कथा · 39
आकाश-कुटी का मुनि
वसिष्ठ अपने संकल्प से आकाश में स्थित कुटी में लौटते हैं और भीतर एक अपरिचित सिद्ध को समाधि में पाते हैं। कुटी को धारण करने वाला संकल्प हटते ही साधक बिना जागे विशाल आकाश में गिरने लगता है। यह भेंट श्रीराम को उत्तरदायित्व के प्रश्न से उस सूक्ष्म प्रक्रिया तक ले जाएगी, जिसके द्वारा अनेक मन एक संसार का साझा अनुभव करते हैं।
कुटी में अपरिचित साधक
वसिष्ठ अपने पिछले विलक्षण अन्तर्दर्शन से लौटकर उस आकाश-कुटी में पहुँचे, जो उनकी पुरानी समाधि से जुड़ी थी। जिस भौतिक शरीर को वे कभी वहाँ छोड़ गए थे, वह अब नहीं था। उसके स्थान पर एक अपरिचित सिद्ध अकेला बैठा था।
साधक पद्मासन में स्थित था। उसका सिर और ग्रीवा अचल थे, दोनों हाथ नाभि के पास व्यवस्थित थे और नेत्र बन्द थे। श्वास तथा बाहरी गति शान्त हो चुकी थी। ललाट पर त्रिपुण्ड्र था और मुख पर गहरी समाधि की शान्ति।
वसिष्ठ ने घटना के क्रम का अनुमान लगाया। सिद्ध ने त्यक्त शरीर देखा होगा, उसे निर्वाण प्राप्त किसी साधक का शव समझा होगा, एक ओर हटाया होगा और खाली कुटी में अपनी समाधि लगाने के लिए बैठ गया होगा।
उस कुटी की कोई साधारण नींव नहीं थी। वसिष्ठ का लगातार संकल्प उसे आकाश में स्थिर रखता था। अब वे सूक्ष्म शरीर से सप्तर्षिलोक की ओर जाना चाहते थे और उस निवास की आवश्यकता पूरी हो चुकी थी।
उन्होंने कुटी को धारण करने वाला संकल्प वापस ले लिया। कुटी विलीन हो गई और ध्यानस्थ सिद्ध नीचे गिरने लगा।
साधक ने नेत्र नहीं खोले और आसन भी नहीं बदला। वसिष्ठ तुरन्त उसके पीछे चले। निवास हटाने के उनके निर्णय का प्रभाव ऐसे व्यक्ति पर पड़ा था, जिसकी उपस्थिति वे देख चुके थे। अब वे परिणाम के साथ रहने वाले थे।
स्वर्णभूमि तक गिरना
सिद्ध समाधि में ही विशाल आकाश से उतरता रहा। सप्तद्वीप के पार दस सहस्र योजन विस्तृत स्वर्णभूमि थी। उसकी गिरावट वहीं समाप्त हुई।
वह उसी पद्मासन में भूमि से टकराया। शरीर का निचला भाग स्वर्णभूमि से लगा, जबकि प्राण और अपान की संयुक्त गति ने सिर तथा धड़ को ऊँचा रखा। योगबल से शरीर टूटा नहीं और आघात से समाधि भी भंग नहीं हुई।
वसिष्ठ उसके पास खड़े होकर पुकारते रहे। कोई उत्तर नहीं मिला। सिद्ध को कुटी के विलय, गिरने, भूमि पर पहुँचने और पास खड़े ऋषि की आवाज का ज्ञान नहीं हुआ था।
तब वसिष्ठ ने बादल का रूप धारण किया। स्थिर शरीर पर वर्षा होने लगी। स्वर्णभूमि पर मेघ गर्जे और कठोर ओले साधक के चारों ओर तथा शरीर पर गिरे।
अन्ततः सिद्ध ने नेत्र खोले। सामने वसिष्ठ खड़े थे और चारों ओर वह भूमि थी, जो समाधि आरम्भ करने वाली कुटी से बहुत दूर थी।
वसिष्ठ ने पूछा, “आप कौन हैं? कहाँ रहे हैं? मेरी कुटी में क्यों बैठे और आकाश से गिरते समय भी आपको कुछ ज्ञात क्यों नहीं हुआ?”
सिद्ध ने कुछ समय माँगा। वह अन्तर्मुख हुआ, अपने पिछले जन्मों का क्रम स्मरण किया और जगाने वाले ऋषि को पहचान लिया।
सिद्ध की लम्बी यात्रा
उसने वसिष्ठ को प्रणाम किया और क्षमा माँगी। फिर बताया कि अविच्छिन्न एकान्त की खोज उसे आकाश-कुटी तक कैसे लाई थी।
बहुत समय तक वह देवताओं के आनन्द-उद्यानों, मेरु के प्रदेशों और लोकपालों की पुरियों में घूमता रहा। उसने दिव्य सौन्दर्य देखा, सूक्ष्म इन्द्रियसुख भोगे और भाग्य के अनेक परिवर्तन अनुभव किए।
इनमें से किसी अनुभव ने स्वाभाविक और स्थायी विश्राम नहीं दिया। प्रत्येक सुख किसी वस्तु, उसका भोग करने योग्य शरीर और शीघ्र बदल जाने वाली इच्छा पर निर्भर था। आनन्द उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों के भीतर उसके अन्त की गति भी चलती रहती थी।
सिद्ध ने देहधारी जीवन की तुलना नदी से की। जन्म और मृत्यु उसके दो तट थे, राग और द्वेष लहरों की तरह उठते थे और निरन्तर परिवर्तन उसकी धारा था। यौवन, धन, परिवार, मित्रता, सम्पत्ति और शरीर सभी उसी प्रवाह में थे।
उसने प्रत्येक सम्भावित आश्रय पर विचार किया था। शरीर निरन्तर बदलता, यौवन वृद्धावस्था में जाता, धन हाथ बदलता और सम्बन्ध परिस्थिति के अनुसार नया रूप लेते। इन वस्तुओं को सुरक्षित करने का प्रयत्न करने वाला मन भी पकड़ते समय बदल रहा होता था।
उसने जाना कि वासना शान्त होने और मन के आत्मस्वरूप में विश्राम पाने पर स्थिर सुख प्रकट होता है। पाताल, पृथ्वी, स्वर्ग या किसी इन्द्रियभोग में उसे उस शान्ति के समान कुछ नहीं मिला।
उसका वैराग्य इतना गहरा हो गया कि आकर्षक वस्तुएँ इन्द्रियों को बाहर नहीं खींच पाती थीं। वह ऐसा स्थान चाहता था, जहाँ लम्बी समाधि में अकेला रह सके और कोई नई इच्छा अन्तर्विश्राम को बाधित न करे।
उसने कहा, “मुझे आपकी कुटी मिली और भीतर एक शरीर पड़ा दिखा। मैंने समझा कि स्वामी निर्वाण प्राप्त करके उसे छोड़ चुके हैं। शरीर एक ओर हटाकर मैं बैठ गया। मैंने पूरी जाँच किए बिना निर्णय लिया।”
फिर उसने निर्णय वसिष्ठ पर छोड़ दिया। “कृपया बताइए कि मेरा आचरण निन्दा, दण्ड या क्षमा में से किसके योग्य है।”
उत्तरदायित्व और क्षमा
वसिष्ठ ने उसकी बात पर विचार किया। सिद्ध ने मिले हुए शरीर के बारे में अनुमान लगाकर किसी दूसरे का आश्रय ग्रहण किया था। वसिष्ठ ने साधक को देखा और उसके गिरने के परिणाम का विचार किए बिना कुटी हटा दी थी।
वसिष्ठ ने कहा, “कुटी का संकल्प वापस लेने से पहले मैंने भी आपके स्थान का पूरा विचार नहीं किया। इस घटना में हम दोनों का निर्णय सम्मिलित है। इसलिए हम एक-दूसरे को क्षमा करें।”
इस उत्तर से दण्ड का प्रसंग समाप्त हो गया। दोनों सिद्धों ने अपने ध्यान की सीमा स्वीकार की और अपनी योगसिद्धि को सम्पूर्ण दोष दूसरे पर रखने का कारण नहीं बनाया।
वे उठे, परस्पर सम्मान किया और अलग यात्राओं के लिए तैयार हुए। सिद्ध नन्दनवन की ओर चला गया और वसिष्ठ ने सप्तर्षिलोक की दिशा में यात्रा फिर आरम्भ की।
यह भेंट एक बिना जाँचे शरीर और ग्रहण की गई कुटी से शुरू हुई थी। अन्त में दोनों साधकों ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उनके निर्णय कहाँ एक-दूसरे को प्रभावित कर गए। क्षमा ने घटना का परिणाम मिटाए बिना उसे शान्त कर दिया।
सूक्ष्म शरीर पर श्रीराम का प्रश्न
वसिष्ठ ने कथा का यह भाग सुनाया तो श्रीराम ने पूछा कि कुटी से जुड़ा भौतिक शरीर धूल हो जाने के बाद वे दिव्य लोकों में कैसे घूमे।
वसिष्ठ ने बताया कि वे मन से बने सूक्ष्म शरीर में चल रहे थे। उसे पृथ्वी के आधार की आवश्यकता नहीं थी और सामान्य पदार्थ की रुकावट उसका मार्ग नहीं रोकती थी। वे सिद्धों, लोकपालों, इन्द्र और दूसरे दिव्य निवासियों के प्रदेशों में प्रवेश कर सकते थे।
वसिष्ठ उन सबको देख और सुन सकते थे, पर वे लोग उन्हें देख या सुन नहीं पाते थे। ऊँचे स्वर में पुकारने पर कोई उत्तर नहीं देता। किसी गिरते हुए व्यक्ति की सहायता के लिए हाथ बढ़ाने पर साधारण स्पर्श नहीं बनता था।
श्रीराम ने पूछा कि कुटी में बैठे सिद्ध ने उन्हें कैसे देखा। वसिष्ठ ने समझाया कि उन्होंने उस विशेष साधक को दिखाई देने का संकल्प किया था। जब सिद्ध पुरुषों के दो संकल्प विपरीत दिशा में हों, तब अधिक शुद्ध और शक्तिशाली संकल्प प्रभावी होता है।
इस उत्तर से श्रीराम ने सूक्ष्म अवस्थाओं में रहने वाले पिशाचों के विषय में प्रश्न किया। उनके विचित्र रूप और अदृश्यता को समझने के लिए यह जानना आवश्यक था कि मन से बना जीवन किस प्रकार लगातार अनुभव का रूप लेता है।
पिशाचों के मन-निर्मित संसार
वसिष्ठ ने पिशाच को सूक्ष्म और मन के संस्कारों से बना प्राणी बताया। लम्बे समय की धारणा और वासना उन्हें शरीर, वातावरण, भूख, भय तथा एक-दूसरे को देखने की ऐसी शक्ति देती है, जो उनके संस्कार के अनुकूल होती है।
उनके संसार नगरों, वनों, कुओं, जलमार्गों, रास्तों और अशुद्ध माने जाने वाले स्थानों के आसपास अनुभव किए जा सकते हैं। अपनी स्थिति में वे गर्मी, ठंड, इच्छा, भय, क्रोध, लोभ और भ्रम अनुभव करते हैं।
पुराना अभ्यास सूक्ष्म रचना को व्यावहारिक भार देता है। स्वप्न चलते समय स्थान, संकट, आवश्यकता और परिणाम को विश्वासयोग्य बना सकता है। उसी प्रकार दीर्घ संस्कार सूक्ष्म संसार को उन प्राणियों के लिए कार्यशील बनाता है, जिनकी दृष्टि उसे धारण करती है।
वसिष्ठ ने मन्त्र, औषधि, तप, दान, साहस, धर्म और अनुशासित संकल्प को उन साधनों में गिना, जिनसे हानिकारक प्रभाव को रोका या दूसरी दिशा दी जा सकती है। प्रत्येक साधन उस संस्कार पर काम करता है, जिससे सूक्ष्म सम्बन्ध प्रभावी हुआ है।
यह विवेचन श्रीराम के प्रश्न को व्यापक सिद्धान्त तक ले गया। लगातार मनःसंस्कार और साझा धारणा शरीरों तथा संसारों को अनुभव में ठोस बनाते हैं। उनकी बनावट साधारण पदार्थ से भिन्न हो सकती है, फिर भी अनुभव के भीतर उनके प्रभाव पर ध्यान देना पड़ता है।
संकल्प से दिखाई देने वाला शरीर
वसिष्ठ दिव्य नगरों में अदृश्य अवस्था में चलते रहे। वे निवासियों और उनकी गतिविधि को देख सकते थे, पर सामान्य व्यवहार सम्भव नहीं था। यह कठिनाई स्पष्ट होने पर उन्हें सत्यसंकल्प की शक्ति स्मरण हुई।
उन्होंने निश्चय किया कि सामने उपस्थित देवता और निवासी उन्हें देख सकें। संकल्प उसी क्षण फलित हुआ। लोगों की दृष्टि उनकी ओर उठी, आवाजें उन्हें सम्बोधित करने लगीं और सामान्य संवाद आरम्भ हो गया।
अलग-अलग देखने वालों ने अपने निकट अनुभव होने वाले तत्त्व के अनुसार उनके प्रकट होने को समझा। जिन्हें लगा कि वे पृथ्वी से निकले हैं, उन्होंने पार्थिव वसिष्ठ कहा।
जिन्होंने उन्हें सूर्य के तेज में प्रकट देखा, उन्होंने तेजस वसिष्ठ नाम दिया। वायु-प्रदेश में देखने वालों ने वातवसिष्ठ या मारुत-वसिष्ठ कहा।
जल से प्रकट मानने वालों ने वारिवसिष्ठ नाम दिया। जल से जुड़े नाम का एक पुराना रूप वारिज वसिष्ठ भी है। ये सभी नाम उसी एक यात्री के लिए थे।
अधिक लोग उन्हें देखने और सम्बोधित करने लगे तो सूक्ष्म रूप ने उनके साझा संसार में भौतिक शरीर जैसी व्यावहारिक स्थिति पा ली। वसिष्ठ इस सामान्य व्यवहार में भाग लेते हुए भी अपने स्वरूप को चिदाकाश में स्थित जानते रहे।
उन्होंने इस घटना से श्रीराम को समझाया कि दृश्य, शरीर की ठोसता और सामाजिक स्वीकृति बार-बार की धारणा से प्रभाव ग्रहण करते हैं। आकाश-कुटी, गिरता सिद्ध, अदृश्य यात्री और संकल्प से दिखाई देने वाला ऋषि उसी शक्ति के अलग कार्य दिखाते हैं।
सूर्यास्त होने पर वाल्मीकि ने उस दिन की कथा समाप्त की। सभा सन्ध्या के अनुष्ठानों के लिए उठी और अपने स्थानों को चली गई। प्रातः वे फिर लौटेंगे और उस चैतन्य पर विचार आगे बढ़ाएँगे, जिसमें ऐसे सभी संसार दिखाई देते हैं।