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भाग 19 · विदेह-कैवल्य और समापन

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 19 · विदेह-कैवल्य और समापन · श्लोक 546-580

पत्ता जहाँ भी गिरे, पेड़ वैसा का वैसा। घड़ा फूटा, घड़े का आकाश आकाश में मिल गया। दूध में दूध, तेल में तेल, पानी में पानी, मिल कर एक हो जाता है। यह विवेकचूडामणि का आख़िरी पन्ना है, जहाँ देह-त्याग की चिंता घुल जाती है, और अंत में वह कथन आता है जो सबसे ऊँचा है, न बद्ध, न साधक, न मुमुक्षु, न मुक्त। और फिर शिष्य की विदाई, और शंकर-भारती की जय।

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पहले एक बात

यह विवेकचूडामणि का आख़िरी भाग है। यहाँ गुरु का अंतिम संदेश है, ज्ञानी के देह-त्याग की कथा, फिर बंधन-मोक्ष को भी कल्पना बताते हुए सबसे ऊँचा सत्य, और अंत में, गुरु से शिष्य की विदाई, और शंकर-भारती की जय-घोषणा।

तस्वीरें कई हैं। एक, पत्ता पेड़ से गिरता है, कहीं भी गिरे, क्या फ़र्क पड़ता है, पेड़ वैसा का वैसा। दो, घड़ा फूटा, घड़े का आकाश आकाश में मिला; उपाधि नष्ट, ब्रह्म-वेत्ता ब्रह्म ही। तीन, दूध में दूध, तेल में तेल, पानी में पानी, मिल कर एक। चार, आख़िरी, सबसे चौंकाने वाली, न बद्ध, न साधक, न मुमुक्षु, न मुक्त। बंधन-मोक्ष भी माया-कल्पना। यह विवेकचूडामणि का अंतिम कथन है।

गुरु एक साफ़ भेद खींचते हैं, अभिमानी और मुनि का। जो स्थूल देह से नाता जोड़ कर अभिमान करता है, उसी को सुख आता है, दुख आता है, शुभ-अशुभ आते हैं, क्योंकि वह हर टकराव को मुझे लगा हुआ मानता है। पर जिस मुनि का वह बंधन ही विध्वस्त हो चुका, जो सद्-आत्मा में बैठा है, उसे शुभ-अशुभ फल कहाँ से छुएगा। और इसे समझाने के लिए गुरु आकाश से एक मिसाल उठाते हैं। ग्रहण के समय हम कहते हैं, सूर्य ग्रसित हो गया; पर सूर्य असल में ग्रसित होता ही नहीं, बस चन्द्रमा बीच में आ कर हमारी आँख से उसे ढक देता है। सूर्य वैसा का वैसा रहता है। यही भ्रांति ज्ञानी पर भी चलती है।

546 · 547

स्थूलादिसंबन्धवतोऽभिमानिनः सुखं च दुःखं च शुभाशुभे च ।
विध्वस्तबन्धस्य सदात्मनो मुनेः कुतः शुभं वाप्यशुभं फलं वा ॥ 546 ॥
तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः ।
ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्यां ह्यज्ञात्वा वस्तुलक्षणम् ॥ 547 ॥

वैसे ही देह आदि बंधनों से विमुक्त उस ब्रह्म-वेत्ता-श्रेष्ठ को मूढ़ लोग देही समझ बैठते हैं, क्योंकि उन्हें केवल शरीर का आभास भर दिखता है। पर ज्ञानी का देह से रिश्ता तो साँप और उसकी केंचुली जैसा है। साँप एक पुरानी त्वचा छोड़ कर आगे बढ़ जाता है, वह केंचुली वहीं पड़ी रहती है, इधर-उधर हवा से हिलती हुई, पर अब वह साँप नहीं रही। ज्ञानी का देह भी ऐसा ही पुराना खोल है, जिसे प्राण-वायु जैसे-तैसे हिलाती रहती है, जबकि असली मैं आगे जा चुका।

548 · 549

तद्वद्देहादिबन्धेभ्यो विमुक्तं ब्रह्मवित्तमम् ।
पश्यन्ति देहिवन्मूढाः शरीराभासदर्शनात् ॥ 548 ॥
अहिर्निर्ल्वयनीं वायं मुक्त्वा देहं तु तिष्ठति ।
इतस्ततश्चाल्यमानो यत्किंचित्प्राणवायुना ॥ 549 ॥

देह कहाँ जाएगा, कैसे बहेगा, यह ज्ञानी तय नहीं करता। जैसे पानी की धारा एक लकड़ी को ऊँचे-नीचे स्थलों पर बहा ले जाती है, वैसे ही प्रारब्ध-धारा देह को यथा-काल के भोगों में ले जाती है, और वह बिना विरोध बस बहता रहता है। ऊपर से वह संसारी की तरह भोगों में विचरता दिखता है, पर भीतर वह सिद्ध साक्षी की तरह चुप बैठा है, कुम्हार के चक्र की उस कील की तरह जो स्थिर रहती है जबकि पूरा चक्र घूमता है। न कुछ कल्पता है, न कुछ चाहता है।

550 · 551

स्त्रोतसा नीयते दारु यथा निम्नोन्नतस्थलम् ।
दैवेन नीयते देहो यथाकालोपभुक्तिषु ॥ 550 ॥
प्रारब्धकर्मपरिकल्पितवासनाभिः संसारिवच्चरति भुक्तिषु मुक्तदेहः ।
सिद्धः स्वयं वसति साक्षिवदत्र तूष्णीं चक्रस्य मूलमिव कल्पविकल्पशून्यः ॥ 551 ॥

वह इन्द्रियों को न तो विषयों में जोड़ता है, न उनसे अलग करने की मेहनत करता है। बस साक्षी-भाव में टिका रहता है, और क्रिया के फल को ज़रा भी नहीं ताकता, क्योंकि वह तो स्व-आनंद के घने रस के पान से मस्त-चित्त है। यह एक नशा है, पर सच्चा नशा, और इसी मस्ती में इन्द्रियाँ अपने आप चलती-ठहरती रहती हैं। फिर गुरु एक छोटा पर बहुत ऊँचा वाक्य देते हैं। जो यह पाना है, यह नहीं पाना है वाली चाल को छोड़ कर केवल-आत्मा में ठहर जाए, वह साक्षात् शिव ही है, वही ब्रह्म-वेत्ता-श्रेष्ठ। मुक्त पुरुष ईश्वर से अलग नहीं, यह वेदान्त की सबसे ऊँची मान्यताओं में एक है।

552 · 553

नैवेन्द्रियाणि विषयेषु नियुङ्क्त एष नैवापयुङ्क्त उप्दर्शनलक्षणस्थः ।
नैव क्रियाफलमपीषदवेक्षते स स्वानन्दसान्द्ररसपानसुमत्तचित्तः ॥ 552 ॥
लक्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत्केवलात्मना ।
शिव एव स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः ॥ 553 ॥

गुरु अब जीवन्मुक्ति और विदेह-मुक्ति की पूरी कथा एक साँस में कह देते हैं। ब्रह्म-वेत्ता-श्रेष्ठ जीते जी सदा मुक्त है, कृतार्थ है, करने को अब कुछ बचा नहीं; और जब अंत में उपाधि का नाश होता है, तब वह ब्रह्म ही हो कर निर्द्वय ब्रह्म में पूरी तरह घुल जाता है। दो चरण, पर एक ही सतत यात्रा। इसे समझाने के लिए गुरु रंगमंच की एक छवि उठाते हैं। एक नट मंच पर कभी राजा का वेश पहनता है, कभी भिखारी का; वेश हो या न हो, भीतर का पुरुष वही रहता है। ज्ञानी का देह भी बस एक वेश है, जो बदल सकता है, मिट सकता है, पर असली मैं तो सदा ब्रह्म ही, और कुछ नहीं।

554 · 555

जीवन्नेव सदा मुक्तः कृतार्थो ब्रह्मवित्तमः ।
उपाधिनाशाद्ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति निर्द्वयम् ॥ 554 ॥
शैलूषो वेषसद्भावा भावयोश्च यथा पुमान् ।
तथैव ब्रह्मविच्छ्रेष्ठः सदा ब्रह्मैव नापरः ॥ 555 ॥

अब देह-त्याग की चिंता पूरी तरह घुल जाती है। पेड़ से जो पत्ता टूट कर गिरता है, वह कहीं भी गिरे, किसको परवाह; पेड़ वैसा का वैसा रहता है। उसी तरह ब्रह्म-रूप हो चुके यति का देह जहाँ कहीं, जैसे-तैसे, गिर पड़े, इससे कोई चिंता नहीं, क्योंकि उसका असली जलना तो पहले ही हो चुका, चित्-अग्नि में। और सद्-आत्मा-ब्रह्म में पूर्ण-अद्वय-आनंद रूप से सदा बैठे उस मुनि को, इस चमड़ी-मांस-मल के पिंड को छोड़ने के लिए किसी उचित देश या काल का इंतज़ार नहीं चाहिए। देह का यह रूखा वर्णन जान-बूझ कर है, आसक्ति को आख़िरी झटका; और यह गोला कहीं भी, कभी भी गिरे, मुनि के लिए सब एक समान है।

556 · 557

यत्र क्वापि विशीर्णं सत्पर्णमिव तरोर्वपुः पततात् ।
ब्रह्मीभूतस्य यतेः प्रागेव तच्चिदग्निना दग्धम् ॥ 556 ॥
सदात्मनि ब्रह्मणि तिष्ठतो मुनेः पूर्णाद्वयानन्दमयात्मना सदा ।
न देशकालाद्युचितप्रतीक्षा त्वङ्मांसविट्पिण्डविसर्जनाय ॥ 557 ॥

यहाँ विवेकचूडामणि का एक सबसे यादगार, सबसे सीधा कथन आता है। देह का छूटना मोक्ष नहीं, संन्यासी के दंड या कमंडलु पकड़ने में मोक्ष नहीं; असली मोक्ष तो हृदय में बैठी अविद्या-ग्रंथि का खुलना है, वही और केवल वही मोक्ष है। और एक बार वह ग्रंथि खुल गई, फिर देह रहे या जाए, इससे क्या। आम लोग कहते हैं, गंगा-किनारे मरना शुभ, कहीं और अशुभ। पर पत्ता छोटी नहर में गिरे, नदी में, शिव-क्षेत्र में, या भरे चौक में, इससे पेड़ को क्या शुभ या अशुभ। ज्ञानी पेड़ है, देह उसका पत्ता; उसकी मृत्यु का कोई अच्छा-बुरा स्थान नहीं होता।

558 · 559

देहस्य मोक्षो नो मोक्षो न दण्डस्य कमण्डलोः ।
अविद्याहृदयग्रन्थिमोक्षो मोक्षो यतस्ततः ॥ 558 ॥
कुल्यायामथ नद्यां वा शिवक्षेत्रेऽपि चत्वरे ।
पर्णं पतति चेत्तेन तरोः किं नु शुभाशुभम् ॥ 559 ॥

पेड़ की यह छवि गुरु और गहरी करते हैं। पत्ते, फूल और फल का नाश होता है, वैसे ही देह, इन्द्रिय, प्राण और बुद्धि का विनाश होता है; पर अपनी सद्-आत्मक, आनंद-आकृति वाली आत्मा का नहीं, वह पेड़ की तरह सदा बनी रहती है। फिर गुरु बृहदारण्यक का प्रसिद्ध शब्द प्रज्ञान-घन लाते हैं, हर ओर ठोस ज्ञान का घन, यही आत्मा का सत्य-लक्षण है। श्रुति जब विनाश की बात करती है तो वह विनाश उपाधि का है, आत्मा का कभी नहीं; पहले वह उपाधि की चर्चा करती है, फिर उसी के नाश की।

560 · 561

पत्रस्य पुष्पस्य फलस्य नाशवद् देहेन्द्रियप्राणधियां विनाशः ।
नैवात्मनः स्वस्य सदात्मकस्या नन्दाकृतेर्वृक्षवदस्ति चैषः ॥ 560 ॥
प्रज्ञानघन इत्यात्मलक्षणं सत्यसूचकम् ।
अनूद्यौपाधिकस्यैव कथयन्ति विनाशनम् ॥ 561 ॥

इसी आश्वासन को गुरु याज्ञवल्क्य के मुख से दोहराते हैं। अविनाशी वा अरे अयम् आत्मा, ओ मैत्रेयी, यह आत्मा अविनाशी है, यह श्रुति चारों ओर विनाश-धर्मी विकारों के बीच भी आत्मा का अविनाशित्व घोषित करती है। और इसे एक ज़मीनी मिसाल से बाँधते हैं। पत्थर, पेड़, तृण, धान्य, कूड़ा, ये सब आग में जलते-जलते अंत में मिट्टी ही हो जाते हैं, अपने मूल तत्व में लौट जाते हैं। उसी तरह देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, यह सारा दृश्य ज्ञान-अग्नि में जल कर परम-आत्म-भाव में मिल जाता है। अलग-अलग दिखती ये सब चीज़ें अंत में आत्मा ही हैं।

562 · 563

अविनाशी वा अरेऽयमात्मेति श्रुतिरात्मनः ।
प्रब्रवीत्यविनाशित्वं विनश्यत्सु विकारिषु ॥ 562 ॥
पाषाणवृक्षतृणधान्यकडङ्कराद्या दग्धा भवन्ति हि मृदेव यथा तथैव ।
देहेन्द्रियासुमन आदि समस्तदृश्यं ज्ञानाग्निदग्धमुपयाति परात्मभावम् ॥ 563 ॥

अब गुरु मिलन की उपमाएँ देते हैं। विरोधी अंधेरा अपने आप में कुछ नहीं, बस रोशनी की कमी; सूर्य का तेज आते ही वह विलीन हो जाता है, और फिर एक अंधेरा-एक रोशनी, दो चीज़ें नहीं रहतीं, बस रोशनी। वैसे ही सारा दृश्य-जगत ब्रह्म में विलीन हो जाता है। और घड़े वाली वह यादगार छवि, घड़ा फूटा, तो घड़े का आकाश कहाँ गया, कहीं नहीं; वह तो हमेशा से आकाश ही था, बस घड़े की दीवारों के बीच घिरा दिखता था। दीवार गई, आकाश साफ़ हो गया। उपाधि के विलय पर ब्रह्म-वेत्ता ख़ुद ब्रह्म ही, स्फुट, साफ़, हो जाता है। कुछ घटता नहीं, बस घेरा हटता है।

564 · 565

विलक्षणं यथा ध्वान्तं लीयते भानुतेजसि ।
तथैव सकलं दृश्यं ब्रह्मणि प्रविलीयते ॥ 564 ॥
घटे नष्टे यथा व्योम व्योमैव भवति स्फुटम् ।
तथैवोपाधिविलये ब्रह्मैव ब्रह्मवित्स्वयम् ॥ 565 ॥

फिर तीन रोज़ की उपमाएँ। दूध में दूध डालो, तेल में तेल, पानी में पानी, मिल कर एक हो जाते हैं; कौन कह सकता है यह वाला दूध और वह वाला। आत्म-वेत्ता मुनि का आत्मा में मिलना ऐसा ही है, पहले से दूध-दूध ही था, बस अब एक दूध दिखता है, दो तो थे ही नहीं। इस तरह विदेह-कैवल्य, सत्-मात्र, अखंडित ब्रह्म-भाव पा कर यह यति फिर नहीं लौटता। जन्म-मरण के चक्र से वह बाहर हो गया; मुक्ति अंतिम है, अस्थायी नहीं।

566 · 567

क्षीरं क्षीरे यथा क्षिप्तं तैलं तैले जलं जले ।
संयुक्तमेकतां याति तथात्मन्यात्मविन्मुनिः ॥ 566 ॥
एवं विदेहकैवल्यं सन्मात्रत्वमखण्डितम् ।
ब्रह्मभावं प्रपद्यैष यतिर्नावर्तते पुनः ॥ 567 ॥

और इसका कारण गुरु एक प्यारे तर्क से देते हैं। सद्-आत्मा-एकत्व के विज्ञान से जिसका अविद्या-शरीर जल चुका, जो ब्रह्म ही हो गया, उसका ब्रह्म से फिर उद्भव कहाँ; ब्रह्म ख़ुद से जन्म नहीं लेता, वह तो जन्म-मरण से परे है। फिर एक सूक्ष्म बात आती है। बंधन और मोक्ष, दोनों ही माया-कल्पित हैं, स्व-आत्मा में वस्तुतः हैं ही नहीं, ठीक जैसे निष्क्रिय पड़ी रस्सी में साँप का दिखना और जाना कोई असली घटना नहीं। आत्मा में बंधन-मोक्ष भी ऐसी ही आभासी घटनाएँ हैं, दिखती हैं, पर असली कुछ नहीं।

568 · 569

सदात्मैकत्वविज्ञानदग्धाविद्यादिवर्ष्मणः ।
अमुष्य ब्रह्मभूतत्वाद्ब्रह्मणः कुत उद्भवः ॥ 568 ॥
मायाकॢप्तौ बन्धमोक्षौ न स्तः स्वात्मनि वस्तुतः ।
यथा रज्जौ निष्क्रियायां सर्पाभासविनिर्गमौ ॥ 569 ॥

इसी बात को गुरु तर्क की कसौटी पर कसते हैं। आवृति, यानी ढक्कन का होना ही बंध कहलाता है, उसका न होना मोक्ष; पर ब्रह्म पर कोई आवृति है ही नहीं, क्योंकि दूसरा कुछ है ही नहीं जो उसे ढके, इसलिए वह सदा अनावृत है। और यदि कोई आवृति मान लें, तो वह एक दूसरी चीज़ हो जाएगी, और अद्वैत टूट जाएगा; श्रुति द्वैत सहती नहीं। मूढ़ लोग बुद्धि के इस गुण को आत्म-वस्तु पर झूठे ही आरोप देते हैं, ठीक जैसे बादलों से ढकी आँख की आवृति को सूर्य पर डाल कर कहते हैं सूर्य ढक गया, जबकि सूर्य खुला ही है। आत्मा तो अद्वय, असंग, चित्-स्वरूप अक्षर है।

570 · 571

आवृतेः सदसत्त्वाभ्यां वक्तव्ये बन्धमोक्षणे ।
नावृतिर्ब्रह्मणः काचिदन्याभावादनावृतम् यद्यस्त्यद्वैतहानिः स्याद्द्वैतं नो सहते श्रुतिः ॥ 570 ॥
बन्धञ्च मोक्षञ्च मृषैव मूढा बुद्धेर्गुणं वस्तुनि कल्पयन्ति ।
दृगावृतिं मेघकृतां यथा रवौ यतोऽद्वयासङ्गचिदेतदक्षरम् ॥ 571 ॥

गुरु और भी सूक्ष्म होते हैं। है, यह विचार और नहीं है, यह विचार, ये दोनों बुद्धि के ही गुण हैं, नित्य वस्तु के नहीं; नित्य ब्रह्म न है है, न नहीं है, वह इन दोनों के परे है। ब्रह्म है कहते ही उसे एक है-नहीं वाले विभाजन में डाल दिया जाता है, जबकि वह इन सब विचारों से पहले का है। इसीलिए बंध और मोक्ष माया-कल्पित हैं, आत्मा में नहीं। जो निष्कल है, निष्क्रिय है, शांत है, निरवद्य है, निरंजन है, अद्वितीय परम-तत्व है, उसमें आकाश की तरह कल्पना कहाँ। आकाश में आप क्या कल्पना करेंगे, वह तो ख़ाली है; आत्मा भी वैसी ही सब विशेषणों के, सब कल्पनाओं के परे है।

572 · 573

अस्तीति प्रत्ययो यश्च यश्च नास्तीति वस्तुनि ।
बुद्धेरेव गुणावेतौ न तु नित्यस्य वस्तुनः ॥ 572 ॥
अतस्तौ मायया कॢप्तौ बन्धमोक्षौ न चात्मनि ।
निष्कले निष्क्रिये शान्ते निरवद्ये निरञ्जने अद्वितीये परे तत्त्वे व्योमवत्कल्पना कुतः ॥ 573 ॥

और अब विवेकचूडामणि की सबसे चौंकाने वाली, सबसे ऊँची घोषणा आती है, जिसमें माण्डूक्य उपनिषद और गौडपाद-कारिका की भाषा गूँजती है। न निरोध, न उत्पत्ति; न बद्ध, न साधक; न मुमुक्षु, न मुक्त, यही परमार्थता है। छह नकार, हर एक एक धारणा को काटता है, न कोई अंत, न कोई शुरुआत, न कभी कोई बंधन था, न कोई साधना करने वाला, न कोई मुक्ति चाहने वाला, न कोई मुक्त। यह सब बस व्यवहार के स्तर पर दिखता है; परमार्थ में कुछ हुआ ही नहीं, कोई था ही नहीं, कोई कहीं गया ही नहीं। यह वेदान्त का अंतिम वचन है। और गुरु अपना अंतिम वाक्य जोड़ते हैं, सब वेदों की चूड़ा का यह अंतिम सिद्धान्त-रूप, यह परम अति-गुह्य रहस्य आज मैंने आपको दिखाया, कलि-दोष से रहित, काम से निर्मुक्त बुद्धि वाले आपको, अपने पुत्र की ही तरह बार-बार मुमुक्षु जान कर। यह बात किसी राह चलते जिज्ञासु को नहीं, अपने पुत्र को धीरे-धीरे पका कर सिखाई गई।

574 · 575

न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ 574 ॥
सकलनिगमचूडास्वान्तसिद्धान्तरूपं परमिदमतिगुह्यं दर्शितं ते मयाद्य ।
अपगतकलिदोषं कामनिर्मुक्तबुद्धिं स्वसुतवदसकृत्त्वां भाव्यित्वा मुमुक्षुम् ॥ 575 ॥

अब कथा अपने अंतिम मोड़ पर आती है। इस तरह गुरु का वाक्य सुन कर, विनम्रता से नत हो कर, शिष्य उनकी अनुमति पा कर निर्मुक्त-बंधन हो कर चला गया। सुना, झुका, और गुरु जब जाने को कहें तभी गया, यह गुरु-शिष्य परम्परा का सुंदर नियम है। पर शिष्य चला गया, और गुरु? वह सदा-आनंद के सिन्धु में निर्मग्न-मानस, पूरी वसुधा को सब जगह पावन करता हुआ निरंतर विचरता रहा। मुक्त-गुरु रुकता नहीं, एक सेवा-धारा की तरह बस बहता रहता है, हर जगह जा कर पावन करता रहता है।

576 · 577

इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं प्रश्रयेण कृतानतिः ।
स तेन समनुज्ञातो ययौ निर्मुक्तबन्धनः ॥ 576 ॥
गुरुरेव सदानन्दसिन्धौ निर्मग्नमानसः ।
पावयन्वसुधां सर्वाण्विचचार निरन्तरः ॥ 577 ॥

अब ग्रंथ अपना पता बताता है, यह किसके लिए रचा गया। इस तरह आचार्य और शिष्य के संवाद से आत्म-लक्षण निरूपित किया गया, मुमुक्षुओं को सुख से बोध मिल जाए, इसी सिद्धि के लिए। संवाद का रूप इसीलिए चुना गया, ताकि साधक आसानी से बोध तक पहुँचे; दर्शन-शास्त्र होते हुए भी इसका लहजा सहज रखा गया। और गुरु कहते हैं, इस हितकर उपदेश को वही ग्रहण करें जिनके सब चित्त-दोष विधि से दूर हो चुके, जो संसार-सुख से विरत हैं, प्रशांत-चित्त हैं, श्रुति-रसिक यति हैं, और मुमुक्षु हैं। पाँच कसौटियाँ; यह हर किसी का ग्रंथ नहीं, यह पके हुए साधक के लिए है।

578 · 579

इत्याचार्यस्य शिष्यस्य संवादेनात्मलक्षणम् ।
निरूपितं मुमुक्षूणां सुखबोधोपपत्तये ॥ 578 ॥
हितमिदमुपदेशमाद्रियन्तां विहितनिरस्तसमस्तचित्तदोषाः ।
भवसुखविरताः प्रशान्तचित्ताः श्रुतिरसिका यतयो मुमुक्षवो ये ॥ 579 ॥

और अब अंतिम श्लोक, एक काव्य-भरी छवि के साथ। संसार-मार्ग पर लोग तपते सूरज की किरणों से उठी दाह से थके हुए, पानी की चाह में मरुभूमि में भटक रहे हैं, और वहाँ पानी? बस मरीचिका। पर बहुत पास ही, अत्यंत निकट, एक अमृत-समुद्र खड़ा है, बस कोई दिखाने वाला चाहिए। यही विवेकचूडामणि करती है, उस सुख-कारी ब्रह्म-अद्वय को, उस पास खड़े अमृत-समुद्र को दिखा देती है। और अंतिम शब्द, शंकर-भारती विजयते, निर्वाण-संदायिनी; निर्वाण देने वाली शंकर की वाणी विजयी होती है। विवेकचूडामणि यहाँ समाप्त, 580 श्लोक, एक पूरी यात्रा, सबसे पहले प्रश्न से ले कर अंत के निर्वाण-संदायिनी तक। ओम् तत् सत्।

580

संसाराध्वनि तापभानुकिरणप्रोद्भूतदाहव्यथा खिन्नानां जलकाङ्क्षया मरुभुवि भ्रान्त्या परिभ्राम्यताम् ।
अत्यासन्नसुधाम्बुधिं सुखकरं ब्रह्माद्वयं दर्शयत्य् एषा शंकरभारती विजयते निर्वाणसंदायिनी ॥ 580 ॥

विवेकचूडामणि की पूरी यात्रा

यह आख़िरी पन्ना है, विवेकचूडामणि के 580 श्लोक यहाँ पूरे हुए। पूरी यात्रा एक नज़र में, एक शिष्य का अधिकार (1-31), साधन-चतुष्टय (32-71), गुरु से मिलना और अनात्म का खंडन (72-211), साक्षी और ब्रह्म का स्थापन (212-266), तत्त्वमसि-निर्णय (267-297), वासना-क्षय और अहंकार-नाश (298-328), समाधि-विधि (329-407), जीवन्मुक्ति और कर्म-त्रय (408-470), शिष्य का जागरण और स्तोत्र (471-519), गुरु का परम-वचन और ज्ञानी की रोज़ की चाल (520-545), और अंत में, विदेह-कैवल्य, बंधन-मोक्ष भी कल्पना, और शंकर-भारती की जय (546-580)।

इस सब के बीच कुछ टेकें हृदय में बैठ जाती हैं, एकमेव अद्वयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन। हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ। वैराग्यस्य फलं बोधो, बोधस्योपरतिः फलम्। बुद्धिर्विनष्टा, गलिता प्रवृत्तिः। यही विवेकचूडामणि का हृदय है।

और सबसे ऊँचा कथन श्लोक 574 का, न निरोधो, न उत्पत्तिः; न बद्धो, न साधकः; न मुमुक्षुः, न वै मुक्तः। पहले सुनने में यह अटपटा लगता है। पर यह रहस्य उसी पर खुलता है जो इसके पास देर तक ठहरता है।

विवेकचूडामणि एक बार पढ़ने का ग्रंथ नहीं। हर पाठ पर एक नई परत खुलती है, और जो टेक हृदय में बैठ गई, वह धीरे-धीरे जीवन में उतर आती है।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, अक्षरशः।

स्थायी पता: /vivekachudamani/videha-samapan/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-23

विवेकचूडामणि यहाँ पूरी (580/580 श्लोक)। ओम् तत् सत्। 🙏

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