सात आकाशी ऋषि

कथा · 40

सात आकाशी ऋषि: एक नगर जो विचार से बना था

एक प्रलय के बाद के काल में वसिष्ठ सात आकाशी ऋषियों से मिले। पुरानी सृष्टि गई थी, नई अभी आ रही थी। कोई शोक नहीं, कोई जल्दी नहीं, बस एक ठहराव। चालीस कथाओं के बाद यही अन्तिम पड़ाव।

सरयू पर रात थी।

राम और वसिष्ठ बहुत देर से बैठे थे। एक स्तर पर देखें तो बहुत बरस से, क्योंकि बरसों से वसिष्ठ राम को कथाएँ सुनाते आ रहे थे। आज शायद आख़िरी थी।

Sage Vasishtha and young prince Rama sit together on the Saryu riverbank deep at night; clouds have parted to reveal the seven bright stars of the Saptarshi above the still water, oil-lamp reflections trembling on the river; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text, no watermark.

बादल हट गए थे और ऊपर सप्तर्षि के तारे दिख रहे थे, वो सात तारे जो रात भर एक ही जगह दिखते हैं और आकाश के साथ हलके से घूमते रहते हैं।

राम ने तारों की ओर देखा, फिर वसिष्ठ की ओर।

राम बोले – “गुरुदेव, अब आख़िरी कथा।”

वसिष्ठ बोले – “राम, आख़िरी कथा भी मेरी अपनी है। तुमने मुझसे बहुत कथाएँ सुनीं, पर आज तुम्हें मेरी अपनी कथा सुननी है। मैंने एक बार सात ऋषियों को आकाश में देखा था। उनकी कथा सुनो।”

विचार

बहुत बरस पहले, जब मैं युवा था, एक बार मुझे एक विचार आया।

यह विचार राम जैसे प्रश्नों से अलग था। यह मेरे भीतर बरसों से पड़ा था, पर अब तक बाहर नहीं आया था। मैं अक्सर सोचता – अगर मैं अपना देह छोड़कर आकाश में चला जाऊँ, तो क्या होगा?


यह विचार अजीब था। मैं ऋषि था, मेरा काम ज्ञान देना था, राजाओं को सिखाना, पुस्तकें लिखना, यज्ञ करना।

पर भीतर एक प्यास थी, एक बार आकाश में रहने की, बाहर निकलने की, कथाओं के परे जाने की।


तो मैंने तप किया, बरसों तक।

एक दिन मेरी पत्नी अरुन्धती ने पूछा – “वसिष्ठ, क्या आप अभी ख़ुश हैं?”

“हाँ।”

“फिर इतना तप क्यों?”

मैंने कहा – “अरुन्धती, मुझे एक बात देखनी है। मुझे देखना है कि कथाओं के बाहर क्या है।”

Young Vasishtha and his consort Arundhati seated outdoors at night beside a small clay lamp near a thatched ashram hut, mountains and a starry sky behind, Arundhati speaking gently with a hand raised, a tender parting mood; warm painterly classical Indian color art, dignified, no text, no watermark.

अरुन्धती बोलीं – “वसिष्ठ, अगर आप कथाओं के बाहर जाएँगे, तो आप मेरे साथ नहीं रहेंगे, क्योंकि मैं तो कथा हूँ।”

मैंने रुककर उन्हें देखा – “तो रुक जाऊँ?”

“नहीं, आप जाइए। पर लौटिए। और जो देखें, वो मुझे बताइए।”


मैंने तप किया।

ऊपर

Vasishtha's luminous translucent consciousness rises as a glowing flowing figure straight up out of his cross-legged meditating body, soaring through swirling night clouds high above a small curving earth, the seated body left behind by a fire; ethereal painterly classical Indian color illustration, dignified, no text, no watermark.

एक दिन मेरी चेतना ने मेरा देह छोड़ा और मैं ऊपर उड़ा, बहुत ऊँचे।

मेरे नीचे पृथ्वी थी, छोटी सी, और मेरे आगे खुला आकाश था।

मैं ऊपर बढ़ता गया।


एक जगह आई जहाँ हवा नहीं थी। मैंने ध्यान दिया कि मैं वहाँ हवा के बिना भी था, क्योंकि मेरी चेतना को हवा की ज़रूरत नहीं थी।


फिर वो जगह आई जहाँ कुछ भी नहीं था। मतलब सचमुच कुछ भी नहीं, न तारे, न ग्रह, न प्रकाश, बस एक खालीपन।

मैं उस खालीपन में रुक गया। मेरी चेतना ने पहले थोड़ी हलचल की, फिर ठहर गई।


Vasishtha as a serene old sage seated cross-legged, eyes closed, suspended alone in an immense featureless black void with no ground and no stars, a faint inner glow outlining his form to show pure being amid absolute emptiness; meditative painterly classical Indian color illustration, dignified, no text, no watermark.

वहाँ कुछ भी नहीं था, पर मैं था।

मैंने सोचा कि यह कितना विचित्र है, यहाँ कुछ नहीं और फिर भी मैं हूँ, तो मैं किसी चीज़ पर निर्भर नहीं हूँ, मैं ख़ुद हूँ। पहली बार मुझे यह बात इतनी स्पष्ट हुई।


मैं वहाँ बहुत देर रहा, पर देर का कोई अर्थ नहीं था, क्योंकि वहाँ समय ही नहीं था।

सात

फिर बहुत दूर एक चीज़ दिखी, एक हलकी सी चमक।

मैं उसकी ओर बढ़ा।

Vasishtha as a luminous traveler arriving before seven extremely ancient rishis seated together within a soft radiant glow in deep cosmic darkness, their weathered faces serene and eyes open, an aura of light far larger than their small bodies; reverent painterly classical Indian color illustration, dignified, no text, no watermark.

जब मैं पास पहुँचा, तो उस चमक के भीतर सात ऋषि बैठे थे, बहुत पुराने।


उनके चेहरे ऐसे थे जैसे कोई पत्थर सदियों से धूप में मँजा हुआ हो। उनकी आँखें खुली थीं, पर वो किसी एक चीज़ को नहीं, हर चीज़ को देख रहे थे।

उनका देह छोटा था, पर उनकी छाया बहुत बड़ी थी, क्योंकि उनके चारों ओर एक प्रकाश था जो उनसे कहीं बड़ा था।

मैं उनके पास पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला – “भाइयों।”

सबसे बीच वाले ऋषि बोले – “वसिष्ठ।”

मैं चौंक गया – “आप मुझे जानते हैं?”

“बेटा, हम सबको जानते हैं।”


बातचीत

मैं आकाश में ही बैठ गया। बैठने में कोई आसन नहीं था, बस मेरी चेतना वहाँ ठहर गई।


मैंने पूछा – “भाइयों, मैं यहाँ क्यों आया?”

सातों ऋषि एक साथ हँसे – “बेटा, यह तो ख़ुद से पूछो।”


मैंने अपने भीतर देखा, अपनी प्यास को। मैं उस सबसे ऊपरी जगह जाना चाहता था जहाँ कोई कथा बाक़ी न हो।


मैंने पूछा – “भाइयों, क्या यह वही जगह है?”

सबसे बीच वाले ऋषि बोले – “बेटा, यही वो जगह है।”

“तो यहाँ क्या है?”

“बेटा, यहाँ सब कथाएँ अपनी जगह लौट आती हैं।”

“मतलब?”

The central elder of the seven aerial sages speaks to a kneeling Vasishtha in the starry void, gesturing toward streams of luminous tales flowing out and curling back into a single radiant source behind the seated circle of witness-sages; symbolic painterly classical Indian color illustration, dignified, no text, no watermark.

ऋषि बोले – “बेटा, यहाँ सब कथाओं का स्रोत है। यहाँ से सब निकलती हैं, यहीं सब लौटती हैं। तुम जो भी कथा सुनते हो, वो यहीं से आती है, और जब वो ख़त्म होती है, तो यहीं लौटती है। हम सात ऋषि उन कथाओं के साक्षी हैं। हम कोई कथा नहीं कहते, हम बस देखते हैं।”


“और जो कथाएँ अभी चल रही हैं?”

“वो हमारी आँखों के सामने चल रही हैं, पर हम उनमें नहीं हैं।”

“मतलब आप कथाओं को देख रहे हैं, पर उनमें भाग नहीं ले रहे?”

“हाँ।”

“पर यह कैसे हो सकता है? कथा देखना भी तो एक भाग लेना है।”

ऋषि बोले – “बेटा, हम देखते हैं, पर देखने में हम कहीं नहीं होते। हम साक्षी हैं, और साक्षी कथा का हिस्सा नहीं होता।”


मैंने पूछा – “भाइयों, एक और प्रश्न। मेरी कथा?”

“बेटा, तुम्हारी कथा भी यहीं से आई है। तुम वसिष्ठ हो, ब्रह्मा के पुत्र, सप्तर्षियों में एक। तुम जब भी कोई कथा कहते हो, वो यहीं से आती है। और तुम ख़ुद भी एक कथा हो, और जब तुम अपनी कथा पूरी करोगे, तब तुम भी यहीं लौटोगे।”


मैंने उन सात पुराने ऋषियों को देखा और मुझे लगा कि मैं भी एक दिन वहाँ होऊँगा। पर यह सोच भी अजीब थी, क्योंकि मैं तो वहाँ ही था, अभी, और साथ ही मेरी कथा नीचे पृथ्वी पर भी चल रही थी।


और प्रश्न

मैंने पूछा – “भाइयों, मुझे एक बात बताइए। राम कौन है?”

“राम?”

“हाँ। मुझे लगता है मेरी एक कथा एक राम के साथ जुड़ी हुई है, दशरथ का पुत्र। पर वो अभी पैदा नहीं हुआ, फिर भी मैं उसके बारे में जानता हूँ।”


ऋषि बोले – “बेटा, राम वो है जो हर बार पैदा होता है, हर सृष्टि में, हर कथा में। उसका रूप बदलता है, पर उसकी चेतना नहीं।

“तुम राम को इसलिए जानते हो क्योंकि तुम पहले भी उसके गुरु रह चुके हो, बहुत बार। हर बार जब राम आता है, तुम भी आते हो, और हर बार वसिष्ठ-राम का सम्बन्ध होता है। इस बार वो दशरथ का पुत्र है, पिछली बार और कोई था, उससे पहले और कोई।”

मैंने मन ही मन यह बात स्वीकार की।


“और मेरी मृत्यु?”

ऋषि बोले – “बेटा, तुम्हारे देह की मृत्यु एक दिन होगी, पर तुम्हारी कथा नहीं मरेगी। तुम वसिष्ठ हो, और तुम वसिष्ठ रहोगे, अनगिनत कथाओं तक। पर एक दिन वो भी आएगा जब वसिष्ठ की कथा अपनी जगह लौटेगी। तब तुम यहाँ आओगे, हमारे पास, और कथा से अलग हो जाओगे।”

“कब?”

ऋषि बोले – “बेटा, कब का प्रश्न समय का है, और यहाँ समय नहीं है। बस इतना कह सकता हूँ कि वो दिन तुम ख़ुद जान जाओगे।”

सिद्ध-गुरु

मैं वहाँ बहुत देर बैठा रहा। ऋषियों ने मुझसे कुछ और भी कहा, पर वो बातें मैं तुम्हें नहीं बताऊँगा, राम, क्योंकि वो ऐसी बातें हैं जो हर एक को अपने आप मिलनी होती हैं।


कुछ देर बाद ऋषियों में से एक उठे और बोले – “बेटा, तुम्हारी कथा नीचे चल रही है, तुम्हें वापस जाना है।”

“पर मुझे यहाँ अच्छा लग रहा है।”

“बेटा, यह बात ठीक है, पर तुम्हें राम को कथाएँ सुनानी हैं, चालीस कथाएँ। यह आख़िरी कथा भी तभी होगी, जब तुम राम को हमारे बारे में बताओगे।”


तभी मेरे सामने एक दूसरी सिद्ध-छवि प्रकट हुई, एक गुरु, जो बोले – “वसिष्ठ, मैं तुम्हें मार्ग दिखाने आया हूँ। लौटो, तुम्हें बहुत काम है।”


मैं उठा।

मैंने सात ऋषियों को प्रणाम करके पूछा – “भाइयों, मैं फिर आऊँगा?”

“बेटा, तुम जब चाहो आ सकते हो। पर एक बार आओ, तो लौटने में बहुत बरस लगेंगे, क्योंकि तुम्हारी कथा को समय चाहिए।”


लौटना

मैं नीचे आया, बहुत तेज़ी से, पर मुझे लगा जैसे बहुत धीरे।

जब मैंने अपने देह में लौटकर आँखें खोलीं, तो मैं अपने आश्रम में था और अरुन्धती मेरे पास बैठी थीं।

“वसिष्ठ।”

“अरुन्धती।”

“लौट आए? क्या देखा?”


Vasishtha, returned to his body, sits close beside Arundhati at night by a single oil lamp at their riverside ashram, telling her of his vision, the seven Saptarshi stars glimmering above mountains; intimate warm painterly classical Indian color illustration, dignified, no text, no watermark.

मैंने कहा – “अरुन्धती, मैंने सात ऋषियों को देखा, आकाश के सबसे ऊपर। वो वहाँ हमेशा से बैठे हैं, सब कथाओं के साक्षी। और एक दिन हम भी वहाँ होंगे।”

अरुन्धती ने पूछा – “मैं भी?”

“हाँ।”

“पर मैं तो कथा हूँ, आप कह रहे थे।”

“हाँ, पर हर कथा एक दिन कथाकार बनती है। यह बात मैंने वहाँ सीखी।”


अरुन्धती ने फिर पूछा – “वसिष्ठ, मुझे एक बात बताइए। क्या वहाँ हम दोनों एक होंगे, या अलग?”

मैंने कहा – “अरुन्धती, वहाँ हम दोनों होंगे, पर वहाँ ‘दो’ का कोई अर्थ नहीं, और ‘एक’ का भी नहीं। ये बातें वहाँ नहीं होतीं।”

अरुन्धती बोलीं – “वसिष्ठ, यह बात मैं समझ नहीं पा रही।”

“मैं भी पूरी तरह नहीं समझा।”

“पर आपने देखा।”

“हाँ, देखा। समझ बाद में आएगी।”


इसके बाद बहुत बरस बीत गए। मैंने राम को पाया और उसे कथाएँ सुनानी शुरू कीं।


राम की वृद्धि

राम, मैंने तुम्हें चालीस कथाएँ सुनाई हैं।


जब हम मिले, तुम बहुत युवा थे, तुम्हारे प्रश्न साधारण थे, और तुम सोचते थे कि उत्तर कहीं बाहर हैं। पहली कथा सुनते समय तुमने एक सपने की बात पूछी थी, अपनी माँ का सपना। मुझे तुम्हारी आँखें याद हैं, उनमें डर का एक छोटा सा रूप था।


फिर हम आगे चले। लीला की कथा में तुमने पूछा था कि क्या प्रेम के भीतर डर है। तब तुम समझे कि हर प्रेम के भीतर वो डर है, और उस डर के पार जाने का रास्ता प्रेम को छोड़ना नहीं, बल्कि उसे और गहरा करना है।


कर्कटी की कथा सुनते समय तुमने अपनी भूख पर ध्यान दिया और समझा कि भूख को प्रश्न में बदला जा सकता है।


चूड़ाला की कथा में तुमने अपनी माँ के बारे में सोचा, वो माँ जो जानती तो हैं पर सुनी नहीं जातीं, और तब तुमने तय किया कि तुम अपनी पत्नी की बात सुनोगे।


ऐसी बहुत सी कथाएँ हुईं, और हर एक ने तुम में एक छोटी सी बात बदली।

अब तुम्हारी आँखों में कुछ है जो पहले नहीं था, एक स्थिरता, एक हलकी सी हँसी, और एक भीतर की समझ।


मैंने तुम्हें कुछ सिखाया, पर असली सीख तुम्हारी अपनी थी।

मेरी कथाएँ बस दर्पण थीं, जिनमें तुमने अपने को देखा।


चालीस कथाएँ

लवण की कथा। लीला की। कर्कटी की। पुण्य-पावन की। गाधि की। चूड़ाला की। भुशुण्ड की। जनक की। प्रह्लाद की। शुक्र की। इंदु के दस पुत्रों की। बलि की। वीतहव्य की। उद्दालक की। विपश्चित की। दशूर की। इन्द्र-अहल्या की। सुरघु की। कच की। व्याध की। हेमचूड़ की। दम-व्याल-कट की। शिला-लोक की। आकाशज की। भास-विलास की। चिन्तामणि की। तीन राजकुमारों की। मूर्ख हाथी की। मंकि की। शुक की। विदुरथ की। सौ रुद्रों की। बिल्व-फल की। हेतुक की। कुन्ददन्त की। शिखिध्वज की। वासुदेव की। पुण्यमिता की। एक अर्ध-श्लोक की।


और अब यह आख़िरी।


सात आकाशी ऋषि, जहाँ सब कथाएँ अपनी जगह लौटती हैं।

राम बहुत देर तक चुप रहे।


फिर राम बोले – “गुरुदेव, तो ये सब कथाएँ वो सब उसी एक जगह से आईं?”

“हाँ।”

“और वो सब वहीं लौटेंगी?”

“हाँ।”

“और मैं?”


वसिष्ठ बोले – “राम, तुम भी वहीं से आए हो, और तुम भी वहीं लौटोगे। पर अभी तुम्हारी कथा बहुत बाक़ी है। तुम्हें राज्य चलाना है, बहुत कुछ करना है। पर अब तुम्हें यह पता है कि सब कुछ कहाँ से आता है, और कहाँ लौटता है।”


राम ने पूछा – “गुरुदेव, मेरी कथा कितनी लम्बी होगी?”

वसिष्ठ बोले – “राम, बहुत लम्बी। तुम पिता बनोगे, राजा बनोगे, वनवास जाओगे, युद्ध करोगे, फिर लौटोगे। तुम बहुत बरस राज्य करोगे, बहुत सी पीड़ा सहोगे, और बहुतों को सहारा दोगे। पर अन्त में, एक दिन, तुम सरयू में जाओगे।”

राम ने सरयू की ओर देखा।

“और तब मैं उन सात ऋषियों के पास?”

“हाँ।”

“और मैं उन्हें पहचानूँगा?”

“हाँ, तुम पहचानोगे, क्योंकि तुम पहले भी वहाँ रह चुके हो। तुम बस अभी भूले हुए हो।”


राम ने आसमान की ओर देखा, जहाँ ऊपर सप्तर्षि के तारे थे, बहुत स्थिर और बहुत शान्त।

“गुरुदेव, क्या वो तारे ही सात ऋषि हैं?”

वसिष्ठ बोले – “राम, ये तारे उन सात की एक छाया हैं। हम पृथ्वी से जो देखते हैं, वो उनका असली रूप नहीं। पर एक स्तर पर, हाँ, वो वहाँ हैं।”


राम ने पूछा – “गुरुदेव, मेरे लिए एक बात कीजिए। जब मेरा समय आए, तो क्या आप भी होंगे?”


वसिष्ठ ने राम को बहुत देर तक देखा, फिर बोले – “राम, मैं होऊँगा। शायद मेरा देह नहीं, पर मैं किसी न किसी रूप में ज़रूर होऊँगा, क्योंकि वसिष्ठ-राम का सम्बन्ध बहुत पुराना है, और बहुत आगे तक जाएगा।”


राम की आँखें भीगीं तो नहीं, पर भीतर कुछ हलका सा खुल गया।


दोनों बहुत देर तक चुप रहे। सरयू पर रात घनी हो रही थी, और पानी पर सप्तर्षि की छाया बहुत स्थिर पड़ी थी।

Elderly Vasishtha rests his open palm upon the bowed head of young prince Rama who kneels with eyes closed on the Saryu riverbank, a quiver of arrows beside them, the seven Saptarshi stars and their still reflection on the dark water above; tender painterly classical Indian color illustration, dignified, no text, no watermark.

वसिष्ठ ने अपनी हथेली राम के सिर पर रखी और राम ने आँखें बन्द कीं।

दूर पानी पर एक नाव हलके से हिल रही थी, और उसमें एक नन्हा दिया जल रहा था, जो बरसों तक यूँ ही हिलता रहेगा।


राम ने पूछा – “गुरुदेव, मेरा एक प्रश्न है।”

“पूछो।”


“क्या मैं भी कभी सात ऋषियों के पास जा सकूँगा?”


वसिष्ठ बोले – “राम, हाँ, पर अभी नहीं।”

“कब?”

“राम, यह तुम्हारी कथा पर निर्भर है। जब तुम्हारी कथा पूरी होगी, तब तुम भी ऊपर जाओगे। पर एक बात।”

“क्या?”


“राम, ऊपर जाने के लिए तुम्हें अपनी कथा छोड़नी होगी। बहुत बरस लगेंगे, बहुत पीड़ा होगी, बहुत प्रेम, बहुत कुछ खोना, बहुत कुछ पाना। यह सब करने के बाद, एक दिन तुम तैयार हो जाओगे।”


राम बोले – “गुरुदेव, यह तो कठिन है।”

“हाँ।”

“पर मैं करूँगा।”


वसिष्ठ बोले – “राम, यह वादा अभी मत करो।”

“क्यों?”

“क्योंकि तुम अभी जवान हो। अभी तो तुम्हें अपनी कथा शुरू करनी है। वादे बाद में।”


राम ने फिर पूछा – “गुरुदेव, एक और प्रश्न। वो सात ऋषि, उनके पास जाकर क्या होगा?”


वसिष्ठ बोले – “राम, उनके पास जाकर बहुत कम होगा। बस तुम उनके साथ बैठोगे। वो भी ज़्यादा नहीं बोलते, बस देखते हैं, और तुम भी देखोगे।”


“पर मुझे कुछ करना नहीं?”

“राम, उस स्तर पर करने को कुछ नहीं, बस होना।”

“समझा।”


राम ने पानी की ओर देखकर कहा – “गुरुदेव, मुझे अब चलना चाहिए।”

“हाँ।”


राम उठे – “गुरुदेव, यह आख़िरी कथा थी?”


वसिष्ठ बोले – “राम, मेरी कथाएँ चालीस थीं, पर तुम्हारी अपनी कथा अब शुरू होगी।”


राम ने पूछा – “गुरुदेव, मेरी कथा क्या होगी?”

“राम, तुम जिओगे, पीड़ा सहोगे, प्रेम करोगे, राज्य चलाओगे, और एक दिन तुम भी एक कथा बन जाओगे। लोग तुम्हें भी सुनेंगे, बहुत बरस तक।”


राम बोले – “गुरुदेव, मेरी कथा कौन कहेगा?”

“पता नहीं, कोई एक ऋषि। शायद वाल्मीकि।”

राम ने विनती की – “गुरुदेव, एक छोटी सी विनती है।”

“क्या?”

“वो ऋषि मुझे सच लिखें, सिर्फ़ अच्छी बातें ही नहीं, मेरी कमज़ोरियाँ भी।”


वसिष्ठ बोले – “राम, यह विनती बहुत बड़ी है।”

“क्यों?”

“क्योंकि अधिकतर लोग चाहते हैं कि उनकी कथा बस अच्छी हो। तुम पहले राजा हो जो अपनी पूरी सच्चाई चाहते हो।”


राम ने वसिष्ठ को बहुत देर तक प्रणाम किया।


वसिष्ठ ने राम के सिर पर हाथ रखकर कहा – “राम, अब जाओ। तुम्हारी कथा शुरू।”


राम घर की ओर चले।


रास्ते में राम ने ऊपर देखा, सप्तर्षि वहीं थे।

राम ने मन ही मन उन्हें प्रणाम किया – “सात ऋषिवर, मेरी कथा शुरू हो रही है, मुझे आशीर्वाद दीजिए।”


सप्तर्षि तारे चमकते रहे, और राम को लगा कि उन्होंने सुन लिया।


राम मुस्कुराते हुए घर की ओर बढ़े।


दूर वो नन्हा दिया अब भी जल रहा था और नाव और हलके से हिल रही थी।


राम एक पल रुककर उस दिए को देखते रहे, फिर आगे बढ़ गए।


बहुत बरस की कथा अब शुरू हो रही थी।


घर पहुँचने पर माँ ने उन्हें देखा – “बेटा, तू बहुत बदला दिखता है।”

राम ने कहा – “माँ, गुरुदेव ने आज एक अन्तिम कथा सुनाई।”

“क्या कथा?”

“सात आकाशी ऋषियों की।”

माँ बोलीं – “बेटा, मैं तो नहीं समझती, पर तेरी आँखों में कुछ है जो पहले नहीं था।”


राम ने माँ को गले लगाकर कहा – “माँ, धन्यवाद।”

“बेटा, किस लिए?”

“माँ, मुझे यहाँ तक ले आने के लिए।”


माँ ने कहा – “बेटा, यह तो हम सबका काम है।”


रात अब और घनी हो चली थी और राम सो गए।

सपने में उन्हें सात ऋषि दिखे, वो हँस रहे थे।


सबसे बीच वाले ने हाथ हिलाया, और राम ने भी हाथ हिलाया। सपने में हवा हलकी थी और प्रकाश कुछ अलग सा था।


सुबह जब वो जागे, उन्हें सपना याद था। वो मुस्कुराए और बोले – “फिर मिलेंगे।”


बहुत बरस बाद, जब राम अपनी कथा पूरी कर चुके थे, जब वो सरयू में अपना देह छोड़ गए, तब वो ऊपर सात ऋषियों के पास पहुँचे।


ऋषियों ने उन्हें देखा और सबसे बीच वाला बोला – “राम।”

“ऋषिवर।”

“लम्बी यात्रा।”

“हाँ।”


राम ऋषियों के साथ बैठ गए, बस होने को, और बहुत देर तक चुप रहे।

राम के भीतर एक स्थिरता थी।


यूँ ही बहुत बरस बीतते गए।


फिर एक दिन वसिष्ठ भी आए, और राम बोले – “गुरुदेव।”

“राम।”

दोनों बैठे रहे, बस होने को।


साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6ब.56-70 पर आधारित है। यह संग्रह की अन्तिम कथा है। सात आकाशी ऋषियों का स्थान शास्त्र में सबसे ऊँचा स्थान है, जहाँ सब कथाएँ अपनी जगह लौटती हैं। यह वसिष्ठ के अपने अनुभव की कथा है।

संग्रह यहीं समाप्त होता है।

जो पढ़ा, उसे भीतर ले जाइए।

जो भीतर है, वो हमेशा है।

दर्शन-दृष्टि

वसिष्ठ एक प्रलय के बाद के काल में हैं। पुरानी सृष्टि गई, नई अभी आ रही है। वो आकाश में रहने वाले सात ऋषियों से मिलते हैं, और एक सिद्ध-गुरु से। कोई शोक नहीं, कोई जल्दी नहीं। बस एक ठहराव, और एक चेतना जो हर रचना और हर प्रलय के पार है। कथा यह कहती है कि सब कथाओं के अन्त में जो बचता है, वो एक खुला आकाश है, जिसमें न आरम्भ है न अन्त, बस एक निरन्तर साक्षी।

भारतीय परम्परा में आदि शङ्कराचार्य (788-820) ने अपनी ब्रह्मसूत्र भाष्य में “एकमेवाद्वितीयम्” (छान्दोग्य 6.2.1) पर लिखा कि सृष्टि के पहले और प्रलय के बाद जो रहता है, वो एक अद्वितीय सत्ता है, जिसे न देश में बाँधा जा सकता है न काल में। सात आकाशी ऋषियों की कथा इसी सत्ता का काव्य-रूप है। चालीस कथाओं के बाद, जब हर पात्र अपनी जगह बैठ चुका है, बचते हैं वो ऋषि जो आकाश में रहते हैं, और वो आकाश ख़ुद चेतना का दूसरा नाम है।