भाग 2 · साधन-चतुष्टय

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 2 · साधन-चतुष्टय · श्लोक 14-31

हर रास्ते की एक तैयारी होती है। शंकराचार्य यहाँ चार चीज़ें गिनाते हैं, विवेक, वैराग्य, छह भीतरी सम्पत्तियाँ, और मुक्ति की तड़प। इसे एक ईमानदार checklist की तरह पढ़िए, किसी दरवाज़े के ताले की तरह नहीं।

18 श्लोक · पढ़ने का समय ~ 28 मिनट · पहले पढ़ें: भाग 1 · दुर्लभ जन्म · आगे-पीछे: विवेकचूडामणि मुख्य पृष्ठ

पहले एक बात

भाग 1 ने एक बात साफ़ की: मुक्ति विचार से आती है, कर्म से नहीं। तो स्वाभाविक अगला सवाल, वह विचार करने के लिए तैयार कौन है?

शंकराचार्य इसका जवाब “साधन-चतुष्टय” में देते हैं, चार साधन, चार तैयारियाँ। और यहाँ एक बात पहले ही समझ लीजिए: यह कोई परीक्षा नहीं है जिसे पास कर के ही भीतर घुसने मिलेगा। यह उस माली की सलाह जैसा है जो कहता है, बीज तो डाल दो, पर पहले ज़मीन थोड़ी तैयार कर लो, वरना बीज पड़ा रहेगा, उगेगा नहीं।

चार साधन हैं: विवेक (असली-नक़ली में फ़र्क), वैराग्य (नक़ली से पकड़ ढीली होना), शम-आदि छह भीतरी सम्पत्तियाँ (एक थमा हुआ, सधा हुआ मन), और मुमुक्षुत्व (छूटने की सच्ची तड़प)। और भाग के अंत में एक प्यारा मोड़, भक्ति की एक ऐसी परिभाषा जो शायद आपने पहले न सुनी हैं।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। श्लोक 19 चारों साधन एक साथ गिना देता है, वह नक्शा है। फिर 20 से 27 तक हर साधन की बारी-बारी परिभाषा। असली खंभे: 20 (ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या), 26 (समाधान बनाम मन को बहलाना), 31 (भक्ति की नई परिभाषा)। हर श्लोक पर anchor है।

14 · असली कारक है पात्र

अधिकारिणमाशास्ते फलसिद्धिर्विशेषतः ।
उपाया देशकालाद्याः सन्त्यस्मिन्सहकारिणः ॥ 14 ॥

adhikāriṇam āśāste phala-siddhir viśeṣataḥ · upāyā deśa-kālādyāḥ santy asmin sahakāriṇaḥ

शब्दार्थ: अधिकारिणम् · पात्र, योग्य व्यक्ति को · आशास्ते · चाहती है, अपेक्षा रखती है · फल-सिद्धिः · फल का मिलना · विशेषतः · ख़ास तौर पर · उपायाः · साधन · देश-काल-आदयः · जगह, समय आदि · सहकारिणः · मददगार।

अर्थ: फल का मिलना ख़ास तौर पर एक योग्य पात्र की अपेक्षा रखता है। जगह, समय वग़ैरह जो साधन हैं, वे तो बस इसमें मददगार भर हैं।

भावार्थ: शंकराचार्य एक सीधी, व्यावहारिक बात से शुरू करते हैं। नतीजा किस पर टिका है? “देश-काल” यानी सही जगह, सही वक़्त, सही माहौल, ये सब मददगार हैं, ज़रूरी हैं। पर असली कारक एक ही है: पात्र, यानी आप।

एक मिसाल, एक बढ़िया oven, अच्छी रसोई, सही समय, ये सब रोटी बनने में मदद करते हैं। पर रोटी फिर भी बनाने वाले पर टिकी है। शंकराचार्य कह रहे हैं: माहौल को दोष देना बंद कीजिए। तैयारी का असली काम भीतर है। और बाक़ी का यह भाग वही तैयारी है।

15 · इसलिए, विचार, गुरु के साथ

अतो विचारः कर्तव्यो जिज्ञासोरात्मवस्तुनः ।
समासाद्य दयासिन्धुं गुरुं ब्रह्मविदुत्तमम् ॥ 15 ॥

ato vicāraḥ kartavyo jijñāsor ātma-vastunaḥ · samāsādya dayā-sindhuṁ guruṁ brahma-vid-uttamam

शब्दार्थ: विचारः कर्तव्यः · विचार करना चाहिए · जिज्ञासोः · जानने के इच्छुक का · आत्म-वस्तुनः · आत्म-तत्व का · समासाद्य · पास जा कर · दया-सिन्धुं · दया का समुद्र · ब्रह्म-विद्-उत्तमम् · ब्रह्म के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता।

अर्थ: इसलिए, आत्म-तत्व को जानने के इच्छुक को विचार करना चाहिए, एक दया के समुद्र, ब्रह्म के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता गुरु के पास जा कर।

भावार्थ: भाग 1 का “विचार” यहाँ फिर आता है, पर अब एक शर्त के साथ, गुरु के पास जा कर। और गुरु के दो गुण गिनाए गए हैं, ध्यान से देखिए। एक, “ब्रह्म-विद्-उत्तम”, यानी जिसने सच में जाना हो। दो, “दया-सिन्धु”, दया का समुद्र।

दूसरा गुण पहले से कम ज़रूरी नहीं। एक ऐसा इंसान जो बहुत जानता हैं पर ठंडा हो, सख़्त हो, वह गुरु नहीं। शंकराचार्य कहते हैं असली गुरु में ज्ञान और दया, दोनों एक साथ बहते हैं। आगे श्लोक 33 में वे गुरु का पूरा चित्र खींचेंगे।

16 · पात्र कैसा हो

मेधावी पुरुषो विद्वानुहापोहविचक्षणः ।
अधिकार्यात्मविद्यायामुक्तलक्षणलक्षितः ॥ 16 ॥

medhāvī puruṣo vidvān ūhāpoha-vicakṣaṇaḥ · adhikāry ātma-vidyāyām ukta-lakṣaṇa-lakṣitaḥ

शब्दार्थ: मेधावी · तेज़ बुद्धि वाला · विद्वान् · समझदार · ऊह-अपोह-विचक्षणः · पक्ष-विपक्ष तौलने में निपुण · अधिकारी · पात्र · आत्म-विद्यायाम् · आत्म-ज्ञान में · उक्त-लक्षण-लक्षितः · बताए हुए लक्षणों से पहचाना हुआ।

अर्थ: तेज़ बुद्धि वाला, समझदार, पक्ष और विपक्ष दोनों तौल लेने में निपुण, और आगे बताए जा रहे लक्षणों से युक्त व्यक्ति, आत्म-विद्या का पात्र है।

भावार्थ: एक शब्द यहाँ बहुत प्यारा है, “ऊह-अपोह।” इसका मतलब है किसी बात के पक्ष और विपक्ष, दोनों को तौल पाना। यानी जो आँख मूँद कर मान न ले, और आँख मूँद कर ठुकरा भी न दे।

यह एक राहत भरी बात है। अद्वैत वेदान्त अंध-श्रद्धा नहीं माँगता। यह सोचने वाले, सवाल करने वाले इंसान को बुलाता है। बस शर्त यह है कि सोच ईमानदार हो, दोनों तरफ़ देखने वाली, सिर्फ़ अपनी पसंद की दलील ढूँढने वाली नहीं।

17 · चार के बिना नहीं

विवेकिनो विरक्तस्य शमादिगुणशालिनः ।
मुमुक्षोरेव हि ब्रह्मजिज्ञासायोग्यता मता ॥ 17 ॥

vivekino viraktasya śamādi-guṇa-śālinaḥ · mumukṣor eva hi brahma-jijñāsā-yogyatā matā

शब्दार्थ: विवेकिनः · विवेक वाले का · विरक्तस्य · वैराग्य वाले का · शम-आदि-गुण-शालिनः · शम आदि गुणों से युक्त का · मुमुक्षोः · मुक्ति चाहने वाले का · ब्रह्म-जिज्ञासा-योग्यता · ब्रह्म को जानने की पात्रता · मता · मानी गई है।

अर्थ: जिसमें विवेक हो, वैराग्य हो, शम आदि गुण हों, और जो मुमुक्षु हो, ऐसे ही व्यक्ति की ब्रह्म-जिज्ञासा के लिए पात्रता मानी गई है।

भावार्थ: यह श्लोक चारों साधन एक साँस में नाम ले देता है, विवेक, वैराग्य, शम-आदि, मुमुक्षुत्व। अगले श्लोकों में हर एक की बारी-बारी बात होगी।

शब्द “एव” (ही) पर ध्यान दीजिए, “ऐसे ही व्यक्ति की।” यह सख़्त लगता है। पर इसे डराने वाली बात मत समझिए, एक ईमानदार बात समझिए। यह वैसा ही है जैसे कोई कहे, “तैरना सीखना है तो पानी में उतरना ही पड़ेगा।” शर्त नहीं। सच है। तैयारी के बिना यह विचार बस सिर में घूमता रहेगा, भीतर उतरेगा नहीं।

18 · चार साधन

साधनान्यत्र चत्वारि कथितानि मनीषिभिः ।
येषु सत्स्वेव सन्निष्ठा यदभावे न सिध्यति ॥ 18 ॥

sādhanāny atra catvāri kathitāni manīṣibhiḥ · yeṣu satsv eva sanniṣṭhā yad-abhāve na sidhyati

शब्दार्थ: साधनानि चत्वारि · चार साधन · कथितानि · कहे गए हैं · मनीषिभिः · मनीषियों द्वारा · येषु सत्सु एव · जिनके होने पर ही · सन्निष्ठा · दृढ़ निष्ठा · यद्-अभावे · जिनके अभाव में · न सिध्यति · सिद्ध नहीं होता।

अर्थ: मनीषियों ने यहाँ चार साधन बताए हैं, जिनके होने पर ही दृढ़ निष्ठा बनती है, और जिनके अभाव में कुछ सिद्ध नहीं होता।

भावार्थ: शंकराचार्य एक ज़रूरी बात कहते हैं, ये चार “होने पर ही” निष्ठा बनती है, “अभाव में” कुछ नहीं बनता। यानी ये चार कोई सजावट नहीं। नींव हैं।

एक तस्वीर, आप किसी ज़मीन पर घर बनाना चाहें, पर ज़मीन दलदली हो। आप दीवारें खड़ी कर सकते हैं, पर वे टिकेंगी नहीं। पहले ज़मीन को ठोस करना होंगे। ये चार साधन वही ठोस ज़मीन हैं, जिस पर “विचार” का घर खड़ा रह पाता है।

19 · चारों का नक्शा

आदौ नित्यानित्यवस्तुविवेकः परिगम्यते ।
इहामुत्रफलभोगविरागस्तदनन्तरम्
शमादिषट्कसम्पत्तिर्मुमुक्षुत्वमिति स्फुटम् ॥ 19 ॥

ādau nityānitya-vastu-vivekaḥ parigamyate · ihāmutra-phala-bhoga-virāgas tad-anantaram · śamādi-ṣaṭka-sampattir mumukṣutvam iti sphuṭam

शब्दार्थ: आदौ · सबसे पहले · नित्य-अनित्य-वस्तु-विवेकः · नित्य और अनित्य का भेद · इह-अमुत्र-फल-भोग-विराग · इस लोक और परलोक के भोगों से वैराग्य · शम-आदि-षट्क-सम्पत्तिः · शम आदि छह की सम्पत्ति · मुमुक्षुत्वम् · मुक्ति की तड़प।

अर्थ: सबसे पहले नित्य और अनित्य वस्तु का विवेक; उसके बाद इस लोक और परलोक, दोनों के भोगों से वैराग्य; फिर शम आदि छह की सम्पत्ति; और मुमुक्षुत्व, ये चार साफ़ बताए गए हैं।

भावार्थ: यह भाग का नक्शा है, और गौर कीजिए, चारों एक क्रम में हैं, और क्रम मायने रखता है।

पहले विवेक, जब तक असली-नक़ली का फ़र्क न दिखे, बाक़ी कुछ नहीं हो सकता। विवेक से वैराग्य अपने आप आता है,तो उसकी पकड़ ख़ुद ढीली होने लगती है। पकड़ ढीली हो, तो मन सधने लगता है (शम-आदि छह)। और जब मन सध जाए, तो वह आख़िरी, सबसे साफ़ चाह उठती है, मुमुक्षुत्व, छूट जाने की तड़प। एक से दूसरा, दूसरे से तीसरा। यह सीढ़ी है।

20 · विवेक, ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चयः ।
सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेकः समुदाहृतः ॥ 20 ॥

brahma satyaṁ jagan mithyety evaṁ-rūpo viniścayaḥ · so’yaṁ nityānitya-vastu-vivekaḥ samudāhṛtaḥ

शब्दार्थ: ब्रह्म सत्यं · ब्रह्म सत्य है · जगत् मिथ्या · जगत मिथ्या है · एवं-रूपः विनिश्चयः · इस रूप का दृढ़ निश्चय · नित्य-अनित्य-वस्तु-विवेकः · नित्य-अनित्य का विवेक · समुदाहृतः · कहा गया है।

अर्थ: “ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है”, इस रूप का दृढ़ निश्चय, यही नित्य और अनित्य वस्तु का विवेक कहा गया है।

भावार्थ: यह अद्वैत वेदान्त की सबसे मशहूर पंक्ति है, और सबसे ज़्यादा ग़लत समझी जाने वाली भी। “जगत मिथ्या” का मतलब यह नहीं कि दुनिया है ही नहीं। कि सब सपना है, कि किसी चीज़ की परवाह मत करो। यह बात नहीं।

“मिथ्या” का असली अर्थ है, जो अपने बल पर खड़ा नहीं। जो बदलता रहता है, जो किसी और पर टिका है। एक उदाहरण: समुंदर सच्चा है (नित्य), लहर मिथ्या (अनित्य), इसलिए नहीं कि लहर दिखती नहीं। बल्कि इसलिए कि लहर का अपना कोई अलग, टिकने वाला अस्तित्व नहीं; वह समुंदर के बिना एक पल भी नहीं रह सकती। जगत असली है, पर उधार की असलियत वाला, वह ब्रह्म पर टिका है। विवेक यानी यह फ़र्क साफ़-साफ़, बार-बार देख पाना: कौन ख़ुद से है, और कौन उधार पर।

21 · वैराग्य

तद्वैराग्यं जिहासा या दर्शनश्रवणादिभिः ।
देहादिब्रह्मपर्यन्ते ह्यनित्ये भोगवस्तुनि ॥ 21 ॥

tad vairāgyaṁ jihāsā yā darśana-śravaṇādibhiḥ · dehādi-brahma-paryante hy anitye bhoga-vastuni

शब्दार्थ: वैराग्यं · वैराग्य · जिहासा · छोड़ देने की इच्छा · दर्शन-श्रवण-आदिभिः · देखने, सुनने आदि से · देह-आदि-ब्रह्म-पर्यन्ते · शरीर से ले कर ब्रह्मलोक तक · अनित्ये भोग-वस्तुनि · अनित्य भोग्य वस्तुओं में।

अर्थ: शरीर से ले कर ब्रह्मलोक तक, हर अनित्य भोग्य वस्तु में, देखने-सुनने आदि के अनुभव से जो छोड़ देने की इच्छा जागती है, वही वैराग्य है।

भावार्थ: वैराग्य की परिभाषा में एक बात गौर करने लायक़ है, “देह से ले कर ब्रह्मलोक तक।” यानी सबसे मामूली सुख से ले कर सबसे ऊँचे, स्वर्गीय सुख तक, सब इसमें शामिल हैं।

यह क्यों ज़रूरी है? क्योंकि लोग अक्सर सोचते हैं वैराग्य का मतलब है सांसारिक चीज़ें छोड़ कर “बेहतर,” आध्यात्मिक इनामों के पीछे भागना, स्वर्ग, पुण्य, ऊँचे लोक। शंकराचार्य कहते हैं, नहीं। वे भी अनित्य हैं, वे भी भोग ही हैं। वैराग्य किसी बेहतर सौदे की तलाश नहीं है; यह इस पूरे सौदे-बाज़ी से ही पकड़ ढीली होना है। और यह “देखने-सुनने से” आता है, यानी ध्यान से देख कर, ख़ुद अनुभव कर के, ज़बरदस्ती से नहीं।

22 · शम

विरज्य विषयव्राताद्दोषदृष्ट्या मुहुर्मुहुः ।
स्वलक्ष्ये नियतावस्था मनसः शम उच्यते ॥ 22 ॥

virajya viṣaya-vrātād doṣa-dṛṣṭyā muhur muhuḥ · sva-lakṣye niyatāvasthā manasaḥ śama ucyate

शब्दार्थ: विरज्य · विरक्त हो कर · विषय-व्रातात् · विषयों के समूह से · दोष-दृष्ट्या · दोष देखने की दृष्टि से · मुहुर्मुहुः · बार-बार · स्व-लक्ष्ये · अपने लक्ष्य पर · नियत-अवस्था · टिकी हुई स्थिति · शमः · शम।

अर्थ: बार-बार विषयों के दोष देख कर, उनके समूह से विरक्त हो कर, मन का अपने लक्ष्य पर टिका रहना, यही शम कहा जाता है।

भावार्थ: अब छह भीतरी सम्पत्तियाँ शुरू होती हैं, और पहली है शम, एक थमा हुआ मन।

पर ध्यान दीजिए शंकराचार्य शम को कैसे लाते हैं। वे यह नहीं कहते “मन को ज़बरदस्ती पकड़ कर बिठाओ।” वे कहते हैं, “बार-बार दोष देख कर।” यानी मन तब टिकता है जब उसे ख़ुद दिख जाए कि भागने में कुछ रखा नहीं। एक बच्चे से खिलौना छीन लो तो वह रोएगा; पर अगर उसे ख़ुद दिख जाए कि खिलौना टूटा हुआ है, तो वह अपने आप छोड़ देगा। शम ज़बरदस्ती की शांति नहीं। समझ से आई शांति है।

23 · दम और उपरति

विषयेभ्यः परावर्त्य स्थापनं स्वस्वगोलके ।
उभयेषामिन्द्रियाणां स दमः परिकीर्तितः
बाह्यानालम्बनं वृत्तेरेषोपरतिरुत्तमा ॥ 23 ॥

viṣayebhyaḥ parāvartya sthāpanaṁ sva-sva-golake · ubhayeṣām indriyāṇāṁ sa damaḥ parikīrtitaḥ · bāhyānālambanaṁ vṛtter eṣoparatir uttamā

शब्दार्थ: विषयेभ्यः परावर्त्य · विषयों से लौटा कर · स्व-स्व-गोलके स्थापनं · अपनी-अपनी जगह पर बिठाना · उभयेषाम् इन्द्रियाणाम् · दोनों तरह की इन्द्रियों का · दमः · दम · बाह्य-अनालम्बनं वृत्तेः · मन की वृत्ति का बाहरी सहारे न लेना · उपरतिः उत्तमा · श्रेष्ठ उपरति।

अर्थ: ज्ञान और कर्म, दोनों तरह की इन्द्रियों को विषयों से लौटा कर उनकी अपनी-अपनी जगह बिठा देना, यह दम कहा गया है। और मन की वृत्ति का बाहरी सहारों पर न टिकना, यह श्रेष्ठ उपरति है।

भावार्थ: शम और दम का फ़र्क बारीक है, और प्यारा है। शम मन को सँभालता है, भीतर। दम इन्द्रियों को सँभालता है, आँख, कान, हाथ, ज़बान। शम सेनापति है, दम सिपाही।

और उपरति? वह और गहरी है, मन का बाहरी सहारों पर निर्भर न रहना। ज़्यादातर वक़्त हमारा मन किसी न किसी बाहरी चीज़ का सहारा ढूँढता है, phone, बातचीत, कोई आवाज़, कोई काम। उपरति वह स्थिति है जहाँ मन को बाहर की बैसाखी नहीं चाहिए; वह अपने पैरों खड़ा रह सकता है।

24 · तितिक्षा

सहनं सर्वदुःखानामप्रतीकारपूर्वकम् ।
चिन्ताविलापरहितं सा तितिक्षा निगद्यते ॥ 24 ॥

sahanaṁ sarva-duḥkhānām apratīkāra-pūrvakam · cintā-vilāpa-rahitaṁ sā titikṣā nigadyate

शब्दार्थ: सहनं · सहना · सर्व-दुःखानाम् · सब दुखों का · अप्रतीकार-पूर्वकम् · बिना पलटवार किए · चिन्ता-विलाप-रहितं · चिंता और रोना-धोना छोड़ कर · तितिक्षा · तितिक्षा।

अर्थ: सब दुखों को बिना पलटवार किए, बिना चिंता और रोना-धोना किए सह लेना, यही तितिक्षा कही जाती है।

भावार्थ: तितिक्षा को आसानी से ग़लत समझा जा सकता है, कि बस दाँत भींच कर सब झेलते रहो। पर शंकराचार्य की परिभाषा में दो शब्द इसे बचा लेते हैं: “चिंता और विलाप के बिना।”

यानी असली तितिक्षा गुस्से में दबाया हुआ सहना नहीं। वह तो भीतर ही भीतर उबलता रहता है। असली तितिक्षा वह है जहाँ दुख आता है, और आप उसे आने देते हैं, बिना उसके ख़िलाफ़ लड़े और बिना उस पर रोए। एक खुली हथेली की तरह, बारिश पड़े तो पड़ने दो, मुट्ठी मत भींचो। यह कमज़ोरी नहीं; यह एक गहरी ताक़त है।

25 · श्रद्धा

शास्त्रस्य गुरुवाक्यस्य सत्यबुद्ध्यवधारणम् ।
सा श्रद्धा कथिता सद्भिर्यया वस्तूपलभ्यते ॥ 25 ॥

śāstrasya guru-vākyasya satya-buddhy-avadhāraṇam · sā śraddhā kathitā sadbhir yayā vastūpalabhyate

शब्दार्थ: शास्त्रस्य · शास्त्र का · गुरु-वाक्यस्य · गुरु के वचन का · सत्य-बुद्धि-अवधारणम् · सच्चाई की समझ के साथ ग्रहण करना · श्रद्धा · श्रद्धा · सद्भिः · सज्जनों द्वारा · यया वस्तु उपलभ्यते · जिससे असली चीज़ पाई जाती है।

अर्थ: शास्त्र और गुरु के वचन को सच्चाई की समझ के साथ ग्रहण करना, सज्जनों ने इसे श्रद्धा कहा है, और इसी से असली चीज़ पाई जाती है।

भावार्थ: श्रद्धा को अक्सर “अंध-विश्वास” समझ लिया जाता है, आँख मूँद कर मान लेना। पर शंकराचार्य का शब्द है “सत्य-बुद्धि”, सच्चाई की समझ के साथ। यह अंधा भरोसा नहीं।

श्रद्धा को यूँ समझिए, यह एक काम चलाने लायक़ भरोसा है, जब तक आप ख़ुद जान न लें। एक नक़्शा देख कर आप किसी अनजान शहर में निकल पड़ते हैं, नक़्शे पर “श्रद्धा” इसलिए नहीं कि वह आपका भगवान है, बल्कि इसलिए कि उस पर चले बिना आप पहुँचेंगे ही नहीं। और रास्ते में हर मोड़ पर वह सही निकलता जाता है। श्रद्धा वह दरवाज़ा है जिससे होते हुए आप ख़ुद के अनुभव तक पहुँचते हैं। श्लोक 16 का “ऊह-अपोह” (सवाल करना) और यह श्रद्धा, दोनों साथ चलते हैं, एक-दूसरे के विरोधी नहीं।

26 · समाधान, मन को बहलाना नहीं

सर्वदा स्थापनं बुद्धेः शुद्धे ब्रह्मणि सर्वदा ।
तत्समाधानमित्युक्तं न तु चित्तस्य लालनम् ॥ 26 ॥

sarvadā sthāpanaṁ buddheḥ śuddhe brahmaṇi sarvadā · tat samādhānam ity uktaṁ na tu cittasya lālanam

शब्दार्थ: सर्वदा स्थापनं · हमेशा टिकाना · बुद्धेः · बुद्धि का · शुद्धे ब्रह्मणि · शुद्ध ब्रह्म पर · समाधानम् · समाधान · न तु चित्तस्य लालनम् · मन को बहलाना नहीं।

अर्थ: बुद्धि को हमेशा शुद्ध ब्रह्म पर टिकाए रखना, इसे समाधान कहा गया है, मन को बहला-फुसला कर रखना नहीं।

भावार्थ: छह सम्पत्तियों की यह आख़िरी है, और शंकराचार्य इसमें एक तीखी बात जोड़ देते हैं, “मन को बहलाना नहीं।” यह आधी पंक्ति बहुत कुछ कह जाती है।

“चित्त-लालन” यानी मन को दुलार-दुलार कर, उसकी हर माँग पूरी कर के, एक नक़ली शांति में रखना। आज की भाषा में, अपने आप को comfortable रखने के लिए लगातार कुछ न कुछ करते रहना, मन को कभी असहज न होने देना। शंकराचार्य कहते हैं, समाधान वह नहीं। समाधान कोई आरामदेह अवस्था नहीं; वह एक टिकाव है, बुद्धि का बार-बार, हर बार, उसी एक सच पर लौट आना। आराम और समाधान, दो अलग चीज़ें हैं।

27 · मुमुक्षुता

अहंकारादिदेहान्तान् बन्धानज्ञानकल्पितान् ।
स्वस्वरूपावबोधेन मोक्तुमिच्छा मुमुक्षुता ॥ 27 ॥

ahaṁkārādi-dehāntān bandhān ajñāna-kalpitān · sva-svarūpāvabodhena moktum icchā mumukṣutā

शब्दार्थ: अहंकार-आदि-देह-अन्तान् · अहंकार से ले कर शरीर तक के · बन्धान् · बंधनों को · अज्ञान-कल्पितान् · अज्ञान से गढ़े हुए · स्व-स्वरूप-अवबोधेन · अपने असली रूप के बोध से · मोक्तुम् इच्छा · छूट जाने की इच्छा।

अर्थ: अहंकार से ले कर शरीर तक के, अज्ञान से गढ़े हुए, सब बंधनों से, अपने असली रूप के बोध के ज़रिए छूट जाने की इच्छा, यही मुमुक्षुता है।

भावार्थ: चौथा साधन, और देखिए शंकराचार्य बंधन को कैसे कहते हैं: “अज्ञान से गढ़े हुए।” यानी ये बंधन असली नहीं हैं, गढ़े हुए हैं। फिर से रस्सी-साँप वाली बात (श्लोक 12)।

और इसीलिए छूटने का तरीक़ा भी ख़ास है, “स्व-स्वरूप-अवबोधेन”, अपने असली रूप को जान कर। बंधन तोड़े नहीं जाते, वे देख लेने से ग़ायब हो जाते हैं, क्योंकि वे थे ही नहीं। बस एक ग़लतफ़हमी थी। मुमुक्षुता यानी इस एक चीज़ की सच्ची, जलती हुई चाह। और याद कीजिए, भाग 1 (श्लोक 3) ने इसे तीन सबसे दुर्लभ चीज़ों में गिना था। अगर यह चाह आपके भीतर है, तो आप पहले से रास्ते पर हैं।

28 · कमज़ोर तड़प भी बढ़ सकती है

मन्दमध्यमरूपापि वैराग्येण शमादिना ।
प्रसादेन गुरोः सेयं प्रवृद्धा सूयते फलम् ॥ 28 ॥

manda-madhyama-rūpāpi vairāgyeṇa śamādinā · prasādena guroḥ seyaṁ pravṛddhā sūyate phalam

शब्दार्थ: मन्द-मध्यम-रूपा अपि · कमज़ोर या मँझले रूप वाली भी · वैराग्येण · वैराग्य से · शम-आदिना · शम आदि से · प्रसादेन गुरोः · गुरु की कृपा से · प्रवृद्धा · बढ़ी हुई · सूयते फलम् · फल देती है।

अर्थ: कमज़ोर या मँझले दर्जे की मुमुक्षुता भी, वैराग्य से, शम आदि से, और गुरु की कृपा से, बढ़ कर फल देने लगती है।

भावार्थ: यह भाग का सबसे राहत भरा श्लोक है। श्लोक 17 का “एव” (ही) सख़्त लगा था, लग सकता था कि चारों साधन पूरे, पक्के होने चाहिए, तभी कुछ होंगे।

शंकराचार्य यहाँ नरम पड़ जाते हैं, और एक माली की तरह बात करते हैं। अगर आपकी मुक्ति की तड़प अभी कमज़ोर है, “मन्द”, तो भी कोई बात नहीं। एक छोटा सा पौधा भी, अगर उसे पानी (वैराग्य), धूप (शम-आदि), और माली की देखभाल (गुरु की कृपा) मिले, तो बढ़ता है। तैयारी पूरी हो कर शुरू नहीं होती; वह चलते-चलते बढ़ती है। आपको बस शुरू भर करना है, जहाँ हैं वहीं से।

29 · तेज़ हो तो बाक़ी सब सार्थक

वैराग्यं च मुमुक्षुत्वं तीव्रं यस्य तु विद्यते ।
तस्मिन्नेवार्थवन्तः स्युः फलवन्तः शमादयः ॥ 29 ॥

vairāgyaṁ ca mumukṣutvaṁ tīvraṁ yasya tu vidyate · tasminn evārthavantaḥ syuḥ phalavantaḥ śamādayaḥ

शब्दार्थ: वैराग्यं च मुमुक्षुत्वं · वैराग्य और मुमुक्षुत्व · तीव्रं · तेज़ · यस्य विद्यते · जिसमें हो · तस्मिन् एव · उसी में · अर्थवन्तः फलवन्तः · सार्थक और फलदायी · शम-आदयः · शम आदि।

अर्थ: जिसमें वैराग्य और मुमुक्षुत्व तेज़ हों, उसी में शम आदि गुण सार्थक और फलदायी होते हैं।

भावार्थ: शंकराचार्य यहाँ एक बारीक बात कहते हैं। चारों साधनों में से दो, वैराग्य और मुमुक्षुत्व, एक तरह के इंजन हैं। बाक़ी (शम-आदि छह) उनके बिना चल नहीं पाते।

क्यों? सोचिए, कोई मन को साधने का अभ्यास (शम, दम) कर रहा हैं, पर भीतर वह सच में छूटना न चाहता हैं। तो वह अभ्यास बस एक और काम बन जाएगा, एक खाली कसरत। पर अगर भीतर तड़प हो, सच में, तेज़ी से, तो वही अभ्यास जीवित हो उठता है, उसमें जान आ जाती है। चाह इंजन है; अभ्यास पहिये। पहिये अकेले कहीं नहीं ले जाते।

30 · कमज़ोर हो तो सब मरीचिका

एतयोर्मन्दता यत्र विरक्तत्वमुमुक्षयोः ।
मरौ सलीलवत्तत्र शमादेर्भानमात्रता ॥ 30 ॥

etayor mandatā yatra viraktatva-mumukṣayoḥ · marau salīlavat tatra śamāder bhāna-mātratā

शब्दार्थ: एतयोः मन्दता · इन दोनों का कमज़ोर होना · विरक्तत्व-मुमुक्षयोः · वैराग्य और मुमुक्षा का · मरौ सलिल-वत् · रेगिस्तान में पानी की तरह · शम-आदेः भान-मात्रता · शम आदि का सिर्फ़ दिखावा भर रह जाना।

अर्थ: जहाँ ये दोनों, वैराग्य और मुमुक्षा, कमज़ोर हों, वहाँ शम आदि गुण रेगिस्तान में पानी की तरह बस दिखावा भर रह जाते हैं।

भावार्थ: श्लोक 29 की बात का दूसरा पहलू, और एक बेहद सुंदर तस्वीर के साथ, “मरौ सलिल-वत्”, रेगिस्तान की मरीचिका।

मरीचिका में पानी दिखता तो है, चमकता भी है, पर पास जाएँ तो कुछ नहीं। शंकराचार्य कहते हैं: अगर भीतर सच्ची तड़प न हो, तो आपकी शांति, आपका संयम, आपका अभ्यास, सब उसी मरीचिका जैसा है। दूर से सच्चा लगता है, पर उसमें प्यास बुझाने वाला कुछ नहीं। यह कठोर बात है, पर यह एक ईमानदारी का न्योता है, अपने भीतर झाँक कर पूछिए: मेरा अभ्यास असली पानी है, या रेत पर चमकती रोशनी?

31 · भक्ति, अपने स्वरूप में ठहरना

मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी ।
स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते ॥ 31 ॥

mokṣa-kāraṇa-sāmagryāṁ bhaktir eva garīyasī · sva-svarūpānusandhānaṁ bhaktir ity abhidhīyate

शब्दार्थ: मोक्ष-कारण-सामग्र्याम् · मुक्ति के साधनों की सामग्री में · भक्तिः एव गरीयसी · भक्ति ही सबसे बड़ी · स्व-स्वरूप-अनुसन्धानं · अपने असली रूप का अनुसंधान · भक्तिः इति अभिधीयते · यही भक्ति कही जाती है।

अर्थ: मुक्ति के साधनों की पूरी सामग्री में भक्ति ही सबसे बड़ी है। और भक्ति किसे कहते हैं? अपने असली रूप का अनुसंधान, उसी में बार-बार लौटना, उसी में ठहरना।

भावार्थ: यह भाग का समापन है, और शंकराचार्य एक प्यारा, चौंकाने वाला मोड़ देते हैं। “भक्ति” शब्द सुन कर हमारे मन में एक तस्वीर आती है, मंदिर, आरती, किसी देवता के सामने प्रेम से भरा भक्त, आँसू, गीत।

शंकराचार्य उस तस्वीर से इनकार नहीं करते, पर वे एक और परत खोल देते हैं। अद्वैत के लिए भक्ति है, “स्व-स्वरूप-अनुसंधान”, अपने ही असली रूप की ओर बार-बार लौटना। ज़रा सोचिए: अगर परमात्मा आपसे अलग नहीं। अगर वह आपका ही गहरा स्वरूप है, तो उससे प्रेम करना, उसकी ओर बार-बार लौटना, और अपने सच्चे स्वरूप में ठहरना, ये अलग-अलग काम नहीं रहे, एक ही काम हो गए। यह भक्ति और ज्ञान का मिलन है। और इसी भाव से लैस हो कर, अगला भाग शिष्य को गुरु के सामने ले जाता है, जहाँ असली बातचीत शुरू होती है।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना: भाग 3 · गुरु की शरण, तैयारी हो चुकी, अब शिष्य गुरु के सामने पहुँचता है। गुरु कैसा हो, शिष्य क्या पूछे, और “बंधन” आख़िर है क्या, यहीं से किताब की असली बातचीत शुरू होती है।

और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 26 कहता है, समाधान मन को बहलाना नहीं। आज एक पल देखिए जहाँ आपने अपने आप को सिर्फ़ comfortable रखने के लिए कुछ किया। वह “मन का लालन” था या सच में ज़रूरी? फ़र्क महसूस करना ही विवेक की शुरुआत है।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, verbatim।

स्थायी URL: /vivekachudamani/sadhan-chatushtaya/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-22