कथा · 1
राजा लवण: दो मुहूर्त में साठ वर्ष
उत्तरापाण्डव के राजा लवण अपने सिंहासन पर बैठे-बैठे दो मुहूर्त के लिए निश्चल हुए और चित्त में साठ वर्षों का एक पूरा जीवन जी आए। उस जीवन में राजवैभव विस्मृत हुआ, चाण्डाल-कुल में विवाह हुआ, छह संतानें हुईं और अकाल ने परिवार बिखेर दिया। अगले दिन विन्ध्य की यात्रा ने उस अनुभव को और गहरा रहस्य बना दिया।
उत्तरापाण्डव का दरबार
वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा, “चित्त देश और काल को जैसा ग्रहण करता है, अनुभव उसी आकार में फैलने लगता है। इसी बात को स्पष्ट करने वाला राजा लवण का वृत्तान्त सुनिए।”
उत्तरापाण्डव नाम का देश वनों, नदियों, खेतों और समृद्ध बस्तियों से भरा था। उसके घने वन ऐसे सुरक्षित थे कि तपस्वी वहाँ शान्त भाव से निवास करते थे। करौंदे की झाड़ियाँ गाँवों की सीमा तक चली आती थीं, ऊँचे खजूर दूर से दिखाई देते थे और पके धान से खेत पीले पड़ जाते थे। नीलकण्ठ और सारसों की ध्वनि वनप्रदेश में गूँजती थी। केले के मण्डपों में किन्नर और गन्धर्व गाते थे। पर्वतों पर फूलों का पराग उड़ता और उपवनों में लताओं के बीच विद्याधरियाँ झूला झूलती थीं।
इसी देश पर हरिश्चन्द्र के कुल में उत्पन्न राजा लवण का शासन था। वे धर्मपालक, उदार और पराक्रमी माने जाते थे। कुटिलता उनके व्यवहार में स्थान नहीं पाती थी और विद्वानों की चर्चा उनके दरबार का स्वाभाविक अंग थी। उनके शत्रु उनके नाम से भय खाते थे, पर धर्मनिष्ठ जन उनके संरक्षण में निश्चिन्त रहते थे।
एक दिन सूर्य आकाश में चार दण्ड चढ़ चुका था। लवण सभागृह के ऊँचे सिंहासन पर विराजमान थे। सामन्त अपने स्थानों पर बैठे थे, मंत्री राजकार्य प्रस्तुत कर रहे थे और दूत देश के समाचार सुना चुके थे। वीणा तथा बाँसुरी की ध्वनि सभा में बह रही थी। इतिहास की पोथी पढ़ी जा रही थी, बन्दीजन स्तुति कर रहे थे और परिचारिकाएँ श्वेत चँवर डुला रही थीं। राजसभा अपने नियमित क्रम में चल रही थी।

उसी समय एक इन्द्रजालिक भीतर आया। उसने विनयपूर्वक प्रणाम किया और कहा, “महाराज, सिंहासन पर बैठे हुए मेरा एक आश्चर्यपूर्ण कौतुक देखिए।” फिर उसने मोरपंख का पंखा घुमाया। उसके रंग और चमक ने सभा की दृष्टि बाँध ली।

तभी एक अश्वपालक सभा में पहुँचा। वह किसी सामन्त राजा की ओर से एक तेजस्वी घोड़ा लाया था। उसने कहा, “राजन्, यह अश्व उच्चैःश्रवा के समान सुन्दर और मूर्तिमान वायु की तरह वेगवान है। मेरे स्वामी ने इसे आपके लिए भेजा है, क्योंकि उत्तम वस्तु योग्य पुरुष को अर्पित होने पर शोभा पाती है।”
इन्द्रजालिक ने भी निवेदन किया, “प्रभो, इस अश्व पर आरूढ़ होकर पृथ्वी का विहार कीजिए।”
लवण ने गर्दन उठाकर घोड़े की ओर देखा। राजा की दृष्टि उस पर इस प्रकार टिक गई कि पलकें स्थिर हो गईं। अगले ही क्षण उनका शरीर सिंहासन पर निश्चल था और आँखें बन्द थीं।
सभा का संगीत रुक गया। स्तुति पढ़ते हुए बन्दीजन मौन हो गए और परिचारिकाओं के हाथों में चँवर थम गए। मंत्रियों ने राजा को जगाने का साहस नहीं किया। उन्हें लगा कि महाराज किसी गम्भीर चिन्ता या ध्यान में डूबे हैं। इस प्रकार दो मुहूर्त बीत गए।
फिर लवण का शरीर काँपा। वे आसन से गिरने लगे तो निकट खड़े मंत्रियों ने उन्हें थाम लिया। चेतना लौटने पर उन्होंने धीमे स्वर में पूछा, “यह कौन-सा प्रदेश है? यह सभा किसकी है? इसका राजा कौन है?”
सभासदों ने आदर से उन्हें आश्वस्त किया। उन्होंने कहा कि ज्ञान और विवेक में स्थिर राजा का मन इस प्रकार व्याकुल देखकर वे चिन्तित हैं। कुछ देर में लवण की दृष्टि साफ हुई। उन्होंने सामने खड़े इन्द्रजालिक को देखा और विस्मय से बोले, “तुमने मेरे साथ यह क्या किया? दो मुहूर्त में मैंने देश, काल और जीवन की इतनी अवस्थाएँ देखीं कि एक पूरी सृष्टि उस अनुभव में समा गई। आप सब सुनिए कि मेरे भीतर क्या बीता।”
घोड़े की ओर टिके नेत्र
लवण ने सभा को बताया कि मोरपंख की चमक के बीच उन्हें लगा, वे घोड़े पर सवार हो गए हैं। अश्व उन्हें शिकार के लिए बहुत दूर ले चला। थोड़ी ही देर में नगर, खेत और परिचित मार्ग पीछे छूट गए। सामने एक विशाल, दुर्गम और जलहीन वन था। वहाँ घास और कोमल पत्ते तक दिखाई नहीं देते थे। वृक्षों की हरियाली समाप्त हो चुकी थी, पशु-पक्षी का कोई चिह्न नहीं था और मरुभूमि की मृगतृष्णा दिशाओं में जल का भ्रम पैदा कर रही थी।
घोड़ा थक चुका था। लवण भी भूख, प्यास और धूप से क्लान्त थे। पूरा दिन उस उजाड़ में बीता। सूर्य अस्त हुआ तो उन्होंने धरती पर रात काटी। नींद नहीं आई। राजमहल का सुख दूर की स्मृति जैसा था और वह एक रात उन्हें कल्प जितनी दीर्घ लगी।
सूर्योदय पर वे फिर आगे बढ़े। बहुत कठिनाई से उस नीरस वन को पार करके ऐसी भूमि में पहुँचे जहाँ जामुन और कदम्ब के वृक्ष दिखाई दिए, कहीं-कहीं धान के खेत थे और पक्षियों की ध्वनि सुनाई देती थी। थोड़ा आश्वासन मिला, पर भोजन और जल अब भी उपलब्ध नहीं था। एक जम्बीर वृक्ष के पास पहुँचकर उन्होंने लता का सहारा लिया। उसी समय घोड़ा उन्हें छोड़कर भाग गया।
दूसरी रात भी उपवास, शीत और भय में बीती। लवण ने स्नान नहीं किया, देवपूजा नहीं की और अन्न का एक कण तक नहीं पाया। पत्तों और तिनकों से भरे वृक्ष के खोखले में शरीर समेटकर वे किसी प्रकार प्रातःकाल की प्रतीक्षा करते रहे। राजकीय परिचय, कुल और मर्यादा भूख के आगे धुँधले होने लगे थे।

अगले दिन सूर्य कुछ ऊपर चढ़ा तो उन्हें एक युवती आती दिखाई दी। उसका वर्ण साँवला था, वस्त्र भी गहरे रंग के थे और सिर पर पके चावल का पात्र था। साथ में जम्बू के रस का पात्र था। लवण उसके पास गए और बोले, “बाले, मैं भारी संकट में हूँ। मुझे थोड़ा भोजन दे दीजिए। दीन और पीड़ित का दुःख दूर करने से सम्पदा बढ़ती है।”
युवती आगे बढ़ती रही। राजा उसके पीछे चलते हुए बार-बार भोजन माँगते रहे। तब उसने कहा, “मैं चाण्डाल-कुल की कन्या हूँ। मेरे पिता के लिए यह भोजन ले जा रही हूँ। बिना प्रयोजन हम किसी को अन्न नहीं देते। यदि आप मेरे पति बनना स्वीकार करें, तो इसमें से आपको दे सकती हूँ।”
युवती ने अपने कुल का परिचय दिया, पर अपना निजी नाम नहीं बताया। भूख से व्याकुल लवण के लिए उस समय भोजन ही जीवन का एकमात्र सहारा था।
भूख की तीव्रता ने लवण की शेष हिचक मिटा दी। उन्होंने उत्तर दिया, “इस आपत्ति में वर्ण और कुलाचार का विचार कौन कर सकता है? मैं तुम्हारा पति होना स्वीकार करता हूँ। पहले मुझे भोजन दे दो।”
उसने आधे चावल और जम्बू के रस का भाग उन्हें दिया। अन्न पाकर शरीर को कुछ शक्ति मिली। युवती उन्हें अपने पिता के पास ले गई। वह श्मशान के निकट, धूल से ढका हुआ बैठा था। कन्या ने कहा, “पिताजी, मैंने इन्हें अपना पति चुना है।” पिता ने उसका निर्णय स्वीकार किया, फिर उसे नये वर को घर ले जाने को कहा।
घर की राह पर मांस, रक्त और पशुओं की खालों से भरा परिवेश था। कन्या ने अपनी माता से लवण को मिलवाया। माता ने भी सम्बन्ध स्वीकार कर लिया। कुछ समय बाद विवाह का दिन निश्चित हुआ। मद्य, मांस, वस्त्र और चाण्डाल-रीति की सामग्री जुटाई गई। सात रात तक उत्सव चला। ढोल बजते रहे, लोग नाचते रहे और राजवंशी लवण उस नये कुल के सदस्य बन गए।

भूख और नया कुल
विवाह के बाद जीवन का क्रम बदलता गया। आठ महीने बीतने पर लवण की पत्नी गर्भवती हुई। इसके बाद तीन पुत्र और तीन पुत्रियाँ हुईं। पूरा परिवार बढ़ा तो उसके पालन की चिन्ता भी बढ़ी। सबसे छोटे पुत्र का नाम पृच्छक था।

लवण ने धीरे-धीरे अपने पूर्व राजत्व को भूलना आरम्भ किया। जिस सिर पर कभी मुकुट रहा था, उस पर अब लकड़ी और बोझ उठाने की पिण्डी रहती। तन पर तीसी की छाल का पुराना वस्त्र अथवा जीर्ण कौपीन होता। धूप में नंगे पैर चलते, वर्षा में भीगते और शीत में बिना पर्याप्त आवरण के काँपते। मिट्टी के उन्हीं पात्रों में भोजन मिलता जिनमें बस्ती के दूसरे लोग खाते थे।
परिवार के लिए वे वन से लकड़ियाँ लाते, कन्द और जड़ें खोदते, मछलियाँ पकड़ते और पशु-पक्षियों के लिए जाल बिछाते। हिरन तथा भेड़ का मांस खरीदकर पकाते और विन्ध्याचल की बस्तियों में बेचते। शेष मांस सुखाने के लिए घरों के आसपास फैलाया जाता। कभी मोटा अन्न मिलता, कभी वराह का मांस और कभी भूख ही दिन का भोजन बनती। घर में कलह होती, अन्य चाण्डालों से विवाद होते और बच्चों की आवश्यकता उन्हें फिर वन की ओर ले जाती।
वर्षा की रातें पाषाण-गुफाओं में बीततीं। शिशिर में तेज हवा और बर्फ जैसी शीत सहनी पड़ती। ग्रीष्म में जल और छाया दुर्लभ हो जाते। जूँओं से भरी कन्था, पसीने से भीगा शरीर और निरन्तर श्रम उनके दैनिक जीवन का भाग बन गए। कभी भोजन के छोटे टुकड़े पर परिवार में झगड़ा उठता, कभी बच्चों को चुप कराने के लिए नया जोखिम लेना पड़ता। जीविका की कठोरता ने उनकी दया और विवेक को क्षीण किया। वे वनाग्नि लगाते, शिकार करते और उसी जीवन को अपना स्वभाव मानने लगे।
इस जीवन में साठ वर्ष बीत गए। लवण वृद्ध हो गए। दाढ़ी और बाल श्वेत हुए, शरीर कृश हुआ और राजा होने का स्मरण लगभग मिट गया। पत्नी, पुत्र-पुत्रियाँ, ससुराल और बस्ती ही उनका परिचित संसार रह गए। दो मुहूर्त के भीतर चित्त ने जन्मे सम्बन्धों को दशकों की आत्मीयता और पीड़ा दे दी थी।
लवण के मन ने एक पहचान ग्रहण की और उसी पहचान के अनुकूल सुख-दुःख, कर्तव्य, भय तथा आसक्ति का पूरा संसार अनुभव में उतर आया। राजसभा में बैठा शरीर निश्चल था, जबकि अनुभूति में एक श्रमिक पिता का शरीर थक रहा था और उसका मन परिवार के लिए व्याकुल था।
साठ वर्ष और अकाल
बहुत वर्षों के बाद विन्ध्य प्रदेश में वर्षा रुक गई। पहले जलस्रोत सूखे, फिर घास और पत्तियाँ समाप्त हुईं। मेघ आकाश में आते हुए दिखाई देते, पर बरसे बिना विलीन हो जाते। हवा में धूल और अंगार उड़ते थे। वनाग्नि ने सूखी झाड़ियों को घेर लिया। नगर और गाँव निर्जन होने लगे। पानी का नाम सुनते ही लोग उस दिशा में दौड़ पड़ते, पर वहाँ भी सूखी धरती मिलती।
भूख ने मनुष्यों और पशुओं दोनों को उन्मत्त कर दिया। कुछ लोग पहाड़ों से गिर पड़े, कुछ आग में प्रवेश कर गए और घर छोड़ने वालों को हिंसक पशुओं ने मार डाला। माता, पिता और संतान परस्पर से लिपटे रहते, फिर प्राण बचाने की विवशता उन्हें अलग कर देती। अन्न, तृण, पत्ता और जल, जीवन के चारों सहारे, एक साथ दुर्लभ हो गए थे।

लवण अपनी पत्नी, तीन पुत्रों और तीन पुत्रियों को लेकर उस प्रदेश से निकल पड़े। साथ चल सकने वाले परिवार को उन्होंने ससुराल की बस्ती से बाहर निकाला, पर मार्ग में भोजन और पानी नहीं मिला। शरीर इतने दुर्बल हो गए कि पिता पुत्र को और पुत्र पिता को सहारा नहीं दे पा रहा था। परिवार के सदस्य अपनी-अपनी दिशा में भटकने लगे।
कुछ दूर जाकर लवण ने एक ताड़ के वृक्ष के नीचे विश्राम किया। पत्नी ने दो लड़कों को छाती से लगाकर सुलाया। सबसे छोटा पुत्र पृच्छक पिता के पास बैठा था। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने कहा, “पिताजी, मुझे मांस खाने को और रक्त पीने को दीजिए।”
लवण ने समझाया, “बेटा, यहाँ मांस उपलब्ध नहीं है।”
बालक बार-बार वही माँग दोहराता रहा। भूख से उसकी दशा प्राणान्तिक हो चली थी। पुत्र-स्नेह और असहायता से व्याकुल लवण ने कहा, “तो मेरा मांस खा लेना।” पृच्छक ने भोलेपन से उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
राजा ने आसपास से लकड़ियाँ इकट्ठी कीं और चिता बनाई। उनका विचार था कि अग्नि में शरीर पक जाने पर पुत्र उसे खाकर जीवित रह सकेगा। परिवार की रक्षा की इच्छा उस क्षण विवेक पर छा गई थी। वे जलती हुई चिता में प्रविष्ट हुए। जैसे ही आग की उष्णता शरीर तक पहुँची, पूरा दृश्य हिल गया।
अग्नि से सभा तक
लवण ने स्वयं को फिर राजसभा के सिंहासन पर पाया। उनका शरीर काँप रहा था। तूर्य बज रहे थे और जयघोष सुनाई दे रहा था। वही मंत्री सामने खड़े थे, वही सभासद उन्हें थामे हुए थे और मोरपंख का कौतुक दिखाने वाला इन्द्रजालिक वहीं था। बाहर केवल दो मुहूर्त बीते थे। भीतर बाल्य से वृद्धावस्था तक फैला साठ वर्षों का परिवार और उसका विनाश घट चुका था।
वृत्तान्त सुनाकर लवण ने कहा कि मन की शक्ति देखकर उन्हें भारी आश्चर्य हो रहा है। उनका चित्त ज्ञान और राजकाज में प्रशिक्षित था, फिर भी एक दृष्टि ने उसमें विस्तृत देश, दीर्घ काल और असंख्य कर्मों का अनुभव जगा दिया। साधारण मनुष्य की अवस्था का अनुमान इसी से किया जा सकता है।
राजा के बोलते ही इन्द्रजालिक अदृश्य हो गया। उसने पुरस्कार नहीं माँगा, धन की प्रतीक्षा नहीं की और अपनी कला का कोई परिचय नहीं दिया। सभासदों ने विचार किया कि धन लेकर खेल दिखाने वाला बाजीगर इस प्रकार नहीं जाता। उन्हें लगा कि यह किसी दैवी शक्ति का प्रयोजन था। वसिष्ठ ने श्रीराम को स्पष्ट बताया कि वे स्वयं उस सभा में उपस्थित थे और घटना अपनी आँखों से देखी थी।
इसके बाद वसिष्ठ ने चित्त की रचना समझाई। वासना से युक्त मन निकट को दूर और दूर को निकट अनुभव करा सकता है। उसके संकल्प में एक क्षण कल्प का विस्तार लेता है और कल्प एक क्षण में सिमट जाता है। मन किसी पहचान पर दृढ़ हो जाए तो इन्द्रियाँ, सम्बन्ध और स्मृतियाँ उसी के अनुकूल चलने लगती हैं। लवण का राजत्व उस अनुभव में अप्रासंगिक हो गया और चाण्डाल पिता का “मैं” उतना ही ठोस लगा जितना जागते समय राजा का “मैं”।
शरीर उस भोग का स्वतन्त्र कर्ता नहीं था। राजदेह सिंहासन पर बैठी रही और चाण्डाल-देह चित्त में उभरी। सुख, भूख, लज्जा, क्रोध, मोह और करुणा का भोक्ता वही मन था जिसे अहंकार, जीव और वासना जैसे नाम दिए जाते हैं। इसी कारण वसिष्ठ ने मन को समझने और उसकी वासनाओं को शान्त करने पर बल दिया। बाहरी आकार बदलने से मन की धारणाएँ अपने आप समाप्त नहीं होतीं।
मानसिक राजसूय का फल
श्रीराम के मन में प्रश्न उठा कि धर्मनिष्ठ लवण पर ऐसी कठोर आपत्ति क्यों आई और इन्द्रजालिक का वास्तविक प्रयोजन क्या था। वसिष्ठ ने तब कथा का वह पूर्व प्रसंग बताया जो राजा स्वयं नहीं जानते थे।
किसी समय लवण ने एकान्त में विचार किया था, “मेरे पितामह ने राजसूय यज्ञ किया था। मैं भी उसी कुल में उत्पन्न हुआ हूँ। मैं मन में उस यज्ञ का अनुष्ठान करूँगा।” उन्होंने मानसिक राजसूय आरम्भ किया। चित्त में यज्ञ की सामग्री जुटाई, ऋत्विजों को बुलाया, मुनियों और ब्राह्मणों की पूजा की, देवताओं का आह्वान किया और अग्नि प्रज्वलित की। पूरा एक वर्ष उस मानसिक अनुष्ठान में बीता। अन्त में उन्होंने सर्वस्व दक्षिणा के रूप में दे दिया और दिन ढलने पर अपने उपवन में जागे। बाहर एक दिन बीता था, भीतर विधिपूर्वक एक वर्ष का यज्ञ सम्पन्न हो चुका था।
उस एक वर्ष का अनुभव किसी क्षणिक कल्पना की तरह धुँधला नहीं था। आह्वान से विसर्जन तक प्रत्येक विधि अपने क्रम में उपस्थित हुई। पुरोहित, मुनि, देवता, अग्नि और दक्षिणा, सभी को मन ने उतनी ही स्पष्टता दी जितनी जाग्रत कर्मों को मिलती है। यज्ञ समाप्त होने पर लवण ने उसे पूरा हुआ कर्म माना। इसी स्वीकार ने आगे मिलने वाले फल को भी उनके लिए अनुभव की पूरी गंभीरता दे दी।
वसिष्ठ ने कहा कि राजसूय करने वाले को बारह वर्षों की आपत्ति का फल भोगना पड़ता है। लवण का यज्ञ मन में हुआ था, इसलिए उसका सुख-दुःख भी मन ने ग्रहण किया। इन्द्र ने आकाश से एक देवदूत भेजा, जिसने इन्द्रजालिक का रूप लेकर राजा को उस कर्मफल का अनुभव कराया। प्रयोजन पूरा होते ही वह आकाशमार्ग से लौट गया।
राजसूय से सम्बद्ध आपत्ति बारह वर्ष कही गई है। इन्द्रजाल के भीतर लवण का दूसरा जीवन साठ वर्ष चलता है। राजसभा में उनका शरीर दो मुहूर्त तक निश्चल रहता है। मानसिक राजसूय का एक वर्ष एक बाहरी दिन में पूरा हुआ था। हर अवधि अनुभव के अपने स्तर पर घटती है।
मानसिक कर्म का फल भी मानसिक अनुभव में आया। यह सूत्र कथा की भीतरी संगति समझाता है। जिस चित्त ने एक वर्ष का राजसूय रचा, उसी ने दो मुहूर्त में साठ वर्ष का कष्ट सहा। वसिष्ठ इसे कर्म की यांत्रिक गणना बनाकर नहीं रखते। वे श्रीराम का ध्यान उस अनुभोक्ता की ओर ले जाते हैं जो देह, समय और परिस्थिति बदलते हुए भी हर अनुभव को “मेरा” कहता है।
विन्ध्य की यात्रा
लवण के लिए वृत्तान्त सभा में समाप्त नहीं हुआ। अगले दिन उन्होंने सोचा, “जिस वन, ग्राम और परिवार को मैंने देखा, क्या विन्ध्य में उसका कोई चिह्न मिलेगा?” वे मंत्रियों और सेना के साथ दक्षिण दिशा में निकले। अनेक प्रदेशों से गुजरते हुए वे विन्ध्याचल पहुँचे।
वन के भीतर उन्हें परिचित भूभाग मिलने लगे। कहीं वही उजड़ा मार्ग था, कहीं अकाल से जले वृक्ष और कहीं शिकारी तथा चाण्डालों की वैसी ही बस्ती। वे लोगों से पूछते, स्थानों को पहचानते और प्रत्येक समानता पर अधिक विस्मित होते गए। अन्ततः वे पुष्पसघोष नाम के गाँव पहुँचे।
वहाँ कुछ वृद्ध स्त्रियों के बीच एक बूढ़ी चाण्डाली विलाप कर रही थी। उसका शरीर अकाल से सूख गया था, वस्त्र पुराने थे और आँखों से आँसू बह रहे थे। वह अपने मृत बन्धुओं को याद कर रही थी। उसके शब्दों में पुत्री, जमाई और नाती-नातिनों का शोक साथ-साथ था। लवण ने दासियों से उसे सँभालने को कहा और पूछा, “यहाँ क्या हुआ? तुम कौन हो? तुम्हारी पुत्री और उसका पति कौन थे?”
उसने बताया, “यह पुष्पसघोष गाँव है। मेरे पति का नाम पुष्पक था। हमारी एक पुत्री हुई। भाग्य से यहाँ आए राजा के समान तेजस्वी पुरुष को उसने पति बनाया और उससे पुत्रियाँ तथा पुत्र उत्पन्न हुए। फिर वर्षा बन्द हुई। घोर अकाल में लोग गाँव छोड़कर चले गए और जो नहीं जा सके, वे मर गए। मेरी पुत्री, उसका पति और उनका परिवार भी बिखर गया। अब हम बची हुई स्त्रियाँ अपने जनों को स्मरण करके रोती हैं।”
लवण स्तब्ध रह गए। उन्होंने प्रश्न दोहराए और स्थानों को फिर देखा। चित्त में जी गई कथा तथा इस वृद्धा के वृत्तान्त के बीच गहरा संवाद था। उन्होंने तत्काल किसी एक दार्शनिक निष्कर्ष की घोषणा नहीं की। वे करुणा से भर उठे, भीलों के दुःख को उचित दान और सम्मान से कम किया और उस प्रदेश में चिरकाल तक ठहरे। फिर देव की गति पर विचार करते हुए राजधानी लौट आए।
अगली सुबह उन्होंने वसिष्ठ से पूछा, “स्वप्न में देखा हुआ अनुभव जाग्रत जगत में इस प्रकार सामने कैसे आया?”
वसिष्ठ ने उत्तर को एक ही संभावना में बन्द नहीं किया। सम्भव है, विन्ध्य के चाण्डालों में घटित किसी क्रम की प्रतिभा लवण के चित्त में प्रकट हुई हो। यह भी सम्भव है कि लवण के भ्रम की प्रतिभा वहाँ के लोगों के चित्त में पहुँची हो। दो मानसिक धाराएँ एक समान देश, काल और क्रिया का रूप भी ग्रहण कर सकती हैं। जैसे अनेक कवि समान अर्थ की ओर पहुँच जाते हैं, वैसे ही अलग चित्तों में समान अनुभव का संवाद उठ सकता है।
व्यवहार में पूर्व और उत्तर अनुभव का मेल सत्य का आधार बनता है, जबकि परमार्थ में दोनों चेतना पर आश्रित हैं। वसिष्ठ ने उस वृद्धा को लवण की पत्नी का निर्णायक प्रमाण घोषित नहीं किया। समानता का पूरा भार बना रहा और उसका अर्थ विचार के लिए खुला रहा।
चित्त की निरन्तरता
लवण के अनुभव में पहचान धीरे-धीरे बनी। भूख ने राजकीय मर्यादा का आग्रह ढीला किया। विवाह, श्रम और छह संतानों के पालन ने नये परिवार को आत्मीय बनाया। वृद्धावस्था तक राजत्व स्मृति के छोर पर चला गया। मन ने जिस “मैं” को बार-बार स्वीकार किया, सम्बन्ध, भय और कर्तव्य उसी के चारों ओर व्यवस्थित होते गए।
पुष्पसघोष की वृद्धा का दुःख सामने आया तो लवण ने उसकी दार्शनिक व्याख्या से पहले सहायता की। जाग्रत अनुभव और मानसिक जीवन के सम्बन्ध पर प्रश्न बना रहा, पर उस स्त्री की पीड़ा तत्काल थी। राजा ने वहीं ठहरकर भीलों के कष्ट को कम किया। आत्मविचार ने करुणा को स्थगित नहीं किया।
वसिष्ठ का उपाय वासना के शमन से जुड़ता है। विवेक, योग्य मार्गदर्शन और आत्मविचार से चित्त अपने आधार की ओर मुड़ता है। अनुभव आते-जाते रहते हैं और “मैं यही सीमित रूप हूँ” की जकड़न हल्की होने लगती है। लवण की कथा चित्त की विराट रचनाशक्ति और उससे जागने की सम्भावना को एक साथ सामने रखती है।