विवेकचूडामणि
भाग 3 · गुरु की शरण · श्लोक 32-71
यहाँ ग्रंथ एक संवाद बन जाता है। भव की आँच से तपा एक शिष्य गुरु के सम्मुख आ बैठता है, और गुरु का पहला वचन कोई दर्शन नहीं, अभय है। इसी मोड़ से तत्व का उपदेश आरम्भ होता है, और इसी भाग में वह केन्द्रीय सत्य खुलता है कि बंधन से अपने अतिरिक्त कोई और नहीं छुड़ा सकता।
प्रवेश
भाग 1 और 2 भूमिका थे: साधना क्यों, और साधक कौन। इस भाग में ग्रंथ अपना मूल रूप धारण करता है, गुरु और शिष्य का जीवित संवाद।

क्रम सीधा है। साधनों से सम्पन्न शिष्य गुरु की शरण में आता है, और संसार से भयभीत हो कर विनती करता है। गुरु पहले अभय देते हैं, फिर आश्वासन। तब शिष्य अपना मूल प्रश्न रखता है, और वह एक नहीं, चार प्रश्न हैं। इसके बाद गुरु इस भाग का केन्द्रीय सत्य कहते हैं: इस मार्ग पर साधक को स्वयं ही चलना होगा।
पढ़ने का क्रम
श्लोकों को क्रम से पढ़िए, क्योंकि यहाँ एक संवाद चल रहा है और प्रत्येक श्लोक उसका एक चरण है। इस भाग के आधार-स्तम्भ हैं: गुरु का अभय-वचन; शिष्य के चार प्रश्न; बाहरी बोझ कोई और उतार दे, भूख स्वयं ही मिटानी पड़ती है; और भूमि में दबा हुआ कोष।
संवाद आरम्भ होने से पहले ग्रंथ एक सेतु रखता है। भाग 2 भक्ति की एक परिभाषा पर समाप्त हुआ था; यहाँ उसी पर एक और परत चढ़ती है, कि कुछ मनीषी भक्ति को अपने आत्म-तत्व का अनुसंधान भी कहते हैं। फिर शिष्य को आगे की ओर मोड़ दिया जाता है: साधनों से सम्पन्न जिज्ञासु किसी ज्ञानी गुरु की शरण में जाए, जिनसे बंधन से छुटकारा मिले। एक शब्द मनन के योग्य है, उपसीदेत्, अर्थात् समीप जा कर बैठे। उपनिषद् शब्द भी इसी धातु से है, गुरु के समीप, नीचे, श्रद्धा से बैठ जाना। यही ज्ञान का ग्रहण-भाव है, दूर से सुन लेना नहीं, अपितु समीप जा कर विनम्रता से बैठना।
32 · गुरु की शरण में
स्वात्मतत्त्वानुसन्धानं भक्तिरित्यपरे जगुः ।
उक्तसाधनसंपन्नस्तत्त्वजिज्ञासुरात्मनः
उपसीदेद्गुरुं प्राज्ञ्यं यस्माद्बन्धविमोक्षणम् ॥ 32 ॥
अब ग्रंथ बताता है कि वह गुरु कैसा हो। उसका सम्पूर्ण चित्र एक ही श्लोक में आ जाता है: शास्त्र का ज्ञाता, निष्पाप, इच्छाओं से अनाहत, ब्रह्म का सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता, ब्रह्म में शांत और स्थिर। दो उपमाएँ विशेष हैं। पहली, बिना ईंधन की अग्नि। साधारण आग को जलते रहने के लिए ईंधन चाहिए, किन्तु यह अग्नि स्वयं में स्थित है, इसे बाहर से कुछ अपेक्षित नहीं। सच्चे गुरु की शांति वैसी ही है, किसी बाह्य आधार पर नहीं टिकी। दूसरी, अहेतुक दया का समुद्र। अहेतुक का अर्थ है बिना किसी कारण के। गुरु की करुणा प्रतिदान की अपेक्षा से नहीं बहती, वह स्वभाव से बहती है, जैसे समुद्र स्वभाव से ही है। और जब ऐसा गुरु मिल जाए, तो शिष्य भक्ति, नम्रता, विनय और सेवा से उनकी आराधना करे, और जब वे प्रसन्न हों, तभी आत्मा के विषय में जो जानने योग्य है, वह पूछे। क्रम सूक्ष्म है: पहले सेवा, फिर प्रश्न। यह ज्ञान कोई ऐसी सूचना नहीं जो माँगते ही हाथ आ जाए; यह तभी भीतर उतरता है जब चित्त में खुलापन और नम्रता हो। अहंकार से कड़े हुए मन में सबसे सच्चा उत्तर भी ठहर नहीं पाता।
33 · 34 · गुरु कैसा हो, और सेवा के बाद प्रश्न
श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतो यो ब्रह्मवित्तमः ।
ब्रह्मण्युपरतः शान्तो निरिन्धन इवानलः
अहेतुकदयासिन्धुर्बन्धुरानमतां सताम् ॥ 33 ॥
तमाराध्य गुरुं भक्त्या प्रह्वप्रश्रयसेवनैः ।
प्रसन्नं तमनुप्राप्य पृच्छेज्ज्ञातव्यमात्मनः ॥ 34 ॥
यहाँ से छह श्लोकों तक शिष्य स्वयं बोलता है, और यह संवाद का सबसे आर्द्र भाग है। वह कोई बौद्धिक प्रश्न नहीं रखता, कोई तर्क नहीं देता, केवल पुकारता है। हे स्वामी, झुकने वालों के बंधु, करुणा के समुद्र, संसार-समुद्र में गिरे हुए मुझ को अपनी कृपा-दृष्टि से, अपनी अति-करुणा भरी अमृत-वर्षा से उबार लीजिए। यह ग्रंथ का एक मार्मिक मोड़ है। अब तक तर्क और परिभाषाएँ चल रही थीं; यहाँ एक जीवित साधक अपनी पूरी असहायता के साथ सम्मुख आ जाता है, और जिज्ञासा “मुझे ज्ञात है” से “मुझे उबारिए” में बदल जाती है। पुकार और तीव्र हो उठती है: संसार रूपी जंगल की उस आग से तपा हुआ, जिसे रोका नहीं जा सकता, दुर्भाग्य की हवाओं से झकझोरा हुआ, डरा हुआ, शरण आया हुआ मुझ को मृत्यु से बचाइए। और अंतिम आधी पंक्ति सबसे मार्मिक है, आपके अतिरिक्त और कोई शरण मैं जानता ही नहीं। जब तक कोई दूसरा आसरा शेष रहता है, मन उसी की ओर ताकता रहता है। शिष्य कह रहा है कि उसने सब देख लिया, अब कुछ शेष नहीं, और यही पूर्ण समर्पण गुरु के उत्तर के लिए भूमि तैयार करता है।
35 · 36 · शिष्य की पुकार
स्वामिन्नमस्ते नतलोकबन्धो कारुण्यसिन्धो पतितं भवाब्धौ ।
मामुद्धरात्मीयकटाक्षदृष्ट्या ऋज्व्यातिकारुण्यसुधाभिवृष्ट्या ॥ 35 ॥
दुर्वारसंसारदवाग्नितप्तं दोधूयमानं दुरदृष्टवातैः ।
भीतं प्रपन्नं परिपाहि मृत्योः शरण्यमन्यद्यदहं न जाने ॥ 36 ॥
अब शिष्य अपनी पुकार को तीन सुंदर उपमाओं से सींचता है। पहली, संत बसंत की भाँति हैं। बसंत आता है और प्रत्येक वृक्ष, प्रत्येक पुष्प खिल उठता है, किन्तु बसंत को किसी से कुछ अपेक्षित नहीं; वह किसी एक उपवन का पक्ष नहीं लेता, प्रतिदान नहीं माँगता, उसका स्वभाव ही खिलाना है। संत वैसे ही, स्वयं भयानक संसार-समुद्र पार कर के, बिना किसी कारण औरों को भी पार करा देते हैं। दूसरी, चंद्रमा। दिन भर सूर्य की प्रखर धूप धरती को तपाती है, फिर रात्रि में चंद्रमा आता है और सब कुछ शीतल हो जाता है; चंद्रमा ने यह करने का संकल्प नहीं किया, शीतलता देना उसका स्वभाव ही है। “मैं इसका पात्र हूँ या नहीं” यह प्रश्न ही असंगत है, क्योंकि चंद्रमा नहीं पूछता कि धरती पात्र है या नहीं। तीसरी उपमा सबसे काव्यात्मक है: गुरु की वाणी एक कलश है, जिससे ब्रह्म-आनंद के रस से भरा शीतल अमृत छलक रहा है। श्लोक 36 में संसार अग्नि था; यहाँ गुरु के वचन जल हैं। शिष्य “सींचना” शब्द चुनता है, जैसे झुलसे पौधे को सींचा जाता है; वह ज्ञान नहीं, शीतलता माँग रहा है। और कहता है, धन्य हैं वे जिन पर आपकी एक क्षण की दृष्टि पड़ जाए।
37 · 38 · 39 · संत, चाँद, और वाणी का अमृत
शान्ता महान्तो निवसन्ति सन्तो वसन्तवल्लोकहितं चरन्तः ।
तीर्णाः स्वयं भीमभवार्णवं जनान् अहेतुनान्यानपि तारयन्तः ॥ 37 ॥
अयं स्वभावः स्वत एव यत्पर श्रमापनोदप्रवणं महात्मनाम् ।
सुधांशुरेष स्वयमर्ककर्कश प्रभाभितप्तामवति क्षितिं किल ॥ 38 ॥
ब्रह्मानन्दरसानुभूतिकलितैः पूर्तैः सुशीतैर्युतैः युष्मद्वाक्कलशोज्झितैः श्रुतिसुखैर्वाक्यामृतैः सेचय ।
संतप्तं भवतापदावदहनज्वालाभिरेनं प्रभो धन्यास्ते भवदीक्षणक्षणगतेः पात्रीकृताः स्वीकृताः ॥ 39 ॥
शिष्य की पुकार यहाँ अपने अंतिम चरण पर पहुँचती है, तीन प्रश्नों और एक स्वीकृति पर। इस संसार-समुद्र को मैं कैसे पार करूँ, मेरी गति क्या है, कौनसा उपाय है; और फिर वह वचन जो सब कुछ खोल देता है, जाने न किञ्चित्, मैं कुछ नहीं जानता। यह ग्रंथ का एक गहन क्षण है। यह शिष्य भाग 2 की कसौटी पर विद्वान है, मेधावी है, फिर भी कहता है कि मैं कुछ नहीं जानता। यह केवल अज्ञान का स्वीकार नहीं, एक प्रकार की परिपक्वता है। जब तक मन में “मुझे कुछ तो ज्ञात है” बना रहता है, तब तक सीखने का पूरा अवकाश नहीं बनता। “मैं कुछ नहीं जानता” वह रिक्त पात्र है जिसमें गुरु अब तत्व भर सकते हैं।
40 · मैं कुछ नहीं जानता
कथं तरेयं भवसिन्धुमेतं का वा गतिर्मे कतमोऽस्त्युपायः ।
जाने न किञ्ज्चित्कृपयाव मां प्रभो संसारदुःखक्षतिमातनुष्व ॥ 40 ॥
अब दृश्य पलटता है। अब तक शिष्य बोल रहा था; अब दृष्टि गुरु की ओर मुड़ती है। और गुरु सबसे पहले क्या देते हैं, कोई उपदेश, कोई परिभाषा? नहीं। एक ही भाव, अभीति, अभय। संसार की दावाग्नि से तपे शिष्य को करुणा-रस से भीगी दृष्टि से देख कर, महात्मा गुरु तत्काल उसे अभय देते हैं। और “सहसा”, अर्थात् तुरंत। गुरु प्रतीक्षा नहीं कराते, शर्त नहीं रखते, परीक्षा नहीं लेते; पहले सुरक्षा, फिर शिक्षा। कोई गहरा उपदेश भयग्रस्त मन में नहीं उतरता। और तब, केवल कृपा से, वे उस मुमुक्षु को, उस प्रशांत-चित्त और शम से युक्त शिष्य को तत्व का उपदेश देते हैं। “कृपया एव”, सिर्फ़ कृपा से, यही इस वचन का दिल है। गुरु इसलिए उपदेश नहीं देते कि शिष्य ने सेवा की या कोई हिसाब चुकाना है; वे वैसे ही देते हैं जैसे संत बसंत की भाँति और चंद्रमा की भाँति थे। दोनों एक साथ अपेक्षित हैं: एक खुला पात्र, और निष्काम बहती कृपा।
41 · 42 · गुरु अभय देते हैं, और तब शिक्षा
तथा वदन्तं शरणागतं स्वं संसारदावानलतापतप्तम् ।
निरीक्ष्य कारुण्यरसार्द्रदृष्ट्या दद्यादभीतिं सहसा महात्मा ॥ 41 ॥
विद्वान् स तस्मा उपसत्तिमीयुषे मुमुक्षवे साधु यथोक्तकारिणे ।
प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय तत्त्वोपदेशं कृपयैव कुर्यात् ॥ 42 ॥
गुरु का प्रथम वचन है, मा भैष्ट, भय न कीजिए। पूरे ग्रंथ में गुरु जो सर्वप्रथम कहते हैं, वह कोई दर्शन नहीं, सान्त्वना है। इस एक श्लोक में तीन आश्वासन हैं। पहला, आपका विनाश नहीं, क्योंकि जो सत् है वह कभी नष्ट नहीं होता। दूसरा, उपाय है, यह बंद मार्ग नहीं। तीसरा, जिस मार्ग से यति पार गए, उसी पर आप चलेंगे, यह मार्ग बारम्बार सिद्ध हुआ है। भयभीत साधक को इतना ही चाहिए, कि वह सुरक्षित है, मार्ग है, और वह अकेला नहीं। फिर गुरु एक और आश्वासन देते हैं, और “परमानन्द” शब्द ध्यान खींचता है। शिष्य भय की भाषा में बोला था, अग्नि, समुद्र, मृत्यु; उसकी कामना केवल भय से छूटने की थी। गुरु उसी भाषा में उत्तर नहीं देते, वे कहते हैं कि लक्ष्य बच जाना भर नहीं, परम आनंद है। डूबता हुआ जन केवल तट चाहता है, और उसे बताया जाता है कि तट पर सूखी भूमि ही नहीं, पूर्ण आनंद प्रतीक्षा में है।
43 · 44 · “भय न कीजिए”, और एक बड़ा उपाय
मा भैष्ट विद्वंस्तव नास्त्यपायः संसारसिन्धोस्तरणेऽस्त्युपायः ।
येनैव याता यतयोऽस्य पारं तमेव मार्गं तव निर्दिशामि ॥ 43 ॥
अस्त्युपायो महान् कश्चित्संसारभयनाशनः ।
तेन तीर्त्वा भवाम्भोधिं परमानन्दमाप्स्यसि ॥ 44 ॥
अब गुरु उस “बड़े उपाय” को एक स्पष्ट कारण-शृंखला में खोलते हैं: वेदान्त के अर्थ का विचार, उससे श्रेष्ठ ज्ञान, और उससे दुख का अंत। एक शब्द विशेष है, आत्यन्तिक, अर्थात् पूर्ण और अंतिम। शेष सभी उपचार दुख को कुछ काल के लिए घटाते हैं, फिर वह लौट आता है; यह उपचार अंतिम है, क्योंकि यह दुख के लक्षणों पर नहीं, उसके मूल अज्ञान पर कार्य करता है। किन्तु कहीं यह न समझ लिया जाए कि केवल शुष्क बौद्धिक विचार पर्याप्त है, इसलिए गुरु श्रद्धा, भक्ति, ध्यान और योग जोड़ देते हैं; श्रुति की वाणी इन्हें मुमुक्षु की मुक्ति का कारण साफ़ कहती है। विचार दीपक की लौ है, और श्रद्धा-भक्ति-ध्यान वह दीपक जो इस लौ को थामे रखता है, दोनों साथ चाहिए। और गुरु स्मरण कराते हैं कि बंधन अविद्या-कल्पित है, अज्ञान का गढ़ा हुआ, इसलिए वह तत्व के ज्ञान-मात्र से मिट जाता है। यहीं गुरु पूरी समस्या और पूरा हल एक श्लोक में रख देते हैं, और एक चौंकाने वाली बात कह जाते हैं, परमात्मनः तव, आप परमात्मा का। शिष्य परमात्मा है; समस्या यह नहीं कि वह छोटा है, समस्या यह है कि उसने स्वयं को छोटा मान बैठा है। और समाधान, विवेक से उठी बोध की अग्नि। घास-फूस को हाथ से नोच-नोच कर हटाते रहने पर वह फिर उग आता है, किन्तु अग्नि उसे समूलम्, जड़ समेत भस्म कर देती है।
45 · 46 · 47 · वेदान्त-विचार, श्रद्धा, और विवेक की आग
वेदान्तार्थविचारेण जायते ज्ञानमुत्तमम् ।
तेनात्यन्तिकसंसारदुःखनाशो भवत्यनु ॥ 45 ॥
श्रद्धाभक्तिध्यानयोगाम्मुमुक्षोः मुक्तेर्हेतून्वक्ति साक्षाच्छ्रुतेर्गीः ।
यो वा एतेष्वेव तिष्ठत्यमुष्य मोक्षोऽविद्याकल्पिताद्देहबन्धात् ॥ 46 ॥
अज्ञानयोगात्परमात्मनस्तव ह्यनात्मबन्धस्तत एव संसृतिः ।
तयोर्विवेकोदितबोधवन्हिः अज्ञानकार्यं प्रदहेत्समूलम् ॥ 47 ॥
गुरु ने अभय दिया, आश्वासन दिया, मार्ग बताया। अब शिष्य पुनः बोलता है, किन्तु कितना बदला हुआ। श्लोक 35 से 40 में वह रो रहा था, विनती कर रहा था; यहाँ वह प्रशांत और स्पष्ट है। कृपया सुनिए, स्वामी, यह प्रश्न मैं कर रहा हूँ, आपके मुख से जिसका उत्तर सुन कर मैं कृतार्थ हो जाऊँ। एक शब्द उल्लेखनीय है, भवत्-मुखात्, आपके मुख से। शिष्य कह रहा है कि उसे यह उत्तर ग्रंथ से या सुनी-सुनाई बात से नहीं, स्वयं गुरु के मुख से चाहिए। यह वही उपसीदेत् का भाव है, जीवित गुरु के समीप बैठ कर साक्षात् सुनना।
48 · शिष्य पूछता है
शिष्य उवाच,
कृपया श्रूयतां स्वामिन् प्रश्नोऽयं क्रियते मया ।
यदुत्तरमहं श्रुत्वा कृतार्थः स्यां भवन्मुखात् ॥ 48 ॥
और अब वह धुरी-श्लोक आता है, जिसका उत्तर आगे के पाँच सौ से अधिक श्लोक हैं। शिष्य का एक प्रश्न वस्तुतः प्रश्नों का एक समूह है। बंधन आख़िर है क्या, यह आया कैसे, टिका कैसे रहता है, और इससे छुटकारा कैसे हो; साथ में एक और, वह अनात्मा क्या है और वह परम आत्मा क्या, और दोनों का विवेक कैसे किया जाए। शिष्य की बुद्धि की स्वच्छता यहाँ प्रकट है, वह “मुझे उबारिए” पर नहीं रुकता, समस्या को उसके अंगों में बाँट देता है। यह शुष्क प्रश्नावली नहीं, यह वही प्रश्न है जो प्रत्येक मनुष्य के भीतर कहीं न कहीं स्पंदित रहता है: मैं बद्ध क्यों अनुभव करता हूँ, और मुक्त कैसे होऊँ।
49 · चार सवाल
को नाम बन्धः कथमेष आगतः कथं प्रतिष्ठास्य कथं विमोक्षः ।
कोऽसावनात्मा परमः क आत्मा तयोर्विवेकः कथमेतदुच्यताम् ॥ 49 ॥
गुरु उत्तर का आरम्भ करते हैं, किन्तु पहले शिष्य की प्रशंसा, और वह प्रशंसा बड़ी है: आप धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, आपसे आपका कुल पवित्र हो गया, क्योंकि आप अज्ञान-बंधन से छूट कर ब्रह्म-रूप होना चाहते हैं। इतनी बड़ी प्रशंसा अभी क्यों, जब शिष्य ने अभी कुछ प्राप्त नहीं किया? गुरु एक तथ्य रेखांकित कर रहे हैं: सही प्रश्न का उठ आना ही बड़ी उपलब्धि है। अधिकांश जन जीवन भर सांसारिक भलाई के प्रश्न पूछते रह जाते हैं; जिसके भीतर से “मैं बद्ध क्यों हूँ, मुक्त कैसे होऊँ” उठ आया, वह पहले ही सही दिशा में मुड़ चुका है। और तब गुरु एक बात आरम्भ करते हैं जो छह श्लोकों तक चलेगी और इस भाग का केन्द्र है: इस मार्ग पर साधक के स्थान पर कोई और नहीं चल सकता। पिता पर ऋण हो तो पुत्र चुका सकता है, क्योंकि धन हाथ बदल सकता है; किन्तु भीतरी बंधन हस्तांतरित नहीं होता। गुरु कह रहे हैं, मैं मार्ग दिखाऊँगा, किन्तु चलना आपको ही होगा।
50 · 51 · “धन्य हो आप”, और बंधन स्वयं ही छूटता है
श्रीगुरुवाच,
धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि पावितं ते कुलं त्वया ।
यदविद्याबन्धमुक्त्या ब्रह्मीभवितुमिच्छसि ॥ 50 ॥
ऋणमोचनकर्तारः पितुः सन्ति सुतादयः ।
बन्धमोचनकर्ता तु स्वस्मादन्यो न कश्चन ॥ 51 ॥
अब गुरु इसी सत्य को उदाहरण-दर-उदाहरण गहरा करते हैं। पहला, बेहद सटीक: सिर पर बोझ हो तो कोई और आ कर उतार सकता है, यह बाहरी दुख है, हस्तांतरित किया जा सकता है। पर भूख? आपकी भूख कोई और नहीं मिटा सकता; दुनिया का सबसे प्यार करने वाला इंसान भी आपकी जगह खा कर आपका पेट नहीं भर सकता, खाना आपको ही पड़ेगा। आध्यात्मिक बंधन भूख जैसा है, सिर के बोझ जैसा नहीं; यह इतना भीतरी है कि कोई और इसे छू ही नहीं सकता। दूसरा उदाहरण और स्पष्ट: वैद्य उत्तम चिकित्सा बता दे, सही औषधि लिख दे, किन्तु यदि रोगी औषधि न ले, परहेज़ न करे, तो वह स्वस्थ नहीं होगा। गुरु वैद्य हैं, वे रोग पहचानते और औषधि बताते हैं, किन्तु औषधि लेना रोगी का कार्य है। यह कठोर वचन नहीं, सामर्थ्य देने वाला वचन है: साधक का स्वस्थ होना उसी के हाथ में है। और तीसरा, सबसे सुंदर: कोई चंद्रमा के विषय में घंटों कह सकता है, कितना बड़ा, किस वर्ण का, कितनी दूर; किन्तु जब तक स्वयं आकाश की ओर दृष्टि न उठे, चंद्रमा देखा नहीं गया। आत्मा भी ऐसी ही है। गुरु संकेत कर सकते हैं, “वहाँ देखिए”, किन्तु दृष्टि साधक को ही उठानी होगी।
52 · 53 · 54 · सिर का बोझ, मरीज़, और चाँद
मस्तकन्यस्तभारादेर्दुःखमन्यैर्निवार्यते ।
क्षुधादिकृतदुःखं तु विना स्वेन न केनचित् ॥ 52 ॥
पथ्यमौषधसेवा च क्रियते येन रोगिणा ।
आरोग्यसिद्धिर्दृष्टास्य नान्यानुष्ठितकर्मणा ॥ 53 ॥
वस्तुस्वरूपं स्फुटबोधचक्षुषा स्वेनैव वेद्यं न तु पण्डितेन ।
चन्द्रस्वरूपं निजचक्षुषैव ज्ञातव्यमन्यैरवगम्यते किम् ॥ 54 ॥
चार उदाहरण दे चुकने के बाद गुरु बात को सीधे, बिना उपमा के दोहरा देते हैं, और इसे एक सवाल के रूप में रखते हैं, ताकि शिष्य ख़ुद उत्तर महसूस करे: अज्ञान, इच्छा, कर्म आदि के फंदे का बंधन खोलने में, ख़ुद के सिवा और कौन समर्थ है, सौ करोड़ कल्पों में भी? यह बात बार-बार इसलिए, क्योंकि वह मन की एक गहरी प्रवृत्ति के विपरीत है। मन सदा किसी उद्धारक की खोज में रहता है, कोई गुरु, कोई कृपा, कोई घटना जो आ कर सब ठीक कर दे; गुरु बड़े स्नेह से, बारम्बार, यह आस तोड़ते हैं, और यह तोड़ना भी करुणा है। फिर गुरु एक साहसी श्लोक कहते हैं, उस युग के सभी सम्मानित मार्ग गिना कर: न योग से, न सांख्य से, न कर्म से, न केवल विद्या से, मोक्ष सिर्फ़ ब्रह्म और आत्मा की एकता के बोध से सिद्ध होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि ये मार्ग व्यर्थ हैं; ये मन को तैयार करते हैं, शुद्ध करते हैं। किन्तु अंतिम छुटकारा केवल एक ही बोध से आता है, कि ब्रह्म और आत्मा दो नहीं, एक हैं। यही अद्वैत है, दो का अभाव।
55 · 56 · ख़ुद के बिना कौन छुड़ाए, और एकत्व का बोध
अविद्याकामकर्मादिपाशबन्धं विमोचितुम् ।
कः शक्नुयाद्विनात्मानं कल्पकोटिशतैरपि ॥ 55 ॥
न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया ।
ब्रह्मात्मैकत्वबोधेन मोक्षः सिध्यति नान्यथा ॥ 56 ॥
अब गुरु एक नई बात आरम्भ करते हैं जो आगे तक चलेगी: केवल शब्दों और विद्वत्ता से मुक्ति नहीं। पहला उदाहरण वीणा है। कोई वीणा अत्यंत सुंदर बजाए, सब सराहें, फिर भी वह राजा नहीं बन जाता; संगीत और राज्य भिन्न कोटि की वस्तुएँ हैं। शास्त्रों की सुंदर व्याख्या और वाणी की कुशलता भी वीणा-वादन जैसी ही हैं, सुनने में मधुर, प्रशंसा पाने वाली, किन्तु वे साम्राज्य, अर्थात् मुक्ति, नहीं दिला सकतीं। फिर गुरु उपमा खोल देते हैं और एक प्यारा शब्द-युग्म रखते हैं, भुक्तये न तु मुक्तये। भुक्ति अर्थात् भोग, मुक्ति अर्थात् बंधन से छूट जाना। सुंदर वक्तृत्व, शब्दों का प्रवाह, शास्त्रों की देदीप्यमान व्याख्या, ये एक प्रकार का भोग हैं; वक्ता को प्रशंसा का सुख मिलता है, श्रोता को बौद्धिक आनंद। यह दूषित नहीं, किन्तु है यह भोग ही, और सुखों की भाँति आता-जाता। यह चेतावनी विशेषकर एक विद्वान, मेधावी शिष्य के लिए है, क्योंकि उसका सबसे बड़ा संकट यही है, सुंदर समझ को ही लक्ष्य मान बैठना।
57 · 58 · वीणा, और वाणी का प्रवाह
वीणाया रूपसौन्दर्यं तन्त्रीवादनसौष्ठवम् ।
प्रजारञ्ज्जनमात्रं तन्न साम्राज्याय कल्पते ॥ 57 ॥
वाग्वैखरी शब्दझरी शास्त्रव्याख्यानकौशलम् ।
वैदुष्यं विदुषां तद्वद्भुक्तये न तु मुक्तये ॥ 58 ॥
अब एक सूक्ष्म पहेली जैसा वचन: दोनों दशाओं में शास्त्र-पाठ निष्फल। दोनों “निष्फल” का तात्पर्य भिन्न है। पहला, परम तत्व जाने बिना केवल शास्त्र रट लेना व्यर्थ है, सूचना संचित होती है पर पहुँच कहीं नहीं होती। दूसरा, और यह सुंदर है, जान लेने के पश्चात् शास्त्र-पाठ इस अर्थ में निष्फल कि अब उसकी आवश्यकता शेष नहीं रही। मार्ग का नक्शा तब तक उपयोगी है जब तक गंतव्य न आ जाए; शास्त्र सेतु हैं, गंतव्य नहीं, और सेतु पर ही घर बना कर बैठ जाना, यही गुरु की चेतावनी है। फिर एक सटीक उपमा: शब्दों का जाल एक घना वन है। वन में घंटों, दिनों चला जा सकता है, प्रत्येक वृक्ष भिन्न, प्रत्येक मोड़ नया, फिर भी कहीं पहुँच नहीं होती, केवल भटकाव रहता है। शब्द ऐसे ही हैं, एक परिभाषा दूसरी की ओर, और मन को प्रतीत होता है कि वह कार्य कर रहा है, जबकि वह केवल भटक रहा होता है। गुरु का समाधान दो अंगों में है: प्रयत्न, सच्चा परिश्रम; और तत्त्व-ज्ञ, जिसने स्वयं तत्व जाना हो, उसके समीप जाना। वन से वही निकाल सकता है जो मार्ग जानता है।
59 · 60 · शास्त्र-पाठ, और शब्दों का जंगल
अविज्ञाते परे तत्त्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला ।
विज्ञातेऽपि परे तत्त्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला ॥ 59 ॥
शब्दजालं महारण्यं चित्तभ्रमणकारणम् ।
अतः प्रयत्नाज्ज्ञातव्यं तत्त्वज्ञैस्तत्त्वमात्मनः ॥ 60 ॥
अब गुरु एक तीव्र चित्र लाते हैं: अज्ञान एक सर्प है, और उसने डस लिया है। सर्पदंश को क्या अपेक्षित है? केवल एक वस्तु, उसी विष को उतारने वाली औषधि। उसके सम्मुख वेद पढ़े जाएँ, शास्त्र सुनाए जाएँ, औषधियाँ दी जाएँ, किन्तु यदि वही विष-नाशक औषधि न हो, तो विष चढ़ता ही रहेगा। अज्ञान को उतारने वाली औषधि एक ही है, ब्रह्म-ज्ञान; शेष सब उत्तम हो सकता है, किन्तु वह इस विशेष विष को नहीं उतारता। और गुरु इसी को एक अचूक चित्र में बदल देते हैं: कोई रोगी औषधि की शीशी सम्मुख रखे और बार-बार “औषधि, औषधि” कहता रहे, तो क्या वह स्वस्थ होगा? नहीं, औषधि को पीना पड़ता है। अपरोक्ष-अनुभव इस श्लोक का कुंजी-शब्द है। परोक्ष अर्थात् जो दृष्टि से परे है, केवल सुना-सुनाया; अपरोक्ष अर्थात् साक्षात्, अपना। ब्रह्म के विषय में बोलना औषधि का नाम लेना है; ब्रह्म का साक्षात् अनुभव उसे पीना है। यह सब पढ़ कर, समझ कर यह न मान लिया जाए कि कार्य पूर्ण हो गया; समझना औषधि का नाम जानना है, अनुभव उसे पीना है।
61 · 62 · साँप का डंक, और “दवा” कहने भर से
अज्ञानसर्पदष्टस्य ब्रह्मज्ञानौषधं विना ।
किमु वेदैश्च शास्त्रैश्च किमु मन्त्रैः किमौषधैः ॥ 61 ॥
न गच्छति विना पानं व्याधिरौषधशब्दतः ।
विनापरोक्षानुभवं ब्रह्मशब्दैर्न मुच्यते ॥ 62 ॥
गुरु दो ज़रूरी काम गिनाते हैं जो असली मुक्ति के लिए चाहिए और जो केवल शब्दों से नहीं होते। एक, दृश्य-विलय; दृश्य यानी जो देखा जाता है, यह पूरा बाहरी संसार जिसे हम ठोस, अंतिम सच मान बैठे हैं, उसका विलय, यानी उस ग़लत ठोसपन का घुल जाना। दो, आत्मा का तत्व जान लेना। और एक तीखा शब्द आता है, उक्ति-मात्र-फल, जिनका फल केवल बोल देना है। कुछ साधकों के लिए आध्यात्मिक शब्द एक अभ्यास बन जाते हैं, मुख से निकलते हैं, सुनने में सुंदर लगते हैं, और इतना ही। फिर गुरु एक और सटीक उदाहरण देते हैं: कोई व्यक्ति बार-बार कहता रहे “मैं राजा हूँ, मैं राजा हूँ”, तो क्या वह राजा बन जाएगा? नहीं। राजा बनने के लिए वास्तविक कार्य चाहिए, श्रम, संघर्ष, यथार्थ परिवर्तन। यह उस प्रवृत्ति पर सीधी चोट है जिसमें प्रतीत होता है कि केवल सही पहचान अपना लेने से वस्तुएँ बदल जाएँगी। “मैं ब्रह्म हूँ” दोहराते रहना, उस ओर वास्तविक साधना किए बिना, ठीक “मैं राजा हूँ” कह देने जैसा है।
63 · 64 · सिर्फ़ शब्द से नहीं, और “मैं राजा हूँ”
अकृत्वा दृश्यविलयमज्ञात्वा तत्त्वमात्मनः ।
ब्रह्मशब्दैः कुतो मुक्तिरुक्तिमात्रफलैर्नृणाम् ॥ 63 ॥
अकृत्वा शत्रुसंहारमगत्वाखिलभूश्रियम् ।
राजाहमिति शब्दान्नो राजा भवितुमर्हति ॥ 64 ॥
शब्दों की पूरी चर्चा का सबसे सुंदर उदाहरण अब आता है, भूमि में दबा हुआ कोष। इसका सौंदर्य यही है कि कोष पहले से ही वहीं है, भूमि के नीचे; उसे कहीं से लाना नहीं, केवल ऊपर की मिट्टी और शिलाएँ हटानी हैं। गुरु पूरी विधि गिनाते हैं, और प्रत्येक चरण का एक आध्यात्मिक प्रतिरूप है: भरोसेमंद की बात, गुरु का उपदेश; खुदाई, मनन, अर्थात् सुनी बात पर गहरा विचार; शिलाएँ हटाना, ध्यान; और उठा लेना, साक्षात् अनुभव। साधक का यथार्थ स्वरूप एक गड़ा कोष है, खोया नहीं, केवल ढका हुआ। और अंतिम शब्द, न दुर्युक्तिभिः, कुतर्कों से नहीं। चतुर वितर्क कोष नहीं निकालते; ईमानदार खुदाई निकालती है। तस्मात्, इसलिए, यह कह कर गुरु पूरी लंबी बात को एक गाँठ में बाँध देते हैं: ख़ुद के सिवा कोई नहीं। रोगग्रस्त होने पर समझदार व्यक्ति हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठता, स्वयं चिकित्सा में जुट जाता है; संसार-बंधन एक रोग है, और उसी विवेक से, सर्व-प्रयत्न, पूरे बल से उसमें जुटना है।
65 · 66 · दबा हुआ ख़ज़ाना, और अपना प्रयत्न
आप्तोक्तिं खननं तथोपरिशिलाद्युत्कर्षणं स्वीकृतिं निक्षेपः समपेक्षते नहि बहिः शब्दैस्तु निर्गच्छति ।
तद्वद्ब्रह्मविदोपदेशमननध्यानादिभिर्लभ्यते मायाकार्यतिरोहितं स्वममलं तत्त्वं न दुर्युक्तिभिः ॥ 65 ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भवबन्धविमुक्तये ।
स्वैरेव यत्नः कर्तव्यो रोगादाविव पण्डितैः ॥ 66 ॥
गुरु जवाब देने से पहले फिर एक बार शिष्य के सवाल की तारीफ़ करते हैं। श्लोक 50 में उन्होंने शिष्य की तारीफ़ की थी; यहाँ वे सवाल की करते हैं। एक शब्द मनोहर है, सूत्र-प्राय, सूत्र जैसा। संस्कृत में सूत्र वह रचना है जो अत्यंत संक्षिप्त हो, किन्तु जिसमें बहुत कुछ कसा हुआ हो, एक बीज जिसमें सम्पूर्ण वृक्ष निहित है। शिष्य का यह छोटा प्रश्न वस्तुतः एक बीज है, जिसके भीतर पूरी विद्या भरी है। और तब गुरु कहते हैं, ध्यान लगा कर सुनिए, हे विद्वान, इसी के सुनने से आप तुरंत संसार-बंधन से मुक्त हो जाएँगे। एक प्रश्न उठ सकता है, गुरु तो अभी यही कहते रहे कि बोलने-सुनने मात्र से मुक्ति नहीं; फिर यहाँ क्यों कहते हैं कि सुनने से तुरंत मुक्त हो जाएँगे? यह विरोध नहीं। कुंजी अवहित शब्द में है, ध्यान लगा कर, पूर्णतः उपस्थित हो कर सुनना। यह वह सतही सुनना नहीं जिसकी अब तक निंदा हो रही थी; वेदान्त इसे श्रवण कहता है, साधना का प्रथम चरण। जब वचन यथार्थ हो, वक्ता ने स्वयं जाना हो, और श्रोता पूर्णतः खुला हो, तब बोध तत्काल उतर सकता है।
67 · 68 · “आपका सवाल श्रेष्ठ है”, और “ध्यान से सुनिए”
यस्त्वयाद्य कृतः प्रश्नो वरीयाञ्ज्छास्त्रविन्मतः ।
सूत्रप्रायो निगूढार्थो ज्ञातव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ 67 ॥
शृणुष्वावहितो विद्वन्यन्मया समुदीर्यते ।
तदेतच्छ्रवणात्सद्यो भवबन्धाद्विमोक्ष्यसे ॥ 68 ॥
अब विस्तार में उतरने से पूर्व गुरु पूरे मार्ग की एक झलक देते हैं, एक रूपरेखा। मोक्ष का पहला कारण कहा जाता है, अनित्य चीज़ों में पूरा वैराग्य; फिर शम, दम, तितिक्षा, और चिपका लेने वाले सब कर्मों का त्याग। ये शब्द भाग 2 के साधन-चतुष्टय से लौट आते हैं, किन्तु एक भेद है। भाग 2 में ये पात्रता थे, मार्ग पर चढ़ने से पहले की तैयारी; यहाँ गुरु इन्हें मोक्ष का कारण कहते हैं, अर्थात् ये केवल आरम्भिक शर्तें नहीं, मार्ग के अंग हैं, अंत तक साथ चलते हैं। फिर गुरु शेष रूपरेखा देते हैं, श्रवण, मनन और निदिध्यासन, यह वेदान्त की प्रसिद्ध त्रयी है। श्रवण, सत्य को सुनना; मनन, उस पर गहराई से विचार करना, सारे संशय मिटा देना; ध्यान, उस सत्य में बार-बार, दीर्घ काल तक स्थित होना, जब तक वह केवल जानी हुई बात न रह कर अनुभूत सत्य बन जाए। इस श्लोक का असली रत्न दो शब्द हैं, इह एव, यहीं, इसी जन्म में। मुक्ति मृत्यु के पश्चात् की कोई वस्तु नहीं, किसी अन्य लोक की बात नहीं; निर्वाण-सुख इसी देह में, इसी जीवन में पाया जा सकता है।
69 · 70 · रास्ते की झलक, और यहीं, इसी जन्म में
मोक्षस्य हेतुः प्रथमो निगद्यते वैराग्यमत्यन्तमनित्यवस्तुषु ।
ततः शमश्चापि दमस्तितिक्षा न्यासः प्रसक्ताखिलकर्मणां भृशम् ॥ 69 ॥
ततः श्रुतिस्तन्मननं सतत्त्व ध्यानं चिरं नित्यनिरन्तरं मुनेः ।
ततोऽविकल्पं परमेत्य विद्वान् इहैव निर्वाणसुखं समृच्छति ॥ 70 ॥
यह भाग 3 का आख़िरी श्लोक है, और यह एक दरवाज़ा है। गुरु ने अभय दिया, भरोसा दिया, रास्ते का नक्शा दिखाया, और शिष्य के सवाल को उसका पूरा हक़ दिया। अब असली शिक्षा शुरू होने वाली है: अब आपको जो समझना है, आत्मा और अनात्मा का विवेक, वह मैं कहता हूँ; भली भाँति सुन कर उसे अपने भीतर दृढ़ कर लीजिए। आत्म-अनात्म-विवेचन, यही ग्रंथ का नाम भी समझा देता है, विवेक का शिरोमणि-रत्न। और गुरु एक अंतिम, आवश्यक बात कहते हैं, श्रुत्वा आत्मनि अवधारय, सुन कर अपने भीतर दृढ़ कर लीजिए। केवल सुनना पर्याप्त नहीं, केवल समझना पर्याप्त नहीं; औषधि वाली बात यहीं लौटती है। सुनी हुई बात को भीतर इतना बैठाना है कि वह अपनी हो जाए। इसी के साथ अगला भाग शरीर से आरम्भ होता है, सबसे प्रथम, सबसे स्थूल अनात्मा, और एक-एक परत उतारते हुए वास्तविक आत्मा तक पहुँचता है।
71 · “अब आत्म-अनात्म का विवेक सुनिए”
यद्बोद्धव्यं तवेदानीमात्मानात्मविवेचनम् ।
तदुच्यते मया सम्यक्श्रुत्वात्मन्यवधारय ॥ 71 ॥
आगे का मार्ग
सीधा अगला पन्ना भाग 4 है, स्थूल और सूक्ष्म शरीर। वहाँ गुरु शिष्य के प्रश्न का वास्तविक उत्तर आरम्भ करते हैं, और सबसे स्थूल सिरे से, अर्थात् इस शरीर से। “अनात्मा” क्या-क्या है, यह एक-एक कर के उद्घाटित होता है।
श्लोक 62 इस भाग की केन्द्रीय शिक्षा को एक वाक्य में रख देता है: औषधि का नाम लेने से रोग नहीं जाता, उसे पीना पड़ता है। ज्ञात होना और जीना भिन्न हैं; विवेक सुनी हुई बात नहीं, अनुभूत सत्य है।