भाग 19 · विदेह-कैवल्य और समापन

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 19 · विदेह-कैवल्य और समापन · श्लोक 546-580

देह जहाँ-तहाँ गिरे, पत्ते की तरह, ब्रह्म-भूत यति का तो वह पहले ही चित्-अग्नि में जल चुका। मोक्ष देह का नहीं। अविद्या-हृदय-ग्रंथि का। घड़ा फूटा, आकाश आकाश ही। दूध में दूध मिला, एक हो जाता है। और अंत में, “शंकर-भारती विजयते, निर्वाण-सन्दायिनी।”

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पहले एक बात

यह विवेकचूडामणि का आख़िरी भाग है। यहाँ गुरु का अंतिम संदेश है, ज्ञानी के देह-त्याग की कथा, फिर बंधन-मोक्ष को भी “कल्पना” बताते हुए सबसे ऊँचा सत्य, और अंत में, गुरु से शिष्य की विदाई, और शंकर-भारती की जय-घोषणा।

तस्वीरें कई हैं। एक, पत्ता पेड़ से गिरता है, कहीं भी गिरे, क्या फ़र्क पड़ता है, पेड़ वैसा का वैसा। दो, घड़ा फूटा, घड़े का “आकाश” आकाश में मिला; उपाधि नष्ट, ब्रह्म-वेत्ता ब्रह्म ही। तीन, दूध में दूध, तेल में तेल, पानी में पानी, मिल कर एक। चार, आख़िरी, सबसे चौंकाने वाली: “न बद्ध, न साधक, न मुमुक्षु, न मुक्त।” बंधन-मोक्ष भी माया-कल्पना। यह विवेकचूडामणि का अंतिम कथन है।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। तीन हिस्से, देह-त्याग, ज्ञान-अग्नि से कार्य-नाश (546-563), मिलन की उपमाएँ, घटे नष्टे, क्षीरे क्षीरे (564-569), और बंधन-मोक्ष भी कल्पना, परम-कथन और समापन (570-580)। असली खंभे: 553 (शिव एव साक्षात्), 558 (मोक्ष अविद्या-ग्रंथि का, देह-दंड-कमंडलु का नहीं), 565 (घटे नष्टे), 566 (क्षीरे-क्षीरे), 574 (न निरोधो न उत्पत्तिः), 580 (शंकर-भारती विजयते)।

546 · स्थूल-संबंध-अभिमानी को सुख-दुख-शुभ-अशुभ; ध्वस्त-बंध मुनि को कहाँ

स्थूलादिसंबन्धवतोऽभिमानिनः सुखं च दुःखं च शुभाशुभे च ।
विध्वस्तबन्धस्य सदात्मनो मुनेः कुतः शुभं वाप्यशुभं फलं वा ॥ 546 ॥

sthūlādi-sambandha-vato’bhimāninaḥ sukhaṁ ca duḥkhaṁ ca śubhāśubhe ca · vidhvasta-bandhasya sad-ātmano muneḥ kutaḥ śubhaṁ vāpy aśubhaṁ phalaṁ vā

शब्दार्थ: स्थूल-आदि-सम्बन्ध-वतः अभिमानिनः · स्थूल आदि से सम्बन्ध रखने वाले अभिमानी को · सुखं च दुःखं च शुभ-अशुभे च · सुख, दुख, शुभ-अशुभ · विध्वस्त-बन्धस्य सद्-आत्मनः मुनेः · विध्वस्त-बंध, सद्-आत्मा मुनि को · कुतः शुभं वा अपि अशुभं फलं वा · कहाँ शुभ या अशुभ फल।

अर्थ: स्थूल आदि से सम्बन्ध रखने वाले अभिमानी को सुख, दुख, शुभ-अशुभ होते हैं। पर विध्वस्त-बंध, सद्-आत्मा मुनि को, कहाँ शुभ या अशुभ फल?

भावार्थ: गुरु एक साफ़ भेद करते हैं, अभिमानी और मुनि।

अभिमानी को सुख-दुख इसलिए होते हैं क्योंकि वह “मैं देह हूँ” मानता है। देह से चीज़ें टकराती हैं, और वह “मुझे” लगा हुआ मानता है। मुनि के लिए “बंध विध्वस्त”, वह कनेक्शन टूटा हुआ है। तो “मुझे क्या” वाली बात कहाँ।

547 · सूर्य ग्रस्त-जैसा दिखे, असली में अग्रस्त; भ्रांति के कारण लोग “ग्रस्त” कहते

तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः ।
ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्यां ह्यज्ञात्वा वस्तुलक्षणम् ॥ 547 ॥

tamasā grasta-vad bhānād a-grasto’pi ravir janaiḥ · grasta ity ucyate bhrāntyāṁ hy ajñātvā vastu-lakṣaṇam

शब्दार्थ: तमसा ग्रस्त-वत् भानात् · अंधेरे से ग्रस्त-जैसा दिखने से · अग्रस्तः अपि रविः · असल में अग्रस्त सूर्य भी · जनैः ग्रस्तः इति उच्यते · लोगों द्वारा “ग्रस्त” कहा जाता · भ्रान्त्यां · भ्रांति में · हि अज्ञात्वा वस्तु-लक्षणम् · असल वस्तु को न जान कर।

अर्थ: अंधेरे से ग्रस्त-जैसा दिखने से, असल में अग्रस्त सूर्य भी, लोगों द्वारा “ग्रस्त” कहा जाता है, भ्रांति में, असल वस्तु को न जान कर।

भावार्थ: गुरु एक अद्भुत खगोलीय मिसाल देते हैं, ग्रहण के समय का सूर्य।

हम कहते हैं, “सूर्य-ग्रहण है, सूर्य ग्रसित हो गया।” पर असल में सूर्य “ग्रसित” नहीं। बस चन्द्रमा बीच में आ गया, और हमारी आँख से सूर्य ढक गया। सूर्य वैसा का वैसा। यह भ्रांति है। उसी तरह, ज्ञानी “बद्ध” दिखता है, पर असल में बद्ध नहीं।

548 · वैसे ही देह-बंधनों से विमुक्त ब्रह्म-वित्तम को मूढ़ “देही” देखते

तद्वद्देहादिबन्धेभ्यो विमुक्तं ब्रह्मवित्तमम् ।
पश्यन्ति देहिवन्मूढाः शरीराभासदर्शनात् ॥ 548 ॥

tadvad dehādi-bandhebhyo vimuktaṁ brahma-vit-tamam · paśyanti dehi-van mūḍhāḥ śarīrābhāsa-darśanāt

शब्दार्थ: तद्-वद् देह-आदि-बन्धेभ्यः विमुक्तं ब्रह्म-वित्-तमम् · वैसे ही देह आदि बंधनों से विमुक्त ब्रह्म-वेत्ता-श्रेष्ठ को · पश्यन्ति देही-वत् मूढाः · मूढ़ “देही” की तरह देखते · शरीर-आभास-दर्शनात् · शरीर-आभास के दर्शन से।

अर्थ: वैसे ही, देह आदि बंधनों से विमुक्त ब्रह्म-वेत्ता-श्रेष्ठ को मूढ़ “देही” की तरह देखते हैं, शरीर-आभास के दर्शन से।

भावार्थ: गुरु पिछले श्लोक की उपमा को सीधा ज्ञानी पर लगाते हैं।

मूढ़ ज्ञानी का “शरीर-आभास” देखते हैं, और सोचते हैं, “यह तो हम जैसा ही है, देही।” पर शरीर है तो शरीर-आभास भर, असल में ज्ञानी देह से मुक्त है। यह भ्रांति है, ग्रहण-जैसी।

549 · साँप की केंचुली की तरह, देह त्याग देता है, प्राण-वायु से चलित

अहिर्निर्ल्वयनीं वायं मुक्त्वा देहं तु तिष्ठति ।
इतस्ततश्चाल्यमानो यत्किंचित्प्राणवायुना ॥ 549 ॥

ahir nirlvayanīṁ vāyaṁ muktvā dehaṁ tu tiṣṭhati · itas tataś cālyamāno yat-kiṁcit prāṇa-vāyunā

शब्दार्थ: अहिः निर्ल्वयनीम् इव · साँप अपनी केंचुली की तरह · मुक्त्वा देहं तु तिष्ठति · देह छोड़ कर रहता है · इतः ततः चाल्यमानः · इधर-उधर हिलाया जाता हुआ · यत्-किंचित् प्राण-वायुना · कुछ भी, प्राण-वायु से।

अर्थ: साँप अपनी केंचुली (पुरानी त्वचा) की तरह, [ज्ञानी] देह को छोड़ कर रहता है, कुछ भी, प्राण-वायु से इधर-उधर हिलाया जाता हुआ।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी, ज़मीनी उपमा देते हैं, साँप की केंचुली।

साँप एक त्वचा छोड़ कर आगे बढ़ता है, पुरानी त्वचा वहीं पड़ी रहती है। उसके लिए वह त्वचा अब “साँप” नहीं। एक पुराना खोल। ज्ञानी का देह से रिश्ता ऐसा ही है। देह बस “पुराना खोल”, प्राण-वायु से हिलता है, पर असली “मैं” तो आगे बढ़ चुका। यह बहुत मुक्त-कर-देने वाली तस्वीर है।

550 · पानी की धारा लकड़ी को निम्न-उन्नत स्थलों पर ले जाती; दैव देह को

स्त्रोतसा नीयते दारु यथा निम्नोन्नतस्थलम् ।
दैवेन नीयते देहो यथाकालोपभुक्तिषु ॥ 550 ॥

strotasā nīyate dāru yathā nimnonnata-sthalam · daivena nīyate deho yathā-kālopabhuktiṣu

शब्दार्थ: स्त्रोतसा नीयते दारु · पानी की धारा से लकड़ी ले जाई जाती · यथा निम्न-उन्नत-स्थलम् · निम्न-उन्नत स्थलों पर · दैवेन नीयते देहः · दैव से देह ले जाई जाती · यथा-काल-उपभुक्तिषु · यथा-काल भोगों में।

अर्थ: जैसे पानी की धारा लकड़ी को निम्न-उन्नत स्थलों पर ले जाती है, वैसे ही दैव (प्रारब्ध) देह को यथा-काल के भोगों में ले जाता है।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी, बहती उपमा देते हैं, नदी में बहती लकड़ी।

लकड़ी कहाँ जाएगी, कौनसे मोड़ पर अटकेगी, कहाँ डूबेगी, लकड़ी नहीं तय करती; नदी तय करती है। उसी तरह ज्ञानी का देह, कौनसे भोग कब आएँगे, कब जाएँगे, ज्ञानी नहीं तय करता; प्रारब्ध-धारा करती है। और वह बस बहता है, बिना विरोध।

551 · प्रारब्ध-कर्म से बनी वासनाओं से, संसारी की तरह विचरता मुक्त-देह; भीतर साक्षी, चक्र की कील की तरह स्थिर

प्रारब्धकर्मपरिकल्पितवासनाभिः संसारिवच्चरति भुक्तिषु मुक्तदेहः ।
सिद्धः स्वयं वसति साक्षिवदत्र तूष्णीं चक्रस्य मूलमिव कल्पविकल्पशून्यः ॥ 551 ॥

prārabdha-karma-parikalpita-vāsanābhiḥ saṁsāri-vac carati bhuktiṣu mukta-dehaḥ · siddhaḥ svayaṁ vasati sākṣi-vad atra tūṣṇīṁ cakrasya mūlam iva kalpa-vikalpa-śūnyaḥ

शब्दार्थ: प्रारब्ध-कर्म-परिकल्पित-वासनाभिः · प्रारब्ध-कर्म से कल्पित वासनाओं से · संसारि-वत् चरति भुक्तिषु मुक्त-देहः · संसारी की तरह भोगों में चरता मुक्त-देह · सिद्धः स्वयं वसति साक्षि-वद् · सिद्ध स्वयं रहता साक्षी की तरह · अत्र तूष्णीं · यहाँ चुप · चक्रस्य मूलम् इव · चक्र की कील की तरह · कल्प-विकल्प-शून्यः · कल्प-विकल्प से शून्य।

अर्थ: प्रारब्ध-कर्म से कल्पित वासनाओं से, मुक्त-देह संसारी की तरह भोगों में चरता है। सिद्ध स्वयं यहाँ साक्षी की तरह चुप रहता है, चक्र की कील की तरह, कल्प-विकल्प से शून्य।

भावार्थ: गुरु एक अद्भुत यंत्र-उपमा देते हैं, “चक्र की कील।”

कुम्हार का चक्र घूमता है, मिट्टी से घड़ा बनता है। पर बीच में एक कील है, जो स्थिर, वह नहीं घूमती। वही कील पूरे चक्र को सहारा देती है। ज्ञानी ऐसी ही कील है, देह घूमती है, भोग होते हैं, पर वह कील की तरह स्थिर, कुछ-कल्पना नहीं।

552 · इन्द्रियों को विषयों में न नियुक्त, न अपयुक्त; उप-दर्शन-लक्षण-स्थ; क्रिया-फल भी नहीं देखता

नैवेन्द्रियाणि विषयेषु नियुङ्क्त एष नैवापयुङ्क्त उप्दर्शनलक्षणस्थः ।
नैव क्रियाफलमपीषदवेक्षते स स्वानन्दसान्द्ररसपानसुमत्तचित्तः ॥ 552 ॥

naivendriyāṇi viṣayeṣu niyuṅkta eṣa naivāpa-yuṅkta upa-darśana-lakṣaṇa-sthaḥ · naiva kriyā-phalam apīṣad avekṣate sa svānanda-sāndra-rasa-pāna-su-matta-cittaḥ

शब्दार्थ: न एव इन्द्रियाणि विषयेषु नियुङ्क्ते एषः · न इन्द्रियों को विषयों में नियुक्त करता · न एव अपयुङ्क्ते · न अपयुक्त करता · उप-दर्शन-लक्षण-स्थः · उप-दर्शन (साक्षी) लक्षण में स्थित · न एव क्रिया-फलम् अपि ईषद् अवेक्षते · क्रिया-फल को थोड़ा भी नहीं देखता · सः स्व-आनन्द-सान्द्र-रस-पान-सु-मत्त-चित्तः · वह स्व-आनंद के घने रस के पान से मस्त-चित्त।

अर्थ: न तो इन्द्रियों को विषयों में नियुक्त करता है, न उन्हें अपयुक्त (अलग) करता है, उप-दर्शन (साक्षी) लक्षण में स्थित। क्रिया-फल को थोड़ा भी नहीं देखता, वह स्व-आनंद के घने रस के पान से मस्त-चित्त है।

भावार्थ: गुरु एक प्यारा शब्द देते हैं, “स्व-आनंद के घने रस के पान से मस्त-चित्त।”

एक नशे की तरह, पर असली, सच्चा नशा। और इस मस्ती में, इन्द्रियाँ अपने आप, कुछ करवाने का प्रयास नहीं। कुछ रोकने का भी नहीं। फल-चिंता शून्य। यह असली स्वतंत्रता है।

553 · लक्ष्य-अलक्ष्य की गति छोड़, केवल-आत्मा से रहे, साक्षात् शिव ही, ब्रह्म-वित्-उत्तम

लक्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत्केवलात्मना ।
शिव एव स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः ॥ 553 ॥

lakṣyālakṣya-gatiṁ tyaktvā yas tiṣṭhet kevalātmanā · śiva eva svayaṁ sākṣād ayaṁ brahma-vid-uttamaḥ

शब्दार्थ: लक्ष्य-अलक्ष्य-गतिं त्यक्त्वा · लक्ष्य-अलक्ष्य की गति छोड़ कर · यः तिष्ठेत् केवल-आत्मना · जो केवल-आत्मा से रहे · शिवः एव स्वयं साक्षात् अयं ब्रह्म-विद्-उत्तमः · शिव ही स्वयं साक्षात्, यह ब्रह्म-वेत्ता उत्तम।

अर्थ: लक्ष्य-अलक्ष्य की गति छोड़ कर, जो केवल-आत्मा से रहे, वह साक्षात् शिव ही, यह ब्रह्म-वेत्ता-उत्तम।

भावार्थ: गुरु एक संक्षिप्त पर बेहद ऊँचा कथन देते हैं, “वह साक्षात् शिव ही।”

“लक्ष्य-अलक्ष्य की गति”, यानी “यह पाना है, यह नहीं पाना है” की चाल। यह छोड़ी, और बस “केवल-आत्मा” से रहे, तो वह कौन है? “साक्षात् शिव।” यानी कल्याण-मूर्ति, परम-शिव। यह वेदान्त की एक सबसे ऊँची मान्यता है, मुक्त पुरुष ईश्वर से अलग नहीं।

554 · जीते जी सदा मुक्त, कृतार्थ ब्रह्म-वित्तम, उपाधि-नाश से ब्रह्म ही, निर्द्वय ब्रह्म में मिल जाता

जीवन्नेव सदा मुक्तः कृतार्थो ब्रह्मवित्तमः ।
उपाधिनाशाद्ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति निर्द्वयम् ॥ 554 ॥

jīvann eva sadā muktaḥ kṛtārtho brahma-vit-tamaḥ · upādhi-nāśād brahmaiva san brahmāpyeti nirdvayam

शब्दार्थ: जीवन् एव सदा मुक्तः कृतार्थः ब्रह्म-वित्-तमः · जीते जी सदा मुक्त, कृतार्थ, ब्रह्म-वेत्ता-श्रेष्ठ · उपाधि-नाशात् ब्रह्म एव सन् · उपाधि-नाश पर ब्रह्म ही हो कर · ब्रह्म अप्येति निर्द्वयम् · निर्द्वय ब्रह्म में मिल जाता।

अर्थ: जीते जी सदा मुक्त, कृतार्थ ब्रह्म-वेत्ता-श्रेष्ठ, उपाधि-नाश पर ब्रह्म ही हो कर, निर्द्वय ब्रह्म में मिल जाता है।

भावार्थ: गुरु जीवन्मुक्ति और विदेह-मुक्ति की कथा एक श्लोक में पूरी कर देते हैं।

पहले, “जीवन्-एव सदा मुक्त।” शरीर रहते भी मुक्त। और “कृतार्थ”, जो काम था, हो गया, और कुछ करने को बचा नहीं। फिर, “उपाधि-नाश से”, यानी जब अंत में देह छूट जाए, तब “निर्द्वय ब्रह्म” में पूरी तरह घुल जाता है। दो चरण, एक सतत यात्रा।

555 · नट जैसा वेश पहने, फिर भी “पुरुष” वही, वैसे ही ब्रह्म-वित्-श्रेष्ठ सदा ब्रह्म ही

शैलूषो वेषसद्भावा भावयोश्च यथा पुमान् ।
तथैव ब्रह्मविच्छ्रेष्ठः सदा ब्रह्मैव नापरः ॥ 555 ॥

śailūṣo veṣa-sad-bhāvā bhāvayoś ca yathā pumān · tathaiva brahma-vic-chreṣṭhaḥ sadā brahmaiva nāparaḥ

शब्दार्थ: शैलूषः वेष-सद्-भावा-भावयोः च यथा पुमान् · नट वेश-होने-न-होने में भी जैसे पुरुष · तथा एव ब्रह्म-वित्-श्रेष्ठः सदा ब्रह्म एव न अपरः · वैसे ही ब्रह्म-वेत्ता-श्रेष्ठ सदा ब्रह्म ही, और कुछ नहीं।

अर्थ: नट, वेश [पहने] हो या न हो, जैसे एक ही पुरुष होता है, वैसे ही ब्रह्म-वेत्ता-श्रेष्ठ सदा ब्रह्म ही, और कुछ नहीं।

भावार्थ: गुरु एक रंगमंच-उपमा देते हैं। एक नट (अभिनेता) मंच पर एक भूमिका निभाता है, कभी राजा, कभी भिखारी। पर वह अभिनेता वही, भीतर का “पुरुष।”

ज्ञानी का देह “वेश” है, मंच पर एक भूमिका। वह बदल सकती है, मिट सकती है, पर असली “मैं” (ब्रह्म) सदा वही। यह उपमा बहुत साफ़ है, और ज्ञानी की रोज़ की कहानी समझाती है।

556 · ब्रह्म-भूत यति का देह कहीं पत्ते की तरह गिरे, चित्-अग्नि से पहले ही जल चुका

यत्र क्वापि विशीर्णं सत्पर्णमिव तरोर्वपुः पततात् ।
ब्रह्मीभूतस्य यतेः प्रागेव तच्चिदग्निना दग्धम् ॥ 556 ॥

yatra kvāpi viśīrṇaṁ sat parṇam iva taror vapuḥ patatāt · brahmī-bhūtasya yateḥ prāg eva tac cid-agninā dagdham

शब्दार्थ: यत्र क्व अपि विशीर्णं सत् · जहाँ कहीं विशीर्ण (टूट कर) · पर्णम् इव तरोः वपुः पततात् · पेड़ के पत्ते की तरह देह गिरे · ब्रह्मी-भूतस्य यतेः · ब्रह्म-रूप हो चुके यति का · प्राग् एव तत् चित्-अग्निना दग्धम् · पहले ही वह चित्-अग्नि से जल चुका।

अर्थ: ब्रह्म-भूत यति का देह जहाँ कहीं, पेड़ के पत्ते की तरह विशीर्ण हो कर, गिरे, [चिंता नहीं], क्योंकि पहले ही वह चित्-अग्नि से जल चुका।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी प्रकृति-उपमा देते हैं, पेड़ से गिरता पत्ता।

पत्ता कहाँ गिरेगा, कौन परवाह करता है? पेड़ नहीं करता, हम नहीं करते। बस गिर गया। ज्ञानी का देह भी ऐसा ही, कब, कहाँ गिरेगा, फ़र्क नहीं पड़ता। क्यों? क्योंकि उसका असली “जलना” तो पहले ही हो चुका, “चित्-अग्नि” से। चित् = चेतना, ज्ञान। वह आग है, जो देह को “मैं” से अलग कर चुकी।

557 · सद्-आत्मा-ब्रह्म में स्थित मुनि को, त्वक्-मांस-विष्ठा-पिंड त्यागने के लिए देश-काल नहीं चाहिए

सदात्मनि ब्रह्मणि तिष्ठतो मुनेः पूर्णाद्वयानन्दमयात्मना सदा ।
न देशकालाद्युचितप्रतीक्षा त्वङ्मांसविट्पिण्डविसर्जनाय ॥ 557 ॥

sad-ātmani brahmaṇi tiṣṭhato muneḥ pūrṇādvayānanda-mayātmanā sadā · na deśa-kālādy-ucita-pratīkṣā tvaṅ-māṁsa-viṭ-piṇḍa-visarjanāya

शब्दार्थ: सद्-आत्मनि ब्रह्मणि तिष्ठतः मुनेः · सद्-आत्मा-ब्रह्म में स्थित मुनि को · पूर्ण-अद्वय-आनन्द-मय-आत्मना सदा · पूर्ण-अद्वय-आनंद-मय आत्मा से सदा · न देश-काल-आदि-उचित-प्रतीक्षा · देश-काल आदि की उचित प्रतीक्षा नहीं · त्वक्-मांस-विट्-पिण्ड-विसर्जनाय · चमड़ी-मांस-मल के पिंड (शरीर) के विसर्जन के लिए।

अर्थ: सद्-आत्मा-ब्रह्म में स्थित मुनि को, पूर्ण-अद्वय-आनंद-मय आत्मा के रूप में सदा, चमड़ी-मांस-मल के पिंड के विसर्जन के लिए देश-काल आदि की उचित प्रतीक्षा नहीं।

भावार्थ: गुरु बहुत स्पष्ट, थोड़ा रूखा वर्णन देते हैं, देह “त्वक्-मांस-विट्-पिंड” है। चमड़ी, मांस, मल का गोला।

यह वर्णन जान-बूझ कर है, देह के प्रति आसक्ति को आख़िरी झटका। और यह “गोला” कब, कहाँ गिरे, किसी “उचित” मौक़े का इंतज़ार नहीं। गंगा-किनारे, श्मशान, घर, कोई भी जगह, कोई भी समय। मुनि के लिए सब एक।

558 · मोक्ष देह का नहीं। दंड-कमंडलु का नहीं। अविद्या-हृदय-ग्रंथि का मोक्ष ही मोक्ष

देहस्य मोक्षो नो मोक्षो न दण्डस्य कमण्डलोः ।
अविद्याहृदयग्रन्थिमोक्षो मोक्षो यतस्ततः ॥ 558 ॥

dehasya mokṣo no mokṣo na daṇḍasya kamaṇḍaloḥ · avidyā-hṛdaya-granthi-mokṣo mokṣo yatas tataḥ

शब्दार्थ: देहस्य मोक्षः नो मोक्षः · देह का मोक्ष, मोक्ष नहीं · न दण्डस्य कमण्डलोः · न दंड (डंडा) का, न कमंडलु का · अविद्या-हृदय-ग्रन्थि-मोक्षः · अविद्या की हृदय-ग्रंथि का मोक्ष · मोक्षः यतः ततः · वही मोक्ष, इसलिए।

अर्थ: देह का मोक्ष, मोक्ष नहीं; न दंड, न कमंडलु का। अविद्या की हृदय-ग्रंथि का मोक्ष ही मोक्ष है।

भावार्थ: यह विवेकचूडामणि का एक सबसे यादगार, सबसे सीधा कथन है। “मोक्ष” क्या नहीं। और क्या है।

देह के छूटने को “मुक्ति” कहना, ग़लत। संन्यासी के दंड या कमंडलु पकड़ने को “मुक्ति” कहना, और ग़लत। असली मुक्ति, हृदय में बैठी “अविद्या-ग्रंथि” का खुलना। यह बौद्धिक नहीं। अनुभव से, अंदर। और एक बार ग्रंथि खुली, चाहे शरीर रहे या जाए, चाहे दंड हो या न हो, मुक्ति है।

559 · कुल्या में हो या नदी में या शिव-क्षेत्र में या चौक में, पत्ता गिरे, पेड़ को क्या शुभ-अशुभ

कुल्यायामथ नद्यां वा शिवक्षेत्रेऽपि चत्वरे ।
पर्णं पतति चेत्तेन तरोः किं नु शुभाशुभम् ॥ 559 ॥

kulyāyām atha nadyāṁ vā śiva-kṣetre’pi catvare · parṇaṁ patati cet tena taroḥ kiṁ nu śubhāśubham

शब्दार्थ: कुल्यायाम् अथ नद्यां वा · छोटी नहर में हो या नदी में · शिव-क्षेत्रे अपि चत्वरे · शिव-क्षेत्र में या चौक में · पर्णं पतति चेत् तेन · पत्ता गिरे तो उससे · तरोः किं नु शुभ-अशुभम् · पेड़ को क्या शुभ-अशुभ।

अर्थ: छोटी नहर में, नदी में, शिव-क्षेत्र में, या चौक में, पत्ता गिरे तो उससे पेड़ को क्या शुभ-अशुभ?

भावार्थ: गुरु पत्ते की उपमा को और गहरा करते हैं, पत्ता कहाँ गिरे, पेड़ को क्या फ़र्क।

आम तौर पर लोग कहते हैं, “गंगा-किनारे मरना शुभ, कहीं और अशुभ।” गुरु कहते हैं, यह बात देह के लिए हैं सकती है (अंध-विश्वास), पर ज्ञानी “पेड़” है, और देह “पत्ता।” पत्ते का गिरना पेड़ का “शुभ-अशुभ” नहीं। तो ज्ञानी की “मृत्यु” का कोई “अच्छा-बुरा” स्थान नहीं।

560 · पत्ते-फूल-फल के नाश की तरह देह-इन्द्रिय-प्राण-धी का नाश; आत्मा का नहीं। पेड़ की तरह

पत्रस्य पुष्पस्य फलस्य नाशवद् देहेन्द्रियप्राणधियां विनाशः ।
नैवात्मनः स्वस्य सदात्मकस्या नन्दाकृतेर्वृक्षवदस्ति चैषः ॥ 560 ॥

patrasya puṣpasya phalasya nāśa-vad dehendriya-prāṇa-dhiyāṁ vināśaḥ · naivātmanaḥ svasya sad-ātmakasyā nandākṛter vṛkṣa-vad asti caiṣaḥ

शब्दार्थ: पत्रस्य पुष्पस्य फलस्य नाश-वद् · पत्ते, फूल, फल के नाश की तरह · देह-इन्द्रिय-प्राण-धियां विनाशः · देह, इन्द्रिय, प्राण, बुद्धि का विनाश · न एव आत्मनः स्वस्य सद्-आत्मकस्य · पर अपनी सद्-आत्मक आत्मा का नहीं · आनन्द-आकृतेः वृक्ष-वद् · आनंद-आकृति, पेड़ की तरह · अस्ति च एषः · है यह।

अर्थ: पत्ते, फूल, फल के नाश की तरह, देह, इन्द्रिय, प्राण, बुद्धि का विनाश होता है। पर अपनी सद्-आत्मक, आनंद-आकृति वाली आत्मा का नहीं। पेड़ की तरह वह बना रहता है।

भावार्थ: गुरु पेड़-उपमा को आगे बढ़ाते हैं, एक पेड़ के “अंग” हैं: पत्ते, फूल, फल। ये बदलते रहते हैं, गिरते हैं, फिर निकलते हैं।

पर पेड़? वह वैसा का वैसा। आपकी देह-इन्द्रिय-प्राण-बुद्धि, ये पत्ते-फूल-फल हैं। ये गिरेंगे, नए आएँगे। पर आत्मा, पेड़, हमेशा।

561 · “प्रज्ञान-घन”, आत्म-लक्षण सत्य-सूचक; नाश तो उपाधि का बताया जाता

प्रज्ञानघन इत्यात्मलक्षणं सत्यसूचकम् ।
अनूद्यौपाधिकस्यैव कथयन्ति विनाशनम् ॥ 561 ॥

prajñāna-ghana ity ātma-lakṣaṇaṁ satya-sūcakam · anūdyaupādhikasyaiva kathayanti vināśanam

शब्दार्थ: प्रज्ञान-घनः इति आत्म-लक्षणं सत्य-सूचकम् · “प्रज्ञान-घन”, यह आत्म-लक्षण सत्य-सूचक · अनूद्य औपाधिकस्य एव · उपाधि का ही अनूदय (पुनः-कथन कर के) · कथयन्ति विनाशनम् · विनाश कहते।

अर्थ: “प्रज्ञान-घन”, यह आत्म-लक्षण सत्य-सूचक है। उपाधि का ही अनूदय (पुनः-कथन कर के), उसका विनाश कहा जाता है।

भावार्थ: गुरु एक प्रसिद्ध उपनिषद-शब्द “प्रज्ञान-घन” (बृहदारण्यक) पर बात करते हैं।

यह आत्मा का सत्य-लक्षण है, “ज्ञान का घन।” यानी हर तरफ़ ठोस ज्ञान। और कुछ श्रुतियों में “विनाश” की बात आती है, पर वह विनाश “उपाधि” का, “आत्मा” का नहीं। श्रुति पहले उपाधि की चर्चा करती है, फिर उसके विनाश की बात, आत्मा का विनाश कभी नहीं।

562 · “अविनाशी वा अरे अयम् आत्मा”, श्रुति आत्मा का अविनाशित्व कहती है, विनश्यत् विकारियों में भी

अविनाशी वा अरेऽयमात्मेति श्रुतिरात्मनः ।
प्रब्रवीत्यविनाशित्वं विनश्यत्सु विकारिषु ॥ 562 ॥

avināśī vā are’yam ātmeti śrutir ātmanaḥ · prabravīty avināśitvaṁ vinaśyatsu vikāriṣu

शब्दार्थ: अविनाशी वा अरे अयम् आत्मा इति श्रुतिः · “अविनाशी, ओ! यह आत्मा”, श्रुति · आत्मनः प्रब्रवीति अविनाशित्वं · आत्मा का अविनाशित्व बताती · विनश्यत्सु विकारिषु · विनाश-धर्मी विकारियों में [भी]।

अर्थ: “अविनाशी, ओ! यह आत्मा”, यह श्रुति आत्मा का अविनाशित्व बताती है, विनाश-धर्मी विकारियों के बीच भी।

भावार्थ: गुरु बृहदारण्यक उपनिषद की प्रसिद्ध पंक्ति “अविनाशी वा अरे अयम् आत्मा” (4.5.14) लाते हैं। यह याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को कहा था।

“अरे” शब्द भी ख़ास है, एक प्यारा, स्नेह-भरा संबोधन (“ओ!”)। श्रुति कहती है, चारों ओर विनाश हो, पर आत्मा अविनाशी। यह बस आश्वासन नहीं। यह तथ्य है।

563 · पत्थर-पेड़-तृण-धान्य-कूड़ा जले, मिट्टी ही; देह-इन्द्रिय-प्राण-मन ज्ञान-अग्नि से जला, परम-आत्म-भाव

पाषाणवृक्षतृणधान्यकडङ्कराद्या दग्धा भवन्ति हि मृदेव यथा तथैव ।
देहेन्द्रियासुमन आदि समस्तदृश्यं ज्ञानाग्निदग्धमुपयाति परात्मभावम् ॥ 563 ॥

pāṣāṇa-vṛkṣa-tṛṇa-dhānya-kaḍaṅkarādyā dagdhā bhavanti hi mṛd eva yathā tathaiva · dehendriyāsu-mana ādi samasta-dṛśyaṁ jñānāgni-dagdham upayāti parātma-bhāvam

शब्दार्थ: पाषाण-वृक्ष-तृण-धान्य-कडङ्कर-आद्याः दग्धाः भवन्ति हि मृद् एव यथा · पत्थर, पेड़, तृण, धान्य, कूड़ा आदि जल कर मिट्टी ही हो जाते हैं · तथा एव देह-इन्द्रिय-असु-मन-आदि समस्त-दृश्यं · वैसे ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन आदि सब दृश्य · ज्ञान-अग्नि-दग्धम् उपयाति परम-आत्म-भावम् · ज्ञान-अग्नि से जल कर परम-आत्म-भाव में जाते।

अर्थ: पत्थर, पेड़, तृण, धान्य, कूड़ा, जल कर मिट्टी ही हो जाते हैं। वैसे ही, देह, इन्द्रिय, प्राण, मन आदि सब दृश्य, ज्ञान-अग्नि से जल कर परम-आत्म-भाव में जाते हैं।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी, ज़मीनी उपमा देते हैं, चीज़ें जलें, राख होगी; पर जब और जलें, अंत में सब मिट्टी।

“मिट्टी” यानी मूल तत्व, जहाँ से आईं। उसी तरह, देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, ये सब “ज्ञान-अग्नि” में जल कर “परम-आत्म-भाव” में मिल जाते हैं। यानी अलग-अलग दिखती ये सब चीज़ें, अंत में “आत्मा” ही।

564 · अंधेरा सूर्य-तेज में विलीन, वैसे सब दृश्य ब्रह्म में

विलक्षणं यथा ध्वान्तं लीयते भानुतेजसि ।
तथैव सकलं दृश्यं ब्रह्मणि प्रविलीयते ॥ 564 ॥

vi-lakṣaṇaṁ yathā dhvāntaṁ līyate bhānu-tejasi · tathaiva sakalaṁ dṛśyaṁ brahmaṇi pravilīyate

शब्दार्थ: विलक्षणं यथा ध्वान्तं लीयते भानु-तेजसि · विलक्षण (विरोधी) अंधेरा जैसे सूर्य-तेज में विलीन · तथा एव सकलं दृश्यं ब्रह्मणि प्रविलीयते · वैसे ही सकल दृश्य ब्रह्म में विलीन हो जाता।

अर्थ: विलक्षण (विरोधी) अंधेरा जैसे सूर्य-तेज में विलीन हो जाता है, वैसे ही सकल दृश्य ब्रह्म में विलीन हो जाता है।

भावार्थ: गुरु एक सीधा-सादा रूपक देते हैं, अंधेरा और रोशनी।

अंधेरा अपने आप में कुछ नहीं। बस रोशनी की कमी। सूर्य उगा, और अंधेरा “विलीन।” वहाँ अब “एक अंधेरा” और “एक रोशनी”, दो चीज़ें नहीं; बस रोशनी। दृश्य-जगत वैसा ही, ब्रह्म-रोशनी आते ही “विलीन।”

565 · घटे नष्टे, आकाश आकाश ही; उपाधि-विलय पर ब्रह्म-वित् ख़ुद ब्रह्म ही

घटे नष्टे यथा व्योम व्योमैव भवति स्फुटम् ।
तथैवोपाधिविलये ब्रह्मैव ब्रह्मवित्स्वयम् ॥ 565 ॥

ghaṭe naṣṭe yathā vyoma vyomaiva bhavati sphuṭam · tathaivopādhi-vilaye brahmaiva brahma-vit svayam

शब्दार्थ: घटे नष्टे यथा व्योम व्योम एव भवति स्फुटम् · घड़े के नष्ट होने पर जैसे आकाश आकाश ही, साफ़, हो जाता · तथा एव उपाधि-विलये ब्रह्म एव ब्रह्म-वित् स्वयम् · वैसे ही उपाधि-विलय पर ब्रह्म ही ब्रह्म-वेत्ता स्वयं।

अर्थ: घड़े के नष्ट होने पर, जैसे आकाश आकाश ही, साफ़, हो जाता है, वैसे ही उपाधि-विलय पर ब्रह्म-वेत्ता ख़ुद ब्रह्म ही।

भावार्थ: यह विवेकचूडामणि का एक यादगार श्लोक है, “घटे नष्टे।” घड़ा फूटा।

घड़ा फूटा, घड़े का “आकाश” कहाँ गया? कहीं नहीं। वह तो हमेशा से ही “आकाश” था, बस घड़े की दीवारों के बीच घिरा “दिखता” था। दीवार गई, आकाश आकाश रहा। ज्ञानी का देह-त्याग ऐसा ही, कुछ “घट” नहीं रहा, बस घेरा हटा। और हमेशा से जो था (ब्रह्म), वह “स्फुट”, साफ़, हो गया।

566 · दूध में दूध, तेल में तेल, पानी में पानी, मिल कर एक; वैसे आत्म-वित् मुनि आत्मा में

क्षीरं क्षीरे यथा क्षिप्तं तैलं तैले जलं जले ।
संयुक्तमेकतां याति तथात्मन्यात्मविन्मुनिः ॥ 566 ॥

kṣīraṁ kṣīre yathā kṣiptaṁ tailaṁ taile jalaṁ jale · saṁyuktam ekatāṁ yāti tathātmany ātma-vin muniḥ

शब्दार्थ: क्षीरं क्षीरे यथा क्षिप्तं · दूध में दूध जैसे डाला गया · तैलं तैले जलं जले · तेल में तेल, पानी में पानी · संयुक्तम् एकतां याति · संयुक्त हो कर एक हो जाता · तथा आत्मनि आत्म-वित् मुनिः · वैसे आत्मा में आत्म-वेत्ता मुनि।

अर्थ: जैसे दूध में दूध, तेल में तेल, पानी में पानी डाला जाता है, संयुक्त हो कर एक हो जाते हैं, वैसे ही आत्म-वेत्ता मुनि आत्मा में [एक हो जाता है]।

भावार्थ: गुरु तीन प्यारी, रोज़ की उपमाएँ देते हैं, दूध-तेल-पानी।

दूध में दूध डालो, कौन कह सकता है “यह वाला दूध” और “वह वाला”? बस “दूध।” मुनि का आत्मा में मिलना ऐसा ही, पहले से “दूध-दूध” था, बस अब “एक दूध” दिखता है। दो थे ही नहीं। बस ऐसा दिखता था।

567 · इस तरह विदेह-कैवल्य, सत्-मात्र, अखंडित ब्रह्म-भाव पा कर यति लौटता नहीं

एवं विदेहकैवल्यं सन्मात्रत्वमखण्डितम् ।
ब्रह्मभावं प्रपद्यैष यतिर्नावर्तते पुनः ॥ 567 ॥

evaṁ vi-deha-kaivalyaṁ san-mātratvam akhaṇḍitam · brahma-bhāvaṁ prapadyaiṣa yatir nāvartate punaḥ

शब्दार्थ: एवं विदेह-कैवल्यं सन्-मात्रत्वम् अखण्डितम् · इस तरह विदेह-कैवल्य, सत्-मात्र, अखंडित · ब्रह्म-भावं प्रपद्य एषः यतिः · ब्रह्म-भाव पा कर यह यति · न आवर्तते पुनः · फिर नहीं लौटता।

अर्थ: इस तरह, विदेह-कैवल्य, सत्-मात्र, अखंडित ब्रह्म-भाव, पा कर, यह यति फिर नहीं लौटता।

भावार्थ: गुरु एक ज़रूरी, अंतिम कथन देते हैं, “नावर्तते पुनः।” फिर नहीं लौटता।

यानी जन्म-मरण के चक्र से बाहर। एक बार विदेह-कैवल्य, देह-रहित अकेलापन, हो गया, तो वापसी नहीं। यह बहुत महत्वपूर्ण है, मुक्ति अंतिम है, अस्थायी नहीं।

568 · सद्-आत्म-एकत्व-विज्ञान से अविद्या-शरीर जला; ब्रह्म-भूत को ब्रह्म से कहाँ उद्भव

सदात्मैकत्वविज्ञानदग्धाविद्यादिवर्ष्मणः ।
अमुष्य ब्रह्मभूतत्वाद्ब्रह्मणः कुत उद्भवः ॥ 568 ॥

sad-ātmaikatva-vijñāna-dagdhāvidyādi-varṣmaṇaḥ · amuṣya brahma-bhūtatvād brahmaṇaḥ kuta udbhavaḥ

शब्दार्थ: सद्-आत्म-एकत्व-विज्ञान-दग्ध-अविद्या-आदि-वर्ष्मणः · सद्-आत्मा-एकत्व के विज्ञान से अविद्या आदि के शरीर के जल जाने पर · अमुष्य ब्रह्म-भूतत्वाद् · इसके ब्रह्म-भूत होने से · ब्रह्मणः कुतः उद्भवः · ब्रह्म से कहाँ उद्भव।

अर्थ: सद्-आत्मा-एकत्व के विज्ञान से अविद्या आदि के शरीर के जल जाने पर, इसके ब्रह्म-भूत होने से, ब्रह्म से कहाँ उद्भव (पुनर्जन्म)?

भावार्थ: गुरु एक प्यारा तर्क देते हैं, एक बार “ब्रह्म-भूत” हो गए, फिर “ब्रह्म से जन्म” का क्या मतलब?

ब्रह्म ख़ुद से जन्म नहीं लेता; वह तो जन्म-मरण से परे है। तो जब आप “ब्रह्म ही” हो, तो जन्म कहाँ। यह विदेह-कैवल्य के बाद कोई वापसी क्यों नहीं। का सबसे साफ़ कारण।

569 · माया-कल्पित बंध-मोक्ष असली नहीं। रस्सी निष्क्रिय; साँप दिखना-जाना भी कल्पना

मायाकॢप्तौ बन्धमोक्षौ न स्तः स्वात्मनि वस्तुतः ।
यथा रज्जौ निष्क्रियायां सर्पाभासविनिर्गमौ ॥ 569 ॥

māyā-kḷptau bandha-mokṣau na staḥ svātmani vastutaḥ · yathā rajjau niṣkriyāyāṁ sarpābhāsa-vinirgamau

शब्दार्थ: माया-कॢप्तौ बन्ध-मोक्षौ · माया-कल्पित बंध-मोक्ष · न स्तः स्व-आत्मनि वस्तुतः · स्व-आत्मा में वस्तुतः नहीं · यथा रज्जौ निष्क्रियायाम् · जैसे निष्क्रिय रस्सी में · सर्प-आभास-विनिर्गमौ · साँप-आभास का आना-जाना।

अर्थ: बंध और मोक्ष माया-कल्पित हैं; स्व-आत्मा में वस्तुतः नहीं हैं, जैसे निष्क्रिय रस्सी में साँप-आभास का आना-जाना नहीं।

भावार्थ: गुरु एक ज़रूरी, सूक्ष्म बात कहते हैं, बंधन और मोक्ष, दोनों ही “माया-कल्पित।”

रस्सी में “साँप आना-जाना” कोई असली घटना नहीं। वह तो भ्रम है। आत्मा में बंधन और मोक्ष भी ऐसी ही “घटनाएँ” हैं, दिखती हैं, पर असली कुछ नहीं। यह बात आख़िरी पुलिंदा है, अद्वैत की सबसे सूक्ष्म ऊँचाई।

570 · आवृति के सत्-असत् से ही बंध-मोक्ष की बात; ब्रह्म पर आवृति नहीं। दूसरा नहीं। सब अन-आवृत

आवृतेः सदसत्त्वाभ्यां वक्तव्ये बन्धमोक्षणे ।
नावृतिर्ब्रह्मणः काचिदन्याभावादनावृतम् यद्यस्त्यद्वैतहानिः स्याद्द्वैतं नो सहते श्रुतिः ॥ 570 ॥

āvṛteḥ sad-asattvābhyāṁ vaktavye bandha-mokṣaṇe · nāvṛtir brahmaṇaḥ kācid anyābhāvād an-āvṛtam yady asty advaita-hāniḥ syād dvaitaṁ no sahate śrutiḥ

शब्दार्थ: आवृतेः सद्-असत्त्वाभ्यां · आवृति के सत्-असत् होने से · वक्तव्ये बन्ध-मोक्षणे · बंध-मोक्ष कहे जाते · न आवृतिः ब्रह्मणः काचिद् · ब्रह्म पर कोई आवृति नहीं · अन्य-अभावात् अनावृतम् · दूसरे के अभाव से अन-आवृत · यद्य् अस्ति अद्वैत-हानिः स्याद् · अगर हो, तो अद्वैत-हानि · द्वैतं नो सहते श्रुतिः · श्रुति द्वैत सहती नहीं।

अर्थ: आवृति के सत्-असत् होने से बंध-मोक्ष कहे जाते हैं। पर ब्रह्म पर कोई आवृति नहीं। दूसरे के अभाव से, सब अन-आवृत। अगर [आवृति] हो, तो अद्वैत-हानि, श्रुति द्वैत सहती नहीं।

भावार्थ: गुरु एक तर्क-शास्त्रीय बात कहते हैं, “आवृति” (ढक्कन) का होना ही “बंध,” न होना “मोक्ष।”

पर ब्रह्म पर कोई “आवृति” कैसे हो? दूसरा है ही नहीं, तो “ढकने वाला” कौन। इसलिए ब्रह्म “अनावृत” है। और अगर “आवृति” मान लें, तो वह “दूसरी चीज़” होगी, और अद्वैत टूटेगा। श्रुति द्वैत नहीं मानती। तो बंध-मोक्ष की पूरी बात “बाहर” है, असली में नहीं।

571 · बंध-मोक्ष मूढ़ बुद्धि के गुण को वस्तु पर डाल कर कल्पना; जैसे रवि पर मेघ-आवृति

बन्धञ्च मोक्षञ्च मृषैव मूढा बुद्धेर्गुणं वस्तुनि कल्पयन्ति ।
दृगावृतिं मेघकृतां यथा रवौ यतोऽद्वयासङ्गचिदेतदक्षरम् ॥ 571 ॥

bandhañ ca mokṣañ ca mṛṣaiva mūḍhā buddher guṇaṁ vastuni kalpayanti · dṛg-āvṛtiṁ megha-kṛtāṁ yathā ravau yato’dvayāsaṅga-cid etad akṣaram

शब्दार्थ: बन्धम् च मोक्षं च मृषा एव मूढाः · बंध और मोक्ष, झूठ ही मूढ़ · बुद्धेः गुणं वस्तुनि कल्पयन्ति · बुद्धि का गुण वस्तु पर कल्पित करते · दृग्-आवृतिं मेघ-कृतां यथा रवौ · जैसे मेघ-कृत आँख की आवृति को सूर्य पर · यतः अद्वय-असङ्ग-चिद् एतद् अक्षरम् · क्योंकि यह अद्वय-असंग-चित्-अक्षर।

अर्थ: बंध और मोक्ष, झूठ ही, मूढ़ बुद्धि के गुण को वस्तु पर कल्पित करते हैं। जैसे मेघ-कृत आँख की आवृति को सूर्य पर। क्योंकि यह [आत्मा] अद्वय-असंग-चित्-अक्षर है।

भावार्थ: गुरु एक प्यारी ज़मीनी मिसाल देते हैं, बादल छाए, और हम कहते हैं “सूर्य ढक गया।”

पर सूर्य ढका? असल में हमारी आँख के सामने बादल है, सूर्य खुला ही है। यह “ढकना” आँख के अनुभव का है, सूर्य का नहीं। उसी तरह, बंधन-मोक्ष “बुद्धि के अनुभव” हैं, आत्मा के नहीं।

572 · “है”-“नहीं” प्रत्यय भी बुद्धि के गुण; नित्य वस्तु के नहीं

अस्तीति प्रत्ययो यश्च यश्च नास्तीति वस्तुनि ।
बुद्धेरेव गुणावेतौ न तु नित्यस्य वस्तुनः ॥ 572 ॥

astīti pratyayo yaś ca yaś ca nāstīti vastuni · buddher eva guṇāv etau na tu nityasya vastunaḥ

शब्दार्थ: अस्ति इति प्रत्ययः यः · “है”, यह प्रत्यय जो · च यः नास्ति इति वस्तुनि · और “नहीं है”, वस्तु में · बुद्धेः एव गुणौ एतौ · ये दोनों बुद्धि के ही गुण · न तु नित्यस्य वस्तुनः · नित्य वस्तु के नहीं।

अर्थ: “है” और “नहीं है”, ये दोनों प्रत्यय (विचार) बुद्धि के ही गुण हैं; नित्य वस्तु के नहीं।

भावार्थ: गुरु एक बेहद सूक्ष्म बात कहते हैं, “है” और “नहीं है”, दोनों बुद्धि का काम।

नित्य वस्तु (ब्रह्म) न “है” है, न “नहीं है”, वह इन दोनों के परे। जब आप कहते हैं “ब्रह्म है,” तो भी आप एक “है-नहीं” वाले विभाजन में डाल रहे। ब्रह्म इन सब विचारों से पहले का है।

573 · ये दोनों माया-कल्पित; निष्कल-निष्क्रिय-शांत में कल्पना कहाँ, आकाश की तरह

अतस्तौ मायया कॢप्तौ बन्धमोक्षौ न चात्मनि ।
निष्कले निष्क्रिये शान्ते निरवद्ये निरञ्जने अद्वितीये परे तत्त्वे व्योमवत्कल्पना कुतः ॥ 573 ॥

atas tau māyayā kḷptau bandha-mokṣau na cātmani · niṣkale niṣkriye śānte niravadye nirañjane advitīye pare tattve vyoma-vat kalpanā kutaḥ

शब्दार्थ: अतः तौ मायया कॢप्तौ बन्ध-मोक्षौ · इसलिए ये दोनों माया-कल्पित बंध-मोक्ष · न च आत्मनि · आत्मा में नहीं · निष्कले निष्क्रिये शान्ते · निष्कल, निष्क्रिय, शांत · निरवद्ये निरञ्जने · निरवद्य (दोष-रहित), निरंजन · अद्वितीये परे तत्त्वे · अद्वितीय, परम-तत्व में · व्योम-वत् कल्पना कुतः · आकाश की तरह कल्पना कहाँ।

अर्थ: इसलिए ये दोनों, बंध और मोक्ष, माया-कल्पित हैं; आत्मा में नहीं। निष्कल, निष्क्रिय, शांत, निरवद्य, निरंजन, अद्वितीय, परम-तत्व में, आकाश की तरह, कल्पना कहाँ?

भावार्थ: गुरु आख़िरी निष्कर्ष की ओर बढ़ते हैं, सात “निर्” शब्दों के बीच, एक ही बात: “कल्पना कहाँ।”

आकाश में आप क्या “कल्पना” कर सकते हैं? कुछ नहीं। वह तो ख़ाली है। आत्मा भी वैसी, सब विशेषणों के परे, सब कल्पनाओं के परे। बंधन-मोक्ष की बात भी एक “कल्पना” है, जो सच की तरह दिखती है।

574 · न निरोध, न उत्पत्ति; न बद्ध, न साधक; न मुमुक्षु, न मुक्त, यही परमार्थता

न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ 574 ॥

na nirodho na cotpattir na baddho na ca sādhakaḥ · na mumukṣur na vai mukta ity eṣā paramārthatā

शब्दार्थ: न निरोधः न च उत्पत्तिः · न निरोध, न उत्पत्ति · न बद्धः न च साधकः · न बद्ध, न साधक · न मुमुक्षुः न वै मुक्तः · न मुमुक्षु, न मुक्त · इति एषा परमार्थता · यही परमार्थता।

अर्थ: न निरोध, न उत्पत्ति; न बद्ध, न साधक; न मुमुक्षु, न मुक्त, यही परमार्थता।

भावार्थ: यह विवेकचूडामणि की सबसे चौंकाने वाली, सबसे ऊँची घोषणा है। माण्डूक्य उपनिषद और गौडपाद-कारिका की भाषा यहाँ गूँजती है।

छह नकार, हर एक एक धारणा को काटता है। “निरोध” (अन्त) नहीं। पुनर्जन्म नहीं। “उत्पत्ति” (शुरुआत) नहीं। पहले-जन्म भी नहीं। “बद्ध” नहीं। कोई बंधन ही नहीं था। “साधक” नहीं। कोई साधना करने वाला नहीं। “मुमुक्षु” नहीं। कोई मुक्ति चाहने वाला नहीं। “मुक्त” नहीं। कोई मुक्त भी नहीं। यह सब बस “व्यवहार” के स्तर पर। “परमार्थ” में, कुछ नहीं हुआ, कोई नहीं था, कोई कहीं नहीं गया। यह वेदान्त का अंतिम वचन है।

575 · सब निगम-चूड़ा का सार, परम-गुह्य, आज आपके लिए, अपने सुत की तरह बार-बार सोच कर

सकलनिगमचूडास्वान्तसिद्धान्तरूपं परमिदमतिगुह्यं दर्शितं ते मयाद्य ।
अपगतकलिदोषं कामनिर्मुक्तबुद्धिं स्वसुतवदसकृत्त्वां भाव्यित्वा मुमुक्षुम् ॥ 575 ॥

sakala-nigama-cūḍā-svānta-siddhānta-rūpaṁ param idam ati-guhyaṁ darśitaṁ te mayādya · apa-gata-kali-doṣaṁ kāma-nirmukta-buddhiṁ sva-suta-vad asakṛt tvāṁ bhāvyitvā mumukṣum

शब्दार्थ: सकल-निगम-चूड़ा-स्व-अन्त-सिद्धान्त-रूपं · सब वेदों की चूड़ा के अंतिम सिद्धान्त का रूप · परम् इदम् अति-गुह्यं · यह परम, अति-गुह्य · दर्शितं ते मया अद्य · आज मैंने आपको दिखाया · अपगत-कलि-दोषं · कलि-दोष से मुक्त · काम-निर्मुक्त-बुद्धिं · काम-निर्मुक्त बुद्धि वाला · स्व-सुत-वद् असकृत् त्वां भाव्यित्वा मुमुक्षुम् · अपने पुत्र की तरह बार-बार आपको मुमुक्षु जान कर।

अर्थ: सब वेदों की चूड़ा का अंतिम सिद्धान्त-रूप, यह परम, अति-गुह्य, आज मैंने आपको दिखाया, कलि-दोष से मुक्त, काम-निर्मुक्त-बुद्धि वाले, अपने पुत्र की तरह बार-बार आपको मुमुक्षु जान कर।

भावार्थ: गुरु अपना अंतिम वाक्य कहते हैं। “सकल-निगम-चूड़ा-सिद्धान्त”, सब वेदों की चूड़ा का सिद्धान्त। यानी जो सबसे ऊपर है, सबसे महत्वपूर्ण।

और एक प्यारी बात, “स्व-सुत-वद्”, अपने पुत्र की तरह। यानी गुरु ने यह बात किसी “जिज्ञासु” को नहीं। अपने “पुत्र” को सिखाई। और “असकृत्”, बार-बार। यह कोई एक-बार की बात नहीं। एक धीरे-धीरे, पकाते हुए की प्रक्रिया है।

576 · इस तरह गुरु-वचन सुन कर, प्रश्रय से नत; उनकी अनुमति से निर्मुक्त-बंधन जाता है

इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं प्रश्रयेण कृतानतिः ।
स तेन समनुज्ञातो ययौ निर्मुक्तबन्धनः ॥ 576 ॥

iti śrutvā guror vākyaṁ praśrayeṇa kṛtānatiḥ · sa tena samanujñāto yayau nirmukta-bandhanaḥ

शब्दार्थ: इति श्रुत्वा गुरोः वाक्यं · इस तरह गुरु का वाक्य सुन कर · प्रश्रयेण कृतानतिः · विनम्रता से नत · सः तेन समनुज्ञातः · वह उनसे अनुमति पा कर · ययौ निर्मुक्त-बन्धनः · निर्मुक्त-बंधन गया।

अर्थ: इस तरह गुरु का वाक्य सुन कर, विनम्रता से नत; वह उनसे अनुमति पा कर, निर्मुक्त-बंधन, गया।

भावार्थ: कथा का अंतिम मोड़, शिष्य की विदाई।

तीन चीज़ें: सुनी, झुका, और गुरु की “अनुमति” से ही गया। यह “गुरु-शिष्य” परम्परा का एक सुंदर नियम है, शिष्य अपनी मर्ज़ी से नहीं जाता; गुरु जब “जा” कहें, तब। और “निर्मुक्त-बंधन”, बंधन-मुक्त। वह अब पूरी तरह आज़ाद है। कथा का यहाँ “औपचारिक” अंत हो जाता है।

577 · गुरु सदा-आनंद-सिन्धु में निर्मग्न-मानस; वसुधा को पावन करते निरंतर विचरते रहे

गुरुरेव सदानन्दसिन्धौ निर्मग्नमानसः ।
पावयन्वसुधां सर्वाण्विचचार निरन्तरः ॥ 577 ॥

gurur eva sadānanda-sindhau nirmagna-mānasaḥ · pāvayan vasudhāṁ sarvāṇi vicacāra nirantaraḥ

शब्दार्थ: गुरुः एव सदा-आनन्द-सिन्धौ निर्मग्न-मानसः · गुरु ही सदा-आनंद-सिन्धु में निर्मग्न-मानस · पावयन् वसुधां सर्वाणि · वसुधा को पावन करते सब [जगहों पर] · विचचार निरन्तरः · विचरते रहे निरंतर।

अर्थ: गुरु, सदा-आनंद-सिन्धु में निर्मग्न-मानस, वसुधा को सब जगह पावन करते, निरंतर विचरते रहे।

भावार्थ: शिष्य गया, पर गुरु? वह वहीं रहता है, विचरता रहता है। एक अद्भुत तस्वीर।

गुरु ने “अपना काम” किया, पर वह “मुक्ति-दात्री” का काम बस “करता” रहा। और कहाँ? “वसुधां सर्वाणि”, पूरी वसुधा पर। हर जगह जा कर पावन करता है। मुक्त-गुरु एक सेवा-यंत्र की तरह है, रुकता नहीं। बस बहता है।

578 · इस तरह आचार्य-शिष्य के संवाद से आत्म-लक्षण निरूपित, मुमुक्षुओं के सुख-बोध के लिए

इत्याचार्यस्य शिष्यस्य संवादेनात्मलक्षणम् ।
निरूपितं मुमुक्षूणां सुखबोधोपपत्तये ॥ 578 ॥

ity ācāryasya śiṣyasya saṁvādenātma-lakṣaṇam · nirūpitaṁ mumukṣūṇāṁ sukha-bodhopapattaye

शब्दार्थ: इति आचार्यस्य शिष्यस्य संवादेन · इस तरह आचार्य और शिष्य के संवाद से · आत्म-लक्षणम् निरूपितं · आत्म-लक्षण निरूपित · मुमुक्षूणां सुख-बोध-उपपत्तये · मुमुक्षुओं के सुख-बोध की सिद्धि के लिए।

अर्थ: इस तरह आचार्य और शिष्य के संवाद से आत्म-लक्षण निरूपित किया गया, मुमुक्षुओं के सुख-बोध की सिद्धि के लिए।

भावार्थ: ग्रंथ अब अपना “पता” बताता है, किसके लिए। “मुमुक्षु”, मुक्ति चाहने वाले।

और “सुख-बोध”, सुख से बोध। यानी संवाद इसलिए, ताकि साधक “आसानी से” बोध को पाए। यह विवेकचूडामणि की एक प्यारी पहचान है, दर्शन-शास्त्र होते हुए भी, इसका लहजा “आसान” है।

579 · यह हितकर उपदेश ग्रहण करें, चित्त-दोष-निरस्त, भव-सुख-विरत, प्रशांत-चित्त, श्रुति-रसिक मुमुक्षु

हितमिदमुपदेशमाद्रियन्तां विहितनिरस्तसमस्तचित्तदोषाः ।
भवसुखविरताः प्रशान्तचित्ताः श्रुतिरसिका यतयो मुमुक्षवो ये ॥ 579 ॥

hitam idam upadeśam ādriyantāṁ vihita-nirasta-samasta-citta-doṣāḥ · bhava-sukha-viratāḥ praśānta-cittāḥ śruti-rasikā yatayo mumukṣavo ye

शब्दार्थ: हितम् इदम् उपदेशम् आद्रियन्तां · हितकर इस उपदेश को ग्रहण करें · विहित-निरस्त-समस्त-चित्त-दोषाः · सब चित्त-दोषों को विधि से दूर किए · भव-सुख-विरताः प्रशान्त-चित्ताः · संसार-सुख से विरत, प्रशांत-चित्त · श्रुति-रसिकाः यतयः मुमुक्षवः ये · श्रुति-रसिक यति, जो मुमुक्षु।

अर्थ: हितकर इस उपदेश को ग्रहण करें, सब चित्त-दोषों को विधि से दूर किए हुए, संसार-सुख से विरत, प्रशांत-चित्त, श्रुति-रसिक यति, जो मुमुक्षु हैं।

भावार्थ: गुरु पाँच गुणों वाले साधक का चित्रण करते हैं, जो इस उपदेश का “अधिकारी” है।

चित्त-दोष-निरस्त, भव-सुख-विरत, प्रशांत-चित्त, श्रुति-रसिक, मुमुक्षु। पाँच कसौटियाँ। यह कोई “हर किसी” का ग्रंथ नहीं। यह एक “पका हुआ” साधक के लिए है। बाक़ी लोगों के लिए तैयारी ज़रूरी। पर जो पका, उसे यह सीधे चाहिए।

580 · संसार-मार्ग में जल-कांक्षा से मरुभूमि में भटकते थके लोगों को, अमृत-सिन्धु जैसा सुख-कारी ब्रह्म-अद्वय दिखाती; शंकर-भारती विजयते, निर्वाण-संदायिनी

संसाराध्वनि तापभानुकिरणप्रोद्भूतदाहव्यथा खिन्नानां जलकाङ्क्षया मरुभुवि भ्रान्त्या परिभ्राम्यताम् ।
अत्यासन्नसुधाम्बुधिं सुखकरं ब्रह्माद्वयं दर्शयत्य् एषा शंकरभारती विजयते निर्वाणसंदायिनी ॥ 580 ॥

saṁsārādhvani tāpa-bhānu-kiraṇa-prodbhūta-dāha-vyathā khinnānāṁ jala-kāṅkṣayā maru-bhuvi bhrāntyā paribhrāmyatām · atyāsanna-sudhāmbu-dhiṁ sukha-karaṁ brahmādvayaṁ darśayaty eṣā śaṅkara-bhāratī vijayate nirvāṇa-sandāyinī

शब्दार्थ: संसार-अध्वनि ताप-भानु-किरण-प्रोद्भूत-दाह-व्यथा खिन्नानां · संसार-मार्ग में, ताप-सूर्य की किरणों से उठी दाह-व्यथा से थके लोगों को · जल-कांक्षया मरुभुवि भ्रान्त्या परिभ्राम्यताम् · पानी की चाह से मरुभूमि में भ्रांति से भटकते · अत्य्-आसन्न-सुधा-अम्बु-धिं सुख-करं ब्रह्म-अद्वयं दर्शयति एषा · बेहद पास के अमृत-समुद्र को, सुख-कारी ब्रह्म-अद्वय को, यह दिखाती है · शंकर-भारती विजयते निर्वाण-संदायिनी · निर्वाण-दात्री शंकर-भारती (शंकर की वाणी) विजयी होती है।

अर्थ: संसार-मार्ग में, ताप-सूर्य की किरणों से उठी दाह-व्यथा से थके, पानी की चाह में मरुभूमि में भ्रांति से भटकते लोगों को, बेहद पास का अमृत-समुद्र, सुख-कारी ब्रह्म-अद्वय, यह [विवेकचूडामणि] दिखाती है। निर्वाण-दात्री शंकर-भारती विजयी होती है।

भावार्थ: यह विवेकचूडामणि का अंतिम श्लोक है। और एक अद्भुत, काव्य-भरी छवि के साथ।

लोग संसार-मार्ग में, सूरज की तपन से थके, पानी ढूँढते मरुभूमि में भटक रहे। और मरुभूमि में पानी? बस मरीचिका। पर बहुत पास, “अत्य्-आसन्न”, एक “अमृत-समुद्र” है। बस कोई दिखाने वाला चाहिए। और यह विवेकचूडामणि वही करती है, पास खड़े अमृत-समुद्र (ब्रह्म-अद्वय) को दिखाती है। और अंतिम शब्द, “शंकर-भारती विजयते।” शंकर की वाणी विजयी हैं।

विवेकचूडामणि यहाँ समाप्त। 580 श्लोक, एक पूरी यात्रा, सबसे पहले प्रश्न से, सबसे अंत में “निर्वाण-संदायिनी” तक। ओम् तत् सत्।

विवेकचूडामणि की पूरी यात्रा,

यह आख़िरी पन्ना है, विवेकचूडामणि के 580 श्लोक यहाँ पूरे हुए। पीछे देखिए, क्या मिला: एक शिष्य का अधिकार (1-31), साधन-चतुष्टय (32-71), गुरु से मिलना और अनात्म का खंडन (72-211), साक्षी और ब्रह्म का स्थापन (212-266), तत्त्वमसि-निर्णय (267-297), वासना-क्षय और अहंकार-नाश (298-328), समाधि-विधि (329-407), जीवन्मुक्ति और कर्म-त्रय (408-470), शिष्य का जागरण और स्तोत्र (471-519), गुरु का परम-वचन और ज्ञानी की रोज़ की चाल (520-545), और अंत में, विदेह-कैवल्य, बंधन-मोक्ष भी कल्पना, और शंकर-भारती की जय (546-580)।

इस सब के बीच, कुछ टेकें जो दिल में बैठ जाती हैं: “एकमेव अद्वयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन।” “हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ।” “वैराग्यस्य फलं बोधो, बोधस्योपरतिः फलम्।” “बुद्धिर्विनष्टा, गलिता प्रवृत्तिः।” इनको याद रखिए। यह विवेकचूडामणि का दिल है।

और एक काम जेब में रखिए: श्लोक 574, “न निरोधो, न उत्पत्तिः; न बद्धो, न साधकः; न मुमुक्षुः, न वै मुक्तः।” यह एक रहस्य है। पहले अजीब लगेगा। पर थोड़े दिन इस पर बैठिए, एक दिन यह बहुत खुलेगा।

पूरी विवेकचूडामणि एक बार पढ़ी? बहुत अच्छा। अब इसे दोबारा पढ़िए, और तीसरी बार, और चौथी। हर बार कुछ नया खुलेगा। और इस बार, जो टेक दिल में बैठी है, उसे रोज़ एक बार धीरे-धीरे कहिए। बात धीरे-धीरे जीने में बस जाएगी।

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, verbatim।

स्थायी URL: /vivekachudamani/videha-samapan/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-23

विवेकचूडामणि यहाँ पूरी (580/580 श्लोक)। ओम् तत् सत्। 🙏