझे यह चाहिए, ऐसा होना चाहिए” बुनती रहती है। यही हर मुसीबत की जड़ है।
और गुरु एक प्यारी बात जोड़ देते हैं, जीवन्मुक्त और विदेह-मुक्त, दोनों एक ही “केवल” स्थिति में हैं। यानी मुक्ति देह छूटने पर नहीं। अभी हो सकती है। आख़िरी पंक्ति बृहदारण्यक की प्रसिद्ध बात है, “जहाँ रत्ती भर भेद, वहीं भय।” अद्वैत यहाँ डर का जवाब बन जाता है: एक हो जाएँ, और डर के लिए “दूसरा” बचेगा ही नहीं।
330 · ज्ञानी भी, एक रत्ती भेद देखे, डर वहीं
यदा कदा वापि विपश्चिदेष ब्रह्मण्यनन्तेऽप्यणुमात्रभेदम् ।
पश्यत्यथामुष्य भयं तदैव यद्वीक्षितं भिन्नतया प्रमादात् ॥ 330 ॥
yadā kadā vāpi vipaścid eṣa brahmaṇy anante’py aṇu-mātra-bhedam · paśyaty athāmuṣya bhayaṁ tadaiva yad vīkṣitaṁ bhinnatayā pramādāt
शब्दार्थ: यदा कदा वा अपि · जब कभी भी · विपश्चित् · विद्वान भी · ब्रह्मणि अनन्ते अणु-मात्र-भेदम् · अनंत ब्रह्म में अणु भर भी भेद · पश्यति अथ अमुष्य भयम् · देखता है, तभी उसे भय · प्रमादात् भिन्नतया वीक्षितं · प्रमाद से जो अलग दिखा।
अर्थ: जब कभी भी विद्वान (ज्ञानी) इस अनंत ब्रह्म में अणु भर भी भेद देखता है, तभी उसे भय (आ जाता है), क्योंकि प्रमाद से वह अलग दिखा।
भावार्थ: श्लोक 329 की बात आगे, और एक तीखी सच्चाई। ज्ञानी होना भी कवच नहीं। अगर एक पल का प्रमाद हो, और मन रत्ती भर भेद देख ले, तो भय वहीं हाज़िर।
यह बात बेचैन करती है, और करनी चाहिए। मुक्ति एक “हासिल करो और भूल जाओ” वाली डिग्री नहीं। यह एक जीवित दर्शन है, हर पल नया। जिस पल आप “मैं” और “वह”, “अपना” और “पराया” वाली रेखा बनाते हैं, उसी पल डर का दरवाज़ा खुल जाता है। इसलिए सजगता, हर पल।
331 · निषिद्ध को “मैं” मानने वाला, चोर जैसा
श्रुतिस्मृतिन्यायशतैर्निषिद्धे दृश्येऽत्र यः स्वात्ममतिं करोति ।
उपैति दुःखोपरि दुःखजातं निषिद्धकर्ता स मलिम्लुचो यथा ॥ 331 ॥
śruti-smṛti-nyāya-śatair niṣiddhe dṛśye’tra yaḥ svātma-matiṁ karoti · upaiti duḥkhopari duḥkha-jātaṁ niṣiddha-kartā sa malimluco yathā
शब्दार्थ: श्रुति-स्मृति-न्याय-शतैः निषिद्धे · श्रुति, स्मृति, सैकड़ों तर्कों से वर्जित · दृश्ये यः स्व-आत्म-मतिं करोति · इस दृश्य में जो “मैं” समझ बना लेता है · उपैति दुःख-उपरि दुःख-जातम् · दुख पर दुख पाता रहता है · निषिद्ध-कर्ता मलिम्लुचः यथा · वर्जित काम करने वाला चोर की तरह।
अर्थ: श्रुति, स्मृति और सैकड़ों तर्कों से वर्जित इस दृश्य (संसार) में जो “यह मैं हूँ” वाली समझ बना लेता है, वह दुख पर दुख पाता रहता है, उस चोर की तरह जो वर्जित काम करता है।
भावार्थ: गुरु एक बेहद सटीक उपमा देते हैं, चोर। एक चोर जानता है कि चोरी वर्जित है, हर जगह से उसे रोका गया है, फिर भी करता है। और उसका इनाम? लगातार दुख, पकड़े जाने का डर, सज़ा।
दृश्य में “मैं” समझना, यह भी एक “निषिद्ध” काम है। श्रुति कहती है यह नहीं, स्मृति कहती है यह नहीं। तर्क कहता है यह नहीं। फिर भी मन उसी पुरानी पहचान को पकड़ बैठता है, और दुख ख़त्म नहीं होता। चोर वाली उपमा का दर्द यही है: यह एक “अनजाने” की भूल नहीं। यह एक “जानते-बूझते” की भूल है।
332 · सत्य से जुड़े, महान; झूठ से, नष्ट
सत्याभिसंधानरतो विमुक्तो महत्त्वमात्मीयमुपैति नित्यम् ।
मिथ्याभिसन्धानरतस्तु नश्येद् दृष्टं तदेतद्यदचौरचौरयोः ॥ 332 ॥
satyābhisaṁdhāna-rato vimukto mahattvam ātmīyam upaiti nityam · mithyābhisandhāna-ratas tu naśyed dṛṣṭaṁ tad etad yad acaura-caurayoḥ
शब्दार्थ: सत्य-अभिसंधान-रतः · सत्य के अनुसंधान में रत · विमुक्तः · मुक्त · महत्त्वम् आत्मीयम् नित्यम् · अपनी असली महानता हमेशा · मिथ्या-अभिसन्धान-रतः नश्येत् · झूठे अनुसंधान वाला नष्ट · दृष्टं अचौर-चौरयोः · यह तो (दुनिया में) “न-चोर” और “चोर” में देखा गया है।
अर्थ: सत्य के अनुसंधान में रत व्यक्ति मुक्त है, और अपनी असली महानता हमेशा पाता है। पर झूठे अनुसंधान में रत नष्ट हो जाता है, यह वैसा ही है जैसा दुनिया में “न-चोर” और “चोर” के साथ देखा जाता है।
भावार्थ: चोर वाली उपमा यहाँ अपने दूसरे पहलू में आती है। एक “न-चोर”, ईमानदार आदमी, आराम से रहता है, उसे डर नहीं। समाज में सम्मान है। एक चोर, हमेशा छिपा, हमेशा डरा, अंत में पकड़ा जाता है।
“अभिसंधान” यानी जिस ओर मन को लगातार जोड़ा जाए। सत्य की ओर मन लगाओ, तो अपनी असली महानता खुलती है। झूठ की ओर, चाहे कितनी भी “मेहनत” लगे, आख़िर में नष्ट होते हैं। यह कोई धार्मिक सज़ा नहीं; यह बस प्राकृतिक नियम है। जिस ओर ध्यान, उसी ओर पहचान।
333 · आत्म-दृष्टि में टिको, असली निष्ठा
यतिरसदनुसन्धिं बन्धहेतुं विहाय स्वयमायामहमस्मीत्यात्मदृष्ट्यैव तिष्ठेत् ।
सुखयति ननु निष्ठा ब्रह्मणि स्वानुभूत्या हरति परमविद्याकार्यदुःखं प्रतीतम् ॥ 333 ॥
yatir asad-anusandhiṁ bandha-hetuṁ vihāya svayam āyām aham asmīty ātma-dṛṣṭyaiva tiṣṭhet · sukhayati nanu niṣṭhā brahmaṇi svānubhūtyā harati parama-vidyā-kārya-duḥkhaṁ pratītam
शब्दार्थ: यतिः असद्-अनुसन्धिं विहाय · यति असत् का अनुसंधान छोड़ कर · बन्ध-हेतुं · जो बंधन का कारण · “स्वयम् अहम् अस्मि” इति आत्म-दृष्ट्या एव तिष्ठेत् · “मैं स्वयं ही हूँ”, इस आत्म-दृष्टि में ही टिके · सुखयति ननु निष्ठा ब्रह्मणि · ब्रह्म में निष्ठा सुख देती है · स्व-अनुभूत्या हरति परम-विद्या-कार्य-दुःखं प्रतीतम् · अपने अनुभव से, परम-अविद्या के काम वाले दिखते दुख को हर लेती है।
अर्थ: यति असत् के अनुसंधान को, जो बंधन का कारण है, छोड़ कर, “मैं स्वयं ही हूँ”, इस आत्म-दृष्टि में ही टिके। ब्रह्म में निष्ठा सुख देती है, और अपने अनुभव से, अविद्या के काम वाले दिखते दुख को हर लेती है।
भावार्थ: गुरु एक सीधा निर्देश देते हैं और साथ ही एक प्यारा भरोसा। निर्देश, असत् का अनुसंधान छोड़ो, आत्म-दृष्टि में टिको। भरोसा, यह “सुखयति”, सुख देती है।
अध्यात्म कभी-कभी एक सूखा त्याग लगता है, “यह छोड़ो, वह छोड़ो।” पर गुरु यहाँ साफ़ करते हैं, आत्म-निष्ठा कोई बलिदान नहीं; यह आनंद का स्रोत है। और काम भी करती है, दुख जो दिखता है (अविद्या-कार्य), उसे “हर लेती” है। एक तरफ़ छूट, दूसरी तरफ़ पाना, पर असल में दोनों एक ही हैं।
334 · बाहर का अनुसंधान, दुर्वासना बढ़ाता है
बाह्यानुसन्धिः परिवर्धयेत्फलं दुर्वासनामेव ततस्ततोऽधिकाम् ।
ज्ञात्वा विवेकैः परिहृत्य बाह्यं स्वात्मानुसन्धिं विदधीत नित्यम् ॥ 334 ॥
bāhyānusandhiḥ parivardhayet phalaṁ dur-vāsanām eva tatas tato’dhikām · jñātvā vivekaiḥ parihṛtya bāhyaṁ svātmānusandhiṁ vidadhīta nityam
शब्दार्थ: बाह्य-अनुसन्धिः परिवर्धयेत् फलं · बाहरी अनुसंधान फल बढ़ाता है · दुर्-वासनाम् एव · दुर्वासना ही · ततः ततः अधिकाम् · और-और ज़्यादा · ज्ञात्वा विवेकैः परिहृत्य बाह्यं · विवेक से जान कर बाहरी को छोड़ कर · स्व-आत्म-अनुसन्धिं विदधीत नित्यम् · स्व-आत्म-अनुसंधान लगातार करे।
अर्थ: बाहरी (विषयों का) अनुसंधान दुर्वासना का फल और-और ज़्यादा बढ़ाता जाता है। विवेक से यह जान कर, बाहरी को छोड़ कर, स्व-आत्म-अनुसंधान लगातार करे।
भावार्थ: गुरु एक सीधा कारण-प्रभाव बताते हैं: जिस ओर ध्यान, उसी ओर वासना। बाहर ध्यान, बाहरी चीज़ों की और-और चाह। भीतर ध्यान, आत्मा की ओर सहज खिंचाव।
यह बात आज की दुनिया में और भी ज़रूरी हो गई है, हम लगातार बाहर ध्यान देते हैं (फ़ोन, ख़बरें, दूसरों के जीवन)। हर “देखना” एक नई वासना बीज की तरह बोता है। गुरु कहते हैं, विवेक से इसे जान लो, और “नित्यम्”, लगातार, स्व-आत्म-अनुसंधान करते रहो। यह एक बार का काम नहीं। रोज़ का, हर पल का।
335 · बाहर रुके, मन प्रसन्न; मन प्रसन्न, परमात्म-दर्शन
बाह्ये निरुद्धे मनसः प्रसन्नता मनःप्रसादे परमात्मदर्शनम् ।
तस्मिन्सुदृष्टे भवबन्धनाशो बहिर्निरोधः पदवी विमुक्तेः ॥ 335 ॥
bāhye niruddhe manasaḥ prasannatā manaḥ-prasāde paramātma-darśanam · tasmin sudṛṣṭe bhava-bandha-nāśo bahir-nirodhaḥ padavī vimukteḥ
शब्दार्थ: बाह्ये निरुद्धे मनसः प्रसन्नता · बाहर रोके जाने पर मन की प्रसन्नता · मनः-प्रसादे परमात्म-दर्शनम् · मन की प्रसन्नता में परमात्म-दर्शन · तस्मिन् सु-दृष्टे भव-बन्ध-नाशः · वह ठीक से देखा जाने पर संसार-बंधन का नाश · बहिः-निरोधः पदवी विमुक्तेः · बाहर का रोकना ही मुक्ति का मार्ग।
अर्थ: बाहर के रोके जाने पर मन में प्रसन्नता; मन की प्रसन्नता में परमात्म-दर्शन; वह ठीक से देखा जाने पर संसार-बंधन का नाश। तो बाहर का रोकना ही मुक्ति का मार्ग है।
भावार्थ: गुरु एक बेहद साफ़ कारण-शृंखला देते हैं, चार कड़ियाँ, एक के बाद एक। बाहर रुका → मन शांत हुआ → परमात्मा दिखा → बंधन टूटा।
हर कड़ी ज़रूरी है, और हर कड़ी अगली के लिए ज़मीन तैयार करती है। और एक प्यारी बात, “मनः-प्रसाद।” मन की एक प्रसन्न, साफ़ अवस्था। यह कोई बड़ा रहस्यमय अनुभव नहीं। बस मन का शांत, हल्का होना। और इसी हल्के मन में परमात्मा अपने आप दिखता है, कोई ज़ोर नहीं लगाना पड़ता। पानी थम जाए, चाँद उसमें अपने आप साफ़ झलकने लगता है।
336 · कौन समझदार होंगे जो असत् पर टिकेगा?
कः पण्डितः सन्सदसद्विवेकी श्रुतिप्रमाणः परमार्थदर्शी ।
जानन्हि कुर्यादसतोऽवलम्बं स्वपातहेतोः शिशुवन्मुमुक्षुः ॥ 336 ॥
kaḥ paṇḍitaḥ san sad-asad-vivekī śruti-pramāṇaḥ paramārtha-darśī · jānan hi kuryād asato’valambaṁ sva-pāta-hetoḥ śiśuvan mumukṣuḥ
शब्दार्थ: कः पण्डितः सन् · कौन पंडित होते हुए · सत्-असत्-विवेकी · सत्-असत् का विवेकी · श्रुति-प्रमाणः · श्रुति को प्रमाण मानने वाला · परमार्थ-दर्शी · परम-सच को देखने वाला · जानन् कुर्यात् असतः अवलम्बम् · जानते हुए असत् का सहारा लेगा · स्व-पात-हेतोः · अपने ही पतन के कारण · शिशु-वत् मुमुक्षुः · बच्चे की तरह मुमुक्षु।
अर्थ: कौन पंडित, सत्-असत् का विवेकी, श्रुति को प्रमाण मानने वाला, परम-सच को देखने वाला, जान-बूझ कर असत् का सहारा लेगा, जो उसके अपने पतन का कारण है? कौन ऐसा मुमुक्षु, जो बच्चे की तरह [यह करे]?
भावार्थ: गुरु एक चुभने वाला सवाल पूछते हैं, जो दिखाता है कि असली समस्या क्या है। समझदार आदमी जानता है क्या ठीक है, फिर भी उसी ग़लती को बार-बार करता है। यह एक “बच्चे जैसा” व्यवहार है।
बच्चा आग को छूता है, जल जाता है, फिर भी अगली बार छूता है, क्योंकि उसकी समझ टिकती नहीं। समझदार मुमुक्षु को बच्चा बनना नहीं चाहिए। एक बार जान लिया कि असत् पतन का कारण है, तो उससे दूरी रखो। यह सवाल आईने की तरह है, हम अपने अनुभव में देखते हैं और शर्मिंदा हो जाते हैं: हाँ, मैं भी यह करता हूँ।
337 · देह-संसक्ति के साथ मुक्ति नहीं
देहादिसंसक्तिमतो न मुक्तिः मुक्तस्य देहाद्यभिमत्यभावः ।
सुप्तस्य नो जागरणं न जाग्रतः स्वप्नस्तयोर्भिन्नगुणाश्रयत्वात् ॥ 337 ॥
dehādi-saṁsakti-mato na muktiḥ muktasya dehādy-abhimaty-abhāvaḥ · suptasya no jāgaraṇaṁ na jāgrataḥ svapnas tayor bhinna-guṇāśrayatvāt
शब्दार्थ: देह-आदि-संसक्ति-मतः न मुक्तिः · देह आदि से चिपके हुए की मुक्ति नहीं · मुक्तस्य देह-आदि-अभिमति-अभावः · मुक्त के लिए देह-आदि का अभिमान-अभाव · सुप्तस्य नो जागरणं न जाग्रतः स्वप्नः · सोते का जागना नहीं। जागते का सपना नहीं · तयोः भिन्न-गुण-आश्रयत्वात् · दोनों भिन्न गुणों पर टिके होने से।
अर्थ: देह आदि से चिपके हुए की मुक्ति नहीं; मुक्त के लिए देह-आदि का अभिमान नहीं रहता। सोते का जागना नहीं। जागते का सपना नहीं। क्योंकि दोनों भिन्न गुणों पर टिके हैं।
भावार्थ: गुरु एक एकदम सटीक तर्क देते हैं। देह-संसक्ति और मुक्ति, दोनों एक साथ नहीं हो सकते। एक की मौजूदगी दूसरे का न होना ही है।
उपमा सीधी है: सोता हुआ इंसान जागा हुआ नहीं हो सकता, जागा हुआ सोता नहीं। दो अलग अवस्थाएँ, अलग गुणों पर टिकीं, एक साथ संभव ही नहीं। तो अगर आप “मैं आधा मुक्त हूँ, थोड़ी देह-पहचान बची है” सोचते हैं, यह सोचना ही असंभव है। मुक्ति हो या न हो, बीच का कुछ नहीं।
338 · अंदर-बाहर एक, वही मुक्त
अन्तर्बहिः स्वं स्थिरजङ्गमेषु ज्ञात्वात्मनाधारतया विलोक्य ।
त्यक्ताखिलोपाधिरखण्डरूपः पूर्णात्मना यः स्थित एष मुक्तः ॥ 338 ॥
antar-bahiḥ svaṁ sthira-jaṅgameṣu jñātvātmanādhāratayā vilokya · tyaktākhilopādhir akhaṇḍa-rūpaḥ pūrṇātmanā yaḥ sthita eṣa muktaḥ
शब्दार्थ: अन्तर्-बहिः स्वं स्थिर-जङ्गमेषु · अंदर-बाहर, स्थिर-गतिमान चीज़ों में अपने को · ज्ञात्वा आत्मना आधारतया विलोक्य · आत्मा के रूप में, आधार के रूप में देख कर · त्यक्त-अखिल-उपाधिः अखण्ड-रूपः · सब उपाधियाँ छोड़ कर, अखंड-रूप · पूर्ण-आत्मना यः स्थितः एष मुक्तः · पूर्ण-आत्मा रूप में स्थित, वही मुक्त।
अर्थ: अंदर-बाहर, स्थिर और गतिमान चीज़ों में, अपने आप को आत्मा के रूप में, सबके आधार के रूप में देख कर, सब उपाधियाँ छोड़ कर, अखंड-रूप, पूर्ण-आत्मा के रूप में जो स्थित है, वही मुक्त है।
भावार्थ: गुरु मुक्त की एक सुंदर परिभाषा देते हैं, और यह जीवन्मुक्ति की पहली झलक है।
मुक्त इंसान बाहर-भीतर का भेद नहीं देखता; स्थिर-गतिमान के बीच की रेखा नहीं देखता। सब में अपना आत्मा देखता है, और सबका आधार भी आत्मा देखता है। और “अखंड-रूप”, कोई दरार नहीं। यह ब्रह्मांड एक पूरा, एक रस, और वह उसी का स्वरूप।
339 · सर्वात्म-भाव से ही मुक्ति
सर्वात्मना बन्धविमुक्तिहेतुः सर्वात्मभावान्न परोऽस्ति कश्चित् ।
दृश्याग्रहे सत्युपपद्यतेऽसौ सर्वात्मभावोऽस्य सदात्मनिष्ठया ॥ 339 ॥
sarvātmanā bandha-vimukti-hetuḥ sarvātma-bhāvān na paro’sti kaścit · dṛśyāgrahe saty upapadyate’sau sarvātma-bhāvo’sya sad-ātma-niṣṭhayā
शब्दार्थ: सर्वात्मना बन्ध-विमुक्ति-हेतुः · पूरी तरह से बंधन-मुक्ति का कारण · सर्वात्म-भावात् न परः अस्ति कश्चित् · सर्वात्म-भाव से बढ़ कर कुछ नहीं · दृश्य-अग्रहे सति · दृश्य के न-पकड़ने पर · उपपद्यते असौ सर्वात्म-भावः · वह सर्वात्म-भाव बनता है · सद्-आत्म-निष्ठया · सद्-आत्मा में निष्ठा से।
अर्थ: पूरी तरह से बंधन-मुक्ति का कारण, सर्वात्म-भाव, से बढ़ कर कुछ नहीं। दृश्य के न पकड़े जाने पर वह सर्वात्म-भाव बनता है, सद्-आत्म-निष्ठा से।
भावार्थ: गुरु मुक्ति की चाबी एक शब्द में दे देते हैं, “सर्वात्म-भाव।” सब में अपना आत्मा देखना; अपने आत्मा को सब का आत्मा देखना।
और यह कैसे आता है? “दृश्य-अग्रह”, दिखती चीज़ों को न पकड़ने से। यह बारीक बात है: दृश्य को “नकारना” नहीं। बस “न पकड़ना।” जब पकड़ ढीली होती है, दीवारें घुलने लगती हैं। और जब दीवारें न हों, तो “अंदर-बाहर” का फ़र्क मिट जाता है, सर्वात्म-भाव अपने आप आता है।
340 · दृश्य का अग्रहण, कैसे संभव
दृश्यस्याग्रहणं कथं नु घटते देहात्मना तिष्ठतो बाह्यार्थानुभवप्रसक्तमनसस्तत्तत्क्रियां कुर्वतः ।
संन्यस्ताखिलधर्मकर्मविषयैर्नित्यात्मनिष्ठापरैः तत्त्वज्ञैः करणीयमात्मनि सदानन्देच्छुभिर्यत्नतः ॥ 340 ॥
dṛśyasyāgrahaṇaṁ kathaṁ nu ghaṭate dehātmanā tiṣṭhato bāhyārthānubhava-prasakta-manasas tat-tat-kriyāṁ kurvataḥ · saṁnyastākhila-dharma-karma-viṣayair nityātma-niṣṭhā-paraiḥ tattva-jñaiḥ karaṇīyam ātmani sadānandecchubhir yatnataḥ
शब्दार्थ: दृश्यस्य अग्रहणं कथं घटते · दृश्य का अग्रहण कैसे होंगे · देह-आत्मना तिष्ठतः · “मैं देह हूँ” वाले के लिए · बाह्य-अर्थ-अनुभव-प्रसक्त-मनसः · बाह्य अनुभवों में फँसे मन वाले के लिए · तत्-तत्-क्रियां कुर्वतः · विभिन्न क्रियाएँ करते हुए · संन्यस्त-अखिल-धर्म-कर्म-विषयैः · सब धर्म-कर्म-विषय छोड़ने वालों · नित्य-आत्म-निष्ठा-परैः तत्त्व-ज्ञैः · नित्य आत्म-निष्ठा वाले तत्त्व-ज्ञानियों · करणीयम् आत्मनि सदा-आनन्द-इच्छुभिः यत्नतः · सदा-आनंद की इच्छा वालों को आत्मा में करना है, यत्न से।
अर्थ: दृश्य का अग्रहण कैसे संभव होंगे उस के लिए, जो “मैं देह हूँ” में टिका हो, जिसका मन बाह्य अनुभवों में फँसा हो, जो तरह-तरह की क्रियाएँ कर रहा हैं? यह तो उन तत्त्व-ज्ञानियों को, जिन्होंने सब धर्म-कर्म-विषय छोड़े हों, जो नित्य आत्म-निष्ठा में हों, जो सदा-आनंद चाहते हों, यत्न से, आत्मा में, करना है।
भावार्थ: गुरु एक ईमानदार सवाल पूछते हैं और जवाब देते हैं। दृश्य-अग्रहण आसान नहीं। और निश्चय ही “मैं देह हूँ” समझे, बाहरी अनुभवों में डूबे, सब कुछ करते रहने वाले के लिए तो असंभव।
तो यह किनके लिए है? जिन्होंने एक स्तर पर त्याग किया है, जो आत्म-निष्ठा में लगे हैं, जो सदा-आनंद चाहते हैं। और गुरु “यत्न से” शब्द जोड़ देते हैं, यह अपने आप नहीं होता; प्रयत्न चाहिए। पर हो सकता है। अगला हिस्सा (समाधि का) यही “यत्न” कैसे करें, बताएगा।
341 · सर्वात्म-सिद्धि के लिए, समाधि
सर्वात्मसिद्धये भिक्षोः कृतश्रवणकर्मणः ।
समाधिं विदधात्येषा शान्तो दान्त इति श्रुतिः ॥ 341 ॥
sarvātma-siddhaye bhikṣoḥ kṛta-śravaṇa-karmaṇaḥ · samādhiṁ vidadhāty eṣā śānto dānta iti śrutiḥ
शब्दार्थ: सर्वात्म-सिद्धये भिक्षोः · सर्वात्म-सिद्धि के लिए, बिखुक (साधु) के लिए · कृत-श्रवण-कर्मणः · जिसने श्रवण पूरा किया हैं · समाधिं विदधाति एषा · वह समाधि का विधान करती है · “शान्तः दान्तः” इति श्रुतिः · “शांत, दान्त”, श्रुति।
अर्थ: सर्वात्म-सिद्धि के लिए, जिसने श्रवण पूरा कर लिया है, उस बिखुक के लिए, श्रुति समाधि का विधान करती है (“शांत, दान्त”, आदि कह कर)।
भावार्थ: गुरु अब असली विधि देते हैं, समाधि। और श्रुति (बृहदारण्यक का प्रसिद्ध वचन “शान्तो दान्तः उपरतस्तितिक्षुः समाहितः”) को गवाह बनाते हैं।
पहले के साधन, श्रवण, मनन, सिर तैयार करते हैं। पर अंतिम साक्षात्कार के लिए कुछ और चाहिए, समाधि, यानी मन की वह गहरी एकाग्रता जिसमें “मैं” और “वह” का फ़र्क घुल जाता है। यह कोई बौद्धिक काम नहीं। यह एक अनुभव है। और यही श्रुति का वादा है।
342 · अहंकार का नाश, एकदम नहीं
आरूढशक्तेरहमो विनाशः कर्तुं न शक्य सहसापि पण्डितैः ।
ये निर्विकल्पाख्यसमाधिनिश्चलाः तानन्तरानन्तभवा हि वासनाः ॥ 342 ॥
ārūḍha-śakter ahamo vināśaḥ kartuṁ na śakya sahasāpi paṇḍitaiḥ · ye nirvikalpākhya-samādhi-niścalāḥ tān antarānanta-bhavā hi vāsanāḥ
शब्दार्थ: आरूढ-शक्तेः अहमः विनाशः · चढ़ी हुई शक्ति वाले अहंकार का नाश · कर्तुं न शक्य सहसा अपि पण्डितैः · पंडितों द्वारा भी अचानक संभव नहीं · ये निर्विकल्प-आख्य-समाधि-निश्चलाः · जो “निर्विकल्प” नाम वाली समाधि में निश्चल · तान् अन्तरा अनन्त-भवाः हि वासनाः · उन्हें (छोड़ कर भी) अनेक जन्मों की वासनाएँ हैं।
अर्थ: चढ़ी हुई शक्ति वाले अहंकार का नाश पंडितों द्वारा भी अचानक नहीं किया जा सकता। जो निर्विकल्प-नाम वाली समाधि में निश्चल हैं, उन्हीं (के लिए संभव है); क्योंकि अनेक जन्मों की वासनाएँ हैं।
भावार्थ: गुरु एक ईमानदार बात कहते हैं। अहंकार “अचानक” नहीं मरता, एक झटके में नहीं। क्यों? क्योंकि वासनाएँ अनगिनत जन्मों की हैं, गहरी जड़ें हैं।
तो इलाज क्या? निर्विकल्प समाधि, एक ऐसी अचल अवस्था जिसमें कोई विकल्प, कोई “यह करूँ या वह” नहीं रह जाता। यह एक-दिन-में हासिल नहीं होती; यह धीरे-धीरे, अभ्यास से पकती है। अगले श्लोक यह बताएँगे कि किस रास्ते से।
343 · विक्षेप-शक्ति, अहं-बुद्धि से जुड़ती है
अहंबुद्ध्यैव मोहिन्या योजयित्वावृतेर्बलात् ।
विक्षेपशक्तिः पुरुषं विक्षेपयति तद्गुणैः ॥ 343 ॥
ahaṁ-buddhyaiva mohinyā yojayitvāvṛter balāt · vikṣepa-śaktiḥ puruṣaṁ vikṣepayati tad-guṇaiḥ
शब्दार्थ: अहं-बुद्ध्या एव मोहिन्या · मोहिनी अहं-बुद्धि से ही · योजयित्वा आवृतेः बलात् · जोड़ कर, आवरण-शक्ति के बल से · विक्षेप-शक्तिः पुरुषं विक्षेपयति · विक्षेप-शक्ति पुरुष को विचलित करती है · तद्-गुणैः · अपने गुणों से।
अर्थ: मोहिनी अहं-बुद्धि से जोड़ कर, और आवरण-शक्ति के बल से, विक्षेप-शक्ति पुरुष को अपने गुणों (राग-द्वेष आदि) से विचलित करती है।
भावार्थ: गुरु एक मनोवैज्ञानिक चित्र देते हैं, दो शक्तियाँ (आवरण और विक्षेप, भाग 4 की याद) कैसे मिल कर काम करती हैं।
पहले आवरण-शक्ति आत्मा को ढक देती है। फिर अहं-बुद्धि उभरती है, “मैं यह हूँ” वाला छोटा “मैं।” और इस अहं-बुद्धि से जुड़ कर विक्षेप-शक्ति आती है, और तरह-तरह के गुण-दोषों (राग, क्रोध, लोभ) से पुरुष को इधर-उधर फेंकती है। दोनों मिल कर एक पूरा क़ैदखाना बनाते हैं। अगला श्लोक इसका इलाज देगा।
344 · दृग्-दृश्य का दूध-पानी जैसा भेद
विक्षेपशक्तिविजयो विषमो विधातुं निःशेषमावरणशक्तिनिवृत्त्यभावे ।
दृग्दृश्ययोः स्फुटपयोजलवद्विभागे नश्येत्तदावरणमात्मनि च स्वभावात् निःसंशयेन भवति प्रतिबन्धशून्यो विक्षेपणं नहिं तदा यदि चेन्मृषार्थे ॥ 344 ॥
vikṣepa-śakti-vijayo viṣamo vidhātuṁ niḥśeṣam āvaraṇa-śakti-nivṛtty-abhāve · dṛg-dṛśyayoḥ sphuṭa-payo-jalavad vibhāge naśyet tad āvaraṇam ātmani ca svabhāvāt niḥsaṁśayena bhavati pratibandha-śūnyo vikṣepaṇaṁ nahiṁ tadā yadi cen mṛṣārthe
शब्दार्थ: विक्षेप-शक्ति-विजयः विषमः · विक्षेप-शक्ति की पूरी जीत कठिन · आवरण-शक्ति-निवृत्ति-अभावे · आवरण-शक्ति के पूरे हटे बिना · दृग्-दृश्ययोः स्फुट-पयो-जल-वत् विभागे · दृग् (देखने वाला) और दृश्य (देखा जाने वाला) के दूध-पानी जैसे साफ़ विभाजन पर · नश्येत् तद् आवरणम् · वह आवरण नष्ट · स्वभावात् निःसंशयेन प्रतिबन्ध-शून्यः · स्वभाव से, बिना संशय, बिना रुकावट · विक्षेपणं नहिं तदा यदि चेत् मृषा-अर्थे · तब विक्षेप नहीं। अगर (दृश्य) झूठ के लिए।
अर्थ: विक्षेप-शक्ति की पूरी जीत कठिन है, जब तक आवरण-शक्ति पूरी हटी न हो। दृग् और दृश्य के दूध-पानी जैसे साफ़ विभाजन पर वह आवरण नष्ट हो जाता है, और आत्मा स्वभाव से ही, बिना संशय, बिना रुकावट हो जाती है, फिर विक्षेप नहीं। अगर दृश्य के लिए (मन न जाए)।
भावार्थ: गुरु एक बहुत प्यारी उपमा देते हैं, “स्फुट-पयो-जल-वत्”, दूध और पानी की साफ़ छँटाई। एक प्रसिद्ध कहानी है हंस की, हंस मिले हुए दूध-पानी में से दूध छाँट लेता है।
दृग् (देखने वाला, आत्मा) और दृश्य (देखी जाने वाली दुनिया) हमारे अनुभव में मिले हुए हैं, घुले हुए। विवेक की हंस-नज़र इन्हें अलग कर देती है, दूध से पानी। और जब यह छँटाई “स्फुट”, साफ़, हो जाए, तो आवरण अपने आप टूटता है। और जब आवरण टूटा, तो विक्षेप भी अपने आप थमता है। एक की मूल, दूसरी की शाख, मूल कटी, शाख गिरी।
345 · सम्यक्-विवेक, माया का बंधन काटता है
सम्यग्विवेकः स्फुटबोधजन्यो विभज्य दृग्दृश्यपदार्थतत्त्वम् ।
छिनत्ति मायाकृतमोहबन्धं यस्माद्विमुक्तस्तु पुनर्न संसृतिः ॥ 345 ॥
samyag-vivekaḥ sphuṭa-bodha-janyo vibhajya dṛg-dṛśya-padārtha-tattvam · chinatti māyā-kṛta-moha-bandhaṁ yasmād vimuktas tu punar na saṁsṛtiḥ
शब्दार्थ: सम्यग्-विवेकः स्फुट-बोध-जन्यः · सम्यक् विवेक, साफ़ बोध से जन्मा · विभज्य दृग्-दृश्य-पदार्थ-तत्त्वम् · दृग्-दृश्य पदार्थों के तत्व को बाँट कर · छिनत्ति माया-कृत-मोह-बन्धं · माया-निर्मित मोह-बंधन को काटता है · यस्मात् विमुक्तः तु पुनः न संसृतिः · जिससे मुक्त होने पर फिर संसार नहीं।
अर्थ: साफ़ बोध से जन्मा सम्यक् विवेक, दृग् और दृश्य पदार्थों के तत्व को अलग-अलग कर के, माया-निर्मित मोह-बंधन को काट देता है। जिससे मुक्त होने पर फिर संसार नहीं।
भावार्थ: गुरु एक अंतिम वादा करते हैं, सम्यक्-विवेक माया का बंधन काट देता है, और एक बार कट जाए, “फिर संसार नहीं।”
यह बहुत ज़ोरदार बात है। संसार-चक्र एक नदी की तरह है, पर सम्यक्-विवेक की एक तेज़ धारा उसकी रीढ़ काट देती है। फिर पानी अपने स्रोत में लौट जाता है, चक्र रुक जाता है। और गुरु “पुनः न”, फिर नहीं। कहते हैं। यह कोई अस्थायी राहत नहीं; यह अंतिम है।
346 · पर-अवर एकत्व की आग, अविद्या का जंगल जलाती है
परावरैकत्वविवेकवन्हिः दहत्यविद्यागहनं ह्यशेषम् ।
किं स्यात्पुनः संसरणस्य बीजं अद्वैतभावं समुपेयुषोऽस्य ॥ 346 ॥
parāvaraikatva-viveka-vanhiḥ dahaty avidyā-gahanaṁ hy aśeṣam · kiṁ syāt punaḥ saṁsaraṇasya bījaṁ advaita-bhāvaṁ samupeyuṣo’sya
शब्दार्थ: पर-अवर-एकत्व-विवेक-वन्हिः · पर (ब्रह्म) और अवर (जीव) की एकता के विवेक की आग · दहति अविद्या-गहनं अशेषम् · अविद्या के घने जंगल को पूरा जला देती है · किं स्यात् पुनः संसरणस्य बीजम् · फिर संसरण का बीज क्या होंगे · अद्वैत-भावं समुपेयुषः अस्य · अद्वैत-भाव में पहुँचे हुए के लिए।
अर्थ: पर (ब्रह्म) और अवर (जीव) की एकता के विवेक की आग, अविद्या के घने जंगल को पूरा जला देती है। फिर संसरण (संसार-चक्र) का बीज क्या बचेगा, अद्वैत-भाव में पहुँचे हुए के लिए?
भावार्थ: गुरु एक ज़बरदस्त तस्वीर देते हैं, अविद्या एक “घना जंगल” है, और एकत्व-विवेक एक आग।
जंगल में आग लगे, तो पूरा जंगल, हर पेड़, हर झाड़ी, हर बीज, सब जल जाता है। कुछ नहीं बचता जो दोबारा उग सके। एकत्व-विवेक भी ऐसा ही करता है, अविद्या के साथ-साथ उसके सारे बीज भी जला देता है। तो अगला सवाल अपने आप उठता है: फिर संसार कैसे? कोई बीज ही नहीं बचा! यह “एक-बार-के-लिए-हमेशा” वाली मुक्ति है।
347 · आवरण की निवृत्ति, दुख की निवृत्ति
आवरणस्य निवृत्तिर्भवति हि सम्यक्पदार्थदर्शनतः ।
मिथ्याज्ञानविनाशस्तद्विक्षेपजनितदुःखनिवृत्तिः ॥ 347 ॥
āvaraṇasya nivṛttir bhavati hi samyak-padārtha-darśanataḥ · mithyā-jñāna-vināśas tad-vikṣepa-janita-duḥkha-nivṛttiḥ
शब्दार्थ: आवरणस्य निवृत्तिः सम्यक्-पदार्थ-दर्शनतः · आवरण की निवृत्ति सम्यक् पदार्थ-दर्शन से · मिथ्या-ज्ञान-विनाशः · मिथ्या-ज्ञान का नाश · तद्-विक्षेप-जनित-दुःख-निवृत्तिः · उससे विक्षेप से उत्पन्न दुख की निवृत्ति।
अर्थ: आवरण की निवृत्ति सम्यक् पदार्थ-दर्शन से होती है; (फिर) मिथ्या-ज्ञान का नाश; और उससे विक्षेप से उत्पन्न दुख की भी निवृत्ति।
भावार्थ: गुरु एक साफ़ कारण-शृंखला देते हैं, और यह तीन कड़ियों में पूरी मुक्ति का चित्र है। एक, सम्यक्-दर्शन (सही ढंग से देखना)। दो, मिथ्या-ज्ञान का नाश। तीन, दुख की निवृत्ति।
हर कड़ी से अगली अपने आप आती है। काम बस एक जगह है, पहली कड़ी। सही ढंग से देख लो, बाक़ी अपने आप। और सबसे प्यारी बात, दुख की निवृत्ति यहाँ “कुछ करने” से नहीं आती; वह बस आवरण और मिथ्या-ज्ञान के हटने का दूसरा नाम है।
348 · रस्सी-दर्शन से तीनों ख़त्म
एतत्त्रितयं दृष्टं सम्यग्रज्जुस्वरूपविज्ञानात् ।
तस्माद्वस्तुसतत्त्वं ज्ञातव्यं बन्धमुक्तये विदुषा ॥ 348 ॥
etat tritayaṁ dṛṣṭaṁ samyag rajju-svarūpa-vijñānāt · tasmād vastu-sa-tattvaṁ jñātavyaṁ bandha-muktaye viduṣā
शब्दार्थ: एतत् त्रितयं दृष्टं · यह त्रिक देखा गया · सम्यग् रज्जु-स्वरूप-विज्ञानात् · रस्सी के स्वरूप के सम्यक् विज्ञान से · तस्मात् वस्तु-स-तत्त्वं ज्ञातव्यं · इसलिए वस्तु का तत्व जानना चाहिए · बन्ध-मुक्तये विदुषा · विद्वान को, बंधन-मुक्ति के लिए।
अर्थ: यह त्रिक (आवरण-निवृत्ति, मिथ्या-ज्ञान-नाश, दुख-निवृत्ति) रस्सी के स्वरूप के सम्यक् विज्ञान से देखा गया है। इसलिए विद्वान को, बंधन-मुक्ति के लिए, वस्तु का तत्व जानना चाहिए।
भावार्थ: गुरु फिर रस्सी-साँप का उदाहरण लाते हैं, और दिखाते हैं कि श्लोक 347 की त्रिक वहाँ कैसे काम करती है।
अँधेरे में रस्सी “साँप” दिखती है। फिर रस्सी का “सम्यक् विज्ञान”, साफ़ देख लेना कि यह रस्सी है। उसी एक पल में तीन काम हो जाते हैं: आवरण (अँधेरा) हटा, मिथ्या-ज्ञान (साँप-समझ) नष्ट, और उससे पैदा हुआ दुख (डर) चला गया। कोई अलग-अलग तीन काम नहीं। एक ही “देख लेना।” तो बंधन-मुक्ति का काम बस यही है, “वस्तु का तत्व” साफ़ देख लेना।
349 · तपे लोहे की तरह बुद्धि फैलती है
अयोऽग्नियोगादिव सत्समन्वयान् मात्रादिरूपेण विजृम्भते धीः ।
तत्कार्यमेतद्द्वितयं यतो मृषा दृष्टं भ्रमस्वप्नमनोरथेषु ॥ 349 ॥
ayo’gni-yogād iva sat-samanvayān mātrādi-rūpeṇa vijṛmbhate dhīḥ · tat-kāryam etad dvitayaṁ yato mṛṣā dṛṣṭaṁ bhrama-svapna-mano-ratheṣu
शब्दार्थ: अयः-अग्नि-योगात् इव · लोहे और आग के योग से जैसे · सत्-समन्वयात् · सत् के संयोग से · मात्रा-आदि-रूपेण विजृम्भते धीः · “मात्रा” (विषय) आदि रूप में बुद्धि फैलती है · तद्-कार्यम् एतत् द्वितयं · यह दोनों (दृग्-दृश्य) उसके काम हैं · यतः मृषा दृष्टं भ्रम-स्वप्न-मनोरथेषु · क्योंकि भ्रम-स्वप्न-दिवास्वप्न में झूठा देखा जाता है।
अर्थ: लोहे और आग के योग से जैसे (तपा लोहा “आग जैसा” लगता है), वैसे ही सत् (आत्मा) के संयोग से बुद्धि “विषय” आदि रूप में फैलती है। यह दोनों (दृग्-दृश्य) उसके काम हैं, क्योंकि भ्रम, स्वप्न, दिवास्वप्न में ये झूठे देखे जाते हैं।
भावार्थ: गुरु तपे लोहे की उपमा फिर लाते हैं (भाग 5, श्लोक 133 की याद)। लोहे को आग में डालो, और लोहा “आग जैसा” दिखने लगता है, पर वह आग नहीं।
बुद्धि भी ऐसी ही है। आत्मा (सत्) से जुड़ कर वह “जागरूक” लगती है, “देखती है”, “जानती है।” पर असली में, चेतना आत्मा की है, बुद्धि की नहीं। और इसी झूठी जागरूकता से दृग्-दृश्य का पूरा खेल खड़ा होता है। भ्रम, स्वप्न, दिवास्वप्न, तीनों में बुद्धि एक पूरी दुनिया खड़ी कर लेती है। पर वह झूठी है।
350 · सब विकार पल भर के, आत्मा अबदला
ततो विकाराः प्रकृतेरहंमुखा देहावसाना विषयाश्च सर्वे ।
क्षणेऽन्यथाभावितया ह्यमीषाम् असत्त्वमात्मा तु कदापि नान्यथा ॥ 350 ॥
tato vikārāḥ prakṛter ahaṁ-mukhā dehāvasānā viṣayāś ca sarve · kṣaṇe’nyathā-bhāvitayā hy amīṣām asattvam ātmā tu kadāpi nānyathā
शब्दार्थ: ततः विकाराः प्रकृतेः · इसलिए प्रकृति के विकार · अहं-मुखा देह-अवसाना · “मैं” से शुरू, देह तक · विषयाः च सर्वे · और सारे विषय · क्षणे अन्यथा-भावितया अमीषाम् असत्त्वम् · पल भर में अन्यथा होने से इनका असत्त्व · आत्मा तु कदापि न अन्यथा · पर आत्मा कभी अन्यथा नहीं।
अर्थ: इसलिए “मैं” से शुरू हो कर देह तक के, और सारे विषय, ये प्रकृति के विकार, पल भर में अन्यथा (बदलते) हो जाने से, इनका असत्त्व (साबित होता है)। पर आत्मा कभी अन्यथा नहीं होती।
भावार्थ: गुरु एक सरल कसौटी देते हैं असली और नक़ली में फ़र्क की। जो “पल भर में बदल जाए”, वह असली नहीं। जो “कभी न बदले”, वही असली।
अहंकार बदलता है, मन बदलता है, शरीर बदलता है, संसार बदलता है, सब “पल भर” के। तो ये सब “असत्”, असली नहीं। पर आत्मा? “कदापि न अन्यथा”, कभी अन्यथा नहीं। यह कसौटी रोज़ की जाँच के लिए मिल जाती है: कोई भी चीज़, कितनी “अपनी” लगती हैं, अगर बदलती है, तो वह आप नहीं। आप वह हैं जो हर बदलाव को देखता है।
351 · असली परम-आत्मा का चित्र
नित्याद्वयाखण्डचिदेकरूपो बुद्ध्यादिसाक्षी सदसद्विलक्षणः ।
अहंपदप्रत्ययलक्षितार्थः प्रत्यक्सदानन्दघनः परात्मा ॥ 351 ॥
nityādvayākhaṇḍa-cid-eka-rūpo buddhy-ādi-sākṣī sad-asad-vilakṣaṇaḥ · ahaṁ-pada-pratyaya-lakṣitārthaḥ pratyak-sadānanda-ghanaḥ parātmā
शब्दार्थ: नित्य-अद्वय-अखण्ड-चित्-एक-रूपः · नित्य, अद्वय, अखंड, चित्-एक-रूप · बुद्धि-आदि-साक्षी · बुद्धि आदि का साक्षी · सत्-असत्-विलक्षणः · सत्-असत् से अलग · “अहं” पद-प्रत्यय-लक्षित-अर्थः · “मैं” शब्द के प्रत्यय का इशारित अर्थ · प्रत्यक्-सदा-आनन्द-घनः परात्मा · भीतर का, सदा-आनंद-घन, परम-आत्मा।
अर्थ: नित्य, अद्वय, अखंड, चित्-एक-रूप; बुद्धि आदि का साक्षी; सत्-असत् से अलग; “मैं” शब्द के असली इशारे का अर्थ; भीतर का, सदा-आनंद-घन, यही परम-आत्मा है।
भावार्थ: गुरु आत्मा की एक पूरी परिभाषा देते हैं, और हर शब्द एक खंभा है।
“नित्य” (कभी न बदलने वाला), “अद्वय” (दूसरा नहीं), “अखंड” (बिना दरार), “चित्-एक-रूप” (बस चेतना, बस वह), “बुद्धि आदि का साक्षी” (देखने वाला, ख़ुद नहीं देखा जाने वाला), “सत्-असत् से अलग” (किसी खाँचे में नहीं), “मैं शब्द का असली अर्थ” (हर “मैं” के पीछे का असली “मैं”)।यह आप हैं। हर शब्द आपकी ओर इशारा है।
352 · विभाजन कर, जान कर, शांत हो जाता है
इत्थं विपश्चित्सदसद्विभज्य निश्चित्य तत्त्वं निजबोधदृष्ट्या ।
ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डबोधं तेभ्यो विमुक्तः स्वयमेव शाम्यति ॥ 352 ॥
itthaṁ vipaścit sad-asad-vibhajya niścitya tattvaṁ nija-bodha-dṛṣṭyā · jñātvā svam ātmānam akhaṇḍa-bodhaṁ tebhyo vimuktaḥ svayam eva śāmyati
शब्दार्थ: इत्थं विपश्चित् सत्-असत् विभज्य · इस तरह ज्ञानी सत्-असत् को विभाजित कर · निश्चित्य तत्त्वं निज-बोध-दृष्ट्या · अपने बोध से तत्व निश्चित कर · ज्ञात्वा स्वं आत्मानम् अखण्ड-बोधं · अपने आत्मा को अखंड-बोध के रूप में जान कर · तेभ्यः विमुक्तः स्वयम् एव शाम्यति · उनसे मुक्त, स्वयं ही शांत हो जाता है।
अर्थ: इस तरह ज्ञानी सत् और असत् को विभाजित कर के, अपने बोध से तत्व निश्चित कर के, और अपने आत्मा को अखंड-बोध के रूप में जान कर, उनसे (अनात्म-चीज़ों से) मुक्त हो कर, स्वयं ही शांत हो जाता है।
भावार्थ: गुरु पूरी विधि को तीन कदमों में रख देते हैं, विभाजन, निश्चय, ज्ञान। और फल, “स्वयम् एव शाम्यति”, अपने आप शांत हैं जाता है।
यह सुंदर है: शांति को “हासिल” नहीं किया जाता, वह आती है, तीन कदमों के बाद, अपने आप। आपको शांति के लिए कुछ “करना” नहीं; बस सही काम कर लो, शांति अपने आप पीछे चली आती है।यह “विमुक्त” है, मुक्त। समझ और मुक्ति एक ही चीज़ बन जाती हैं।
353 · हृदय की अज्ञान-गाँठ खुलती है
अज्ञानहृदयग्रन्थेर्निःशेषविलयस्तदा ।
समाधिनाविकल्पेन यदाद्वैतात्मदर्शनम् ॥ 353 ॥
ajñāna-hṛdaya-granther niḥśeṣa-vilayas tadā · samādhinā-vikalpena yadādvaitātma-darśanam
शब्दार्थ: अज्ञान-हृदय-ग्रन्थेः · अज्ञान की हृदय-गाँठ का · निःशेष-विलयः तदा · पूरा विलय तब · समाधिना अविकल्पेन · निर्विकल्प समाधि से · यदा अद्वैत-आत्म-दर्शनम् · जब अद्वैत-आत्म-दर्शन (हो)।
अर्थ: अज्ञान की हृदय-गाँठ का पूरा विलय तब होता है, जब निर्विकल्प समाधि से अद्वैत-आत्म-दर्शन होता है।
भावार्थ: यह एक बेहद ख़ास, बेहद प्रिय श्लोक है। “अज्ञान-हृदय-ग्रन्थि”, हृदय में बँधी अज्ञान की एक गाँठ, यह उपनिषदों की एक प्रसिद्ध छवि है (मुण्डक, “भिद्यते हृदय-ग्रन्थिः…”)।
हम सोचते हैं अज्ञान सिर में है, बौद्धिक है। उपनिषद् कहते हैं नहीं। वह हृदय में बँधी एक गाँठ है। और एक गाँठ बहुत ज़ोर लगाने से नहीं खुलती; धीरे, ध्यान से, सूई की नोक से खुलती है। निर्विकल्प समाधि वही सूई है। उससे “अद्वैत-आत्म-दर्शन”, दो-नहीं का अनुभव, और उसी के साथ गाँठ खुल जाती है। यही असली मुक्ति का पल है।
354 · “आप-मैं-यह” वाली कल्पना घुलती है
त्वमहमिदमितीयं कल्पना बुद्धिदोषात् प्रभवति परमात्मन्यद्वये निर्विशेषे ।
प्रविलसति समाधावस्य सर्वो विकल्पो विलयनमुपगच्छेद्वस्तुतत्त्वावधृत्या ॥ 354 ॥
tvam-aham-idam itīyaṁ kalpanā buddhi-doṣāt prabhavati paramātmany advaye nirviśeṣe · pravilasati samādhāv asya sarvo vikalpo vilayanam upagacched vastu-tattvāvadhṛtyā
शब्दार्थ: “त्वम्-अहम्-इदम्” इति इयं कल्पना · “आप-मैं-यह” वाली यह कल्पना · बुद्धि-दोषात् प्रभवति · बुद्धि के दोष से उठती है · परमात्मनि अद्वये निर्विशेषे · अद्वय, निर्विशेष परम-आत्मा में · प्रविलसति समाधौ अस्य · इसकी समाधि में फैलती है (और) · सर्वः विकल्पः विलयनम् उपगच्छेत् · सब विकल्प विलय हो जाते हैं · वस्तु-तत्त्व-अवधृत्या · वस्तु-तत्व की पकड़ से।
अर्थ: “आप, मैं, यह”, यह कल्पना बुद्धि के दोष से, अद्वय और निर्विशेष परम-आत्मा पर उठती है। उसकी समाधि में, वस्तु-तत्व की पकड़ से, सब विकल्प विलय में चले जाते हैं।
भावार्थ: गुरु पूरे संसार के विभाजन को एक शब्द में रख देते हैं, “त्वम्-अहम्-इदम्”, आप-मैं-यह। यह तीन-शब्दों वाला विभाजन ही हमारे पूरे संसार-अनुभव का ढाँचा है।
और गुरु कहते हैं, यह बुद्धि का “दोष” है, असली नहीं। एक स्वस्थ बुद्धि एक देखती है; एक रोगी बुद्धि तीन देखती है। समाधि वह दवा है, और जब वह आ जाए, “सब विकल्प”, हर “यह-वह” का खाँचा, विलय हो जाता है। बस एक रह जाता है, बिना नाम के, बिना खाँचे के।
355 · शान्त, दान्त, विकल्प जला कर, ब्रह्म-रूप में
शान्तो दान्तः परमुपरतः क्षान्तियुक्तः समाधिं कुर्वन्नित्यं कलयति यतिः स्वस्य सर्वात्मभावम् ।
तेनाविद्यातिमिरजनितान्साधु दग्ध्वा विकल्पान् ब्रह्माकृत्या निवसति सुखं निष्क्रियो निर्विकल्पः ॥ 355 ॥
śānto dāntaḥ param uparataḥ kṣānti-yuktaḥ samādhiṁ kurvan nityaṁ kalayati yatiḥ svasya sarvātma-bhāvam · tenāvidyā-timira-janitān sādhu dagdhvā vikalpān brahmākṛtyā nivasati sukhaṁ niṣkriyo nirvikalpaḥ
शब्दार्थ: शान्तः दान्तः परम् उपरतः क्षान्ति-युक्तः · शांत, दान्त, परम-उपरत, क्षमा-युक्त · समाधिं कुर्वन् नित्यं कलयति यतिः · नित्य समाधि करते हुए यति अनुभव करता है · स्वस्य सर्वात्म-भावम् · अपने सर्वात्म-भाव को · तेन अविद्या-तिमिर-जनितान् साधु दग्ध्वा विकल्पान् · उससे अविद्या-अँधेरे से उत्पन्न विकल्पों को ठीक से जला कर · ब्रह्म-आकृत्या निवसति सुखं · ब्रह्म-रूप में सुख से रहता है · निष्क्रियः निर्विकल्पः · निष्क्रिय, निर्विकल्प।
अर्थ: शांत, दान्त, परम-उपरत, क्षमा-युक्त, नित्य समाधि करता यति अपने सर्वात्म-भाव को अनुभव करता है। उससे अविद्या के अँधेरे से उत्पन्न विकल्पों को ठीक से जला कर, ब्रह्म-रूप में, निष्क्रिय और निर्विकल्प हो कर, सुख से रहता है।
भावार्थ: गुरु जीवन्मुक्त यति का एक पूरा चित्र देते हैं, और देखिए उसमें कितनी सरलता है।
चार गुण, शांत (मन साफ़), दान्त (इन्द्रियाँ सधी), उपरत (विषयों से लौटा), क्षांति-युक्त (क्षमा वाला)। यही गुण, साथ में नित्य समाधि, साथ में सर्वात्म-भाव का अनुभव। फिर अविद्या के विकल्प जलते हैं। और अंत में, “सुखम्”, सुख से। यह त्याग की उदास तस्वीर नहीं; यह एक भरा-पूरा, सुख-से-जीने वाली अवस्था है।
356 · बाहर को भीतर घोल देने वाले, असली मुक्त
समाहिता ये प्रविलाप्य बाह्यं श्रोत्रादि चेतः स्वमहं चिदात्मनि ।
त एव मुक्ता भवपाशबन्धैः नान्ये तु पारोक्ष्यकथाभिधायिनः ॥ 356 ॥
samāhitā ye pravilāpya bāhyaṁ śrotrādi cetaḥ svam ahaṁ cid-ātmani · ta eva muktā bhava-pāśa-bandhaiḥ nānye tu pārokṣya-kathābhidhāyinaḥ
शब्दार्थ: समाहिताः ये प्रविलाप्य · समाहित जो घोल देते हैं · बाह्यं श्रोत्र-आदि · बाहरी कान आदि (इन्द्रियों) को · चेतः स्वम् अहं चित्-आत्मनि · चित्त, अपने “मैं” को, चित्-आत्मा में · ते एव मुक्ताः भव-पाश-बन्धैः · वही मुक्त संसार-फंदे-बंधन से · न अन्ये तु पारोक्ष्य-कथा-अभिधायिनः · और नहीं। परोक्ष कथाएँ कहने वाले।
अर्थ: जो समाहित हो कर बाहरी कान आदि इन्द्रियों को, चित्त को, और अपने “मैं” को, चित्-आत्मा में घोल देते हैं, वही असली मुक्त हैं संसार-बंधन से। और नहीं। बस परोक्ष कथाएँ कहने वाले।
भावार्थ: गुरु एक तीखी बात कहते हैं, सिर्फ़ “बात करने वाले” मुक्त नहीं हैं। मुक्त वह है जिसने सच में घोल लिया।
“पारोक्ष्य-कथा”, परोक्ष कथा, यानी सुनी-सुनाई बात, दूसरों से कही गई कथा। ज्ञान दो तरह का होता है, परोक्ष (किताबों से, सुना हुआ) और अपरोक्ष (सीधा, अपना अनुभव)। गुरु कहते हैं, सिर्फ़ परोक्ष ज्ञान, सिर्फ़ शास्त्र-चर्चा, मुक्ति नहीं देता। मुक्ति “घोल देने” से आती है, अपने अनुभव में, इन्द्रियों को, चित्त को, और सबसे ज़रूरी, “मैं” को भी, चित्-आत्मा में पूरी तरह घोल देना।
357 · उपाधि-भेद से भेद, उपाधि-विलय से केवल
उपाधिभेदात्स्वयमेव भिद्यते चोपाध्यपोहे स्वयमेव केवलः ।
तस्मादुपाधेर्विलयाय विद्वान् वसेत्सदाकल्पसमाधिनिष्ठया ॥ 357 ॥
upādhi-bhedāt svayam eva bhidyate copādhy-apohe svayam eva kevalaḥ · tasmād upādher vilayāya vidvān vaset sadā-kalpa-samādhi-niṣṭhayā
शब्दार्थ: उपाधि-भेदात् स्वयम् एव भिद्यते · उपाधि-भेद से (आत्मा) स्वयं ही भिन्न दिखती है · च उपाधि-अपोहे स्वयम् एव केवलः · और उपाधि के हटने पर स्वयं ही केवल · तस्मात् उपाधेः विलयाय · इसलिए उपाधि के विलय के लिए · विद्वान् वसेत् सदा-कल्प-समाधि-निष्ठया · विद्वान सदा-समान समाधि-निष्ठा में रहे।
अर्थ: उपाधि के भेद से (आत्मा) स्वयं ही भिन्न-भिन्न दिखती है; और उपाधि के हटने पर स्वयं ही “केवल” (अकेली) हो जाती है। इसलिए उपाधि के विलय के लिए विद्वान को सदा-समान समाधि-निष्ठा में रहना चाहिए।
भावार्थ: गुरु एक प्यारी बात कहते हैं, आत्मा अपने आप कभी “भिन्न” नहीं होती; वह बस उपाधि के कारण ऐसी दिखती है (राजा-सिपाही वाला उदाहरण, भाग 9 की याद)।
तो काम क्या है? आत्मा को “ठीक” करना नहीं। वह तो पहले से ठीक है। बस उपाधि का “विलय” करना है। और इसका रास्ता, सदा-समान समाधि-निष्ठा। समाधि कोई “कभी-कभार” वाली चीज़ नहीं रह जाती; वह जीने का तरीक़ा बन जाती है।
358 · कीड़ा भौंरे का ध्यान, भौंरा बनता है
सति सक्तो नरो याति सद्भावं ह्येकनिष्ठया ।
कीटको भ्रमरं ध्यायन् भ्रमरत्वाय कल्पते ॥ 358 ॥
sati sakto naro yāti sad-bhāvaṁ hy eka-niṣṭhayā · kīṭako bhramaraṁ dhyāyan bhramaratvāya kalpate
शब्दार्थ: सति सक्तः नरः याति सद्-भावम् · सत् में लगा मनुष्य सद्-भाव पाता है · हि एक-निष्ठया · एक-निष्ठा से · कीटकः भ्रमरं ध्यायन् · कीड़ा भौंरे का ध्यान करते हुए · भ्रमरत्वाय कल्पते · भौंरा बनने योग्य हो जाता है।
अर्थ: सत् में लगा मनुष्य एक-निष्ठा से सद्-भाव पाता है। कीड़ा भौंरे का ध्यान करते हुए भौंरा बनने योग्य हो जाता है।
भावार्थ: गुरु एक पुरानी, प्रसिद्ध तस्वीर देते हैं, कीड़ा-भौंरा। मान्यता है, एक भौंरा एक कीड़े को पकड़ कर अपने घर में बंद कर देता है, और बार-बार उसके पास आता है। डर में, कीड़ा भौंरे का ही ध्यान करते-करते, कहते हैं, ख़ुद भौंरा बन जाता है।
उपमा की बात सीधी है: जिस पर एकाग्रता से ध्यान दो, वह बन जाते हैं। अगर सत् पर, ब्रह्म पर एकाग्र हो, तो सत् हो जाएँ। यह कोई जादू नहीं। यह मन का प्राकृतिक नियम है। जिस ओर ध्यान, उसी ओर रूपांतरण।
359 · कीड़े की तरह, योगी भी
क्रियान्तरासक्तिमपास्य कीटको ध्यायन्नलित्वं ह्यलिभावमृच्छति ।
तथैव योगी परमात्मतत्त्वं ध्यात्वा समायाति तदेकनिष्ठया ॥ 359 ॥
kriyāntarāsaktim apāsya kīṭako dhyāyann ali-tvaṁ hy ali-bhāvam ṛcchati · tathaiva yogī paramātma-tattvaṁ dhyātvā samāyāti tad-eka-niṣṭhayā
शब्दार्थ: क्रिया-अन्तर-आसक्तिम् अपास्य कीटकः · दूसरी क्रियाओं का लगाव छोड़ कर कीड़ा · ध्यायन् अलित्वं हि अलि-भावम् ऋच्छति · भौंरे-पन का ध्यान करते-करते भौंरा-भाव पा लेता है · तथा एव योगी परमात्म-तत्त्वं ध्यात्वा · वैसे ही योगी परमात्म-तत्व का ध्यान कर के · समायाति तद्-एक-निष्ठया · एक-निष्ठा से उसी को पा लेता है।
अर्थ: दूसरी क्रियाओं का लगाव छोड़ कर, कीड़ा भौंरे-पन का ध्यान करते-करते भौंरा-भाव पा लेता है। वैसे ही योगी परमात्म-तत्व का ध्यान कर के, एक-निष्ठा से, उसी को पा लेता है।
भावार्थ: श्लोक 358 की बात आगे, और गुरु एक ज़रूरी शब्द जोड़ देते हैं: “क्रिया-अन्तर-आसक्तिम् अपास्य”, दूसरी क्रियाओं का लगाव छोड़ कर।
कीड़ा भौंरा इसलिए बनता है कि उसने बाक़ी सब छोड़ कर बस एक ही ध्यान किया। योगी भी वैसे ही, एक-निष्ठा से, बाक़ी सब छोड़ कर, परमात्मा का ध्यान करे, और परमात्मा हो जाए। चाबी “एक” में है। बँटा हुआ ध्यान बँटा हुआ नतीजा देता है। एक ध्यान, एक होने का रास्ता।
360 · अति-सूक्ष्म, स्थूल नज़र से नहीं
अतीव सूक्ष्मं परमात्मतत्त्वं न स्थूलदृष्ट्या प्रतिपत्तुमर्हति ।
समाधिनात्यन्तसुसूक्ष्मवृत्या ज्ञातव्यमार्यैरतिशुद्धबुद्धिभिः ॥ 360 ॥
atīva sūkṣmaṁ paramātma-tattvaṁ na sthūla-dṛṣṭyā pratipattum arhati · samādhinātyanta-su-sūkṣma-vṛtyā jñātavyam āryair atiśuddha-buddhibhiḥ
शब्दार्थ: अतीव सूक्ष्मं परमात्म-तत्त्वं · अति-सूक्ष्म परमात्म-तत्व · न स्थूल-दृष्ट्या प्रतिपत्तुम् अर्हति · स्थूल नज़र से नहीं पकड़ा जा सकता · समाधिना अति-सु-सूक्ष्म-वृत्या · अति-सूक्ष्म वृत्ति वाली समाधि से · ज्ञातव्यम् आर्यैः अति-शुद्ध-बुद्धिभिः · अति-शुद्ध बुद्धि वाले आर्यों द्वारा जानना है।
अर्थ: परमात्म-तत्व अति-सूक्ष्म है, स्थूल नज़र से इसे पकड़ा नहीं जा सकता। अति-सूक्ष्म वृत्ति वाली समाधि से, अति-शुद्ध बुद्धि वाले आर्यों द्वारा यह जाना जाना है।
भावार्थ: गुरु एक चेतावनी देते हैं, परमात्मा को “स्थूल नज़र” से, यानी मोटी, सतही समझ से, पकड़ा नहीं जा सकता।
एक उपमा: एक अति-सूक्ष्म कण को देखने के लिए माइक्रोस्कोप चाहिए, नंगी आँख नहीं। आत्मा भी सबसे सूक्ष्म है, उसे देखने के लिए “अति-सूक्ष्म वृत्ति वाली समाधि” चाहिए। बौद्धिक हलचल, तर्क-वितर्क, ये उसे पकड़ नहीं पाते। बस मन की बहुत बारीक, बहुत साफ़ अवस्था में वह झलकता है।
361 · सोने की तरह, पुटपाक से शुद्ध
यथा सुवर्णं पुटपाकशोधितं त्यक्त्वा मलं स्वात्मगुणं समृच्छति ।
तथा मनः सत्त्वरजस्तमोमलं ध्यानेन सन्त्यज्य समेति तत्त्वम् ॥ 361 ॥
yathā suvarṇaṁ puṭa-pāka-śodhitaṁ tyaktvā malaṁ svātma-guṇaṁ samṛcchati · tathā manaḥ sattva-rajas-tamo-malaṁ dhyānena saṁtyajya sameti tattvam
शब्दार्थ: यथा सुवर्णं पुट-पाक-शोधितं · जैसे सोना पुट-पाक से शुद्ध होता · त्यक्त्वा मलं स्व-आत्म-गुणं समृच्छति · मैल छोड़ कर अपना मूल गुण पा लेता है · तथा मनः सत्त्व-रजस्-तमस्-मलं · वैसे ही मन सत्व-रजस्-तमस् के मैल को · ध्यानेन सन्त्यज्य समेति तत्त्वम् · ध्यान से छोड़ कर तत्व पा लेता है।
अर्थ: जैसे सोना पुट-पाक (तेज़ आग में पकाने) से शुद्ध होता है, मैल छोड़ कर अपना मूल चमकता गुण पा लेता है, वैसे ही मन भी, सत्व-रजस्-तमस् के मैल को ध्यान से छोड़ कर, तत्व पा लेता है।
भावार्थ: गुरु एक बेहद सुंदर उपमा देते हैं, सोने की शुद्धि। कच्चा सोना मैला होता है, अन्य धातुएँ मिली होती हैं। उसे “पुट-पाक”, एक ख़ास भट्टी में बार-बार तपा कर, शुद्ध किया जाता है। मैल जल जाता है, असली सोना बच जाता है।
मन भी ऐसा ही है। उस पर तीनों गुणों का “मैल” चढ़ा है। ध्यान वह आग है जो इस मैल को जलाती है। और जो बचता है, मन का असली, शुद्ध तत्व, वह आत्मा से अलग नहीं। ध्यान शुद्धि की भट्टी है, और तत्व उसकी पकड़ में आ जाता है।
362 · पका मन ब्रह्म में घुले, सविकल्प-रहित समाधि
निरन्तराभ्यासवशात्तदित्थं पक्वं मनो ब्रह्मणि लीयते यदा ।
तदा समाधिः सविकल्पवर्जितः स्वतोऽद्वयानन्दरसानुभावकः ॥ 362 ॥
nirantarābhyāsa-vaśāt tad itthaṁ pakvaṁ mano brahmaṇi līyate yadā · tadā samādhiḥ sa-vikalpa-varjitaḥ svato’dvayānanda-rasānubhāvakaḥ
शब्दार्थ: निरन्तर-अभ्यास-वशात् · निरंतर अभ्यास से · पक्वं मनः ब्रह्मणि लीयते यदा · पका मन जब ब्रह्म में घुलता है · तदा समाधिः सविकल्प-वर्जितः · तब समाधि, सविकल्प से रहित (निर्विकल्प) · स्वतः अद्वय-आनन्द-रस-अनुभावकः · स्वतः अद्वय-आनंद-रस का अनुभव कराने वाली।
अर्थ: निरंतर अभ्यास से ऐसे पका मन जब ब्रह्म में घुल जाता है, तब समाधि, सविकल्प से रहित (यानी निर्विकल्प), अपने आप अद्वय-आनंद-रस का अनुभव कराने वाली हैं जाती है।
भावार्थ: गुरु एक प्यारा शब्द देते हैं, “पक्वम् मनः”, पका मन। मन भी एक फल की तरह पकता है, धीरे-धीरे, समय के साथ, निरंतर अभ्यास से।
और जब पक जाए, तो वह ब्रह्म में “घुल” जाता है, किसी ज़ोर से नहीं। अपने आप, जैसे पका फल पेड़ से ख़ुद गिर जाता है। और उस घुलने में “निर्विकल्प समाधि” खुलती है, कोई “यह करूँ या वह” नहीं। कोई दो नहीं। बस एक रस, अद्वय-आनंद। यह समाधि “की” नहीं जाती; वह “होती” है, अपने आप।
363 · वासना-गाँठ, कर्म, सब नष्ट
समाधिनानेन समस्तवासना ग्रन्थेर्विनाशोऽखिलकर्मनाशः ।
अन्तर्बहिः सर्वत एव सर्वदा स्वरूपविस्फूर्तिरयत्नतः स्यात् ॥ 363 ॥
samādhinānena samasta-vāsanā-granther vināśo’khila-karma-nāśaḥ · antar-bahiḥ sarvata eva sarvadā svarūpa-visphūrtir ayatnataḥ syāt
शब्दार्थ: समाधिना अनेन समस्त-वासना-ग्रन्थेः विनाशः · इस समाधि से सारी वासनाओं की गाँठ का नाश · अखिल-कर्म-नाशः · सारे कर्मों का नाश · अन्तर्-बहिः सर्वतः सर्वदा · अंदर-बाहर, हर तरफ़, हर समय · स्वरूप-विस्फूर्तिः अयत्नतः स्यात् · स्वरूप का प्रकाशन बिना यत्न के हो जाता है।
अर्थ: इस (निर्विकल्प) समाधि से सारी वासनाओं की गाँठ का नाश होता है, सारे कर्मों का नाश होता है। और अंदर-बाहर, हर तरफ़, हर समय, स्वरूप का प्रकाशन बिना यत्न के हो जाता है।
भावार्थ: गुरु निर्विकल्प समाधि का फल बताते हैं, और एक प्यारा शब्द है, “अयत्नतः”, बिना यत्न के।
पहले स्वरूप को “जानने” के लिए यत्न लगता था, विवेक, अभ्यास, समाधि। पर समाधि के बाद, स्वरूप का प्रकाशन “अयत्न” से होता है, हर समय, हर जगह। यह बहुत राहत की बात है: काम सिर्फ़ शुरू में है। एक बार वह आख़िरी “घुलना” हो गया, फिर आपको “करने” को कुछ नहीं। स्वरूप ख़ुद ही चमकता रहता है।
364 · श्रवण, मनन, निदिध्यासन, गुणा करते जाओ
श्रुतेः शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि ।
निदिंध्यासं लक्षगुणमनन्तं निर्विकल्पकम् ॥ 364 ॥
śruteḥ śata-guṇaṁ vidyān mananaṁ mananād api · nidiṁdhyāsaṁ lakṣa-guṇam anantaṁ nirvikalpakam
शब्दार्थ: श्रुतेः शत-गुणं मननम् · श्रुति (सुनने) से सौ गुना मनन (विचार) · मननात् अपि निदिध्यासं लक्ष-गुणम् · मनन से लाख गुना निदिध्यासन (गहरा ध्यान) · अनन्तं निर्विकल्पकम् · और अनंत, निर्विकल्प।
अर्थ: जानो, श्रुति (सुनने) से सौ गुना श्रेष्ठ है मनन। मनन से लाख गुना श्रेष्ठ है निदिध्यासन। और अनंत गुना श्रेष्ठ है निर्विकल्प (समाधि)।
भावार्थ: यह विवेकचूडामणि की सबसे प्रसिद्ध और सबसे प्यारी पंक्तियों में से एक है। वेदान्त की पूरी विधि, चार पायदान, एक श्लोक में।
पहला पायदान, श्रवण: सच को सुनना। दूसरा, मनन: सौ गुना श्रेष्ठ, सुनी बात पर गहरा सोचना, हर शक मिटाना। तीसरा, निदिध्यासन: लाख गुना श्रेष्ठ, उस सच में लगातार, गहरा ध्यान करना। चौथा, निर्विकल्प: अनंत गुना श्रेष्ठ, ध्यान भी “करने” वाला नहीं रहता, बस वह एक होना। यह सीढ़ी हर ऊपरी पायदान पर गहराई बढ़ाती है, सौ गुना, लाख गुना, अनंत। काम सिर्फ़ सुन कर रुक मत जाओ; ऊपर के पायदानों तक चलते रहो।
365 · निर्विकल्प समाधि से ही, साफ़, निश्चित
निर्विकल्पकसमाधिना स्फुटं ब्रह्मतत्त्वमवगम्यते ध्रुवम् ।
नान्यथा चलतया मनोगतेः प्रत्ययान्तरविमिश्रितं भवेत् ॥ 365 ॥
nirvikalpaka-samādhinā sphuṭaṁ brahma-tattvam avagamyate dhruvam · nānyathā calatayā mano-gateḥ pratyayāntara-vimiśritaṁ bhavet
शब्दार्थ: निर्विकल्पक-समाधिना स्फुटं · निर्विकल्प समाधि से साफ़ · ब्रह्म-तत्त्वम् अवगम्यते ध्रुवम् · ब्रह्म-तत्व निश्चित रूप से जाना जाता है · न अन्यथा · और किसी तरह नहीं · चलतया मनो-गतेः · मन की चलायमान गति से · प्रत्यय-अन्तर-विमिश्रितं भवेत् · दूसरे प्रत्ययों से मिला हुआ हो जाएगा।
अर्थ: निर्विकल्प समाधि से ही ब्रह्म-तत्व साफ़, निश्चित रूप से जाना जाता है। और किसी तरह नहीं। क्योंकि मन की चलायमान गति से (किसी और तरह से प्राप्त ज्ञान) दूसरे प्रत्ययों से मिला हुआ ही रहेगा।
भावार्थ: गुरु निर्विकल्प समाधि की ज़रूरत को रेखांकित करते हैं, और एक ज़रूरी बात कहते हैं।
अगर मन चल रहा है (हलचल में है), तो हर “ज्ञान” दूसरे विचारों से मिला-जुला रहेगा, शुद्ध नहीं। एक हिलते कैमरे से ली गई तस्वीर धुँधली होती है। मन के निर्विकल्प होने पर ही ब्रह्म-तत्व “स्फुटम्”, साफ़, झलकता है। तो काम मन की हलचल थमाने का है, अधिक जानकारी इकट्ठा करने का नहीं।
366 · इसलिए, समाधिस्थ हो जा
अतः समाधत्स्व यतेन्द्रियः सन् निरन्तरं शान्तमनाः प्रतीचि ।
विध्वंसय ध्वान्तमनाद्यविद्यया कृतं सदेकत्वविलोकनेन ॥ 366 ॥
ataḥ samādhatsva yatendriyaḥ san nirantaraṁ śānta-manāḥ pratīci · vidhvaṁsaya dhvāntam anādy-avidyayā kṛtaṁ sad-ekatva-vilokanena
शब्दार्थ: अतः समाधत्स्व · इसलिए समाधिस्थ हो जा · यत-इन्द्रियः सन् निरन्तरं · इन्द्रियों को संयत कर के निरंतर · शान्त-मनाः प्रतीचि · शांत मन से, भीतर · विध्वंसय ध्वान्तम् अनादि-अविद्यया कृतं · अनादि अविद्या से बनाए अँधेरे का विनाश कर · सद्-एकत्व-विलोकनेन · सत्-एकत्व के अवलोकन से।
अर्थ: इसलिए, इन्द्रियों को संयत कर के, शांत मन से, भीतर, निरंतर समाधिस्थ हो जा। और सत्-एकत्व के अवलोकन से, अनादि अविद्या से बनाए अँधेरे का विनाश कर।
भावार्थ: यह भाग 12 का समापन है, और एक सीधे आदेश पर बंद होता है।
तीन बातें गुरु जोड़ देते हैं, इन्द्रिय-संयम, शांत मन, और भीतर का रुख़। ये तीनों मिल कर समाधि की ज़मीन बनाते हैं। और इसमें “निरंतरम्” शब्द जोड़ा गया है, कभी-कभार नहीं। लगातार। यह जीने का तरीक़ा बन जाए। और काम का फल भी साफ़ है, अनादि अविद्या का अँधेरा नष्ट हो जाए। एक “अवलोकन”, सत्-एकत्व का अवलोकन, और अँधेरा गया। काम लंबा है, पर रास्ता सीधा। अगले भाग में: योग के अंग, वैराग्य के दो पंख।
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना: भाग 13, योग के अंग और वैराग्य के दो पंख। समाधि की विधि अब और साफ़ होती है, और वैराग्य को मुक्ति-महल पर चढ़ने के दो पंखों में से एक बताया जाता है।
और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 364 कहता है, श्रवण से सौ गुना मनन, मनन से लाख गुना निदिध्यासन। आज देखिए, आपका अध्यात्म कौनसे पायदान पर अटका है? सुनने पर, सोचने पर, या ध्याने पर? अगला पायदान कौनसा है?