लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

पात्र

वसिष्ठ

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पात्र-यात्रा · वाल्मीकि रामायण और योगवासिष्ठ के चुने हुए प्रसंग

इक्ष्वाकुओं का वह पुरोहित जिसके हाथ में यज्ञ का भार, नवजातों के नाम और अभिषेक की सामग्री रहती है, और जो एक दूसरे ग्रन्थ में राजपाट से ऊबे उसी राजकुमार के सामने बैठकर कथाओं से संसार का स्वरूप समझाता है।

सरयू के उत्तर तट पर यज्ञभूमि बन चुकी है, और अश्वमेध का घोड़ा लौट आया है। पुत्र के लिए यज्ञ करने चले अयोध्या के राजा दशरथ सबसे पहले अपने कुलपुरोहित के पास जाते हैं। वाल्मीकि के बालकाण्ड में, सर्ग 13 में, राजा वसिष्ठ और उनकी पत्नी अरुन्धती को प्रणाम करते हैं और विनय से कहते हैं, “ब्रह्मन्, मेरा यज्ञ शास्त्र के अनुसार आरम्भ हो, और ऐसा प्रबन्ध हो कि राक्षस कोई विघ्न न डाल सकें। इस यज्ञ का सारा भार अब आप ही पर है।” उत्तर में पहले “ऐसा ही होगा” आता है, फिर, “आपने जो चाहा है, वह सब मैं निश्चय ही करूँगा।” उसी क्षण से यज्ञ की सारी व्यवस्था और हर आए हुए राजा का सत्कार उन्हीं के हाथ में है। यज्ञ के बाद चार पुत्र जन्मते हैं, और सर्ग 18 में नाम भी राजा की ओर से वसिष्ठ ही रखते हैं: राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। जहाँ कोई काम शास्त्र की विधि से होना है, वहाँ उसका भार उन्हीं पर है।

राजद्वार पर दो ऋषि

सर्ग 20 से 21 में विश्वामित्र राजद्वार पर आकर यज्ञ-रक्षा के लिए राम को माँगते हैं। दशरथ स्नेह से लड़खड़ाते शब्दों में मना करते हैं, और विश्वामित्र का रोष ऐसा उठता है कि समूची पृथ्वी काँप जाती है। तब धीर महर्षि वसिष्ठ राजा से कहते हैं, “इक्ष्वाकु के कुल में जन्मे आप मानो साक्षात् धर्म हैं। आप धीर हैं, उत्तम व्रतों के पालक हैं; आपको अपना दिया हुआ वचन नहीं छोड़ना चाहिए।” ये ऋषि आपके पुत्र का भला करने के लिए ही राम को माँग रहे हैं। बात पूरी भी नहीं होती कि राजा का चेहरा खिल उठता है और वे स्वयं राम को, लक्ष्मण सहित, बुलवा भेजते हैं। राम की कथा का पहला मोड़ इसी सलाह से खुलता है।

मिथिला में, सर्ग 51 से 65 के बीच, जनक के पुरोहित शतानन्द राम को वह कथा सुनाते हैं जिसमें ये दोनों ऋषि आमने-सामने हैं। राजा विश्वामित्र सेना के साथ वसिष्ठ के आश्रम पहुँचते हैं, और मुनि पूरी सेना का आतिथ्य अपनी कामधेनु शबला से करवाते हैं। तृप्त राजा वही गाय माँग बैठते हैं, और उत्तर मिलता है, “शबला को मैं न सौ करोड़ गायों के बदले दूँगा, न एक लाख के, और न चाँदी के ढेरों के लिए।” राजा उसे बल से खींचने लगते हैं; शबला सेवकों को झटककर मुनि के चरणों में आ गिरती है, और वसिष्ठ उसे ऐसे समझाते हैं जैसे कोई दुखिया बहन को समझाता है, “तो ऐसा बल उत्पन्न कीजिए जो शत्रु की सेना को मिटा दे।” उसके हुंकार से निकले योद्धा राजा की सेना क्षण में मिटा देते हैं। विश्वामित्र महादेव से दिव्य अस्त्र पाकर लौटते हैं, और वसिष्ठ ब्रह्म-दण्ड उठाकर कहते हैं, “मैं यहाँ खड़ा हूँ, अधम क्षत्रिय!” ब्रह्मास्त्र तक हर अस्त्र उस एक लाठी में समा जाता है, और ऋषियों की प्रार्थना पर ही वे अपनी शान्ति में लौटते हैं। हारे हुए राजा का निश्चय उसी दिन का है: ऐसा तप जो उन्हें इसी जन्म में ब्राह्मण बना दे।

हज़ारों वर्ष के तप के बाद, सर्ग 65 में, जब देवता विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि कहते हैं, तो उनकी एक माँग शेष रह जाती है: ब्रह्मा के पुत्र वसिष्ठ उन्हें ब्राह्मण कहकर पुकारें। देवता वसिष्ठ को मनाते हैं। ब्रह्मर्षि वसिष्ठ आते हैं, मित्रता करते हैं, और कहते हैं, “ऐसा ही हो।” उसी मिथिला में, सर्ग 70 से 73 में, वसिष्ठ दशरथ की ओर से पूरा इक्ष्वाकु-वंश सुनाकर राम और लक्ष्मण के लिए जनक की दो पुत्रियाँ माँगते हैं, और विवाह की वेदी से लेकर कन्याओं के हाथ कुमारों के हाथ में देने तक, सब उन्हीं के निर्देश में होता है।

द्वार पर अभिषेक की सामग्री

अयोध्याकाण्ड के सर्ग 3 से 5 में राम को युवराज बनाने का निश्चय होता है, और अभिषेक की सारी विधि और सामग्री की आज्ञा राजा वसिष्ठ से माँगते हैं। वसिष्ठ एक-एक वस्तु गिनाते हैं, सोना और रत्न, श्वेत छत्र, सोने के सौ कलश, नखों तक समूचा एक व्याघ्र-चर्म, और साँझ को स्वयं राम के भवन जाकर सीता-सहित राम को उपवास कराते हैं, “राम, आपके पिता आप पर प्रसन्न हैं; कल आप राज्य पाने वाले हैं।” भोर में, सर्ग 14 में, वे अभिषेक की सामग्री लिए अन्तःपुर के द्वार पर हैं और सुमन्त्र से कहते हैं, “महाराज से कहिए कि मैं आ गया हूँ, अभिषेक की सारी सामग्री द्वार पर है, और वे शीघ्रता करें।” भीतर रात भर में सब बदल चुका है; कैकेयी के दो वरदान राम को वन भेज चुके हैं।

सर्ग 37 में इस शान्त पुरोहित का रोष दिखता है। कैकेयी राम, लक्ष्मण और सीता के लिए वल्कल ले आई हैं। सीता ने वल्कल लिया ही है कि राजगुरु उन्हें रोकते हैं और रानी की ओर मुड़ते हैं, “तब वृक्षों समेत इस सूनी, जनहीन धरती पर आप अकेली राज कीजिएगा, प्रजा का अहित चाहने वाली।” आपने अकेले राम का वनवास माँगा था, इसलिए सीता सजी-सँवरी ही राम के साथ वन में रहें; वल्कल उनके लिए नहीं है। विदा के समय लक्ष्मण जनक के दिए दिव्य धनुष आचार्य वसिष्ठ के घर से लाते हैं।

राजा के बिना राज्य

दशरथ शोक में प्राण छोड़ते हैं, और सर्ग 66 में वसिष्ठ के आदेश से राजा का शरीर तेल से भरी द्रोणी में रखा जाता है, क्योंकि पुत्र के बिना राजा का दाह नहीं हो सकता। ऋषियों के कहने पर वसिष्ठ भरत का नाम लेते हैं और पाँच दूतों को नाम लेकर केकय भेजते हैं। भरत लौटकर एक ही बैठक में पिता की मृत्यु और भाइयों का वनवास सुनते हैं, और शोक से जलते राजकुमार से वसिष्ठ कहते हैं, “बस, यशस्वी राजकुमार, अब शोक नहीं।” सर्ग 82 में वे सभा में कोमल स्वर में कहते हैं, “तात, राजा दशरथ अपना वचन निभाकर धर्म का आचरण करते हुए स्वर्ग सिधारे, और सोने और धान्य से भरी यह समृद्ध पृथ्वी आपको सौंप गए।” भरत राज्य के बदले गुरु के सामने ही रथ माँगते हैं, और भरद्वाज के आश्रम तक पुरोहित को आगे करके पैदल चलते हैं।

चित्रकूट पर, सर्ग 104 में, वसिष्ठ दशरथ की विधवा रानियों को आगे करके उस ओर चलते हैं जहाँ राम हैं, और राम उनके चरण ऐसे थाम लेते हैं जैसे इन्द्र बृहस्पति के चरण थामते हैं। भरत की विनती आती है और राम का मना करना। सर्ग 110 में वसिष्ठ इक्ष्वाकु-कुल का क्रम सुनाकर बताते हैं कि इस कुल में ज्येष्ठ का ही अभिषेक होता आया है, और सर्ग 111 में वे कहते हैं, “काकुत्स्थ, आचार्य, पिता और माता, ये तीनों मनुष्य के लिए जन्म से ही पूज्य होते हैं,” आचार्य को उनमें ऊपर रखते हैं, और कहते हैं कि भरत जो माँग रहे हैं, वह देकर भी राम मर्यादा नहीं लाँघेंगे। राम उत्तर देते हैं कि पिता का वचन अक्षरशः पूरा होगा। लौटते समय भरद्वाज के पूछने पर भरत बताते हैं कि तब वसिष्ठ ने राम से यह बड़ी बात कही, “महाप्राज्ञ, बड़े हर्ष से ये सोने से मढ़ी पादुकाएँ भरत को दे दीजिए; इन पादुकाओं के रूप में अयोध्या में रहकर प्रजा का योग-क्षेम सँभालिए।” राम पादुकाओं पर खड़े होते हैं और उन्हें भरत को दे देते हैं।

अभिषेक, और एक कुम्भ से जन्म

चौदह बरस बाद, युद्धकाण्ड के सर्ग 128 में, वृद्ध होकर भी पूरे सक्रिय वसिष्ठ ही राम का अभिषेक करते हैं और उन्हें किरीट पहनाते हैं। उत्तरकाण्ड के सर्ग 55 से 57 में राम लक्ष्मण को अपने पुरोहित का जन्म सुनाते हैं। इक्ष्वाकु के बारहवें पुत्र निमि एक दीर्घ सत्र के लिए सबसे पहले वसिष्ठ को चुनते हैं, और वसिष्ठ कहते हैं, “राजर्षि, मुझे पहले ही इन्द्र चुन चुके हैं; जब तक उनका यज्ञ पूरा न हो, आप कुछ समय प्रतीक्षा कीजिए।” निमि गौतम से यज्ञ कराने लगते हैं, और लौटे हुए वसिष्ठ सोए हुए राजा को शाप देते हैं, “राजन, आपने मेरी अवज्ञा करके किसी और को वरण किया; इसलिए आपका यह देह चेतना से खाली हो जाएगा।” जागे हुए निमि वही शाप लौटा देते हैं, और उसी क्षण दोनों विदेह हो जाते हैं। हवा बने वसिष्ठ अपने पिता ब्रह्मा के पास जाते हैं, और ब्रह्मा कहते हैं, “महायशस्वी, आप मित्र और वरुण के छोड़े हुए तेज में प्रवेश कीजिए।” दोनों देवताओं का तेज एक कुम्भ में जाता है, और उससे पहले अगस्त्य, फिर वसिष्ठ जन्मते हैं, किसी माता के गर्भ से नहीं; इक्ष्वाकु उन्हें जन्मते ही पुरोहित वरण कर लेते हैं। निमि की चेतना प्राणियों की पलकों में बसती है।

सर्ग 106 से 110 में काल राजद्वार पर आता है, और दुर्वासा की शर्त पर की गई प्रतिज्ञा के कारण राम को लक्ष्मण का त्याग करना पड़ता है। सभा में सब चुप रह जाते हैं, और वसिष्ठ बोलते हैं, “महायशस्वी राम, आपका यह अन्त और लक्ष्मण से आपका यह बिछोह, जिससे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, हमने पहले ही देख लिया था। महाबाहु, इन्हें त्याग दीजिए। काल बड़ा बलवान है।” प्रजा धरती पर पड़ी है, और वसिष्ठ कहते हैं, “वत्स राम, इन प्रजाजनों को देखिए, धरती पर पड़े हैं।” भोर में तेजस्वी वसिष्ठ महाप्रस्थान की सारी विधि शास्त्र के अनुसार, कुछ भी छोड़े बिना, पूरी करते हैं, और ऋषि राम के पीछे खुले हुए स्वर्ग-द्वार तक जाते हैं। वसिष्ठ का अपना अन्त काव्य नहीं कहता; अन्तिम दर्शन में वे वही कर रहे हैं जो पहले दृश्य में कर रहे थे, विधि पूरी करना।

योगवासिष्ठ के वसिष्ठ

योगवासिष्ठ, जिसे महारामायण भी कहते हैं, इन्हीं वसिष्ठ को एक दूसरी भूमिका में रखता है; उसकी कथा वाल्मीकि से अलग चलती है, और यहाँ अलग ही रखी गई है। उसके वैराग्य प्रकरण में राम तीर्थयात्रा से लौटते हैं और पन्द्रहवें वर्ष में शरद के सरोवर की तरह दिन-दिन सूखने लगते हैं। दशरथ वसिष्ठ से पूछते हैं, और वसिष्ठ कहते हैं कि राम की उदासी का एक कारण है, पर राजा उसकी चिन्ता न करें। तभी विश्वामित्र राजसभा में आकर राम को माँगते हैं; राम सभा में लाए जाते हैं और वैराग्य का वह लम्बा भाषण देते हैं जिस पर आकाश से अनदेखे सिद्ध फूल बरसाते हैं। तब विश्वामित्र वसिष्ठ को याद दिलाते हैं कि निषध पर्वत पर ब्रह्मा ने दोनों की शत्रुता शान्त करने के लिए जो ज्ञान दिया था, वही अब राम को दिया जाए, और वसिष्ठ उत्तर देते हैं कि जैसे दीपक से रात का अँधेरा मिटता है, वैसे वे राम का अज्ञान मिटाएँगे।

मुमुक्षु प्रकरण में वसिष्ठ अपना जन्म स्वयं सुनाते हैं, और यह जन्म वाल्मीकि वाले कुम्भ से अलग है। मनुष्यों का दुख देखकर ब्रह्मा ने जाना कि संसार से पार केवल ज्ञान से होता है, और ध्यान में बैठकर अपने से वसिष्ठ को उत्पन्न किया। एक क्षण के लिए उनकी बुद्धि पर मोह का बादल डाला, और जब पुत्र दुखी होकर पूछने लगा कि यह संसार दुख से इतना भरा क्यों है, तब वह ज्ञान दिया जिससे वह शान्त हुआ, और भेजा: भरतखण्ड में जाइए, और जो संसार से ऊबे हों उन्हें यह ज्ञान दीजिए। छह प्रकरणों में वही ज्ञान राम को कथाओं से दिया जाता है: राजा लवण के दो मुहूर्त में बीते साठ वर्ष, भुशुण्ड के देखे हुए कल्प, चूड़ाला का छद्म-वेश, और एक कथा वसिष्ठ की अपनी, जिसमें ध्यान में डूबे वे अपने को आकाश में टँगी अपनी ही कुटी में पाते हैं और उनकी जगह पर एक अनजान सिद्ध समाधि में बैठा है।

उपदेश के अन्तिम दिन वसिष्ठ वह बात कहते हैं जो अब तक नहीं आई थी, “राम, यही सिद्धान्त हम आपको पहले भी सिखा चुके हैं, जब आप हमारे शिष्य हुआ करते थे। पर तब आप इसे पूरा समझ नहीं पाए, इसलिए आपको एक और जन्म लेना पड़ा, ताकि इसे हमसे फिर से सीखें।” अन्तिम निर्देश है, “अपने राज्य पर न्याय और समता से शासन करना सीखिए।” मुनि चुप होते हैं, और सभा में किसी के कुछ कहने से पहले आकाश से फूल गिरने लगते हैं। राम कहते हैं, “मेरा अज्ञान मिट गया है और आपकी कृपा से मैं सत्य के ज्ञान तक पहुँच गया हूँ।”

उनकी राह

तीन ठहराव, तीन प्रश्न

नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वसिष्ठ सलाह देते हैं, भिड़ते हैं, या शिष्य से कुछ कहते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।

  1. जिस सलाह ने राम को विश्वामित्र के साथ भेजा। विश्वामित्र, ताड़का-वध और यज्ञ-रक्षा पढ़िए, बालकाण्ड 20 से 21 का वह दृश्य जहाँ राजा मना कर चुके हैं। पूछिए: जब पिता का स्नेह और दिया हुआ वचन आमने-सामने आ जाएँ, तो बीच में खड़ा पुरोहित किसकी ओर से बोलता है?
  2. एक लाठी, और हर अस्त्र। मिथिला की कथाएँ पढ़िए, बालकाण्ड 51 से 65 में शबला से “ऐसा ही हो” तक। पूछिए: जो पुरुष ब्रह्मास्त्र निगल सकता है, उसके लिए किसी को ब्राह्मण कह देना इतना बड़ा काम क्यों है?
  3. आचार्य, पिता और माता। चित्रकूट में भरत-राम मिलन और पादुका पढ़िए, फिर उपदेश का समापन। पूछिए: चित्रकूट पर जिस शिष्य ने गुरु की आज्ञा नहीं मानी, वही दशरथ की सभा में अन्त तक क्यों सुनता रहा?

अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ राजा कह रहे हैं कि इस यज्ञ का सारा भार अब आप ही पर है। क्या वह वाक्य अब केवल यज्ञ के बारे में लगता है?

दशरथ का पुत्रेष्टि-यज्ञ और राम का जन्म · यज्ञ का भार लेता एक पुरोहित, और चार नवजातों को दिए गए चार नाम।

राम का वन-गमन · द्वार पर रखी अभिषेक की सामग्री, और रानी के हाथ से हटाया गया वल्कल।

राम का स्वधाम-गमन · सभा में सबके चुप रहने पर बोला गया एक वाक्य, और सरयू की राह पर पूरी की गई अन्तिम विधि।

जिसके हाथ में विधि रही

वाल्मीकि के वसिष्ठ के हिस्से में काव्य के बड़े दृश्य नहीं आते; वे हर बड़े दृश्य के ठीक पहले या ठीक बाद खड़े मिलते हैं। यज्ञ से पहले भार उन पर है, जन्म के बाद नाम उनके, अभिषेक से पहले सामग्री उनकी, और सबके अन्त में महाप्रस्थान की विधि भी। दो बार वे अपनी जगह से आगे बढ़ते हैं, और दोनों बार धर्म के लिए: राजा से कहते हैं कि दिया हुआ वचन न छोड़िए, और सीता के हाथ से वल्कल हटवाते हैं। उनका रोष भी इसी नाप का है; शबला के लिए लाठी उठती है, निमि के लिए शाप, और फिर एक प्रार्थना पर वे लौट आते हैं। चित्रकूट पर यही पुरोहित आचार्य को माता-पिता से ऊपर रखकर राम से राज्य लेने को कहते हैं, और शिष्य नहीं मानता; पादुकाओं का उपाय फिर भी उन्हीं के मुख से निकलता है। योगवासिष्ठ इसी पुरुष को दशरथ की सभा में बैठाकर वह काम देता है जो वाल्मीकि में उनके पास कभी आया ही नहीं: उस राजकुमार का मन बदलना, जो हर आज्ञा मानता आया है, और वहाँ उनके पास न लाठी है न सामग्री, केवल कथाएँ। दोनों ग्रन्थों में उनका स्थान एक ही है: जहाँ कोई चीज़ विधि से होनी है, चाहे यज्ञ हो या ज्ञान, वहाँ भार उन्हीं पर है।

आधार-संस्करण और इस परिचय का दायरा

आधार-संस्करण: इस पुस्तकालय में प्रयुक्त गीताप्रेस वाल्मीकि रामायण, संस्कृत मूल और हिन्दी अनुवाद; योगवासिष्ठ के लिए इस पुस्तकालय की वसिष्ठ की कथाएँ, जो मित्र के अनुवाद पर आधारित हैं। इस प्रस्तुति के प्रसंग: बालकाण्ड 8 से 18, 20 से 21, 51 से 65 और 70 से 73; अयोध्याकाण्ड 3 से 5, 14, 37, 66 से 68, 76 से 77, 82, 90, 104, 110 से 111 और 113; युद्धकाण्ड 128; उत्तरकाण्ड 55 से 57 और 106 से 110। योगवासिष्ठ: वैराग्य प्रकरण 4 से 10 और 31 से 33, मुमुक्षु प्रकरण 2 और 10, और निर्वाण प्रकरण का समापन। इस प्रस्तुति का दायरा: दो ग्रन्थों से खींचा गया पात्र-चित्र, हर ग्रन्थ अपनी जगह पर; उद्धृत वचन इस पुस्तकालय की रामायण और योगवासिष्ठ की कड़ियों के हिन्दी पाठ से।

सीमाएँ और पाठ-भेद: वसिष्ठ का जन्म वाल्मीकि (उत्तरकाण्ड 56 से 57, मित्र और वरुण का कुम्भ) और योगवासिष्ठ (मुमुक्षु प्रकरण 10, ब्रह्मा से सीधे उत्पन्न) में अलग-अलग कहा गया है; दोनों अपने-अपने ग्रन्थ के नाम से रखे गए हैं। शबला और त्रिशंकु की कथा मिथिला में शतानन्द के मुख से है, और पादुकाओं वाला वाक्य भरत के मुख से भरद्वाज को सुनाया गया है। योगवासिष्ठ के चौखटे के जो अंश इस पुस्तकालय की कथाओं में नहीं हैं, वे मित्र के अनुवाद से बिना उद्धरण के लिए गए हैं।

वसिष्ठ का यह चित्र अंग्रेज़ी में पढ़िए।

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