
राज्याभिषेक की वह पहली रात्रि, जो अयोध्यावासियों के हर्ष को बढ़ाने वाली थी, बीत गई। प्रातःकाल किन्नरों के समान मधुरकण्ठ वन्दीजन (स्तुति-गायक) राजभवन में एकत्र हुए और श्रीराम का गुणगान करने लगे। हे राजन्, आपका पराक्रम विष्णु-सा है, आपकी कान्ति अश्विनीकुमारों-सी, आपकी बुद्धि बृहस्पति-सी, और प्रजापालन में आप ब्रह्मा के समान हैं; आपकी क्षमा पृथ्वी-सी अविचल, आपका तेज सूर्य-सा, आपका वेग वायु-सा, और आपकी गम्भीरता समुद्र-सी है। जागिए, हे सौम्य वीर, कौसल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले श्रीराम! जब तक आप सोते हैं, समस्त संसार सोया रहता है। ऐसे मधुर वचनों से जगाए गए श्रीराम श्वेत वस्त्र से ढके अपने शयन को छोड़कर वैसे ही उठे जैसे शेषनाग की शय्या से नारायण उठते हैं।
श्रीराम की सभा: मित्रों से घिरे धर्मराज
स्नान और अग्निहोत्र (नित्य की अग्नि-उपासना) से पवित्र होकर श्रीराम इक्ष्वाकुओं के पवित्र देवमन्दिर में गए और वहाँ देवताओं, पितरों तथा ब्राह्मणों का यथाविधि पूजन किया। फिर वे बाहरी सभाकक्ष की ओर निकले। पुरोहित वसिष्ठ को आगे रखकर समस्त मन्त्रीगण, जो प्रज्वलित अग्नियों के समान तेजस्वी थे, उपस्थित हुए। नाना देशों के राजा महात्मा क्षत्रिय वैसे ही श्रीराम के पास बैठे जैसे देवता इन्द्र के पास बैठते हैं।

भरत, लक्ष्मण और महायशस्वी शत्रुघ्न तीनों वेदों के समान श्रीराम की सेवा में हर्षित होकर बैठे। मुदित नाम के अनेक सेवक हाथ जोड़े प्रसन्न मुख से उनके पास आ बैठे। काम-रूपी (इच्छानुसार रूप धारण करने वाले) महावीर बीस वानर, जिनमें सुग्रीव प्रमुख थे, श्रीराम की सेवा में उपस्थित हुए। चार राक्षस-मन्त्रियों से घिरे विभीषण वैसे ही श्रीराम के पास बैठे जैसे यक्ष कुबेर की सेवा करता है। वेदज्ञ कुलीन मनुष्य और श्रीमान् ऋषि भी उन्हें घेरकर बैठे। उस मानव-रूप में श्रीराम सहस्राक्ष इन्द्र से भी अधिक शोभा पा रहे थे, और वहाँ बैठे हुए जनों के बीच पुराणवेत्ता महात्माओं द्वारा धर्म से युक्त अत्यन्त मधुर कथाएँ कही जाने लगीं।
समझने की कुंजी (बीस वानर): वाल्मीकि यहाँ श्रीराम के पास बैठे प्रमुख वानरों-भालुओं के नाम गिनाते हैं, सुग्रीव, अंगद, हनुमान, जाम्बवान्, सुषेण, तार, नील, नल, मैन्द, द्विविद, कुमुद, शरभ, शतबलि, गन्धमादन, गज, गवाक्ष, गवय, धूम्र, रम्भ और ज्योतिर्मुख। ये वे ही साथी हैं जिन्होंने लंका-युद्ध में प्राण लगाए थे, और अब अयोध्या में राजा के सम्मानित अतिथि हैं।
सार: उत्तरकाण्ड का यह भाग राज्याभिषेक के पश्चात् आरम्भ होता है। श्रीराम का दरबार वह संगम है जहाँ अयोध्या के मन्त्री, मित्र-राजा, और लंका-युद्ध के वानर-भालू-राक्षस साथी एक साथ बैठे हैं, मानो धर्म का राज्य अपने समस्त सहयोगियों को एक छत के नीचे ले आया हो।
राजाओं की विदाई: जनक, युधाजित्, प्रतर्दन और तीन सौ नरेश

इस प्रकार महाबाहु श्रीराम प्रतिदिन नगर और जनपद के समस्त कार्यों का शासन करते रहे। कुछ दिनों बाद उन्होंने हाथ जोड़कर विदेहराज, मिथिलापति जनक से विनयपूर्वक कहा, हे राजन्, आप ही हमारे आश्रय हैं, हम आपके द्वारा पालित हैं; आपके उग्र तप-तेज से ही मैंने रावण का वध किया। इक्ष्वाकुओं और मैथिलों के बीच सम्बन्ध-प्रधान अतुल प्रीति सदा से रही है। अब आप ये रत्न लेकर अपने नगर पधारें; भरत सहायता के लिए आपके पीछे-पीछे आएँगे। जनक ने “तथास्तु” कहकर उत्तर दिया, हे राजन्, मैं आपके दर्शन और नीति से प्रसन्न हूँ। जो रत्न मेरे लिए संचित किए गए थे, वे सब मैं अपनी पुत्री महारानी सीता को ही अर्पित करता हूँ। यह कहकर श्रीमान् जनक प्रसन्न-मन से श्रीराम की अनुमति लेकर मिथिला को प्रस्थित हुए।
तत्पश्चात् श्रीराम ने अपने मामा, केकयराज युधाजित् से हाथ जोड़कर कहा, हे राजन्, यह राज्य, मैं स्वयं, भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मण, सब आपके अधीन हैं; आप ही हमारे आश्रय हैं। वृद्ध राजा (केकयराज अश्वपति) आपके लिए सन्तप्त होंगे, अतः आज ही आपका प्रस्थान उचित है; लक्ष्मण बहुत धन और रत्न लेकर आपके पीछे चलेंगे। युधाजित् ने भी “तथास्तु” कहा और बोले, हे राघव, ये रत्न और धन आपके ही पास अक्षय रहें। राजा की प्रदक्षिणा करके केकयराज लक्ष्मण को साथ लेकर वैसे ही चले जैसे वृत्रासुर के वध के पश्चात् इन्द्र विष्णु को छोटे भाई-रूप में लेकर अमरावती लौटे थे।

फिर श्रीराम ने अपने निर्भय मित्र काशीपति प्रतर्दन को विदा करते हुए कहा, हे राजन्, आपने भरत के साथ मिलकर मेरे राज्याभिषेक में जो उद्योग किया, उससे आपकी प्रीति और परम सौहार्द प्रकट हुआ। अब आप अपनी रमणीय, सुदृढ़ प्राकार और सुन्दर तोरणों वाली नगरी वाराणसी लौटें, जिसकी रक्षा आप करते हैं। ऐसा कहकर श्रीराम अपने श्रेष्ठ आसन से उठे और छाती से लगे प्रतर्दन को कसकर आलिंगन में भरा।
काशीपति को विदा करके श्रीराम वहाँ एकत्र तीन सौ नरेशों से हँसते हुए मधुर वाणी में बोले, मेरे प्रति आपकी अविचल भक्ति आपके तेज से सिद्ध है। आपका धर्म नियत है, सत्य सदा विद्यमान है; आप महात्माओं के तेज से ही दुर्बुद्धि, राक्षसों में अधम रावण मारा गया, मैं तो वहाँ केवल निमित्तमात्र था। सीता के हरण का समाचार सुनकर महात्मा भरत ने आप सबको बुलाया था; अब बहुत समय बीत चुका, अतः मैं समझता हूँ कि आपको लौट जाना चाहिए। महान् हर्ष से भरे राजाओं ने उत्तर दिया, हे राम, हमारे सौभाग्य से आप विजयी हुए और अपने राज्य में सुस्थिर हुए, हमारे सौभाग्य से सीता वापस आईं और शत्रु पराजित हुआ। यही हमारी परम कामना और परम प्रीति थी कि हम आपको शत्रु-नाश करके विजयी देखें। आप हमारी प्रशंसा करते हैं, पर हम तो आपकी प्रशंसा करना भी नहीं जानते। ऐसा कहकर, श्रीराम के “ठीक है” कहने पर, हाथ जोड़े सब राजा “हम जा रहे हैं” कहते हुए, सम्मानित होकर अपने-अपने देश लौट गए।
एक उप-कथा (टीकाकारों का प्रक्षेप-नोट): गीता प्रेस संस्करण बताता है कि वाल्मीकि-रामायण के कुछ संस्करणों में सर्ग 37 और 38 के बीच पाँच सर्ग प्रक्षिप्त रूप में जोड़े गए हैं, जिनमें अगस्त्य द्वारा वाली-सुग्रीव की उत्पत्ति और रावण की श्वेतद्वीप-यात्रा का वर्णन है। किन्तु चूँकि पिछले सर्ग में ही अगस्त्य के प्रस्थान का उल्लेख हो चुका है, इन सर्गों का यहाँ समावेश असंगत मानकर हटा दिया गया है।
सार: राज्याभिषेक के उत्सव का समापन-दृश्य। श्रीराम एक-एक करके अपने सहयोगी राजाओं, जनक, युधाजित्, प्रतर्दन और तीन सौ नरेशों, को सम्मान और रत्न देकर विदा करते हैं। हर विदाई में वही भाव है: विजय का श्रेय औरों को, और निमित्तमात्र का स्थान अपने लिए।
वानर-भालू-राक्षसों को रत्न-दान
वे महात्मा राजा हाथियों-घोड़ों की सहस्र सेनाओं से पृथ्वी कँपाते हुए प्रसन्नतापूर्वक चले। मार्ग में बल के घमण्ड से भरे वे आपस में कहने लगे, हम तो श्रीराम और रावण को युद्ध में आमने-सामने भी न देख पाए! भरत ने हमें युद्ध समाप्त हो जाने के बाद व्यर्थ ही बुलाया; यदि हम समय पर बुलाए जाते तो राजाओं द्वारा राक्षस शीघ्र ही मार दिए जाते। फिर भी श्रीराम और लक्ष्मण की भुजाओं के बल से रक्षित होकर हम समुद्र के उस पार निश्चिन्त होकर लड़ सकते थे। ऐसी सहस्र बातें कहते हुए वे अपने-अपने समृद्ध राज्यों में लौटे और श्रीराम की प्रसन्नता के लिए नाना उपहार, घोड़े, रथ, रत्न, मदोन्मत्त हाथी, श्रेष्ठ चन्दन, दिव्य आभूषण, मणि-मुक्ता-प्रवाल, रूपवती दासियाँ, बकरियाँ-भेड़ें और अनेक रथ, भेजे। भरत, लक्ष्मण और महाबली शत्रुघ्न उन रत्नों को लेकर अयोध्या लौटे।
उन सब अद्भुत वस्तुओं को प्रीतिपूर्वक स्वीकार करके श्रीराम ने वे रत्न कृतकर्मा राजा सुग्रीव को, विभीषण को, तथा उन अन्य वानरों-राक्षसों को बाँट दिए जिनसे घिरकर उन्होंने रावण पर विजय पाई थी। उन महाबली वानरों-राक्षसों ने श्रीराम के दिए रत्न अपने सिरों और भुजाओं पर धारण किए। फिर श्रीराम ने हनुमान और अंगद को अपनी गोद में बिठाकर सुग्रीव से कहा, हे वानरेश, आपका योग्य पुत्र अंगद और आपके मन्त्री पवनपुत्र, दोनों आपको मन्त्रणा देने में और मेरे हित में संलग्न रहे हैं, अतः ये सब प्रकार के सम्मान के योग्य हैं। यह कहकर उन्होंने अपने शरीर से महामूल्य आभूषण उतारकर अंगद और हनुमान को पहनाए।
नील, नल, केसरी, कुमुद, गन्धमादन, सुषेण, पनस, मैन्द, द्विविद, जाम्बवान्, गवाक्ष, विनत, धूम्र, बलीमुख, प्रजंघ, महाबली सन्नाद, दरीमुख, दधिमुख और इन्द्रजानु, इन यूथपतियों को मानो नेत्रों से ही पी लेना चाहते हों, ऐसे कोमल स्वर में सम्बोधित करते हुए श्रीराम बोले, आप मेरे मित्र हैं, मेरे दूसरे प्राण हैं, मेरे भाई हैं; हे वनवासियो, आपने ही मुझे विपत्ति से उबारा। राजा सुग्रीव आप जैसे श्रेष्ठ मित्रों के कारण धन्य हैं। यह कहकर उन्होंने सबको योग्यतानुसार महामूल्य आभूषण और हीरे दिए और उन्हें गले से लगाया।

मधुपिंगल वर्ण के वे वानर वहाँ सुगन्धित मधु पीते, राजोचित मांस तथा कन्द-मूल-फल खाते हुए ठहरे रहे। इस प्रकार एक मास से अधिक बीत गया, किन्तु श्रीराम की भक्ति में उन्हें वह एक मुहूर्त जैसा प्रतीत हुआ। शिशिर ऋतु का दूसरा मास फाल्गुन भी सुख से बीत गया; इक्ष्वाकुओं की रमणीय नगरी में श्रीराम के आतिथ्य से उन सबका समय परम प्रीति में व्यतीत हुआ।
सार: श्रीराम का राज्य कृतज्ञता पर खड़ा है। विजय के पश्चात् वे अपने युद्ध-साथियों को अपने शरीर के आभूषण तक उतारकर देते हैं और उन्हें “मित्र, भाई, दूसरे प्राण” कहते हैं, यह वह धर्म-राज्य है जो उपकार को कभी नहीं भूलता।
वानरों की विदाई और हनुमान का वरदान

उनके इस प्रकार रहते हुए महातेजस्वी श्रीराम ने सुग्रीव से कहा, हे सौम्य, देव-दानवों के लिए भी दुर्जय किष्किन्धा को लौटिए और मन्त्रियों सहित निष्कण्टक राज्य का पालन कीजिए। अंगद, हनुमान, महाबली नल, गन्धमादन, ऋषभ, सुपाटल, केसरी, शरभ, शुम्भ, शंखचूड़, सुषेण (आपके श्वशुर), तार, कुमुद, नील, शतबलि, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, भालूराज जाम्बवान्, इन सब महात्मा वानरों-भालुओं को, जिन्होंने मेरे लिए प्राण त्यागने में संकोच न किया, प्रीतिपूर्वक देखिए और इनके प्रति कभी अप्रिय न कीजिए।
फिर बार-बार सुग्रीव को आलिंगन करके श्रीराम ने विभीषण से मधुर वाणी में कहा, लंका का धर्मपूर्वक शासन कीजिए; आप धर्मज्ञ माने जाते हैं, मेरे द्वारा, लंकानगरी द्वारा, समस्त राक्षसों द्वारा और आपके ज्येष्ठ भ्राता विश्रवापुत्र कुबेर द्वारा। हे राजन्, कभी अपनी बुद्धि अधर्म में न लगाइए; बुद्धिमान् राजा ही पृथ्वी का दृढ़ शासन करते हैं। सुग्रीव सहित मुझे आप परम प्रीति से सदा स्मरण कीजिए और निश्चिन्त होकर जाइए। श्रीराम का यह वचन सुनकर भालुओं, वानरों और राक्षसों ने बार-बार “साधु-साधु” कहकर उनकी प्रशंसा की, हे महाबाहु राम, आपकी बुद्धि अद्भुत है, आपका पराक्रम अद्भुत है, और आपकी परम मधुरता तो ब्रह्मा-सी है।
तब हनुमान नतमस्तक होकर बोले, हे राजन्, मेरा परम स्नेह सदा आप में बना रहे; मेरी भक्ति आप में नियत रहे, मेरा भाव अन्यत्र न जाए। हे वीर, जब तक इस पृथ्वी पर राम-कथा प्रचलित रहे, तब तक मेरे प्राण इस शरीर में रहें, इसमें सन्देह नहीं। हे रघुनन्दन, आपका जो दिव्य चरित है, आपकी जो कथा है, उसे अप्सराएँ मुझे गाकर सुनाती रहें; उस चर्या-अमृत को कानों से पीकर मैं अपनी उत्कण्ठा वैसे ही दूर करूँगा जैसे वायु बादलों की पंक्ति को बिखेर देती है।

श्रीराम अपने श्रेष्ठ आसन से उठे और स्नेह से हनुमान को आलिंगन में भरकर बोले, हे कपिश्रेष्ठ, ऐसा ही हो, इसमें सन्देह नहीं। जब तक संसार में मेरी यह कथा प्रचलित रहेगी, तब तक आपकी कीर्ति और आपके प्राण-दोनों स्थिर रहेंगे; जब तक लोक रहेंगे, तब तक मेरी कथाएँ रहेंगी। आपके एक-एक उपकार के बदले मैं अपने प्राण दे सकता हूँ, फिर भी शेष उपकारों का ऋणी रहूँगा। मेरा यह ऋण मेरे हृदय में सदा बना रहे (ऐसा अवसर ही न आए कि मुझे चुकाना पड़े), क्योंकि उपकार का प्रत्युपकार तभी होता है जब मनुष्य संकट में हो। यह कहकर श्रीराम ने अपने कण्ठ से चन्द्र-सा देदीप्यमान, बीच में वैदूर्य-मणि जड़ा हार उतारकर हनुमान के गले में बाँध दिया। उस महान् हार से हनुमान वैसे शोभा पाने लगे जैसे चन्द्र से आक्रान्त शिखर वाला स्वर्णगिरि।
श्रीराम का यह वचन सुनकर महाबली वानर एक-एक करके उठकर, सिर से उनके चरणों में प्रणाम करके चले। सुग्रीव और धर्मात्मा विभीषण को श्रीराम ने छाती से लगाया; सब वानर अश्रुपूर्ण नेत्रों से, वियोग की पीड़ा से मूढ़-से होकर, श्रीराम को छोड़ते हुए वैसे चले गए जैसे देही (आत्मा) देह को छोड़ता है।
सार: हनुमान का वरदान इस काण्ड का परम कोमल क्षण है, “जब तक राम-कथा रहेगी, हनुमान जीवित रहेंगे।” यहीं चिरंजीव हनुमान की परम्परा का बीज है। वियोग का दुःख इतना गहरा है कि वाल्मीकि उसे देह से आत्मा के निकलने जैसा बताते हैं।
पुष्पक की विदाई और रामराज्य का वर्णन

भालुओं, वानरों और राक्षसों को विदा करके श्रीराम भाइयों सहित सुख से प्रसन्न रहने लगे। कुछ समय बाद अपराह्न में उन्होंने आकाश से एक मधुर वाणी सुनी, हे प्रिय राम, सौम्य मुख से मुझे देखिए; हे प्रभो, मुझे कुबेर के भवन से आया हुआ पुष्पक जानिए। मैं आपकी आज्ञा पाकर कुबेर के पास गया था, तो उन्होंने मुझसे कहा, महात्मा राघव ने युद्ध में दुर्जय रावण को मारकर आप पर अधिकार प्राप्त कर लिया; उस दुरात्मा रावण के सपरिवार वध से मुझे भी परम हर्ष हुआ। हे सौम्य, आप श्रीराम को ही वहन कीजिए, यही मेरी आज्ञा है; आप उस लोकाश्रय राघवनन्दन को वहन कीजिए और निःशंक होकर जाइए। उन महात्मा कुबेर की आज्ञा मानकर मैं आपके पास आया हूँ; मुझे निःशंक होकर स्वीकार कीजिए। मैं सब प्राणियों के लिए अजेय हूँ और कुबेर की आज्ञा से, अपने प्रभाव से, आपकी आज्ञा पालन करता हुआ सर्वत्र विचरूँगा।
यह सुनकर महाबली श्रीराम ने लौटे हुए उस श्रेष्ठ विमान को देखकर कहा, यदि ऐसा है तो हे विमानश्रेष्ठ पुष्पक, आपका स्वागत है; कुबेर की इस अनुकूलता से हम पर अनुचित आचरण का दोष नहीं लगेगा। फिर श्रीराम ने लावा, पुष्प, धूप और सुगन्धित चन्दन से पुष्पक का पूजन करके कहा, अभी जाइए; जब मैं स्मरण करूँ तब आ जाइए। हे सौम्य, सिद्धों के मार्ग में अन्तर्धान होकर मेरे वियोग का विषाद न कीजिए; आपको जिस दिशा में इच्छा हो, इच्छानुसार जाते हुए कोई बाधा न हो। पुष्पक ने “ऐसा ही हो” कहकर श्रीराम से पूजित होकर अभीष्ट दिशा में प्रस्थान किया।

उस गुणनिधि पुष्पक के अन्तर्धान होने पर भरत ने हाथ जोड़कर श्रीराम से कहा, हे दिव्य-आत्मा वीर, आपके राज्य में अमानुष प्राणी भी मनुष्यों के समान बार-बार बोलते हैं। आपके राजदण्ड धारण किए एक मास ही बीता है और मनुष्य रोग से रहित हो गए हैं, वृद्धों को भी मृत्यु नहीं आती, स्त्रियों को प्रसव में पीड़ा नहीं होती, और मनुष्य सुगठित हैं। हे राजन्, हर नगरवासी को अत्यधिक हर्ष प्राप्त है। मेघ समय पर अमृत-सा जल बरसाते हैं, स्पर्श-सुखद, मंगलकारी वायु बहती है। नगर और जनपद के लोग राजधानी में आकर कहते हैं, ऐसा ही राजा हमारा चिरकाल तक हो। भरत के इन सुमधुर वचनों को सुनकर नृपश्रेष्ठ श्रीराम हर्ष से भर गए।
समझने की कुंजी (पुष्पक का लौटना): पुष्पक वही विमान है जो रावण ने कुबेर से छीना था और श्रीराम लंका से अयोध्या इसी से लौटे थे। अब विजय के पश्चात् श्रीराम इसे कुबेर को लौटाना न्यायसंगत मानते हैं, इसी से कुबेर स्वयं इसे श्रीराम की सेवा में सौंप देते हैं। यह श्रीराम के धर्म-निष्ठ चरित्र की एक झलक है: छीनी हुई वस्तु अपने पास नहीं रखते।
सार: यहाँ “रामराज्य” का वह आदर्श चित्र है जो आगे की समस्त भारतीय कल्पना का प्रतिमान बना, न रोग, न अकाल-मृत्यु, न प्रसव-पीड़ा, समय पर वर्षा, सुखद वायु। प्रजा की एक ही प्रार्थना है: ऐसा शासक सदा बना रहे।
अशोक-वाटिका में विहार और सीता की अभिलाषा

पुष्पक को विदा करके महाबाहु श्रीराम अशोक-वाटिका में गए, जो चन्दन, अगुरु, आम, नारियल, देवदार, चम्पक, अशोक, पुन्नाग, मधूक, कटहल, असन और धूमरहित अग्नि-सी दीप्त पारिजात वृक्षों से शोभित थी; लोध्र, नीप, अर्जुन, नाग, सप्तपर्ण, अतिमुक्तक, मन्दार, कदली और लता-समूहों से भरी थी। सदा रमणीय पुष्पों-फलों, दिव्य गन्ध-रस वाले कोमल पल्लवों, मत्त भ्रमरों, कोकिलों और रंग-बिरंगे पक्षियों से सुशोभित वह वाटिका इन्द्र के नन्दन और ब्रह्मनिर्मित कुबेर के चैत्ररथ उद्यान-सी थी। वहाँ कितने ही वृक्ष स्वर्ण-से, कितने अग्निशिखा-से, और कितने नील अंजन-से दीप्त थे।
उस विस्तीर्ण अशोक-वाटिका में, जो अनेक आसन-गृहों और लता-गृहों से युक्त थी, श्रीराम पुष्पों से सजे सुन्दर आसन पर बैठे। उन्होंने अपने हाथ से सीता को मैरेयक-सी मधु पिलाई, जैसे इन्द्र शची को पिलाते हैं। सेवकों ने श्रीराम के भोजन के लिए शीघ्र ही राजोचित स्वादिष्ट व्यंजन और नाना फल लाए। अप्सराओं, नागकन्याओं और किन्नरियों से घिरी, नृत्य-गीत में निपुण रूपवती स्त्रियाँ पान के प्रभाव में श्रीराम के सम्मुख नृत्य करने लगीं। धर्मात्मा श्रीराम ने उन सबको प्रसन्न किया और सीता के साथ बैठे वे वैसे शोभित हुए जैसे अरुन्धती के साथ वसिष्ठ। इस प्रकार दिन-प्रतिदिन देवता के समान विहार करते हुए दोनों का बहुत समय व्यतीत हुआ और भोगप्रदायिनी शिशिर ऋतु बीत गई। पूर्वाह्न में धर्मानुसार धर्मकार्य करके श्रीराम शेष दिन अन्तःपुर में रहते; सीता भी देवपूजन करके बिना भेद के समस्त सासुओं की सेवा करतीं और रंग-बिरंगे आभूषण-वस्त्र पहनकर श्रीराम के पास वैसे आतीं जैसे शची इन्द्र के पास।

एक दिन श्रीराम ने अपनी पत्नी को कल्याणकारी लक्षणों (गर्भ के चिह्नों) से युक्त देखकर अतुल हर्ष पाया और बोले, “बहुत सुन्दर! बहुत सुन्दर!” फिर सुरकन्या-सी सुन्दर सीता से कहा, हे वैदेही, अब आप में सन्तान-प्राप्ति का समय उपस्थित हुआ है; बताइए, आपकी क्या इच्छा है, आपकी कौन-सी कामना पूरी की जाए? सीता ने मुसकराकर उत्तर दिया, हे राघव, मैं गंगातट पर बसे उग्रतेजस्वी, फल-मूल खाने वाले ऋषियों के पवित्र तपोवनों के दर्शन करना और उनके चरणों में रहना चाहती हूँ; मेरी परम कामना यह है कि मैं एक रात भी उन फल-मूल-भोजी मुनियों के तपोवन में निवास करूँ। श्रीराम ने “तथास्तु” कहकर वचन दिया, हे वैदेही, निश्चिन्त रहिए, आप निःसन्देह कल जाएँगी। यह कहकर श्रीराम मित्रों से घिरे मध्यकक्ष में चले गए।
सार: यह वाटिका-विहार का सुख-दृश्य ही उस करुण मोड़ की पृष्ठभूमि है जो अब आने वाला है। सीता गर्भवती हैं, उन्होंने स्वयं तपोवन-दर्शन की इच्छा प्रकट की, और यही निर्दोष इच्छा आगे चलकर श्रीराम के लिए वह आड़ बनेगी जिसके सहारे वियोग का कठोर निर्णय कार्यान्वित होगा।
भद्र का समाचार: प्रजा का अपवाद
वहाँ बैठे राजा श्रीराम के पास विदूषक और कथावाचक नाना प्रकार की हास्य-कथाएँ सुनाते थे। विजय, मधुमत्त, काश्यप, मंगल, कुल, सुराजि, कालिय, भद्र, दन्तवक्त्र और सुमागध, ये विनोदप्रिय जन हर्षपूर्वक श्रीराम को कथाएँ सुनाते थे। किसी कथा के बीच श्रीराम ने पूछा, हे भद्र, नगर और जनपद में क्या-क्या चर्चा हो रही है? लोग मेरे, सीता के, भरत के, लक्ष्मण के, शत्रुघ्न के और माता कैकेयी के विषय में क्या कहते हैं? वन में और राज्य में राजाओं की आलोचना होती ही है।
भद्र ने हाथ जोड़कर कहा, हे राजन्, नगरवासियों की चर्चाएँ शुभ ही हैं; मुख्यतः वे रावण-वध से अर्जित विजय की चर्चा करते हैं। श्रीराम ने कहा, जो कुछ है, उसे बिना कुछ छोड़े यथार्थ रूप से कहिए; नगरवासी कौन-से शुभ-अशुभ वचन कहते हैं? सुनकर मैं जो शुभ है उसे करूँगा और अशुभ से बचूँगा; निर्भय होकर, बिना किसी संकोच के बताइए कि पापी लोग नगर और जनपद में क्या कहते हैं। भद्र ने स्थिर मन से कहा, हे राजन्, सुनिए कि चौराहों, बाजारों, गलियों, वनों और उपवनों में नगरवासी क्या कहते हैं।

वे कहते हैं, श्रीराम ने समुद्र पर सेतु बाँधने का दुष्कर कार्य किया, जो पूर्वजों, देवताओं और दानवों ने भी कभी नहीं सुना; दुर्धर्ष रावण को सेना-वाहनों सहित मारा, वानरों-भालुओं और राक्षसों को वश में किया। किन्तु रावण को मारकर, सीता को लाकर, श्रीराम ने अमर्ष को पीछे रखकर उन्हें फिर अपने घर में बसा लिया। उन्हें सीता के साथ भोग से कैसा सुख मिलता है? जिस सीता को रावण ने पहले बलपूर्वक गोद में उठाकर हरा, जो लंका ले जाई गई, अशोक-वाटिका में रही, राक्षसों के वश में रही, उसकी श्रीराम निन्दा क्यों नहीं करते? अब हमारी स्त्रियों का ऐसा आचरण भी हमें सहना पड़ेगा, क्योंकि राजा जैसा करता है, प्रजा वैसा ही अनुसरण करती है। हे राजन्, इस प्रकार समस्त नगरों और जनपदों के लोग नाना प्रकार से ये बातें कहते हैं।
यह सुनकर श्रीराम परम आर्त-से होकर समस्त मित्रों से बोले, बताइए, क्या यह सचमुच ऐसा ही है? तब सब सिर से भूमि को छूकर, प्रणाम करके, दीन होकर बोले, निःसन्देह, यह ऐसा ही है। सबका कहा सुनकर शत्रुसूदन श्रीराम ने उन मित्रों को विदा कर दिया।
समझने की कुंजी (लोकापवाद): “अपवाद” का अर्थ है जनसाधारण में फैली निन्दा या मिथ्या लांछन। अग्नि-परीक्षा के बाद भी, और देवताओं की साक्षी के बाद भी, प्रजा का एक वर्ग सीता के लंका-निवास को लेकर लांछन फैलाता है। श्रीराम का संकट यह है कि वे जानते हैं सीता निर्दोष हैं, फिर भी एक राजा के रूप में उन्हें प्रजा की धारणा का सामना करना है।
सार: सुख के शिखर पर यह वह दरार है जो सब कुछ बदल देगी। प्रजा का यह अपवाद श्रीराम के मर्म को काटता है, यहीं से उत्तरकाण्ड की वह करुण-गाथा आरम्भ होती है जो श्रीराम के जीवन का परम कठिन धर्म-संकट है।
भाइयों का आह्वान
मित्रों को विदा करके और बुद्धि से निश्चय करके श्रीराम ने पास खड़े द्वारपाल से कहा, शीघ्र शुभलक्षण लक्ष्मण, महाभाग भरत और अपराजित शत्रुघ्न को बुला लाइए। द्वारपाल ने सिर पर हाथ जोड़कर लक्ष्मण के भवन जाकर प्रवेश किया और प्रणाम करके कहा, राजा आपको देखना चाहते हैं, वहाँ चलिए, विलम्ब न कीजिए। “बहुत अच्छा” कहकर लक्ष्मण रथ पर चढ़कर शीघ्र श्रीराम के भवन गए। फिर द्वारपाल ने भरत को और शत्रुघ्न को भी इसी प्रकार बुलाया; तीनों श्रीराम के पास पहुँचे। द्वारपाल ने आकर बताया कि सब भाई उपस्थित हैं।

कुमारों के आने का समाचार सुनकर चिन्ता से व्याकुल-इन्द्रिय, दीन-मन, नतमुख श्रीराम ने द्वारपाल से कहा, शीघ्र कुमारों को मेरे पास भेज दीजिए; मेरा जीवन इन्हीं पर टिका है, ये मेरे प्रिय प्राण हैं। राजा की आज्ञा पाकर श्वेत-वस्त्रधारी कुमार हाथ जोड़े, नतमस्तक होकर, स्थिर मन से भीतर आए। उन्होंने श्रीराम का मुख ग्रहलगे चन्द्रमा-सा, सन्ध्या के निस्तेज सूर्य-सा देखा; उनके बुद्धिमान् भ्राता के नेत्र अश्रुपूर्ण और मुख मुरझाए कमल-सा था। तुरन्त उन्होंने सिर झुकाकर श्रीराम के चरणों में प्रणाम किया और स्थिर खड़े हो गए, जबकि श्रीराम अश्रु बहाते रहे।
महाबली श्रीराम ने उन्हें भुजाओं से उठाकर आलिंगन किया और आसन पर बैठाकर कहा, हे नरेश्वरो, आप ही मेरा सर्वस्व हैं, आप ही मेरा जीवन हैं; आप द्वारा रचित राज्य का मैं केवल पालन कर रहा हूँ। आप शास्त्रों के अर्थ में पारंगत और बुद्धि में परिनिष्ठित हैं; मेरे इस प्रयोजन पर आप सब मिलकर विचार करें। यह सुनकर वे सब सावधान हो गए, और उद्विग्न मन से सोचने लगे कि राजा क्या कहेंगे।
सार: ग्रहण लगे चन्द्र-सा, निस्तेज सूर्य-सा श्रीराम का मुख, वाल्मीकि के ये उपमान बता देते हैं कि भीतर कितना बड़ा द्वन्द्व चल रहा है। जिस राजा को प्रजा निष्कलंक मानती थी, वही आज भाइयों के सामने अश्रु बहाता है, क्योंकि अब वह निर्णय कहने वाला है जो उसका हृदय चीर रहा है।
श्रीराम की आज्ञा: सीता का निर्वासन
दीन-मन से बैठे उन भाइयों से सूखे मुख वाले श्रीराम बोले, आप सब सुनिए, आपका कल्याण हो; अन्यथा मन न लाइए। नगरवासियों में सीता को लेकर जैसी चर्चा है, वह बताता हूँ। नगरवासियों और जनपद का यह अत्यन्त बड़ा, घृणित अपवाद मुझ में फैला है, और वह मेरे मर्म को काटता है। मैं इक्ष्वाकु महात्माओं के कुल में उत्पन्न हूँ और सीता भी महात्मा जनकों के सत्कुल में जन्मीं। हे सौम्य, आप जानते ही हैं कि दण्डक के निर्जन वन से रावण ने सीता का हरण किया और मैंने उसका विनाश किया। तब मेरे मन में जनकपुत्री के प्रति यह विचार उठा कि लंका में रावण के साथ रही इस सीता को मैं नगर में कैसे लाऊँ।
हे सौमित्र, अपनी शुद्धि के प्रमाण के लिए तब सीता आपके सामने अग्नि में प्रविष्ट हुई थीं। हव्यवाहन अग्नि ने मैथिली को निष्पाप कहा; आकाशचारी वायु ने भी, चन्द्र और सूर्य ने भी देवताओं की सन्निधि में, और समस्त ऋषियों के सम्मुख जनकात्मजा को निष्पाप घोषित किया। शुद्ध-आचरण वाली सीता देव-गन्धर्वों की सन्निधि में, लंका में महेन्द्र द्वारा मेरे हाथ में सौंपी गईं; मेरी अन्तरात्मा भी जानती है कि सीता शुद्ध और यशस्विनी हैं। तब वैदेही को लेकर मैं अयोध्या आया। किन्तु अब मेरे हृदय में यह महान् लोकवाद और शोक है; नगरवासियों और जनपद का यह अत्यन्त बड़ा अपवाद है। जिस किसी प्राणी का अपयश लोक में गाया जाता है, जब तक वह अपयश-शब्द कहा जाता रहे, तब तक वह अधम लोकों में गिरता है। अपयश की देवता निन्दा करते हैं और कीर्ति लोकों में पूजित होती है।
हे पुरुषश्रेष्ठो, समस्त महात्मा कीर्ति के लिए ही उद्योग करते हैं; अपवाद के भय से मैं अपने प्राण या आप सबको भी त्याग सकता हूँ, फिर जनकात्मजा को त्यागना तो क्या! आप मुझे शोक-सागर में डूबा देखें, इससे अधिक दुःख मुझे और कोई नहीं दीखता। हे सौमित्र, कल प्रातः आप सुमन्त्र द्वारा हाँके रथ पर सीता को बिठाकर राज्य की सीमा से बाहर छोड़ आइए। गंगा के उस पार महात्मा वाल्मीकि का दिव्य-सा आश्रम तमसा के तीर पर है; हे रघुनन्दन, उस निर्जन प्रदेश में, उस आश्रम के समीप, इसे छोड़कर शीघ्र लौट आइए। मेरा वचन कीजिए, और सीता के विषय में मुझे प्रत्युत्तर मत दीजिए।
अतः आप जाइए, इसमें कोई विचार न कीजिए; आपके द्वारा इसका निवारण मुझे परम अप्रिय होगा। मैं आप सबको अपने चरणों और जीवन की शपथ देता हूँ कि जो मुझे बीच में कुछ कहकर समझाने का प्रयत्न करेगा, वह मेरा अहितकारी ही होगा, क्योंकि वह मेरे अभीष्ट का विघात करेगा। यदि आप मेरी आज्ञा में स्थित होकर मेरा मान रखते हैं, तो आज ही सीता को यहाँ से ले जाइए। इसने पहले मुझसे कहा था कि “मैं गंगातट के आश्रम देखना चाहती हूँ”, अब इसकी यही कामना पूरी हो जाए। यह कहकर अश्रुओं से ढके नेत्रों वाले धर्मात्मा श्रीराम भाइयों से घिरकर, शोक से व्याकुल हृदय लिए, हाथी-से लम्बी साँसें भरते हुए अपने अन्तःपुर में चले गए।
समझने की कुंजी (राजधर्म बनाम पतिधर्म): यह श्रीराम के जीवन का परम कठिन धर्म-संकट है। वे जानते हैं सीता निर्दोष हैं, उनकी अन्तरात्मा और देवताओं तक की साक्षी इसका प्रमाण है। फिर भी एक राजा का धर्म है कि वह प्रजा के विश्वास और आदर्श को अक्षुण्ण रखे, क्योंकि “राजा जैसा करता है, प्रजा वैसा ही अनुसरण करती है।” यहाँ पति-राम और राजा-राम के बीच का द्वन्द्व अपने चरम पर है, और राजधर्म जीतता है, पर उसकी कीमत श्रीराम के हृदय का शोक-सागर है।
सार: यह वाल्मीकि-रामायण का परम विवादास्पद और गहरे-से-गहरा करुण निर्णय है। श्रीराम भाइयों को शपथ दे देते हैं कि कोई उन्हें रोके नहीं, मानो वे जानते हों कि यदि एक क्षण भी रुके तो हृदय निर्णय को टाल देगा। निर्वासन की आज्ञा देकर वे टूटे हुए हाथी-से साँस भरते भीतर चले जाते हैं।
लक्ष्मण सीता को लेकर वन की ओर
रात बीतने पर दीन-चेतना, सूखे मुख वाले लक्ष्मण ने सुमन्त्र से कहा, हे सारथे, श्रेष्ठ रथ में शीघ्रगामी घोड़े जोतकर उसमें सीता के लिए सुन्दर आसन सजाइए; राजा की आज्ञा से सीता को पुण्यकर्मा महर्षियों के आश्रम ले जाना है, अतः शीघ्र रथ ले आइए। सुमन्त्र “तथास्तु” कहकर श्रेष्ठ घोड़ों से जुता, सुख-शय्या से सज्जित रथ ले आए और लक्ष्मण से बोले, हे प्रभो, रथ आ गया, जो कार्य हो उसे कीजिए।
तब लक्ष्मण राजभवन में प्रवेश कर सीता के पास जाकर बोले, हे देवि, आपने राजा (श्रीराम) से आश्रम-दर्शन का वर माँगा था; राजा ने स्वीकार करके मुझे आज्ञा दी है कि मैं आपको आश्रमों तक ले चलूँ। हे वैदेही, हमारे राजा के शासन से शीघ्र चलकर, गंगातट पर ऋषियों के शुभ आश्रमों में, मुनियों से सेवित अरण्य में आप पधारें। यह सुनकर महात्मा लक्ष्मण के वचनों से वैदेही को अतुल हर्ष हुआ और उन्होंने जाने की इच्छा की। वे महामूल्य वस्त्र और नाना रत्न लेकर बोलीं, ये आभूषण और महामूल्य रत्न मैं मुनिपत्नियों को दूँगी। लक्ष्मण ने उनकी इच्छा का अनुमोदन किया और मैथिली को रथ में बिठाकर, श्रीराम की आज्ञा का स्मरण करते हुए शीघ्रगामी घोड़ों से चल दिए।

मार्ग में सीता ने लक्ष्मीवर्धन लक्ष्मण से कहा, हे रघुनन्दन, मुझे अनेक अशुभ लक्षण दीखते हैं; मेरा दाहिना नेत्र फड़कता है, अंग काँपते हैं, हृदय अस्वस्थ-सा लगता है, परम उत्कण्ठा और अधीरता मुझे घेर रही है। हे पृथुलोचन, पृथ्वी शून्य-सी दीखती है। हे भ्रातृवत्सल वीर, आपके भ्राता का कल्याण हो; मेरी समस्त सासुओं का और नगर-जनपद के समस्त प्राणियों का भी कुशल हो। इस प्रकार हाथ जोड़कर सीता ने देवताओं से प्रार्थना की। लक्ष्मण ने सिर झुकाकर मैथिली को प्रणाम किया और सूखे हृदय से “कल्याण हो” कहकर मानो प्रसन्न होने का प्रयत्न किया।
गोमती-तट के आश्रम में रात बिताकर, प्रातः उठकर लक्ष्मण ने सारथि से कहा, शीघ्र रथ जोतिए; मैं भागीरथी का जल त्र्यम्बक शिव के समान सिर पर धारण करूँगा। सारथि ने मनोवेगी घोड़े जोतकर सीता को रथ पर चढ़ने को कहा; विशालाक्षी सीता रथ पर चढ़ीं और लक्ष्मण तथा बुद्धिमान् सुमन्त्र के साथ पापनाशिनी गंगा के पास पहुँचीं। आधा दिन चलकर भागीरथी के जलाशय को देखकर दीन लक्ष्मण ऊँचे स्वर में रो पड़े।

धर्मज्ञा सीता ने आतुर लक्ष्मण को देखकर कहा, आप यह क्यों रोते हैं? जिस गंगातट पर आने की मेरी चिर-अभिलाषा थी, उस हर्ष के समय आप मुझे विषादग्रस्त क्यों करते हैं? हे पुरुषर्षभ, आप सदा राम के पास रहते हैं; क्या उनसे केवल दो रात्रि के वियोग से ही आप शोकग्रस्त हो गए? राम मुझे भी प्राणों से भी प्रिय हैं, पर मैं ऐसा शोक नहीं करती; आप भी ऐसे बालिश न बनिए। मुझे भी कमल-नयन, सिंह-वक्ष, कृशोदर राम के दर्शन की उत्कण्ठा है। तब लक्ष्मण ने नेत्र पोंछकर नाविकों को बुलाया; उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, नौका तैयार है। गंगा पार करने की इच्छा से लक्ष्मण ने शुभ नौका पर चढ़कर, सावधान होकर सीता को गंगा पार कराई।
सार: यह यात्रा-प्रसंग करुणा से भारी है, क्योंकि सीता को सत्य का तनिक भी आभास नहीं। वे हर्षित हैं कि आश्रम-दर्शन की कामना पूरी हो रही है, और रोते हुए लक्ष्मण को सान्त्वना देती हैं, जबकि लक्ष्मण उस भार से दबे हैं जिसे वे कह नहीं पाते। अशुभ शकुन और सीता की निर्दोष प्रसन्नता, दोनों एक साथ चलते हैं।
गंगा पार: लक्ष्मण सत्य कहते हैं
राघव के अनुज लक्ष्मण ने निषाद की लाई विस्तीर्ण, सुसज्जित नौका पर पहले मैथिली को बिठाकर स्वयं चढ़े। उन्होंने सुमन्त्र को रथ सहित उस तट पर रुकने को कहा और नाविक को नौका खेने का आदेश दिया। भागीरथी के दूसरे तट पर पहुँचकर अश्रुओं से ढके लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर मैथिली से कहा, हे जनकात्मजे, इस कार्य से मेरा हृदय एक महान् शल्य से बिंध गया है, जिसके निमित्त मैं लोक में निन्दनीय बनाया गया। हे लोकनिन्दित कार्य, इससे तो मेरे लिए आज मरण या उससे भी कठिन कोई मृत्यु श्रेयस्कर थी; मुझे इस लोक-निन्दित कार्य में नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए था। हे शोभने, इसमें मेरा दोष न मानिए। यह कहकर लक्ष्मण हाथ जोड़े भूमि पर गिर पड़े।

रोते, हाथ जोड़े, अपनी मृत्यु चाहते हुए लक्ष्मण को देखकर अत्यन्त उद्विग्न मैथिली ने कहा, यह क्या है, मैं समझ नहीं पाती; लक्ष्मण, यथार्थ बताइए। न आप स्वस्थ दीखते हैं, न राजा कुशल जान पड़ते हैं। राजा ने आपको शपथ दी है जिससे आप सन्ताप में हैं; आप मेरे सम्मुख वह सत्य कहिए, मैं आपको आज्ञा देती हूँ। वैदेही द्वारा प्रेरित दीन-चेतना लक्ष्मण नतमुख, अश्रु से रुँधे गले से बोले, हे जनकात्मजे, परिषद् के बीच आपके विषय में अत्यन्त कठोर अपवाद सुनकर, नगर और जनपद के निमित्त सन्तप्त-हृदय श्रीराम मुझे यह सौंपकर भवन में चले गए। राजा के हृदय में अमर्ष से बिंधे वे वचन आपके सम्मुख कहने योग्य नहीं, अतः मैं नहीं कहता। हे निर्दोष देवि, अपवाद-भय से भीत राजा ने आपको त्यागा है, यद्यपि देवताओं ने मेरी ही सन्निधि में आपको निर्दोष घोषित किया था; इसे अन्यथा न लीजिए।
राजा की आज्ञा और गर्भवती का दौर्हृद (इच्छा) मानकर मुझे आपको आश्रम के समीप छोड़ना है। यह जाह्नवी-तट ब्रह्मर्षियों का पवित्र, रमणीय तपोवन है। हे शुभे, विषाद न कीजिए; यहाँ महायशस्वी ब्रह्मर्षि वाल्मीकि निवास करते हैं, जो मेरे पिता राजा दशरथ के परम मित्र और मुनियों में श्रेष्ठ हैं। उनके चरणों की शरण लेकर, उपवास और एकाग्रता से राम का स्मरण करती हुई, पातिव्रत्य धारण करके, राम को सदा हृदय में रखती हुई आप निवास कीजिए; ऐसा करने से आपका परम कल्याण होगा।
एक उप-कथा (वाल्मीकि और दशरथ की मित्रता): वाल्मीकि यहाँ एक मार्मिक संयोग रचते हैं, जिस आश्रम में सीता का निर्वासन होता है, उसके स्वामी ऋषि वाल्मीकि श्रीराम के पिता दशरथ के परम मित्र हैं। और यही वाल्मीकि इस सम्पूर्ण रामायण के रचयिता हैं। निर्वासित सीता उसी कवि की शरण में जाती हैं जो उनकी और उनके पुत्रों की कथा को अमर करेगा।
सार: सत्य का यह क्षण रामायण के गहरे-से-गहरे हृदयविदारक संवादों में है। लक्ष्मण इस कार्य को अपने जीवन का परम बड़ा शल्य कहते हैं, मरण को इससे श्रेयस्कर बताते हैं। और सीता, जो अभी तक हर्षित थीं, को एक ही वाक्य में अपने निर्वासन का सत्य ज्ञात हो जाता है।
सीता का विलाप और श्रीराम के लिए सन्देश
लक्ष्मण के कठोर वचन सुनकर जनकात्मजा परम विषाद में पड़कर मूर्छित-सी भूमि पर गिर पड़ीं। एक मुहूर्त बाद अश्रुपूर्ण नेत्रों से, दीन वाणी में बोलीं, हे लक्ष्मण, निश्चय ही मेरा यह शरीर विधाता ने दुःख के लिए ही रचा है, जो आज दुःख की मूर्ति-सा दीखता है। मैंने पूर्व में कौन-सा पाप किया था, किसको उसकी पत्नी से वियुक्त किया था, जो मैं शुद्ध-आचरण वाली सती होकर भी राजा द्वारा त्यागी गई? पहले मैं राम के चरणों का अनुसरण करती हुई आश्रम-निवास की इच्छा करती थी, उस दुःख में भी मैं उनके साथ रहती; अब उस आश्रम में अकेली, निर्जन में मैं कैसे रहूँगी? ऋषि पूछेंगे तो किसको अपना दुःख बताऊँगी, कौन-सा अपकर्म बताऊँगी, किस कारण महात्मा राघव ने मुझे त्यागा?

हे सौमित्र, मैं आज ही गंगाजल में अपने प्राण नहीं त्यागती, क्योंकि उससे मेरे पति का राजवंश भंग हो जाएगा (होने वाली सन्तान नष्ट हो जाएगी)। हे सौमित्र, आप राजा की आज्ञा का पालन कीजिए, मुझ दुःखभागिनी को छोड़ दीजिए; पर मेरा यह वचन सुन लीजिए। मेरी सब सासुओं को बिना भेद के हाथ जोड़कर, सिर से प्रणाम करके कुशल कहना। और धर्म में सुस्थिर राजा से मेरा यह सन्देश कहना, हे रघुनन्दन, जैसे आपको नगरवासियों का अपवाद दूर करना आवश्यक है, उसी प्रकार पत्नी का भी धर्म है; पति ही स्त्री का देवता, बन्धु और गुरु है, अतः प्राणों से भी पति का प्रिय करना चाहिए।
राजा से कहना, जैसे आप भाइयों के साथ बरतते हैं, वैसे ही सदा प्रजा के साथ बरतें; यही परम धर्म है और इसी से अनुपम कीर्ति होगी। प्रजा के प्रति धर्मपूर्वक किए गए व्यवहार से जो फल मिलेगा, वही आपके लिए श्रेष्ठ होगा। हे नरर्षभ, मैं अपने शरीर का शोक नहीं करती; आप जिस अपवाद-भय से मुझे त्याग रहे हैं, हे राजन्, मैं वह अपवाद ही दूर करूँगी, क्योंकि आप मेरी परम गति हैं। यह सब आप संक्षेप में राम से कह देना। आपने अपने नेत्रों से देखा है कि मैं गर्भवती हूँ।

यह सुनकर दीन लक्ष्मण सिर से भूमि को प्रणाम करके कुछ कह न सके; एक मुहूर्त विचार कर, बार-बार रोते हुए सीता की प्रदक्षिणा करके बोले, हे शुभे, हे अनघे, मैंने आपका रूप कभी नहीं देखा, केवल आपके चरण ही मेरी दृष्टि के विषय रहे हैं; अब आपको राम से रहित इस वन में मैं कैसे देखूँ? यह कहकर, उन्हें नमस्कार करके लक्ष्मण नौका पर चढ़े, नाविक को खेने को कहा, और उत्तर तट पर पहुँचकर, शोक के भार से दबे, मूढ़-से होकर शीघ्र रथ पर चढ़े; बार-बार मुड़कर अनाथ-सी सीता को देखते हुए वे चल पड़े।
दूर जाते रथ और लक्ष्मण को बार-बार देखती, उद्विग्न सीता को शोक ने घेर लिया। दुःख के भार से झुकी, यशस्विनी, पतिव्रता सीता अपने नाथ को न देखती हुई मोर के स्वर से गूँजते उस वन में ऊँचे स्वर में रोने लगीं।
सार: सीता के इस विलाप की महानता उनके सन्देश में है। त्यागी जाकर भी वे श्रीराम पर दोष नहीं मढ़तीं; उल्टे राजा को राजधर्म का स्मरण कराती हैं, “जैसे भाइयों के साथ, वैसे प्रजा के साथ रहें।” वे आत्महत्या इसलिए नहीं करतीं कि गर्भस्थ राजवंश नष्ट न हो। लक्ष्मण का यह कहना कि उन्होंने कभी सीता का रूप नहीं देखा, केवल चरण देखे, देवर के निर्मल भाव का परम प्रमाण है।
वाल्मीकि का आश्रय

आश्रम के मुनिबालकों ने सीता को रोते देखा और तप से प्राप्त दिव्यदृष्टि वाले भगवान् वाल्मीकि के पास दौड़कर गए। मुनिपुत्रों ने महर्षि के चरण छूकर निवेदन किया, हे भगवन्, नदी के तट पर पहले कभी न देखी हुई कोई श्रेष्ठ स्त्री, किसी महात्मा की पत्नी, लक्ष्मी-सी, विकृत मुख से शोकाकुल होकर अकेली रो रही है। वह इतने दुःख के योग्य नहीं और अनाथ-सी नहीं रहनी चाहिए; हमें वह मनुष्यनी नहीं जान पड़ती। वह आश्रम से दूर नहीं, आपकी शरण आई है और रक्षक चाहती है, आप उसकी रक्षा कीजिए। यह सुनकर धर्मवेत्ता वाल्मीकि, जो तप से सब कुछ पहले से जानते थे, अर्घ्य लेकर, शिष्यों सहित, नंगे पैर शीघ्र गंगातट पहुँचे और राघव की निराश्रित-सी पत्नी सीता को विलाप करते देखा।
तपोबल से जिनका हृदय शीतल हो रहा था, ऐसे मुनिपुंगव वाल्मीकि ने शोकार्त सीता से मधुर वाणी में कहा, आप दशरथ की पुत्रवधू, राम की प्रिय महिषी और राजा जनक की पुत्री हैं; हे पतिव्रते, आपका स्वागत है। धर्मसमाधि से मैंने आपके आने को पहले ही जान लिया था; इसका कारण भी मेरे हृदय में लक्षित हो चुका है। हे महाभागे, आपकी शुद्धि मुझे यथार्थ रूप से ज्ञात है; त्रैलोक्य में जो कुछ है, सब मुझे ज्ञात है। तप से प्राप्त नेत्र से मैं आपको निष्पाप जानता हूँ। हे वैदेही, निःशंक हो जाइए; अब आप मेरे संरक्षण में हैं। आश्रम के समीप तप में लगी तापसी स्त्रियाँ हैं; हे वत्से, वे आपको पुत्री-सा सदा पालेंगी। यह अर्घ्य स्वीकार कीजिए, निश्चिन्त, निर्भय हो जाइए; मानो अपने ही घर आई हों, विषाद न कीजिए। यह परम अद्भुत वचन सुनकर सीता ने सिर से प्रणाम करके, हाथ जोड़कर “तथास्तु” कहा।
आश्रम जाते मुनि के पीछे सीता हाथ जोड़े चलीं। मुनि को आते देख मुनिपत्नियाँ हर्ष से उनके स्वागत को आईं और बोलीं, हे मुनिश्रेष्ठ, आपका स्वागत है; आप बहुत समय बाद आए; हम सब आपको प्रणाम करती हैं, कहिए, हम क्या करें? वाल्मीकि ने कहा, यह राम की पत्नी, दशरथ की पुत्रवधू, जनक की सती पुत्री सीता आई है। यह निष्पाप है, पति द्वारा त्यागी गई है, और सदा मेरे संरक्षण में रहेगी। आप सब इसे परम स्नेह से देखें; जो आदर मुझे देती हैं, वही इसे दें, यह विशेष रूप से आप सबके आदर के योग्य है। इस प्रकार सीता को तापसी स्त्रियों को बार-बार सौंपकर महायशस्वी, महातपस्वी ऋषि वाल्मीकि शिष्यों सहित अपने आश्रम लौट गए।
सार: वाल्मीकि का आश्रय सीता के लिए मातृ-गृह-सा है। ऋषि तप से सब कुछ जानते हैं, सीता की शुद्धि और उनके आने का कारण भी, इसलिए वे बिना एक भी प्रश्न पूछे उन्हें अपनी पुत्री-सा स्थान देते हैं। यहीं सीता के दोनों पुत्र (लव-कुश) जन्म लेंगे और यहीं रामायण की रचना होगी।
लक्ष्मण और सुमन्त्र का संवाद: नियति की झलक
सीता को आश्रम में प्रविष्ट देखकर दीन-चेतना लक्ष्मण घोर सन्ताप में पड़ गए और कुशल सारथि सुमन्त्र से बोले, हे सारथे, सीता-वियोग से उत्पन्न श्रीराम का दुःख देखिए। शुद्ध-आचरण वाली अपनी पत्नी जनकात्मजा को त्यागने से अधिक दुःख राघव के लिए और क्या होगा? मैं स्पष्ट जानता हूँ कि वैदेही से राघव का यह वियोग दैव से ही है; दैव सदा दुरतिक्रम है। जो राघव क्रुद्ध होकर गन्धर्वों सहित देवताओं और राक्षसों सहित असुरों का नाश कर सकते हैं, वे भी दैव के अधीन हैं। पहले पिता के वचन से राम चौदह वर्ष दण्डक के निर्जन वन में रहे; अब नगरवासियों के क्रूर वचन सुनकर सीता का पुनः निर्वासन उससे भी कठिन प्रतीत होता है। हे सूत, नगरवासियों की हीन बातों के कारण सीता को निर्वासित करने के इस यश-हारक कार्य में कौन-सा धर्म-आश्रय है?
लक्ष्मण के ये नाना वचन सुनकर प्राज्ञ सुमन्त्र ने श्रद्धापूर्वक कहा, हे सौमित्र, सीता के विषय में आपको सन्ताप नहीं करना चाहिए; यह तो आपके पिता के सामने ब्राह्मणों (ज्योतिषियों) ने पहले ही देख लिया था। राम निश्चय ही दुःखप्राय और सुखहीन होंगे, और शीघ्र ही प्रियजनों से वियोग पाएँगे। धर्मात्मा महान् राम बहुत समय बाद आपको, मैथिली को, शत्रुघ्न और भरत को भी त्याग देंगे, ऐसी भविष्यवाणी थी। हे सौमित्र, दुर्वासा ने राजा के सामने जो वचन कहा था, वह आपको या भरत को बताने योग्य नहीं था; वह ऋषि का वचन महाजनसमूह, मेरे और वसिष्ठ की सन्निधि में कहा गया था। ऋषि के वचन सुनकर राजा दशरथ ने मुझसे कहा था, हे सूत, मेरे जनों के बीच कहीं भी यह न कहना। उस लोकपाल राजा के वचन को मैं कभी झूठा न करूँगा, यह मेरा निश्चय है। हे सौम्य, आपके सम्मुख भी मुझे यह सर्वथा न कहना चाहिए, किन्तु यदि आपको सुनने की श्रद्धा है तो सुनिए। यद्यपि राजा ने वह रहस्य पहले मुझे सुनाया था, तथापि मैं कहूँगा, क्योंकि दैव दुरतिक्रम है। यह शोक-युक्त दुःख जिस दैव से आया है, उसे आप भरत और शत्रुघ्न के सामने न कहना। उस गम्भीर अर्थ वाले महान् वचन को सुनकर सौमित्र ने सूत से कहा, सत्य कहिए।
सार: लक्ष्मण की वेदना का उत्तर सुमन्त्र दैव के रहस्य से देते हैं। यह वियोग आकस्मिक नहीं, इसकी भविष्यवाणी दुर्वासा ऋषि ने राजा दशरथ के समय ही कर दी थी। वाल्मीकि यहाँ करुण घटनाओं को एक बड़े नियति-चक्र में जोड़ते हैं, ताकि श्रीराम का कठोर निर्णय भी एक पूर्वनिर्धारित विधान का अंश दीखे।
भृगु का शाप: विष्णु का मनुष्य-जन्म
लक्ष्मण द्वारा प्रेरित सूत ने ऋषि दुर्वासा का कहा वचन सुनाना आरम्भ किया, पूर्वकाल में अत्रिपुत्र दुर्वासा नामक महामुनि वर्षाकाल के चार मास वसिष्ठ के पवित्र आश्रम में रहे। आपके महायशस्वी पिता दशरथ पुरोहित वसिष्ठ के दर्शन को स्वयं वहाँ गए। उन्होंने वसिष्ठ के बायीं ओर बैठे, सूर्य-से तेजस्वी महामुनि दुर्वासा को देखा और दोनों तापसश्रेष्ठ मुनियों को विनयपूर्वक प्रणाम किया। दोनों ने राजा का स्वागत, आसन, पाद्य, फल-मूल से सत्कार किया। मध्याह्न में जब परम ऋषियों के बीच मधुर कथाएँ हुईं, तो राजा ने हाथ जोड़कर अत्रिपुत्र दुर्वासा से पूछा, हे भगवन्, मेरा वंश कब तक रहेगा? राम कितने आयु के होंगे, अन्य पुत्रों की आयु कितनी होगी, और राम के जो पुत्र होंगे उनकी आयु कितनी होगी? मेरी इच्छा है कि आप मेरे इस वंश की गति बताएँ।
राजा दशरथ का यह वचन सुनकर महातेजस्वी दुर्वासा कहने लगे, हे राजन्, सुनिए, पूर्व में देवासुर-संग्राम में जो हुआ था वह सुनिए। देवताओं द्वारा भर्त्सना किए गए दैत्य भृगुपत्नी की शरण गए और उसके दिए अभय से वहाँ निर्भय होकर रहने लगे। उन्हें अपनी पत्नी द्वारा संरक्षित देखकर क्रुद्ध सुरेश्वर विष्णु ने तीक्ष्ण-धार चक्र से भृगुपत्नी का सिर काट डाला। अपनी पत्नी का वध देखकर क्रुद्ध भृगु ने सहसा शत्रुकुलनाशक विष्णु को शाप दिया, जैसे आपने क्रोध में मूर्छित होकर मेरी अवध्य पत्नी का वध किया, वैसे ही, हे जनार्दन, आप मनुष्यलोक में जन्म लेंगे; वहाँ बहुत वर्षों तक पत्नी का वियोग पाएँगे।
तब आत्मानुभाव से सम्पन्न विष्णु शाप से चित्त-विकल हुए। शाप से पीड़ित भृगु ने उस देव की आराधना की; भक्तवत्सल देव ने तप से आराधित होकर लोकों के हित के लिए वह शाप ग्रहण कर लिया। हे राजन्, इस प्रकार पूर्वजन्म में भृगु द्वारा शापित वे महातेजस्वी विष्णु ही यहाँ आपके पुत्रत्व को प्राप्त हुए हैं और तीनों लोकों में “राम” नाम से विख्यात हैं। उसी शाप का वह महान् फल (सीता-वियोग) वे भोगेंगे। राम दीर्घकाल तक अयोध्या के अधिपति रहेंगे, दस सहस्र वर्ष और दस सौ वर्ष राज्य भोगकर, अनेक समृद्ध अश्वमेध करके, अनेक राजवंश स्थापित करके, अन्त में ब्रह्मलोक जाएँगे। राघव के सीता से दो पुत्र होंगे; उन दोनों पुत्रों का राघव अभिषेक करेंगे, किन्तु अयोध्या में नहीं, अन्यत्र, ऐसा मुनि का वचन है। यह सब बताकर महातेजस्वी महामुनि दुर्वासा मौन हो गए, और राजा दशरथ दोनों महात्माओं को प्रणाम करके अयोध्या लौट आए।
सुमन्त्र ने कहा, मुनि का कहा यह वचन मैंने सुना और हृदय में धारण किया; यह अन्यथा न होगा। इस स्थिति में, हे राघव, आपको सन्ताप नहीं करना चाहिए; सीता या राघव के लिए, हे नरोत्तम, दृढ़ रहिए। सूत का यह परम अद्भुत वचन सुनकर लक्ष्मण को अतुल हर्ष हुआ और वे “साधु-साधु” कह उठे। इस प्रकार सूत और लक्ष्मण के मार्ग में बातें करते-करते सूर्य अस्ताचल पहुँचा और दोनों ने केशिनी नदी के तट पर रात्रि-विश्राम किया।
समझने की कुंजी (भृगु-शाप): यह उपकथा सीता-वियोग को एक गहरे पौराणिक कारण से जोड़ती है। भृगुपत्नी के वध के कारण भृगु ने विष्णु को शाप दिया कि वे मनुष्य-रूप में जन्म लेकर पत्नी-वियोग सहेंगे। श्रीराम विष्णु के ही अवतार हैं, अतः सीता-वियोग उस प्राचीन शाप का फल है। आधुनिक समतुल्य: “दस सहस्र और दस सौ वर्ष” अर्थात् ग्यारह हजार वर्ष का राज्य, यह दीर्घ, आदर्श शासन का प्रतीक है।
एक उप-कथा: यह भृगु-शाप वाली कथा वैष्णव परम्परा में विष्णु के अनेक अवतारों का कारण बताई जाती है। ध्यान दें कि वाल्मीकि इसे दुर्वासा के मुख से, राजा दशरथ की सभा में कही गई भविष्यवाणी के रूप में रखते हैं, अर्थात् कथा के भीतर ही कथा। यह वाल्मीकि की इतिहास-रचना की एक विशेषता है: करुण घटना को नियति के विधान में पिरोना।
लक्ष्मण का लौटना और श्रीराम की सान्त्वना
केशिनी-तट पर रात बिताकर लक्ष्मण प्रातः उठकर अयोध्या की ओर चले। मध्याह्न में रत्नसम्पन्न, हृष्ट-पुष्ट जनों से भरी अयोध्या में महारथी लक्ष्मण ने प्रवेश किया। श्रीराम के चरणों के पास जाकर “मैं क्या कहूँगा” यह सोचते हुए वे परम दीनता को प्राप्त हुए। चन्द्र-सा सौम्य, परम उदार श्रीराम का भवन उनके सम्मुख आया। नतमुख, दीन-मन लक्ष्मण बिना रोक-टोक भीतर गए और श्रेष्ठ आसन पर बैठे दीन, अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले ज्येष्ठ भ्राता को देखा। उनके चरण पकड़कर, किसी प्रकार स्वयं को सँभालकर, हाथ जोड़कर दीन वाणी में बोले, हे वीर, आपकी आज्ञा को आगे रखकर, शुद्ध-आचरण वाली, पतिव्रताओं में विख्यात जनकात्मजा सीता को गंगातट पर वाल्मीकि के शुभ आश्रम में, यथानिर्दिष्ट छोड़कर, मैं आपके चरणों की सेवा में पुनः लौट आया हूँ।
तब लक्ष्मण ने श्रीराम को सान्त्वना दी, हे पुरुषव्याघ्र, शोक न कीजिए; काल की गति ऐसी ही है। आप जैसे बुद्धिमान्, मनस्वी जन शोक नहीं करते। समस्त संचय क्षय में, उन्नतियाँ पतन में, संयोग वियोग में और जीवन मरण में समाप्त होते हैं; अतः पुत्र, पत्नी, मित्र और धन में अत्यन्त आसक्ति उचित नहीं, क्योंकि इनसे वियोग निश्चित है। आप मन से ही मन को, और समस्त लोकों को वश में करने में समर्थ हैं; फिर अपने लिए यह शोक क्यों? हे राघव, जिस अपवाद-भय से आपने मैथिली को त्यागा, वह अपवाद भी फिर नगर में लौट आएगा, इसमें सन्देह नहीं। आप जैसे पुरुषश्रेष्ठ ऐसे विषयों में मोहित नहीं होते। अतः हे पुरुषशार्दूल, धैर्य से सावधान होकर इस दुर्बल बुद्धि को त्याग दीजिए और सन्ताप न कीजिए।
महात्मा लक्ष्मण के इस वचन से मित्रवत्सल कुलनन्दन श्रीराम परम प्रीति से बोले, हे नरश्रेष्ठ लक्ष्मण, ऐसा ही है जैसा आप कहते हैं; मेरे कार्य के अनुशासन में ही मेरा परितोष है। हे सौम्य, आपके सुन्दर वचनों से मेरी निवृत्ति हुई, सन्ताप दूर हुआ; मैं फिर अपना आपा पा गया।
सार: यहाँ भूमिकाएँ पलट जाती हैं, जो लक्ष्मण गंगातट पर टूट गए थे, वही अब अनित्यता का दर्शन देकर श्रीराम को सँभालते हैं। “संचय क्षय में, उन्नति पतन में, संयोग वियोग में, जीवन मरण में समाप्त होता है”, यह वैराग्य-सूत्र शोक के बीच भी श्रीराम को पुनः कर्तव्य में स्थिर करता है।
राजा नृग की कथा: प्रजा-कार्य की उपेक्षा का दण्ड
लक्ष्मण के परम अद्भुत वचन सुनकर सुप्रसन्न श्रीराम बोले, हे सौम्य, इस समय आप जैसा बुद्धिमान्, मेरे मन का अनुगामी बन्धु दुर्लभ है। मेरे हृदय में जो कुछ है उसे कहता हूँ, सुनकर मेरा वचन करना। हे सौम्य, चार दिन बीत गए और मैंने प्रजा का कार्य नहीं किया; यह उपेक्षा मेरे मर्म को काटती है। मेरी प्रजा, पुरोहित, मन्त्री, और कार्य-अर्थी स्त्री-पुरुष बुलाए जाएँ। जो राजा प्रतिदिन प्रजा का कार्य नहीं करता, वह घोर संवृत (वायुहीन) नरक में निःसन्देह गिरता है।
श्रीराम ने एक कथा सुनाई, पूर्वकाल में नृग नाम का महायशस्वी, ब्रह्मण्य, सत्यवादी, शुचि राजा हुआ। उसने एक बार पुष्कर तीर्थ में सोने से सजी, बछड़ों सहित करोड़ों गौएँ ब्राह्मणों को दान कीं। उन गौओं के समूह में एक दरिद्र, अग्निहोत्री, उञ्छवृत्ति (गिरे हुए दाने बीनकर जीने वाले) ब्राह्मण की बछड़े सहित गौ भी छू गई और दान में दे दी गई। भूख से पीड़ित वह ब्राह्मण उस खोई गौ को अनेक वर्षों तक सब राज्यों में खोजता रहा पर न पाया। अन्ततः कनखल जाकर उसने एक ब्राह्मण के घर अपनी निरोग गौ को पूर्ण बछड़े सहित देखा। उसने अपनी गौ को उसके नाम “शबला” से पुकारा; गौ ने स्वर पहचाना और अग्नि-से तेजस्वी भूखे ब्राह्मण के पीछे चल पड़ी। जिस ब्राह्मण ने उसे पाला था, वह भी शीघ्र पीछे आया और ऋषि से कहा, यह मेरी गौ है। दूसरे ने कहा, यह गौ राजसिंह नृग ने मुझे छूकर दी थी। दोनों विद्वान् ब्राह्मणों में महान् विवाद हुआ।
विवाद करते हुए दोनों दाता नृग के पास गए और राजभवन के द्वार पर खड़े रहे, पर नृग के आदेश से उन्हें प्रवेश न मिला। अनेक दिन-रात प्रतीक्षा करके वे क्रुद्ध हुए और परम सन्तप्त होकर घोर शाप दिया, जो आप कार्य-अर्थियों की कार्य-सिद्धि के लिए दर्शन नहीं देते, अतः आप कृकलास (छिपकली) होकर बहुत सहस्र वर्षों तक सब प्राणियों से अदृश्य रहकर एक गड्ढे में रहेंगे। इस लोक में यदुकुल की कीर्ति बढ़ाने वाले वासुदेव नामक पुरुष-रूपी विष्णु जन्म लेंगे; हे राजन्, वे ही आपको शाप से मुक्त करेंगे, तब आपका उद्धार होगा; भार उतारने के लिए नर और नारायण दोनों कलियुग में महावीर्य से जन्म लेंगे। ऐसा शाप देकर दोनों ब्राह्मणों ने वह दुर्बल, वृद्ध गौ अन्य ब्राह्मण को दे दी।
इस प्रकार नृग ने वह दारुण शाप भोगा। कार्य-अर्थियों के विवाद की उपेक्षा राजाओं के लिए दोष है; अतः हे सौमित्र, कार्य-अर्थी जन शीघ्र मेरे दर्शन को आएँ। जो राजा सत्कार्य करता है पर उसका फल नहीं समझता, वह नष्ट हो जाता है; अतः जाइए और कार्य-अर्थी जनों की प्रतीक्षा कीजिए।
समझने की कुंजी (राजधर्म की शिक्षा): नृग की कथा उस संकट के तुरन्त बाद आती है जब श्रीराम चार दिन प्रजा-कार्य से विमुख रहे। संदेश स्पष्ट है: राजा का परम कर्तव्य प्रजा की पुकार सुनना है; इसकी उपेक्षा करने वाला महादानी राजा भी शाप का भागी बनता है। वासुदेव कृष्ण द्वारा नृग के उद्धार की भविष्यवाणी इस कथा को आगे के अवतारों से जोड़ती है।
सार: सीता-वियोग के शोक से उठकर श्रीराम तुरन्त राजधर्म की ओर मुड़ते हैं, यही उनका चरित्र है। नृग की कथा उनके लिए और लक्ष्मण के लिए एक दर्पण है: व्यक्तिगत शोक चाहे जितना गहरा हो, प्रजा का कार्य एक दिन भी रुक नहीं सकता।
नृग का गड्ढे में प्रवेश
श्रीराम का वचन सुनकर परमार्थवेत्ता लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर कहा, हे काकुत्स्थ, अल्प अपराध पर भी दोनों ब्राह्मणों ने नृग पर यमदण्ड-सा कठोर शाप दिया। अपने को पापयुक्त सुनकर राजा नृग ने उन क्रुद्ध ब्राह्मणों से क्या कहा? श्रीराम ने आगे सुनाया, हे सौम्य, सुनिए कि शाप-विद्ध वह राजा क्या बोला। दोनों ब्राह्मणों के मार्ग पर चले जाने का समाचार पाकर नृग ने पुरोहित, मन्त्री, नैगम (व्यापारी) और समस्त प्रजा को बुलाकर दुःख से कहा, आप सब मुझे सावधान होकर सुनिए। नारद और पर्वत, दोनों भद्र, अनिन्द्य देवर्षि, मुझे महान् भय देकर वायु-से तीसरे लोक (ब्रह्मलोक) चले गए हैं। यह राजकुमार वसु अभी अभिषिक्त किया जाए। मेरे शिल्पी एक सुखद गड्ढा बनाएँ, जहाँ मैं ब्राह्मणों के दिए शाप का काल काटूँगा, एक गड्ढा वर्षा से रक्षा करने वाला, दूसरा शीत से, और एक सुखद गड्ढा ग्रीष्म से रक्षा करने वाला। फलयुक्त वृक्ष और पुष्पित लताएँ तथा छायादार झाड़ियाँ गड्ढों के चारों ओर बोई जाएँ; गड्ढे सब ओर रमणीय बनाए जाएँ। मेरे चारों ओर डेढ़ योजन तक सदा सुगन्धित पुष्प हों।
ऐसी व्यवस्था करके नृग ने वसु को सिंहासन पर बिठाकर कहा, हे पुत्र, धर्म में नित्य स्थित रहकर क्षत्रिय-धर्म से प्रजा का पालन कीजिए। आपके सामने ही दोनों ब्राह्मणों ने मुझ पर शाप गिराया; हे नरश्रेष्ठ, ऐसे अल्प अपराध पर भी; अतः हे नरर्षभ, मेरे लिए अनुताप मत करना। हे पुत्र, कृतान्त (नियति) कुशल है, जिसने मुझे विपत्ति में डाला; मनुष्य वही पाता है जो प्राप्तव्य है, वहीं जाता है जहाँ गन्तव्य है, वही लभता है जो लभ्य है, पूर्वजन्म से आए सब दुःख-सुख यों ही मिलते हैं; अतः हे वत्स, विषाद न करना। यह कहकर महायशस्वी राजा नृग वास के लिए उस सुनिर्मित गड्ढे में चला गया और महारत्नों से सजे उस विशाल गड्ढे में प्रवेश कर ब्राह्मणों के रोष से दिए शाप का परिणाम भोगने लगा।
सार: नृग शाप को बिना आक्रोश स्वीकार करता है और पुत्र को नियति का दर्शन देकर राज्य सौंप देता है, “जो प्राप्तव्य है वही मिलता है।” यह वैराग्य-भाव श्रीराम के अपने संकट का प्रतिबिम्ब है: नियति को समभाव से स्वीकार करना ही धर्म है।
राजा निमि और वसिष्ठ का परस्पर शाप
श्रीराम बोले, हे लक्ष्मण, यह नृग के शाप का विस्तार मैंने आपको बताया; यदि और सुनने की श्रद्धा हो तो एक अन्य कथा सुनिए। लक्ष्मण ने कहा, हे राजन्, ऐसी अद्भुत कथाओं से मेरी तृप्ति नहीं होती। तब इक्ष्वाकुनन्दन श्रीराम परम धार्मिक कथा कहने लगे, इक्ष्वाकु महात्माओं के बारहवें पुत्र निमि नामक राजा हुए, जो वीर्य और धर्म में परिनिष्ठित थे। उस वीर्यसम्पन्न राजा ने गौतम के आश्रम के समीप देवपुरी-सी नगरी बसाई, जिसका शुभ नाम वैजयन्त (इन्द्र के भवन के नाम पर) था। बड़ी नगरी बसाकर निमि के मन में अपने पिता को प्रसन्न करने के लिए दीर्घ सत्र (यज्ञ) करने का विचार उठा।
तब मनुपुत्र इक्ष्वाकु से अनुमति लेकर निमि ने पहले ब्रह्मर्षिश्रेष्ठ वसिष्ठ को पुरोहित-रूप में वरण किया; फिर तपोनिधि अत्रि, अंगिरा और भृगु को निमन्त्रित किया। किन्तु वसिष्ठ ने कहा, मुझे पहले इन्द्र ने वरण कर रखा है, अतः कुछ समय प्रतीक्षा कीजिए जब तक इन्द्र का यज्ञ पूरा न हो। इस बीच महाविप्र गौतम ने निमि के यज्ञ में पुरोहित का स्थान भर दिया, और महातेजस्वी वसिष्ठ ने इन्द्र का यज्ञ किया। इन्द्रयज्ञ की समाप्ति पर अनिन्द्य ऋषि वसिष्ठ निमि के यज्ञ में होता-कर्म करने आए, तो देखा कि उनका छोड़ा हुआ समय गौतम ने ले लिया है। इससे ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ अत्यन्त क्रुद्ध हुए।
राजा के दर्शन की इच्छा से वसिष्ठ कुछ देर बैठे रहे; पर उस दिन राजर्षि निमि को निद्रा ने अत्यन्त घेर लिया। राजा से न मिल पाने पर महात्मा वसिष्ठ क्रुद्ध होकर बोले, हे राजन्, चूँकि आपने मेरी अवज्ञा करके किसी अन्य को वरण किया, अतः आपका शरीर चेतना से रहित हो जाएगा। जागने पर शाप सुनकर क्रोध-मूर्छित राजा ने ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ से कहा, मुझ सोते हुए, आपके आगमन से अनजान को, क्रोध से मलिन होकर आपने यमदण्ड-से शाप-अग्नि से जलाया; अतः हे ब्रह्मर्षि, आपका यह सुन्दर शरीर भी चेतना से रहित होगा, इसमें सन्देह नहीं। इस प्रकार रोषवश परस्पर शापित वे महान् राजा और महान् ब्राह्मण, दोनों ही सहसा विदेह (देहरहित) हो गए, और उनका प्रभाव वैसा ही बना रहा।
सार: यह कथा शाप की दुर्निवारता और क्रोध की विनाशकता दिखाती है। एक छोटी-सी चूक, समय का व्यतिक्रम और निद्रा, दो महापुरुषों को परस्पर शाप तक ले जाती है, और दोनों देह त्याग देते हैं। आगे इसी से जनक-वंश और वसिष्ठ के पुनर्जन्म की कथा निकलती है।
वसिष्ठ का पुनर्जन्म और उर्वशी की कथा
श्रीराम का यह वचन सुनकर परवीरहा लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर पूछा, हे काकुत्स्थ, देह त्याग देने पर देव-सम्मत वे ब्राह्मण और राजा फिर देह से कैसे संयुक्त हुए? श्रीराम ने बताया, परस्पर शाप से देह त्यागकर वे धार्मिक राजर्षि और तपोधन ब्रह्मर्षि वायुभूत हो गए। देहहीन महामुनि वसिष्ठ अन्य देह पाने के लिए अपने पिता ब्रह्मा के पास गए और देवदेव के चरणों में प्रणाम करके वायु-रूप में बोले, हे देवदेव, हे अण्डज (ब्रह्माण्ड से उत्पन्न), निमि के शाप से मैं देहरहित होकर वायुभूत हो गया हूँ। देहहीन समस्त प्राणियों को महान् दुःख होता है; देहहीन के सब कार्य लुप्त हो जाते हैं; अतः कृपा कीजिए कि मुझे नया शरीर मिले। तब अमित-प्रभ स्वयम्भू ब्रह्मा ने कहा, हे महायशस्वी, आप मित्र और वरुण के तेज (वीर्य) में प्रवेश कीजिए; हे द्विजश्रेष्ठ, वहाँ भी आप अयोनिज (बिना गर्भ के) उत्पन्न होंगे और महान् धर्म से युक्त होकर पुनः मेरे वश में आएँगे (अर्थात् मेरे पुत्र-रूप में जन्म लेंगे)। ऐसा कहने पर वसिष्ठ ब्रह्मा की प्रदक्षिणा करके शीघ्र वरुण के लोक गए।
उसी समय मित्र भी क्षीरसागर के स्वामी वरुण का पद साझा कर रहे थे और देवराजों से पूजित हो रहे थे। तभी परम अप्सरा उर्वशी अपनी सखियों सहित संयोगवश वहाँ आई। क्षीरसागर में क्रीड़ा करती रूपसम्पन्ना उर्वशी को देखकर वरुण परम हर्ष से भर गए। कमलदल-से नेत्र और पूर्णचन्द्र-से मुख वाली उस श्रेष्ठ अप्सरा का वरुण ने मैथुन के लिए वरण किया। उर्वशी ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, हे सुरेश्वर, मुझे तो पहले ही साक्षात् मित्र ने वरण कर रखा है। कामबाण से पीड़ित वरुण बोले, हे सुश्रोणि, हे वरवर्णिनी, मैं अपना यह तेज इस देवनिर्मित कुम्भ में छोड़ दूँगा; यों मैं कृतकाम हो जाऊँगा, यदि आप संगम नहीं चाहतीं। यह सुनकर उर्वशी परम प्रसन्न होकर बोली, ऐसा ही हो; मेरा हृदय आप में स्थित है और आपके प्रति अधिक भाव है, किन्तु हे प्रभो, मेरा शरीर मित्र का है। यह सुनकर वरुण ने प्रज्वलित अग्नि-से दीप्त अपना वह महान् अद्भुत रेत उस कुम्भ में छोड़ दिया।
उर्वशी वहाँ गई जहाँ देवता मित्र थे। मित्र अत्यन्त क्रुद्ध होकर बोले, मैंने पहले आपको वरण किया, तो हे दुष्टचारिणी, आपने मुझे छोड़कर अन्य को पति क्यों वरा? इस दुष्कर्म से मेरे क्रोध से मलिन होकर आप कुछ काल मनुष्यलोक में निवास करेंगी। बुध के औरस पुत्र, काशीराज राजर्षि पुरूरवा के पास जाइए; वही आपका भर्ता होगा। तब शाप-दोष से उर्वशी प्रतिष्ठान-नगर में राज्य करने वाले बुधपुत्र पुरूरवा के पास गई। उससे आयु नामक महाबली पुत्र हुआ, जिसका पुत्र इन्द्र-सी द्युति वाला नहुष हुआ। जब इन्द्र वृत्र पर वज्र छोड़कर श्रान्त होकर अपना पद छोड़ गए, तब नहुष ने एक लाख वर्ष इन्द्रत्व का शासन किया। सुन्दर दाँत-नेत्र वाली उर्वशी उस शाप से भूमि पर बहुत वर्ष रहीं और शाप-क्षय पर इन्द्र के लोक लौट गईं।
समझने की कुंजी (अयोनिज जन्म): “अयोनिज” अर्थात् माता के गर्भ से न जन्मना। वसिष्ठ का पुनर्जन्म मित्र-वरुण के तेज (वीर्य) से, एक देव-निर्मित कुम्भ (पात्र) में, बिना गर्भ के होता है, इसी से आगे “कुम्भज” अगस्त्य और वसिष्ठ की उत्पत्ति की कथा जुड़ती है। यह कथा सीता-वियोग प्रसंग से इसलिए जुड़ी कि यहाँ इक्ष्वाकु-वंश के कुलगुरु वसिष्ठ की उत्पत्ति बताई जा रही है।
वसिष्ठ-अगस्त्य की उत्पत्ति और जनक-वंश का आरम्भ
उस दिव्य, अद्भुत कथा को सुनकर परम प्रसन्न लक्ष्मण ने फिर पूछा, हे काकुत्स्थ, देह त्याग देने पर देव-सम्मत वे ब्राह्मण वसिष्ठ और राजा निमि फिर देह से कैसे संयुक्त हुए? सत्यपराक्रमी श्रीराम ने महात्मा वसिष्ठ की कथा सुनाई, हे रघुश्रेष्ठ, उन दोनों महात्माओं (मित्र-वरुण) के तेज से भरा वह कुम्भ था; उसी में दो तेजोमय श्रेष्ठ ऋषि उत्पन्न हुए। कुम्भ से पहले भगवान् अगस्त्य ऋषि उत्पन्न हुए और “मैं आपका पुत्र नहीं” कहकर मित्र को छोड़कर चले गए। वह मित्र का तेज था जो उर्वशी की उपस्थिति में पहले छोड़ा गया था, और उस कुम्भ में वरुण का तेज भी मिला दिया गया था। कुछ काल बाद मित्र-वरुण से उत्पन्न तेजस्वी वसिष्ठ का जन्म हुआ, जो इक्ष्वाकुओं के कुलगुरु बने। उन अनिन्द्य वसिष्ठ को जन्मते ही महातेजस्वी इक्ष्वाकु ने अपने वंश के हित के लिए पुरोहित-रूप में वरण किया।
श्रीराम बोले, हे सौम्य, इस प्रकार अपूर्व-देह वसिष्ठ का निर्गम बताया; अब निमि का जो हुआ वह सुनिए। राजा को विदेह (देहरहित) देखकर सब मनीषी ऋषियों ने यज्ञ-दीक्षा लेकर यज्ञ पूरा किया। श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने नगरवासियों और सेवकों सहित राजा के शरीर को गन्ध, माल्य और वस्त्रों से सुरक्षित रखा। यज्ञ की समाप्ति पर भृगु ने कहा, हे राजन्, मैं प्रसन्न हूँ; मैं आपकी चेतना लौटाऊँगा। समस्त देव भी प्रसन्न होकर निमि की चेतना से बोले, हे राजर्षि, वर माँगिए; आपकी चेतना कहाँ निवास करे? निमि की चेतना ने कहा, हे सुरश्रेष्ठो, मैं समस्त प्राणियों के नेत्रों (पलकों) में निवास करूँ। देवों ने कहा, ऐसा ही हो; आप वायु-रूप में सब प्राणियों के नेत्रों में विचरेंगे; हे पृथ्वीपति, आपको विश्राम देने के लिए, जो वायु-रूप में सदा विचरते हैं, प्राणी बार-बार पलक झपकेंगे। (इसी से “निमेष”, पलक झपकना, का सम्बन्ध निमि से जोड़ा जाता है।)
ऐसा कहकर सब देव यथागत लौट गए। महात्मा ऋषियों ने पुत्रहीन निमि के शरीर को लेकर ओजपूर्वक अरणि (अग्नि उत्पन्न करने की लकड़ी) में मन्त्र-होम से मन्थन किया। मन्थन की जाती अरणि से महातपस्वी पुत्र प्रकट हुआ, विदेह (बिना देह के जन्म) से उत्पन्न होने से “वैदेह,” मन्थन से उत्पन्न होने से “मिथि,” और अद्भुत रीति से जन्मने से “जनक” कहलाया। इस प्रकार सर्वप्रथम विदेहराज जनक हुए, जो महातेजस्वी मिथि नाम से प्रसिद्ध थे, और उन्हीं से मैथिल-वंश चला। श्रीराम बोले, हे सौम्य, इस प्रकार मैंने निमि के शाप से वसिष्ठ की और वसिष्ठ के शाप से राजा निमि की उत्पत्ति का अद्भुत कारण पूर्णतः बताया।
समझने की कुंजी (तीन नाम, एक उत्पत्ति): निमि का पुत्र तीन नामों से जाना गया, विदेह (पिता विदेह से जन्मा), मिथि (मन्थन से), और जनक (अद्भुत-असाधारण जन्म से)। इन्हीं से मिथिला और जनक-वंश का आरम्भ हुआ, वही वंश जिसमें सीता जन्मीं। ध्यान दें कि यह सम्पूर्ण कथा-शृंखला श्रीराम सीता-वियोग के शोक के पश्चात् लक्ष्मण को सुना रहे हैं, अतः जनक-वंश की उत्पत्ति यहाँ स्वाभाविक रूप से जुड़ती है।
सार: शाप और पुनर्जन्म की इस शृंखला का चरम यह है कि उसी से इक्ष्वाकुओं के गुरु वसिष्ठ और सीता के पूर्वज जनक, दोनों की उत्पत्ति होती है। वाल्मीकि शोक के मध्य इन कथाओं को इसलिए पिरोते हैं कि वे दिखाएँ, सृष्टि का हर महान् वंश और सम्बन्ध किसी न किसी शाप, तप या नियति के विधान से बँधा है।
शुक्राचार्य का शाप: राजा ययाति
श्रीराम के यों कहने पर परवीरहा लक्ष्मण ने तेज से दीप्त महात्मा श्रीराम से कहा, हे राजशार्दूल, प्राचीन काल में देहरहित वसिष्ठ और विदेह के साथ जो हुआ, वह वास्तव में अद्भुत और महान् आश्चर्यजनक है। निमि क्षत्रिय, शूर और विशेष रूप से दीक्षित थे, फिर भी राजा ने महात्मा वसिष्ठ को क्षमा न करके उचित न किया। यह सुनकर क्षत्रियपुंगव श्रीराम ने सर्वशास्त्रनिपुण लक्ष्मण से कहा, हे वीर, क्षमा सब पुरुषों में नहीं दीखती। हे सौमित्र, सावधान होकर सुनिए कि ययाति ने सत्त्वगुण-प्रधान उपाय का आश्रय लेकर दुःसह रोष को कैसे शान्त किया।
नहुष के पुत्र राजा ययाति पौरवों के वर्धक थे। उनकी दो पत्नियाँ थीं, जो रूप में भूमि पर अनुपम थीं। एक थी वृषपर्वा की पुत्री, दिति की पौत्री शर्मिष्ठा, जिसे राजर्षि ययाति बहुत आदर देते थे; दूसरी थी उशना (शुक्राचार्य) की पुत्री देवयानी, जो सुन्दर होते हुए भी राजा को प्रिय न थी। दोनों के सुन्दर, विनीत पुत्र हुए, शर्मिष्ठा ने पूरु को और देवयानी ने यदु को जन्म दिया। पूरु अपने गुणों और मातृ-पक्ष के कारण राजा को प्रिय था। इससे दुःखग्रस्त यदु ने अपनी माता से कहा, हे देवि, आप भार्गव (भृगुपुत्र शुक्राचार्य) के कुल में जन्मी होकर भी यह मानसिक दुःख और दुःसह अपमान सहती हैं। हम दोनों एक साथ अग्नि में प्रवेश कर लें; राजा भले दैत्यपुत्री शर्मिष्ठा के साथ रमण करे। यदि आपके लिए यह सहनीय है तो मुझे जाने की अनुमति दें, आप सह सकती हैं, मैं नहीं सह सकता; मैं निःसन्देह मर जाऊँगा।
परम आर्त, रोते पुत्र के वचन सुनकर देवयानी क्रुद्ध होकर अपने पिता का स्मरण करने लगी। पुत्री के भाव को जानकर भार्गव शुक्र शीघ्र वहाँ आए जहाँ देवयानी थी। उसे अप्रकृतिस्थ, अप्रसन्न, अचेतन-सी देखकर पिता ने पूछा, यह क्या है? बार-बार पूछने पर क्रुद्ध देवयानी ने पिता से कहा, हे मुनिश्रेष्ठ, मैं अग्नि, तीक्ष्ण विष या जल में प्रवेश कर लूँगी; मैं जी नहीं सकती। आप नहीं जानते कि मैं कितनी दुःखी और अपमानित हूँ, हे ब्रह्मन्। वृक्ष की उपेक्षा से वृक्ष पर जीने वाले (पत्ते-फूल) नष्ट होते हैं; उसी प्रकार राजर्षि ययाति अवज्ञा से मेरा परिभव करते हैं, मुझ में अवज्ञा करते हैं और मुझे आदर के योग्य नहीं मानते।
देवयानी का यह वचन सुनकर कोप से घिरे भार्गव नहुषपुत्र ययाति को शाप देने लगे, हे नहुषपुत्र, चूँकि आप मेरी अवज्ञा करते हैं, हे दुरात्मन्, अतः आप वय और जरा से जीर्ण होकर शिथिलता को प्राप्त होंगे। ऐसा शाप देकर और पुत्री को सान्त्वना देकर महायशस्वी ब्रह्मर्षि भार्गव अपने भवन लौट गए। सूर्य-सी कान्ति वाले वे द्विजपुंगवश्रेष्ठ देवयानी को सान्त्वना देकर, नहुषपुत्र ययाति पर शाप देकर पुनः चले गए।
समझने की कुंजी (यदु और पूरु): देवयानी से जन्मा यदु यदुवंश का मूल बना (जिसमें आगे कृष्ण होंगे), और शर्मिष्ठा से जन्मा पूरु पौरव-वंश का (जिसमें कौरव-पाण्डव होंगे)। ययाति को शुक्राचार्य का जरा-शाप मिलता है, यह कथा महाभारत में विस्तार पाती है, जहाँ ययाति अपनी जरा पुत्रों से बदलने को कहते हैं। यह सर्ग उस कथा का आरम्भ-बिन्दु मात्र रखता है; श्रीराम इसे “रोष को सत्त्वगुण से कैसे जीता जाए” के उदाहरण-रूप में लक्ष्मण को सुनाने लगते हैं।
सार: श्रीराम क्रोध और क्षमा का विवेचन करते हुए ययाति का दृष्टान्त लक्ष्मण को सुनाने लगते हैं। शाप-शृंखला यहाँ भी चलती है, शुक्राचार्य की क्रुद्ध वाणी ययाति को जरा का शाप देती है। प्रजा-अपवाद से उपजे सीता-निर्वासन के महान् धर्म-संकट के पश्चात् वाल्मीकि श्रीराम-लक्ष्मण के इन संवादों के माध्यम से क्रोध, क्षमा, नियति और राजधर्म के गूढ़ प्रश्नों को बार-बार उठाते हैं, मानो उस एक कठिन निर्णय की प्रतिध्वनि समस्त कथाओं में गूँज रही हो।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, उत्तरकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।