सात आकाशी ऋषि

कथा · 40

सात आकाशी ऋषि: एक नगर जो विचार से बना था

सात ऋषि उड़ रहे थे। आकाश में एक नगर मिला। वो उतरे। नगर के लोग पारदर्शी थे। पूछा – तुम क्या हो? जवाब चौंका देने वाला था।

सात ऋषि थे। योग की शक्ति से उन्होंने उड़ना सीखा था। समय-समय पर वो आकाश में निकलते। नए लोक देखने।

एक दिन वो साथ निकले। बहुत ऊँचाई पर। बादलों के ऊपर। तारों के नीचे।

एक जगह उन्हें कुछ अजीब दिखा। आकाश में एक नगर था।

“यह क्या है?”

“पता नहीं। उतरकर देखें।”

वो नगर के पास उतरे। महल थे, सड़कें थीं, दुकानें थीं। सब वैसा ही जैसे ज़मीन के नगर।

लोग चल रहे थे। मगर एक बात थी – लोग पारदर्शी थे। हलकी सी छाया जैसे। उन्हें देखो तो आर-पार दिखता था।

एक आदमी पास से गुज़रा। ऋषियों ने रोका।

“भाई, यह कौन सा नगर है?”

आदमी ने रुककर देखा।

“आप कहाँ से आए हैं?”

“नीचे से। पृथ्वी से।”

आदमी मुस्कुराया।

“पृथ्वी? तो आप अभी भी देह में हैं?”

“हाँ। आप नहीं हैं?”

“नहीं। हम सब यहाँ विचार-शरीर में हैं।”

“विचार-शरीर?”

“बैठिए। मैं समझाता हूँ।”

सब बैठ गए एक चौक में। आदमी ने बताया।

“कई जीवन पहले हम सब पृथ्वी पर थे। मगर हम सब साधक थे। हमने ध्यान किया। हम सब के बीच एक विचार बना – ‘क्या होगा अगर हम सब का एक नगर हो? जहाँ हम साथ रहें, मगर देह से मुक्त?’

“हमने यह विचार वर्षों संजोया। हर एक ने अपने मन में इसे पाला। एक दिन – हमारी देह छूटी। हम मरे नहीं। बस हमारा मन इस विचार में स्थिर हो गया।

“हम यहाँ आए। यह नगर हम सबकी मिली-जुली कल्पना है। यह असली है, क्योंकि हम सब इसे एक साथ धारण किए हैं। मगर ठोस नहीं है, क्योंकि यह विचार है।”

ऋषियों ने एक-दूसरे को देखा।

“तो आप खाते क्या हैं?”

“भोजन का विचार। खाने का अनुभव होता है। पेट भरने का अनुभव होता है। मगर हम बिना भोजन के भी जी सकते हैं। शरीर है ही नहीं।”

“और सोते हैं?”

“सोने का विचार। थकने का अनुभव। ये सब हम बना लेते हैं अपने मन में।”

एक ऋषि ने पूछा, “तो आप मुक्त हैं?”

आदमी ने सोचा। फिर बोला।

“पूरी तरह नहीं। हम देह से मुक्त हैं, मगर मन से नहीं। हमने एक नगर बनाया, मगर हम उस नगर के बंदी हैं। अगर हम विचार छोड़ें, तो नगर ग़ायब। हम बँधे हैं, बस अलग तरह से।

“असली मुक्ति हम नहीं पाए। उसके लिए हमें इस नगर को भी छोड़ना होगा।”

ऋषि चुप रहे। एक देर तक।

फिर एक ने पूछा, “हम जो पृथ्वी पर हैं, हम कौन हैं?”

आदमी ने मुस्कुराकर कहा, “आप भी विचार-शरीर में हैं। बस आप का विचार ज़्यादा ठोस लगता है। हमारा हलका। फ़र्क़ डिग्री का है, नहीं तरह का।”

ऋषियों के होश उड़ गए।

“मगर हमारी देह तो असली है।”

“असली कितनी?”

उन्होंने अपने हाथ देखे। ठोस लगते थे। मगर भीतर – कण थे। कणों में और कण। अंत में – खाली जगह।

“हमारा शरीर भी ज़्यादातर खाली है।”

“हाँ। बस आपके लिए वो ख़ाली जगह ठोस लगती है। हमारे लिए वो ख़ाली जगह ख़ाली ही दिखती है।”

ऋषि बहुत देर बैठे। फिर उठे। आदमी को धन्यवाद दिया।

आकाश में फिर उड़े।

नीचे की पृथ्वी देखी। सब कुछ ठोस दिखता था – मगर उन्हें अब पता था। ठोस का भ्रम है। बाक़ी सब विचार है।

एक ऋषि ने धीरे से कहा, “अब हम घर लौटें। अपनी पृथ्वी की देहों में।”

“मगर अब वो भी पहले जैसी नहीं लगेंगी।”

सब हँसे।

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, हम जिसे ठोस कहते हैं, वो भी विचार ही है। फ़र्क़ बस इस बात का है कि कितने लोग एक साथ उस विचार को धारण कर रहे हैं। एक नगर सात लोगों के विचार से बन सकता है। एक ब्रह्मांड अरबों लोगों के विचार से। मगर असली – तो वो नहीं जो धारण किया जाता है। असली वो है जो धारण करता है।”

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