विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 2 · साधन-चतुष्टय · श्लोक 14-31
हर मार्ग की एक तैयारी होती है। शंकराचार्य यहाँ चार साधन गिनाते हैं, विवेक, वैराग्य, छह भीतरी सम्पत्तियाँ, और मुक्ति की तड़प। यह कोई ताला खोलने वाली कुंजी नहीं, ज़मीन को ब्रह्म-विचार के योग्य बना देने वाली ईमानदार तैयारी है।
पहले एक बात
भाग 1 ने एक बात साफ़ की थी, कि मुक्ति विचार से आती है, कर्म से नहीं। तो स्वाभाविक अगला प्रश्न उठता है, उस विचार के लिए तैयार कौन है।

शंकराचार्य इसका उत्तर साधन-चतुष्टय में देते हैं, चार साधन, चार तैयारियाँ। यह कोई ऐसी परीक्षा नहीं जिसे उत्तीर्ण कर के ही भीतर प्रवेश मिले। यह उस माली की सलाह जैसा है जो कहता है, बीज तो डाल दो, पर पहले ज़मीन थोड़ी तैयार कर लो, वरना बीज पड़ा रहेगा, उगेगा नहीं।
चार साधन हैं, विवेक यानी असली और नक़ली का भेद, वैराग्य यानी नक़ली से पकड़ का ढीला पड़ना, शम-आदि छह भीतरी सम्पत्तियाँ यानी एक थमा हुआ, सधा हुआ मन, और मुमुक्षुत्व यानी छूटने की सच्ची तड़प। और भाग के अंत में एक प्यारा मोड़ आता है, भक्ति की एक ऐसी परिभाषा जो कम सुनी जाती है।
इस भाग का क्रम
श्लोक 19 चारों साधन एक साथ गिना देता है, वही नक्शा है। फिर 20 से 27 तक हर साधन की बारी-बारी परिभाषा आती है। मुख्य खंभे तीन हैं, श्लोक 20 (ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या), श्लोक 26 (समाधान और मन का बहलाना), और श्लोक 31 (भक्ति की नई परिभाषा)।
शंकराचार्य एक सीधी, ज़मीनी बात से शुरू करते हैं। फल किसी एक चीज़ पर सबसे ज़्यादा टिका है, और वह है पात्र स्वयं। सही जगह, सही समय, सही माहौल, ये सब साथ देने वाले हैं, ज़रूरी भी हैं, पर असली कारक यही नहीं। जैसे अच्छा चूल्हा और सुथरी रसोई रोटी बनने में मदद तो करते हैं, पर रोटी आख़िर बनाने वाले पर ही टिकी रहती है। माहौल पर सारा भार डाल देना यहीं रुक जाता है, क्योंकि असली काम भीतर का है। और इसीलिए, आत्म-तत्व को जानने की इच्छा जिसमें जागी हो, उसे एक दया के समुद्र, ब्रह्म के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता गुरु के पास जा कर विचार करना चाहिए। गुरु के दो गुण यहाँ गिनाए गए हैं, एक तो जिसने सच में जाना हो, दूसरा जिसके भीतर दया भी उतनी ही बहती हो। जो बहुत जाने पर ठंडा और सख़्त हो, वह गुरु नहीं। असली गुरु में ज्ञान और करुणा साथ-साथ बहते हैं।
14 · 15
अधिकारिणमाशास्ते फलसिद्धिर्विशेषतः ।
उपाया देशकालाद्याः सन्त्यस्मिन्सहकारिणः ॥ 14 ॥
अतो विचारः कर्तव्यो जिज्ञासोरात्मवस्तुनः ।
समासाद्य दयासिन्धुं गुरुं ब्रह्मविदुत्तमम् ॥ 15 ॥
अब प्रश्न यह कि पात्र कैसा हो। शंकराचार्य कहते हैं, तेज़ बुद्धि वाला, समझदार, और एक ख़ास गुण से युक्त, किसी बात के पक्ष और विपक्ष, दोनों को तौल पाने में निपुण। यानी जो आँख मूँद कर मान भी न ले, और आँख मूँद कर ठुकरा भी न दे। अद्वैत वेदान्त अंध-श्रद्धा नहीं माँगता, वह सोचने वाले, प्रश्न करने वाले व्यक्ति को बुलाता है, बस शर्त इतनी कि सोच ईमानदार हो, दोनों ओर देखने वाली। फिर शंकराचार्य चारों साधन एक साँस में गिना देते हैं, जिसमें विवेक हो, वैराग्य हो, शम आदि गुण हों, और जो मुमुक्षु हो, ऐसे ही व्यक्ति की ब्रह्म-जिज्ञासा के लिए पात्रता मानी गई है। शब्द ही पर बात टिकी है, ऐसे ही व्यक्ति की। यह सख़्त लगता है, पर डराने वाली शर्त नहीं, सीधी सच्चाई है, जैसे तैरना सीखना हो तो पानी में उतरना ही पड़ेगा। और ये चार कोई सजावट नहीं, मनीषियों ने इन्हें इसलिए गिनाया कि इनके होने पर ही दृढ़ निष्ठा बनती है, अभाव में कुछ सिद्ध नहीं होता। दलदली ज़मीन पर दीवारें खड़ी तो की जा सकती हैं, पर टिकेंगी नहीं। ये चार वही ठोस ज़मीन हैं, जिस पर विचार का घर खड़ा रह पाता है।
16 · 17 · 18
मेधावी पुरुषो विद्वानुहापोहविचक्षणः ।
अधिकार्यात्मविद्यायामुक्तलक्षणलक्षितः ॥ 16 ॥
विवेकिनो विरक्तस्य शमादिगुणशालिनः ।
मुमुक्षोरेव हि ब्रह्मजिज्ञासायोग्यता मता ॥ 17 ॥
साधनान्यत्र चत्वारि कथितानि मनीषिभिः ।
येषु सत्स्वेव सन्निष्ठा यदभावे न सिध्यति ॥ 18 ॥
अब चारों का नक्शा खुलता है, और इसमें क्रम मायने रखता है। सबसे पहले नित्य और अनित्य का विवेक, फिर इस लोक और परलोक, दोनों के भोगों से वैराग्य, फिर शम आदि छह की सम्पत्ति, और अंत में मुमुक्षुत्व। एक से दूसरा अपने आप उतरता है। जब तक असली और नक़ली का भेद न दिखे, बाक़ी कुछ नहीं हो सकता। विवेक से वैराग्य अपने आप आता है, नक़ली पर पकड़ ख़ुद ढीली पड़ने लगती है। पकड़ ढीली हो, तो मन सधने लगता है, और जब मन सध जाए, तब वह आख़िरी, सबसे साफ़ चाह उठती है, छूट जाने की तड़प। यह एक सीढ़ी है। और पहली ही सीढ़ी, विवेक, अद्वैत की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति में बँधी है, ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, इस रूप का दृढ़ निश्चय ही नित्य-अनित्य का विवेक कहा गया है। यहीं सबसे ज़्यादा भ्रम भी होता है। जगत मिथ्या का अर्थ यह नहीं कि दुनिया है ही नहीं, या सब स्वप्न है। मिथ्या का असली अर्थ है, जो अपने बल पर खड़ा नहीं, जो बदलता रहता है, जो किसी और पर टिका है। समुंदर सच्चा है, नित्य; लहर अनित्य, इसलिए नहीं कि लहर दिखती नहीं, बल्कि इसलिए कि उसका अपना कोई अलग, टिकने वाला अस्तित्व नहीं, वह समुंदर के बिना एक पल भी नहीं रह सकती। जगत असली है, पर उधार की असलियत वाला, वह ब्रह्म पर टिका है। विवेक यानी यही भेद बार-बार साफ़ देख पाना, कौन ख़ुद से है, और कौन उधार पर।
19 · 20
आदौ नित्यानित्यवस्तुविवेकः परिगम्यते ।
इहामुत्रफलभोगविरागस्तदनन्तरम्
शमादिषट्कसम्पत्तिर्मुमुक्षुत्वमिति स्फुटम् ॥ 19 ॥
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चयः ।
सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेकः समुदाहृतः ॥ 20 ॥
विवेक के बाद वैराग्य की बारी है, और इसकी परिभाषा में एक बात ध्यान खींचती है, शरीर से ले कर ब्रह्मलोक तक। यानी सबसे मामूली सुख से ले कर सबसे ऊँचे, स्वर्गीय सुख तक, हर अनित्य भोग्य वस्तु में, देखने-सुनने के अनुभव से जो छोड़ देने की इच्छा जागती है, वही वैराग्य है। लोग प्रायः सोचते हैं कि वैराग्य का अर्थ है सांसारिक चीज़ें छोड़ कर बेहतर, आध्यात्मिक इनामों के पीछे भागना, स्वर्ग, पुण्य, ऊँचे लोक। शंकराचार्य कहते हैं, वे भी अनित्य हैं, वे भी भोग ही हैं। वैराग्य किसी बेहतर सौदे की तलाश नहीं, यह इस पूरी सौदेबाज़ी से ही पकड़ का ढीला पड़ना है, और यह ध्यान से देख कर, स्वयं अनुभव कर के आता है, ज़बरदस्ती से नहीं। फिर छह भीतरी सम्पत्तियाँ शुरू होती हैं, और पहली है शम, एक थमा हुआ मन। बार-बार विषयों के दोष देख कर, उनसे विरक्त हो कर, मन का अपने लक्ष्य पर टिका रहना ही शम है। शंकराचार्य इसे ज़बरदस्ती से नहीं लाते, वे कहते हैं बार-बार दोष देख कर। बच्चे से खिलौना छीन लो तो वह रोएगा, पर अगर उसे स्वयं दिख जाए कि खिलौना टूटा है, तो वह अपने आप छोड़ देता है। शम ज़बरदस्ती की शांति नहीं, समझ से आई शांति है। फिर दम और उपरति। ज्ञान और कर्म, दोनों तरह की इन्द्रियों को विषयों से लौटा कर उनकी अपनी जगह बिठा देना दम है, और मन की वृत्ति का बाहरी सहारों पर न टिकना श्रेष्ठ उपरति है। शम भीतर मन को सँभालता है, दम बाहर इन्द्रियों को, और उपरति इससे भी गहरी है, मन को बाहर की कोई बैसाखी नहीं चाहिए, वह अपने पैरों खड़ा रह सकता है।
21 · 22 · 23
तद्वैराग्यं जिहासा या दर्शनश्रवणादिभिः ।
देहादिब्रह्मपर्यन्ते ह्यनित्ये भोगवस्तुनि ॥ 21 ॥
विरज्य विषयव्राताद्दोषदृष्ट्या मुहुर्मुहुः ।
स्वलक्ष्ये नियतावस्था मनसः शम उच्यते ॥ 22 ॥
विषयेभ्यः परावर्त्य स्थापनं स्वस्वगोलके ।
उभयेषामिन्द्रियाणां स दमः परिकीर्तितः
बाह्यानालम्बनं वृत्तेरेषोपरतिरुत्तमा ॥ 23 ॥
चौथी सम्पत्ति तितिक्षा है, और इसे सहज ही ग़लत समझा जा सकता है, कि बस दाँत भींच कर सब झेलते रहो। पर शंकराचार्य की परिभाषा में दो शब्द इसे बचा लेते हैं, बिना चिंता और बिना रोना-धोना। सब दुखों को बिना पलटवार किए, बिना चिंता और विलाप के सह लेना ही तितिक्षा है। असली तितिक्षा गुस्से में दबाया हुआ सहना नहीं, वह तो भीतर ही भीतर उबलता रहता है। यह वह है जहाँ दुख आता है, और उसे आने दिया जाता है, एक खुली हथेली की तरह, बारिश पड़े तो पड़ने दो, मुट्ठी मत भींचो। यह कमज़ोरी नहीं, गहरी ताक़त है। फिर श्रद्धा, जिसे प्रायः अंध-विश्वास समझ लिया जाता है। पर शंकराचार्य का शब्द है सच्चाई की समझ के साथ। शास्त्र और गुरु के वचन को इसी समझ के साथ ग्रहण करना श्रद्धा है, और इसी से असली चीज़ पाई जाती है। किसी अनजान शहर का नक़्शा देख कर आदमी निकल पड़ता है, भरोसा इसलिए नहीं कि वह कोई पूज्य वस्तु है, बल्कि इसलिए कि उस पर चले बिना पहुँचा ही नहीं जा सकता, और रास्ते में हर मोड़ पर वह सही निकलता जाता है। प्रश्न करना और श्रद्धा रखना, दोनों साथ चलते हैं। और छठी, आख़िरी सम्पत्ति है समाधान, जिसमें शंकराचार्य एक तीखी बात जोड़ देते हैं। बुद्धि को हमेशा शुद्ध ब्रह्म पर टिकाए रखना समाधान है, मन को बहला-फुसला कर रखना नहीं। मन को दुलार-दुलार कर, उसकी हर माँग पूरी कर के एक नक़ली शांति में रखना, यह समाधान नहीं। समाधान कोई सुख-चैन की अवस्था नहीं, वह एक टिकाव है, बुद्धि का बार-बार, हर बार, उसी एक सत्य पर लौट आना।
24 · 25 · 26
सहनं सर्वदुःखानामप्रतीकारपूर्वकम् ।
चिन्ताविलापरहितं सा तितिक्षा निगद्यते ॥ 24 ॥
शास्त्रस्य गुरुवाक्यस्य सत्यबुद्ध्यवधारणम् ।
सा श्रद्धा कथिता सद्भिर्यया वस्तूपलभ्यते ॥ 25 ॥
सर्वदा स्थापनं बुद्धेः शुद्धे ब्रह्मणि सर्वदा ।
तत्समाधानमित्युक्तं न तु चित्तस्य लालनम् ॥ 26 ॥
अब चौथा और आख़िरी साधन, मुमुक्षुता। शंकराचार्य बंधन को कहते हैं अज्ञान से गढ़ा हुआ, यानी ये बंधन असली नहीं। अहंकार से ले कर शरीर तक के, अज्ञान से गढ़े हुए सब बंधनों से, अपने असली रूप के बोध के ज़रिए छूट जाने की इच्छा ही मुमुक्षुता है। और इसीलिए छूटने का तरीक़ा भी ख़ास है, अपने असली रूप को जान कर। बंधन तोड़े नहीं जाते, वे देख लेने से ग़ायब हो जाते हैं, क्योंकि वे थे ही नहीं, बस एक भ्रम था। मुमुक्षुता यानी इसी एक चीज़ की सच्ची, जलती हुई चाह। पर यहाँ शंकराचार्य नरम भी पड़ जाते हैं, और यह भाग का सबसे राहत भरा वचन है। मुक्ति की यह तड़प अभी कमज़ोर हो, मँझले दर्जे की हो, तो भी कोई बात नहीं, वैराग्य से, शम आदि से, और गुरु की कृपा से वह बढ़ कर फल देने लगती है। एक छोटा सा पौधा भी पानी, धूप और माली की देखभाल पा कर बढ़ता है। तैयारी पूरी हो कर आरम्भ नहीं होती, वह चलते-चलते बढ़ती है, जहाँ साधक है वहीं से।
27 · 28
अहंकारादिदेहान्तान् बन्धानज्ञानकल्पितान् ।
स्वस्वरूपावबोधेन मोक्तुमिच्छा मुमुक्षुता ॥ 27 ॥
मन्दमध्यमरूपापि वैराग्येण शमादिना ।
प्रसादेन गुरोः सेयं प्रवृद्धा सूयते फलम् ॥ 28 ॥
अब शंकराचार्य एक बारीक बात कहते हैं। चारों साधनों में से दो, वैराग्य और मुमुक्षुत्व, चलाने वाली शक्ति हैं, बाक़ी शम-आदि छह उनके बिना चल नहीं पाते। जिसमें ये दोनों तेज़ हों, उसी में शम आदि गुण सार्थक और फलदायी होते हैं। कोई मन को साधने का अभ्यास करता रहे, पर भीतर सच में छूटना न चाहता हो, तो वह अभ्यास बस एक और काम बन जाता है, एक खाली कसरत। पर भीतर तड़प हो, सच में, तीव्रता से, तो वही अभ्यास जीवित हो उठता है। तड़प चलाने वाली शक्ति है, अभ्यास उसके पहिये, और पहिये अकेले कहीं नहीं ले जाते। इसी का दूसरा पहलू एक बेहद सुंदर तस्वीर के साथ आता है, रेगिस्तान की मरीचिका। जहाँ ये दोनों कमज़ोर हों, वहाँ शम आदि गुण रेगिस्तान में पानी की तरह बस दिखावा भर रह जाते हैं। मरीचिका में पानी दिखता तो है, चमकता भी है, पर पास जाएँ तो कुछ नहीं। भीतर सच्ची तड़प न हो, तो शांति, संयम, अभ्यास, सब उसी मरीचिका जैसा है, दूर से सच्चा लगता है, पर उसमें प्यास बुझाने वाला कुछ नहीं। और अंत में शंकराचार्य एक प्यारा, चौंकाने वाला मोड़ देते हैं। मुक्ति के साधनों की पूरी सामग्री में भक्ति ही सबसे बड़ी है, और भक्ति किसे कहते हैं, अपने असली रूप का अनुसंधान, उसी में बार-बार लौटना, उसी में ठहरना। भक्ति शब्द सुन कर मन में मंदिर, आरती, प्रेम से भरा भक्त, आँसू, गीत, ऐसी तस्वीर उठती है। शंकराचार्य उससे इनकार नहीं करते, पर एक और परत खोल देते हैं। यदि परमात्मा साधक से अलग नहीं, यदि वह उसका ही गहरा स्वरूप है, तो उससे प्रेम करना, उसकी ओर बार-बार लौटना, और अपने सच्चे स्वरूप में ठहरना, ये अलग-अलग काम नहीं रहते, एक ही काम हो जाते हैं। यहीं भक्ति और ज्ञान मिल जाते हैं। और इसी भाव से युक्त हो कर अगला भाग शिष्य को गुरु के सामने ले जाता है, जहाँ असली बातचीत आरम्भ होती है।
29 · 30 · 31
वैराग्यं च मुमुक्षुत्वं तीव्रं यस्य तु विद्यते ।
तस्मिन्नेवार्थवन्तः स्युः फलवन्तः शमादयः ॥ 29 ॥
एतयोर्मन्दता यत्र विरक्तत्वमुमुक्षयोः ।
मरौ सलीलवत्तत्र शमादेर्भानमात्रता ॥ 30 ॥
मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी ।
स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते ॥ 31 ॥
आगे का भाग
सीधा अगला पन्ना, भाग 3 · गुरु की शरण। तैयारी हो चुकी, अब शिष्य गुरु के सामने पहुँचता है। गुरु कैसा हो, शिष्य क्या पूछे, और बंधन आख़िर है क्या, यहीं से ग्रंथ की असली बातचीत आरम्भ होती है।
श्लोक 26 की बात इसी ओर ले जाती है, कि समाधान मन को बहलाना नहीं। मन का लालन और समाधान का भेद पहचान लेना ही विवेक की शुरुआत है, और वही विवेक भाग 3 के द्वार पर शिष्य को खड़ा करता है।