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नींव और संदर्भकोश को समझने के रास्ते

लक्ष्मण

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पात्र-यात्रा · वाल्मीकि रामायण के चुने हुए प्रसंग

अयोध्या से सरयू तक एक पुरुष अपने बड़े भाई के आगे आगे चला, हर द्वार पर खड़ा रहा, और जो क्रोध राम ने कभी नहीं कहा, वह हर बार उसी के मुख से निकला।

अयोध्या के राजभवन में चार बालक हैं, और उनमें से एक अपने बड़े भाई की परछाईं की तरह चलता है। बालकाण्ड का सर्ग 18 उसे पहली बार नाम से पुकारता है: कैकेयी के गर्भ से भरत जन्मे, फिर सुमित्रा ने दो पुत्र जन्मे, लक्ष्मण और शत्रुघ्न, और ग्यारहवें दिन वसिष्ठ ने सुमित्रा के पहले पुत्र का नाम लक्ष्मण रखा। उसी सर्ग में काव्य वह बात कह देता है जो आगे हर काण्ड में फिर फिर सच होगी। लक्ष्मण बचपन से ही राम से गहरे जुड़े थे, “तेजस्वी लक्ष्मण मानो राम के ही प्राण थे, जो देह से बाहर घूमते थे।” लक्ष्मण के बिना राम को पलक भर नींद न आती, और उनके बिना सामने रखे स्वादिष्ट भोजन को भी हाथ न लगाते। राम घोड़े पर शिकार को निकलते तो लक्ष्मण धनुष बाण लिए पीछे पीछे चलते और चारों ओर से उनकी रक्षा करते। पीछे चलने और रक्षा करने की यही दो मुद्राएँ आगे चौदह बरस के वन में, लंका के रण में और अन्त में अयोध्या के राजद्वार पर लक्ष्मण की पहचान बनी रहती हैं।

बालक लक्ष्मण का पहला लम्बा मार्ग विश्वामित्र के पीछे है। बालकाण्ड के सर्ग 20 से 30 में ऋषि राजद्वार पर आकर बड़े बेटे को माँगते हैं, और वसिष्ठ की बात पूरी होते ही दशरथ “स्वयं राम को, लक्ष्मण सहित, बुलवा भेजते हैं।” सरयू के तट पर दोनों भाई बला और अतिबला विद्या पाते हैं, ताड़का के वन में राम के साथ लक्ष्मण भी लहरों का कोलाहल सुनते हैं, और सिद्धाश्रम में छह दिन दोनों यज्ञ की रखवाली करते हैं। मिथिला में, सर्ग 73 में, जनक हाथ जोड़कर दो पुत्रवधुएँ देते हैं, “सीता राम के लिए और ऊर्मिला लक्ष्मण के लिए।” ऊर्मिला का नाम विवाह के मण्डप में आता है; वन के चौदह बरस लक्ष्मण अकेले काटते हैं।

वह क्रोध जो स्नेह से उठा

अयोध्याकाण्ड का सर्ग 21 लक्ष्मण को पहली बार बोलते हुए सुनाता है, और वे जो कहते हैं, वह काव्य में कोई दूसरा पुत्र नहीं कहता। कौसल्या के भवन में वनवास की आज्ञा सुनाई जा चुकी है, माता विलाप कर रही हैं, और लक्ष्मण उनकी ओर फिरकर शपथ खाते हैं, “देवी, अपने धनुष की और अपने सत्य, दान और देव-पूजन के पुण्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि मैं हृदय से अपने बड़े भाई का हूँ। राम धधकती आग में पैठें या वन में, मुझे उनसे पहले वहाँ पैठा हुआ समझिए।” फिर वह वाक्य आता है जो पिता पर उठता है: कैकेयी में मन अटकाए, बुढ़ापे के दूसरे बचपन में पहुँचे “अपने उस वृद्ध पिता को मैं मार डालूँगा।” राम पूरी बात सुनते हैं और भाई के पराक्रम को मानकर ही उत्तर देते हैं: संसार में धर्म ही सबसे बड़ा है, पिता की आज्ञा धर्म पर टिकी है, “इसलिए राजा को बन्दी बनाकर या मारकर राज्य लेने का यह क्षत्रिय-बल वाला अयोग्य विचार छोड़िए। धर्म पर खड़े रहिए, कठोरता न बरतिए।” सर्ग 23 में लक्ष्मण भौंहें चढ़ाकर, बिल में बैठे नाग की तरह फुफकारकर, दैव के विरुद्ध पुरुषार्थ का पक्ष रखते हैं; राम उनके आँसू पोंछते हैं और एक ही वाक्य दोहराते हैं, “सौम्य, मुझे माता-पिता की आज्ञा में दृढ़ जानिए; सज्जनों का यही मार्ग है।”

क्रोध जहाँ हारता है, वहीं से याचना शुरू होती है। सर्ग 31 में सीता का संवाद सुन चुके लक्ष्मण बड़े भाई के चरण कसकर पकड़ लेते हैं: “धनुष लिए मैं आपके आगे-आगे चलूँगा। आपके बिना मुझे न स्वर्ग चाहिए, न देवता होना, न लोकों का ऐश्वर्य।” राम रोकते हैं और कारण भी देते हैं कि दोनों के जाने पर कौसल्या और सुमित्रा की सेवा कौन करेगा। लक्ष्मण का उत्तर इस काव्य में सेवा की सबसे पूरी परिभाषा है: “मुझे अपना अनुचर बनाइए; इसमें कोई अधर्म नहीं। डोरी चढ़ा धनुष लेकर, कुदाल और टोकरी उठाए, मैं आपको राह दिखाता हुआ आगे-आगे चलूँगा। आप जागते हों या सोते, सब काम मैं करूँगा।” राम का मन भर आता है, और वे उन्हें वसिष्ठ के घर रखे वरुण के दिए दिव्य धनुष, कवच और तरकश लाने भेजते हैं। सर्ग 40 में विदा की घड़ी है, और सुमित्रा अपने बेटे को वह एक वाक्य देती हैं जिसके भीतर पूरा वनवास समा जाता है: “राम को दशरथ समझिए, जनक की बेटी को मुझे, और वन को अयोध्या; फिर बेटा, सुख से जाइए।”

गंगा के तट पर एक रात, चित्रकूट पर एक दोपहर

शृंगवेरपुर में, सर्ग 51 में, राम और सीता इंगुदी के पेड़ तले तिनकों पर सोए हैं, और निषादराज गुह लक्ष्मण के लिए बिछौना सजाकर कहते हैं कि राजकुमार सो जाएँ, पहरा हम देंगे। लक्ष्मण का उत्तर उस रात का सबसे सच्चा वाक्य है, “दशरथ के पुत्र जब सीता के साथ धरती पर सो रहे हों, तब मुझे नींद कैसे आए, अन्न कैसे रुचे, सुख कैसे भाए?” फिर वे अयोध्या की बात करते हैं, कि महाराज बहुत दिन नहीं जिएँगे, कि कौसल्या और उनकी अपनी माता सुमित्रा यह रात शायद न काट पाएँ, और गुह ज्वर से तड़पते हाथी की तरह आँसू बहाते सुनते रहते हैं। बाद में भरत गंगा के इसी घाट पर आते हैं, और गुह उन्हें वह रात सुनाते हैं जो उन्होंने अपनी आँखों देखी थी।

चित्रकूट पर, सर्ग 96 में, लक्ष्मण साल के पेड़ पर चढ़कर उत्तर की ओर एक विशाल सेना देखते हैं, और ऊपर से ही राम को पुकारते हैं कि आग बुझा दीजिए, सीता गुफा में चली जाएँ, धनुष तैयार रखिए। ध्वजा पर कोविदार का चिह्न है, और लक्ष्मण उसे देखते ही सब समझ लेते हैं: “वह कोविदार-ध्वज आज हमारे वश में आएगा, और मैं उस भरत को आमने-सामने देख सकूँगा जिसके कारण आपने, सीता ने और मैंने इतना कष्ट सहा।” फिर वही बात जो उन्होंने अयोध्या में पिता के लिए कही थी, अब भाई के लिए: “शत्रु बनकर सामने आया भरत मारे जाने के ही योग्य है, वीर।” राम उन्हें हर तरह शान्त करके सर्ग 97 में उत्तर देते हैं कि भाइयों और मित्रों के विनाश पर मिली सम्पत्ति वे विष मिले पकवान की तरह नहीं लेंगे; “भरत का अपमान मेरा अपमान है,” और यदि राज्य के लिए यह बात है, तो वे भरत को देखते ही कह देंगे, “यह राज्य सदा के लिए लक्ष्मण को दे दीजिए।” लक्ष्मण लज्जा से मानो अपने ही अंगों में सिमट जाते हैं और बात बदलने को धीरे से कहते हैं, “मुझे लगता है, स्वयं पिता महाराज दशरथ आपसे मिलने आए हैं।” राम छत्र न देखकर रुक जाते हैं, और लक्ष्मण पेड़ से उतरकर हाथ जोड़े उनके पास आ खड़े होते हैं।

पंचवटी: एक हँसी, और एक पुकार

अरण्यकाण्ड के सर्ग 18 में शूर्पणखा राम से ठुकराई जाकर लक्ष्मण की ओर मुड़ती है, और वाणी के धनी लक्ष्मण मुसकराकर उत्तर देते हैं, “मैं तो दास हूँ; मुझ दास की भार्या बनकर आप स्वयं दासी क्यों बनना चाहती हैं? मैं अपने आर्य भाई के अधीन हूँ।” राक्षसी हँसी नहीं पकड़ पाती और सीता पर झपटती है। राम उसे थामकर लक्ष्मण से कहते हैं, “सौमित्र, क्रूर और अनार्य लोगों से किसी भी तरह हँसी नहीं करनी चाहिए,” और आज्ञा देते हैं; लक्ष्मण तलवार खींचकर उसके कान और नाक काट देते हैं। उसी कटे हुए मुख से खर, दूषण और अन्त में रावण तक बात पहुँचती है।

सर्ग 43 में सोने और चाँदी के रंग वाला मृग आश्रम के किनारे खड़ा है। सीता मुग्ध हैं और लक्ष्मण का मन पहली नज़र में ही खटक जाता है: “मुझे तो यह वही मारीच राक्षस लगता है, मृग का रूप धरे। यह माया है, इसमें कोई सन्देह नहीं।” राम फिर भी जाते हैं, और जाते हुए आज्ञा देते हैं कि कवच पहनकर यहीं रहिए और मिथिला की राजकुमारी की रक्षा कीजिए। सर्ग 44 में बाण से बिंधा मारीच ठीक राम की आवाज़ में पुकारता है, “हा सीते! हा लक्ष्मण!” सर्ग 45 वह घड़ी है जिसके लिए लक्ष्मण के पास कोई सही उत्तर नहीं है। सीता दौड़ने को कहती हैं; लक्ष्मण को भाई की आज्ञा याद है और वे अपनी जगह से हिलते नहीं। वे समझाते हैं कि राम रण में मारे नहीं जा सकते, कि वह आवाज़ राक्षस का जादू थी। तब सीता वे शब्द कहती हैं जो काव्य में लक्ष्मण पर कहे गए सबसे कठोर शब्द हैं: “आप अनार्य हैं, निर्दयी हैं, क्रूर कर्म वाले हैं, अपने कुल के कलंक!” और यह भी कि वे राम के पीछे वन में अपने मतलब से आए हैं, “या भरत ने आपको अपना दूत बनाकर भेजा है।” लक्ष्मण हाथ जोड़ लेते हैं, “आप मेरे लिए देवता हैं; मैं आपको उत्तर देने का साहस नहीं कर सकता।” पर “तपे हुए लोहे के बाण की तरह दोनों कानों में धँसते ये शब्द मुझसे सहे नहीं जाते, जनक की बेटी।” वन के देवताओं को साक्षी करके, बार बार मुड़कर देखते हुए, वे राम की ओर चल देते हैं, और पीछे परिव्राजक के वेश में रावण आ खड़ा होता है।

किष्किन्धा के द्वार पर

किष्किन्धाकाण्ड के सर्ग 30 में वर्षा बीत चुकी है, शरद उतर आया है, और प्रस्रवण की गुफा में राम सीता की याद में टूट रहे हैं। सुग्रीव का वचन था कि वर्षा बीतते ही खोज शुरू होगी, और किष्किन्धा से गीत और मृदंग का घोष आ रहा है। राम लक्ष्मण को भेजते हैं और सन्देश भी देते हैं, कि सुग्रीव से कह दें, “जिस मार्ग से रण में मेरे हाथों मरकर वाली गया, वह मार्ग बन्द नहीं हुआ है।” सर्ग 31 में लक्ष्मण सन्देश से आगे निकल जाते हैं: “मैं अपना उमड़ता क्रोध रोक नहीं पा रहा; उस वचन तोड़ने वाले सुग्रीव को आज ही समाप्त करूँगा। वाली का पुत्र अंगद सिंहासन पर बैठे।” राम इस बार उन्हें भेजने से पहले रोकते हैं, “आप-जैसा धर्म जानने वाला मित्र-वध का विचार भी मन में नहीं लाता; यह पाप है। जो अपने क्रोध को विवेक से मार देता है, वही पुरुषों में श्रेष्ठ वीर है।” कोमल भाषा में बात करने की आज्ञा लेकर निकले लक्ष्मण रास्ते के साल और ताल उखाड़ते, चट्टानें कुचलते किष्किन्धा पहुँचते हैं।

सर्ग 33 और 34 में लक्ष्मण सात आँगन पार करके सुग्रीव के अन्तःपुर तक आते हैं, नूपुरों की रुनझुन सुनकर लज्जा से गड़ जाते हैं, क्योंकि पराई स्त्रियों के सामने न जाने का उनका व्रत है, और उसी रोष में धनुष की ऐसी टंकार करते हैं कि चारों दिशाएँ गूँज उठती हैं। सुग्रीव तारा को भेजते हैं, और स्त्री के सामने आते ही लक्ष्मण का क्रोध ढीला पड़ जाता है; वे आँखें नीची किए खड़े रहते हैं और तारा से ही पूछते हैं, “आप कर्तव्य का तत्त्व जानती हैं; बताइए, इस घड़ी हमें क्या करना चाहिए।” तारा समझाती हैं कि सेना पहले ही बुलाई जा चुकी है, और लक्ष्मण भीतर आकर रुमा को आलिंगन में लिए सुग्रीव को देखते ही फिर भड़क उठते हैं। सुग्रीव गले की माला तोड़ देते हैं, और माला के साथ उनका मद भी उतर जाता है। सर्ग के अन्त में जो पुरुष वानरराज को मारने चला था, वह उन्हें सखा कहकर क्षमा माँगता है: “शोक में डूबे श्रीराम का विलाप सुनकर मैंने आपसे जो कठोर बातें कहीं, उन्हें क्षमा कीजिए, सखे।”

लंका में तीन बार

युद्धकाण्ड में लक्ष्मण तीन बार धरती पर गिरते हैं, और तीनों बार राम का जीवन उनके साथ गिरता है। सर्ग 73 में इन्द्रजित अदृश्य रहकर ब्रह्मास्त्र से वानर-सेना को गिराता है, और बरसते बाणों के बीच राम लक्ष्मण से कहते हैं, “मन अविचल रखकर आज यहीं मेरे साथ यह बाण-वर्षा सहिए।” दोनों भाई घायल होकर गिरते हैं, और हनुमान हिमालय से ओषधियों का पर्वत उठा लाते हैं। फिर इन्द्रजित माया की सीता रचकर हनुमान की आँखों के सामने उसे काट डालता है, और यह सुनकर राम मूर्च्छित होकर लक्ष्मण की गोद में पड़ते हैं। उस घड़ी लक्ष्मण का क्रोध पिता, भाई या मित्र पर नहीं, स्वयं धर्म पर उठता है: “आर्य, आप सत्पथ पर टिके हैं और इन्द्रियों को जीत चुके हैं, फिर भी धर्म आपको विपत्ति से नहीं बचा पाया; तो यह धर्म निरर्थक है। रावण सुख से है और आप पर विपत्ति है; लगता है धर्म और अधर्म ने आपस में अपनी जगह बदल ली है।” विभीषण आकर बताते हैं कि सीता जीवित हैं, और यह भी कि ब्रह्मा के वर में इन्द्रजित की मृत्यु लिखी है: निकुम्भिला के वट तक पहुँचकर अग्नि को तृप्त करने से पहले जो शत्रु धनुष ताने उस पर चढ़ आए, वही उसका काल होगा।

सर्ग 86 से 90 का युद्ध इस काव्य के सबसे लम्बे युद्धों में है, और उसके अन्त में लक्ष्मण इन्द्र के अस्त्र को धनुष पर चढ़ाकर उसके देवता से अपने काम की बात कहते हैं: “यदि दशरथ के पुत्र राम धर्मात्मा हैं, सत्य के पालक हैं और पौरुष में जिनकी कोई बराबरी नहीं, तो इस रावण-पुत्र का वध कीजिए।” बाण कुण्डलों और शिरस्त्राण समेत इन्द्रजित का सिर धड़ से अलग कर देता है। लहू से भीगे लक्ष्मण विभीषण और हनुमान के कन्धों का सहारा लिए राम के पास लौटते हैं, और राम उन्हें ज़बरदस्ती गोद में बैठा लेते हैं: “वाह, लक्ष्मण! हम तृप्त हुए। जो काम दूसरों के बस का नहीं था, वह आपने कर दिखाया।” और यह भी: “सौभाग्य से आपने निर्दयी रावण की दाहिनी भुजा काट दी।” सर्ग 101 में रावण स्वयं रण में है, विभीषण पर मय की रची शक्ति उठती है, और लक्ष्मण बाणों की वर्षा से बीच में आ जाते हैं; रावण शक्ति का मुख उन्हीं की ओर मोड़ देता है। शक्ति लक्ष्मण के देह को पार करके धरती में धँस जाती है। राम उसे अपने हाथों से निकालकर तोड़ते हैं और बाण छोड़ते छोड़ते ही विलाप करते हैं, “देश-देश में पत्नियाँ मिल जाती हैं, देश-देश में सगे-सम्बन्धी मिल जाते हैं; पर वह देश हमें नहीं दिखता जहाँ सगा भाई मिले।” हनुमान फिर पर्वत का शिखर उठा लाते हैं, और उठ खड़े हुए लक्ष्मण का पहला वाक्य भाई की ढीली बात पर एक ठेस है: “सत्यवादी अपनी प्रतिज्ञा झूठी नहीं होने देते; प्रतिज्ञा का पालन ही बड़प्पन की पहचान है। आज रावण के वध से अपनी प्रतिज्ञा पूरी कीजिए।”

गंगा के पार, और राजद्वार पर

उत्तरकाण्ड के सर्ग 45 में राम भाइयों को बुलाकर आज्ञा देते हैं कि सीता को वाल्मीकि के आश्रम के पास छोड़ आइए, और सीता को छोड़ने के बारे में कोई बात न की जाए। रात बीतने पर सूखे मुख वाले लक्ष्मण सुमन्त्र से रथ जुतवाते हैं और सीता से कहते हैं कि राजा ने आश्रमों के दर्शन की अनुमति दी है। सीता हर्ष से खिलकर मुनियों की पत्नियों के लिए वस्त्र और रत्न साथ रख लेती हैं। रास्ते में वे अपशकुन गिनाती हैं और लक्ष्मण भीतर से टूटे हुए, ऊपर से प्रसन्न दिखने का जतन करते हुए बस इतना कहते हैं, “सब कुशल है।” भागीरथी दिखते ही वे फूट फूटकर रो पड़ते हैं, और सीता पूछती हैं कि राम से दो रात के बिछोह पर आप ऐसा बचपना क्यों करते हैं। सर्ग 47 में, गंगा के दूसरे तट पर, लक्ष्मण हाथ जोड़े धरती पर गिर पड़ते हैं: “मेरा हृदय एक बड़े शल्य से बिंध गया है, क्योंकि मुझे यह काम सौंपा गया है और इसके लिए लोग मेरी निन्दा करेंगे। इससे तो मेरे लिए मृत्यु ही अच्छी थी। शुभे, मैं आपसे विनती करता हूँ, इसे मेरा दोष न मानिएगा।” सीता राजा के लिए अपना सन्देश देती हैं, और लक्ष्मण लौटने से पहले वह बात कहते हैं जो चौदह बरस के वन में भी नहीं कही गई थी: “निर्दोष देवि, आपका रूप मैंने कभी नहीं देखा; अब तक केवल आपके चरण ही मेरी आँखों के आगे रहे।” नाव पर बैठकर, बार बार मुड़कर देखते हुए, वे उस पार अनाथ सी ठहरी सीता से दूर होते जाते हैं। अयोध्या लौटकर वे राम के चरण छूते हैं और उन्हें ही ढाढ़स बँधाते हैं कि सारे संयोगों का अन्त वियोग में है, और जिस अपवाद के कारण सीता त्यागी गईं, वह नगर में फिर लौटकर राजा से ही आ जुड़ेगा।

अन्त राजद्वार पर आता है। सर्ग 104 में काल तपस्वी के वेश में आता है और राम से एकान्त की शर्त लेता है कि जो कोई उनकी बात सुने या देखे, वह राम के हाथ से वध्य हो; राम लक्ष्मण को ही द्वार पर खड़ा करते हैं। सर्ग 105 में दुर्वासा आते हैं और इसी क्षण राम का दर्शन माँगते हैं; लक्ष्मण एक मुहूर्त ठहरने को कहते हैं, और ऋषि क्रोध से काले पड़कर नगर, देश, भरत, राम और पूरे वंश को शाप देने की बात कहते हैं। लक्ष्मण मन में पूरा अर्थ तौलते हैं और निश्चय करते हैं, “एक मेरी ही मृत्यु हो जाए; सबका नाश न हो।” वे भीतर जाकर सूचना देते हैं। दुर्वासा भोजन पाकर “साधु, राम” कहकर लौट जाते हैं, और सर्ग 106 में सिर झुकाए बैठे राम से लक्ष्मण प्रसन्न मुख से कहते हैं, “सौम्य, निःशंक होकर मुझे मारिए और अपनी प्रतिज्ञा निभाइए; ककुत्स्थ, जो मनुष्य अपनी प्रतिज्ञा से गिर जाते हैं, वे नरक जाते हैं।” वसिष्ठ सभा में कहते हैं कि यह बिछोह उन्होंने पहले ही देख लिया था, काल बड़ा बलवान है, प्रतिज्ञा को व्यर्थ न कीजिए। तब राम भरी सभा में वह वाक्य कहते हैं: “सौमित्र, धर्म का उलटाव न हो, इसलिए मैं आपका त्याग करता हूँ; सज्जनों के लिए त्याग और वध, दोनों एक ही हैं।” लक्ष्मण की आँखें भर आती हैं; वे वेग से बाहर निकलते हैं और अपने घर में पैर नहीं रखते। सरयू के तट पर वे आचमन करके हाथ जोड़ते हैं, श्वास भीतर थामते हैं और फिर उसे छोड़ते ही नहीं। इन्द्र उन्हें सशरीर, जीवित ही उठा ले जाते हैं, और देवता विष्णु के चौथे भाग को लौटा आया देखकर उनकी पूजा करते हैं।

उनकी राह

तीन ठहराव, तीन प्रश्न

नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ लक्ष्मण कुछ कहते हैं जो राम कभी नहीं कहते, और फिर वही करते हैं जो राम कहते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।

  1. कौसल्या के भवन में शपथ। राम के वन-गमन की कड़ी में लक्ष्मण का रोष और राम का उत्तर साथ पढ़िए; अयोध्याकाण्ड 21 में पिता पर उठा वाक्य है और 31 में आगे आगे चलने की याचना। पूछिए: जो क्रोध स्नेह से उठे, क्या वह धर्म से छोटा होता है, या उसी का दूसरा मुख?
  2. दो आज्ञाओं के बीच। स्वर्ण-मृग और सीता-हरण में अरण्यकाण्ड 45 पर ठहरिए, जहाँ राम की आज्ञा है कि सीता को अकेला न छोड़ें और सीता की आज्ञा है कि राम की ओर दौड़ें। पूछिए: जब दो आज्ञाएँ टकराएँ, तो वचन किसका निभे?
  3. द्वार पर खड़ा पुरुष। राम के स्वधाम-गमन में उत्तरकाण्ड 105 और 106 पढ़िए, जहाँ दुर्वासा का शाप एक ओर है और काल को दिया राम का वचन दूसरी ओर। पूछिए: “एक मेरी ही मृत्यु हो जाए” कहने वाले ने उस घड़ी क्या चुना, और क्या छोड़ा?

अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक बालक धनुष लिए भाई के घोड़े के पीछे पीछे चल रहा है। क्या वह चाल अब आज्ञाकारिता जैसी दिखती है, या किसी ऐसे चुनाव जैसी जो हर दिन फिर से किया गया?

चित्रकूट में भरत-राम मिलन और पादुका · साल के पेड़ पर चढ़ा एक भाई, कोविदार की ध्वजा, और राम का वह वाक्य कि यह राज्य सदा के लिए लक्ष्मण को दे दीजिए।

वर्षा, सुग्रीव का प्रमाद, सीता-खोज की दिशाएँ · अन्तःपुर के द्वार पर धनुष की एक टंकार, नीची आँखों से तारा की सुनी हुई बात, और गले से तोड़कर फेंकी गई सुग्रीव की माला।

इन्द्रजित का वध और रावण का रण-प्रस्थान · निकुम्भिला के वट से पहले रोका गया एक यज्ञ, इन्द्र के अस्त्र पर रखी एक शर्त, और वह शक्ति जो विभीषण के लिए चली थी।

जो आगे आगे चला

पूरा पढ़िए तो वाल्मीकि के लक्ष्मण की जगह हमेशा एक सीमा पर है: शिकार में घोड़े के पीछे, वन की राह में भाई के आगे, कुटी के द्वार पर रात भर जागते हुए, और अन्त में राजद्वार पर, जहाँ काल भीतर है और दुर्वासा बाहर। उस सीमा पर खड़ा पुरुष वह सब कह देता है जो भीतर बैठा पुरुष नहीं कह सकता। पिता मारे जाने योग्य हैं, भरत मारे जाने योग्य हैं, सुग्रीव आज ही समाप्त होगा, और लंका में तो धर्म ही निरर्थक है; चारों बार राम वह क्रोध सुनते हैं, उसे मानते हैं, और उसे मोड़ देते हैं। लक्ष्मण हर बार मुड़ जाते हैं, और यही उनकी कथा का रहस्य है। उनके क्रोध से इस काव्य में कोई मरता नहीं; उनके वचन से मरते हैं, शूर्पणखा का मुख कटता है, इन्द्रजित का सिर गिरता है, और सीता गंगा के पार छूट जाती हैं। जो काम राम का नाम ढो नहीं सकता, वह लक्ष्मण के हाथ सौंपा जाता है, और वे उसे अपने ऊपर निन्दा लेकर पूरा करते हैं। सुमित्रा ने विदा में कहा था कि वन को अयोध्या समझिए; बेटे ने यह सीख इतनी पूरी निभाई कि अयोध्या लौटकर भी उन्हें द्वार ही मिला। दुर्वासा के सामने उन्होंने एक पल में हिसाब किया, एक की मृत्यु या सबका नाश, और भीतर चले गए। राम ने त्याग को वध कहा; लक्ष्मण ने उसे अपने व्रत का अन्तिम काम माना और सरयू तक अकेले गए। बालकाण्ड ने जिसे देह से बाहर घूमते राम के प्राण कहा था, वह प्राण उत्तरकाण्ड में पहले निकला, और राम उसके पीछे नदी में उतरे।

आधार-संस्करण और इस परिचय का दायरा

आधार-संस्करण: इस पुस्तकालय में प्रयुक्त गीताप्रेस वाल्मीकि रामायण, संस्कृत मूल और हिन्दी अनुवाद, सातों काण्ड। इस प्रस्तुति के प्रसंग: बालकाण्ड 18, 20 से 30 और 73; अयोध्याकाण्ड 21, 23, 31, 40, 51 और 96 से 97; अरण्यकाण्ड 18 और 43 से 45; किष्किन्धाकाण्ड 30 से 34; युद्धकाण्ड 73, 83, 86 से 90 और 101 से 102; उत्तरकाण्ड 45 से 48 और 104 से 106। इस प्रस्तुति का दायरा: सातों काण्डों से खींचा गया पात्र-चित्र; उद्धृत वचन इस पुस्तकालय की वाल्मीकि रामायण की कड़ियों के हिन्दी पाठ से, जो गीताप्रेस पाठ पर आधारित है।

सीमाएँ और पाठ-भेद: अध्यात्म रामायण की राम गीता, जिसमें राम लक्ष्मण को वेदान्त सिखाते हैं, और तुलसीदास का रामचरितमानस दूसरी कथाओं के रूप में केवल नामित हैं; उनके प्रसंग इस परिचय में नहीं मिलाए गए। ऊर्मिला का उल्लेख बालकाण्ड 73 के विवाह तक सीमित रखा गया है।

लक्ष्मण का यह चित्र अंग्रेज़ी में पढ़िए।

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