पात्र-यात्रा · वाल्मीकि रामायण के चुने हुए प्रसंग
एक रानी जिसे राम और भरत में कोई भेद नहीं दिखता, एक ही दोपहर में वह स्त्री बन जाती है जिसके दो वरदान एक राजा को मारते हैं और एक राजकुमार को वन भेजते हैं; फिर भी काव्य उसे अन्त तक “माता कैकेयी” कहकर ही पुकारता है।
अयोध्या उत्सव में डूबी है, और कैकेयी अपनी शय्या पर लेटी हैं। अयोध्याकाण्ड का सर्ग 7 उनके मायके की कुबड़ी दासी मन्थरा को छत से उतरकर सीधे शयन-कक्ष में लाता है, “उठिए, मूढ़! आप कैसे पड़ी हुई हैं?” रानी मीठे स्वर में पूछती हैं, “मन्थरा, कुशल तो है न?” दासी समाचार सुनाती है कि कल राम युवराज होंगे, और इसे सर्वनाश कहती है। कैकेयी शरद की पूर्णिमा के चन्द्रमा-सी शय्या से उठ बैठती हैं और उसे एक दिव्य आभूषण भेंट करती हैं: “राम और भरत में मुझे कोई भेद नहीं दीखता।” “आपने वह कही है, इसलिए मैं आपको एक और श्रेष्ठ वरदान देती हूँ; जो चाहें, माँग लीजिए।” यह कैकेयी का पहला दृश्य है, और इसमें वे एक दासी को वरदान दे रही हैं। काव्य में उनके जितने शब्द दर्ज हैं, लगभग सब इसी दिन और इसके बाद की एक रात के हैं।
उस दिन से पहले वे काव्य में एक नाम और एक हिस्सा हैं। बालकाण्ड के सर्ग 15 में ब्रह्मा दशरथ की तीन रानियों को “ह्री, श्री और कीर्ति जैसी” कहते हैं; सर्ग 16 में राजा पायस बाँटते हैं, “उसके बाद जो बचा, उसका आधा कैकेयी को”; सर्ग 18 में उनके गर्भ से “सत्यपराक्रमी भरत” जन्मते हैं। उनके भाई युधाजित के घर ही भरत बड़े होते हैं। दो पुराने वरदानों की कथा सर्ग 9 में मन्थरा सुनाती है: देवासुर युद्ध में मूर्च्छित दशरथ को कैकेयी रणभूमि से बाहर निकाल लाईं, और प्रसन्न राजा ने दो वर दिए। “आपने तब कहा था, ‘स्वामी, जब चाहूँगी, तब माँग लूँगी।’”
तीन वार, और एक पलटा हुआ मन
मन्थरा आभूषण फेंक देती है और दूसरा वार करती है: कल आप “हाथ जोड़े, दासी की तरह उस कौसल्या के सामने खड़ी रहेंगी।” कैकेयी का उत्तर फिर राम का गुणगान है, “जैसे भरत मेरे लिए माननीय हैं, वैसे ही, और उनसे अधिक, राघव हैं।” तीसरे वार में दासी भरत का भविष्य खोलती है और एक पुराना घाव कुरेदती है, “अपने सौभाग्य के घमण्ड में आपने पहले कौसल्या का अपमान किया था; राम की माता, आपकी वह सौत, अपना बैर कैसे न चुकाएगी?” यहाँ कैकेयी का मुख क्रोध से जल उठता है। “आज ही मैं राम को यहाँ से वन भेजूँगी, और भरत को बिना देर युवराज पद पर अभिषिक्त कराऊँगी।” उपाय वही दो वरदान हैं, और कोपभवन। काव्य एक वाक्य में अपना निर्णय लिख देता है: “महान बुद्धि वाली होकर भी वे उसकी बातों से एक अनुभवहीन किशोरी-सी कुमार्ग पर चल पड़ीं।” रानी दासी के कूबड़ पर सोने की माला चढ़ाने का वचन देती हैं, मोतियों का हार उतारकर फेंकती हैं और भूमि पर लेट जाती हैं: “यदि राम अभिषिक्त हुए, तो यह मेरे जीवन का अन्त है।”
सर्ग 10 से 13 में राजा आते हैं और सुनने से पहले देने लगते हैं, “अपने पुण्यों की शपथ खाकर कहता हूँ, जो आपको प्रिय हो, वही करूँगा।” कैकेयी पहले प्रतिज्ञा माँगती हैं, फिर माँग बताने का वचन देती हैं; राजा राम की शपथ खाते हैं, और रानी साक्षी बुलाती हैं: “जिस क्रम से आप शपथ खा रहे हैं और मुझे वरदान दे रहे हैं, उसे इन्द्र समेत तैंतीस देवता सुनें।” “रघुनन्दन, आपके ही पास धरोहर रखे वे दो वरदान आज मैं माँगती हूँ।” भरत का अभिषेक, राम का “दण्डक वन में चौदह वर्ष तपस्वी का जीवन,” “और आज ही मैं राघव को वन को जाते हुए देखूँ।” राजा उन्हें साँपिन कहते हैं, सिर से उनके चरण छूते हैं; उत्तर और कड़ा होता है। “वीर राजन, दो वरदान देकर अब आप पछताते हैं, तो पृथ्वी पर अपने धर्म की घोषणा कैसे करेंगे?” और अन्तिम वाक्य: “भरत की और अपनी शपथ खाकर कहती हूँ, राम के निर्वासन के सिवा मैं किसी बात से सन्तुष्ट न हूँगी।” इतना कहकर वे मौन हो जाती हैं। रात भर राजा आकाश से प्रभात रोकने की विनती करते हैं, और “उस निर्दय रानी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार न की।”
जो आज्ञा राजा न दे सके
भोर में, सर्ग 14 में, राजा भूमि पर करवटें बदल रहे हैं। “वर देकर आप ऐसे पड़े क्यों हैं, जैसे कोई पाप कर बैठे हों?” “मैं तीन बार कहती हूँ।” राजा वह कहते हैं जो एक पति कह सकता है: “जो हाथ मैंने मन्त्रों के बीच अग्नि के सामने थामा था, आपके उस हाथ को, और मुझसे जन्मे आपके पुत्र भरत को, आपके साथ ही, मैं त्यागता हूँ।” रानी का स्वर नहीं बदलता, “व्याकुल हुए बिना अपने पुत्र राम को यहाँ बुलवाइए।” सर्ग 18 में राम आते हैं; पिता के मुख से केवल “राम” निकलता है, और राम प्रश्न कैकेयी से पूछते हैं। वे निडर होकर उत्तर देती हैं कि राजा अब “बह चुकी नदी पर बाँध बाँधना चाहते हैं,” और “आपके सामने ये अपने होंठ नहीं खोलेंगे।” राम वचन देते हैं, “राम दो बार नहीं बोलता,” और तब वे सुनाती हैं: “उन्हीं वरों के बदले मैंने आज राजा से भरत का अभिषेक और आपका दण्डकारण्य-गमन माँगा है।” राम कहते हैं, “ऐसा ही हो,” और कैकेयी “खिल उठी।” अब वे जल्दी मचाती हैं, और राम का उत्तर उन्हें वह पद देता है जो उन्होंने माँगा नहीं था: “केकय की राजकुमारी, आपका मुझ पर पिता से भी अधिक अधिकार है; फिर भी इतनी छोटी बात के लिए आपको पिता के पास जाना पड़ा, तो लगता है कि आपको मुझमें कोई गुण नहीं दिखा।”
विदा के दिन, सर्ग 34 से 37 में, कैकेयी पर तीन भाषण पड़ते हैं। सुमन्त्र उन्हें “पतिघातिनी” कहते हैं, “पर वह देवी न क्षुब्ध हुई, न पीड़ित; उस घड़ी उसके मुख का रंग तक नहीं बदला।” राजा राम के साथ सेना और कोष भेजना चाहते हैं, तब पहली बार उनका मुँह सूखता है: “ऐसा स्वादहीन, सूना राज्य भरत नहीं लेंगे।” “आपके ही वंश में सगर ने अपने ज्येष्ठ पुत्र असमंज को निकाल दिया था; राम भी वैसे ही, बिना किसी सहारे के, जाएँ।” राजा के मुख से एक शब्द निकलता है, “धिक्कार!” राम वल्कल माँगते हैं, और “कैकेयी स्वयं वल्कल उठा लाई और उस भरी सभा में, लाज छोड़कर, राम से बोली, ‘इन्हें पहन लीजिए।’” लक्ष्मण पहनते हैं, और सीता उनके हाथ से कुश के दो वस्त्र लेकर उन्हें बाँधना नहीं जानतीं। वसिष्ठ का क्रोध आता है, और उसके भीतर एक सीधा तर्क: “केकय-राजपुत्री, आपने अकेले राम का वनवास माँगा था।” सर्ग 40 में रथ की धूल ओझल होते ही राजा गिरते हैं, और कैकेयी बाईं ओर से उन्हें उठाने आती हैं। “पापी संकल्प वाली कैकेयि, मेरे अंगों को न छूइए; मैं आपको देखना भी नहीं चाहता। न आप मेरी पत्नी हैं, न बान्धवी।” “कैकेयि, आपकी साध पूरी हुई; अब विधवा होकर राज्य भोगिए।” छठी रात राजा “हा क्रूर कैकेयी, मेरी शत्रु, इस कुल का कलंक!” कहकर प्राण छोड़ते हैं। उस रात कैकेयी उस कमरे में नहीं थीं।
“यह सब मैंने आपके ही लिए रचा है”
सर्ग 72 में भरत केकय से लौटते हैं और माता के भवन जाते हैं। कैकेयी “प्रसन्नता से सोने का आसन छोड़कर उठ खड़ी हुईं,” उनका सिर सूँघती हैं और नाना-मामा की कुशल पूछती हैं। भरत पिता की खाली शय्या के बारे में पूछते हैं, और वे “वह भयानक, अप्रिय समाचार यों सुनाया मानो कोई सुखद बात हो, ‘जो सब प्राणियों की गति है, वही गति आपके महात्मा पिता को मिली।’” भरत धरती पर गिरते हैं; माता उन्हें उठाती हैं, और जब बेटा पूछता है कि राम किस पाप पर वन भेजे गए, तो “अपना सारा कुकर्म ज्यों का त्यों, प्रसन्न होकर” कह जाती हैं: “पुत्र, राम को युवराज बनाने की बात सुनते ही मैंने आपके पिता से आपके लिए राज्य और राम के लिए वनवास माँगा।” “यह सब मैंने आपके ही लिए रचा है।” सर्ग 73 और 74 में बेटा वह कहता है जो पति भी नहीं कह सके थे: “माता का रूप धरे मेरी शत्रु, पति की हत्यारी, आप मुझसे बोलने के योग्य नहीं।” और एक वाक्य जो आगे की कथा तय करता है: “आप जैसी पाप-निश्चय वाली स्त्री को त्यागने में मुझे कोई संकोच न होता, यदि राम आपको सदा माता न मानते।” सर्ग 78 में शत्रुघ्न मन्थरा को घसीटते हैं; कैकेयी उसे बचाने आती हैं और फटकार से काँपकर “अपने पुत्र भरत की शरण में” भागती हैं। अधमरी मन्थरा उनके चरणों में गिरती है, और “भरत की माता ने धीरे-धीरे ढाढ़स बँधाया।”
भरद्वाज के आश्रम में, सर्ग 92 में, काव्य पहली बार उनके भीतर झाँकता है: “कैकेयी ने भी, जिन्हें बेटे को युवराज बनाने की साध अधूरी रह जाने पर सारा संसार धिक्कार रहा था, लज्जा से ऋषि के चरण छुए, और प्रदक्षिणा करके उदास मन से भरत के पास ही जा खड़ी हुईं।” भरत उनका परिचय देते हैं, “यह क्रोधी, घमण्डी, ओछी, ऊपर से आर्य और भीतर से क्रूर कैकेयी मेरी माता है,” और ऋषि उत्तर देते हैं, “भरत, कैकेयी को आप दोषी न मानें, क्योंकि राम का यह वनवास सबके सुख का कारण बनेगा।” चित्रकूट में राम भरत से कुशल पूछते हैं, और उस सूची में यह भी है, “और यशस्विनी माता कैकेयी भी प्रसन्न तो हैं न?” सर्ग 107 में राम एक पुरानी बात बताते हैं: पिता ने कैकेयी से विवाह करते समय उनके नाना को वचन दिया था कि अयोध्या का राज्य कैकेयी की सन्तान को मिलेगा। पादुकाएँ देने से पहले वे कहते हैं, “आपकी माता ने आपके लिए यह सब स्नेह से किया हो या राज्य के लोभ से, उसे मन में न रखिए, प्रिय, और उनके साथ माता जैसा ही बर्ताव कीजिए।” और विदा के समय वह शपथ: “माता कैकेयी का ध्यान रखिए; उन पर क्रोध न कीजिए। इसकी शपथ आपको मैं भी देता हूँ और सीता भी, रघुनन्दन।”
काव्य उन्हें आगे भी छूता है। युद्धकाण्ड के सर्ग 119 में विमान पर बैठे दशरथ कहते हैं, “आपको वन भेजने के लिए कैकेयी ने जो शब्द कहे थे, वे आज भी मेरे हृदय में गड़े हैं,” और राम की पहली माँग उन्हीं के लिए है: “धर्मज्ञ, कैकेयी और भरत पर कृपा कीजिए। आपने कैकेयी को कहा था, ‘मैं आपको पुत्र के साथ त्यागता हूँ।’ प्रभु, वह घोर शाप कैकेयी और उनके पुत्र को न छुए।” “ऐसा ही हो,” महाराज कहते हैं। नन्दिग्राम में राम “यशस्विनी कैकेयी को प्रणाम” करते हैं, और भरत राज्य लौटाते हुए कहते हैं, “मेरी माता का भी आपने मान रखा था।” उत्तरकाण्ड के अन्तिम सर्गों में “सुमित्रा और यशस्विनी कैकेयी भी, अनेक धर्मकार्य करके,” कौसल्या के पीछे स्वर्ग में जा बसती हैं और वहाँ “राजा दशरथ से मिलीं।” जिसने कहा था कि वे न उनकी पत्नी हैं, न बान्धवी, काव्य उसी के पास उन्हें लौटाता है।
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ कैकेयी कुछ देती हैं, कुछ सुनाती हैं, या किसी से कुछ कहलवाती हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- दासी को दिया गया वरदान। मंथरा, कैकेयी, दो वरदान में अयोध्याकाण्ड 7 से 9 पढ़िए, जहाँ रानी पहले आभूषण देती हैं, दो बार राम के गुण गाती हैं, और तीसरे वार पर पलट जाती हैं। पूछिए: तीन वारों में कौन-सा लगा, भरत का भय, या कौसल्या के अपमान की वह पुरानी याद?
- जो आज्ञा पिता न दे सके। राम का वन-गमन में सर्ग 18 और 19 पर ठहरिए, जहाँ आज्ञा कैकेयी सुनाती हैं और राम कहते हैं कि उन पर कैकेयी का अधिकार पिता से भी अधिक है। पूछिए: वह वाक्य कैकेयी को क्या देता है, और क्या वह वही है जो उन्होंने माँगा था?
- “यह सब मैंने आपके ही लिए रचा है।” भरत का आगमन, पादुका में सर्ग 72 पढ़िए, जहाँ माता बेटे को पिता की मृत्यु और अपना किया एक ही स्वर में सुनाती हैं। पूछिए: कथा के भीतर यह सब किसके लिए किया गया था, और क्या उस कमरे में कोई इसे मानता है?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ शय्या पर लेटी रानी एक कुबड़ी दासी को वरदान दे रही है। क्या वह उदारता अब उसी स्त्री की दिखती है जो कोपभवन में तैंतीस देवताओं को साक्षी बुलाएगी, या किसी और की?
दशरथ की मृत्यु · कौसल्या का धिक्कार कि बस भरत और कैकेयी फूले नहीं समाते, और छठी रात राजा की अन्तिम पुकार में उनका नाम।
चित्रकूट में भरत-राम मिलन और पादुका · ऋषि के चरणों पर लज्जा, विवाह के समय दिया गया एक पुराना वचन, और विदा की शपथ कि माता कैकेयी पर क्रोध न कीजिए।
अग्नि-परीक्षा, अयोध्या-वापसी, राज्याभिषेक · विमान पर बैठे पिता के हृदय में अब तक गड़े हुए शब्द, और बेटे की पहली माँग कि वह घोर शाप कैकेयी को न छुए।
जिसे काव्य ने माता कहना नहीं छोड़ा
पूरा पढ़िए तो वाल्मीकि की कैकेयी एक दिन और एक रात की स्त्री हैं। उनके अपने शब्द लगभग सब अयोध्याकाण्ड के सर्ग 7 से 19 के बीच हैं, और उनमें भी पहले वाले राम के पक्ष में हैं। उसके बाद वे मौन हैं, और उनके बारे में दूसरे बोलते हैं: सुमन्त्र, वसिष्ठ, दशरथ, नगर की स्त्रियाँ, और सबसे कठोर स्वर में उनका अपना बेटा। काव्य उस निन्दा को पूरी लम्बाई में दर्ज करता है और उसके साथ दो बातें और रखता है। एक यह कि राम उन्हें हर बार माता कहते हैं और लंका के आकाश में पिता से पहली कृपा उन्हीं के लिए माँगते हैं। दूसरी यह कि काव्य उनका एक भी पश्चात्ताप का वाक्य नहीं लिखता; भरद्वाज के आश्रम में उनकी लज्जा दिखती है, शब्द नहीं। वाल्मीकि उन्हें “अनार्या” और “यशस्विनी” दोनों कहते हैं, और दोनों विशेषण अन्त तक चलते हैं। भरद्वाज का “दोषी न मानें” एक ओर है, “कुल का कलंक” दूसरी ओर, और काव्य एक को चुनकर दूसरे को नहीं मिटाता। जिसके दो वरदानों ने राजा को मारा, अन्त में वह उसी राजा के पास स्वर्ग में पहुँचती है, और वह वाक्य भी उसी विशेषण के साथ लिखा गया है।
आधार-संस्करण और इस परिचय का दायरा
आधार-संस्करण: इस पुस्तकालय में प्रयुक्त गीताप्रेस वाल्मीकि रामायण, संस्कृत मूल और हिन्दी अनुवाद, सातों काण्ड। इस प्रस्तुति के प्रसंग: बालकाण्ड 15 से 18 और 73; अयोध्याकाण्ड 7 से 19, 34 से 40, 61 से 64, 72 से 74, 78, 92, 99 से 104, 107 और 112; युद्धकाण्ड 119 और 127 से 128; उत्तरकाण्ड 43 और 99। इस प्रस्तुति का दायरा: बालकाण्ड से उत्तरकाण्ड तक खींचा गया पात्र-चित्र; उद्धृत वचन इस पुस्तकालय की वाल्मीकि रामायण की कड़ियों के हिन्दी पाठ से, जो गीताप्रेस पाठ पर आधारित है।
सीमाएँ और पाठ-भेद: देवासुर संग्राम में कैकेयी की सेवा काव्य में तीन तरह से कही गई है (मन्थरा: मूर्च्छित राजा को रणभूमि से बाहर ले जाना; कैकेयी राजा से: रात भर जागकर रक्षा; कैकेयी राम से: शरीर से बाण निकालना); तीनों अपने-अपने प्रसंग में हैं। कैकेयी की माता का नाम पाठ में नहीं है। तुलसीदास के रामचरितमानस की कैकेयी दूसरी कथा की कैकेयी हैं और केवल नामित हैं; उनका कोई प्रसंग इस परिचय में नहीं मिलाया गया।