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पात्र-यात्रा · वाल्मीकि रामायण के चुने हुए प्रसंग
एक वृद्ध राजा सुनने से पहले वचन दे देता है, और फिर उस वचन को निभाने का मोल अपने प्राणों से चुकाता है; बालकाण्ड ने जिसे चार पुत्रों का पिता बनाया, अयोध्याकाण्ड उसे छठी रात एक पुकार पर समाप्त कर देता है।
अयोध्या का अन्तःपुर, और कल राम का अभिषेक है। अयोध्याकाण्ड का सर्ग 10 वृद्ध राजा को अपनी मन्त्रिपरिषद से विदा लेकर भीतर आते दिखाता है, तोतों और मोरों की बोली से गूँजते उस भवन में, जहाँ उनकी प्रिय रानी कैकेयी अपनी शय्या पर नहीं हैं। द्वारपालिनी बताती है कि देवी कोपभवन में हैं, और निष्पाप, वृद्ध राजा अपनी युवती भार्या को धरती पर पड़ा देखते हैं, “मानो आधार वृक्ष से कटकर गिरी लता, या स्वर्ग से ठुकराई किन्नरी।” वे उन्हें हाथों से सहलाते हुए पूछते हैं, “मैं नहीं समझता कि आपका यह क्रोध मेरे प्रति है। किसने आपको झिड़का, किसने अपमान किया, जो आप इस तरह धूल में लोट रही हैं और मेरे प्राण सुखा रही हैं?” और माँग सुनने से पहले ही देना शुरू कर देते हैं: “आज कौन अवध्य होकर भी वध्य हो जाए, कौन वध्य छूट जाए? कौन दरिद्र धनी हो, कौन धनी निर्धन?” “जहाँ तक सूर्य का चक्र चमकता है, वहाँ तक पृथ्वी मेरी है। इनमें से जो आपका मन चाहे, माँग लीजिए।” और फिर वह शपथ, जिसकी कैकेयी को प्रतीक्षा थी: “अपने पुण्यों की शपथ खाकर कहता हूँ, जो आपको प्रिय हो, वही करूँगा।” दशरथ की पूरी कथा इसी क्रम में चलती है, वचन पहले, माँग बाद में, और मोल सबसे बाद में।
उससे पहले वे एक पुत्रहीन राजा हैं। बालकाण्ड के सर्ग 8 से 18 में वे अश्वमेध करते हैं, ऋष्यशृंग उनके लिए पुत्रेष्टि करते हैं, और अग्नि से एक प्राणी तपे सोने का पात्र लिए निकलता है, जिसमें देवताओं का बनाया पायस है। “राजन, अश्वमेध और पुत्रेष्टि से देवताओं का पूजन करके आज आपने यह फल पाया है।” दशरथ “ऐसे प्रसन्न हुए जैसे दरिद्र को धन मिल जाए।” वे आधा पायस कौसल्या को देते हैं, बचे हुए का आधा सुमित्रा को, फिर उसका आधा कैकेयी को, और क्षण भर सोचकर बचा हुआ आधा फिर सुमित्रा को। चार पुत्र जन्मते हैं, और काव्य कहता है कि “चारों प्रिय पुत्रों से दशरथ वैसे ही प्रसन्न रहते जैसे ब्रह्मा चारों दिशाओं के स्वामी इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर से।” सर्ग 18 से 22 में विश्वामित्र द्वार पर आकर यज्ञ की रक्षा के लिए राम को माँगते हैं, और राजा पहले हाँ कहते हैं, फिर रावण का नाम सुनकर मुकर जाते हैं: “उस दुरात्मा के सामने रण में मैं टिक नहीं सकता।” ऋषि का क्रोध उमड़ता है, “पहले माँगी हुई वस्तु देने का वचन, और अब उसी से मुकरना!” वसिष्ठ समझाते हैं, और तब “राजा ने पुत्र का मस्तक सूँघा और प्रसन्न हृदय से उन्हें कुशिकवंशी विश्वामित्र के हाथों सौंप दिया।” मिथिला में, सर्ग 69 में, जनक विवाह का दिन तय करते हैं और दशरथ कहते हैं, “मैंने पहले से सुना है कि दान दाता के अधीन होता है। आप जैसा कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे।” लौटते रास्ते परशुराम राम को ललकारते हैं, और “दशरथ यों गिड़गिड़ाते रहे, और प्रतापी परशुराम ने उनकी एक बात भी कान में न पड़ने दी; हाथ जोड़े खड़े राजा मानो वहाँ थे ही नहीं।” यह पिता हर द्वार पर पहले डरता है, फिर देता है।
वृद्ध राजा का निश्चय
अयोध्याकाण्ड के सर्ग 1 से 4 में “देह पर बुढ़ापे की छाया थी और आकाश में अशुभ संकेतों की आहट,” और इन्हीं दो बोझों को उठाए दशरथ सभा जुटाते हैं। भरत और शत्रुघ्न ननिहाल में हैं, और राजा मन को यह कहकर समझा लेते हैं कि वे दोनों यह प्रिय समाचार पीछे सुन लेंगे। सभा में वे कहते हैं कि वे अपने ज्येष्ठ पुत्र को प्रजा के हित में नियुक्त करना चाहते हैं “और स्वयं विश्राम,” और जब सभा एक स्वर में हाँ कहती है, तो वे एक प्रश्न पूछते हैं जो केवल यह राजा पूछ सकता था: “मैं धर्म से इस पृथ्वी का शासन कर ही रहा हूँ; फिर भी आप राम को युवराज क्यों देखना चाहते हैं?” सभा राम के गुण गिनाती है, और राजा का सारा शोक धुल जाता है। उसी रात वे राम को दूसरी बार बुलवाते हैं और एकान्त में कहते हैं, “राम, मैं वृद्ध हो गया हूँ।” बुरे सपने हैं, ग्रहों का डर है, और “कल मैं निश्चय ही आपको युवराज पद दूँगा।”
सर्ग 10 से 12 में कोपभवन की वह रात है जिससे यह परिचय खुला था। शपथ दे चुकने के बाद ही कैकेयी देवासुर संग्राम के दो पुराने वर माँगती हैं, भरत का अभिषेक और राम का चौदह वर्ष का वनवास, और राजा पहले यह समझ नहीं पाते कि यह “दिन में देखा हुआ कोई स्वप्न है, या मेरे चित्त का भ्रम।” फिर क्रोध आता है: “निर्दय, दुष्ट आचरण वाली, इस कुल का नाश करने चली स्त्री! राम ने या मैंने आपका क्या बिगाड़ा है?” “मैंने अनजाने में तीखे विष वाली एक साँपिन को राजकुमारी समझकर अपने ही नाश के लिए घर में बसा लिया।” और फिर वह वाक्य जिसमें उनका सारा पितृत्व है: “संसार सूर्य के बिना, खेती जल के बिना भले रह जाए, पर राम के बिना मेरे देह में प्राण नहीं ठहर सकते।” वे सिर से उनके चरण छूते हैं, “समुद्र से घिरी इस पृथ्वी पर जो कुछ मिल सकता है, सब मैं आपको दूँगा; पर उस राह पर मत बढ़िए जो मेरी मृत्यु पर जाकर रुकती है।” कैकेयी शैब्य और अलर्क की कथाएँ गिनाकर कहती हैं कि वचन देकर अब पछताते हैं तो धर्म की घोषणा कैसे करेंगे। “राम!” कहकर वे कटे वृक्ष से गिरते हैं। सारी रात वे आकाश पर आँखें टिकाए कहते रहते हैं, “नक्षत्रों से सजी रात्रि, मैं नहीं चाहता कि आप प्रभात में बदलें,” और भोर में जब वन्दीजन मंगलगान लेकर आते हैं, उस दिन राजा उन्हें रोक देते हैं।
एक शब्द
सर्ग 14 में राजा भूमि पर करवटें बदल रहे हैं, और कैकेयी उनसे वरों का मोल माँगती हैं; राजा इतना ही कहते हैं, “मैं धर्म की डोर में बँधा हूँ, और मेरी सुध जाती रही है।” सुमन्त्र मंगल स्तुति करने आते हैं और राजा कहते हैं, “इस बेवक्त की स्तुति से आप मेरे मर्म को फिर फिर काट रहे हैं।” राम लाए जाते हैं, और सर्ग 18 में इस पिता के मुख से “केवल ‘राम’ इतना निकला; आँसुओं से अँधी आँखों से वे न उन्हें देख सके, न आगे कुछ बोल सके।” आज्ञा कैकेयी सुनाती है; राम “ऐसा ही हो” कहते हैं; और राजा लाज और दुःख से “अपने को पलंग की चादर में छिपा लेते हैं।” विदा के समय, सर्ग 34 में, वे अपनी सब रानियों को बुलवाते हैं, “सब पत्नियों से घिरकर मैं राघव को देखना चाहता हूँ,” और बेटे को यह कहकर विदा करते हैं, “जाइए तात, निर्भय और मंगलमय मार्ग पर निश्चिन्त मन से जाइए; आप स्वभाव से सत्यनिष्ठ हैं और मन धर्म में लगा है; वन जाने का आपका निश्चय पलटा नहीं जा सकता।” कैकेयी सीता के लिए भी वल्कल ले आती हैं, और लोग चिल्लाते हैं कि धिक्कार है दशरथ को, जो यह घोर अन्याय होते देखते हैं और रोकते नहीं। तब इस राजा का एक निषेध आता है, “कैकेयि, सीता कुश के वल्कल पहनकर जाने योग्य नहीं,” और एक आज्ञा कोषाध्यक्ष को, कि सीता को वन के जितने वर्ष बिताने हैं, उन्हें गिनकर बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण दे दिए जाएँ। जब कैकेयी सगर और असमंज की कथा सुनाती हैं कि राम भी बिना सहारे जाएँ, तो राजा के मुख से केवल एक शब्द निकलता है, “धिक्कार!” और जब रथ चल पड़ता है, वे उसके पीछे दौड़ते हैं और धूल तक देखते रहते हैं।
पुराना बाण, छठी रात
सर्ग 57 से 64 में सुमन्त्र सूनी अयोध्या में लौटते हैं और राजा को राम का सन्देश सुनाते हैं। राजा मान लेते हैं कि “पापी कुल और पापी मन की कैकेयी के कहने में आकर” उन्होंने इस निर्णय पर मन्त्रणा में कुशल वृद्धों से कोई विचार नहीं किया। कौसल्या का धिक्कार आता है कि बस आपके पुत्र भरत और आपकी पत्नी कैकेयी फूली नहीं समाते, और सम्राट “हा राम!” कहकर मूर्च्छित हो जाते हैं। होश में आकर वे हाथ जोड़ते हैं, “कौसल्या, मैं आपकी कृपा चाहता हूँ; हाथ जोड़े हुए यह मेरी विनती है।” और छठी रात वे रानी को वह पाप सुनाते हैं जो उनके भीतर अपने आप जाग आया है। वे युवराज थे, शब्दभेदी कहलाते थे, वर्षा ऋतु में शिकार की लालसा लिए सरयू के तट पर गए, और रात के पिछले पहर अँधेरे में उन्हें “पानी में घड़ा भरने की आवाज़ सुनाई दी, हाथी के चिंघाड़ने सी।” उन्होंने आवाज़ की दिशा में बाण छोड़ा, और उधर से मनुष्य की वाणी उठी: “मुझ से तपस्वी पर, जिसका कोई शत्रु ही नहीं, यह शस्त्र कैसे आ गिरा?” मरते हुए मुनिकुमार को अपने प्राणों का उतना शोक नहीं था जितना अपने अन्धे, बूढ़े माता पिता का, जो प्यास की पीड़ा सहते उसकी राह देखते होंगे। दशरथ घड़ा लेकर उन दोनों के पास गए, अपना पाप अपने मुँह से कहा, और पिता ने चिता पर चढ़ने से पहले कहा, “जैसा पुत्र वियोग का दुःख इस घड़ी मुझे है, वैसे ही आप भी, राजन्, पुत्र के शोक में अपना अन्त पाएँगे।” “उस कर्म का फल अब मेरे सिर पर आ पड़ा है।”
फिर अन्त आता है, और वह केवल कुछ वाक्य लम्बा है। “यदि राम एक बार मुझे छू लें, मुझे थाम लें, या धन और युवराज पद स्वीकार कर लें, तो मैं जी जाऊँ, ऐसा मेरा मन कहता है।” “कौन समझदार पिता दुराचारी बेटे को भी त्याग देता है? और कौन बेटा पिता के निकाले जाने पर पिता को दोष न दे?” “कौसल्या, मन धुँधला पड़ रहा है और हृदय डूब रहा है।” उन्हें वे लोग धन्य लगते हैं जो पन्द्रहवें वर्ष राम का मुख फिर देखेंगे। “हा महाबाहु राघव! हा मेरे कष्ट हरने वाले! हा कौसल्या, मुझे कुछ दिखता नहीं!” और “आधी रात बीतने पर, असह्य दुःख से पीड़ित होकर उसी क्षण प्राण छोड़ गए।” सुबह अन्तःपुर उन्हें जगाने आता है और उन्हें नहीं जगा पाता। देह तेल की द्रोणी में रखा जाता है, दूत केकय को दौड़ते हैं, और जब भरत लौटते हैं, तब वे उन्हें अग्नि देते हैं, यह कहते हुए कि राजन, मैं परदेस में था, तभी राम और लक्ष्मण को वन भेजकर आपने क्या सोचा था। चित्रकूट पर, कुटी के द्वार पर, चारों भाई एक साथ इसी पिता को जल देते हैं।
काव्य उन्हें एक बार और लौटाता है। युद्धकाण्ड के सर्ग 119 में, सीता की अग्नि परीक्षा के बाद, शिव राम से कहते हैं, “काकुत्स्थ, देखिए, विमान के शिखर पर यह आपके पिता राजा दशरथ हैं, जो मनुष्य लोक में आपके महायशस्वी गुरु थे।” विमान पर बैठे राजा राम को गोद में बिठाते हैं और कहते हैं, “राम, मैं आपसे सत्य कहता हूँ: आपसे सदा के लिए बिछुड़े मुझे न स्वर्ग का वास बहुत लगता है, न वह सम्मान जो देवश्रेष्ठ मुझे देते हैं।” वे कहते हैं कि अब वचन पूरा हुआ, अयोध्या का राज्य लीजिए, और राम जो पहली बात माँगते हैं, वह उस स्त्री के लिए है जिसने दोनों को उजाड़ा था: “धर्मज्ञ, कैकेयी और भरत पर कृपा कीजिए।” लक्ष्मण और सीता को उपदेश देकर पिता विमान में बैठते हैं और लौट जाते हैं।
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ दशरथ कुछ देते हैं, कुछ कह नहीं पाते, या किसी पुराने हिसाब को पहचानते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- सुनने से पहले दिया हुआ वचन। मंथरा, कैकेयी, दो वरदान में अयोध्याकाण्ड 10 और 11 पढ़िए, जहाँ राजा “जो आपको प्रिय हो, वही करूँगा” कहते हैं और उसके बाद माँग सुनते हैं। पूछिए: जो वचन बिना सुने दिया गया, उसे निभाना सत्य है, या उस भूल का दाम चुकाना?
- एक शब्द, और बाकी किसी और का। राम का वन गमन में सर्ग 18 पर ठहरिए, जहाँ पिता के मुख से केवल “राम” निकलता है और आज्ञा कैकेयी सुनाती है। पूछिए: जिसने आज्ञा दी ही नहीं, राम ने उसका कौन सा वचन निभाया, और पिता की चुप्पी भी क्या एक आज्ञा थी?
- शब्द पर चला बाण। दशरथ की मृत्यु में सर्ग 63 और 64 पढ़िए, जहाँ राजा को अपना पुराना पाप अपने आप याद आता है और मुनिकुमार के पिता का शाप पूरा होता है। पूछिए: कथा के भीतर यह मृत्यु शाप का फल है या वचन का; और राजा स्वयं इसे किस नाम से पुकारते हैं?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक वृद्ध राजा धरती पर पड़ी रानी से पूछ रहा है कि किसने आपका अपमान किया। क्या वह प्रश्न अब केवल स्नेह जैसा दिखता है, या उस आदत जैसा जिसने उसे राम का पिता भी बनाया और राम से अलग भी किया?
दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ और पुत्र जन्म · अग्नि से निकला तपे सोने का पात्र, तीन रानियों में चार बार बँटा पायस, और एक दरिद्र को मिला धन।
विश्वामित्र, ताड़का वध, यज्ञ रक्षा · द्वार पर एक ऋषि, रावण के नाम पर मुकरता एक पिता, और फिर बेटे का सूँघा हुआ मस्तक।
अग्नि परीक्षा, अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक · लंका के आकाश में इन्द्र का विमान, गोद में बिठाया हुआ बेटा, और कैकेयी के लिए माँगी गई कृपा।
जिसने वचन का मोल चुकाया
पूरा पढ़िए तो वाल्मीकि के दशरथ के जीवन में वचन एक के ऊपर एक रखे हैं, और हर नया वचन पिछले को खींचता है। विश्वामित्र को दिया वचन रावण के नाम पर डगमगाता है और वसिष्ठ के कहने पर निभता है; सभा में की गई घोषणा कोपभवन की शपथ से टकराती है; और कोपभवन की शपथ, जो माँग सुनने से पहले दी गई थी, बाकी सबको हरा देती है। बालकाण्ड का पहला सर्ग जिस पुरुष का पता पूछता है, उसका एक गुण यह है कि उसकी प्रतिज्ञा अटल हो; काव्य वह गुण राम में दिखाता है, और उसका पहला मोल राम के पिता से वसूल करता है। इस राजा में डर है, जो हर ऋषि के सामने पहले बोलता है, और स्नेह है, जो हर बार डर को हराकर बेटे को सौंप देता है; कोपभवन में वही स्नेह, बिना सुने, कैकेयी को भी सौंप दिया गया। वे किसी को दोष देने से पहले अपने को दोष देते हैं: कौसल्या के धिक्कार पर हाथ जोड़ते हैं, और छठी रात अपने पुराने बाण को अपने आप याद करते हैं, जिसे काव्य ने उनके अन्त की व्याख्या के रूप में रखा है। उनके मुख से विदा के समय एक ही शब्द निकला, और वह शब्द उनके बेटे का नाम था; उसी नाम को पुकारते हुए वे गए। लंका के आकाश में विमान पर जब वे लौटे, तो राम ने उनसे पहली कृपा कैकेयी के लिए माँगी, और पिता ने वह भी दे दी। जिसने जीवन भर सुनने से पहले दिया, उसे काव्य अन्त में एक बार और देते हुए छोड़ता है।
आधार संस्करण और इस परिचय का दायरा
आधार संस्करण: इस पुस्तकालय में प्रयुक्त गीताप्रेस वाल्मीकि रामायण, संस्कृत मूल और हिन्दी अनुवाद, सातों काण्ड। इस प्रस्तुति के प्रसंग: बालकाण्ड 8 से 22, 69 से 70 और 73 से 77; अयोध्याकाण्ड 1 से 4, 10 से 14, 18, 31 से 40 और 57 से 66; युद्धकाण्ड 119। इस प्रस्तुति का दायरा: बालकाण्ड से युद्धकाण्ड तक खींचा गया पात्र चित्र; उद्धृत वचन इस पुस्तकालय की वाल्मीकि रामायण की कड़ियों के हिन्दी पाठ से, जो गीताप्रेस पाठ पर आधारित है।
सीमाएँ और पाठ भेद: सरयू के तट पर मारा गया मुनिकुमार वाल्मीकि के पाठ में अनाम है और यहाँ भी अनाम रखा गया है। तुलसीदास के रामचरितमानस के दशरथ दूसरी कथा के दशरथ हैं और केवल नामित हैं; उनका कोई प्रसंग इस परिचय में नहीं मिलाया गया।