इस पृष्ठ पर
पात्र-यात्रा · वाल्मीकि रामायण के चुने हुए प्रसंग
जिस राज्य के लिए एक माँ ने सब कुछ दाँव पर लगा दिया, उसका बेटा उसे छूता तक नहीं; चौदह बरस वह उसे धरोहर की तरह सँभालता है और लौटाते समय दसगुना गिनकर देता है।
केकय की राजधानी राजगृह में एक रात एक राजकुमार बुरा सपना देखता है, और सुबह प्रिय सखाओं के घेरे में बैठकर भी उसका मन नहीं बहलता। अयोध्याकाण्ड का सर्ग 69 उसे पहली बार लम्बी साँस लेते सुनाता है। एक सखा पूछ लेता है कि इतने मित्रों के बीच आप हमारे आनन्द में साथ क्यों नहीं देते, और भरत कहते हैं, “सुनिए, यह उदासी मुझ पर किस कारण उतरी है।” सपने में पिता थे, और उन्हें याद करके “यह बड़ा डर मेरे हृदय से जाता ही नहीं।” वे सपना सुना ही रहे हैं कि थके घोड़ों वाले दूत आते हैं, कहते हैं कि वसिष्ठ और सब मन्त्री आपको कुशल कहते हैं, शीघ्र चलिए, और इससे आगे एक शब्द नहीं बताते। भरत की पहली चिन्ता राज्य नहीं है; वे पूछते हैं, “मेरे पिता राजा दशरथ कुशल हैं?” बालकाण्ड के सर्ग 18 में काव्य उन्हें जन्म दे चुका है, “कैकेयी के गर्भ से सत्यपराक्रमी भरत जन्मे, विष्णु के चौथाई अंश,” और शत्रुघ्न उन्हें प्राणों से भी प्यारे हुए; मिथिला में सर्ग 73 में जनक ने कहा था, “रघुनन्दन, माण्डवी का हाथ अपने हाथ से ग्रहण कीजिए।” और जब अयोध्या में राम के अभिषेक की तैयारी हुई, वे शत्रुघ्न के साथ ननिहाल में थे। जो कुछ उनके नाम पर माँगा गया, सब उनकी पीठ पीछे माँगा गया; यही इस पात्र की कथा की कुंजी है।
राम ने वन जाते समय सुमन्त्र के हाथ भरत के नाम एक सन्देश भेजा था, और सर्ग 58 में सुमन्त्र उसे राजा को सुनाते हैं: भरत से कहिएगा, “अपनी सब माताओं के साथ न्याय से बर्तिए,” और बार बार आँसू बहाते हुए यह भी, “जो मेरी माता मुझ पर इतनी वत्सल हैं, उन कौसल्या को अपनी ही माता समझिए।” यह सन्देश भरत को तब मिलता है जब पिता नहीं रहे, और वे इसे जीवन भर निभाते हैं।
सूनी अयोध्या में एक पुत्र
सात रात का रास्ता काटकर भरत अयोध्या पहुँचते हैं तो न गीत हैं, न बाजे, और पिता के भवन में पिता नहीं मिलते। सर्ग 72 में कैकेयी शुभ समाचार के स्वर में कहती हैं कि राजा परलोक चले गए, और भरत धरती पर गिर पड़ते हैं। फिर दूसरा समाचार, कि राम चीर पहनकर दण्डक को चले गए, और भाई के चरित्र पर एक क्षण की शंका से काँपते हुए वे पूछते हैं, “कहीं राम ने किसी ब्राह्मण का धन तो नहीं छीना?” माता सब कह देती हैं और अन्त में यह कि स्वयं को सारी पृथ्वी के राजा के रूप में अभिषिक्त कराइए। सर्ग 73 में भरत का उत्तर इस काव्य में किसी बेटे का माँ से कहा सबसे कठोर वाक्य है। “आपने राजा को प्रेत बना दिया और उस पर राम को तपस्वी।” “प्रलय की रात की तरह आप इस कुल में प्रकट हुईं, और मेरे पिता ने अंगार को छाती से लगाकर भी उसे अंगार नहीं पहचाना।” राज्य का बोझ वे नापकर दिखाते हैं: “जिसका बल केवल राम हैं, वह मैं राज्य का यह बोझ कैसे उठाऊँगा? बछड़े पर रखा बोझ बछड़ा कब सँभालता है?” और फिर वह पंक्ति जिसमें उनका सारा संयम है: “आप जैसी पाप निश्चय वाली स्त्री को त्यागने में मुझे कोई संकोच न होता, यदि राम आपको सदा माता न मानते।” प्रतिज्ञा उसी साँस में आती है, कि वे राम को अभी वन से लौटा लाएँगे, “और उन तेजस्वी राम को लौटाकर, स्थिर मन से, उन्हीं का सेवक बनकर जिऊँगा।”
सर्ग 75 में कौसल्या के पास उनके लिए केवल कड़वाहट है, “आपको राज्य की चाह थी; लीजिए, यह निष्कण्टक राज्य आपका हुआ,” और हर शब्द उन्हें घाव में सूई की तरह बिंधता है। वे उनके चरणों में गिरकर शपथें लेते हैं, एक के बाद एक, हर शपथ “जिसकी सहमति से मेरे आर्य वन गए” से शुरू होती है: उसे वह पाप लगे जो प्यास से तड़पते को पानी पास होते हुए भी ‘पानी नहीं है’ कहकर लौटा देने वाले को लगता है। शपथ लेते लेते वे फिर गिरते हैं, और कौसल्या उन्हें गोद में लेकर कहती हैं, “आप सत्यप्रतिज्ञ हैं, बेटा; आप सज्जनों के लोक पाएँगे।” पिता का दाह संस्कार होता है, और तेरहवें दिन शत्रुघ्न मन्थरा को घसीटते हैं; भरत ही उन्हें रोकते हैं, “सब लोगों की दृष्टि में स्त्रियाँ अवध्य हैं; इसे क्षमा कीजिए,” और यह भी कि यदि राम को पता चल जाए कि हमने इस कुबड़ी को मारा है, “तो वे धर्मात्मा न आपसे फिर कभी बोलेंगे, न मुझसे।”
चौदहवें दिन मन्त्री आते हैं कि यह राज्य बिना स्वामी का है और भाई को लाँघने का कोई दोष आप पर नहीं। भरत अभिषेक की सामग्री की प्रदक्षिणा करते हैं और कहते हैं, “हमारे कुल में राज्य सदा बड़े भाई का माना गया है; आप जैसे समझदार लोगों को मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए। राम हमारे बड़े भाई हैं, वही पृथ्वी के स्वामी होंगे; उनकी जगह मैं चौदह बरस वन में रहूँगा।” भरी सभा में वसिष्ठ भी पिता और पितामह का सिंहासन लेने को कहते हैं, और उत्तर हंस की कूक जैसे स्वर में आता है: “मैं दशरथ का पुत्र होकर अपने बड़े भाई के सिंहासन का अपहर्ता कैसे बनूँ, जब राज्य ही नहीं, मैं स्वयं भी राम का हूँ?” और यदि भाई लौटने को न मानें, “तो जैसे आर्य लक्ष्मण वन में रह रहे हैं, वैसे ही मैं भी वहीं रहूँगा।”
गंगा के घाट पर दो शंकाएँ
सर्ग 84 में गंगा के तट पर गुह कोविदार की ध्वजा वाली सेना देखकर अपने लोगों से कहते हैं कि कैकेयी पुत्र ने राम को मारने की ठानी है, और भेंट लेकर आकर सीधा पूछ लेते हैं, “बिना प्रयास बड़े काम कर डालने वाले राम के प्रति कहीं आप बुरे मन से तो नहीं जा रहे?” भरत का उत्तर मीठा है और पूरा: “वह घड़ी कभी न आए जब मुझमें ऐसी दुष्टता दिखे। आप मुझ पर शंका न कीजिए; वे रघुवंशी मेरे बड़े भाई हैं और मैं उन्हें पिता के बराबर मानता हूँ।” उसी रात गुह उन्हें लक्ष्मण का धनुष लिए जागना सुनाते हैं, और जटाओं की बात सुनते ही भरत मूर्च्छित हो जाते हैं, इस आशंका में कि जटा बाँध लेने के बाद राम शायद अब अयोध्या न लौटें। गंगा पार प्रयाग में, सर्ग 90 में, दूसरी शंका एक ऋषि की है। सेना को कोस भर पीछे रोककर, शस्त्र और आभूषण उतारकर भरत पैदल भरद्वाज के आश्रम आते हैं, और ऋषि पूछते हैं, “कहीं उन निरपराध राम और लक्ष्मण का निष्कण्टक राज्य भोगने के लिए आप कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते?” भरत की आँखों से आँसू बह चलते हैं। “सब कुछ जानने वाले आप भी मुझे ऐसा मानें, तो मैं मारा गया।” “मैं तो उन पुरुष व्याघ्र को मनाकर अयोध्या लौटा लाने और उनके चरणों में सिर झुकाने आया हूँ।” उस रात ऋषि विश्वकर्मा को बुलाकर पूरी सेना का दिव्य आतिथ्य करते हैं, और उस वैभव के बीच काव्य भरत की एक छोटी सी मुद्रा दर्ज करता है: वे भीतर रखे राजसिंहासन की प्रदक्षिणा करते हैं, जैसे राम उस पर बैठे हों वैसे झुककर प्रणाम करते हैं, “फिर चँवर हाथ में लिया और प्रधान मन्त्री के आसन पर बैठ गए।” विदा में ऋषि एक बात और देते हैं: “भरत, कैकेयी को आप दोषी न मानें, क्योंकि राम का यह वनवास सबके सुख का कारण बनेगा।”
चित्रकूट: धरना और पादुका
चित्रकूट के पास भरत की पहली आज्ञा है, “राम के आश्रम को किसी तरह की बाधा न पहुँचे,” और सर्ग 99 में वे पैदल उस महावन में घुसते हैं। पत्तों की कुटिया में बैठे बड़े भाई को देखते ही धीरज टूट जाता है: “जिन्हें राजसभा में मन्त्रियों से घिरकर बैठना चाहिए था, मेरे वही बड़े भाई जंगली हिरनों के बीच बैठे हैं।” “धिक्कार है मेरे जीवन को, जिसे संसार कोसता है; मैं कितना निर्दयी हूँ।” वे चरणों तक हाथ नहीं पहुँचा पाते, गिर पड़ते हैं, और उनके मुँह से बस एक बार “आर्य!” निकलता है। जब बोल पाते हैं, तो पहले पिता की मृत्यु कहते हैं और फिर याचना: “आप मुझ कुख्यात दास पर यह कृपा कीजिए: आज ही इन्द्र की तरह अयोध्या के राज्य पर अपना अभिषेक करवाइए।” अगले दिन वे अपने को नापकर बोलते हैं, “आपकी बराबरी करके राज चलाने की सामर्थ्य मुझमें उतनी ही नहीं, महीपति, जितनी गधे में घोड़े की चाल की,” और विनती का अन्त एक शर्त है: “यदि मेरी विनती ठुकराकर आप यहाँ से अकेले वन में ही चले जाएँगे, तो मैं भी आपके साथ चल दूँगा।” सर्ग 107 में राम दो वरों की पूरी कथा सुनाते हैं और वह वाक्य कहते हैं जो दोनों भाइयों की जगह तय कर देता है: “भरत, आप मनुष्यों के राजा बनिए, और मैं वन के पशुओं का सम्राट बनूँगा।”
तर्क चुक जाते हैं, तो सर्ग 111 में भरत अपने हाथों कुश बिछाकर बैठ जाते हैं: “मैं बड़े भाई के द्वार पर तब तक बैठा रहूँगा जब तक वे प्रसन्न होकर मेरी बात नहीं मान लेते।” राम पूछते हैं, “भरत, मैंने आपका क्या बिगाड़ा है, प्रिय, कि आप मेरे द्वार पर धरना देकर मुझ पर दबाव डालेंगे?” द्वार पर लेटकर रोकना ब्राह्मण का तरीका है, क्षत्रिय का नहीं। भरत उठते हैं और उठते ही अपना अन्तिम प्रस्ताव रखते हैं: “पर यदि पिता की आज्ञा पूरी करनी ही है और किसी को वन में रहना ही है, तो चौदह बरस मैं ही वन में रहूँगा।” राम का निश्चय सर्ग 112 में पहाड़ है, “चन्द्रमा से कान्ति भले चली जाए, हिमालय भले अपना हिम छोड़ दे, समुद्र भले अपनी मर्यादा लाँघ जाए, पर मैं पिता को दिया वचन नहीं तोड़ूँगा,” और तब भरत उनके आगे सोने से मढ़ी काठ की पादुकाएँ रख देते हैं: “आर्य, इन स्वर्णभूषित पादुकाओं पर अपने चरण रखिए।” राम उन पर खड़े होते हैं, उतरते हैं, उन्हें सौंप देते हैं, और भरत अपनी शर्त कहते हैं: “यदि चौदहवाँ बरस पूरा होते ही अगले दिन मैं आपको अयोध्या लौटा न देखूँ, रघुकुल के रत्न, तो मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा।” राम उन्हें वही सौंपते हैं जो कोई और नहीं सँभाल सकता था: “माता कैकेयी का ध्यान रखिए; उन पर क्रोध न कीजिए।” सर्ग 115 में नन्दिग्राम में भरत मन्त्रिमण्डल को आज्ञा देते हैं, “इन पादुकाओं पर शीघ्र राजछत्र तानिए; मैं इन्हें अपने बड़े भाई के चरण ही मानता हूँ,” और राज्य का जो भी काम आता, वे पहले पादुकाओं को निवेदित करते, फिर उसका निबटारा करते।
नन्दिग्राम से सरयू तक
युद्धकाण्ड का सर्ग 126 भरत को चौदह बरस बाद वैसे ही पाता है जैसे उन्होंने कहा था: अयोध्या से कोस भर दूर, दुबले, जटा और वल्कल में, “श्रीराम की पादुकाएँ आगे रखकर पृथ्वी का शासन करते।” हनुमान का समाचार सुनते ही वे हर्ष में मूर्च्छित हो जाते हैं, और होश आने पर हाथ जोड़े कहते हैं, “बहुत दिनों के बाद आज मेरी कामना पूरी हुई।” सारी अयोध्या नन्दिग्राम पहुँच जाती है; भरत सुग्रीव को गले लगाकर कहते हैं, “सुग्रीव, आप हम चार भाइयों के पाँचवें भाई हैं।” फिर सर्ग 127 का वह क्षण जिसके लिए यह पात्र लिखा गया है। भरत पादुकाएँ अपने हाथों राम के चरणों के नीचे रखते हैं: “यह आपका सारा राज्य, जो अब तक मेरे पास धरोहर था, मैं आपको लौटाता हूँ। अपना कोश, कोष्ठागार, भवन और सेना देख लीजिए; आपके तेज के बल पर मैंने सब कुछ दसगुना कर दिया है।” वानर और विभीषण तक रो पड़ते हैं। अभिषेक के रथ पर भरत सारथि बनकर लगाम थामते हैं, और राम उन्हें युवराज बनाते हैं। उत्तरकाण्ड के सर्ग 100 और 101 में वे मामा युधाजित के कहने पर अपने पुत्रों तक्ष और पुष्कल को लेकर सिन्धु के तट पर जाते हैं, संवर्त अस्त्र से शैलूष के तीन करोड़ गन्धर्व पुत्रों को गिराते हैं, तक्षशिला और पुष्कलावत बसाते हैं, और पाँच बरस में लौटते हैं। अन्त उसी एक मना करने से आता है जिससे कथा शुरू हुई थी। सर्ग 108 में लक्ष्मण को विदा करके राम कहते हैं कि आज ही भरत को अयोध्या का राजा बनाकर वन जाएँगे, और भरत राज्य को धिक्कारते हैं: “राजन्, मैं सत्य की और स्वर्ग के भोग की शपथ लेकर कहता हूँ, रघुनन्दन, आपके बिना मैं राज्य नहीं चाहता।” कुश और लव को राज देकर राम सरयू की ओर चलते हैं, भरत और शत्रुघ्न अन्तःपुर सहित अग्निहोत्र लिए उनके पीछे हो लेते हैं, और गोप्रतार के घाट पर सब सरयू में उतरते हैं। जिसने चौदह बरस नगर के बाहर बैठकर राम की राह देखी, वह अन्त में भी उनसे एक डग पीछे ही चला।
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ भरत कुछ अस्वीकार करते हैं, कुछ माँगते हैं, या कुछ लौटाते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- माँ के सामने बेटा। भरत का आगमन और सिंहासन का अस्वीकार पढ़िए; अयोध्याकाण्ड 73 में कैकेयी की भर्त्सना है और 79 में मन्त्रियों को उत्तर कि हमारे कुल में राज्य सदा बड़े भाई का माना गया है। पूछिए: जिसने अपने लिए कुछ नहीं माँगा, उसके नाम पर सब कुछ माँग लिया गया; ऐसे पाए हुए को ठुकराना अधिकार है या कर्तव्य?
- द्वार पर कुश की शय्या। चित्रकूट में भरत राम मिलन और पादुका में सर्ग 111 और 112 पर ठहरिए, जहाँ भरत धरना देते हैं और राम कहते हैं कि यह ब्राह्मण का तरीका है, क्षत्रिय का नहीं। पूछिए: जब प्रेम के पास तर्क चुक जाएँ, तो उसके हाथ में क्या बचता है, और पादुकाएँ उस प्रेम का उत्तर हैं या उसकी सीमा?
- दसगुना लौटाना। अयोध्या वापसी और राज्याभिषेक में युद्धकाण्ड 127 पढ़िए, जहाँ भरत पादुकाएँ राम के चरणों के नीचे रखते हैं और कोश, भवन और सेना को दसगुना बताते हैं। पूछिए: धरोहर सँभालने वाला उसे बढ़ाकर क्यों लौटाता है, और यह गिनती राजा की है या सेवक की?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ राजगृह में एक राजकुमार सपने से डरकर पूछता है कि पिता कुशल हैं। क्या वह डर अब केवल पुत्र का डर दिखता है, या उस पुरुष का जिसने जान लिया था कि उसके नाम पर कुछ माँगा जा चुका है?
दशरथ की मृत्यु · सुमन्त्र के हाथ भरत के नाम राम का सन्देश, कि सब माताओं के साथ न्याय से बर्तिए और कौसल्या को अपनी ही माता समझिए।
राम का वन गमन · वह सुबह जब अयोध्या सजी थी और भरत ननिहाल में थे, और वे दो वर जो उनकी पीठ पीछे माँगे गए।
राम का स्वधाम गमन · सिन्धु के तट पर तीन करोड़ गन्धर्वों पर छूटा संवर्त, तक्षशिला और पुष्कलावत की नींव, और सरयू के घाट पर एक डग पीछे चलता भाई।
धरोहर का राजा
पूरा पढ़िए तो वाल्मीकि के भरत के मुख से राज्य के लिए एक ही शब्द बार बार निकलता है, धरोहर। कैकेयी के सामने वह बोझ है जो बछड़ा नहीं उठा सकता; मन्त्रियों के सामने बड़े भाई का अधिकार; वसिष्ठ के सामने वह चीज़ जिसके साथ वे स्वयं भी राम के हैं; नन्दिग्राम में पवित्र धरोहर; और राम के चरणों के नीचे पादुकाएँ रखते समय वह सब कुछ जो दसगुना होकर लौटाया जा रहा है। इस काव्य में कोई दूसरा पात्र इतना कुछ पाकर इतना कम अपना नहीं कहता। उनका क्रोध भी अलग है: वह कैकेयी पर पूरा उतरता है और उसी वाक्य में रुक जाता है, क्योंकि राम उन्हें माता मानते हैं; शत्रुघ्न का हाथ मन्थरा से वे इसी कारण हटवाते हैं। गुह और भरद्वाज दोनों उन पर एक ही शंका करते हैं, और दोनों को वे एक ही उत्तर देते हैं, कि वह घड़ी कभी न आए। चित्रकूट पर उनके पास तर्क, आँसू, धरना और अन्त में अपने ही वनवास का प्रस्ताव है, और राम का वचन उनमें से किसी से नहीं हिलता; तब वे पादुकाएँ रखते हैं और अपने ऊपर अग्नि की शर्त लेकर लौटते हैं। चौदह बरस नगर के बाहर बैठकर वे वही करते हैं जो राम ने उनसे माँगा था, कैकेयी पर क्रोध नहीं करना और कौसल्या को माता मानना। जिस बेटे के नाम पर दो वर माँगे गए थे, उसने जीवन भर उनमें से एक भी नहीं भोगा, और जब राम ने अन्त में सचमुच राज्य देना चाहा, उसने फिर वही कहा जो चौदहवें दिन अयोध्या की सभा में कहा था। सरयू के घाट पर वह भाई से एक डग पीछे उतरा, जैसे सदा चला था।
आधार संस्करण और इस परिचय का दायरा
आधार संस्करण: इस पुस्तकालय में प्रयुक्त गीताप्रेस वाल्मीकि रामायण, संस्कृत मूल और हिन्दी अनुवाद, सातों काण्ड। इस प्रस्तुति के प्रसंग: बालकाण्ड 18 और 73; अयोध्याकाण्ड 58, 69 से 79, 84 से 92, 99 से 101, 104 से 107 और 111 से 115; युद्धकाण्ड 126 से 128; उत्तरकाण्ड 100 से 102 और 108 से 110। इस प्रस्तुति का दायरा: सातों काण्डों से खींचा गया पात्र चित्र; उद्धृत वचन इस पुस्तकालय की वाल्मीकि रामायण की कड़ियों के हिन्दी पाठ से, जो गीताप्रेस पाठ पर आधारित है।
सीमाएँ और पाठ भेद: तुलसीदास के रामचरितमानस के भरत दूसरी कथा के भरत हैं और यहाँ केवल नामित हैं; उनका कोई प्रसंग इस परिचय में नहीं मिलाया गया। माण्डवी का उल्लेख बालकाण्ड 73 के विवाह तक सीमित रखा गया है।