पार्वती की तपस्या

ब्रह्माजी देवर्षि नारद से कहते हैं, सुनिए। आपने गिरिराजकुमारी को शिवपंचाक्षर मन्त्र का उपदेश देकर जबसे विदा ली, उनका चित्त खिल उठा और निश्चय जम गया कि महादेव केवल तपस्या से ही सधेंगे। उन्होंने सखियों जया और विजया के हाथ पिता हिमाचल और माता मेना से वन जाने की आज्ञा मँगवायी। पिता ने स्वीकार कर लिया, पर मेना ने स्नेहवश बेटी को अनेक प्रकार से समझाया और घर से दूर वन में तप करने से रोका। रोकते हुए उनके मुख से दो अक्षर निकले, उ, मा, अर्थात् न जाइए। उसी दिन से शिवा का नाम उमा पड़ गया।

पर बेटी को दुखी देखकर मेना ने विचार बदल दिया और तपस्या की आज्ञा दे दी। आज्ञा पाते ही उत्तम व्रत वाली पार्वती ने शंकर का स्मरण करके बड़े सुख का अनुभव किया, माता पिता को प्रणाम किया और दोनों सखियों के साथ चल पड़ीं। राजकुमारी के प्रिय वस्त्र वहीं छूट गये; कमर में मूँज की मेखला बँधी, देह पर वल्कल आये, और हार की जगह हृदय से मृगचर्म लगा। वे गंगावतरण तीर्थ की ओर चलीं, गंगोत्तरी की ओर।

हिमालय का वही शिखर, जहाँ ध्यानस्थ शंकर ने कामदेव को दग्ध किया था, गंगावतरण कहलाता है। वहीं परम उत्तम शृंगीतीर्थ में पार्वती ने तपस्या आरम्भ की; गौरी के तप से ही उसका नाम गौरी शिखर पड़ गया। शिवा ने अपने तप की परीक्षा के लिये वहाँ बहुत से सुन्दर, पवित्र, फल देने वाले वृक्ष भी लगाये।

पंचाग्नि के बीच

पहले भूमि शुद्ध करके उन्होंने एक वेदी बनायी, फिर मन समेत सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके वह तपस्या आरम्भ की जो मुनियों के लिये भी दुष्कर थी। ग्रीष्म में चारों ओर दिन रात आग जलाये उन ज्वालाओं के बीच बैठतीं और निरन्तर पंचाक्षर मन्त्र जपतीं। वर्षा में वेदी या पत्थर की चट्टान पर आसन जमाये आकाश से गिरती जलधाराओं में भीगती रहतीं। शीतकाल में निराहार रहकर शीतल जल के भीतर खड़ी रहतीं और रातें चट्टानों पर बैठकर काटतीं। इस तप के बीच शिवा मनोवांछित फलों के दाता शिव का ध्यान करतीं, अवकाश मिलने पर सखियों के साथ अपने लगाये वृक्ष सींचतीं और आश्रम में पधारे अतिथियों का सत्कार करतीं। प्रचण्ड आँधी, कड़ाके की सर्दी, वर्षा, दुःसह धूप, जो दुख आये, उन्होंने कुछ नहीं गिना; मन शिव में लगाये वे सुस्थिर भाव से वहीं टिकी रहीं।

पहला वर्ष फलाहार में बीता, दूसरा केवल पत्ते चबाकर, और इसी क्रम में असंख्य वर्ष व्यतीत हो गये। फिर हिमवान् की पुत्री ने पत्ते खाना भी छोड़ दिया और सर्वथा निराहार रहने लगीं, तो भी तपश्चर्या में अनुराग बढ़ता ही गया। भोजन के लिये पर्ण तक का परित्याग किया, इसलिये देवताओं ने उनका नाम अपर्णा रख दिया। अब वे शिव का स्मरण करती हुई एक पैर पर खड़ी होकर पंचाक्षर जपने लगीं; अंगों पर चीर और वल्कल, मस्तक पर जटाओं का समूह। इस तपस्या से उन्होंने मुनियों को भी जीत लिया, और उस तपोवन में महेश्वर का चिन्तन करते हुए काली के तीन हजार वर्ष बीत गये।

फिर वे उस स्थान पर क्षण भर ठहरीं जहाँ महादेवजी ने साठ हजार वर्षों तक तप किया था, और सोचने लगीं, क्या महादेवजी नहीं जानते कि मैं उनके लिये नियमों के पालन में तत्पर होकर तपस्या कर रही हूँ? फिर इतने दीर्घ काल से तपती हुई मुझ सेविका के पास वे आये क्यों नहीं? लोक, वेद और मुनि, सब कहते हैं कि भगवान् शंकर सर्वज्ञ, सर्वात्मा और सर्वदर्शी हैं, भक्तों को अभीष्ट वस्तु देते हैं, समस्त क्लेश हर लेते हैं। तब उन्होंने मन ही मन कहा, यदि मैंने समस्त कामनाएँ छोड़कर अपने आपको वृषभध्वज में लगाया है, यदि नारदतन्त्र का कहा शिवपंचाक्षर मन्त्र सदा उत्तम भक्तिभाव से विधिपूर्वक जपा है, यदि मैं शिव की भक्ति से युक्त और निर्विकार हूँ, तो वे कल्याणकारी भगवान् शंकर मुझ पर प्रसन्न हों। ऐसा नित्य चिन्तन करती हुई जटा वल्कलधारिणी पार्वती मुख नीचे किये सुदीर्घ काल तक तपस्या में लगी रहीं।

अब उस तप का दूसरा प्रभाव सुनिए। आश्रम के पास पहुँचते ही स्वभाव के विरोधी प्राणी वैर भूल जाते थे। सिंह और गौ परस्पर कोई बाधा नहीं पहुँचाते, चूहे बिल्ली जैसे जन्म के वैरी भी वहाँ रोष नहीं करते थे। वृक्षों में सदा फल लगे रहते, भाँति भाँति के तृण और विचित्र पुष्प वन की शोभा बढ़ाते। वह सारा वनप्रान्त कैलास के समान हो गया, मानो पार्वती के तप की सिद्धि ने ही वन का रूप धर लिया हो।

प्रतिज्ञा

बहुत वर्ष और बीत गये, भगवान् शंकर फिर भी प्रकट नहीं हुए। तब हिमाचल, मेना और मन्दराचल आदि आश्रम पर आये और उस दुष्कर तपस्या को छोड़कर घर लौट चलने का अनुरोध करने लगे। पार्वती ने कहा, पिताजी, माताजी, मेरे सभी बान्धव! मैंने पहले जो बात कही थी, क्या आप लोगों ने भुला दी? तो मेरी प्रतिज्ञा फिर सुन लीजिए। जिन्होंने रोष में कामदेव को भस्म किया, जिन्होंने इस पर्वत के वन तक को जला डाला, वे महादेवजी विरक्त सही, पर भक्तवत्सल भी हैं; मैं उन्हें केवल तपस्या से यहीं बुला लूँगी और अवश्य संतुष्ट करूँगी। आप सब प्रसन्नता से अपने अपने घर जाइए, और यह जान लीजिए कि महान् तपोबल से ही सदाशिव की सेवा सुलभ हो सकती है। यह मैं आप लोगों से सत्य, सत्य कहती हूँ।

इतना कहकर सुमधुर भाषिणी पर्वतराजकुमारी चुप हो गयीं, और सुमेरु आदि पर्वत गिरिजा की बारंबार प्रशंसा करते, विस्मित, जैसे आये थे वैसे ही लौट गये। उनके जाते ही सखियों से घिरी पार्वती ने यथार्थ निश्चय करके पहले से भी अधिक उग्र तपस्या आरम्भ कर दी।

तीनों लोक तपने लगे

अब आगे सुनिए। देवताओं, असुरों, मनुष्यों और चराचर प्राणियों समेत समस्त त्रिलोकी उस महती तपस्या से संतप्त हो उठी। देवता, असुर, यक्ष, किन्नर, चारण, सिद्ध, साध्य, मुनि, विद्याधर, बड़े बड़े नाग, प्रजापति, गुह्यक, सब महान् से महान् कष्ट में पड़ गये, और कारण किसी की समझ में नहीं आया। तब इन्द्र आदि देवता बृहस्पति से सलाह लेकर बड़ी विह्वलता से सुमेरु पर मुझ विधाता की शरण में आये; अंग संतप्त, कान्ति उतरी हुई। प्रणाम और स्तुति करके उन्होंने एक साथ पूछा, प्रभो! जगत् के संतप्त होने का क्या कारण है?

मैंने मन ही मन शिव का स्मरण करके जान लिया कि विश्व का यह दाह गिरिजा की तपस्या का फल है, और उन सबको लेकर शीघ्र क्षीरसागर गया। वहाँ सुखद आसन पर विराजमान श्रीहरि की देवताओं समेत हाथ जोड़कर स्तुति की और कहा, महाविष्णो! पार्वती के परम उग्र तप से संतप्त होकर हम सब आपकी शरण में आये हैं। हमें बचाइए।

लक्ष्मीपति बोले, देवताओ! मैंने आज पार्वती की तपस्या का सारा कारण जान लिया है। अब आप सबके साथ परमेश्वर शिव के समीप चलता हूँ; हम सब मिलकर प्रार्थना करेंगे कि वे गिरिजा को ब्याह लें। संसार के कल्याण के लिये देवाधिदेव पिनाकधारी शिवा को वर लें, इसके लिये जैसे भी बने, उनके आश्रम पर चलकर प्रयत्न करेंगे।

पर यह सुनकर देवता काँप उठे। बोले, भगवन्! जो कालाग्नि के समान दीप्तिमान् हैं, जिनके नेत्र भयानक हैं, उन रोष भरे महाप्रभु रुद्र के पास हम नहीं जा सकते; जैसे उन्होंने कुपित होकर दुर्जय काम को भस्म किया, वैसे ही हमें भी दग्ध कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं। श्रीहरि ने सान्त्वना दी, देवताओ! प्रेम और आदर से मेरी बात सुनिए। भगवान् शिव देवताओं के स्वामी और उनके भय का नाश करने वाले हैं; वे आपको दग्ध नहीं करेंगे। वे पुराणपुरुष, सर्वेश्वर, परात्पर और स्वयं तपस्वी हैं; उन कल्याणकारी शम्भु की शरण में हम सबको अवश्य चलना चाहिये।

शिव के द्वार पर

विष्णु के ऐसा कहने पर सब देवता उनके साथ पिनाकपाणि का दर्शन करने चले। मार्ग में पहले पार्वती का आश्रम पड़ता था, सो सब कौतूहलपूर्वक वहाँ गये, और गिरिराजनन्दिनी के श्रेष्ठ तप को देखते ही उनके उत्तम तेज से व्याप्त हो गये। तपस्या में लगी उन तेजोमयी जगदम्बा को नमस्कार करके, साक्षात् सिद्धिस्वरूपा शिवा देवी के तप की भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए, वे उस ओर बढ़े जहाँ भगवान् वृषभध्वज विराजमान थे।

पर पहले पास जाने का साहस किसे हुआ? नारद! देवताओं ने सबसे पहले आपको ही भेजा और स्वयं मदन का दहन करने वाले हर से दूर खड़े देखते रहे कि भगवान् कुपित हैं या प्रसन्न। आप ठहरे सदा निर्भय और विशेष रूप से शिव के भक्त; आपने पास जाकर उन्हें सर्वथा प्रसन्न देखा और लौटकर श्रीविष्णु आदि सबको उनके स्थान पर ले गये। वहाँ सबने देखा, भक्तवत्सल शिव प्रसन्न मुद्रा में, अपने गणों से घिरे, तपस्वी का रूप धारण किये योगपट्ट पर आसीन हैं। मुझ ब्रह्मा सहित श्रीविष्णु, देवताओं, सिद्धों और मुनीश्वरों ने प्रणाम करके वेदों और उपनिषदों के सूक्तों द्वारा उनका स्तवन किया।

तब दयालु नन्दिकेश्वर ने भगवान् की दीनबन्धुता की प्रशंसा करते हुए निवेदन किया, प्रभो! देवता और मुनि संकट में पड़कर आपकी शरण आये हैं; सर्वेश्वर! आप इनका उद्धार करें। नन्दी के सूचित करने पर भगवान् शम्भु धीरे धीरे आँखें खोलकर ध्यान से उपरत हुए और समाधि से विरत होकर बोले, श्रीविष्णु और ब्रह्मा आदि देवेश्वरो! आप सब मेरे समीप कैसे आये? आने का जो भी कारण हो, शीघ्र बताइए।

सब देवता कारण बताने के लिये विष्णु के मुख की ओर देखने लगे। तब शिव के महान् भक्त श्रीविष्णु ने कहा, शम्भो! तारकासुर ने देवताओं को महान् कष्ट दिया है, यही निवेदन करने सब यहाँ आये हैं। भगवन्! आपके औरस पुत्र से ही वह तारक दैत्य मारा जा सकेगा, किसी और प्रकार से नहीं; मेरा यह कथन सर्वथा सत्य है। स्वामिन्! तारकासुर के पीड़ित इन देवताओं का उद्धार कीजिए। देव! शम्भो! आप अपने दाहिने हाथ से गिरिजा का पाणिग्रहण करें; गिरिराज हिमवान् की दी हुई महानुभावा पार्वती को पाणिग्रहण के द्वारा ही अनुगृहीत कीजिए।

उसी गौरी शिखर पर एक ओर एक पैर पर खड़ी अपर्णा का जप चल रहा था, दूसरी ओर योगपट्ट पर बैठे योगी के सम्मुख विवाह का अनुरोध रखा था। जिन्होंने काम को भस्म किया, वर बनने की प्रार्थना अब उन्हीं से थी। महादेव ने इस पर क्या कहा, और गिरिजा की कैसी परीक्षा ली, वह अगली कथा है।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (पार्वती खण्ड)