विवेकचूडामणि · Vivekachudamani
भाग 3 · गुरु की शरण · श्लोक 32-71
अब तक किताब तैयारी की बात कर रही थी। यहाँ वह एक कमरा बन जाती है, एक शिष्य, जो टूट कर गुरु के सामने आता है, और एक गुरु, जो पहला शब्द कहते हैं: “डरो मत।” यहीं से असली बातचीत शुरू होती है।
पहले एक बात
भाग 1 और 2 एक तरह से भूमिका थे, क्यों पढ़ें, और कौन तैयार है। इस भाग में किताब अपना असली रूप ले लेती है: यह एक बातचीत बन जाती है।
कहानी सीधी है। एक शिष्य गुरु के पास आता है, जुटा हुआ, पर डरा हुआ, टूटा हुआ। वह गिड़गिड़ाता है (श्लोक 35-40)। गुरु उसे पहले अभय देते हैं, फिर भरोसा (41-47)। तब शिष्य अपना असली सवाल पूछता है, और वह एक नहीं। चार सवाल हैं (49)। और फिर गुरु एक बेहद ज़रूरी बात कहते हैं, जो इस पूरे भाग का दिल है: इस रास्ते पर आपको कोई और नहीं ले जा सकता; ख़ुद को ख़ुद ही उठाना होंगे।
इस भाग को एक नाटक के पहले दृश्य की तरह पढ़िए। दो लोग, एक कमरा, और एक सवाल जो हवा में लटका है।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से, यहाँ एक कहानी चल रही है, श्लोक पात्रों के संवाद हैं। असली खंभे: 41-43 (गुरु का “डरो मत”), 49 (शिष्य के चार सवाल), 52-54 (सिरदर्द कोई और हटा दे, भूख ख़ुद ही मिटानी पड़ती है), 65 (दबा हुआ ख़ज़ाना)। हर श्लोक पर anchor है।
32 · गुरु के पास जाओ
स्वात्मतत्त्वानुसन्धानं भक्तिरित्यपरे जगुः ।
उक्तसाधनसंपन्नस्तत्त्वजिज्ञासुरात्मनः
उपसीदेद्गुरुं प्राज्ञ्यं यस्माद्बन्धविमोक्षणम् ॥ 32 ॥
svātma-tattvānusandhānaṁ bhaktir ity apare jaguḥ · ukta-sādhana-saṁpannas tattva-jijñāsur ātmanaḥ · upasīded guruṁ prājñyaṁ yasmād bandha-vimokṣaṇam
शब्दार्थ: स्व-आत्म-तत्त्व-अनुसन्धानं · अपने आत्म-तत्व का अनुसंधान · अपरे जगुः · कुछ और लोग कहते हैं · उक्त-साधन-सम्पन्नः · बताए हुए साधनों से युक्त · तत्त्व-जिज्ञासुः · तत्व जानने का इच्छुक · उपसीदेत् · पास जाए · प्राज्ञ्यं गुरुं · ज्ञानी गुरु के · बन्ध-विमोक्षणम् · बंधन से छुटकारा।
अर्थ: कुछ लोग भक्ति को “अपने आत्म-तत्व का अनुसंधान” भी कहते हैं। बताए हुए साधनों से युक्त, तत्व जानने का इच्छुक शिष्य एक ज्ञानी गुरु के पास जाए, जिनसे बंधन से छुटकारा मिले।
भावार्थ: भाग 2 भक्ति की एक परिभाषा पर बंद हुआ था; यह श्लोक उसी पर एक और परत जोड़ता है, और फिर शिष्य को आगे बढ़ा देता है, “गुरु के पास जाए।”
एक शब्द गौर करने लायक़ है: “उपसीदेत्”, पास जा कर बैठे। “उपनिषद्” शब्द भी इसी जड़ से है, गुरु के पास, नीचे, बैठ जाना। यह सीखने का एक ख़ास भाव है: दूर से सुनना नहीं। पास जा कर, विनम्र हो कर बैठ जाना। यहीं से अगले चालीस श्लोकों का दृश्य खुलता है।
33 · गुरु कैसा हो
श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतो यो ब्रह्मवित्तमः ।
ब्रह्मण्युपरतः शान्तो निरिन्धन इवानलः
अहेतुकदयासिन्धुर्बन्धुरानमतां सताम् ॥ 33 ॥
śrotriyo’vṛjino’kāma-hato yo brahma-vittamaḥ · brahmaṇy uparataḥ śānto nirindhana ivānalaḥ · ahetuka-dayā-sindhur bandhur ānamatāṁ satām
शब्दार्थ: श्रोत्रियः · शास्त्र-जानकार · अवृजिनः · निष्पाप · अकाम-हतः · इच्छाओं से अनाहत · ब्रह्म-वित्तमः · ब्रह्म का सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता · ब्रह्मणि उपरतः · ब्रह्म में स्थिर, शांत · निरिन्धनः अनलः इव · बिना ईंधन की आग की तरह · अहेतुक-दया-सिन्धुः · बेवजह दया का समुद्र · बन्धुः · मित्र।
अर्थ: जो शास्त्र-जानकार हो, निष्पाप हो, इच्छाओं से अनाहत हो, ब्रह्म का सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता हैं, ब्रह्म में शांत-स्थिर हो, बिना ईंधन की आग की तरह, और बेवजह दया का समुद्र हो, झुकने वाले सज्जनों का मित्र हो: ऐसा गुरु हो।
भावार्थ: गुरु का पूरा चित्र। दो उपमाएँ इसमें ख़ास हैं। एक, “बिना ईंधन की आग।” आग को जलते रहने के लिए ईंधन चाहिए; पर एक ऐसी आग की कल्पना कीजिए जो बस है, जिसे और कुछ नहीं चाहिए। असली गुरु ऐसा है, उसकी शांति किसी बाहरी चीज़ पर नहीं टिकी।
दूसरी, “अहेतुक दया का समुद्र।” “अहेतुक” यानी बेवजह, बिना किसी कारण के। गुरु की करुणा कोई सौदा नहीं, किसी बदले की उम्मीद से नहीं बहती। वह बस बहती है, जैसे समुद्र बस है। ज्ञान और बेशर्त दया, असली गुरु की दो पहचान।
34 · उनकी सेवा करो, फिर पूछो
तमाराध्य गुरुं भक्त्या प्रह्वप्रश्रयसेवनैः ।
प्रसन्नं तमनुप्राप्य पृच्छेज्ज्ञातव्यमात्मनः ॥ 34 ॥
tam ārādhya guruṁ bhaktyā prahva-praśraya-sevanaiḥ · prasannaṁ tam anuprāpya pṛcchej jñātavyam ātmanaḥ
शब्दार्थ: तम् आराध्य · उनकी आराधना कर के · भक्त्या · भक्ति से · प्रह्व-प्रश्रय-सेवनैः · नम्रता, विनय और सेवा से · प्रसन्नं अनुप्राप्य · प्रसन्न पा कर · पृच्छेत् · पूछे · ज्ञातव्यम् आत्मनः · आत्मा के विषय में जो जानने योग्य है।
अर्थ: भक्ति से, नम्रता, विनय और सेवा से उस गुरु की आराधना करे; और जब वे प्रसन्न हों, तब आत्मा के विषय में जो जानने योग्य है, वह पूछे।
भावार्थ: एक छोटा सा क्रम यहाँ छिपा है, और वह आज की दुनिया में अजीब लग सकता है। शंकराचार्य कहते हैं, पहले सेवा, फिर सवाल।
हम सोचते हैं जवाब एक जानकारी है, जो माँगते ही मिल जानी चाहिए। पर यह ज्ञान ऐसा नहीं। यह तभी उतरता है जब भीतर एक खुलापन हो, एक नम्रता हैं। नम्रता और सेवा सवाल पूछने की “फ़ीस” नहीं हैं; वे ख़ुद वह बर्तन हैं जिसमें जवाब टिकता है। अकड़े हुए मन में सबसे सच्चा जवाब भी ठहर नहीं पाता।
35 · शिष्य की पुकार
स्वामिन्नमस्ते नतलोकबन्धो कारुण्यसिन्धो पतितं भवाब्धौ ।
मामुद्धरात्मीयकटाक्षदृष्ट्या ऋज्व्यातिकारुण्यसुधाभिवृष्ट्या ॥ 35 ॥
svāmin namaste nata-loka-bandho kāruṇya-sindho patitaṁ bhavābdhau · mām uddharātmīya-kaṭākṣa-dṛṣṭyā ṛjvyāti-kāruṇya-sudhābhi-vṛṣṭyā
शब्दार्थ: स्वामिन् · हे स्वामी · नत-लोक-बन्धो · झुकने वालों के बंधु · कारुण्य-सिन्धो · करुणा के समुद्र · पतितं भव-अब्धौ · संसार-समुद्र में गिरे हुए को · उद्धर · उबार · कटाक्ष-दृष्ट्या · कृपा-दृष्टि से · सुधा-अभिवृष्ट्या · अमृत की वर्षा से।
अर्थ: हे स्वामी, आपको प्रणाम, झुकने वालों के बंधु, करुणा के समुद्र। संसार-समुद्र में गिरे हुए मुझ को अपनी कृपा-दृष्टि से, अपनी सीधी, अति-करुणा भरी अमृत-वर्षा से उबार लीजिए।
भावार्थ: यहाँ से छह श्लोकों तक शिष्य ख़ुद बोलता है, और यह बातचीत का सबसे भावुक हिस्सा है। ध्यान दीजिए शिष्य कैसे बोलता है: कोई बौद्धिक सवाल नहीं। कोई दलील नहीं। बस एक पुकार।
“पतितं भव-अब्धौ”, मैं संसार के समुद्र में गिर गया हूँ। यह विवेकचूडामणि का एक ज़रूरी मोड़ है। किताब अब तक तर्क और परिभाषाओं से चल रही थी; यहाँ अचानक एक जीता-जागता इंसान अपनी पूरी बेबसी के साथ सामने आ जाता है। और शायद यही असली शुरुआत है, जब समझ “मुझे पता है” से बदल कर “मुझे बचाओ” बन जाती है।
36 · संसार की दावाग्नि
दुर्वारसंसारदवाग्नितप्तं दोधूयमानं दुरदृष्टवातैः ।
भीतं प्रपन्नं परिपाहि मृत्योः शरण्यमन्यद्यदहं न जाने ॥ 36 ॥
durvāra-saṁsāra-davāgni-taptaṁ dodhūyamānaṁ duradṛṣṭa-vātaiḥ · bhītaṁ prapannaṁ paripāhi mṛtyoḥ śaraṇyam anyad yad ahaṁ na jāne
शब्दार्थ: दुर्वार · जिसे रोका न जा सके · संसार-दव-अग्नि · संसार रूपी जंगल की आग · तप्तं · तपा हुआ · दोधूयमानं · बुरी तरह झकझोरा हुआ · दुरदृष्ट-वातैः · दुर्भाग्य की हवाओं से · भीतं प्रपन्नं · डरे हुए, शरण आए हुए · परिपाहि मृत्योः · मृत्यु से बचाइए।
अर्थ: संसार रूपी जंगल की उस आग से तपा हुआ, जिसे रोका नहीं जा सकता; दुर्भाग्य की हवाओं से बुरी तरह झकझोरा हुआ; डरा हुआ, शरण आया हुआ मुझ को मृत्यु से बचाइए, आपके सिवा कोई और शरण मैं जानता ही नहीं।
भावार्थ: शिष्य की पुकार और तीखी हो जाती है, और एक ज़बरदस्त तस्वीर के साथ, “संसार-दव-अग्नि”, संसार जंगल की आग है, जो हर तरफ़ से घेर रही है।
आख़िरी आधी पंक्ति सबसे मार्मिक है: “शरण्यम् अन्यद् यद् अहं न जाने”, और कोई शरण मैं जानता ही नहीं।यह एक तरह की पूर्णता है। जब तक कोई “और रास्ता” बचा रहता है, मन उसी की ओर देखता रहता है। शिष्य यहाँ कह रहा है, मैंने सब आज़मा लिया, अब और कुछ बचा ही नहीं। और ठीक यही पूरी तरह खुल जाना, गुरु के जवाब के लिए ज़मीन तैयार कर देता है।
37 · संत, बसंत की तरह
शान्ता महान्तो निवसन्ति सन्तो वसन्तवल्लोकहितं चरन्तः ।
तीर्णाः स्वयं भीमभवार्णवं जनान् अहेतुनान्यानपि तारयन्तः ॥ 37 ॥
śāntā mahānto nivasanti santo vasantaval loka-hitaṁ carantaḥ · tīrṇāḥ svayaṁ bhīma-bhavārṇavaṁ janān ahetunānyān api tārayantaḥ
शब्दार्थ: शान्ताः महान्तः सन्तः · शांत, महान संत · वसन्त-वत् · बसंत की तरह · लोक-हितं चरन्तः · संसार का भला करते हुए · तीर्णाः स्वयं · ख़ुद पार हुए · भीम-भव-अर्णवं · भयानक संसार-समुद्र · अहेतुना · बिना किसी कारण के · तारयन्तः · दूसरों को भी तारते हुए।
अर्थ: शांत, महान संत बसंत की तरह रहते हैं, संसार का भला करते हुए। ख़ुद भयानक संसार-समुद्र पार कर चुके, वे बिना किसी कारण के दूसरों को भी पार करा देते हैं।
भावार्थ: शिष्य अब एक सुंदर बात कहता है, संत “बसंत की तरह” होते हैं।
इस उपमा में सोचिए। बसंत आता है, और हर पेड़, हर फूल खिल उठता है, पर बसंत को किसी से कुछ नहीं चाहिए। वह किसी एक बाग़ का पक्षपात नहीं करता, इनाम नहीं माँगता। उसका स्वभाव ही खिलाना है। संत वैसे ही हैं, वे दूसरों को तारते हैं “अहेतुना”, बिना कारण। यह एक गहरी बात है: सच्ची करुणा कोई काम नहीं जो किया जाता है; वह एक स्वभाव है, जो बस बहता है।
38 · चाँद की तरह, ख़ुद-ब-ख़ुद
अयं स्वभावः स्वत एव यत्पर श्रमापनोदप्रवणं महात्मनाम् ।
सुधांशुरेष स्वयमर्ककर्कश प्रभाभितप्तामवति क्षितिं किल ॥ 38 ॥
ayaṁ svabhāvaḥ svata eva yat para śramāpanoda-pravaṇaṁ mahātmanām · sudhāṁśur eṣa svayam arka-karkaśa prabhābhitaptām avati kṣitiṁ kila
शब्दार्थ: स्वभावः स्वतः एव · स्वभाव ही ऐसा है · पर-श्रम-अपनोद-प्रवणं · दूसरों की थकान मिटाने को तत्पर · महात्मनाम् · महात्माओं का · सुधांशुः · चंद्रमा · अर्क-कर्कश-प्रभा · सूरज की कड़ी धूप · अभितप्तां · तपी हुई · अवति क्षितिं · धरती को राहत देता है।
अर्थ: महात्माओं का स्वभाव ही ऐसा है, ख़ुद-ब-ख़ुद दूसरों की थकान मिटाने को तत्पर। जैसे यह चंद्रमा, अपने आप, सूरज की कड़ी धूप से तपी हुई धरती को राहत दे देता है।
भावार्थ: शिष्य अपनी बात एक और तस्वीर से पक्की करता है, चंद्रमा।
दिन-भर सूरज की कड़ी धूप धरती को तपाती है। फिर रात में चाँद आता है, और सब कुछ ठंडा, शांत हो जाता है। चाँद ने यह करने का “फ़ैसला” नहीं किया; उसका स्वभाव ही ठंडक देना है। शिष्य कह रहा है, गुरु जी, आपकी करुणा भी ऐसी ही है। मैं इसका हक़दार हूँ या नहीं। यह सवाल ही ग़लत है; चाँद यह नहीं पूछता कि धरती हक़दार है या नहीं। यह विनती में छिपी एक चतुर बात है: करुणा माँगी नहीं जाती, वह स्वभाव से बहती है।
39 · आपके शब्दों के अमृत से सींच दीजिए
ब्रह्मानन्दरसानुभूतिकलितैः पूर्तैः सुशीतैर्युतैः युष्मद्वाक्कलशोज्झितैः श्रुतिसुखैर्वाक्यामृतैः सेचय ।
संतप्तं भवतापदावदहनज्वालाभिरेनं प्रभो धन्यास्ते भवदीक्षणक्षणगतेः पात्रीकृताः स्वीकृताः ॥ 39 ॥
brahmānanda-rasānubhūti-kalitaiḥ pūrtaiḥ suśītair yutaiḥ yuṣmad-vāk-kalaśojjhitaiḥ śruti-sukhair vākyāmṛtaiḥ secaya · saṁtaptaṁ bhava-tāpa-dāva-dahana-jvālābhir enaṁ prabho dhanyās te bhavad-īkṣaṇa-kṣaṇa-gateḥ pātrī-kṛtāḥ svī-kṛtāḥ
शब्दार्थ: ब्रह्मानन्द-रस-अनुभूति-कलितैः · ब्रह्म-आनंद के रस के अनुभव से भरे · सु-शीतैः · ख़ूब शीतल · युष्मद्-वाक्-कलश-उज्झितैः · आपकी वाणी रूपी कलश से छलके हुए · वाक्य-अमृतैः सेचय · वचनों के अमृत से सींचिए · भव-ताप-दाव-दहन-ज्वालाभिः · संसार-ताप की दावाग्नि की लपटों से · पात्री-कृताः स्वीकृताः · पात्र बना लिए, अपना लिए गए।
अर्थ: ब्रह्म-आनंद के रस से भरे, ख़ूब शीतल, आपकी वाणी-कलश से छलकते, सुनने में मीठे, ऐसे वचन-अमृत से, हे प्रभो, संसार-ताप की लपटों से जले हुए मुझ को सींच दीजिए। धन्य हैं वे, जो आपकी एक क्षण की नज़र के पात्र बन कर अपना लिए जाते हैं।
भावार्थ: शिष्य की पुकार यहाँ अपने सबसे काव्यात्मक रूप में है, और एक सुंदर तस्वीर लाती है, गुरु की वाणी एक “कलश” है, जिससे शीतल अमृत छलक रहा है।
श्लोक 36 में संसार आग था; यहाँ गुरु के शब्द पानी हैं। और शिष्य “सींचना” कहता है, एक झुलसे पौधे को सींचना। ध्यान दीजिए, शिष्य ज्ञान नहीं माँग रहा, “शीतलता” माँग रहा है। उसके लिए गुरु का जवाब कोई जानकारी नहीं। एक राहत है। और आख़िरी पंक्ति में वह कहता है, धन्य हैं वे जिन पर आपकी एक क्षण की नज़र पड़ जाए। शिष्य पूरी तरह तैयार है।
40 · मैं कुछ नहीं जानता
कथं तरेयं भवसिन्धुमेतं का वा गतिर्मे कतमोऽस्त्युपायः ।
जाने न किञ्ज्चित्कृपयाव मां प्रभो संसारदुःखक्षतिमातनुष्व ॥ 40 ॥
kathaṁ tareyaṁ bhava-sindhum etaṁ kā vā gatir me katamo’sty upāyaḥ · jāne na kiñcit kṛpayāva māṁ prabho saṁsāra-duḥkha-kṣatim ātanuṣva
शब्दार्थ: कथं तरेयं · कैसे पार करूँ · भव-सिन्धुम् · संसार-समुद्र · का वा गतिः मे · मेरी गति क्या है · कतमः उपायः · कौनसा उपाय · जाने न किञ्चित् · मैं कुछ नहीं जानता · कृपया अव मां · कृपा कर के मेरी रक्षा कीजिए · संसार-दुःख-क्षतिम् आतनुष्व · संसार-दुख का अंत कर दीजिए।
अर्थ: इस संसार-समुद्र को मैं कैसे पार करूँ? मेरी गति क्या है? कौनसा उपाय है? मैं कुछ नहीं जानता। हे प्रभो, कृपा कर के मेरी रक्षा कीजिए, संसार-दुख का अंत कर दीजिए।
भावार्थ: शिष्य की पुकार यहाँ ख़त्म होती है, और तीन सवालों और एक स्वीकारोक्ति पर। “कैसे पार करूँ? मेरी गति क्या? उपाय क्या?”, और फिर वह वाक्य जो सब कुछ खोल देता है: “जाने न किञ्चित्”, मैं कुछ नहीं जानता।
यह विवेकचूडामणि का एक गहरा क्षण है। याद कीजिए, यह शिष्य भाग 2 के मानकों पर “विद्वान” है, “मेधावी” है। फिर भी वह कहता है, मैं कुछ नहीं जानता। यह अज्ञान की स्वीकारोक्ति नहीं। एक तरह की परिपक्वता है। जब तक हम सोचते हैं “मुझे थोड़ा-बहुत तो पता है,” तब तक सीखने की पूरी जगह नहीं बनती। “मैं कुछ नहीं जानता” कह देना, वह ख़ाली बर्तन है जिसमें गुरु अब कुछ डाल सकते हैं।
41 · गुरु अभय देते हैं
तथा वदन्तं शरणागतं स्वं संसारदावानलतापतप्तम् ।
निरीक्ष्य कारुण्यरसार्द्रदृष्ट्या दद्यादभीतिं सहसा महात्मा ॥ 41 ॥
tathā vadantaṁ śaraṇāgataṁ svaṁ saṁsāra-dāvānala-tāpa-taptam · nirīkṣya kāruṇya-rasārdra-dṛṣṭyā dadyād abhītiṁ sahasā mahātmā
शब्दार्थ: तथा वदन्तं · ऐसा कहते हुए · शरण-आगतं · शरण आए हुए · संसार-दावानल-ताप-तप्तम् · संसार की दावाग्नि से तपे हुए · निरीक्ष्य · देख कर · कारुण्य-रस-आर्द्र-दृष्ट्या · करुणा-रस से भीगी दृष्टि से · दद्यात् अभीतिं · अभय दे · सहसा · तुरंत · महात्मा · महात्मा गुरु।
अर्थ: ऐसा कहते हुए, शरण आए हुए, संसार की दावाग्नि से तपे शिष्य को करुणा-रस से भीगी दृष्टि से देख कर, महात्मा गुरु तुरंत उसे अभय देते हैं।
भावार्थ: दृश्य बदलता है। अब तक शिष्य बोल रहा था; अब कैमरा गुरु की ओर मुड़ता है। और गुरु पहले क्या देते हैं, कोई शिक्षा, कोई परिभाषा? नहीं। एक शब्द: “अभीति”, अभय, निडरता।
और “सहसा”, तुरंत। गुरु इंतज़ार नहीं करते, शर्त नहीं रखते, परीक्षा नहीं लेते। शिष्य डरा हुआ है, और सबसे पहले वह डर सँभाला जाता है। यह एक गहरी बात है: कोई गहरी सीख डरे हुए मन में नहीं उतरती। पहले सुरक्षा, फिर सीख। गुरु का पहला काम पढ़ाना नहीं। आश्वस्त करना है।
42 · और तब, करुणा से, शिक्षा
विद्वान् स तस्मा उपसत्तिमीयुषे मुमुक्षवे साधु यथोक्तकारिणे ।
प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय तत्त्वोपदेशं कृपयैव कुर्यात् ॥ 42 ॥
vidvān sa tasmā upasattim īyuṣe mumukṣave sādhu yathokta-kāriṇe · praśānta-cittāya śamānvitāya tattvopadeśaṁ kṛpayaiva kuryāt
शब्दार्थ: विद्वान् सः · वह ज्ञानी गुरु · उपसत्तिम् ईयुषे · पास आए हुए को · मुमुक्षवे · मुमुक्षु को · साधु यथोक्त-कारिणे · जो कहा गया वैसा ठीक से करने वाले को · प्रशान्त-चित्ताय · शांत मन वाले को · शम-अन्विताय · शम से युक्त को · तत्त्व-उपदेशं · तत्व का उपदेश · कृपया एव · सिर्फ़ कृपा से।
अर्थ: वह ज्ञानी गुरु, पास आए हुए, मुमुक्षु, जैसा कहा गया वैसा ठीक से करने वाले, शांत मन और शम से युक्त शिष्य को, सिर्फ़ कृपा से ही तत्व का उपदेश देते हैं।
भावार्थ: दो शब्द इस श्लोक का दिल हैं: “कृपया एव”, सिर्फ़ कृपा से।
गुरु शिष्य को इसलिए नहीं पढ़ाते कि शिष्य ने सेवा की, या कि शिष्य योग्य है, या कि कोई हिसाब बराबर करना है। वे सिर्फ़ कृपा से पढ़ाते हैं, वैसे ही जैसे श्लोक 37-38 में संत बसंत की तरह, चाँद की तरह थे। और श्लोक यह भी याद दिला देता है कि शिष्य पात्र है, मुमुक्षु, शांत, शम वाला, कहा हुआ करने वाला। दोनों चीज़ें साथ चाहिए: एक खुला पात्र, और एक बेशर्त बहती कृपा।
43 · “डरो मत”
मा भैष्ट विद्वंस्तव नास्त्यपायः संसारसिन्धोस्तरणेऽस्त्युपायः ।
येनैव याता यतयोऽस्य पारं तमेव मार्गं तव निर्दिशामि ॥ 43 ॥
mā bhaiṣṭa vidvaṁs tava nāsty apāyaḥ saṁsāra-sindhos taraṇe’sty upāyaḥ · yenaiva yātā yatayo’sya pāraṁ tam eva mārgaṁ tava nirdiśāmi
शब्दार्थ: मा भैष्ट · डरो मत · विद्वन् · हे विद्वान · तव न अस्ति अपायः · आपका कोई विनाश नहीं · तरणे अस्ति उपायः · पार करने का उपाय है · येन एव याताः · जिससे ही गए · यतयः अस्य पारं · साधक इसके पार · तम् एव मार्गं निर्दिशामि · वही मार्ग मैं आपको दिखाता हूँ।
अर्थ: डरो मत, हे विद्वान, आपका कोई विनाश नहीं। संसार-समुद्र पार करने का उपाय है। जिस मार्ग से ही साधक इसके पार गए, वही मार्ग मैं आपको दिखाता हूँ।
भावार्थ: गुरु के पहले शब्द, “मा भैष्ट”, डरो मत। पूरी विवेकचूडामणि में, गुरु जो सबसे पहली बात कहते हैं, वह कोई दर्शन नहीं। एक दिलासा है।
और तीन छोटी बातें इस एक श्लोक में हैं। एक, “आपका विनाश नहीं।” आपको कुछ हैं नहीं सकता; जो असली है वह कभी मिटता नहीं। दो, “उपाय है।” यह कोई बंद गली नहीं। तीन, “जिस मार्ग से साधक पार गए”, आप पहले नहीं हो; यह रास्ता तय हुआ है, बार-बार। एक डरे हुए इंसान को और क्या चाहिए, कि आप सुरक्षित हैं, रास्ता है, और आप अकेले नहीं।
44 · एक बड़ा उपाय है
अस्त्युपायो महान् कश्चित्संसारभयनाशनः ।
तेन तीर्त्वा भवाम्भोधिं परमानन्दमाप्स्यसि ॥ 44 ॥
asty upāyo mahān kaścit saṁsāra-bhaya-nāśanaḥ · tena tīrtvā bhavāmbhodhiṁ paramānandam āpsyasi
शब्दार्थ: अस्ति उपायः महान् · एक बड़ा उपाय है · कश्चित् · कोई · संसार-भय-नाशनः · संसार के डर को मिटाने वाला · तेन तीर्त्वा · उससे पार कर के · भव-अम्भोधिं · संसार-समुद्र · परमानन्दम् आप्स्यसि · परम आनंद पाएँगे।
अर्थ: एक बड़ा उपाय है, जो संसार के डर को मिटा देता है। उससे संसार-समुद्र पार कर के आप परम आनंद पाएँगे।
भावार्थ: गुरु एक वादा करते हैं, और शब्द “परमानन्द” पर ठहरिए। शिष्य ने डर की भाषा में बात की थी, आग, समुद्र, मृत्यु। गुरु जवाब उस भाषा में नहीं देते।
शिष्य का लक्ष्य था बस डर से छूटना, बस बच जाना। गुरु कहते हैं, नहीं। मंज़िल “बच जाना” नहीं। “परम आनंद” है। यह एक प्यारा फ़र्क है। डूबता हुआ आदमी बस किनारा चाहता है; और उसे बताया जाता है कि किनारे पर सिर्फ़ सूखी ज़मीन नहीं। एक पूरा उत्सव इंतज़ार कर रहा है। रास्ता दुख से सिर्फ़ दूर नहीं ले जाता; वह आनंद की ओर ले जाता है।
45 · वेदान्त-विचार से ज्ञान
वेदान्तार्थविचारेण जायते ज्ञानमुत्तमम् ।
तेनात्यन्तिकसंसारदुःखनाशो भवत्यनु ॥ 45 ॥
vedāntārtha-vicāreṇa jāyate jñānam uttamam · tenātyantika-saṁsāra-duḥkha-nāśo bhavaty anu
शब्दार्थ: वेदान्त-अर्थ-विचारेण · वेदान्त के अर्थ के विचार से · जायते ज्ञानम् उत्तमम् · श्रेष्ठ ज्ञान जन्म लेता है · तेन · उससे · आत्यन्तिक · पूर्ण, अंतिम · संसार-दुःख-नाशः · संसार-दुख का नाश · भवति अनु · फिर हो जाता है।
अर्थ: वेदान्त के अर्थ पर विचार करने से श्रेष्ठ ज्ञान जन्म लेता है। और उससे संसार-दुख का पूर्ण, अंतिम नाश हो जाता है।
भावार्थ: गुरु ने श्लोक 44 में कहा था “एक बड़ा उपाय है।” यह श्लोक वह उपाय खोल देता है, और एक साफ़ कारण-शृंखला में: वेदान्त-विचार → श्रेष्ठ ज्ञान → दुख का अंत।
एक शब्द ख़ास है, “आत्यन्तिक”, पूर्ण और अंतिम। दुनिया के बाक़ी इलाज दुख को कुछ देर के लिए कम करते हैं, वह लौट आता है। गुरु कह रहे हैं, यह इलाज आख़िरी है। क्यों? क्योंकि यह दुख के लक्षणों पर नहीं। उसकी जड़, अज्ञान, पर काम करता है। और भाग 1 का “विचार” यहाँ फिर लौट आया, अब अपने पूरे वज़न के साथ।
46 · श्रद्धा, भक्ति, ध्यान
श्रद्धाभक्तिध्यानयोगाम्मुमुक्षोः मुक्तेर्हेतून्वक्ति साक्षाच्छ्रुतेर्गीः ।
यो वा एतेष्वेव तिष्ठत्यमुष्य मोक्षोऽविद्याकल्पिताद्देहबन्धात् ॥ 46 ॥
śraddhā-bhakti-dhyāna-yogān mumukṣoḥ mukter hetūn vakti sākṣāc chruter gīḥ · yo vā eteṣv eva tiṣṭhaty amuṣya mokṣo’vidyā-kalpitād deha-bandhāt
शब्दार्थ: श्रद्धा-भक्ति-ध्यान-योगान् · श्रद्धा, भक्ति, ध्यान और योग · मुक्तेः हेतून् · मुक्ति के कारण · वक्ति साक्षात् श्रुतेः गीः · श्रुति की वाणी साफ़ कहती है · यः एतेषु एव तिष्ठति · जो इन्हीं में टिका रहता है · अविद्या-कल्पितात् देह-बन्धात् · अज्ञान से गढ़े देह-बंधन से।
अर्थ: श्रद्धा, भक्ति, ध्यान और योग, श्रुति की वाणी इन्हें मुमुक्षु की मुक्ति का कारण साफ़ कहती है। जो इन्हीं में टिका रहता है, उसकी मुक्ति अज्ञान से गढ़े देह-बंधन से हो जाती है।
भावार्थ: गुरु यहाँ संतुलन रखते हैं। श्लोक 45 ने कहा था ज्ञान दुख मिटाता है, कहीं ऐसा न लगे कि बस सूखा बौद्धिक विश्लेषण काफ़ी है।
तो गुरु जोड़ देते हैं: श्रद्धा, भक्ति, ध्यान, योग। ज्ञान अकेला, बिना इन गुणों के, बस सिर में रहता है। यह एक दीये जैसा है, विचार की लौ चाहिए, पर उस लौ को थामे रखने के लिए श्रद्धा-भक्ति-ध्यान का दीया भी चाहिए। दोनों साथ। और गुरु फिर वही याद दिला देते हैं, बंधन “अविद्या-कल्पित” है, अज्ञान का गढ़ा हुआ; इसलिए वह जानने भर से मिट जाता है।
47 · विवेक की आग, जड़ समेत
अज्ञानयोगात्परमात्मनस्तव ह्यनात्मबन्धस्तत एव संसृतिः ।
तयोर्विवेकोदितबोधवन्हिः अज्ञानकार्यं प्रदहेत्समूलम् ॥ 47 ॥
ajñāna-yogāt paramātmanas tava hy anātma-bandhas tata eva saṁsṛtiḥ · tayor vivekodita-bodha-vanhiḥ ajñāna-kāryaṁ pradahet samūlam
शब्दार्थ: अज्ञान-योगात् · अज्ञान के जुड़ाव से · परमात्मनः तव · आप परमात्मा का · अनात्म-बन्धः · अनात्मा से बंधन · ततः एव संसृतिः · उसी से संसार-चक्र · तयोः विवेक-उदित-बोध-वन्हिः · दोनों के विवेक से उठी बोध की आग · अज्ञान-कार्यं · अज्ञान का काम · प्रदहेत् समूलम् · जड़ समेत जला दे।
अर्थ: अज्ञान के जुड़ाव से ही आप परमात्मा का अनात्मा से बंधन हुआ, और उसी से संसार-चक्र। उन दोनों, आत्मा और अनात्मा, के विवेक से उठी बोध की आग, अज्ञान के सारे काम को जड़ समेत जला देती है।
भावार्थ: गुरु यहाँ पूरी समस्या और पूरा हल एक श्लोक में रख देते हैं, और एक चौंकाने वाली बात कह जाते हैं: “परमात्मनः तव”, आप परमात्मा का। शिष्य परमात्मा है। समस्या यह नहीं कि वह छोटा है; समस्या यह है कि वह ख़ुद को छोटा मान बैठा है।
और हल, “विवेक से उठी बोध की आग।” आग की उपमा सटीक है। आप घास-फूस को हाथ से नोच-नोच कर हटाते रह सकते हैं, वह फिर उग आता है। पर आग उसे “समूलम्”, जड़ समेत, जला देती है। विवेक वही आग है। यह श्लोक 47 भाग 3 का निचोड़ है, और अब शिष्य का सवाल आने को है।
48 · शिष्य पूछता है
शिष्य उवाच,
कृपया श्रूयतां स्वामिन् प्रश्नोऽयं क्रियते मया ।
यदुत्तरमहं श्रुत्वा कृतार्थः स्यां भवन्मुखात् ॥ 48 ॥
śiṣya uvāca, kṛpayā śrūyatāṁ svāmin praśno’yaṁ kriyate mayā · yad-uttaram ahaṁ śrutvā kṛtārthaḥ syāṁ bhavan-mukhāt
शब्दार्थ: शिष्य उवाच · शिष्य ने कहा · कृपया श्रूयतां · कृपया सुनिए · प्रश्नः अयं क्रियते मया · यह प्रश्न मैं कर रहा हूँ · यद्-उत्तरम् श्रुत्वा · जिसका उत्तर सुन कर · कृतार्थः स्यां · कृतार्थ हो जाऊँ · भवत्-मुखात् · आपके मुख से।
अर्थ: शिष्य ने कहा, कृपया सुनिए, स्वामी, यह प्रश्न मैं कर रहा हूँ। आपके मुख से जिसका उत्तर सुन कर मैं कृतार्थ हैं जाऊँ।
भावार्थ: गुरु ने अभय दिया, भरोसा दिया, रास्ता बताया। अब शिष्य फिर बोलता है, पर देखिए कितना बदल गया है। श्लोक 35-40 में वह रो रहा था, गिड़गिड़ा रहा था। यहाँ वह शांत है, साफ़ है। डर सँभल चुका, अब असली सवाल पूछा जा सकता है।
और एक बात, “भवत्-मुखात्”, आपके मुख से। शिष्य कह रहा है, मुझे यह उत्तर किताब से, सुनी-सुनाई बात से नहीं चाहिए, आपके मुख से चाहिए। यह वही “उपसीदेत्” वाला भाव है (श्लोक 32), जीवित गुरु के पास बैठ कर, सीधे सुनना। अगला श्लोक वह सवाल है।
49 · चार सवाल
को नाम बन्धः कथमेष आगतः कथं प्रतिष्ठास्य कथं विमोक्षः ।
कोऽसावनात्मा परमः क आत्मा तयोर्विवेकः कथमेतदुच्यताम् ॥ 49 ॥
ko nāma bandhaḥ katham eṣa āgataḥ kathaṁ pratiṣṭhāsya kathaṁ vimokṣaḥ · ko’sāv anātmā paramaḥ ka ātmā tayor vivekaḥ katham etad ucyatām
शब्दार्थ: कः नाम बन्धः · बंधन आख़िर है क्या · कथम् एष आगतः · यह आया कैसे · कथं प्रतिष्ठा अस्य · यह टिका कैसे है · कथं विमोक्षः · इससे छुटकारा कैसे · कः असौ अनात्मा · वह अनात्मा क्या है · कः परमः आत्मा · वह परम आत्मा क्या · तयोः विवेकः कथम् · दोनों का विवेक कैसे हो · एतत् उच्यताम् · यह कहिए।
अर्थ: बंधन आख़िर है क्या? यह आया कैसे? यह टिका कैसे रहता है? इससे छुटकारा कैसे हो? वह अनात्मा क्या है, और वह परम आत्मा क्या? और दोनों का विवेक कैसे किया जाए, यह कहिए।
भावार्थ: यह विवेकचूडामणि का धुरी-श्लोक है। शिष्य का “एक” सवाल असल में सवालों का एक पूरा गुच्छा है, और बाक़ी की पूरी किताब, पाँच सौ से ज़्यादा श्लोक, इन्हीं का जवाब है।
सवाल चार हैं: बंधन क्या है, आया कैसे, टिका कैसे है, छूटे कैसे। और साथ में एक और, आत्मा और अनात्मा क्या हैं, और उनमें फ़र्क कैसे करें। ध्यान दीजिए शिष्य की बुद्धि कितनी साफ़ है: वह बस “मुझे बचाओ” पर नहीं रुका; उसने समस्या को उसके हिस्सों में तोड़ दिया। और यह कोई शुष्क प्रश्नावली नहीं, यह वह सवाल है जो हर इंसान के भीतर, कहीं न कहीं, धड़कता रहता है: मैं फँसा हुआ क्यों महसूस करता हूँ, और छूटूँ कैसे?
50 · गुरु, “धन्य हो आप”
श्रीगुरुवाच,
धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि पावितं ते कुलं त्वया ।
यदविद्याबन्धमुक्त्या ब्रह्मीभवितुमिच्छसि ॥ 50 ॥
śrī-guru-uvāca, dhanyo’si kṛta-kṛtyo’si pāvitaṁ te kulaṁ tvayā · yad avidyā-bandha-muktyā brahmī-bhavitum icchasi
शब्दार्थ: श्रीगुरुः उवाच · श्रीगुरु ने कहा · धन्यः असि · आप धन्य हैं · कृत-कृत्यः असि · आपने अपना काम पूरा कर लिया · पावितं ते कुलं · आपका कुल पवित्र हैं गया · अविद्या-बन्ध-मुक्त्या · अज्ञान-बंधन से छूट कर · ब्रह्मी-भवितुम् इच्छसि · ब्रह्म-रूप होना चाहते हैं।
अर्थ: श्रीगुरु ने कहा, आप धन्य हैं, आपने अपना काम पूरा कर लिया, आपका कुल आपसे पवित्र हैं गया, क्योंकि आप अज्ञान-बंधन से छूट कर ब्रह्म-रूप होना चाहते हैं।
भावार्थ: गुरु जवाब देना शुरू करते हैं, पर पहले वे शिष्य की तारीफ़ करते हैं, और तारीफ़ बड़ी है: “धन्य हो, कृतकृत्य हो, आपका कुल पवित्र हैं गया।”
क्यों इतनी बड़ी तारीफ़, अभी, जब शिष्य ने कुछ हासिल नहीं किया? गुरु एक बात रेखांकित कर रहे हैं: यह सही सवाल पूछ लेना ही एक बड़ी उपलब्धि है। ज़्यादातर लोग ज़िंदगी भर “बेहतर नौकरी कैसे, बेहतर रिश्ता कैसे” पूछते रह जाते हैं। जिसके भीतर से “मैं फँसा क्यों हूँ, छूटूँ कैसे” वाला सवाल उठ आया, वह पहले ही मुड़ चुका है। तारीफ़ मंज़िल पर पहुँचने की नहीं। सही दिशा में मुड़ जाने की है।
51 · बंधन से सिर्फ़ आप छुड़ा सकते हो
ऋणमोचनकर्तारः पितुः सन्ति सुतादयः ।
बन्धमोचनकर्ता तु स्वस्मादन्यो न कश्चन ॥ 51 ॥
ṛṇa-mocana-kartāraḥ pituḥ santi sutādayaḥ · bandha-mocana-kartā tu svasmād anyo na kaścana
शब्दार्थ: ऋण-मोचन-कर्तारः · कर्ज़ चुकाने वाले · पितुः · पिता के · सन्ति सुत-आदयः · बेटे आदि होते हैं · बन्ध-मोचन-कर्ता · बंधन से छुड़ाने वाला · स्वस्मात् अन्यः · ख़ुद के सिवा कोई और · न कश्चन · कोई नहीं।
अर्थ: पिता का कर्ज़ चुकाने वाले बेटे आदि हो सकते हैं। पर बंधन से छुड़ाने वाला, ख़ुद के सिवा और कोई नहीं।
भावार्थ: गुरु अब एक बात कहने वाले हैं जो छह श्लोकों तक चलेगी, और जो इस पूरे भाग का दिल है: इस रास्ते पर आपकी जगह कोई और नहीं चल सकता।
उदाहरण रोज़मर्रा का है, कर्ज़। पिता पर कर्ज़ हो, तो बेटा चुका सकता है। पैसा एक ऐसी चीज़ है जो हाथ बदल सकती है। पर भीतरी बंधन? वह हस्तांतरित नहीं होता। गुरु यहाँ एक बारीक, और बहुत ज़रूरी बात साफ़ कर रहे हैं, और यह अजीब लग सकता है, क्योंकि शिष्य अभी-अभी गुरु से “मुझे उबारो” कह कर आया है। गुरु जवाब दे रहे हैं: मैं रास्ता दिखाऊँगा, पर चलना आपको ही है। अगले श्लोक इसी को और साफ़ करेंगे।
52 · सिर का बोझ बनाम भूख
मस्तकन्यस्तभारादेर्दुःखमन्यैर्निवार्यते ।
क्षुधादिकृतदुःखं तु विना स्वेन न केनचित् ॥ 52 ॥
mastaka-nyasta-bhārāder duḥkham anyair nivāryate · kṣudhādi-kṛta-duḥkhaṁ tu vinā svena na kenacit
शब्दार्थ: मस्तक-न्यस्त-भार-आदेः · सिर पर रखे बोझ आदि का · दुःखम् अन्यैः निवार्यते · दुख दूसरों से दूर हो जाता है · क्षुधा-आदि-कृत-दुःखं · भूख आदि से हुआ दुख · विना स्वेन · ख़ुद के बिना · न केनचित् · किसी से नहीं।
अर्थ: सिर पर रखे बोझ का दुख दूसरे दूर कर सकते हैं। पर भूख आदि से हुआ दुख, ख़ुद के बिना किसी से दूर नहीं होता।
भावार्थ: गुरु एक बेहद सटीक उदाहरण देते हैं। सिर पर बोझ हो, कोई और आ कर उतार सकता है। यह एक “बाहरी” दुख है, हस्तांतरित किया जा सकता है।
पर भूख? आपकी भूख कोई और नहीं मिटा सकता। दुनिया का सबसे प्यार करने वाला इंसान भी आपकी जगह खा कर आपका पेट नहीं भर सकता। खाना आपको ही पड़ेगा। गुरु कह रहे हैं, आध्यात्मिक बंधन भूख जैसा है, सिर के बोझ जैसा नहीं। यह इतना भीतरी है कि कोई और इसे छू ही नहीं सकता। गुरु आपको थाली परोस सकते हैं; निवाला आपको ही उठाना है।
53 · मरीज़ ख़ुद दवा लेता है
पथ्यमौषधसेवा च क्रियते येन रोगिणा ।
आरोग्यसिद्धिर्दृष्टास्य नान्यानुष्ठितकर्मणा ॥ 53 ॥
pathyam auṣadha-sevā ca kriyate yena rogiṇā · ārogya-siddhir dṛṣṭāsya nānyānuṣṭhita-karmaṇā
शब्दार्थ: पथ्यम् · परहेज़, सही खान-पान · औषध-सेवा · दवा लेना · क्रियते येन रोगिणा · जिस रोगी द्वारा किया जाता है · आरोग्य-सिद्धिः दृष्टा अस्य · उसी का स्वस्थ होना देखा जाता है · न अन्य-अनुष्ठित-कर्मणा · दूसरों के किए काम से नहीं।
अर्थ: जो रोगी ख़ुद परहेज़ करता है और दवा लेता है, उसी का स्वस्थ होना देखा जाता है, दूसरों के किए काम से नहीं।
भावार्थ: गुरु तीसरा उदाहरण देते हैं, और यह सबसे साफ़ है। एक डॉक्टर सबसे अच्छा इलाज बता दे, सबसे सही दवा लिख दे, पर अगर मरीज़ दवा न ले, परहेज़ न करे, तो वह ठीक नहीं होंगे।
यह उपमा गुरु-शिष्य रिश्ते को ठीक-ठीक रख देती है। गुरु डॉक्टर हैं, वे जाँचते हैं, बीमारी पहचानते हैं, दवा बताते हैं। पर दवा निगलना, परहेज़ निभाना, वह मरीज़ का काम है। और गौर कीजिए, यह कोई कठोर बात नहीं है; यह सशक्त करने वाली बात है। इसका मतलब है, आपका ठीक होना आपके ही हाथ में है। आपको किसी के मूड, किसी की मेहरबानी का इंतज़ार नहीं करना। दवा सामने रखी है।
54 · चाँद अपनी आँख से ही दिखता है
वस्तुस्वरूपं स्फुटबोधचक्षुषा स्वेनैव वेद्यं न तु पण्डितेन ।
चन्द्रस्वरूपं निजचक्षुषैव ज्ञातव्यमन्यैरवगम्यते किम् ॥ 54 ॥
vastu-svarūpaṁ sphuṭa-bodha-cakṣuṣā svenaiva vedyaṁ na tu paṇḍitena · candra-svarūpaṁ nija-cakṣuṣaiva jñātavyam anyair avagamyate kim
शब्दार्थ: वस्तु-स्वरूपं · चीज़ का असली रूप · स्फुट-बोध-चक्षुषा · साफ़ बोध की आँख से · स्वेन एव वेद्यं · ख़ुद ही जाना जाना चाहिए · न तु पण्डितेन · पंडित के ज़रिए नहीं · चन्द्र-स्वरूपं · चाँद का रूप · निज-चक्षुषा एव · अपनी आँख से ही · अन्यैः अवगम्यते किम् · क्या दूसरों से जाना जा सकता है।
अर्थ: किसी चीज़ का असली रूप साफ़ बोध की आँख से, ख़ुद ही जाना जाना चाहिए, किसी पंडित के ज़रिए नहीं। चाँद का रूप अपनी आँख से ही जानना होता है; क्या वह दूसरों के ज़रिए जाना जा सकता है?
भावार्थ: चार उदाहरणों की लड़ी का सबसे सुंदर उदाहरण, चाँद।
कोई आपको चाँद के बारे में घंटों बता सकता है, कितना बड़ा, किस रंग का, कितनी दूर। पर जब तक आप ख़ुद आसमान की ओर आँख न उठाएँ, आपने चाँद देखा नहीं। दूसरे का वर्णन और आपका अपना देखना, दो अलग चीज़ें हैं, और एक दूसरे की जगह नहीं ले सकती। गुरु कह रहे हैं, आत्मा भी ऐसी ही है। मैं आपको इशारा कर सकता हूँ, “वहाँ देखो”, पर आँख आपको ही उठानी होगी। पूरी विवेकचूडामणि एक इशारा है; देखना शिष्य का काम है।
55 · ख़ुद के बिना कौन छुड़ाए
अविद्याकामकर्मादिपाशबन्धं विमोचितुम् ।
कः शक्नुयाद्विनात्मानं कल्पकोटिशतैरपि ॥ 55 ॥
avidyā-kāma-karmādi-pāśa-bandhaṁ vimocituṁ · kaḥ śaknuyād vinātmānaṁ kalpa-koṭi-śatair api
शब्दार्थ: अविद्या-काम-कर्म-आदि-पाश-बन्धं · अज्ञान, इच्छा, कर्म आदि के फंदे का बंधन · विमोचितुम् · खोलने के लिए · कः शक्नुयात् · कौन समर्थ है · विना आत्मानं · ख़ुद के बिना · कल्प-कोटि-शतैः अपि · सौ करोड़ कल्पों में भी।
अर्थ: अज्ञान, इच्छा, कर्म आदि के फंदे का बंधन खोलने में, ख़ुद के बिना और कौन समर्थ है, सौ करोड़ कल्पों में भी?
भावार्थ: चार उदाहरण दे चुकने के बाद गुरु बात को सीधे, बिना उपमा के दोहरा देते हैं, और इसे एक सवाल के रूप में रखते हैं, ताकि शिष्य ख़ुद उत्तर महसूस करे: आपके सिवा और कौन?
और “सौ करोड़ कल्पों में भी”, यानी कितना भी समय बीत जाए, कोई और यह काम नहीं कर सकता। यह बात बार-बार क्यों? क्योंकि यह मन की एक गहरी आदत के ख़िलाफ़ है। मन हमेशा एक “बचाने वाले” की तलाश में रहता है, कोई गुरु, कोई कृपा, कोई घटना जो आ कर सब ठीक कर दे। गुरु बहुत प्यार से, बार-बार, यह आस तोड़ रहे हैं। और यह तोड़ना दया है, क्योंकि जब तक हम बाहर देखते हैं, हम उस एकमात्र जगह नहीं देखते जहाँ काम होना है।
56 · सिर्फ़ ब्रह्म-आत्म-एकत्व के बोध से
न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया ।
ब्रह्मात्मैकत्वबोधेन मोक्षः सिध्यति नान्यथा ॥ 56 ॥
na yogena na sāṁkhyena karmaṇā no na vidyayā · brahmātmaikatva-bodhena mokṣaḥ sidhyati nānyathā
शब्दार्थ: न योगेन · न योग से · न सांख्येन · न सांख्य से · न कर्मणा · न कर्म से · नो न विद्यया · न (केवल) विद्या से · ब्रह्म-आत्म-एकत्व-बोधेन · ब्रह्म और आत्मा की एकता के बोध से · मोक्षः सिध्यति · मोक्ष सिद्ध होता है · न अन्यथा · और किसी तरह नहीं।
अर्थ: न योग से, न सांख्य से, न कर्म से, न (केवल) विद्या से, मोक्ष सिर्फ़ ब्रह्म और आत्मा की एकता के बोध से सिद्ध होता है, और किसी तरह नहीं।
भावार्थ: यह एक हिम्मत वाला श्लोक है। गुरु एक-एक कर के, उस ज़माने के सारे सम्मानित रास्ते गिनाते हैं, योग, सांख्य, कर्म, विद्या, और हर एक के आगे “न” लगा देते हैं।
क्या इसका मतलब ये रास्ते बेकार हैं? नहीं। ये मन को तैयार करते हैं, साफ़ करते हैं, उस ओर मोड़ते हैं (भाग 1 का श्लोक 11 याद कीजिए, कर्म मन साफ़ करता है)। पर “मोक्ष”, आख़िरी छूट, सिर्फ़ एक चीज़ से आती है: यह बोध कि ब्रह्म और आत्मा दो नहीं। एक हैं। और यही “अद्वैत” है, “अ-द्वैत”, दो-नहीं। गुरु इतनी सख़्ती से क्यों कहते हैं? क्योंकि मन हर रास्ते को थोड़ा-थोड़ा आज़मा कर बँटा रहना चाहता है। गुरु तीर को एक ही निशाने पर टिका देते हैं।
57 · वीणा की सुंदरता
वीणाया रूपसौन्दर्यं तन्त्रीवादनसौष्ठवम् ।
प्रजारञ्ज्जनमात्रं तन्न साम्राज्याय कल्पते ॥ 57 ॥
vīṇāyā rūpa-saundaryaṁ tantrī-vādana-sauṣṭhavam · prajā-rañjana-mātraṁ tan na sāmrājyāya kalpate
शब्दार्थ: वीणायाः रूप-सौन्दर्यं · वीणा का रूप-सौंदर्य · तन्त्री-वादन-सौष्ठवम् · तारों के बजाने की कुशलता · प्रजा-रञ्जन-मात्रं · बस लोगों के मनोरंजन भर का · न साम्राज्याय कल्पते · राज्य पाने के काम नहीं आता।
अर्थ: वीणा का रूप-सौंदर्य, और उसके तारों को बजाने की कुशलता, यह बस लोगों के मनोरंजन भर के लिए है; इससे कोई साम्राज्य नहीं मिल जाता।
भावार्थ: गुरु अब एक नई बात शुरू करते हैं, जो श्लोक 66 तक चलेगी, सिर्फ़ शब्दों और विद्वत्ता से मुक्ति नहीं। और पहला उदाहरण वीणा है।
एक इंसान वीणा बहुत सुंदर बजाए, सब वाह-वाह करें, पर इससे वह राजा नहीं बन जाता। संगीत और राज्य, दो अलग जातियों की चीज़ें हैं। गुरु इशारा कर रहे हैं: शास्त्रों की सुंदर व्याख्या, वाणी की कुशलता, ये भी वीणा-वादन जैसी हैं। सुनने में मीठी, सराहना पाने वाली, पर वे “साम्राज्य”, यानी मुक्ति, नहीं दिला सकतीं। अगला श्लोक यह बात साफ़ कर देगा।
58 · वाणी का प्रवाह, भोग के लिए, मोक्ष के लिए नहीं
वाग्वैखरी शब्दझरी शास्त्रव्याख्यानकौशलम् ।
वैदुष्यं विदुषां तद्वद्भुक्तये न तु मुक्तये ॥ 58 ॥
vāg-vaikharī śabda-jharī śāstra-vyākhyāna-kauśalam · vaiduṣyaṁ viduṣāṁ tadvad bhuktaye na tu muktaye
शब्दार्थ: वाक्-वैखरी · वाणी की धाराप्रवाह कुशलता · शब्द-झरी · शब्दों का झरना · शास्त्र-व्याख्यान-कौशलम् · शास्त्र समझाने की निपुणता · वैदुष्यं विदुषां · विद्वानों की विद्वत्ता · भुक्तये · भोग के लिए · न तु मुक्तये · मुक्ति के लिए नहीं।
अर्थ: वाणी की धाराप्रवाह कुशलता, शब्दों का झरना, शास्त्र समझाने की निपुणता, विद्वानों की विद्वत्ता, यह सब वीणा-वादन की तरह भोग के लिए है, मुक्ति के लिए नहीं।
भावार्थ: गुरु अब उपमा खोल देते हैं, और एक प्यारा शब्द-युग्म रखते हैं, “भुक्तये न तु मुक्तये।” यह सुनने में मीठा है, और इसमें गहरी बात है।
“भुक्ति” यानी भोग, आनंद। “मुक्ति” यानी छूट जाना। गुरु कह रहे हैं, सुंदर वक्तृत्व, शब्दों का प्रवाह, शास्त्रों की चमकदार व्याख्या, ये एक तरह का भोग हैं। वक्ता को सराहना का सुख मिलता है, सुनने वाले को बौद्धिक मज़ा। यह बुरा नहीं। पर यह “भोग” है, एक और सुख, और सुखों की तरह आता-जाता। यह मुक्ति नहीं। और यह चेतावनी ख़ास तौर पर एक पढ़े-लिखे, बुद्धिमान शिष्य के लिए है, क्योंकि उसका सबसे बड़ा ख़तरा यही है: सुंदर समझ को ही मंज़िल मान लेना।
59 · शास्त्र-पाठ, दोनों हाल में अधूरा
अविज्ञाते परे तत्त्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला ।
विज्ञातेऽपि परे तत्त्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला ॥ 59 ॥
avijñāte pare tattve śāstrādhītis tu niṣphalā · vijñāte’pi pare tattve śāstrādhītis tu niṣphalā
शब्दार्थ: अविज्ञाते परे तत्त्वे · परम तत्व के न जाने जाने पर · शास्त्र-अधीतिः निष्फला · शास्त्र-पाठ निष्फल · विज्ञाते अपि · जान लेने पर भी · निष्फला · निष्फल।
अर्थ: परम तत्व जाना न गया हैं, तो शास्त्र-पाठ निष्फल है। और परम तत्व जान लिया गया हैं, तब भी शास्त्र-पाठ निष्फल है।
भावार्थ: यह श्लोक एक चतुर पहेली जैसा है, दोनों हालात में शास्त्र-पाठ “निष्फल”? तो उसका फ़ायदा कब है?
दो “निष्फल” का मतलब अलग है। पहला, अगर आपने परम तत्व नहीं जाना, तो सिर्फ़ शास्त्र रट लेना बेकार है; आप जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं, पहुँच कहीं नहीं रहे। दूसरा, और यह सुंदर है, जब आपने जान लिया, तब शास्त्र-पाठ “निष्फल” इस मायने में कि अब उसकी ज़रूरत नहीं रही। एक तस्वीर: नक़्शा तब तक काम का है जब तक आप पहुँचे नहीं; पहुँच गए, तो नक़्शा मोड़ कर रख दो। शास्त्र पुल हैं, मंज़िल नहीं। पुल पर घर बना कर बैठ जाना, यही गुरु की चेतावनी है।
60 · शब्दों का जंगल
शब्दजालं महारण्यं चित्तभ्रमणकारणम् ।
अतः प्रयत्नाज्ज्ञातव्यं तत्त्वज्ञैस्तत्त्वमात्मनः ॥ 60 ॥
śabda-jālaṁ mahāraṇyaṁ citta-bhramaṇa-kāraṇam · ataḥ prayatnāj jñātavyaṁ tattva-jñais tattvam ātmanaḥ
शब्दार्थ: शब्द-जालं · शब्दों का जाल · महा-अरण्यं · घना जंगल · चित्त-भ्रमण-कारणम् · मन के भटकने का कारण · अतः प्रयत्नात् · इसलिए प्रयत्न से · ज्ञातव्यं · जान लेना चाहिए · तत्त्व-ज्ञैः · तत्व के जानकारों से · तत्त्वम् आत्मनः · आत्मा का तत्व।
अर्थ: शब्दों का जाल एक घना जंगल है, जो मन को भटका देता है। इसलिए आत्मा का तत्व, तत्व-जानकारों के पास जा कर, प्रयत्न से जान लेना चाहिए।
भावार्थ: “शब्द-जाल, महा-अरण्य।” शब्दों का जाल एक घना जंगल है। यह उपमा एकदम सटीक है।
एक जंगल में आप घंटों, दिनों चल सकते हैं, हर पेड़ अलग, हर मोड़ नया, हमेशा कुछ और देखने को। पर आप कहीं पहुँच नहीं रहे, बस घूम रहे हैं। शब्द ऐसे ही हैं, एक परिभाषा दूसरी की ओर, दूसरी तीसरी की ओर, और मन को लगता है वह काम कर रहा है, जबकि वह बस भटक रहा है। गुरु का हल दो हिस्सों में है: “प्रयत्न” (सच्ची मेहनत, बस पढ़ना नहीं) और “तत्त्व-ज्ञ” (जिसने ख़ुद जाना हो, उसके पास जाना)। जंगल से कोई वही निकाल सकता है जो रास्ता जानता हैं।
61 · साँप ने काटा हो तो
अज्ञानसर्पदष्टस्य ब्रह्मज्ञानौषधं विना ।
किमु वेदैश्च शास्त्रैश्च किमु मन्त्रैः किमौषधैः ॥ 61 ॥
ajñāna-sarpa-daṣṭasya brahma-jñānauṣadhaṁ vinā · kim u vedaiś ca śāstraiś ca kim u mantraiḥ kim auṣadhaiḥ
शब्दार्थ: अज्ञान-सर्प-दष्टस्य · अज्ञान रूपी साँप के डसे हुए का · ब्रह्म-ज्ञान-औषधं विना · ब्रह्म-ज्ञान की दवा के बिना · किम् उ वेदैः शास्त्रैः · वेदों-शास्त्रों से क्या · किम् उ मन्त्रैः औषधैः · मंत्रों-दवाओं से क्या।
अर्थ: अज्ञान रूपी साँप के डसे हुए के लिए, ब्रह्म-ज्ञान की दवा के बिना, वेदों, शास्त्रों, मंत्रों, दूसरी दवाओं से क्या होंगे?
भावार्थ: गुरु एक तीखी, ज़रूरी तस्वीर लाते हैं, अज्ञान एक साँप है, और उसने डस लिया है।
अब साँप के काटे को क्या चाहिए? एक ही चीज़, सही antidote, ठीक उस ज़हर का। आप उसके सामने वेद पढ़ सकते हैं, शास्त्र सुना सकते हैं, दूसरी दवाएँ दे सकते हैं, पर अगर ठीक वह antidote नहीं, तो ज़हर चढ़ता रहेगा। गुरु कह रहे हैं, अज्ञान का antidote एक ही है: ब्रह्म-ज्ञान। बाक़ी सब चीज़ें अच्छी हो सकती हैं, पर वे इस ख़ास ज़हर को नहीं उतारतीं। बीमारी पहचानो, तभी सही दवा चुनोगे।
62 · “दवा” कहने से बीमारी नहीं जाती
न गच्छति विना पानं व्याधिरौषधशब्दतः ।
विनापरोक्षानुभवं ब्रह्मशब्दैर्न मुच्यते ॥ 62 ॥
na gacchati vinā pānaṁ vyādhir auṣadha-śabdataḥ · vināparokṣānubhavaṁ brahma-śabdair na mucyate
शब्दार्थ: न गच्छति विना पानं · पिए बिना नहीं जाती · व्याधिः · बीमारी · औषध-शब्दतः · “दवा” शब्द कहने भर से · विना अपरोक्ष-अनुभवं · सीधे अनुभव के बिना · ब्रह्म-शब्दैः न मुच्यते · “ब्रह्म” शब्द कहने भर से मुक्ति नहीं।
अर्थ: “दवा, दवा” कहते रहने भर से बीमारी नहीं जाती, उसे पीना पड़ता है। वैसे ही, सीधे अनुभव के बिना, “ब्रह्म, ब्रह्म” कहते रहने भर से मुक्ति नहीं मिलती।
भावार्थ: श्लोक 61 की दवा वाली बात गुरु यहाँ एक हँसी ला देने वाली, और अचूक तस्वीर में बदल देते हैं। एक बीमार आदमी दवा की शीशी सामने रखे, और बार-बार बोले “दवा, दवा, दवा”, क्या वह ठीक होंगे? नहीं। दवा को पीना पड़ता है।
“अपरोक्ष-अनुभव”, यह श्लोक का चाबी-शब्द है। “परोक्ष” यानी जो आँख से ओझल, बस सुना-सुनाया हैं। “अपरोक्ष” यानी सीधा, ख़ुद का, अपनी हथेली पर। ब्रह्म के बारे में बात करना दवा का नाम लेना है; ब्रह्म का सीधा अनुभव दवा पीना है। और शायद यह गुरु की सबसे ज़रूरी चेतावनी है, ख़ास तौर पर एक समझदार पाठक के लिए, यह सब पढ़ कर, समझ कर, यह मत मान लेना कि काम हो गया। समझना दवा का नाम जानना है। अनुभव उसे पीना।
63 · सिर्फ़ शब्द से मुक्ति कहाँ
अकृत्वा दृश्यविलयमज्ञात्वा तत्त्वमात्मनः ।
ब्रह्मशब्दैः कुतो मुक्तिरुक्तिमात्रफलैर्नृणाम् ॥ 63 ॥
akṛtvā dṛśya-vilayam ajñātvā tattvam ātmanaḥ · brahma-śabdaiḥ kuto muktir ukti-mātra-phalair nṛṇām
शब्दार्थ: अकृत्वा दृश्य-विलयम् · दृश्य का विलय किए बिना · अज्ञात्वा तत्त्वम् आत्मनः · आत्मा का तत्व जाने बिना · ब्रह्म-शब्दैः · “ब्रह्म” शब्दों से · कुतः मुक्तिः · मुक्ति कहाँ · उक्ति-मात्र-फलैः · जिनका फल बस बोलना है · नृणाम् · मनुष्यों को।
अर्थ: दृश्य का विलय किए बिना, और आत्मा का तत्व जाने बिना, “ब्रह्म” शब्दों से मनुष्यों को मुक्ति कहाँ, जिन शब्दों का फल बस बोल देना भर है?
भावार्थ: गुरु दो ज़रूरी काम गिनाते हैं जो असली मुक्ति के लिए चाहिए, और जो सिर्फ़ शब्दों से नहीं होते। एक, “दृश्य-विलय।” दृश्य यानी जो देखा जाता है, यह पूरा बाहरी संसार जिसे हम ठोस, अंतिम सच मान बैठे हैं, उसका “विलय”, यानी उस ग़लत ठोसपन का घुल जाना। दो, आत्मा का तत्व जान लेना।
“उक्ति-मात्र-फल”, जिनका फल सिर्फ़ बोल देना है। यह तीखा है। कुछ लोगों के लिए आध्यात्मिक शब्द एक आदत बन जाते हैं, मुँह से निकलते हैं, सुनने में अच्छे लगते हैं, और बस। गुरु बार-बार, धैर्य से, उसी एक बात पर लौट रहे हैं: बोलना और होना, दो अलग चीज़ें हैं।
64 · “मैं राजा हूँ” कहने से राजा नहीं
अकृत्वा शत्रुसंहारमगत्वाखिलभूश्रियम् ।
राजाहमिति शब्दान्नो राजा भवितुमर्हति ॥ 64 ॥
akṛtvā śatru-saṁhāram agatvākhila-bhū-śriyam · rājāham iti śabdān no rājā bhavitum arhati
शब्दार्थ: अकृत्वा शत्रु-संहारम् · शत्रुओं को हराए बिना · अगत्वा अखिल-भू-श्रियम् · पूरी धरती का राज पाए बिना · राजा अहम् इति शब्दात् · “मैं राजा हूँ” शब्द से · नो राजा भवितुम् अर्हति · राजा नहीं बन सकता।
अर्थ: शत्रुओं को हराए बिना, और पूरी धरती का राज पाए बिना, कोई “मैं राजा हूँ” कह देने भर से राजा नहीं बन सकता।
भावार्थ: गुरु एक और मज़ेदार उदाहरण देते हैं, और यह आज की दुनिया में और भी सटीक लगता है। एक आदमी आईने के सामने खड़ा हो कर बार-बार बोले “मैं राजा हूँ, मैं राजा हूँ”, क्या वह राजा बन जाएगा? नहीं। राजा बनने के लिए कुछ असली काम चाहिए, मेहनत, संघर्ष, असली बदलाव।
यह उस आधुनिक रुझान पर एक सीधी चोट है, जहाँ लगता है कि बस सही बात दोहराने से, सही पहचान अपना लेने से, चीज़ें बदल जाएँगी। गुरु कहते हैं, पहचान का दावा करना और वह होना, दो अलग चीज़ें हैं। “मैं ब्रह्म हूँ” दोहराते रहना, बिना उस ओर असली काम किए, ठीक आईने के सामने “मैं राजा हूँ” कहने जैसा है।
65 · दबा हुआ ख़ज़ाना
आप्तोक्तिं खननं तथोपरिशिलाद्युत्कर्षणं स्वीकृतिं निक्षेपः समपेक्षते नहि बहिः शब्दैस्तु निर्गच्छति ।
तद्वद्ब्रह्मविदोपदेशमननध्यानादिभिर्लभ्यते मायाकार्यतिरोहितं स्वममलं तत्त्वं न दुर्युक्तिभिः ॥ 65 ॥
āptoktiṁ khananaṁ tathopari-śilādy-utkarṣaṇaṁ svī-kṛtiṁ nikṣepaḥ samapekṣate nahi bahiḥ śabdais tu nirgacchati · tadvad brahma-vid-upadeśa-manana-dhyānādibhir labhyate māyā-kārya-tirohitaṁ svam amalaṁ tattvaṁ na dur-yuktibhiḥ
शब्दार्थ: आप्त-उक्तिं · भरोसेमंद की बात · खननं · खुदाई · उपरि-शिला-उत्कर्षणं · ऊपर के पत्थर हटाना · स्वीकृतिं · उठा लेना · निक्षेपः · ज़मीन में गड़ा ख़ज़ाना · समपेक्षते · इन सबकी अपेक्षा रखता है · बहिः शब्दैः न निर्गच्छति · “ख़ज़ाना” बोलने से बाहर नहीं आता · ब्रह्म-विद्-उपदेश-मनन-ध्यान-आदिभिः · ब्रह्मज्ञानी के उपदेश, मनन, ध्यान आदि से · माया-कार्य-तिरोहितं · माया के काम से ढका हुआ · दुर्युक्तिभिः · कुतर्कों से।
अर्थ: ज़मीन में गड़ा ख़ज़ाना पाने के लिए चाहिए, किसी भरोसेमंद की बताई जगह, खुदाई, ऊपर के पत्थर हटाना, और फिर उसे उठा लेना। वह “ख़ज़ाना, ख़ज़ाना” बोलने भर से बाहर नहीं आता। वैसे ही, माया के काम से ढका हुआ अपना निर्मल तत्व ब्रह्मज्ञानी के उपदेश, मनन और ध्यान से मिलता है, कुतर्कों से नहीं।
भावार्थ: शब्दों वाली पूरी चर्चा का यह सबसे सुंदर उदाहरण है, दबा हुआ ख़ज़ाना। और गौर कीजिए, यह उपमा इतनी प्यारी क्यों है: ख़ज़ाना पहले से वहीं है, ज़मीन के नीचे। उसे कहीं से लाना नहीं; बस ऊपर की मिट्टी और पत्थर हटाने हैं।
और गुरु पूरी विधि गिना देते हैं, और उसमें एक-एक कदम का एक अध्यात्मिक जोड़ा है: भरोसेमंद की बात (गुरु का उपदेश), खुदाई (मनन, सुनी बात पर गहरा सोचना), पत्थर हटाना (ध्यान, आख़िरी परतें हटाना), और उठा लेना (अनुभव)। आपका असली स्वरूप एक गड़ा ख़ज़ाना है, खोया नहीं। बस ढका हुआ। और आख़िरी शब्द, “न दुर्युक्तिभिः”, कुतर्कों से नहीं। चालाक दलीलें ख़ज़ाना नहीं निकालतीं; ईमानदार खुदाई निकालती है।
66 · इसलिए, अपना प्रयत्न
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भवबन्धविमुक्तये ।
स्वैरेव यत्नः कर्तव्यो रोगादाविव पण्डितैः ॥ 66 ॥
tasmāt sarva-prayatnena bhava-bandha-vimuktaye · svair eva yatnaḥ kartavyo rogādāv iva paṇḍitaiḥ
शब्दार्थ: तस्मात् सर्व-प्रयत्नेन · इसलिए पूरे प्रयत्न से · भव-बन्ध-विमुक्तये · संसार-बंधन से छूटने के लिए · स्वैः एव यत्नः कर्तव्यः · अपना ही प्रयत्न करना चाहिए · रोग-आदौ इव · बीमारी आदि की तरह · पण्डितैः · समझदार लोगों द्वारा।
अर्थ: इसलिए, संसार-बंधन से छूटने के लिए, समझदार लोगों को अपना ही पूरा प्रयत्न करना चाहिए, ठीक जैसे बीमारी में करते हैं।
भावार्थ: “तस्मात्”, इसलिए। यह श्लोक गुरु की पूरी, लंबी बात (श्लोक 51 से) को एक गाँठ में बाँध देता है, और वह बात यही थी: ख़ुद के सिवा कोई नहीं।
और गुरु फिर वही बीमारी वाली उपमा लौटा लाते हैं (श्लोक 53)। बीमार पड़ने पर समझदार आदमी क्या करता है, हाथ पर हाथ धर कर बैठता है, या ख़ुद इलाज में जुटता है? वह जुटता है। गुरु कह रहे हैं, संसार-बंधन एक बीमारी है, और उसी समझदारी से, “सर्व-प्रयत्न”, पूरे ज़ोर से, उसमें जुटना है। यह भाग का व्यावहारिक निचोड़ है: रास्ता है, गुरु है, पर पैर आपके हैं। और अब, इसके बाद, गुरु शिष्य के सवाल का असली जवाब शुरू करते हैं।
67 · “आपका सवाल बहुत अच्छा है”
यस्त्वयाद्य कृतः प्रश्नो वरीयाञ्ज्छास्त्रविन्मतः ।
सूत्रप्रायो निगूढार्थो ज्ञातव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ 67 ॥
yas tvayādya kṛtaḥ praśno varīyāñ chāstra-vin-mataḥ · sūtra-prāyo nigūḍhārtho jñātavyaś ca mumukṣubhiḥ
शब्दार्थ: यः त्वया अद्य कृतः प्रश्नः · जो प्रश्न आज आपने किया · वरीयान् · श्रेष्ठ · शास्त्र-विद्-मतः · शास्त्र-जानकारों को मान्य · सूत्र-प्रायः · सूत्र जैसा (संक्षिप्त पर गहरा) · निगूढ-अर्थः · गूढ़ अर्थ वाला · ज्ञातव्यः मुमुक्षुभिः · मुमुक्षुओं द्वारा जानने योग्य।
अर्थ: आज आपने जो प्रश्न किया, वह श्रेष्ठ है, शास्त्र-जानकारों को मान्य है, सूत्र जैसा संक्षिप्त पर गूढ़ अर्थ वाला, और मुमुक्षुओं के जानने योग्य।
भावार्थ: गुरु जवाब देने से पहले, फिर एक बार शिष्य के सवाल की तारीफ़ करते हैं। श्लोक 50 में उन्होंने शिष्य की तारीफ़ की थी; यहाँ वे सवाल की करते हैं।
एक शब्द प्यारा है, “सूत्र-प्राय”, सूत्र जैसा। सूत्र संस्कृत में एक ऐसी रचना है जो बेहद छोटी हो, पर उसमें बहुत कुछ कसा हुआ हो, एक बीज जिसमें पूरा पेड़। गुरु कह रहे हैं, आपका छोटा सा सवाल असल में एक बीज है; इसके भीतर पूरी विद्या भरी है। एक अच्छे शिक्षक की पहचान यही है, वे जवाब देने से पहले सवाल को उसका पूरा हक़ देते हैं।
68 · “ध्यान से सुनो”
शृणुष्वावहितो विद्वन्यन्मया समुदीर्यते ।
तदेतच्छ्रवणात्सद्यो भवबन्धाद्विमोक्ष्यसे ॥ 68 ॥
śṛṇuṣvāvahito vidvan yan mayā samudīryate · tad etac chravaṇāt sadyo bhava-bandhād vimokṣyase
शब्दार्थ: शृणुष्व अवहितः · ध्यान लगा कर सुनो · विद्वन् · हे विद्वान · यत् मया समुदीर्यते · जो मैं कह रहा हूँ · तत् एतत् श्रवणात् · इसी के सुनने से · सद्यः · तुरंत · भव-बन्धात् विमोक्ष्यसे · संसार-बंधन से मुक्त हो जाएँगे।
अर्थ: ध्यान लगा कर सुनो, हे विद्वान, जो मैं कह रहा हूँ। इसी के सुनने से आप तुरंत संसार-बंधन से मुक्त हैं जाएँगे।
भावार्थ: एक सवाल उठ सकता है, गुरु अभी-अभी तो श्लोकों तक यह कहते रहे कि बोलने-सुनने भर से मुक्ति नहीं। फिर यहाँ क्यों कहते हैं “सुनने से तुरंत मुक्त हो जाओगे”?
विरोधाभास नहीं। चाबी “अवहित” शब्द में है, ध्यान लगा कर, पूरी तरह उपस्थित हो कर सुनना। यह वह सतही सुनना नहीं जिसकी निंदा हो रही थी (शब्दों का जंगल)। यह वह सुनना है जहाँ श्रोता पूरा का पूरा वहाँ हो, वेदान्त में इसे “श्रवण” कहते हैं, साधना का पहला कदम। ऐसा सुनना ख़ुद एक गहरा काम है। जब बात सही हो, बोलने वाला सच में जानता हैं, और सुनने वाला पूरी तरह खुला हो, तो समझ “तुरंत” उतर सकती है। शर्त वही एक है: अवहित, पूरी तरह उपस्थित।
69 · रास्ते की पहली झलक
मोक्षस्य हेतुः प्रथमो निगद्यते वैराग्यमत्यन्तमनित्यवस्तुषु ।
ततः शमश्चापि दमस्तितिक्षा न्यासः प्रसक्ताखिलकर्मणां भृशम् ॥ 69 ॥
mokṣasya hetuḥ prathamo nigadyate vairāgyam atyantam anitya-vastuṣu · tataḥ śamaś cāpi damas titikṣā nyāsaḥ prasaktākhila-karmaṇāṁ bhṛśam
शब्दार्थ: मोक्षस्य हेतुः प्रथमः · मोक्ष का पहला कारण · वैराग्यम् अत्यन्तम् · पूरा वैराग्य · अनित्य-वस्तुषु · अनित्य चीज़ों में · ततः · फिर · शमः दमः तितिक्षा · शम, दम, तितिक्षा · न्यासः प्रसक्त-अखिल-कर्मणां · चिपकाने वाले सब कर्मों का त्याग।
अर्थ: मोक्ष का पहला कारण कहा जाता है, अनित्य चीज़ों में पूरा वैराग्य। फिर शम, दम, तितिक्षा, और चिपका लेने वाले सब कर्मों का पूरी तरह त्याग।
भावार्थ: गुरु अब पूरे रास्ते की एक झलक देते हैं, एक नक्शा, इससे पहले कि वे विस्तार में उतरें। और देखिए, यह भाग 2 के साधन-चतुष्टय से जुड़ा हुआ है: वैराग्य, शम, दम, तितिक्षा, वही शब्द लौट आए।
पर एक फ़र्क है। भाग 2 में ये “पात्रता” थे, रास्ते पर चढ़ने से पहले की तैयारी। यहाँ गुरु इन्हें “मोक्ष का कारण” कह रहे हैं, यानी ये सिर्फ़ शुरुआती शर्तें नहीं। रास्ते का हिस्सा हैं, अंत तक साथ चलते हैं। तैयारी और साधना अलग-अलग डिब्बे नहीं; एक ही धारा है। अगला श्लोक नक्शे को पूरा करेगा।
70 · श्रवण, मनन, ध्यान, और यहीं, इसी जन्म में
ततः श्रुतिस्तन्मननं सतत्त्व ध्यानं चिरं नित्यनिरन्तरं मुनेः ।
ततोऽविकल्पं परमेत्य विद्वान् इहैव निर्वाणसुखं समृच्छति ॥ 70 ॥
tataḥ śrutis tan-mananaṁ satattva dhyānaṁ ciraṁ nitya-nirantaraṁ muneḥ · tato’vikalpaṁ param etya vidvān ihaiva nirvāṇa-sukhaṁ samṛcchati
शब्दार्थ: श्रुतिः · श्रवण (सुनना) · तत्-मननं · उस पर मनन · सतत्त्व ध्यानं · तत्व का ध्यान · चिरं नित्य-निरन्तरं · लंबे समय, नित्य, बिना रुके · मुनेः · मननशील का · अविकल्पं परम् एत्य · निर्विकल्प परम तत्व को पा कर · इह एव · यहीं, इसी जन्म में · निर्वाण-सुखं समृच्छति · निर्वाण-सुख पा लेता है।
अर्थ: फिर श्रवण, उस पर मनन, और तत्व का ध्यान, लंबे समय तक, नित्य, बिना रुके। इससे विद्वान निर्विकल्प परम तत्व को पा कर, यहीं, इसी जन्म में, निर्वाण-सुख पा लेता है।
भावार्थ: गुरु रास्ते का बाक़ी नक्शा देते हैं, श्रवण, मनन, ध्यान, और यह वेदान्त की प्रसिद्ध तिकड़ी है। श्रवण: सच को सुनना। मनन: उस पर गहराई से सोचना, अपने सारे शक मिटा देना। ध्यान (या निदिध्यासन): उस सच में बार-बार, लंबे समय तक डूबना, जब तक वह सिर्फ़ जानी हुई बात न रह कर जिया हुआ सच बन जाए।
पर इस श्लोक का असली रत्न दो शब्द हैं, “इह एव”, यहीं, इसी जन्म में। यह अद्वैत का एक सुंदर, उदार वादा है। मुक्ति मरने के बाद की कोई चीज़ नहीं। किसी और लोक की बात नहीं। निर्वाण-सुख इसी देह में, इसी जीवन में पाया जा सकता है। आगे भाग 8 में गुरु इसी “जीवन्मुक्त” का पूरा चित्र खींचेंगे।
71 · “अब आत्म-अनात्म का विवेक सुनो”
यद्बोद्धव्यं तवेदानीमात्मानात्मविवेचनम् ।
तदुच्यते मया सम्यक्श्रुत्वात्मन्यवधारय ॥ 71 ॥
yad boddhavyaṁ tavedānīm ātmānātma-vivecanam · tad ucyate mayā samyak śrutvātmany avadhāraya
शब्दार्थ: यत् बोद्धव्यं तव इदानीम् · अब आपको जो समझना है · आत्म-अनात्म-विवेचनम् · आत्मा और अनात्मा का विवेक · तत् उच्यते मया · वह मैं कहता हूँ · सम्यक् श्रुत्वा · ध्यान से सुन कर · आत्मनि अवधारय · अपने भीतर पक्का बैठा लो।
अर्थ: अब आपको जो समझना है, आत्मा और अनात्मा का विवेक, वह मैं कहता हूँ। ध्यान से सुन कर, उसे अपने भीतर पक्का बैठा लो।
भावार्थ: यह भाग 3 का आख़िरी श्लोक है, और यह एक दरवाज़ा है। गुरु ने अभय दिया, भरोसा दिया, रास्ते का नक्शा दिखाया, और शिष्य के सवाल को उसका पूरा हक़ दिया। अब असली शिक्षा शुरू होने वाली है।
“आत्म-अनात्म-विवेचन”, यही किताब का नाम भी समझा देता है: विवेक-चूडामणि, विवेक का शिरोमणि-रत्न। और गुरु एक आख़िरी, ज़रूरी बात कहते हैं, “श्रुत्वा आत्मनि अवधारय”, सुन कर अपने भीतर पक्का बैठा लो। सिर्फ़ सुनना काफ़ी नहीं (श्लोक 62 की दवा वाली बात), सिर्फ़ समझना काफ़ी नहीं। सुनी हुई बात को भीतर बिठाना है, जब तक वह आपकी न हैं जाए। और इसी के साथ, अगला भाग शरीर से शुरू होता है, सबसे पहली, सबसे ज़मीनी “अनात्मा”, और एक-एक परत उतारते हुए असली आत्मा तक पहुँचता है।
पढ़ कर आगे क्या
सीधा अगला पन्ना: भाग 4 · स्थूल और सूक्ष्म शरीर, गुरु अब शिष्य के सवाल का असली जवाब शुरू करते हैं, और सबसे ज़मीनी सिरे से: यह शरीर। “अनात्मा” क्या-क्या है, यह एक-एक कर के खुलता है।
और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 62 कहता है, “दवा” बोलने से बीमारी नहीं जाती, उसे पीना पड़ता है। आज जो कुछ आप जानते हैं पर जीते नहीं। कोई एक बात चुनिए, और आज उसे “पी” कर देखिए, बस बोल कर नहीं।