
सिद्धाश्रम में यज्ञ की रक्षा पूरी हो चुकी थी। उस रात दोनों वीर, श्रीराम और लक्ष्मण, प्रसन्न मन से विश्वामित्र की यज्ञशाला में ही रहे। प्रातः की संध्या-वंदना (दिन के आरम्भ की उपासना) समाप्त करके दोनों भाई ऋषियों के पास पहुँचे और प्रज्वलित अग्नि-से तेजस्वी मुनि को प्रणाम करके मधुर वचन कहे। तब सब महर्षियों ने, विश्वामित्र की अनुमति से, श्रीराम से कहा, “मिथिला के राजा जनक एक परम पवित्र यज्ञ करने जा रहे हैं। हम सब वहाँ चलेंगे। आप भी हमारे साथ चलिए। वहाँ आपको एक अद्भुत धनुष-रत्न देखने को मिलेगा।”
यह अध्याय एक यात्रा है। मिथिला की ओर बढ़ते हुए विश्वामित्र, श्रीराम के पूछने पर, रास्ते में पड़ने वाली भूमि और नदियों की कथाएँ सुनाते हैं। इन्हीं कथाओं में अपने कुल का इतिहास, गंगा का धरती पर उतरना, राजा सगर का आख्यान, और अन्त में अहल्या का उद्धार आता है। हर कथा एक स्थान से जुड़ी है।
वह धनुष, और शोण के तट पर पहला पड़ाव

मुनियों ने धनुष का वृत्तान्त सुनाया। यह धनुष इतना भयंकर और तेजस्वी था कि उसका भार आँका नहीं जा सकता था। प्राचीन काल में देवताओं ने, जिन्हें यह भगवान शिव से प्राप्त हुआ था, इसे एक यज्ञ-सभा में मिथिला के पूर्व-राजा देवरात को भेंट किया था। न देवता, न गन्धर्व, न असुर, न राक्षस इसे झुका सके, मनुष्यों की तो बात ही क्या। बड़े-बड़े बलशाली राजपुत्र इसका बल आँकने की लालसा में आए और चढ़ाने में असफल रहे। नाना सुगन्धों और चन्दन से इसकी पूजा होती है, और यह राजा के महल में पूजा की वस्तु बनकर स्थापित है।
एक उप-कथा: गीता प्रेस की टिप्पणी में बताया गया है कि अन्यत्र यह भी कहा गया है कि यह धनुष मिथिला के एक राजा को स्वयं भगवान शिव ने दिया था। पद्म-पुराण और कूर्म-पुराण में यही परम्परा मिलती है, जहाँ प्रसन्न होकर त्रिशूलधारी नीललोहित शिव ने शत्रु-नाश के लिए जनक-वंश को यह अद्भुत धनुष प्रदान किया।

ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र, कुश के वंशज, ने उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किया। उनके पीछे यज्ञ-सामग्री से लदी सौ (100) से अधिक गाड़ियाँ चलीं, जो वेद के ज्ञाता उनके अनुयायियों की थीं। सिद्धाश्रम में रहने वाले पशु-पक्षियों के झुंड भी महात्मा विश्वामित्र के पीछे चल पड़े, पर विश्वामित्र ने उन्हें लौटा दिया। बहुत दूर का मार्ग तय करके, सूर्यास्त के समय, मुनिगण शोण नदी के तट पर रुके। नदी में स्नान करके, सूर्यास्त होने पर अग्नि-होम करके वे सब बैठ गए, विश्वामित्र को आगे रखकर। श्रीराम ने मुनियों का पूजन करके विश्वामित्र के सामने आसन ग्रहण किया और कौतूहल से पूछा, “भगवन्, यह कौन-सा देश है, जो समृद्ध वन से सुशोभित है? मैं इसे यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।” तब उस प्रश्न से प्रेरित होकर महातपस्वी विश्वामित्र ने ऋषियों के बीच उस देश की कथा विस्तार से कहनी आरम्भ की। (सर्ग 31)
सार: मिथिला का धनुष-यज्ञ ही यात्रा का गन्तव्य है, और शोण के तट पर श्रीराम का एक प्रश्न ही उन सारी कथाओं का द्वार खोल देता है जो अब आने वाली हैं।
कुश के चार पुत्र, और कुशनाभ की सौ कन्याएँ
विश्वामित्र ने कहा, “ब्रह्मा से उत्पन्न कुश नाम के एक महातपस्वी राजा थे, जो धर्म के ज्ञाता और सज्जनों के आदर-करने वाले थे। विदर्भ की एक कुलीन रानी से उन्होंने चार बलवान पुत्र उत्पन्न किए, कुशाम्ब, कुशनाभ, असूर्तरजस और वसु, जो तेजस्वी, उत्साही, धर्मिष्ठ और सत्यवादी थे। उन्हें क्षत्रिय-धर्म के अनुसार प्रजा की रक्षा के कार्य में लगाने की इच्छा से कुश ने कहा, ‘पुत्रो, आप प्रजा का पालन कीजिए; इससे आपको अपार पुण्य मिलेगा।’ पिता का वचन सुनकर चारों ने चार नगर बसाए।
कुशाम्ब ने कौशाम्बी नगरी बसाई; धर्मात्मा कुशनाभ ने महोदय नगर बसाया, जो आज का कन्नौज है। असूर्तरजस ने धर्मारण्य नगर बसाया, और वसु ने सब नगरों में श्रेष्ठ गिरिव्रज (आज का राजगीर) बसाया। वसु की वह राजधानी पाँच (5) पर्वतों के बीच में शोभा पाती थी, और इसीलिए वसुमती कहलाई। पाँचों श्रेष्ठ शैल चारों ओर अपनी आभा बिखेरते हैं। शोण नदी, जो इन पाँच पर्वतों के बीच माला-सी फैली है, मगध की ओर बहती है और इसी कारण पवित्र मागधी कहलाती है।
एक उप-कथा: बाद की परम्परा में (महाभारत के अनुसार) गिरिव्रज के ये पाँच पर्वत विपुल, वराह, ऋषभ, ऋषिगिरि (मातंग) और चैत्यक कहलाते हैं। असूर्तरजस के स्थान पर ‘अमूर्तरजस’ पाठ भी मिलता है, और इस वंश को गया तथा धर्मारण्य की भूमि से जोड़ा जाता है।
“धर्मात्मा राजर्षि कुशनाभ ने घृताची नामक अप्सरा से सौ (100) कन्याएँ उत्पन्न कीं, जो अनुपम सुन्दरी थीं। यौवन में उनकी सुन्दरता और भी बढ़ गई। एक दिन वे आभूषणों से सज्जित होकर उद्यान-भूमि में आईं, जैसे मेघों के बीच तारे। वे गाती, नाचती और वीणा बजाती हुई परम आनन्द में थीं। उन्हें देखकर सर्वत्र व्याप्त रहने वाले वायुदेव ने कहा, ‘मैं आप सबको चाहता हूँ; आप मेरी पत्नियाँ बनिए। मनुष्य-भाव छोड़ दीजिए, तो दीर्घ आयु पाएँगी। यौवन सदा चंचल है, विशेषकर मनुष्यों में; मुझे स्वीकार कीजिए तो अक्षय यौवन और अमरता पाएँगी।’
“कन्याओं ने उस वचन की हँसी उड़ाते हुए उत्तर दिया, ‘हे देवश्रेष्ठ, आप प्राण-रूप से सब प्राणियों के भीतर विचरते हैं, हम आपका प्रभाव जानती हैं, फिर भी हम आपकी ओर आकृष्ट नहीं हैं। आप हमारा अपमान क्यों करते हैं? हम कुशनाभ की कन्याएँ हैं; हम चाहें तो शाप देकर आपको आपके स्थान से गिरा दें, पर अपनी तपस्या की रक्षा करती हैं। वह बुरा क्षण कभी न आए जब हम अपने सत्यवादी पिता का अपमान करके स्वयं कोई वर चुनें। पिता ही हमारे स्वामी और परम देवता हैं; जिसे पिता हमें देंगे, वही हमारा पति होगा।’
“यह दृढ़ उत्तर सुनकर वायुदेव अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और उन सबके अंगों में प्रवेश करके उन्हें टेढ़ा कर दिया। कन्याएँ कुब्जा (कुबड़ी) होकर, लज्जित और अश्रुपूरित नेत्रों से, पिता के महल में लौटीं। उन परम सुन्दर, दीन और विकृत कन्याओं को देखकर राजा कुशनाभ घबरा गए और बोले, ‘पुत्रियो, यह क्या है? किसने धर्म का अपमान किया? आप सब किसके द्वारा कुबड़ी बनाई गईं, और चेष्टा करते हुए भी बोलती क्यों नहीं?’ ऐसा पूछकर, एक गहरी साँस भरकर राजा उत्तर सुनने को स्थिर हुए। (सर्ग 32)
सार: कुश का वंश गिरिव्रज और कन्नौज की भूमि से जुड़ा है; और कुशनाभ की सौ कन्याओं ने पिता की मर्यादा के आगे अमरता का प्रलोभन ठुकरा दिया, चाहे इसके लिए कुबड़ी ही क्यों न होना पड़े।
क्षमा की महिमा, और ब्रह्मदत्त से विवाह
“कन्याओं ने सिर से पिता के चरण छूकर कहा, ‘राजन्, सर्वव्यापी वायुदेव ने अशुभ मार्ग पकड़कर हमें भ्रष्ट करना चाहा और हमारे धर्म का आदर नहीं किया। हमने कहा था, हम पिता के अधीन हैं, स्वतन्त्र नहीं; पिता से हमें माँगिए, वे दे दें तो हम आपको पति मानेंगी। पर उस पापी ने हमारी बात न मानी और हमें कठोर प्रहार से विकृत कर दिया।’
“यह सुनकर परम धार्मिक राजा ने उत्तर दिया, ‘पुत्रियो, आपने जो क्षमा की, वह केवल क्षमाशील ही कर सकते हैं; यह अत्यन्त उत्तम कार्य है। और आप सबने एकमत होकर हमारे कुल की मर्यादा की रक्षा की, यह भी अनुपम है। क्षमा नारियों और पुरुषों, दोनों का आभूषण है। देवताओं के प्रति भी ऐसी क्षमा दुष्कर है। क्षमा ही दान है, क्षमा ही सत्य है, क्षमा ही यज्ञ है; क्षमा ही यश है, क्षमा ही धर्म है; इस सम्पूर्ण जगत् की प्रतिष्ठा क्षमा में ही है।’ तब कन्याओं को अन्तःपुर में भेजकर, मन्त्रों में निपुण राजा ने मन्त्रियों के साथ उनके विवाह की चर्चा की, क्योंकि उचित समय और स्थान पर योग्य वर को कन्याएँ देना आवश्यक था।
एक उप-कथा (ब्रह्मदत्त का जन्म): इसी समय चूली नाम के एक ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी (जिन्होंने अपनी जीवन-शक्ति को सदा संयमित रखा) ब्रह्म की प्राप्ति के लिए तप कर रहे थे। ऊर्मिला की पुत्री, सोमदा नामक गन्धर्व-कन्या, उनकी सेवा करती थी। प्रसन्न होकर ऋषि ने वर पूछा, तो उस अविवाहित कन्या ने ब्रह्म-तेज से युक्त एक धार्मिक पुत्र माँगा। ऋषि ने उसे मानस-पुत्र ब्रह्मदत्त दिया। वह ब्रह्मदत्त परम राजसी ऐश्वर्य के साथ काम्पिल्या नगरी में, स्वर्ग में इन्द्र-सा, राज्य करता था।
“राजा कुशनाभ ने अपनी सौ कन्याएँ उसी ब्रह्मदत्त को देने का निश्चय किया। उसे बुलाकर परम प्रसन्न मन से सब कन्याएँ अर्पित कर दीं। ब्रह्मदत्त ने इन्द्र-सा शोभायमान होकर, ज्येष्ठता के क्रम से, एक-एक का हाथ ग्रहण किया। जैसे ही उसका हाथ छुआ, कन्याएँ अपनी विकृति और पीड़ा से मुक्त हो गईं और परम शोभा से प्रकाशित हो उठीं। कुशनाभ अपनी कन्याओं को वायु के दोष से मुक्त देखकर बार-बार आनन्दित हुए। फिर राजा ने नवविवाहित ब्रह्मदत्त को उसकी पत्नियों और उपाध्यायों के साथ विदा किया। सोमदा भी अपने पुत्र का योग्य विवाह देखकर, बहुओं का अभिनन्दन करके और कुशनाभ की प्रशंसा करके वहाँ से चली गई। (सर्ग 33)
सार: क्षमा कन्याओं का परम बल बनी; और जिस हाथ ने उन्हें वर के रूप में थामा, उसी स्पर्श से उनकी विकृति स्वयं मिट गई।
गाधि का जन्म, और विश्वामित्र का अपना वंश
“ब्रह्मदत्त के विदा होने पर, पुत्रहीन कुशनाभ ने पुत्र-प्राप्ति के लिए यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञ चलते समय उनके पिता, ब्रह्मा के पुत्र महात्मा कुश, प्रकट होकर बोले, ‘पुत्र, आपके योग्य एक परम धार्मिक पुत्र होगा। गाधि नाम का वह पुत्र आपको संसार में अक्षय कीर्ति दिलाएगा।’ ऐसा कहकर कुश आकाश-मार्ग से सनातन ब्रह्मलोक को लौट गए। कुछ काल बाद कुशनाभ को गाधि नाम का परम धार्मिक पुत्र हुआ।
“हे काकुत्स्थ, वही परम धार्मिक गाधि मेरे पिता थे। कुश के वंश में जन्म लेने के कारण मैं कौशिक कहलाता हूँ। मेरी एक बड़ी बहन भी थी, सुव्रता, सत्यवती नाम की, जो ऋचीक मुनि को ब्याही गई थी। पति का अनुसरण करते हुए वह सशरीर स्वर्ग गई और बाद में एक परम कल्याणकारी महानदी, कौशिकी (आज की कोसी), बन गई, जो हिमालय के पार्श्व में बहती है। मैं अपनी बहन के स्नेह में हिमालय के पास कौशिकी के तट पर सुखपूर्वक रहता था। फिर यज्ञ के नियम के कारण मैं वह स्थान छोड़कर सिद्धाश्रम आया, जहाँ आपके तेज से मेरा कार्य सिद्ध हुआ। इस प्रकार मैंने अपने जन्म, अपने वंश और इस गिरिव्रज की भूमि का इतिहास कह दिया, जो आपने पूछा था।

“आधी रात बीत चुकी है। अब विश्राम कीजिए, ताकि मार्ग में कोई विघ्न न हो। सब वृक्ष निश्चल हैं, पशु-पक्षी सो गए हैं, दिशाएँ रात्रि के अन्धकार से ढकी हैं। संध्या धीरे-धीरे लुप्त हो गई है और आकाश नक्षत्रों और तारों से, मानो असंख्य नेत्रों से ढका, ज्योतियों से चमक रहा है। शीतल किरणों वाला चन्द्रमा उदय हो रहा है, अन्धकार को मिटाता और प्राणियों के मन को आह्लादित करता। रात्रिचर यक्ष, राक्षस और कच्चा मांस खाने वाले भयंकर प्राणी अब इधर-उधर विचर रहे हैं।” ऐसा कहकर महामुनि मौन हो गए, और सब ऋषियों ने ‘साधु, साधु’ कहकर उनकी प्रशंसा की।
ऋषियों ने कहा, “कुश का यह वंश महान् और सदा धर्मपरायण है; इस वंश के नरश्रेष्ठ ब्रह्मर्षियों के समान हैं। हे महायशस्वी विश्वामित्र, आप तो विशेषकर ऐसे हैं, जिन्होंने तप से ब्रह्मत्व प्राप्त किया; और सरिताओं में श्रेष्ठ कौशिकी ने आपके कुल की कीर्ति बढ़ाई।” इस प्रशंसा से प्रसन्न विश्वामित्र, अस्ताचल को जाते सूर्य की भाँति, निद्रा में लीन हो गए। श्रीराम भी, उनके कुल-इतिहास से कुछ विस्मित होकर, उनकी प्रशंसा करते हुए लक्ष्मण के साथ सो गए। (सर्ग 34)
सार: विश्वामित्र स्वयं इसी कुश-वंश के हैं, और उनकी बहन सत्यवती ही कोसी नदी बनी; इस प्रकार वंश, नदी और भूमि एक ही कथा के सूत्र में बँधे हैं।
शोण पार करके गंगा-तट पर, और गंगा की उत्पत्ति

शेष रात्रि शोण के तट पर बिताकर, सुन्दर प्रभात होने पर विश्वामित्र ने कहा, “हे राम, रात सुन्दर प्रभात में समाप्त हुई, प्रातः-संध्या आ गई है। उठिए, आगे चलने को तैयार होइए।” श्रीराम ने प्रातः-कृत्य पूरे करके पूछा, “हे ब्रह्मन्, पवित्र जल वाला यह शोण यहाँ उथला और बालुका-तटों से सुशोभित है। हम इसे किस घाट से पार करें?” विश्वामित्र बोले, “वही घाट, जिससे ये महर्षि उतर रहे हैं।” तब वे शोण को पार करके, और बहुत आगे चलकर, अपराह्न में सरिताओं में श्रेष्ठ गंगा को देखने पहुँचे, जो हंसों और सारसों से सेवित थी। पवित्र जल वाली उस नदी को देखकर सब मुनि और दोनों राघव आनन्दित हुए। उसके तट पर सब रुके, शास्त्रोक्त विधि से स्नान किया, पितरों और देवताओं को जल अर्पित किया, अग्नि-होम किया और अमृत-तुल्य हवि का अंश ग्रहण किया। फिर प्रसन्न मन से वे विश्वामित्र को घेरकर बैठ गए। तब श्रीराम ने प्रसन्न मन से कहा, “भगवन्, मैं त्रिपथगा गंगा के विषय में सुनना चाहता हूँ, जो स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल, तीनों लोकों में बहती है। तीनों लोकों को पार करके वह नद-नदियों के स्वामी समुद्र से कैसे मिली?”
एक समझ की कुंजी (त्रिपथगा): ‘त्रिपथगा’ का अर्थ है तीन मार्गों से चलने वाली। गंगा को इस नाम से इसलिए पुकारते हैं कि वह स्वर्ग (आकाश-गंगा/मन्दाकिनी, जो आकाश में मन्दाकिनी या क्षीर-पथ के रूप में दिखती है), पृथ्वी, और पाताल, तीनों लोकों में बहती है।
विश्वामित्र ने कहा, “पर्वतराज हिमालय धातुओं का महान् भण्डार है। उसकी दो कन्याएँ थीं, रूप में पृथ्वी पर अनुपम। उनकी माता मेना थीं, मेरु की पुत्री, जो हिमालय की प्रिय पत्नी थीं। उनसे हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री यह गंगा हुई, और दूसरी कन्या उमा नाम की हुई। देवकार्य की सिद्धि के लिए सब देवताओं ने पर्वतराज से ज्येष्ठ गंगा माँगी, जो स्वच्छन्द-गामिनी थी। धर्म के अनुसार और तीनों लोकों के कल्याण के लिए हिमालय ने अपनी पुत्री गंगा देवताओं को दे दी। देवता गंगा को लेकर सन्तुष्ट मन से लौट गए।
“हिमालय की दूसरी कन्या उमा, जिसने तप को ही अपना धन माना, ने कुमारी रहते हुए कठोर व्रत धारण करके भगवान शिव की आराधना में तप किया। पर्वतराज ने अनुपम रुद्र को वह उमा दे दी, जो उग्र तप से युक्त और सम्पूर्ण जगत् से पूजित थीं। हे राघव, गंगा और देवी उमा, ये हिमालय की दो प्रसिद्ध कन्याएँ हैं, जो सारे संसार से वन्दित हैं।
“इस प्रकार गंगा की उत्पत्ति बता दी। अब सुनिए वह त्रिपथगा कैसे बनी। पहले वह देवताओं के साथ आकाश में उठी, जो सब चलने वालों को मार्ग देता है। फिर पर्वतराज की वह कन्या मन्दाकिनी के रूप में स्वर्ग को चढ़ी, और अन्त में पृथ्वी पर बहने वाली, संसार के पाप हरने वाली गंगा बनी।” (सर्ग 35)
सार: गंगा और उमा, दोनों हिमालय की पुत्रियाँ हैं; गंगा देवताओं को सौंप दी जाती है और स्वर्ग से पृथ्वी तक तीन लोकों में बहने का अपना मार्ग रचती है।
शिव-उमा का तप-विघ्न, और कार्तिकेय का जन्म
श्रीराम ने और सुनने की इच्छा प्रकट की, “गंगा ने किस कारण तीनों लोकों को धोया? वह सरिताओं में श्रेष्ठ और त्रिपथगा कैसे विख्यात हुई?” तब विश्वामित्र ने पूरी कथा कही, “हे राम, बहुत पहले नीलकण्ठ शिव ने उमा से विवाह करके दाम्पत्य-सुख में लीन हुए। सौ (100) दिव्य वर्ष, जो छत्तीस हज़ार (36,000) मानव-वर्षों के बराबर हैं, उस क्रीड़ा में बीत गए, पर उनकी कोई सन्तान नहीं हुई।
एक समझ की कुंजी (दिव्य वर्ष): ‘दिव्य वर्ष’ देवताओं का मान है। पाठ स्वयं बताता है कि सौ दिव्य वर्ष लगभग छत्तीस हज़ार (36,000) पृथ्वी-वर्षों के बराबर हैं, अर्थात् एक दिव्य वर्ष लगभग 360 मानव-वर्ष का होता है।
“ब्रह्मा को आगे करके सब देवता वह क्रीड़ा रोकने को तत्पर हुए, क्योंकि वे सोच रहे थे, ‘इस दिव्य दम्पति की सन्तान का तेज कौन सहेगा?’ सब देवता शिव के पास जाकर प्रणाम करके बोले, ‘हे सर्वलोक-महेश्वर, जगत् के हित में लगे रहिए और हम देवताओं पर कृपा कीजिए। लोक आपके पुत्र-रूपी तेज को नहीं सह सकेंगे। ब्रह्म-तप में लीन रहकर आप दाम्पत्य-सुख से विरत होकर अपनी देवी के साथ तप कीजिए। तीनों लोकों के हित के लिए अपना तेज अपने ही भीतर धारण कीजिए; इन लोकों की रक्षा कीजिए, इन्हें नष्ट मत होने दीजिए।’
“देवताओं की बात सुनकर शिव ने ‘ऐसा ही हो’ कहकर उत्तर दिया, ‘मैं और उमा अपना तेज अपने ही भीतर धारण करेंगे; पृथ्वी और अन्य लोक भयरहित होकर रहें। किन्तु मेरा यह अनुपम तेज, जो स्थान से विचलित हो चुका है, उसे कौन ग्रहण करेगा? हे देवश्रेष्ठो, यह बताओ।’ देवताओं ने कहा, ‘जो तेज विचलित हुआ है, उसे पृथ्वी धारण करेगी।’ तब बलशाली शिव ने अपना तेज छोड़ दिया, जिससे पर्वतों और वनों सहित सारी पृथ्वी व्याप्त हो गई। फिर देवताओं ने अग्नि से प्रार्थना की, ‘वायु के साथ मिलकर रुद्र के इस उग्र तेज को ग्रहण करो।’ अग्नि (और वायु) से समाहित होकर वह तेज एक श्वेत पर्वत बन गया, और फिर अग्नि तथा सूर्य-सा देदीप्यमान एक श्वेत सरकण्डों का वन बन गया, जिसमें महातेजस्वी कार्तिकेय का जन्म हुआ, इसीलिए वे अग्नि-जन्मा कहलाते हैं।
“उस समय अत्यन्त प्रसन्न देवताओं और ऋषियों ने उमा और शिव की पूजा की। पर उमा क्रोध से लाल नेत्रों वाली होकर सब देवताओं को शाप देने लगीं, ‘पुत्र-कामना से मैं अपने पति से मिली थी, और आपने मुझे रोका; अब आप अपनी पत्नियों से सन्तान न उत्पन्न कर सकेंगे, आपकी पत्नियाँ इस दिन से सन्तानहीन रहें।’ देवताओं को ऐसा शाप देकर उन्होंने पृथ्वी को भी शाप दिया, ‘हे पृथ्वी, आपकी सतह अनेक रूपों वाली होगी और आपके अनेक स्वामी होंगे; मेरे क्रोध से कलुषित होकर आप पुत्र-सुख न पा सकेंगी, क्योंकि आपने नहीं चाहा कि मेरा पुत्र हो।’
एक उप-कथा: गीता प्रेस की टिप्पणी के अनुसार, बाद में पृथ्वी के अपने पति भगवान विष्णु (वराह-रूप) से जो पुत्र, राक्षस नरक, हुआ, उसका वध बाद में उन्हीं भगवान ने श्रीकृष्ण-रूप में किया।
“अपनी पत्नी के शाप से पीड़ित देवताओं को देखकर शिव वरुण की पश्चिम दिशा की ओर चल पड़े। वहाँ हिमालय के उत्तरी भाग में हिमवत्प्रभव नामक शिखर पर वे अपनी देवी उमा के साथ तप करने लगे। हे राम, यह उमा का विस्तृत वृत्तान्त कह दिया; अब लक्ष्मण के साथ गंगा की उत्पत्ति का शेष आख्यान सुनिए।” (सर्ग 36)
विश्वामित्र ने आगे कहा, “जब शिव उमा के साथ तप कर रहे थे, तब देवता, इन्द्र और अग्नि को आगे करके, अपनी सेना के लिए सेनापति की खोज में ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने मधुर वचनों से सान्त्वना देकर कहा, ‘उमा का यह वचन कि आप अपनी पत्नियों से सन्तान न पाएँगे, सत्य ही होगा; इसमें सन्देह नहीं। पर यह आकाश-गंगा है, जिसमें अग्नि शिव का बीज स्थापित करके एक ऐसा पुत्र उत्पन्न करेंगे, जो शत्रुओं को दबाने वाला और देव-सेना का सेनापति होगा। ज्येष्ठ पर्वत-कन्या गंगा उसे अपना पुत्र मानेगी, और उमा को भी यह स्वीकार होगा।’
“यह सुनकर देवताओं ने ब्रह्मा को प्रणाम किया और कैलास पहुँचकर अग्नि को पुत्र उत्पन्न करने के लिए नियुक्त किया। अग्नि ने गंगा के पास जाकर कहा, ‘हे देवि, यह गर्भ धारण करो; यह देवताओं का प्रिय कार्य है।’ अग्नि का दिव्य रूप देखकर शिव का बीज चारों ओर पिघल गया, और अग्नि ने गंगा को सब ओर से उस तेज से भर दिया, जिससे उसकी सब नाड़ियाँ संतृप्त हो गईं। गंगा बोली, ‘हे देव, मैं आपके तेज से और बढ़े हुए शिव के तेज को धारण नहीं कर सकती।’ अग्नि ने कहा, ‘इस गर्भ को हिमालय के किसी पार्श्व में स्थापित कर दो।’ तब गंगा ने वह अत्यन्त देदीप्यमान तेज अपनी नाड़ियों से निकाल दिया, जो तपे हुए स्वर्ण-सा चमका।
“गंगा से निकलकर वह जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरा, वहाँ अनुपम कान्ति वाला सोना और चाँदी बन गया; ताप की तीव्रता से दूर के क्षेत्र ताँबा और लोहा बन गए; और मल टिन और सीसा बन गया। इस प्रकार पृथ्वी पर पहुँचकर वह बीज नाना धातुओं के रूप में बढ़ा। जिस श्वेत सरकण्डों के वन और श्वेत पर्वत का उल्लेख हुआ, वह उस तेज से सुनहरा हो गया। तभी से, हे राम, अग्नि-सा चमकने वाला स्वर्ण ‘जातरूप’ कहलाया, क्योंकि उसी समय उसका सुन्दर रूप प्रकट हुआ; और घास, लता, वृक्ष व झाड़ी, सब उस स्पर्श से सोना हो गए।

“कृत्तिकाओं ने उस नवजात शिशु को दूध पिलाने का संकल्प किया। षण्मुख (छह मुख वाला) होकर शिशु ने छहों कृत्तिकाओं का दूध एक साथ पिया। देवताओं ने कहा, ‘यह बालक तीनों लोकों में कृत्तिकाओं का पुत्र, कार्तिकेय, कहलाएगा।’ और क्योंकि वह गंगा के गर्भ से स्खलित (निकला) था, देवताओं ने उसका नाम स्कन्द रखा। केवल एक दिन का दूध पीकर वह कोमल-शरीर बालक इतना बलवान हुआ कि उसने अपने पराक्रम से दैत्य-सेना की कई टुकड़ियाँ जीत लीं। तब अग्नि को आगे करके सब देवताओं ने उस महातेजस्वी बालक को देव-सेना का सेनापति अभिषिक्त किया।
“हे राम, यह गंगा का विस्तृत वृत्तान्त और कुमार (स्कन्द) के जन्म की कथा कह दी, जो धन और पुण्य देने वाली है। जो मनुष्य कार्तिकेय का भक्त होता है, वह पुत्र-पौत्रों के साथ दीर्घायु पाता और स्कन्द के दिव्य लोक में स्थान पाता है।” (सर्ग 37)
सार: शिव का अधारणीय तेज अग्नि और गंगा से होकर स्कन्द-कार्तिकेय के रूप में मूर्त होता है, जो देव-सेना का सेनापति बनता है, और उसी तेज से पृथ्वी की धातुएँ जन्म लेती हैं।
राजा सगर, उनकी दो रानियाँ, और साठ हज़ार पुत्र
विश्वामित्र ने मधुर वाणी में दूसरी कथा आरम्भ की, “हे वीर राम, प्राचीन काल में अयोध्या पर सगर नाम के एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे, जो सन्तानहीन होने से प्रजा (सन्तान) की कामना करते थे। उनकी ज्येष्ठ पत्नी विदर्भ-राज की कन्या केशिनी थीं, धर्मिष्ठ और सत्यवादिनी। दूसरी पत्नी सुमति थीं, जो अरिष्टनेमि (कश्यप) की पुत्री और सुपर्ण (गरुड़) की बहन थीं।
“दोनों पत्नियों के साथ महाराज ने हिमालय पर भृगु-प्रस्रवण नामक शिखर पर तप किया। सौ (100) वर्ष पूर्ण होने पर भृगु ने प्रसन्न होकर वर दिया, ‘हे निष्पाप, आपको बहुत-से पुत्र होंगे और संसार में अनुपम कीर्ति मिलेगी। आपकी एक पत्नी वंश चलाने वाला एक पुत्र देगी, और दूसरी साठ हज़ार (60,000) पुत्र देगी।’ दोनों रानियों ने हाथ जोड़कर पूछा, ‘किसे एक पुत्र होगा और किसे अनेक?’ भृगु बोले, ‘आपकी अपनी इच्छा से निर्णय हो; एक वंश चलाने वाला एक पुत्र पाएगी, दूसरी साठ हज़ार यशस्वी पुत्र। बताइए, कौन कौन-सा वर चाहती है?’ ज्येष्ठ केशिनी ने राजा के सामने वंश चलाने वाला एक पुत्र चुना, और गरुड़ की बहन सुमति ने साठ हज़ार उत्साही पुत्र माँगे। राजा ऋषि की परिक्रमा करके, प्रणाम करके, दोनों पत्नियों के साथ अपनी राजधानी लौटे।
एक समझ की कुंजी (साठ हज़ार): साठ हज़ार (60,000) पुत्रों की यह संख्या एक प्रतीकात्मक विशाल पैमाना है। आगे ये सब मिलकर घोड़े की खोज में सारी पृथ्वी खोद डालते हैं, इसलिए कथा में यह बड़ी संख्या एक ‘अनगिनत सेना’-सा भाव देती है।

“समय आने पर ज्येष्ठ केशिनी ने असमंज नामक एक पुत्र को जन्म दिया। सुमति ने एक तूँबी (लौकी)-सा गर्भ जना; जब वह फूट गया तो उसमें से साठ हज़ार पुत्र निकले। धायों ने उन्हें घी से भरे घड़ों में रखकर पाला, और बहुत समय बाद वे सब युवा हुए। पर ज्येष्ठ पुत्र असमंज दुष्ट था: वह बालकों को पकड़कर सरयू के जल में फेंक देता और उन्हें डूबते देखकर हँसता था। ऐसा पापाचारी, सज्जनों को कष्ट देने वाला और प्रजा का अहित करने वाला असमंज पिता द्वारा नगर से निकाल दिया गया। पर असमंज का पुत्र, वीर अंशुमान, सबका प्रिय और मधुरभाषी था। बहुत समय बाद राजा सगर ने यज्ञ करने का दृढ़ निश्चय किया और वेद-ज्ञाता राजा ने अपने उपाध्यायों के साथ यज्ञ आरम्भ किया।” (सर्ग 38)
सार: सगर को एक ओर वंश चलाने वाला असमंज (जो दुष्ट निकला) और दूसरी ओर साठ हज़ार पुत्र मिलते हैं; पर वंश की आशा असमंज के सुशील पुत्र अंशुमान में टिकी है।
अश्वमेध, चुराया हुआ घोड़ा, और पृथ्वी का खनन
श्रीराम ने प्रसन्न होकर पूछा, “हे ब्रह्मन्, मेरे पूर्वज सगर ने यह यज्ञ कैसे किया? मैं इसे विस्तार से सुनना चाहता हूँ।” विश्वामित्र मानो हँसते हुए बोले, “सुनिए। शिव के श्वसुर हिमवान और विन्ध्य पर्वत आमने-सामने देखते हैं; उन दोनों के बीच की भूमि में वह यज्ञ हुआ। वह भूमि यज्ञ के लिए प्रशस्त है। दृढ़ धनुर्धर, महारथी अंशुमान सगर की आज्ञा से यज्ञ के अश्व की रक्षा करते हुए उसके पीछे चलते थे।
एक समझ की कुंजी (आर्यावर्त): गीता प्रेस की टिप्पणी बताती है कि हिमालय और विन्ध्य के बीच की यह भूमि ‘आर्यावर्त’ कहलाती है और शास्त्रों में पवित्र मानी गई है, इसलिए यज्ञ के लिए प्रशस्त है।
“उक्थ्य नामक अनुष्ठान के दिन, इन्द्र ने राक्षस का रूप धरकर सगर का यज्ञीय अश्व चुरा लिया। घोड़ा ले जाते देखकर सब ऋत्विज़ बोले, ‘राजन्, उक्थ्य के दिन यज्ञीय अश्व बलपूर्वक ले जाया जा रहा है। चोर को मारिए और घोड़ा लौटाइए; यह विघ्न हम सबके लिए अमंगलकारी है। ऐसा प्रबन्ध कीजिए कि यज्ञ निर्विघ्न हो।’ यह सुनकर राजा ने अपने साठ हज़ार पुत्रों से कहा, ‘पुत्रो, इस यज्ञ में राक्षसों की पहुँच मुझे नहीं दिखती, क्योंकि इसकी अध्यक्षता पवित्र मन्त्रों से शुद्ध महाभाग कर रहे हैं। आप जाइए और चोर को ढूँढिए। समुद्र से घिरी सारी पृथ्वी का अनुसरण कीजिए; एक-एक योजन भूमि बाँटकर खोजिए। यदि भू-सतह पर न मिले, तो मेरी आज्ञा से पृथ्वी खोदिए, जब तक घोड़ा न मिल जाए। मैं अपने पौत्र अंशुमान और उपाध्यायों के साथ यहीं रहूँगा।’
एक समझ की कुंजी (योजन और खनन): पाठ में ‘एक-एक योजन’ का अर्थ टिप्पणी में एक वर्ग योजन, यानी लगभग 64 वर्ग मील (लगभग 166 वर्ग किलोमीटर) बताया गया है। आगे वे साठ हज़ार वर्ग योजन भूमि खोद डालते हैं, अर्थात् एक विशाल भू-भाग, जो रसातल तक पहुँचता प्रतीत होता है।

“पिता की आज्ञा से वे बलवान राजपुत्र पृथ्वी की सतह पर निकल पड़े। सारी पृथ्वी छानकर भी घोड़ा न मिला, तो वे वज्र-सी कठोर भुजाओं से, एक-एक वर्ग योजन भूमि खोदते हुए, पृथ्वी को खोदने लगे। वज्र-सी कठोर शूलों और भयंकर हलों से खोदी जाती हुई पृथ्वी आर्तनाद करने लगी। पाताल में रहने वाले नाग, असुर, राक्षस और अन्य प्राणियों का, जो खनन में मारे जा रहे थे, एक भयंकर शोर उठा। उन्होंने साठ हज़ार वर्ग योजन भूमि खोद डाली, मानो परम सुन्दर रसातल तक पहुँचना चाहती हो। इस प्रकार पर्वतों से भरे जम्बूद्वीप को सगर-पुत्रों ने सब ओर से खोद डाला।
“तब गन्धर्वों, असुरों और नागों सहित घबराए हुए देवता ब्रह्मा के पास गए और दीन मुख से बोले, ‘भगवन्, सगर-पुत्र सारी पृथ्वी खोद रहे हैं और अनेक महात्मा तथा जलचर मारे जा रहे हैं। वे यह कहते हुए, कि जो सामने आता है उसी ने यज्ञ में विघ्न डाला और घोड़ा चुराया, सब प्राणियों को मार रहे हैं।’” (सर्ग 39)
सार: इन्द्र की चाल से चुराया घोड़ा सगर के साठ हज़ार पुत्रों को पृथ्वी खोदने पर मजबूर करता है, और यह खनन देवताओं तक को भयभीत कर देता है।
कपिल का क्रोध, और सगर-पुत्रों का भस्म होना
“देवताओं की बात सुनकर ब्रह्मा ने भयभीत देवताओं को उत्तर दिया, ‘यह पृथ्वी-देवी सर्वज्ञ विष्णु, लक्ष्मी के पति, की पत्नी हैं, जिनका यह सारा भूमण्डल है। वही प्रभु कपिल का रूप धरकर अपनी योग-शक्ति से सदा पृथ्वी को धारण किए हैं। सगर के पुत्र शीघ्र ही उनके क्रोध की अग्नि से भस्म होंगे। पृथ्वी का यह खनन हर कल्प में होता है, और सगर-पुत्रों का विनाश भी दीर्घदर्शी पुरुष पहले से देख लेते हैं; इसलिए शोक का कारण नहीं।’ यह सुनकर तैंतीस (33) देवता प्रसन्न होकर अपने-अपने स्थान को लौट गए।
एक समझ की कुंजी (तैंतीस देवता): गीता प्रेस की टिप्पणी के अनुसार ये तैंतीस प्रमुख देवता हैं: आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, और दो अश्विनीकुमार (देवताओं के जुड़वाँ वैद्य)।
“सगर-पुत्रों के खनन से वज्रपात-सा भयंकर शब्द उठा। सारी पृथ्वी खोदकर और उसकी परिक्रमा करके वे सब पिता के पास लौटे और बोले, ‘हमने सारी पृथ्वी की परिक्रमा करके उसे खोद डाला, और बलवान देवता, असुर, राक्षस, पिशाच व नागों को नष्ट कर दिया, पर न घोड़ा मिला, न उसका चोर। अब हम क्या करें?’ राजा ने क्रोध से कहा, ‘फिर खोदो, पृथ्वी को भेदकर घोड़ा-चोर को ढूँढो, और तभी लौटो जब कार्य सिद्ध हो जाए।’
“पिता की आज्ञा से साठ हज़ार पुत्र रसातल की ओर खोदते चले। तभी उन्होंने पर्वत-सा विशाल, पूर्व दिशा का रक्षक दिग्गज विरूपाक्ष देखा, जो भूमण्डल को धारण किए था। पूरी पृथ्वी, पर्वतों और वनों सहित, इस महागज विरूपाक्ष के सिर पर टिकी है; जब वह थककर विश्राम के लिए सिर हिलाता है, तब भूकम्प आता है। उस दिग्गज की परिक्रमा करके वे रसातल को भेदते चले।
“फिर पूर्व दिशा भेदकर दक्षिण भेदी, जहाँ विशाल दिग्गज महापद्म दिखा, जो पर्वत-सा शरीर लिए पृथ्वी को सिर पर धारण किए था; देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। उसकी परिक्रमा करके पश्चिम दिशा भेदी, जहाँ अचल-सा दिग्गज सौमनस मिला। फिर उत्तर दिशा भेदी, जहाँ हिम-सा श्वेत दिग्गज भद्र मिला, जो इस भूमण्डल को अपने सुन्दर शरीर पर धारण किए था। उसका स्पर्श करके, परिक्रमा करके वे ईशान (पूर्वोत्तर) दिशा में, जो शिव की और पवित्र मानी जाती है, क्रुद्ध मन से खोदते चले।

“वहाँ उन सबने सनातन वासुदेव को कपिल के रूप में देखा, और उस तेजस्वी ऋषि से कुछ ही दूर चरते हुए घोड़े को भी; इस पर सबको अनुपम हर्ष हुआ। उन्होंने बिना विचारे, उसी को यज्ञ-विघ्नकारी और घोड़ा-चोर समझकर, क्रोध से धुँधले नेत्रों से, कुदाल, हल, वृक्ष और शिलाएँ लिए हुए, उस पर झपटते हुए कहा, ‘ठहरिए, ठहरिए! आपने ही हमारा यज्ञीय घोड़ा चुराया है। दुर्बुद्धि, जान लीजिए, हम सगर के पुत्र आए हैं।’ यह वचन सुनकर अप्रमेय कपिल अत्यन्त क्रोध से भर गए और ‘हुँ’ की हुंकार की। उसी क्षण सब सगर-पुत्र भस्म की राशि बन गए।” (सर्ग 40)
सार: चार दिशाओं के दिग्गजों को पार करके सगर-पुत्र कपिल-रूपी विष्णु तक पहुँचते हैं, पर अविवेक और अहंकार से उन्हें दोषी मान बैठते हैं, और एक हुंकार से सब भस्म हो जाते हैं।
अंशुमान, गरुड़ का उपदेश, और घोड़े की वापसी
“पुत्रों को बहुत समय से अनुपस्थित जानकर राजा सगर ने अपने तेजस्वी पौत्र अंशुमान से कहा, ‘आप शूर, विद्वान और अपने पूर्वजों के समान तेजस्वी हैं। अपने चाचाओं और घोड़ा-चोर का पता लगाइए। पाताल में बलवान और विशाल प्राणी रहते हैं; उनके आक्रमण से बचने को तलवार और धनुष लीजिए। वन्दनीयों को प्रणाम कीजिएगा और विघ्नकारियों को मारिएगा; तभी लौटिएगा जब कार्य सिद्ध हो, और मेरे यज्ञ को पूरा कराइएगा।’
“अंशुमान धनुष और तलवार लेकर तीव्र गति से चले। उन्होंने अपने महात्मा चाचाओं द्वारा बनाए भूमिगत मार्ग में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने देवों-दानवों, पिशाचों, पक्षियों और नागों से पूजित एक दिग्गज देखा। उसकी परिक्रमा करके, कुशल पूछकर, उन्होंने अपने चाचाओं और घोड़ा-चोर के विषय में पूछा। बुद्धिमान दिग्गज ने कहा, ‘हे असमंज-पुत्र, आप कार्य सिद्ध करके घोड़े सहित शीघ्र लौटेंगे।’ इसी प्रकार उन्होंने क्रमशः चारों दिशाओं के दिग्गजों से पूछा, और सबने आदर देकर कहा कि वे घोड़े सहित लौटेंगे।
“तीव्र गति से अंशुमान उस स्थान पर पहुँचे जहाँ उनके चाचा, सगर-पुत्र, भस्म की राशि बने पड़े थे। उन्हें न पाकर पहले से दुखी अंशुमान उनकी मृत्यु पर अत्यन्त शोकाकुल होकर रो पड़े। पास ही चरते यज्ञीय घोड़े को भी देखा। उन्होंने उन राजपुत्रों की आत्माओं को जल देना चाहा, पर पास कोई जलाशय न मिला। तब चारों ओर पैनी दृष्टि डालकर उन्होंने अपने चाचाओं के मामा, वायु-सी गति वाले पक्षिराज गरुड़ को देखा।

“बलवान गरुड़ ने उन्हें समझाया, ‘हे पुरुषव्याघ्र, शोक मत कीजिए; आपके चाचाओं की यह मृत्यु तीनों लोकों के हित में है, क्योंकि यह गंगा के पृथ्वी पर आने का अवसर बनेगी। ये अप्रमेय तेजस्वी कपिल के द्वारा भस्म हुए हैं; इसलिए इन्हें साधारण लौकिक जल मत दीजिए, हे प्रज्ञावान।
एक उप-कथा: गीता प्रेस की टिप्पणी एक स्मृति-वचन उद्धृत करती है: चाण्डाल के हाथ से, जल में डूबने से, साँप के काटने से, बिजली गिरने से, अथवा दाँत वाले पशुओं द्वारा मारे जाने पर पापकर्मियों की मृत्यु होती है, और उनके लिए साधारण जल या पिण्डदान विहित नहीं है। इसी कारण गरुड़ अंशुमान को रोकते हैं।
“गंगा हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री हैं; हे महाबाहु, उन्हीं में अपने पितरों का जलकार्य करना। संसार को पवित्र करने वाली गंगा जब इन भस्म-राशियों को धोएगी, तब साठ हज़ार पुत्र स्वर्गलोक को जाएँगे। हे वीर, घोड़ा लेकर इस क्षेत्र से जाओ और अपने पितामह के यज्ञ को पूरा कराओ।’ गरुड़ का उपदेश सुनकर अंशुमान घोड़ा लेकर शीघ्र राजधानी लौटे। दीक्षित राजा के पास पहुँचकर उन्होंने सारा वृत्तान्त और गरुड़ का वचन कह सुनाया। वह भयंकर-सी कथा सुनकर राजा सगर ने शास्त्रोक्त विधि से यज्ञ पूरा किया और अपनी राजधानी लौटे। पर वे गंगा को पृथ्वी पर लाने का उपाय न ढूँढ सके। तीस हज़ार (30,000) वर्ष राज्य करके और कोई निश्चय न पाकर महान् राजा स्वर्ग सिधार गए।” (सर्ग 41)
सार: अंशुमान घोड़ा तो लौटा लाते हैं, पर गरुड़ बता देते हैं कि भस्म हुए पूर्वजों का उद्धार केवल गंगा से होगा, और यहीं से गंगावतरण की प्रतीक्षा आरम्भ होती है।
अंशुमान, दिलीप, और भगीरथ का तप
“सगर के स्वर्गवास पर प्रजा ने धार्मिक अंशुमान को राजा बनाया। वे महान् राजा हुए, और उनका पुत्र दिलीप भी महान् था। राज्य दिलीप को सौंपकर अंशुमान ने हिमालय के एक रमणीय शिखर पर कठोरतम तप किया। बत्तीस लाख (3,200,000) वर्ष तप-वन में रहकर वे केवल स्वर्ग पा सके, गंगा की वांछित कृपा नहीं।
एक समझ की कुंजी (तप-वर्ष): ये विशाल संख्याएँ, बत्तीस लाख और तीस हज़ार वर्ष, पुराण-शैली में अतिमानवीय तप और राज्यकाल को दर्शाती हैं, जिनका मर्म समय की अकल्पनीय गहराई है, न कि कोई गणितीय माप।
“अपने पितामहों (अर्थात् सगर-पुत्रों) की अस्वाभाविक मृत्यु सुनकर दिलीप शोक से व्याकुल होकर गंगा को लाने का उपाय न पा सके। वे चिन्तित रहते कि गंगावतरण कैसे हो, उन्हें जल कैसे दिया जाए, और उन आत्माओं का उद्धार कैसे हो। इसी चिन्ता में रहते हुए उन्हें भगीरथ नाम का परम धार्मिक पुत्र हुआ। दिलीप ने अनेक यज्ञ किए और तीस हज़ार (30,000) वर्ष राज्य किया, पर पूर्वजों के उद्धार का कोई निश्चय न पा सके और रोग से कालधर्म को प्राप्त हुए। अपने पुत्र भगीरथ को सिंहासन पर बैठाकर वे अपने अर्जित पुण्य से इन्द्रलोक गए।

“धर्मात्मा राजर्षि भगीरथ सन्तानहीन थे और प्रजा (सन्तान) चाहते थे। प्रजा और राज्य का भार मन्त्रियों को सौंपकर, गंगावतरण के संकल्प से, उन्होंने हिमालय के गोकर्ण शिखर पर दीर्घ तप किया। भुजाएँ ऊपर उठाए, पंचाग्नि के बीच, मास में एक बार भोजन करते हुए, इन्द्रियों को जीतकर वे एक हज़ार (1,000) वर्ष तक उग्र तप में लगे रहे।
एक समझ की कुंजी (पंचाग्नि-तप): ‘पंचाग्नि’ तप में साधक चारों दिशाओं में चार अग्नियों के बीच बैठता है, और पाँचवीं अग्नि सिर के ऊपर तपता सूर्य होती है। यह तप की एक अत्यन्त कठोर पद्धति है।
“भगीरथ के उस तप से प्रसन्न होकर प्रजापति ब्रह्मा देवताओं के साथ आए और बोले, ‘हे महाराज, मैं आपके सुतप्त तप से प्रसन्न हूँ; वर माँगिए।’ हाथ जोड़कर भगीरथ ने कहा, ‘यदि भगवान प्रसन्न हैं और तप का फल है, तो सगर के सब पुत्र मुझसे जल पाएँ। गंगा के जल से इन महात्माओं की भस्म भीग जाए, और मेरे सब प्रपितामह सदा के लिए स्वर्ग जाएँ। और हे देव, इक्ष्वाकु-कुल में हमारा वंश न टूटे, इसलिए मुझे एक पुत्र भी चाहिए; यह दूसरा वर हो।’ ब्रह्मा ने मधुर वाणी में कहा, ‘हे इक्ष्वाकु-कुल-वर्धक भगीरथ, आपकी यह महान् कामना पूरी हो। पर यह गंगा, हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री, जब उतरेगी तो पृथ्वी उसका वेग न सह सकेगी। उसे धारण करने में शिव के सिवा मुझे और कोई नहीं दिखता; इसलिए शिव को इसके लिए मनाइए।’ ऐसा कहकर और गंगा को भी समय आने पर भगीरथ का सहयोग करने का आदेश देकर ब्रह्मा देवताओं और मरुद्गणों के साथ ब्रह्मलोक लौट गए।” (सर्ग 42)
सार: अंशुमान और दिलीप की पीढ़ियाँ गंगा को न ला सकीं, पर भगीरथ का तप ब्रह्मा को प्रसन्न करता है, जो उन्हें शिव की ओर भेजते हैं, क्योंकि गंगा का वेग केवल शिव ही सह सकते हैं।
शिव के सिर पर गंगा, और सात धाराएँ

“ब्रह्मा के लौटने पर भगीरथ ने अपने एक पैर के अँगूठे की नोक पर भूमि पर खड़े रहकर एक वर्ष तक शिव की उपासना की। वर्ष पूर्ण होने पर उमापति पशुपति शिव ने कहा, ‘हे नरश्रेष्ठ, मैं प्रसन्न हूँ और आपका प्रिय करूँगा। मैं पर्वतराज की पुत्री गंगा को अपने सिर पर धारण करूँगा।’ तब आकाश से अत्यन्त विशाल रूप और दुस्सह वेग धरकर ज्येष्ठ हैमवती गंगा शिव के पवित्र सिर पर गिरीं। गिरते समय अहंकार से गंगा ने सोचा, ‘मैं अपनी धारा से शिव को बहाकर पाताल में ही ले जाऊँगी।’ उनके इस अहंकार को जानकर त्रिनेत्र शिव ने क्रुद्ध होकर उसे अपनी जटाओं में छिपा लेने का निश्चय किया। हिमालय-सी विशाल, जटाओं से भरी रुद्र के सिर पर गिरी वह पवित्र नदी किसी भी प्रकार पृथ्वी पर न पहुँच सकी, चाहे कितना ही यत्न किया। जटाओं के चक्रव्यूह में वह बाहर निकलने का मार्ग न पा सकी और कई वर्षों तक शिव के सिर पर ही घूमती रही।
“भगीरथ ने फिर परम तप किया, जिससे शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा को बिन्दुसरोवर (हिमालय में एक झील) की ओर छोड़ दिया। छोड़े जाते समय गंगा सात (7) धाराओं में बँट गई। इनमें से तीन कल्याणकारी धाराएँ, ह्लादिनी, पावनी और नलिनी, पूर्व दिशा में बहीं; सुचक्षु, सीता और महानदी सिन्धु, ये तीन पश्चिम दिशा में बहीं। और सातवीं धारा भगीरथ के रथ के पीछे चली। दिव्य रथ पर सवार राजर्षि भगीरथ आगे बढ़े और गंगा उनके पीछे चली। इस प्रकार गंगा आकाश से शिव के सिर पर और वहाँ से पृथ्वी पर उतरकर ‘त्रिपथगा’ (तीन मार्गों वाली) नाम सार्थक करती हुई बही।
“वहाँ पृथ्वी पर गंगा का जल भयंकर शब्द के साथ बहा। मछलियों, कछुओं और शिंशुमारों (जल-गजों) के झुंडों से, गिरते और गिरे हुए जलचरों से, पृथ्वी अत्यन्त सुन्दर दिखी। उस समय देवर्षि, गन्धर्व, यक्ष और सिद्धगण नगर-से विशाल विमानों से, घोड़ों और श्रेष्ठ हाथियों की पीठ से, गंगा का यह अवतरण देख रहे थे। इस अद्भुत, उत्तम गंगावतरण को देखने की इच्छा से अनन्त बल वाले देवगण आकाश में एकत्र हुए। उनके शीघ्र उतरते समय, उनके आभूषणों की चमक से, मेघरहित आकाश सैकड़ों सूर्यों-सा देदीप्यमान हो उठा। जल-गजों, साँपों और फड़कती मछलियों से बिखरा आकाश बिजली की रेखाओं-सा दिखा; और हज़ारों कणों में उछलते श्वेत फेन से शरद् के श्वेत मेघों-सा और हंसों के झुंडों से भरा-सा प्रतीत हुआ।
“गंगा कहीं अति तीव्र बहती, कहीं टेढ़ी; कहीं चौड़ी, कहीं संकरी; कहीं शिला से टकराकर ऊपर उछलती, कहीं सरकती। कहीं अपनी ही लहरों से टकराकर जल फिर ऊपर उछलता और फिर भूमि पर गिरता। पहले शिव के सिर पर गिरी और फिर भूमि पर उतरी गंगा का निर्मल जल, जो स्पर्श-मात्र से पाप हरता है, अत्यन्त शोभा पाने लगा। वहाँ ऋषि, गन्धर्व और भूवासियों ने शिव के अंग से गिरे उस जल को पवित्र मानकर छुआ। जो शाप से आकाश से पृथ्वी पर गिरे थे, वे उसमें स्नान करके पापमुक्त होकर फिर अपने लोकों को लौट गए। उस चमकीले जल को देखकर और उसमें स्नान करके लोग और भी आनन्दित हुए।

“रमणीय रथ पर सवार भगीरथ आगे बढ़े और गंगा उनके पीछे चली। प्रसन्न देवता, ऋषि, दैत्य, दानव, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, महानाग, सर्प, अप्सराएँ और सब जलचर भगीरथ के रथ के पीछे गंगा का अनुसरण करते रहे। जिधर भगीरथ जाते, उधर सर्व-पाप-नाशिनी गंगा चलती। तभी अद्भुत-कर्मा महात्मा जह्नु के यज्ञ-मण्डप को गंगा ने डुबो दिया। गंगा का अहंकार जानकर क्रुद्ध जह्नु ने अपनी योग-शक्ति से गंगा का सारा जल पी लिया, जो परम आश्चर्य था। तब विस्मित देवता, गन्धर्व और ऋषि महात्मा जह्नु की स्तुति करने लगे और गंगा को जह्नु की पुत्री बना दिया, उन्हें मनाकर गंगा को छोड़ देने को कहा।
एक उप-कथा (जाह्नवी नाम): प्रसन्न होकर जह्नु ने गंगा को अपने कानों से निकाल दिया। इसी कारण गंगा जह्नु की पुत्री कहलाती है और ‘जाह्नवी’ नाम से प्रसिद्ध है (अर्थात् जह्नु से उत्पन्न)।
“फिर गंगा भगीरथ के रथ के पीछे चली और सगर-पुत्रों की खोदी हुई खाई तक पहुँची। फिर वह श्रेष्ठ नदी, भगीरथ के कार्य की सिद्धि के लिए, अर्थात् पितरों के उद्धार के लिए, रसातल में पहुँची। गंगा को रसातल तक ले जाकर राजर्षि भगीरथ ने अपने भस्म हुए प्रपितामहों को देखा और मूर्च्छित-से हो गए। गंगा के परम पवित्र जल ने उनकी भस्म-राशियों को डुबो दिया, और पापमुक्त होकर सगर-पुत्रों की आत्माएँ स्वर्ग को चढ़ गईं।” (सर्ग 43)
एक उप-कथा: गीता प्रेस की टिप्पणी बताती है कि इस खाई का जल (समुद्र) बाद में तब खारा हुआ जब अगस्त्य मुनि ने उसे पीकर पुनः छोड़ा।
सार: शिव की जटाओं ने गंगा का दुस्सह वेग सँभाला, और सात धाराओं में बँटकर, जह्नु के उदर से होकर, वह अन्ततः रसातल पहुँचकर सगर-पुत्रों का उद्धार करती है, इस प्रकार भगीरथ का संकल्प सिद्ध होता है।
ब्रह्मा का आशीर्वाद, और गंगा-कथा की महिमा
“गंगा के पीछे चलते हुए राजा भगीरथ उस खाई में, अर्थात् भूमि के अत्यन्त नीचे के स्तर में, पहुँचे जहाँ उनके प्रपितामह भस्म हुए थे। जब गंगा-जल से उनकी भस्म भली-भाँति धुल गई, तब सर्वलोक-प्रभु ब्रह्मा आकर बोले, ‘हे नरश्रेष्ठ, सगर के साठ हज़ार पुत्र पाप से मुक्त होकर देवताओं-से स्वर्ग गए। जब तक संसार में समुद्र का जल रहेगा, तब तक सगर-पुत्र देवताओं-से स्वर्ग में रहेंगे। यह गंगा आपकी ज्येष्ठ पुत्री होगी और आपके नाम से ‘भागीरथी’ विख्यात होगी। यह त्रिपथगा, दिव्या और भागीरथी कहलाएगी; क्योंकि यह तीनों लोकों, स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल, से मार्ग बनाती है, इसलिए त्रिपथगा कहलाई।
“‘हे मनुजाधिप, यहाँ गंगा-तट पर अपने सब प्रपितामहों को जल अर्पित करके अपने पूर्वजों का और अपना संकल्प पूरा कीजिए। आपके यशस्वी पूर्वज सगर, जो धर्मियों में श्रेष्ठ थे, यह मनोरथ पूरा न कर सके; अनुपम तेज वाले अंशुमान भी न कर सके; आपके तेजस्वी पिता दिलीप भी, बहुत प्रार्थना करके भी, गंगा को न ला सके। पर वह संकल्प आपने पूरा किया, हे पुरुषर्षभ, और इससे आपने परम यश पाया। गंगावतरण का यह कार्य आपने सिद्ध किया, और इससे आपने धर्म का महान् फल पाया। हे नरोत्तम, आप स्वयं भी इस वर्ष-भर स्नान-योग्य पवित्र गंगा-जल में स्नान करके अपने पुण्य का फल पाइए। अपने सब प्रपितामहों को जलकार्य कीजिए। अब मैं अपने लोक को लौटता हूँ; आप भी अपनी राजधानी लौटिए।’ ऐसा कहकर देवेश ब्रह्मा जैसे आए थे वैसे ही देवलोक को लौट गए।
“महायशस्वी राजर्षि भगीरथ ने ज्येष्ठता के क्रम से, शास्त्रोक्त विधि से, सगर-पुत्रों को उत्तम जल अर्पित किया, और अन्य पूर्वजों को भी तृप्त किया। शुद्ध होकर वे अपनी राजधानी लौटे और सिद्ध-मनोरथ होकर राज्य करने लगे। प्रजा अपने राजा को पुनः पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुई; उनका शोक मिटा, अभीष्ट सिद्ध हुआ, और चिन्ता दूर हुई।
“हे राम, यह गंगा-अवतरण की कथा मैंने आपको विस्तार से कही। इसके श्रवण से कल्याण पाइए; संध्या का समय बीत रहा है। जो इस धन, यश, आयु, पुत्र और स्वर्ग देने वाली कथा को ब्राह्मणों, क्षत्रियों और अन्य लोगों को सुनाता है, उसके पितर तृप्त होते और देवता प्रसन्न होते हैं। जो इस आयुष्कर गंगावतरण की कथा सुनता है, वह अपनी सब इच्छाएँ पाता है, उसके सब पाप नष्ट होते हैं, और आयु तथा कीर्ति बढ़ती है।” (सर्ग 44)
सार: भगीरथ अपने पूर्वजों का जलकार्य करके संकल्प पूरा करते हैं, गंगा ‘भागीरथी’ नाम पाती है, और इस कथा के श्रवण-कथन की फलश्रुति स्वयं इसका मर्म बन जाती है।
गंगा पार, विशाला नगरी, और समुद्र-मन्थन की कथा
विश्वामित्र की वाणी सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण परम विस्मित हुए और बोले, “हे ब्रह्मन्, गंगावतरण और सगर-खाई के भरने की यह कथा अत्यन्त अद्भुत है। आपकी इस कथा पर विचार करते हुए हमारी यह सारी रात क्षण-सी बीत गई।” प्रभात होने पर श्रीराम ने अपनी संध्या-वंदना पूरी कर चुके विश्वामित्र से कहा, “भगवती रात बीत गई और परम श्रवणीय कथा सुन ली। अब हम पवित्र त्रिपथगा गंगा को पार करें। यहाँ ऋषियों द्वारा भेजी एक नौका है, जो सुखद आसन से युक्त है और आपके आगमन की सूचना पाते ही शीघ्र आ गई है।” तब विश्वामित्र ने श्रीराम, लक्ष्मण और सब ऋषियों को नौका से पार उतरवाया।
उत्तरी तट पर पहुँचकर, ऋषियों का अभिनन्दन करके, गंगा-तट पर बैठे हुए उन्होंने दूर विशाला नगरी देखी। तब विश्वामित्र दोनों राघवों के साथ स्वर्ग-सी रमणीय विशाला नगरी की ओर शीघ्र बढ़े। हाथ जोड़कर श्रीराम ने पूछा, “हे महामुनि, विशाला में इस समय कौन-सा राजवंश राज्य कर रहा है? मुझे बड़ा कौतूहल है।” विश्वामित्र ने विशाला की एक प्राचीन कथा सुनानी आरम्भ की, “सुनिए, हे राम, यहाँ की भूमि से जुड़ी इन्द्र की कथा। प्राचीन सत्ययुग में दिति के बलवान पुत्र और अदिति के महाभाग, पराक्रमी व धार्मिक पुत्र हुए। बड़े होते हुए उन्हें यह विचार आया, ‘हम अमर, जरारहित और रोगरहित कैसे हों?’ तब बुद्धिमान उन्हें सूझा, ‘क्षीरसागर का मन्थन करके हम वह अमृत-रस पाएँ।’
“उन्होंने वासुकि (नागराज) को रस्सी और मन्दर पर्वत को मथानी बनाकर सागर मथना आरम्भ किया। एक हज़ार (1,000) वर्ष बाद रस्सी बने सर्प के सिर अपने दाँतों से मन्दर की शिलाएँ काटने लगे और प्रचुर विष उगलने लगे। तब सागर-सतह पर अचानक ‘हालाहल’ नामक भयंकर विष प्रकट हुआ, जिससे देवता, असुर और मनुष्यों सहित सारा जगत् जलने लगा। देवताओं ने शरण के लिए महादेव शिव को मन से पुकारा, ‘रक्षा करो, रक्षा करो!’ तब शिव और शंख-चक्रधारी विष्णु, दोनों वहीं प्रकट हुए। विष्णु ने मुस्कुराकर त्रिशूलधारी रुद्र से कहा, ‘देव-असुरों के मन्थन में जो पहले निकले, वह आपका भाग है, क्योंकि देवताओं में आप अग्रणी हैं। इसलिए यहाँ रहकर, हे प्रभु, इस विष को सर्वप्रथम भेंट-रूप में ग्रहण कीजिए।’ ऐसा कहकर विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गए। देवताओं का भय और विष्णु का वचन देखकर शिव ने वह भयंकर हालाहल विष अमृत-सा निगलकर अपने कण्ठ में धारण कर लिया और अपने लोक को चले गए।

“फिर देव-असुरों ने पुनः मन्थन किया, पर मथानी मन्दर पर्वत पाताल में धँस गया। देवताओं ने विष्णु की स्तुति की, ‘आप सब प्राणियों, विशेषकर देवताओं, की गति हैं। हमारी रक्षा कीजिए और पर्वत उठाइए।’ तब विष्णु ने कूर्म (कछुए) का रूप धरकर पर्वत को पीठ पर धारण किया, और एक हाथ से पर्वत-शिखर थामकर, देवताओं के बीच रहकर मन्थन में भाग लिया।
“एक हज़ार वर्ष बाद, हाथ में दण्ड और कमण्डलु लिए, आयुर्वेद के मूर्त रूप, परम धार्मिक धन्वन्तरि सर्वप्रथम प्रकट हुए; फिर महान् कान्ति वाली अप्सराएँ प्रकट हुईं। उस मन्थन के जल (अप्) के रस से उत्पन्न होने के कारण वे श्रेष्ठ कन्याएँ ‘अप्सरा’ कहलाईं। उनकी संख्या साठ करोड़ (600,000,000) थी, और उनकी परिचारिकाएँ असंख्य थीं। पर देव और असुर, किसी ने भी उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार नहीं किया; अस्वीकृत रहने के कारण ही वे साधारण (सबकी समान) कहलाईं।
एक समझ की कुंजी (नाम-अर्थ “बाद की परम्परा में”): पाठ स्वयं नामों का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ देता है। ‘अप्सरा’ अप् (जल) के रस से उत्पन्न होने के कारण कहलाईं। आगे, जिन्होंने वारुणी (सुरा) स्वीकार की, वे ‘सुर’ कहलाए, और जिन्होंने नहीं की, वे ‘असुर’ कहलाए।
“फिर क्षीरसागर से जल के देवता वरुण की पुत्री, महाभागा वारुणी (सुरा की अधिष्ठात्री देवी), पति की खोज में निकलीं। दिति के पुत्रों (असुरों) ने उन्हें स्वीकार नहीं किया, पर अदिति के पुत्रों (देवताओं) ने उस निर्दोष को स्वीकार कर लिया। इसी कारण दिति के पुत्र ‘असुर’ (जिन्होंने सुरा न ली) और अदिति के पुत्र ‘सुर’ (जिन्होंने सुरा ली) कहलाए। वारुणी को स्वीकार करने से देवता हर्षित और प्रमुदित हुए।

“फिर अश्वों में श्रेष्ठ उच्चैःश्रवा, मणियों में श्रेष्ठ कौस्तुभ, और उत्तम अमृत प्रकट हुए। उस अमृत को लेकर देव और दैत्यों के दो कुलों में महान् विनाश हुआ; अदिति के पुत्र दिति के पुत्रों से युद्ध करने लगे। सब असुर राक्षसों से मिल गए, और तीनों लोकों को मोहित करने वाला एक अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ। जब सब विनाश की ओर बढ़े, तब बलवान विष्णु ने मोहिनी नामक माया-रूप धरकर शीघ्र अमृत हर लिया। जो विष्णु के सामने आए, वे प्रभुत्वशाली विष्णु द्वारा युद्ध में कुचल दिए गए। इस भयंकर महायुद्ध में अदिति के वीर पुत्रों ने दिति के पुत्रों को पूर्णतः नष्ट कर दिया। दिति-पुत्रों को मारकर और राज्य पाकर इन्द्र ने प्रसन्न मन से, ऋषियों और चारणों सहित, तीनों लोकों पर शासन किया।” (सर्ग 45)
सार: विशाला की भूमि की कथा समुद्र-मन्थन तक जाती है, जहाँ से विष, धन्वन्तरि, अप्सराएँ, वारुणी, उच्चैःश्रवा, कौस्तुभ और अमृत निकलते हैं, और अमृत को लेकर देव-दैत्य संग्राम में दैत्यों का नाश होता है।
दिति का तप, और गर्भ का सात भागों में कटना
“अपने पुत्रों के युद्ध में मारे जाने पर अत्यन्त दुखी दिति ने अपने पति, मरीचि-पुत्र कश्यप, से कहा, ‘हे भगवन्, आपके पुत्रों, अर्थात् देवताओं, ने मेरे पुत्र मार दिए। अब मैं दीर्घ तप से अर्जित एक ऐसा पुत्र चाहती हूँ, जो इन्द्र को मार सके। मुझे ऐसा गर्भ देने और तप की अनुमति देने की कृपा कीजिए।’ तेजस्वी कश्यप ने उस दुखी दिति से कहा, ‘ऐसा ही हो। पुत्र के जन्म तक आप पवित्रता का पालन कीजिए, हे तपोधना। समय पूर्ण होने पर आप मुझसे ऐसा पुत्र पाएँगी जो इन्द्र को युद्ध में मार सके। पूरे एक हज़ार (1,000) वर्ष तक यदि आप पवित्रता बनाए रखेंगी, तो तीनों लोकों के स्वामी इन्द्र को मारने वाला पुत्र जनेंगी।’ ऐसा कहकर ऋषि ने हाथ से उसका स्पर्श किया, आशीर्वाद दिया और अपने तप को चले गए।
“कश्यप के जाने पर दिति परम हर्षित होकर कुशप्लव पहुँचीं और अत्यन्त कठोर तप करने लगीं। उनके तप करते समय सहस्राक्ष इन्द्र ने अपने गुणों से उनकी सेवा की। इन्द्र उनके लिए अग्नि, कुश, काष्ठ, जल, फल, मूल और जो कुछ इच्छित था, लाते; अंग-सेवा और थकान दूर करते हुए सब समय दिति की परिचर्या करते। पूरे एक हज़ार में से दस (10) वर्ष कम बीतने पर परम प्रसन्न दिति ने इन्द्र से कहा, ‘हे वीरों में श्रेष्ठ, मेरे तप के केवल दस वर्ष शेष हैं; उसके बाद आप अपने भाई को अपने पास देखेंगे। आपके लिए ही मैंने जो पुत्र चाहा था, जो आपको जीतने को उत्सुक रहेगा, उसे मैं आपसे मित्रवत् मिला दूँगी, और निश्चिन्त होकर आप उसके साथ तीनों लोकों का विजय-सुख भोगेंगे।’
“ऐसा कहकर, जब सूर्य ठीक मध्य आकाश में था, दिति निद्रा से अभिभूत होकर, सिर के स्थान पर पैर रखकर लेट गईं। उन्हें अपवित्र स्थिति में, बालों को पैरों से छूते हुए और पैरों को सिर की जगह रखे देखकर इन्द्र हँसे और प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी योग-शक्ति से दिति के गर्भ-विवर में प्रवेश किया और पूर्ण सावधानी से गर्भ को सात (7) भागों में काट दिया। वज्र, जो सौ धार वाला अस्त्र है, से कटते हुए गर्भ ऊँचे स्वर में रोने लगा, और दिति जाग गईं। इन्द्र गर्भ से कहते रहे, ‘मत रो, मत रो,’ और रोते हुए भी वज्र से उसे बार-बार काटते रहे। दिति केवल इतना ही बोल सकीं, ‘इसे न मारा जाए, न मारा जाए।’ माता के वचन के आदर से इन्द्र गर्भ से बाहर निकल आए, और हाथ जोड़कर बोले, ‘हे देवि, आप अपवित्र स्थिति में, बालों को पैरों से छूते हुए सो गई थीं। उस अवसर को पाकर मैंने इन्द्र को मारने वाले गर्भ को सात भागों में काट दिया। आप इसके लिए मुझे क्षमा करें।’” (सर्ग 46)
सार: इन्द्र-वध के लिए तप करती दिति के व्रत में एक पवित्रता-दोष का छिद्र पाकर इन्द्र उनके गर्भ में घुसकर उसे सात भागों में काट देते हैं, पर माता के वचन के आदर से मारने से रुक जाते हैं।
मरुतों का जन्म, और विशाला का राजवंश

“गर्भ के सात-सात भागों में बँट जाने पर दुखी दिति ने इन्द्र से कोमल स्वर में कहा, ‘हे देवेश, यह गर्भ मेरे ही दोष से सात भागों में हुआ; इसमें आपका दोष नहीं, हे बलासुर-नाशक। मैं चाहती हूँ कि मेरे गर्भ का यह नाश हम दोनों के लिए शुभ हो जाए। ये सात-सात (अर्थात् उनचास, 49) भाग मरुतों के स्थान-रक्षक हों। हे पुत्र, दिव्य रूप धरकर ये मेरे पुत्र आकाश में ‘मारुत’ नाम से विख्यात होकर विचरें। एक दल ब्रह्मलोक में, एक इन्द्रलोक में, और तीसरा ‘दिव्य वायु’ नाम से आकाश में विचरे। हे देवश्रेष्ठ, शेष चार दल आपकी आज्ञा से चारों दिशाओं में विचरें। आपके ही दिए नाम से वे ‘मारुत’ कहलाएँ।’ दिति की यह बात सुनकर सहस्राक्ष इन्द्र ने हाथ जोड़कर कहा, ‘यह सब आपके कहे अनुसार ही होगा; इसमें सन्देह नहीं। आपके ये देवरूप पुत्र वायु-रूप में विचरेंगे।’ इस प्रकार माता और सौतेला-पुत्र, दोनों उस तप-वन में निश्चय करके, कृतार्थ होकर स्वर्ग गए।
एक समझ की कुंजी (मरुत और 49): सात गर्भ-खण्डों में से प्रत्येक फिर सात भागों में बँटा, तो सात-गुना-सात अर्थात् उनचास (49) मरुत हुए। इन्हें ‘मारुत’ इसलिए कहा गया क्योंकि इन्द्र ने उनसे ‘मा रुदः’ (मत रो) कहा था। बाद की परम्परा में सात वायु-पटल आवह, प्रवह, संवह, उद्वह, विवह, परिवह और परावह नाम से जाने जाते हैं।
“हे काकुत्स्थ, यह वही प्रदेश है जहाँ पहले महान् इन्द्र ने रहकर तप-सिद्ध दिति की सेवा की थी। अब इक्ष्वाकु का परम धार्मिक पुत्र, अलम्बुषा से उत्पन्न, विशाल नाम से विख्यात हुआ। उसी ने इसी स्थान पर अपने नाम से विशाला नगरी बसाई। विशाल का बलवान पुत्र हेमचन्द्र था; हेमचन्द्र के बाद सुचन्द्र हुआ; सुचन्द्र का पुत्र धूम्राश्व; धूम्राश्व का पुत्र सृंजय; सृंजय का यशस्वी पराक्रमी पुत्र सहदेव; सहदेव का धार्मिक पुत्र कुशाश्व; कुशाश्व का तेजस्वी पराक्रमी पुत्र सोमदत्त; और सोमदत्त का पुत्र काकुत्स्थ नाम से विख्यात हुआ। उसी काकुत्स्थ का तेजस्वी, परम विख्यात और दुर्जय पुत्र सुमति इस समय इस नगरी में राज्य कर रहा है। इक्ष्वाकु की कृपा से विशाला के सब राजा दीर्घायु, महात्मा, पराक्रमी और परम धार्मिक हैं। हम आज की रात यहीं सुख से बिताएँगे; कल प्रातः, हे नरश्रेष्ठ, आप जनक के दर्शन कर सकेंगे।”

विश्वामित्र के आगमन की सूचना पाकर महायशस्वी राजा सुमति उनकी अगवानी को आए। अपने उपाध्यायों और बन्धुओं सहित परम पूजा करके, कुशल पूछकर, हाथ जोड़कर सुमति ने कहा, “हे मुनि, मैं धन्य और अनुगृहीत हूँ कि आपने मेरे राज्य में पधारे और मुझे दर्शन भी दिया; मुझसे अधिक धन्य कोई नहीं।” (सर्ग 47)
सार: दिति का खण्डित गर्भ उनचास मरुतों के रूप में आकाश में अमर हो जाता है, और इसी तपोभूमि पर बसी विशाला नगरी इक्ष्वाकु-वंशी सुमति के शासन में पहुँचती है, जो विश्वामित्र की अगवानी करता है।
मिथिला की ओर, सूना आश्रम, और अहल्या का शाप
परस्पर कुशल पूछने के बाद, बातचीत के अन्त में सुमति ने महामुनि विश्वामित्र से कहा, “हे मुनि, ये दो वीर बालक, जो देवताओं के समान पराक्रमी हैं, हाथी और सिंह की चाल वाले, बाघ और बैल-से, कमल-पत्र-से विशाल नेत्रों वाले, अश्विनीकुमारों-सी सुन्दरता वाले, तलवार, तरकश और धनुष धारण किए, यौवन की दहलीज़ पर हैं। ये अपनी इच्छा से देवलोक से उतरे दो देव-से जान पड़ते हैं। ये यहाँ पैदल कैसे और किसलिए आए, और किसके पुत्र हैं? आकार, भाव और चेष्टा में एक-दूसरे के प्रतिरूप, उत्तम अस्त्र धारण किए ये दो नरश्रेष्ठ इस दुर्गम मार्ग पर, चन्द्र-सूर्य-से इस भूमि को सुशोभित करते हुए, क्यों आए? मैं यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।” तब विश्वामित्र ने सारा वृत्तान्त, सिद्धाश्रम का प्रवास और राक्षसी के वध सहित, यथावत् सुना दिया। राजा अत्यन्त विस्मित हुआ और उसने दशरथ के दोनों महाबली पुत्रों का, जो सब सत्कार के योग्य और परम अतिथि के रूप में आए थे, विधिवत् पूजन किया।
सुमति का परम सत्कार पाकर श्रीराम और लक्ष्मण एक रात उसकी राजधानी में बिताकर अगले दिन मिथिला की ओर बढ़े। जनक की सुन्दर नगरी देखकर सब मुनि ‘साधु, साधु’ कहते हुए मिथिला की प्रशंसा करने लगे। मिथिला के उपवन में श्रीराम ने एक प्राचीन, सूना और रमणीय आश्रम देखकर मुनिश्रेष्ठ से पूछा, “यह आश्रम-सा स्थान, जो मुनियों से रहित है, क्या है? मैं सुनना चाहता हूँ, भगवन्, पहले यह किसका आश्रम था?” वाक्य-निपुण, तेजस्वी विश्वामित्र ने उत्तर दिया, “अहो, सुनिए। मैं यथार्थ बताता हूँ कि यह किस महात्मा का आश्रम-स्थल था और किसके क्रोध से शापित हुआ।

“हे नरश्रेष्ठ, यह आश्रम पहले महात्मा गौतम का था, जो दिव्य-सा और देवताओं से भी पूजित था। वे यहाँ अपनी पत्नी अहल्या के साथ अनेक वर्षों तक तप करते थे। एक बार गौतम की अनुपस्थिति जानकर, जब वे नित्य-स्नान आदि के लिए बाहर गए थे, शची-पति सहस्राक्ष इन्द्र ने गौतम का वेष धरकर अहल्या से कहा, ‘हे सुमध्यमा, भोग चाहने वाले ऋतुकाल की प्रतीक्षा नहीं करते; मैं आपसे समागम चाहता हूँ।’
“गौतम के वेष में इन्द्र को पहचानकर भी, उस दुर्बुद्धि स्त्री ने देवराज के प्रति कुतूहल से अपना मन उस ओर लगा दिया। फिर अपने अन्तःकरण में कृतार्थ होकर उसने इन्द्र से कहा, ‘हे देवश्रेष्ठ, मैं इस मिलन से कृतार्थ हुई; अब आप शीघ्र यहाँ से जाएँ। हे देवेश, गौतम से अपनी और मेरी, दोनों की हर प्रकार रक्षा करें।’ इन्द्र ने हँसकर कहा, ‘हे सुश्रोणि, मैं परम सन्तुष्ट हूँ; जैसे आया था वैसे ही जाता हूँ।’ इस प्रकार समागम करके इन्द्र, गौतम के भय से शंकित होकर, शीघ्र-शीघ्र कुटिया से निकले। तभी उन्होंने तीर्थ-जल से भीगे, अग्नि-से देदीप्यमान, हाथ में समिधा और कुश लिए, देव-दानवों के लिए भी दुर्जय महामुनि गौतम को कुटिया में प्रवेश करते देखा। देवराज भयभीत होकर मुख नीचा किए खड़े रह गए।

“अपने ही वेष में, दुराचार करते हुए, सहस्राक्ष इन्द्र को देखकर सदाचारी मुनि ने क्रोध से कहा, ‘हे दुर्बुद्धि, मेरा रूप धरकर आपने यह न करने योग्य कार्य किया, इसलिए आप अपने अण्डकोषों से रहित हो जाएँगे।’ महात्मा गौतम के यों कहते ही उसी क्षण इन्द्र के अण्डकोष भूमि पर गिर पड़े। इन्द्र को शाप देकर गौतम ने अपनी पत्नी को भी शाप दिया, ‘आप यहाँ अनेक हज़ार वर्षों तक बिना अन्न-जल के, केवल वायु पर, भस्म पर लेटकर पश्चात्ताप करती हुई, सब प्राणियों के लिए अदृश्य रहकर इस आश्रम में रहेंगी। पर जब दशरथ-पुत्र, सबके लिए दुर्जय श्रीराम, इस भयंकर वन में आएँगे, तभी आप पवित्र होंगी। हे दुराचारिणी, उनका आतिथ्य करने पर आप लोभ-मोह से मुक्त होकर, प्रसन्न मन से अपना मूल शरीर पाकर मेरे पास लौटेंगी।’ इस प्रकार उस स्त्री को शाप देकर तेजस्वी गौतम यह आश्रम छोड़कर हिमालय के एक रमणीय, सिद्ध-चारणों से सेवित शिखर पर तप करने चले गए।” (सर्ग 48)
सार: मिथिला के पास यह सूना आश्रम गौतम का था; इन्द्र के छल और अहल्या के पतन पर गौतम दोनों को शाप देते हैं, पर अहल्या के उद्धार को श्रीराम के आगमन से जोड़ देते हैं।
इन्द्र को मेष-वृषण, और अहल्या का उद्धार
“अण्डकोषों से रहित होकर इन्द्र ने भयभीत नेत्रों से, अग्नि को आगे करके, देवों, सिद्धों, गन्धर्वों और चारणों से कहा, ‘महात्मा गौतम के तप में विघ्न डालकर, उन्हें क्रुद्ध करके, मैंने देवताओं का ही कार्य किया, क्योंकि वे मेरा पद चाहने लगे थे। इस पर मैं अपनी पुरुषार्थ-शक्ति से रहित कर दिया गया और अहल्या भी त्याग दी गई; महान् शाप से गौतम का तप-तेज भी मैंने हर लिया। इसलिए हे देवश्रेष्ठो, ऋषियों और चारणों के साथ मिलकर आप मुझे, जिसने देव-कार्य किया, पुनः पुरुषत्व प्रदान कीजिए।’
“इन्द्र की बात सुनकर अग्नि को आगे किए देवता मरुद्गणों के साथ पितृ-देवताओं के पास गए और बोले, ‘यह मेष पुरुषत्व से युक्त है, और इन्द्र शाप से पुरुषत्वहीन हुआ है। मेष के वृषण लेकर शीघ्र इन्द्र को दे दीजिए। बधिया किया गया मेष आपको परम सन्तुष्टि देगा; और जो मनुष्य भविष्य में आपको ऐसा मेष अर्पित करेंगे, उन्हें आप अक्षय और प्रचुर फल देंगे।’ अग्नि की प्रार्थना सुनकर पितृ-देवताओं ने एकमत होकर मेष के वृषण निकालकर सहस्राक्ष इन्द्र को लगा दिए।
एक उप-कथा: पाठ बताता है कि तभी से पितृ-देवता बधिया किए गए मेषों को ही ग्रहण करते हैं, और जो साबुत मेष अर्पित करते हैं उन्हें भी पूरा फल देते हैं; और तभी से इन्द्र ‘मेष-वृषण’ (मेष के वृषण धारण करने वाला) कहलाता है, जो महात्मा गौतम के तप के प्रभाव का प्रमाण है।

“विश्वामित्र ने कहा, ‘हे तेजस्वी राजकुमार, अब उस पुण्यकर्मा गौतम के आश्रम में प्रवेश करो और देव-रूपिणी, महाभागा अहल्या का उद्धार करो।’ यह सुनकर श्रीराम, लक्ष्मण के साथ, विश्वामित्र को आगे करके आश्रम में गए, और उन्होंने उस महाभागा को देखा, जिसकी आभा तप से प्रदीप्त थी; जो गौतम के शाप के कारण देव-दानवों के लिए भी, और भू-वासियों के लिए तो और भी, दुर्निरीक्ष्य थी; जिसे विधाता ने बड़े यत्न से, माया-निर्मित-सी, रचा था; जो धुएँ से घिरी प्रज्वलित अग्नि-शिखा-सी, अथवा तुषार से ढके और मेघों में छिपे पूर्ण-चन्द्र की प्रभा-सी, अथवा मेघों के जल के बीच चमकते सूर्य-मण्डल-सी देदीप्यमान थी।
“गौतम के वचन से वह सब लोकों के लिए अदृश्य हो गई थी, जब तक श्रीराम का दर्शन न हो; अब शाप का अन्त पाकर वह उनकी दृष्टि में आई। दोनों राघवों ने प्रसन्नता से उसके चरण छुए, और गौतम के वचन को स्मरण करती हुई अहल्या ने दोनों का स्वागत किया। एकाग्र मन से उसने विधिपूर्वक उन्हें पाद्य, अर्घ्य और आतिथ्य अर्पित किया, और श्रीराम ने प्रसन्नता से स्वीकार किया। तब आकाश से प्रचुर पुष्प-वृष्टि हुई, देव-दुन्दुभियाँ बजीं, और गन्धर्व-अप्सराओं में महान् उत्सव हुआ। ‘साधु, साधु’ कहते हुए देवताओं ने तप-बल से शुद्ध-अंगी, गौतम के वश में रहने वाली अहल्या का अभिनन्दन किया। तेजस्वी गौतम भी अहल्या के साथ सुखी होकर लौट आए, और श्रीराम का विधिवत् पूजन करके उन्होंने पुनः अपना तप आरम्भ किया। श्रीराम भी महामुनि गौतम से परम सत्कार पाकर वहाँ से मिथिला की ओर बढ़े।” (सर्ग 49)
सार: देवता इन्द्र को मेष के वृषण देकर पुरुषत्व लौटाते हैं; और श्रीराम के दर्शन-मात्र से अहल्या का शाप टूटता है, वह अपना दिव्य रूप पाकर गौतम के साथ पुनः सुखी होती है, और राम का मार्ग अब मिथिला की ओर खुलता है।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 31-49 (गीता प्रेस गोरखपुर)।