अध्याय 1 · दशरथ का पुत्रेष्टि-यज्ञ व पुत्र-जन्म

वाल्मीकि रामायण · बालकाण्ड
दशरथ का पुत्रेष्टि-यज्ञ व पुत्र-जन्म · सर्ग 1 से 18

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देवर्षि नारद वीणा लिए वृक्ष के नीचे बैठे हैं और महर्षि वाल्मीकि हाथ जोड़कर प्रश्न पूछ रहे हैं।

तमसा नदी के तट पर, एक ऋषि के मन में करुणा से जो पहली पंक्ति फूटी, वही आदिकाव्य का बीज बनी, और उसी काव्य का आरम्भ अब हम आप तक पहुँचाते हैं। महर्षि वाल्मीकि ने देवर्षि नारद से पूछा था, इस संसार में इस समय वह कौन है जो गुणवान है, वीर्यवान है, धर्म का ज्ञाता है, कृतज्ञ है, सत्यवादी है, दृढ़प्रतिज्ञ है, जिसके चरित्र में कोई दोष नहीं, जो समस्त प्राणियों का हितैषी है, विद्वान है, समर्थ है, और जिसका दर्शन ही मन को मोह ले। जिसने अपने मन को जीत लिया हो, क्रोध पर विजय पाई हो, और जिसका रोष युद्ध में देवताओं तक को कँपा दे, ऐसा एक ही पुरुष कौन है। नारद ने मुस्कुराकर कहा, हम आपको वही पुरुष बताते हैं, और इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न उस पुरुष का नाम लिया, राम।

नारद की कथा, सम्पूर्ण रामायण एक ही साँस में

नारद ने राम के गुणों की माला पिरोई, बुद्धिमान, नीतिमान, वाग्मी (वाणी में निपुण), श्रीसम्पन्न, शत्रुओं का संहारक, चौड़े कंधोंवाला, आजानुबाहु (घुटनों तक लम्बी भुजाओंवाला), शंख-सी ग्रीवा, विशाल छाती, बड़े नेत्र। वे न बहुत लम्बे थे न बहुत छोटे, अंग समान और सुगठित, शरीर पर मंगल-चिह्न। धर्म के रहस्य के ज्ञाता, सत्य-प्रतिज्ञ, प्रजा के हित में रत। समुद्र की भाँति गम्भीर, हिमालय की भाँति धीर, पराक्रम में विष्णु के समान, दर्शन में चन्द्र-सा सौम्य, क्रोध में प्रलयकाल की अग्नि-सा, और क्षमा में पृथ्वी के समान। ऐसे राम कौसल्या के आनन्द को बढ़ानेवाले पुत्र थे।

राजा दशरथ ने प्रजा को प्रसन्न करने की इच्छा से अपने इन्हीं ज्येष्ठ पुत्र राम को युवराज-पद पर बैठाना चाहा। पर रानी कैकेयी ने, जिन्हें राजा ने किसी पुरानी सेवा के बदले एक वर देने का वचन दिया था, उसी वर के बदले राम का वनवास और अपने पुत्र भरत का राज्याभिषेक माँग लिया। सत्यवचन के बन्धन में बँधे दशरथ ने अपने प्रिय पुत्र राम को वन भेज दिया।

राम के पीछे विनयशील लक्ष्मण चले, जो सुमित्रा के आनन्द-वर्धन और भाई के स्नेही थे। राम की प्रिय पत्नी सीता, जो जनक के कुल में हल की रेखा से प्रकट हुई थीं और जिन्हें प्राणों के समान चाहा जाता था, भी राम के साथ वैसे ही चलीं जैसे रोहिणी चन्द्रमा के साथ चलती हैं। राम वीर थे, प्रतिज्ञा का पालन करते हुए वन को गए, और शृंगवेरपुर में गंगा-तट पर निषादराज गुह से मिले, सूत (सारथी) को वहीं से लौटा दिया। वन-दर-वन, गहरी नदियाँ पार करते हुए, प्रयाग में भरद्वाज के दर्शन कर, उनके निर्देश से चित्रकूट पहुँचे, और वहाँ एक सुन्दर पर्णकुटी बनाकर तीनों देवताओं और गन्धर्वों की भाँति सुख से रहने लगे।

राम के चित्रकूट जाने पर पुत्र-शोक से व्याकुल दशरथ ने पुत्र का नाम लेते-लेते स्वर्ग को प्रयाण किया। वसिष्ठ आदि ब्राह्मणों ने भरत को राज्य लेने को कहा, पर महाबली भरत ने राज्य नहीं चाहा। वे राम को मनाने वन गए, बड़े भाई से, आर्य-भाव से, प्रार्थना की कि आप ही राजा बनें, क्योंकि आप धर्म के ज्ञाता हैं। पर राम ने पिता के आदेश के कारण राज्य नहीं लिया, और भरत को अपनी चरण-पादुकाएँ प्रेम के चिह्न-स्वरूप देकर बार-बार समझाकर लौटाया। भरत बिना अपनी इच्छा पूरी किए, राम के चरण छूकर अयोध्या लौटे और अयोध्या से 14 मील दूर नन्दिग्राम में रहकर राम के लौटने की प्रतीक्षा में राज्य चलाने लगे।

राम ने दण्डक वन में प्रवेश किया, विराध राक्षस को मारा, शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य और उनके भाई के दर्शन किए, और अगस्त्य के वचन से इन्द्र का दिया धनुष, खड्ग और अक्षय बाणोंवाले दो तरकश ग्रहण किए। वन में रहते हुए सभी ऋषियों ने राक्षसों के वध की प्रार्थना की, और राम ने प्रतिज्ञा की। जनस्थान-निवासिनी शूर्पणखा (जिसके नाखून सूप-से बड़े थे), जो इच्छानुसार रूप धरती थी, राम के द्वारा विरूपित की गई, लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट दिए।

शूर्पणखा के कहने पर खर, त्रिशिरा, दूषण और उनके अनुचरों समेत जनस्थान के 14000 राक्षस राम ने युद्ध में मार डाले। बन्धु-वध सुनकर क्रोध से मूर्च्छित रावण ने मारीच की सहायता माँगी। मारीच के बहुत मना करने पर भी, काल से प्रेरित रावण ने मायावी मारीच से दोनों राजकुमारों को आश्रम से दूर भिजवाकर सीता का हरण किया, और बीच में रोकनेवाले गृध्र (गिद्ध) जटायु को घातक रूप से घायल कर दिया। राम ने शोक में विलाप किया, जटायु का दाह-संस्कार किया, और वन में सीता को ढूँढ़ते हुए कबन्ध नामक विकृत राक्षस से मिले। उसे मारकर दाह किया तो वह अपने मूल गन्धर्व-रूप में स्वर्ग गया, और राम को शबरी के पास जाने को कहा।

शबरी के पूजन के पश्चात राम पम्पा-तट पर हनुमान से मिले। हनुमान के माध्यम से सुग्रीव से मैत्री हुई, अग्नि को साक्षी मानकर। राम ने सुग्रीव को विश्वास दिलाने को दुन्दुभि का विशाल कंकाल पैर के अँगूठे से 80 मील दूर फेंका, और एक ही बाण से सात ताड़-वृक्षों, एक पर्वत और रसातल को बेध दिया। सुग्रीव की शंका दूर हुई। फिर सुग्रीव ने ललकारा, बाली निकला, और तारा के समझाने पर भी युद्ध में आया, राम ने एक ही बाण से बाली को मार गिराया और सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य दिया। सुग्रीव ने सीता की खोज में वानरों को सब दिशाओं में भेजा।

सम्पाति गृध्र के वचन से बलवान हनुमान 800 मील चौड़ा खारा समुद्र लाँघ गए, लंका में अशोकवाटिका में राम का ध्यान करती सीता को पाया, राम की अँगूठी की पहचान दी, और तोरण तोड़ डाला। पाँच सेनापतियों, सात मन्त्रिपुत्रों और अक्ष को मारकर, मेघनाद के ब्रह्मास्त्र से स्वयं बँध गए। रावण से मिलने को उत्सुक हनुमान ने राक्षसों को सहन किया, फिर सीता के निवास को छोड़कर सारी लंका जलाकर लौट आए।

राम सुग्रीव-सहित समुद्र-तट पर पहुँचे, समुद्र को सूर्य-सरीखे बाणों से क्षुब्ध किया, और समुद्र के प्रकट होकर प्रार्थना करने पर नल से सेतु बँधवाया। लंका पहुँचकर रावण को मारा, और सीता को पाकर परम लज्जा का अनुभव हुआ। राम के कठोर वचन पर सती सीता ने अग्नि में प्रवेश किया, और अग्निदेव के वचन से उन्हें निष्पाप जानकर राम ने उन्हें स्वीकार किया। विभीषण को लंका के सिंहासन पर बैठाकर, देवताओं के वर से युद्ध में मरे वानरों को पुनर्जीवित करवाकर, राम पुष्पक विमान से, स्वजन और मित्रों समेत, अयोध्या को चले। भरद्वाज के आश्रम से हनुमान को आगे भरत के पास भेजा, नन्दिग्राम में जटा उतारकर, सीता-सहित राम ने पुनः राज्य पाया।

नारद ने कहा, राम-राज्य में लोग सुखी, सन्तुष्ट, धर्मात्मा होंगे, अकालमृत्यु न होगी, स्त्रियाँ विधवा न होंगी, अग्नि, जल, वायु और ज्वर का भय न होगा। नगर-राष्ट्र धन-धान्य से भरे रहेंगे। राम सैकड़ों अश्वमेध और प्रचुर स्वर्णवाले यज्ञ करेंगे, विद्वानों को करोड़ों गौएँ और ब्राह्मणों को अगणित धन देंगे। 11000 वर्ष राज्य कर वे ब्रह्मलोक को जाएँगे। यह पवित्र, पापनाशक, वेदों के तुल्य राम-चरित जो पढ़ता है, सब पापों से मुक्त हो जाता है।

सार: सर्ग 1 में नारद पूरी रामायण को एक ही कथा-सूत्र में पिरो देते हैं, मानो आगे आनेवाले समुद्र का चित्र पहले ही एक बूँद में दिखा दिया हो।

क्रौंच-वध और श्लोक का जन्म

क्रौंच पक्षी बाण से मरा पड़ा है, उसकी संगिनी विलाप करती है, वाल्मीकि निषाद को रोकते हैं।

नारद के लौट जाने पर वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज के साथ तमसा नदी के तट पर गए, जो गंगा से अधिक दूर नहीं थी। तट उन्हें स्वच्छ और कीचड़-रहित लगा, उन्होंने भरद्वाज से कहा, यहाँ का जल सत्पुरुष के मन-सा निर्मल है, यहीं स्नान करूँगा। शिष्य ने वल्कल (पेड़ की छाल का वस्त्र) दिया, और मुनि वन का सौन्दर्य देखते घूमने लगे। तभी उन्होंने एक क्रौंच (सारस) के जोड़े को देखा, जो परस्पर अनुरक्त मधुर स्वर में विचर रहा था। एक पापी, वैरबुद्धि निषाद ने मुनि के देखते-देखते उस जोड़े के नर पक्षी को बाण से मार गिराया।

रक्त से सने पंखोंवाला नर भूमि पर तड़पने लगा, और उसकी संगिनी अपने प्रियतम से बिछुड़कर करुण स्वर में रोने लगी। मुनि का हृदय करुणा से भर गया, और उनके मुख से अनायास निकला, हे निषाद, आप अनन्त वर्षों तक प्रतिष्ठा न पाएँ, क्योंकि आपने काम से मोहित क्रौंच-युगल में से एक को मार डाला। कहकर मुनि स्वयं विचार में पड़ गए कि शोक से मैंने यह क्या कह डाला। फिर उन्होंने सोचा, यह जो वाणी चार समान-अक्षर के चरणों में, तन्त्री-लय में गायी जा सकनेवाली निकली है, यही श्लोक हो, सच्ची कविता हो। शिष्य ने वह अनुपम पंक्ति कण्ठस्थ कर ली, और मुनि प्रसन्न हुए।

एक उप-कथा: बाद की परम्परा में इसी प्रसंग से “श्लोक” शब्द की व्युत्पत्ति “शोक” से मानी जाती है, अर्थात जो शोक से उपजी छन्दोबद्ध पंक्ति थी, वही आगे चलकर समस्त काव्य का छन्द बनी। वाल्मीकि “आदिकवि” और रामायण “आदिकाव्य” कहलाए, अर्थात पहले कवि और पहले काव्य।

आश्रम लौटकर मुनि उसी पंक्ति के मनन में डूबे थे कि स्वयं लोकस्रष्टा, चतुर्मुख ब्रह्मा प्रकट हुए। वाल्मीकि चकित होकर खड़े हो गए, अर्घ्यपाद्य से उनका पूजन किया। पर उनका मन अब भी उस क्रौंची की पीड़ा पर अटका था, और वे फिर वही श्लोक दुहराने लगे, यह सोचकर कि अनजाने मैंने निषाद को शाप दे दिया। ब्रह्मा हँसकर बोले, हे ब्रह्मन, यह श्लोक मेरी ही इच्छा से आपकी वाणी से प्रकट हुआ है, इस पर खेद न करें। आप इसी छन्द में धर्मात्मा राम का सम्पूर्ण चरित रचें। जब तक पृथ्वी पर पर्वत और नदियाँ रहेंगी, तब तक यह कथा संसार में प्रचलित रहेगी, और आप मेरे लोकों में, अपनी इच्छानुसार, ऊपर और नीचे, सर्वत्र वास करेंगे। ऐसा कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गए।

सार: करुणा की एक चीख ने पहला श्लोक रचा, और ब्रह्मा ने उसी को सम्पूर्ण रामायण की रचना का आदेश बना दिया, यहीं से आदिकाव्य का जन्म हुआ।

कवि का अपना संक्षेप

नारद से सम्पूर्ण कथा सुनकर वाल्मीकि ने आचमन कर, पूर्वाग्र कुश-आसन पर बैठकर, ब्रह्मा के दिए योग-बल से ध्यान लगाया। उस योग-दृष्टि से उन्होंने राम, लक्ष्मण, सीता और राजा दशरथ का, उनकी रानियों और राष्ट्र-सहित, सारा जीवन हथेली पर रखे आँवले-सा प्रत्यक्ष देख लिया, वे कैसे हँसे, कैसे बोले, कैसे चले, क्या किया, सब। फिर उन्होंने इस मनोहर चरित को छन्दों में बाँधना आरम्भ किया, और स्वयं अपने काव्य की रूपरेखा कह सुनाई।

राम का जन्म और महान वीर्य; विश्वामित्र के साथ यात्रा में सुनी गंगावतरण आदि अनेक अद्भुत कथाएँ; जानकी का विवाह और धनुष-भंग; राम-परशुराम का विवाद; अभिषेक की तैयारी और कैकेयी की कुटिलता; अभिषेक का विघात और राम का वनवास; राजा का शोक, विलाप और परलोक-गमन; प्रजा का विषाद; निषादराज से संवाद; गंगा-तरण; भरद्वाज-दर्शन; चित्रकूट में वास्तु-कर्म; भरत का आगमन; पादुका-अभिषेक; नन्दिग्राम-निवास; दण्डक-गमन; विराध-वध; शरभंग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्य के दर्शन; अनसूया का स्नेह; धनुष-ग्रहण; शूर्पणखा-संवाद और विरूपण; खर-त्रिशिरा-दूषण-वध; मारीच-वध; सीता-हरण; जटायु-वध; कबन्ध और पम्पा के दर्शन; शबरी-दर्शन; हनुमान से भेंट; सुग्रीव-मैत्री; बाली-वध; तारा-विलाप; समुद्र-लंघन; मैनाक और सुरसा; सिंहिका-वध; लंका-दर्शन; सीता को मणि और अभिज्ञान; अशोकवाटिका; लंका-दाह; सेतु-बन्ध; विभीषण-संग; कुम्भकर्ण-वध; मेघनाद-वध; रावण-वध; सीता-प्राप्ति; विभीषण-अभिषेक; अयोध्या-गमन; राम-अभिषेक का उत्सव; और सेना का विसर्जन। नारद से जो सुना था, उसके आगे जो कुछ राम को इस पृथ्वी पर करना था, वह सब भी वाल्मीकि ने उत्तरकाण्ड में रच दिया।

सार: कवि स्वयं अपनी कथा की अनुक्रमणिका सुनाते हैं, ताकि श्रोता जान ले कि किस-किस मोड़ से यह कथा गुज़रेगी।

कुश और लव का गायन

वाल्मीकि ने राम के पूरे जीवन का काव्य रचा, 24000 श्लोक, पाँच सौ से अधिक सर्ग, छह काण्ड और उत्तरकाण्ड। पर अब प्रश्न था, इसे जनसभाओं में कौन गाएगा। तभी मुनि-वेश में दो भाई, कुश और लव, उनके चरणों में आ गिरे। ये राम के ही पुत्र थे, सीता ने वनवास के समय वाल्मीकि के आश्रम में इन्हें जन्म दिया था, और मुनि इनके पालक-गुरु थे। दोनों वेदों में निष्णात, मधुर स्वर के धनी और संगीत में दक्ष थे। मुनि ने उन्हें वेदों के अर्थ को उद्भासित करने के हेतु सम्पूर्ण रामायण, जो “पौलस्त्य-वध” अर्थात पुलस्ति के पौत्र रावण के वध की कथा भी कहलाती है, सिखा दी।

एक उप-कथा: रावण के पितामह पुलस्त्य ब्रह्मा के मानस-पुत्र थे, इसी से रावण “पौलस्त्य” कहलाता है, और रावण-वध की प्रधानता के कारण काव्य का एक नाम “पौलस्त्य-वध” पड़ा। मार्ग और देशी, दो गायन-शैलियाँ बताई गई हैं, संस्कृत के गीत मार्ग-शैली में, प्राकृत के देशी-शैली में गाए जाते हैं।

दोनों बालक यह काव्य तीन कालों (विलम्बित, मध्य, द्रुत) और सात स्वरों में, तन्त्री-लय के साथ गाते थे, और इसमें शृंगार, करुण, हास्य, रौद्र, भय, वीर आदि नौ रस भरे थे। एक दिन ऋषियों की सभा में उन्होंने गाया, तो सब आँसुओं से भीगकर “साधु, साधु” कह उठे। किसी मुनि ने कलश, किसी ने वल्कल, किसी ने कृष्णमृगचर्म, यज्ञोपवीत, कमण्डलु, मुंजमेखला, कुश-आसन, कुठार, चीर दिए, और सबने आयु और पुष्टि का आशीर्वाद दिया।

घूमते-गाते इन्हें राम ने अयोध्या की गलियों में देखा, अपने महल में लाए, सिंहासन पर बैठे, मन्त्रियों और भाइयों के बीच, और लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न से कहा, इन देव-तेज बालकों से यह अद्भुत आख्यान सुनिए, यह मेरे ही हित का है। दोनों ने मार्ग-शैली में गाना आरम्भ किया, और राम भी सभा में बैठकर धीरे-धीरे उस आनन्द में लीन हो गए।

सार: राम के अपने ही पुत्र राम-कथा गाते हैं, और राजा राम अपनी ही कथा सुनकर मुग्ध हो जाते हैं, काव्य अपने नायक तक स्वयं लौट आता है।

कोसल और अयोध्या नगरी

अब कुश और लव आदि से कथा सुनाते हैं। यह सम्पूर्ण पृथ्वी प्रजापति वैवस्वत मनु से लेकर विजयी राजाओं की रही है। उन्हीं के वंश में सगर नामक राजा हुए, जिन्होंने समुद्र को खुदवाया, और जिनके 60000 पुत्र थे। इसी इक्ष्वाकु-वंश में “रामायण” नामक यह महान आख्यान उपजा।

सरयू के तट पर कोसल नामक एक विशाल, सम्पन्न जनपद है, धन-धान्य से भरा। उसी में लोक-विख्यात अयोध्या नगरी है, जिसे स्वयं वैवस्वत मनु ने अपनी इच्छा से बसाया था।

एक उप-कथा: “अयोध्या” का अर्थ है जिससे युद्ध न किया जा सके, अजेय। पाठ में नगरी की लम्बाई 12 योजन और चौड़ाई 3 योजन बताई गई है। एक योजन को लगभग 8 मील (13 किमी) माना जाए तो नगरी लगभग 96 मील (155 किमी) लम्बी और 24 मील (39 किमी) चौड़ी थी, यह संख्या नगर की महिमा को बढ़ाने के लिए है, आधुनिक नापजोख नहीं।

नगरी के सुविभक्त राजमार्ग प्रतिदिन जल से सींचे जाते और देव-कन्याओं द्वारा बरसाए फूलों से बिखरे रहते। तोरण-द्वार और सुन्दर कपाट थे, बाज़ार सुव्यवस्थित, सब प्रकार के यन्त्र-आयुध और शतघ्नियाँ (एक प्रकार के अस्त्र), सब शिल्पियों का वास। सूत और मागध (स्तुति-गायक) घूमते, ऊँचे अट्टालिकाएँ और ध्वजाएँ शोभा देतीं। गहरी, दुर्लंघ्य खाई से घिरी, घोड़ों, हाथियों, गौओं, ऊँटों से भरी। रत्नजड़ित प्रासाद पर्वतों-से दिखते, और नगरी इन्द्र की अमरावती-सी लगती। यह अष्टापद (पासे के पट) की भाँति रचित, सात मंज़िल के भवनों से सुसज्जित थी, जिनमें शालि-चावल और ईख-रस-सा मीठा जल भरा था।

इस नगरी में सहस्रों महारथी रहते थे, जो कभी अकेले पड़े, असहाय, या युद्ध से भागते योद्धा पर बाण न चलाते, पर तीक्ष्ण शस्त्रों और बाहुबल से सिंह, व्याघ्र और वराह को मार डालते। दुन्दुभि, मृदंग, वीणा और पणव के घोष से गूँजती अयोध्या पृथ्वी पर अनुपम थी। राजा दशरथ ने इस नगरी को वैसे ही बसाया जैसे इन्द्र अमरावती को, और इसे वेदपारंगत, सत्यनिष्ठ, दानशील ब्राह्मणों तथा महर्षि-तुल्य ऋषियों से भर दिया।

सार: कथा अपने भूगोल में बसती है, इक्ष्वाकु-वंश की राजधानी अयोध्या स्वयं एक देव-नगरी-सी खड़ी होती है।

दशरथ का राज्य और सुखी प्रजा

अयोध्या में रहते हुए राजा दशरथ प्रजा की रक्षा करते थे, वे वेदज्ञ, दीर्घदर्शी, महातेजस्वी, और नगर-ग्रामवासियों के प्रिय थे। इक्ष्वाकुओं में अतिरथ (जो अनेक महारथियों से अकेले लड़े), यज्ञशील, धर्मपरायण, जितेन्द्रिय, महर्षि-तुल्य राजर्षि, तीनों लोकों में विख्यात। बलवान, निःशत्रु, मित्रवान, धन-संचय में इन्द्र और कुबेर के समान। जैसे मनु ने लोक की रक्षा की, वैसे ही दशरथ ने।

उस नगरी में लोग सुखी, धर्मात्मा, बहुश्रुत, अलोभी, सत्यवादी और अपने धन से सन्तुष्ट थे। कोई ऐसा गृहस्थ न था जिसके पास गौ, अश्व, धन-धान्य न हो। कोई कामी, कृपण, क्रूर, अविद्वान या नास्तिक न दीखता। सब स्त्री-पुरुष धर्मशील, सुसंयत, और महर्षियों-से निर्मल थे। कोई कुण्डल, मुकुट, माला से रहित न था, कोई स्नान कर सुगन्ध न लगाता हो ऐसा न था। चारों वर्ण के लोग देवता और अतिथि का पूजन करते, कृतज्ञ, उदार, शूर थे। सब दीर्घायु, धर्म और सत्य में रत। ब्राह्मण इन्द्रियों को जीते, दान और स्वाध्याय में रत; क्षत्रिय ब्राह्मणों के पीछे चलते, वैश्य क्षत्रियों के, और शूद्र अपने कर्म में रत होकर तीनों वर्णों की सेवा करते।

नगरी कम्बोज, बाह्लीक (बल्ख), वनायु और सिन्धु-घाटी के उत्तम घोड़ों से, और विन्ध्य व हिमालय के मदमत्त, पर्वत-से विशाल हाथियों से भरी थी, ऐरावत, महापद्म, अंजन और वामन कुल के, तथा भद्र, मन्द्र, मृग जाति के और इनके संकर। दशरथ इस नगरी पर वैसे ही शासन करते थे जैसे चन्द्रमा नक्षत्रों पर। दृढ़ तोरण और अर्गलोंवाली, सहस्रों मनुष्यों से भरी इस सार्थक नामवाली अयोध्या पर इन्द्र-तुल्य राजा राज्य करते थे।

सार: दशरथ के धर्म-शासन में प्रजा का जीवन ही उनकी परम कीर्ति है, राजा की महिमा उसके लोगों के सुख से नापी जाती है।

आठ मन्त्री और उनका चरित्र

दशरथ के मन्त्री गुणों में सम्पन्न, मन्त्र (परामर्श) के ज्ञाता, दूसरों के मन को पढ़नेवाले, और स्वामी के हित में रत थे। इस वीर राजा के आठ यशस्वी, शुचि और राजकार्य में अनुरक्त मन्त्री थे, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल, और आठवें अर्थवित सुमन्त्र। उनके दो प्रिय ऋत्विज (पुरोहित-परामर्शदाता) थे, वसिष्ठ और वामदेव। अन्य परामर्शदाताओं में सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, दीर्घायु मार्कण्डेय, और ब्राह्मण कात्यायन थे।

एक उप-कथा: बाद की परम्परा में अमात्य और मन्त्री में भेद किया गया है, अमात्य कार्यों का निर्वाह करते थे, जबकि मन्त्री व्यवहार (न्याय) देखते थे। मनु ने राजा को सात या आठ परीक्षित मन्त्री रखने का विधान दिया है, इसी से दशरथ के आठ मन्त्री हैं।

ये मन्त्री विद्या से विनम्र, लज्जाशील, कुशल, जितेन्द्रिय, श्रीमान, शस्त्रज्ञ, दृढ़पराक्रमी, कीर्तिमान, और वचन के अनुसार कार्य करनेवाले थे। तेज, क्षमा और यश से युक्त, मुस्कुराकर बोलनेवाले, जो क्रोध या काम-अर्थ के लोभ में भी असत्य न कहते। राजकार्य में सदा जागरूक, नीति की आँखों से सब देखते। अपने या पराए राज्य की कोई बात उनसे अनजानी न रहती, गुप्तचरों से सब ज्ञात हो जाता। अपने पुत्रों को भी समय पर यथोचित दण्ड देते, पर निर्दोष शत्रु को भी न सताते। ब्राह्मण और क्षत्रिय को बिना सताए कोष भरते, और अपराधी की शक्ति-अशक्ति देखकर दण्ड देते। ऐसे शुचि, एकमत मन्त्रियों के कारण नगर या राष्ट्र में कोई मिथ्यावादी न था, कोई परस्त्री-रत दुष्ट न था, सम्पूर्ण राष्ट्र शान्त था। ऐसे मन्त्रियों से युक्त, दस काम-जनित और आठ क्रोध-जनित दोषों से रहित, दशरथ उदित सूर्य की भाँति तेजोमय रश्मियों से शोभायमान होकर वसुधा पर शासन करते थे।

सार: सुयोग्य, सत्यनिष्ठ मन्त्री-मण्डल ही दशरथ के तेज की वे किरणें हैं जिनसे उनका शासन-सूर्य दीप्त होता है।

पुत्र की चाह और अश्वमेध का संकल्प

पुत्रहीन राजा दशरथ स्वर्ण सिंहासन पर उदास बैठे हैं, झरोखे से सरयू और अयोध्या नगरी दिखती है।

इतने ऐश्वर्य और धर्म के बीच भी एक रिक्तता थी, धर्मज्ञ महात्मा दशरथ का वंश चलानेवाला कोई पुत्र न था, और इसी चिन्ता में वे दुखी रहते। एक दिन विचार करते हुए उनके मन में आया, क्यों न पुत्र के लिए अश्वमेध-यज्ञ से देव को प्रसन्न करूँ। पवित्र-मना मन्त्रियों से परामर्श कर, दृढ़ निश्चय कर, उन्होंने सुमन्त्र से कहा, हे मन्त्रिश्रेष्ठ, मेरे पुरोहितों समेत सब गुरुओं को शीघ्र बुला लाएँ।

सुमन्त्र वेदपारंगत सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, पुरोहित वसिष्ठ और अन्य ब्राह्मणश्रेष्ठों को ले आए। राजा ने उनका पूजन कर मधुर, धर्म-अर्थयुक्त वचन कहे, पुत्र के अभाव में मुझे सुख नहीं, अतः अश्वमेध से देव को प्रसन्न करना चाहता हूँ। मैं इसे शास्त्रोक्त विधि से करना चाहता हूँ, आप इस विषय में युक्ति सोचें। वसिष्ठ-प्रमुख सब ब्राह्मणों ने “साधु, साधु” कहकर प्रस्ताव की प्रशंसा की और कहा, इस यज्ञ से आप अवश्य अभीष्ट पुत्र पाएँगे, सरयू के उत्तर तट पर यज्ञभूमि तैयार हो।

एक उप-कथा: अश्वमेध में यज्ञ का घोड़ा छोड़ा जाता है, और वह जहाँ-जहाँ विचरता है, उसके हर पग पर ब्राह्मण आहुति देते हैं। ब्राह्मण-ग्रन्थों के अनुसार 400 क्षत्रिय राजकुमार उस घोड़े की रक्षा करते हैं, ताकि यज्ञ में विघ्न न पड़े।

राजा दशरथ हाथ जोड़कर सभा में बैठे ऋषियों से प्रार्थना करते हैं, पीछे रानियाँ बैठी हैं।

राजा प्रसन्न हुए और मन्त्रियों से कहा, गुरुओं के वचन से यज्ञ-सामग्री जुटाई जाए। समर्थ राजकुमारों की देखरेख में, उपाध्याय-सहित घोड़ा छोड़ा जाए, और सरयू के उत्तर तट पर यज्ञभूमि बने। शान्ति-कर्म विधिपूर्वक हों। ब्राह्मणों ने सावधान किया, यह यज्ञ हर राजा कर सकता है, पर यदि इसमें कोई कष्ट देनेवाला अपराध (आवश्यक कर्म का लोप) हो जाए तो विद्वान ब्रह्मराक्षस भी छिद्र ढूँढ़ते हैं; विधिहीन यज्ञ का कर्ता तत्काल नष्ट हो जाता है। अतः सब विधिपूर्वक हो। राजा ने मन्त्रियों को विदा कर, अन्तःपुर में जाकर अपनी प्रिय रानियों से कहा, मैं पुत्र के लिए यज्ञ करूँगा, मेरे साथ दीक्षा लो; और इस सुखद वचन से रानियों के मुख शिशिर-अन्त के कमलों-से खिल उठे।

सार: पुत्रहीनता की पीड़ा से अश्वमेध का संकल्प जन्म लेता है, और सारी अयोध्या इस आशा से दीप्त हो उठती है।

सनत्कुमार की भविष्यवाणी और ऋष्यशृंग की कथा

चिंतित राजा दशरथ सिंहासन पर बैठे हैं और मंत्री सुमंत्र घुटनों के बल बैठकर परामर्श दे रहे हैं।

दशरथ का यह संकल्प सुनकर सुमन्त्र ने एकान्त में राजा से कहा, एक पुरानी कथा सुनिए, जो मैंने पुराण में सुनी थी। भगवान सनत्कुमार ने पूर्वकाल में ऋषियों के बीच आपके पुत्र-प्राप्ति के विषय में यह कथा कही थी। काश्यप के पुत्र विभाण्डक हैं, और उनका पुत्र ऋष्यशृंग नाम से विख्यात होगा। वन में ही पला, सदा वन में विचरता, पिता की सेवा में रत यह विप्रेन्द्र संसार को नहीं जानता।

एक उप-कथा: बाद की परम्परा में नाम “ऋष्यशृंग” का अर्थ “मृग-सींगवाला” जोड़ा जाता है। पाठ में दो प्रकार के ब्रह्मचर्य बताए गए हैं, एक मुंजमेखला और मृगचर्म धारण कर गुरु-गृह में अकेले रहना, दूसरा गुरु-गृह में शिक्षा पाकर अपने वर्ण की कन्या से विवाह कर नियत रात्रियों में ही समागम करना।

उन्हीं दिनों अंग देश में महाबली रोमपाद राजा होंगे। किसी अपराध के कारण वहाँ घोर अनावृष्टि (सूखा) पड़ेगी, जो सब लोगों को भयभीत करेगी। दुखी राजा विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर प्रायश्चित्त पूछेंगे, और वे कहेंगे, विभाण्डक-पुत्र ऋष्यशृंग को सब उपायों से यहाँ ले आएँ, और अपनी पुत्री शान्ता उन्हें विधिपूर्वक दें। पर ब्राह्मण विभाण्डक के शाप से डरकर स्वयं न जाएँगे, और कहेंगे, हम उपाय सोचकर बिना दोष के विप्र को ले आएँगे। फिर रोमपाद गणिकाओं (वारांगनाओं) के द्वारा ऋष्यशृंग को बुलवाएँगे, वर्षा होगी, और शान्ता उन्हें ब्याह दी जाएगी। फिर जामाता ऋष्यशृंग आपके लिए पुत्र-कामना का यज्ञ करवाएँगे, यही सनत्कुमार का कथन है। यह सुनकर हर्षित दशरथ ने पूछा, ऋष्यशृंग किस उपाय से रोमपाद की राजधानी लाए गए, वह सुनाएँ।

सार: सुमन्त्र की पुरानी कथा भविष्य का द्वार खोलती है, ऋष्यशृंग का यज्ञ ही दशरथ की सन्तान का मार्ग बनेगा।

ऋष्यशृंग का प्रलोभन और शान्ता से विवाह

कुटिया के द्वार पर खड़े युवा तपस्वी ऋष्यशृंग को सुंदर गायिकाएँ फूल और संगीत से रिझा रही हैं।

सुमन्त्र ने आगे कहा, सुनिए कि किस उपाय से ऋष्यशृंग लाए गए। मन्त्रियों-सहित पुरोहित ने रोमपाद से कहा, हमने एक निर्दोष उपाय सोचा है। ऋष्यशृंग वन में रहते, तप और स्वाध्याय में रत, स्त्रियों और इन्द्रिय-सुखों से अनजान हैं। मन को लुभानेवाले इन्द्रिय-विषयों से हम उन्हें शीघ्र ले आएँगे, सुन्दर, सुसज्जित गणिकाएँ वहाँ जाएँ और विविध उपायों से उन्हें ले आएँ। राजा ने स्वीकृति दी, और गणिकाएँ विभाण्डक के आश्रम के समीप वन में जा बसीं।

ऋष्यशृंग पिता के स्नेह में सन्तुष्ट, आश्रम से बाहर कभी न जाते, उन्होंने जन्म से किसी स्त्री-पुरुष या नगर-राष्ट्र के प्राणी को न देखा था। एक दिन दैववश वे उस स्थान पर आ निकले जहाँ गणिकाएँ थीं। चित्र-विचित्र वेश में मधुर स्वर में गातीं वे प्रमदाएँ उनके पास आकर बोलीं, आप कौन हैं, यहाँ अकेले क्या करते हैं, बताइए। उनका अनदेखा, कमनीय रूप देखकर ऋष्यशृंग ने स्नेह से अपना और पिता का परिचय दिया, और कहा, समीप ही हमारा आश्रम है, वहाँ मैं आप सबका विधिपूर्वक पूजन (आतिथ्य) करूँगा। वे आश्रम गईं, ऋष्यशृंग ने अर्घ्य, पाद्य, मूल-फल अर्पित किए, पर वे विभाण्डक के लौटने के भय से, अपने उत्तम फल (मोदक और मिष्ठान्न) देकर, उन्हें आलिंगन कर, व्रत का बहाना बनाकर चली गईं।

वन में ऋष्यशृंग मिठाई चख रहे हैं, नगर की सुंदरियाँ पकवान परोसकर उन्हें कौतूहल से देख रही हैं।

उन फलों को (वस्तुतः मिष्ठान्न को) ऋष्यशृंग ने फल ही समझा, क्योंकि वन में रहनेवालों ने ऐसा स्वाद कभी न चखा था। गणिकाओं के जाने पर उनका हृदय अस्वस्थ-सा हो उठा। अगले दिन वे फिर उसी स्थान गए, गणिकाएँ हर्षित होकर बोलीं, हमारे आश्रम चलिए, वहाँ विशेष रूप से आतिथ्य होगा। मन को भानेवाले इस वचन से वे चल पड़े, और स्त्रियाँ उन्हें गंगा की नौका से रोमपाद की राजधानी ले गईं। उनके आते ही देव ने अकस्मात वर्षा कर दी, और जगत आनन्दित हो उठा। वर्षा के साथ आए तपस्वी विप्र को राजा रोमपाद ने सिर झुकाकर अर्घ्य दिया, और विप्रेन्द्र से वर माँगा कि उन्हें या उनके पिता को मेरे प्रति क्रोध न आए। फिर अन्तःपुर में ले जाकर शान्त मन से अपनी पुत्री शान्ता उन्हें विधिपूर्वक दे दी, और महातेजस्वी ऋष्यशृंग सब इच्छित सुखों में पूजित होकर, पत्नी शान्ता के साथ वहाँ रहने लगे।

सार: संसार से अछूते तपस्वी ऋष्यशृंग कोमल उपायों से अंग देश आते हैं, और शान्ता से विवाह कर वर्षा और सौभाग्य लाते हैं।

दशरथ ऋष्यशृंग और शान्ता को अयोध्या लाते हैं

वर्षा के बीच नाव से उतरते ऋष्यशृंग का राजा रोमपाद स्वागत करते हैं, नगरवासी देखते खड़े हैं।

सुमन्त्र ने और कहा, हे राजेन्द्र, सुनिए कि बुद्धिमान सनत्कुमार ने आगे क्या कहा। अंग-राजा का पुत्र रोमपाद नाम से विख्यात होगा, और महायशस्वी दशरथ उनके पास जाकर कहेंगे, हे धर्मात्मन, मैं निःसन्तान हूँ, शान्ता के पति ऋष्यशृंग आपकी अनुमति से मेरे वंश की वृद्धि के लिए यज्ञ करें। रोमपाद विचार कर पुत्रवान ऋष्यशृंग को सौंप देंगे, और यश के अभिलाषी दशरथ हाथ जोड़कर ऋष्यशृंग से प्रार्थना करेंगे कि वे पुत्र-प्राप्ति, प्रजा और स्वर्ग के लिए यज्ञ करवाएँ, और उन्हें चार अमित-पराक्रमी, वंश की प्रतिष्ठा बढ़ानेवाले पुत्र प्राप्त होंगे। यही सनत्कुमार ने देवयुग में कहा था।

अतः, हे पुरुषश्रेष्ठ, आप स्वयं सेना और वाहन-सहित जाकर ऋष्यशृंग को आदर से ले आइए। सुमन्त्र के इस वचन से दशरथ हर्षित हुए, वसिष्ठ की अनुमति लेकर, अन्तःपुर और मन्त्रियों-सहित, वन-नदियाँ पार करते उस स्थान पहुँचे जहाँ ऋष्यशृंग रोमपाद के पास थे। राजा ने अग्नि-से दीप्त ऋषिपुत्र को देखा, और मित्र-भाव से रोमपाद ने दशरथ का विशेष पूजन किया, ऋष्यशृंग को अपनी मैत्री और सम्बन्ध (कि शान्ता वस्तुतः दशरथ की पुत्री थीं) का परिचय कराया। सात-आठ दिन रहकर दशरथ ने रोमपाद से कहा, आपकी पुत्री शान्ता अपने पति के साथ मेरी राजधानी चलें, वहाँ एक बड़ा कार्य प्रारम्भ है। रोमपाद ने “तथास्तु” कहा, और ऋष्यशृंग ने भी सहमति दी।

दशरथ ने आगे शीघ्रगामी दूत भेजकर अयोध्या को सजाने, सींचने, धूप देने और ध्वजाओं से अलंकृत करने का आदेश दिया। हर्षित नागरिकों ने वैसा ही किया, और राजा ने ऋष्यशृंग को आगे कर शंख-दुन्दुभि के घोष में सुसज्जित नगरी में प्रवेश किया, मानो सहस्राक्ष इन्द्र ने वामन (काश्यप-पुत्र) को स्वर्ग में प्रवेश कराया हो। शान्ता को पति-सहित आते देख सब रानियाँ प्रेम से आनन्दित हुईं, और शान्ता राजा व रानियों से पूजित होकर पति-सहित कुछ काल वहाँ सुख से रहीं।

सार: मित्रता और सम्बन्ध के बल पर दशरथ ऋष्यशृंग को अयोध्या ले आते हैं, अब यज्ञ का याजक मिल गया है।

यज्ञ की स्वीकृति और अनुमोदन

राजा दशरथ मृगचर्मधारी ऋष्यशृंग के चरणों में प्रणाम करते हैं, रानियाँ और ऋषि यज्ञ-वेदी के पास खड़े हैं।

कुछ काल बीता, और एक अति मनोहर वसन्त आने पर दशरथ के मन में फिर यज्ञ की इच्छा जागी। उन्होंने देव-तुल्य कान्तिवाले ऋष्यशृंग के चरणों में सिर झुकाकर, वंश की वृद्धि और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए यज्ञ की प्रार्थना की। ऋष्यशृंग ने कहा, यज्ञ-सामग्री तैयार हो, घोड़ा छोड़ा जाए, और सरयू के उत्तर तट पर यज्ञभूमि बने। राजा ने सुमन्त्र से कहा, वेदपारंगत ब्राह्मणों, सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, पुरोहित वसिष्ठ और अन्य ब्राह्मणश्रेष्ठों को शीघ्र बुला लाएँ।

सुमन्त्र सबको ले आए, और राजा ने आदरपूर्वक वही धर्म-अर्थयुक्त, मधुर वचन कहे जो पहले कहे थे, कि पुत्र के अभाव में सुख नहीं, अतः मैं अश्वमेध से देव को प्रसन्न करूँगा, और ऋष्यशृंग के प्रभाव से सब कामनाएँ पाऊँगा। वसिष्ठ-प्रमुख सब ब्राह्मणों ने “साधु” कहकर अनुमोदन किया, और ऋष्यशृंग-प्रमुख ने कहा, सामग्री जुटे, घोड़ा छूटे, यज्ञभूमि बने, शान्ति-कर्म विधिपूर्वक हों, यह यज्ञ हर राजा कर सकता है, पर कोई कष्टकर अपराध न हो, क्योंकि विद्वान ब्रह्मराक्षस छिद्र ढूँढ़ते हैं और विधिहीन यज्ञ का कर्ता नष्ट हो जाता है। अतः सब विधिपूर्वक हो। राजा प्रसन्न हुए, मन्त्रियों से सब विधान की व्यवस्था कराने को कहा, और ब्राह्मणों को विदा कर अन्तःपुर में गए।

सार: याजक और ब्राह्मणों का अनुमोदन पाकर यज्ञ का संकल्प पक्का होता है, और सावधानी का स्वर बार-बार दोहराया जाता है।

यज्ञ की तैयारी और राजाओं का निमन्त्रण

सरयू तट पर ऋषियों के बीच राजा दशरथ हाथ जोड़े बैठे हैं, सामने यज्ञ-वेदी तैयार हो रही है।

फिर वसन्त के आने पर एक पूरा वर्ष बीता, और घोड़ा लौट आया। दशरथ ने वसिष्ठ और उनकी पत्नी अरुन्धती को प्रणाम कर, विनम्र प्रार्थना की, आप मेरे निःस्वार्थ हितैषी और परम गुरु हैं, इस यज्ञ का सारा भार आप ही वहन करें। वसिष्ठ ने “तथास्तु” कहकर सब करने का वचन दिया, और यज्ञकर्म में निपुण वृद्ध ब्राह्मणों, स्थपतियों (शिल्प-वास्तुज्ञों), कर्मचारियों, शिल्पकारों, बढ़इयों, खुदाई करनेवालों, गणकों (ज्योतिषियों), तथा नट-नर्तकों को राजा के आदेश से अपने-अपने कार्य करने को कहा।

वसिष्ठ ने निर्देश दिए, सहस्रों ईंटें लाई जाएँ, राजा-योग्य प्रासाद और ब्राह्मणों के लिए सैकड़ों सुदृढ़, भक्ष्य-अन्न-पान से युक्त भवन बनें; नगरवासियों और दूर से आनेवाले राजाओं के लिए पृथक-पृथक आवास, अश्वशाला, गजशाला, शय्यागृह और योद्धाओं के बड़े आवास बनें। सबको विधिपूर्वक, आदर से, उत्तम अन्न दिया जाए, अवज्ञा से नहीं, ताकि सब वर्ण सम्मानित हों। काम-क्रोध के वश में भी किसी का अनादर न हो; यज्ञकर्म में लगे शिल्पियों का विशेष आदर हो।

राजा दशरथ राजा रोमपाद का हाथ थामे मिलते हैं, दरबार में सैनिक और रानियाँ उपस्थित हैं, पीछे नगर दिखता है।

फिर वसिष्ठ ने सुमन्त्र को बुलाकर कहा, पृथ्वी के धार्मिक राजाओं, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रों को सहस्रों की संख्या में सादर निमन्त्रित करें। सबके पहले स्वयं जाकर मिथिला के शूर, सत्यवादी जनक को ले आएँ, जिन्हें मैं राजा का पूर्व-निर्धारित सम्बन्धी (भावी समधी) जानकर पहले कह रहा हूँ। काशी-नरेश, वृद्ध परम-धार्मिक केकय-राजा (दशरथ के श्वसुर) और उनके पुत्र, अंगेश्वर रोमपाद और उनके पुत्र, कोसल-राजा भानुमान, मगधाधिपति शूर प्राप्तिज्ञ, तथा पूर्व, सिन्धु-सौवीर और सौराष्ट्र के राजाओं को आदर से ले आएँ; दक्षिण के और अन्य मित्र राजाओं को भी अनुचर-बान्धवों समेत शीघ्र बुलाएँ।

सुमन्त्र ने तुरन्त योग्य पुरुषों को राजाओं को लाने भेजा, और स्वयं भी मुनि के आदेश से उन विशिष्ट राजाओं को लाने चल पड़े जिन्हें स्वयं लाना था। कर्मचारियों ने यज्ञ की सब तैयारी की सूचना वसिष्ठ को दी, और प्रसन्न मुनि ने कहा, किसी को अवज्ञा या उपहास से कुछ न दिया जाए, अवज्ञा से किया दान दाता को नष्ट कर देता है। कुछ दिनों में अनेक राजा रत्न आदि बहुमूल्य भेंट लेकर आए। वसिष्ठ ने राजा से कहा, राजागण आ गए, मैंने सबका यथायोग्य सत्कार किया, सब यज्ञ-सामग्री तैयार है, अब आप यज्ञ के लिए समीप के यज्ञायतन में पधारें। शुभ नक्षत्रवाले दिन, वसिष्ठ और ऋष्यशृंग दोनों के परामर्श से, राजा यज्ञभूमि गए, और वसिष्ठ-प्रमुख ब्राह्मणों ने ऋष्यशृंग को आगे कर शास्त्रोक्त विधि से यज्ञकर्म आरम्भ किया; श्रीमान राजा अपनी पत्नियों-सहित दीक्षा में प्रविष्ट हुए।

सार: सरयू-तट पर एक विराट आयोजन खड़ा होता है, दूर-दूर के राजा और सहस्रों ब्राह्मण आते हैं, और शुभ दिन यज्ञ-दीक्षा आरम्भ होती है।

अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान

वर्ष पूरा होने और घोड़े के लौटने पर सरयू के उत्तर तट पर अश्वमेध यज्ञ आरम्भ हुआ। ब्राह्मणश्रेष्ठों ने ऋष्यशृंग को ब्रह्मा-पद (यज्ञ की देखरेख करनेवाले अध्यक्ष) पर रखकर अपने-अपने कार्य किए, अन्य तीन याजक होता, अध्वर्यु और उद्गाता कहलाते हैं।

एक उप-कथा: चार प्रमुख याजकों के कार्य भिन्न हैं, होता ऋग्वेद से देवों का आह्वान करते हैं; अध्वर्यु यजुर्वेद के मन्त्रों से भूमि नापना, वेदी बनाना, पात्र जुटाना, अग्नि जलाना करते हैं; उद्गाता सामवेद के स्तोत्र गाते हैं; और ब्रह्मा, जो सब में अधिक विद्वान और सर्ववेदज्ञ हों, यज्ञ की निगरानी करते हैं।

याजकों ने कल्पसूत्रों की रीति और मीमांसा-शास्त्र के क्रम से सब कार्य किए। प्रातःसवन (सोमरस निकालने की क्रिया) से लेकर मध्याह्न और तृतीय सवन तक के कर्म हर्ष से सम्पन्न हुए। इन्द्र के लिए आहुति विधिपूर्वक दी गई, और सोम-लता को पत्थर पर कूटकर रस निकाला गया। प्रवर्ग्य और उपसद इष्टि शास्त्रोक्त विधि से की गई। यज्ञ में कोई आहुति गलत न दी गई, न कोई कर्म छूटा, हर कार्य मन्त्रोच्चार के साथ हुआ।

एक उप-कथा: पाठ में “ऋतु” शब्द छह ऋतुओं के लिए आया है, और कहा गया है कि यज्ञ-समाप्ति के बाद छह ऋतुएँ (प्रत्येक दो मास की, अर्थात लगभग एक पृथ्वी-वर्ष) बीतीं, फिर बारहवें मास में राम का जन्म हुआ।

गरुड़-आकार की स्वर्ण वेदी पर यज्ञाग्नि जल रही है, दशरथ रानियों सहित खड़े हैं, पास श्वेत अश्व सजा है।

ब्राह्मण, अन्य द्विज और शूद्र, तपस्वी, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी, वृद्ध, रोगी, स्त्री और बालक, सब प्रतिदिन यज्ञ के अन्न-पान से तृप्त हुए, और दिन-रात खाते रहने पर भी तृप्ति की सीमा न दीखती। “अन्न और वस्त्र बार-बार दिए जाएँ” इस आदेश से अनेक पुरुष मुक्त-हस्त दान करते। पर्वत-से अन्न-कूट दीखते। नाना देशों से आए स्त्री-पुरुष पूरी तरह तृप्त हुए। ब्राह्मणों को “हम तृप्त हुए, आपका कल्याण हो” कहते दशरथ ने सुना। सुसज्जित पुरुष ब्राह्मणों को परोसते, और रत्न-कुण्डलधारी अन्य उनकी सेवा करते। कर्म के अन्तराल में विद्वान ब्राह्मण परस्पर को जीतने को अनेक तर्क करते। कोई ब्राह्मण ऐसा न था जो षडंग-वेद का ज्ञाता, व्रती, बहुश्रुत और तर्क-कुशल न हो।

यूप (यज्ञ-स्तम्भ) खड़े करने का समय आने पर छह बिल्व, छह खदिर, छह पलाश के स्तम्भ बने; एक श्लेष्मातक और देवदार के दो स्तम्भ, जो छह अरत्नि (लगभग 9 फुट या 2.7 मीटर) की दूरी पर खड़े किए गए। कुल 21 यूप, प्रत्येक 21 अरत्नि (लगभग 32 फुट या 9.5 मीटर) ऊँचे, अष्टकोणीय, चिकने, स्वर्णजड़ित, और एक-एक वस्त्र से अलंकृत। ये सप्तर्षियों-से दीप्त थे। शास्त्रोक्त माप की ईंटों से कुशल शिल्पियों ने वेदी बनाई, जो गरुड़-आकार की, स्वर्ण-पंखोंवाली, साधारण से तिगुनी, और 18 कुण्डोंवाली थी (साधारण वेदी में छह ही होते हैं)। नियत देवताओं के लिए पशु, सर्प और पक्षी स्तम्भों से बाँधे गए, यज्ञ का घोड़ा और जलचर भी बाँधे गए, और 300 पशु यूपों से बाँधे गए, जिनमें दशरथ का उत्तम अश्वरत्न भी था।

रानी कौसल्या रात में फूल-मालाओं से सजे यज्ञ के श्वेत अश्व के पास तलवारें लिए खड़ी हैं।

कौसल्या ने उस घोड़े का परिक्रमा कर परम हर्ष से तीन तलवारों से उसका स्पर्श किया, और धर्म की कामना से उस गरुड़-सम घोड़े के साथ स्थिर मन से एक रात्रि बितायी। फिर रात्रि के अन्त में चारों याजकों ने राजा की प्रथम पत्नी (महिषी), दूसरी पत्नी (वावाता) और तीसरी पत्नी (परिवृत्ति) को घोड़े से सम्बन्धित किया।

एक उप-कथा: बाद की परम्परा में राजा की तीन पत्नियों के वर्ग-नाम बताए गए हैं, महिषी (क्षत्रिया, अभिषेक के समय साथ अभिषिक्त), वावाता और परिवृत्ति। पर दशरथ की तीनों रानियाँ, कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी, क्षत्रिय-राजकन्याएँ ही थीं।

यज्ञ के बाद राजा दशरथ ब्राह्मणों को स्वर्ण आभूषण और गौएँ दान कर रहे हैं, रानियाँ पीछे खड़ी हैं।

जितेन्द्रिय, परम-निपुण ऋत्विज ने शास्त्रोक्त विधि से अश्वकन्द (अश्वगन्धा) पकाया, और राजा ने उसके धूम की गन्ध सूँघकर अपना पाप दूर किया जो पुत्र-प्राप्ति में बाधक था। सोलहों ब्राह्मण ऋत्विजों ने घोड़े के सब अंगों को विधिपूर्वक अग्नि में अर्पित किया। अन्य यज्ञों में हवि प्लक्ष-वृक्ष की डाल पर रखी जाती है, पर अश्वमेध में बेंत की चटाई पर। कल्पसूत्र और ब्राह्मणों में अश्वमेध तीन दिन का बताया गया है, पहले दिन का सवन चतुष्टोम (ज्योतिष्टोम), दूसरे दिन उक्थ्य, तीसरे दिन अतिरात्र। राजा ने यज्ञ के अन्त में अनेक गौण यज्ञ भी किए, ज्योतिष्टोम, आयुष्टोम, दो अतिरात्र, अभिजित, विश्वजित और दो आप्तोर्याम, ये आठ महायज्ञ।

यज्ञ-समाप्ति पर कुलवर्धक राजा ने दक्षिणा में पूर्व दिशा होता को, पश्चिम अध्वर्यु को, दक्षिण ब्रह्मा को और उत्तर उद्गाता को दे दी, यही अश्वमेध की विहित दक्षिणा है, जिसे सर्वप्रथम स्वयम्भू ब्रह्मा ने किया था। ऋत्विजों ने पृथ्वी न लेकर कहा, इसकी रक्षा आप ही कर सकते हैं, हम स्वाध्याय में रत हैं, हमें कुछ निष्क्रय (बदले में मणि, स्वर्ण या गौ) दीजिए। तब वेदपारंगत ब्राह्मणों के कहने पर राजा ने उन्हें 10 लाख गौएँ, 10 करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ और उसकी चौगुनी रजत-मुद्राएँ दीं।

एक उप-कथा (संख्याओं का पैमाना): 10 लाख गौएँ अर्थात दस लाख की दान-राशि; 10 करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ और उसकी चौगुनी (40 करोड़) रजत-मुद्राएँ, ये अंक यज्ञ की अपार उदारता को दर्शाते हैं। बाहर से आए ब्राह्मणों को अतिरिक्त 1 करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ दी गईं, यह सब महाकाव्यीय वैभव का सूचक है, ऐतिहासिक लेखा नहीं।

ऋत्विजों ने सारा धन ऋष्यशृंग और बुद्धिमान वसिष्ठ को न्यायपूर्वक बाँटने को सौंपा, और समान विभाजन से सब प्रसन्न हुए। राजा ने बाहर से आए ब्राह्मणों को 1 करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ दीं, और जब बाँटने को कुछ न बचा, तो एक दरिद्र ब्राह्मण को अपना उत्तम हस्ताभूषण दे दिया। ब्राह्मणों को प्रसन्न कर, हर्ष से व्याकुल राजा ने उन्हें प्रणाम किया, और भूमि पर लेटे उदार राजा को ब्राह्मणों ने अनेक आशीर्वाद दिए। पापनाशक, स्वर्ग ले जानेवाले, श्रेष्ठ राजाओं के लिए भी दुस्तर इस यज्ञ को पूरा कर राजा हर्षित हुए, और ऋष्यशृंग से कहा, हे सुव्रत, अब मेरे वंश की वृद्धि करनेवाला कार्य कीजिए। ऋष्यशृंग ने “तथास्तु” कहकर वचन दिया कि आपको चार वंश-वर्धक पुत्र होंगे। यह मधुर वचन सुनकर महात्मा राजा ने प्रणाम कर ऋष्यशृंग से फिर वही प्रार्थना दुहराई।

सार: अश्वमेध का विराट अनुष्ठान, अपार दान-दक्षिणा के साथ, निर्दोष सम्पन्न होता है, और ऋष्यशृंग चार पुत्रों का वचन देते हैं।

पुत्रेष्टि-यज्ञ और देवों की रावण-विषयक प्रार्थना

कुछ क्षण विचार कर, सचेत होकर, वेदज्ञ ऋष्यशृंग ने राजा से कहा, मैं आपके पुत्रों के लिए अथर्ववेद में बताए मन्त्रों से सिद्ध पुत्रेष्टि-यज्ञ विधिपूर्वक करूँगा। फिर तेजस्वी ऋष्यशृंग ने वह पुत्रकाम यज्ञ आरम्भ कर, मन्त्र-दृष्ट विधि से अग्नि में आहुतियाँ दीं। तब ब्रह्मा-सहित देवता, गन्धर्व, सिद्ध और परम ऋषि अपना भाग लेने वहाँ एकत्र हुए (मनुष्यों को अदृश्य)।

कमल पर विराजे चतुर्मुख ब्रह्मा के सामने देवता बादलों के बीच हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे हैं।

उस सभा में देवताओं ने लोकस्रष्टा ब्रह्मा से प्रार्थना की, हे भगवन, आपके वर से रावण नामक राक्षस अपने बल से हम सबको सता रहा है, हम उसे वश में नहीं कर सकते। आपने प्रसन्न होकर उसे वर दिया, और हम उस वर का सम्मान करते हुए उसके सब अपराध सहते रहे हैं। वह दुर्मति तीनों लोकों को व्याकुल करता, समृद्ध से द्वेष करता, और देवराज इन्द्र तक को पराजित करना चाहता है। वर से उन्मत्त, दुर्धर्ष वह ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों, ब्राह्मणों और असुरों का तिरस्कार करता है। सूर्य उसे तपाता नहीं, वायु उसके पास तेज़ नहीं बहती, उसे देखकर तरंगमय समुद्र भी काँप उठता है। हे भगवन, इस घोर राक्षस से हमें महान भय है, उसके वध का उपाय कीजिए।

ब्रह्मा ने विचार कर कहा, इस दुरात्मा के वध का उपाय मुझे ज्ञात हो गया। उसने गन्धर्वों, यक्षों, देवताओं और राक्षसों से अवध्य होने का वर माँगा था, और मैंने “तथास्तु” कहा था। पर उसने अवज्ञावश मनुष्यों का नाम न लिया, अतः वह मनुष्य के हाथों ही मारा जा सकता है, और उसकी कोई दूसरी मृत्यु नहीं। यह प्रिय वचन सुनकर सब देवता और महर्षि परम हर्षित हुए।

गरुड़ पर विराजे चतुर्भुज विष्णु शंख-चक्र-गदा लिए उतरते हैं, नीचे देवता और ऋषि हाथ जोड़े खड़े हैं।

इसी बीच महाद्युतिमान, शंख-चक्र-गदाधारी, पीताम्बरधारी, तप्त-स्वर्ण के केयूर पहने, देवों से वन्दित जगत्पति विष्णु, गरुड़ पर सवार, मेघ पर सूर्य-से, वहाँ पधारे। ब्रह्मा से मिलकर वे स्थिर बैठ गए, और सब देवों ने नतमस्तक होकर प्रार्थना की, हे विष्णो, लोकों के हित की कामना से हम आप पर भार रखते हैं, आप अपने को चार रूपों में विभाजित कर, ह्री, श्री और कीर्ति-सी अयोध्या-नरेश दशरथ की तीन रानियों (कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी) के द्वारा उनके पुत्र-रूप में आइए, और मनुष्य बनकर लोक-कण्टक रावण को युद्ध में मारिए, जो अन्य देवताओं से अवध्य है। वह मूर्ख रावण बल के मद में देवों, गन्धर्वों, सिद्धों और श्रेष्ठ ऋषियों को सताता है, नन्दनवन में क्रीड़ा करते ऋषि, गन्धर्व और अप्सराएँ उसके द्वारा स्वर्ग से गिराए गए हैं। हम सब, सिद्ध-गन्धर्व-यक्षों समेत, ऋषियों के साथ आपकी शरण आए हैं, आप ही हमारी परम गति हैं, हे परन्तप।

इस प्रकार स्तुत होकर विष्णु ने ब्रह्मा-प्रमुख धर्मनिष्ठ देवों से कहा, भय छोड़ें, आपका कल्याण हो। आपके हित के लिए मैं क्रूर, दुराधर्ष, देव-ऋषियों को भय देनेवाले रावण को उसके पुत्र-पौत्र, मन्त्री, ज्ञाति-बान्धवों समेत मारकर, इस पृथ्वी पर 11000 वर्ष मनुष्य-लोक में रहकर शासन करूँगा। यह वर देकर आत्मवान विष्णु ने अपनी जन्मभूमि अयोध्या और पिता-रूप में दशरथ को चुना। फिर देव, ऋषि, गन्धर्व, रुद्र और अप्सराएँ दिव्य स्तुतियों से मधुसूदन की स्तुति करने लगे, हे देव, उग्रतेज, प्रवृद्ध-दर्प, इन्द्र-द्रोही, तपस्वियों के कण्टक रावण का सम्पूर्ण नाश कीजिए। उसे, उसकी सेना और बान्धवों समेत मारकर, अपने भक्तों को निश्चिन्त कर, हे सुरेन्द्र, आप अपने सुरक्षित, निर्दोष वैकुण्ठ-लोक को लौटिए।

सार: पुत्रेष्टि-यज्ञ की अग्नि में देवों की प्रार्थना मिलती है, और विष्णु स्वयं दशरथ के घर अवतार लेकर रावण-वध का संकल्प लेते हैं, मानुष-राम के जन्म की भूमिका यहीं बँधती है।

पायस का दान और रानियों में विभाजन

देवों से नियुक्त नारायण विष्णु ने सब जानते हुए भी देवों से मधुर वचन कहा। देवों ने कहा, हे विष्णो, मनुष्य-रूप धारण कर रावण को युद्ध में मारिए। उन्होंने रावण के तप और ब्रह्मा से पाए वर का स्मरण कराया, कि उसे मनुष्य के सिवा किसी अन्य प्राणी से भय नहीं, क्योंकि वर के समय उसने अवज्ञावश मनुष्यों का नाम न लिया था। यह सुनकर विष्णु ने पिता-रूप में दशरथ को चुना।

यज्ञ की लपटों से प्रकट यज्ञपुरुष खीर का स्वर्ण-पात्र देते हैं, राजा दशरथ हाथ फैलाकर झुके हैं।

उसी समय अपुत्र, महाद्युतिमान, शत्रुनाशक राजा पुत्र की इच्छा से पुत्रेष्टि-यज्ञ कर रहे थे। तब यजमान की अग्नि (आहवनीय) से अतुल कान्तिवाला, महावीर्य, महाबली एक महान भूत प्रकट हुआ, कृष्णवर्ण, रक्ताम्बरधारी, रक्तमुख, दुन्दुभि-स्वर, शरीर-मुख-सिर पर सिंह-से कोमल केश; दिव्य आभूषणों से सज्जित, पर्वत-शिखर-सा ऊँचा, दर्पित व्याघ्र-सा चलता, सूर्य-सा प्रदीप्त। उसने दोनों भुजाओं में तप्त-स्वर्ण का एक विशाल पात्र उठा रखा था, जो दिव्य पायस (दूध-चावल-शक्कर की खीर) से भरा और रजत-ढक्कन से ढका था, मानो प्रिय पत्नी हो।

उसने दशरथ को देखकर कहा, हे राजन, मुझे विष्णु (प्राणियों के रक्षक) का दूत जानिए, उनके लोक से यहाँ आया। राजा ने हाथ जोड़कर स्वागत किया और पूछा, आपके लिए क्या करूँ। दूत ने कहा, अश्वमेध और पुत्रेष्टि से देवों के पूजन से आज आपको यह फल मिला है। हे नृपश्रेष्ठ, यह देव-निर्मित पायस लीजिए, यह सन्तान देनेवाला, धन्य और आरोग्य-वर्धक है। इसे अपनी अनुरूप पत्नियों को “ग्रहण करें” कहकर दीजिए, उनसे आपको वे पुत्र मिलेंगे जिनके लिए आप यज्ञ कर रहे हैं। राजा ने “तथास्तु” कहकर सिर झुकाकर वह दिव्यान्न-पूर्ण स्वर्ण-पात्र लिया, उस अद्भुत भूत को प्रणाम कर परम हर्ष से परिक्रमा की, और वह तेजस्वी भूत अग्नि में ही अन्तर्धान हो गया।

राजा दशरथ खीर का भारी स्वर्ण-कलश थामे रानियों की ओर बढ़ते हैं, पास यज्ञाग्नि और ऋषि बैठे हैं।

पायस पाकर दशरथ ऐसे प्रसन्न हुए जैसे दरिद्र को धन मिल जाए। हर्ष की किरणों से उद्दीप्त अन्तःपुर शरद-पूर्णिमा के चन्द्र-सा शोभित हो उठा। राजा ने अन्तःपुर में जाकर ज्येष्ठ रानी कौसल्या से कहा, यह पुत्रदायी पायस लीजिए, और आधा पायस कौसल्या को दिया। शेष का आधा (कुल का चौथाई) सुमित्रा को दिया। बचे आधे का आधा (कुल का आठवाँ) कैकेयी को दिया, और फिर विचार कर शेष आधा (कुल का आठवाँ) पुनः सुमित्रा को दिया। इस प्रकार राजा ने सब रानियों को पृथक-पृथक पायस बाँटा। पायस पाकर सब उत्तम रानियाँ इसे विशेष सम्मान मानकर हर्षित हुईं। उस उत्तम पायस को पृथक-पृथक खाकर वे अग्नि और सूर्य-से तेजस्वी गर्भ को शीघ्र ही धारण कर गईं। गर्भवती रानियों को देख, अभीष्ट पाकर, इन्द्र और सिद्ध-ऋषियों से पूजित राजा वैसे ही हर्षित हुए जैसे स्वर्ग में इन्द्र।

सार: अग्नि से प्रकट दिव्य दूत पायस सौंपता है, और राजा उसे रानियों में बाँटते हैं, यहीं चार पुत्रों के गर्भ की नींव पड़ती है।

वानर-वीरों की उत्पत्ति

राजा दशरथ चम्मच से तीनों रानियों के पात्रों में खीर बाँट रहे हैं, झरोखे से नगर दिखता है।

विष्णु के दशरथ के पुत्र-रूप में अवतरित होने का संकल्प कर लेने पर, स्वयम्भू ब्रह्मा ने सब देवताओं से कहा, सत्यप्रतिज्ञ, वीर, हम सबके हितैषी विष्णु के बलवान, इच्छानुसार रूप धरनेवाले सहायक उत्पन्न करें। उन्होंने कहा, प्रमुख अप्सराओं, विद्याधरी-स्त्रियों, नाग-कन्याओं, गन्धर्वी-स्त्रियों, यक्ष-कन्याओं, रीछनियों, किन्नरी-स्त्रियों और वानरियों के गर्भ से, अपने ही समान बलवान, मायाविद, शूर, वायु-वेगी, नीतिज्ञ, बुद्धिमान, विष्णु-तुल्य पराक्रमी, अवध्य, उपायज्ञ, दिव्य-देहधारी, सर्वास्त्र-कुशल, अमृत-भोजी देवों-से पुत्र, वानर-रूप में, उत्पन्न करें।

ब्रह्मा ने कहा, ऋक्षराज जाम्बवान को मैंने पहले ही उत्पन्न कर दिया है, वह जँभाई लेते समय मेरे मुख से उत्पन्न हुआ। आदेश पाकर देवों ने वानर-रूप में पुत्र उत्पन्न किए, ऋषि, सिद्ध, विद्याधर, नाग और चारण भी वन-विचरण करनेवाले वीर पुत्र उपजाने लगे। इन्द्र ने महेन्द्र-तुल्य बाली को, सूर्य ने सुग्रीव को, बृहस्पति ने सब वानरों में बुद्धि में श्रेष्ठ तार को, कुबेर ने गन्धमादन को, विश्वकर्मा ने नल को, अग्नि ने अग्नि-तुल्य कान्ति और बल में अधिक नील को, अश्विनीकुमारों ने मैन्द और द्विविद को, वरुण ने सुषेण को, पर्जन्य ने शरभ को उत्पन्न किया। वायु के औरस पुत्र वज्र-तुल्य देहवाले, गरुड़-से वेगवान, सब वानरों में बुद्धिमान और बलवान हनुमान हुए। ये सहस्रों की संख्या में, रावण-वध को सदा उद्यत, उत्पन्न हुए।

ये वीर अप्रमेय बल के, इच्छानुसार रूप धरनेवाले, गज-पर्वत-से विशाल, महाबली थे। चारणों ने भी विशाल-देह, वन-विचरण करनेवाले, फलाहारी वानर-पुत्र उपजाए। ऋक्ष, वानर और गोपुच्छ (लंगूर) देव-शिशुओं-से शीघ्र ही जन्म लेते। प्रत्येक देव का पुत्र उसी के रूप, बल और पराक्रम के समान होता, और लंगूरों के बीच जन्मे तो पिता से भी कुछ अधिक पराक्रमी। ये सिंह-व्याघ्र-से दर्प और बल के, शिला और पर्वत को अस्त्र बनानेवाले, नख-दन्त-आयुधी, सर्वास्त्र-कुशल थे। ये पर्वतों को हिला देते, वृक्षों को उखाड़ देते, वेग से समुद्र को क्षुब्ध कर देते, पैरों से पृथ्वी फाड़ देते, महासमुद्र लाँघ जाते, आकाश में प्रवेश कर बादल पकड़ लेते, मदमत्त हाथियों को थाम लेते, और अपने नाद से उड़ते पक्षियों को गिरा देते।

ऐसे करोड़ों कामरूपी, यूथपति वानर उत्पन्न हुए, जो प्रमुख यूथों में नेता बने और अन्य वीर वानरों को उपजाया। कुछ ऋक्षवान पर्वत के शिखरों पर, कुछ नाना पर्वतों-वनों में बस गए, कुछ सूर्य-पुत्र सुग्रीव और इन्द्र-पुत्र बाली के पास, कुछ नल, नील, हनुमान आदि के पास रहे। गरुड़-तुल्य बलवाले, युद्ध-कुशल ये वानर विचरते हुए सिंह, व्याघ्र और महासर्पों को मार डालते। महाबली, विपुल-पराक्रमी बाली ने अपनी भुजाओं के बल से इन ऋक्ष-वानर-लंगूरों की रक्षा की। पर्वत-वन-समुद्र-सहित यह पृथ्वी विविध आकृति और चिह्नवाले इन वीरों से भर गई। मेघ-समूह और पर्वत-शिखर-से, भयंकर देहवाले ये महाबली वानर-यूथपति, राम की सहायता के हेतु ही जन्मे, पृथ्वी पर छा गए।

सार: राम के अवतार से पहले ही उनकी भावी सेना पृथ्वी पर तैयार हो जाती है, देवों के अंश से जन्मे वानर-वीर रावण-वध की प्रतीक्षा में हैं।

राम-जन्म और भाइयों का अवतरण

महात्मा दशरथ के उस अश्वमेध और पुत्रेष्टि-यज्ञ के सम्पन्न होने पर, अपने-अपने भाग पाकर देवता लौट गए। दीक्षा का व्रत पूरा कर राजा रानियों, सेवकों, सेना और वाहनों-सहित नगरी लौटे। यज्ञ में आए राजा भी, यथायोग्य पूजित होकर, वसिष्ठ, ऋष्यशृंग, वामदेव आदि को प्रणाम कर, हर्ष से अपने देशों को लौटे। राजा दशरथ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को आगे कर पुनः नगरी में आए, और ऋष्यशृंग, पूजित होकर, पत्नी शान्ता-सहित विदा हुए। सबको विदा कर, पूर्ण-मना राजा पुत्रोत्पत्ति की प्रतीक्षा में सुख से रहने लगे।

रानी कौसल्या तेजोमय नवजात राम को गोद में लिए बैठी हैं, दशरथ, ऋषि और रानियाँ निहार रहे हैं।

यज्ञ के बाद छह ऋतुएँ (प्रत्येक दो मास की, अर्थात लगभग एक वर्ष) बीतीं। फिर बारहवें मास में, चैत्र की शुक्ल नवमी तिथि को, जब अदिति-देवता-नक्षत्र पुनर्वसु उदित था, पाँच ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, गुरु, शुक्र) अपने-अपने उच्च स्थान में थे, और कर्क लग्न में चन्द्र-सहित गुरु था, माता कौसल्या ने जगत्पति, त्रिलोक-पूज्य, इक्ष्वाकु-वंश के आनन्द, विष्णु के आधे अंशवाले, दिव्य-लक्षणों से युक्त, रक्ताभ नेत्र, आजानुबाहु, रक्त-ओष्ठ, दुन्दुभि-स्वरवाले पुत्र राम को जन्म दिया।

एक उप-कथा (संख्या/काल): अश्वमेध-समाप्ति के बाद छह ऋतुएँ अर्थात लगभग एक पृथ्वी-वर्ष बीता; “बारहवें मास” का चैत्र वही मास है। राम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी को है, यही बाद की परम्परा में “रामनवमी” कहलाती है। अंशों का बँटवारा पाठ में स्पष्ट है, राम विष्णु के आधे अंश, भरत चौथाई अंश, और लक्ष्मण व शत्रुघ्न दोनों मिलकर शेष (एक-छठा भाग प्रत्येक के निकट) अंशवाले।

चार पालनों में लेटे नवजात राजकुमारों को दशरथ हाथ जोड़कर निहारते हैं, रानियाँ और ऋषि झुककर देख रहे हैं।

कौसल्या उस अमित-तेजस्वी पुत्र से वैसे ही शोभित हुईं जैसे अदिति वज्रपाणि इन्द्र से। फिर कैकेयी के गर्भ से सत्यपराक्रमी भरत हुए, जो विष्णु के चौथाई अंश और सब दिव्य गुणों से युक्त थे। सुमित्रा ने दो (जुड़वाँ) पुत्र, लक्ष्मण और शत्रुघ्न, जन्मे, जो वीर, सर्वास्त्र-कुशल और विष्णु के शेष अंश से युक्त थे। भरत का जन्म प्रसन्न-मन से तब हुआ जब पुष्य नक्षत्र उदित और सूर्य मीन-लग्न में था; सुमित्रा के दोनों पुत्र तब जन्मे जब आश्लेषा उदित और सूर्य कर्क में था। राजा के चारों महात्मा पुत्र पृथक-पृथक जन्मे, गुणवान, परस्पर अनुरूप, और पूर्वा-उत्तरा भाद्रपदा के नक्षत्रों-से कान्तिमान।

स्वर्ग में गन्धर्व मधुर गाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगीं, देव-दुन्दुभियाँ अपने-आप बजने लगीं, और आकाश से पुष्प-वृष्टि हुई। अयोध्या में महान उत्सव हुआ, गलियाँ नट-नर्तकों और जन-समूह से भर गईं। गायकों और वादकों के घोष से, रत्नों से बिखरे विशाल राजमार्ग शोभायमान हुए। राजा ने सूत-मागध-वन्दीजनों को भेंट दीं, और ब्राह्मणों को सहस्रों गौएँ और धन दिया।

अयोध्या की गलियों में जन्मोत्सव मन रहा है, आकाश से अप्सराएँ और गंधर्व फूल बरसाते नाच-गा रहे हैं।

ग्यारह दिन बीतने पर नामकरण-संस्कार हुआ; वसिष्ठ ने परम प्रसन्न होकर ज्येष्ठ महात्मा को “राम”, कैकेयी-पुत्र को “भरत”, सुमित्रा के प्रथम को “लक्ष्मण” और दूसरे को “शत्रुघ्न” नाम दिया।

एक उप-कथा: श्रुति के अनुसार क्षत्रिय का सूतक (जन्म-अशुद्धि) बारह दिन रहता है, और स्मृति-वचन से राजाओं का नामकरण तेरहवें दिन होता है। राम का जन्म लक्ष्मण-शत्रुघ्न से दो दिन पहले हुआ था, इसी से नामकरण लक्ष्मण-शत्रुघ्न के जन्म से ग्यारहवें और राम के जन्म से तेरहवें दिन हुआ।

गुरु वशिष्ठ यज्ञाग्नि के सामने चारों राजकुमारों का संस्कार कर रहे हैं, दशरथ और रानियाँ पीछे खड़े हैं।

वसिष्ठ ने राजा की ओर से सम्पूर्ण कोसल के नगर-ग्रामवासी ब्राह्मणों को भोजन कराया और रत्नों का विशाल ढेर दिया। चारों पुत्रों के जातकर्म से लेकर उपनयन (यज्ञोपवीत) तक के सब संस्कार करवाए। ज्येष्ठ राम ध्वज-से अपने वंश की महिमा घोषित करते, पिता के आनन्द बने। सब पुत्र वेदवेत्ता, शूर, लोक-हित में रत हुए, और इनमें राम अत्यन्त तेजस्वी, सत्यपराक्रमी थे। निर्मल चन्द्र-से सब के प्रिय, गज-अश्व-रथ की कला में निपुण, धनुर्वेद में रत, और पिता की सेवा में लीन।

लक्ष्मण बचपन से ही ज्येष्ठ भाई राम से अत्यन्त स्नेह रखते, उन्हें हर प्रकार प्रसन्न करते; वे राम के मानो बाहर घूमते प्राण थे। राम लक्ष्मण के बिना न सोते, न उत्तम भोजन करते; और जब राम घोड़े पर सवार होकर मृगया (शिकार) को जाते, लक्ष्मण धनुष-बाण लिए पीछे-पीछे रक्षा करते चलते। इसी प्रकार शत्रुघ्न लक्ष्मण के अनुज, भरत को प्राणों से भी प्रिय थे, और भरत को शत्रुघ्न। चारों प्रिय पुत्रों से दशरथ वैसे ही परम प्रसन्न थे जैसे ब्रह्मा इन्द्र-वरुण-यम-कुबेर से। ज्ञान-सम्पन्न, गुण-युक्त, लज्जाशील, कीर्तिमान, सर्वज्ञ और दीर्घदर्शी इन तेजस्वी पुत्रों के पिता दशरथ लोकाधिप ब्रह्मा-से हर्षित थे। ये मनुष्य-व्याघ्र वैदिक अध्ययन में रत, पितृ-सेवा में लीन और धनुर्वेद में निष्ठित थे।

जब उनकी विद्या पूरी होने को आई, धर्मात्मा दशरथ पुरोहितों (वसिष्ठ, वामदेव) और बान्धवों के साथ पुत्रों के विवाह पर विचार करने लगे। मन्त्रियों के बीच राजा यह विचार कर ही रहे थे कि महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र राजा के महल में आ पहुँचे, और राजा के दर्शन की इच्छा से द्वारपालों से बोले, मैं कौशिक, गाधि-पुत्र, आया हूँ, राजा को शीघ्र सूचित करें।

एक तेजस्वी ऋषि दंड लिए महल के स्वर्ण द्वार पर भालाधारी द्वारपालों से प्रवेश के लिए कह रहे हैं।

यह सुनकर द्वारपाल आदर-भय से राजा के भवन की ओर दौड़े, और इक्ष्वाकु-नरेश को विश्वामित्र के आगमन की सूचना दी। हर्षित राजा पुरोहित वसिष्ठ-सहित उनके स्वागत को वैसे ही आगे बढ़े जैसे इन्द्र ब्रह्मा से मिलने जाए। तेज से दीप्त, संशितव्रत तपस्वी को देख, प्रसन्न-मुख राजा ने अर्घ्य दिया। विश्वामित्र ने शास्त्रोक्त विधि से अर्घ्य स्वीकार कर राजा का कुशल पूछा, और नगर, कोष, जनपद, बान्धव-मित्रों की कुशल पूछी, कि आपके सब सामन्त वश में और शत्रु जीते हुए हैं न, और देव-मनुष्य-सम्बन्धी कर्म भली-भाँति किए जा रहे हैं न। फिर उन्होंने वसिष्ठ और अन्य ऋषियों, वामदेव आदि से यथायोग्य कुशल पूछा। सब हर्षित होकर राजा की सभा में आए, और यथारुचि आसन ग्रहण किया।

परम उदार राजा ने हर्षित होकर विश्वामित्र का पूजन करते कहा, आपका आगमन मेरे लिए वैसा ही है जैसे अमृत हाथ आ जाए, निर्जल भूमि में वर्षा हो जाए, निःसन्तान को अनुरूप पत्नी से पुत्र-जन्म हो, खोया धन मिल जाए, या उत्सव का हर्ष प्राप्त हो; हे महामुने, आपका स्वागत है। आपकी कौन-सी परम कामना मैं हर्ष से पूरी करूँ। हे ब्रह्मन, आप मेरे लिए पात्र-भूत हैं, सौभाग्य से पधारे, आज मेरा जन्म और जीवन सफल हुआ। आपको देखकर मेरी रात्रि शुभ प्रभात में बदल गई। पहले राजर्षि कहलाते आप, तप से अब ब्रह्मर्षि-पद पाकर मेरे लिए अनेक प्रकार पूज्य हैं, आपका आगमन मेरे लिए परम पवित्र हुआ है। आपके दर्शन से मैं मानो सब तीर्थों में हो आया। आप जिस कार्य के लिए पधारे, वह कहिए, मैं अनुगृहीत होकर आपका कार्य पूरा करना चाहता हूँ, इसमें कोई सन्देह न करें, क्योंकि आप मेरे लिए देवता हैं, और आपका आगमन मेरे लिए महान अभ्युदय और उत्तम धर्म लाया है। हृदय और कानों को सुख देनेवाले इस विनम्र वचन को सुनकर, गुण-यश से विख्यात परम ऋषि विश्वामित्र परम हर्ष को प्राप्त हुए।

सार: चैत्र शुक्ल नवमी को राम और उनके भाई अवतरित होते हैं, अयोध्या उत्सव में डूबती है, और जैसे ही चारों बढ़कर शस्त्र-विद्या में निपुण होते हैं, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र द्वार पर आ खड़े होते हैं, अगली कथा की देहरी।

मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 1-18 (गीता प्रेस गोरखपुर)।