Lulla Family

चित्रकेतु की वेदना

कथा 61 · भागवतम् की कथाएँ

चित्रकेतु की वेदना

The Son a Grieving King Was Given, and Then Lost
स्कन्ध 6, अध्याय 14-17

गंगा के तट पर दोपहर ढल चुकी थी। परीक्षित् देर तक चुप रहे, फिर मुनिवर शुकदेव की ओर मुड़े।

”भगवन्, कल आपने उस वृत्रासुर की बात कही थी, जो दानव कहलाता था पर मरते समय किसी सिद्ध संत की तरह बोला। एक बात भीतर अटकी रह गई। आपने कहा था कि वह कोई और था, किसी पुराने जन्म में। मेरे पास अब थोड़े ही दिन हैं, और मैं यही सोचता रहता हूँ, कि कोई पुरुष कैसे, किस रास्ते से, एक दानव की देह तक पहुँचता है। वह पहले कौन था?”

शुकदेव की आँखों में एक हल्की-सी कोमलता उतर आई। ”राजन्, वह एक राजा था। बहुत बड़ा राजा, और उससे भी बड़ा भक्त। उसकी कथा प्रेम से शुरू होती है, और एक शाप पर मुड़ जाती है। नाम था चित्रकेतु। सुनिए।”


Emperor Chitraketu of Shurasena, a majestic chakravartin king on a golden throne in a richly adorned palace, crown and jewels gleaming, surrounded by his vast prosperity and many queens, yet his face shadowed by quiet emptiness; classical Indian color illustration.

शूरसेन देश में चित्रकेतु राज करते थे। चक्रवर्ती सम्राट्, जिनके राज्य में धरती अपने आप, माँगे बिना, अन्न दे देती थी। उनके पास एक करोड़ रानियाँ थीं, और वे स्वयं सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ भी थे। सुन्दरता, उदारता, जवानी, कुलीनता, विद्या, ऐश्वर्य, सब कुछ था।

पर एक भी कोख से कोई बच्चा न हुआ।

दरबार भरा रहता, भण्डार भरे रहते, और महल के भीतर एक ख़ालीपन बैठा रहता जिसका कोई इलाज न था। सारी पृथ्वी उनके वश में थी, सब प्रकार की सम्पत्ति उनकी सेवा में हाज़िर थी, पर वे सब वस्तुएँ उन्हें सुखी न कर पातीं। इसी कारण सम्राट् को सदा एक भीतरी चिन्ता घेरे रहती।

The sage Angira, a luminous ascetic with matted hair, arriving at Chitraketu's palace; the king rising to honor him with arghya water and an offered seat, then sitting humbly on the ground with folded hands; warm classical Indian color illustration.

एक दिन अंगिरा ऋषि, शाप और वरदान दोनों देने में समर्थ, अलग-अलग लोकों में स्वच्छन्द विचरते हुए, इत्तिफ़ाक़ से चित्रकेतु के महल में आ पहुँचे। राजा ने उठकर अर्घ्य और आसन से उनकी विधिपूर्वक पूजा की। फिर जब ऋषि सुख से बैठ गए, तो सम्राट् भी हाथ जोड़कर उनके पास ज़मीन पर बैठ गए, चुपचाप।

अंगिरा देख रहे थे। यह राजा बहुत विनम्र था, और उसके मुख पर किसी भीतरी चिन्ता की एक छाया काँप रही थी।

”राजन्,” ऋषि ने कहा, ”आपकी प्रजा, मन्त्री, सेना, कोष, सब कुशल से तो हैं? जैसे जीव सात आवरणों में घिरा रहता है, वैसे ही राजा अपनी इन प्रकृतियों में घिरा रहता है।” फिर ज़रा रुककर, सीधे आँखों में देखकर, ”पर मैं देख रहा हूँ कि आप स्वयं सन्तुष्ट नहीं हैं। आपके मुख पर किसी अधूरी कामना की लकीर है। यह असन्तोष किसी और का दिया है, या अपना ही है?”

चित्रकेतु ने सिर झुका लिया। बहुत देर तक कुछ न बोले। फिर बहुत धीमे से कहा, ”भगवन्, मुझे पृथ्वी का साम्राज्य मिला है, ऐश्वर्य मिला है। पर भूखे-प्यासे को अन्न-जल के सिवा और किसी चीज़ से शान्ति नहीं मिलती। मेरी कोई सन्तान नहीं। मेरे पितर पिण्ड न मिलने की आशंका से दुःखी हैं, और मैं भी। मुझे इस घोर नरक से उबारिए।”

अंगिरा को उस राजा पर दया आ गई। वे जानते थे कि अभी इस हृदय में पुत्र की लालसा इतनी गहरी जमी है कि उसे ज्ञान देना बेकार है। पहले यह कामना पूरी हो, तभी आगे की बात होगी।

उन्होंने त्वष्टा देवता के योग्य एक यज्ञ रचा, और उसका जो पवित्र अवशेष प्रसाद बचा, वह राजा की रानियों में ज्येष्ठ और सद्गुणवती महारानी कृतद्युति को दिया। फिर बोले, ”राजन्, आपकी पत्नी के गर्भ से एक पुत्र होगा। पर सुन लीजिए। वह आपको हर्ष और शोक, दोनों देगा।”

यह कहकर ऋषि चले गए। राजा ने वह आधा वाक्य सुना भी, और सुनकर भी जाने दिया, जैसे प्यासा आदमी पानी के रंग पर ध्यान नहीं देता।

कृतद्युति ने वह प्रसाद खाया, और गर्भ धारण किया। शुक्लपक्ष के चाँद की तरह वह गर्भ दिन-ब-दिन बढ़ता गया। समय पूरा होने पर एक सुन्दर पुत्र का जन्म हुआ। पूरे शूरसेन देश में आनन्द की लहर दौड़ गई।

Joyous birth-celebration of Chitraketu's son; the king after his bath distributing lavish charity to brahmins, gold, silver, cloth, horses, elephants and herds of sixty crore cows, the whole kingdom rejoicing like rain falling on all; festive classical Indian color illustration.

चित्रकेतु के आनन्द का तो कहना ही क्या। उन्होंने स्नान कर, ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाकर पुत्र का जातकर्म करवाया, और दान में सोना, चाँदी, वस्त्र, गाँव, घोड़े, हाथी, और छः अर्बुद (साठ करोड़) गौएँ बाँट दीं। बादल जैसे सब पर बरसता है, वैसे ही वे बरस पड़े।

पर एक बात थी। जैसे किसी कंगाल को बड़ी कठिनाई से थोड़ा धन मिल जाए तो उसमें उसकी आसक्ति और गहरी हो जाती है, वैसे ही उस बड़ी कठिनाई से मिले पुत्र में राजा का स्नेह दिन-ब-दिन और कसता गया। कृतद्युति का स्नेह तो माँ का था ही।

पर महल में और भी रानियाँ थीं। सौतें। उनकी कोई कोख नहीं फली थी।

राजा अब उस एक बच्चे के लाड़-प्यार में ऐसे डूबे कि बाक़ी रानियों की ओर से उनका मन हट गया। वे रानियाँ पहले से ही सन्तानहीन होने के दुःख में थीं, अब राजा की उपेक्षा का दुःख और जुड़ गया। वे अपने को धिक्कारने लगीं, और मन-ही-मन जलने लगीं।

आपस में कहतीं, ”अरी बहिनो, पुत्रहीन स्त्री बड़ी अभागी होती है। पुत्रवाली सौत तो दासी की तरह उसका तिरस्कार करती है। और तो और, पति भी उसे पत्नी नहीं मानता। भला, दासियों को क्या दुःख? वे तो स्वामी की सेवा करके सम्मान पाती रहती हैं। पर हम तो उनसे भी गई-बीती हो रही हैं।”

The jealous childless co-queens secretly poisoning the infant prince inside the palace, faces twisted with envy and cruelty, the unsuspecting baby and a hidden vial of poison; tense classical Indian color illustration, no other characters named.

यह जलन रोज़ बढ़ती गई, और एक दिन द्वेष में बदल गई। द्वेष ने उनकी बुद्धि मार दी, हृदय में क्रूरता भर दी। वे अपने पति का यह पुत्र-स्नेह सह न सकीं। और एक दिन, उन्होंने उस नन्हे बालक को धीरे से ज़हर दे दिया।

कृतद्युति को कुछ पता न था। वह समझ रही थी कि बच्चा सो रहा है। दूर से देखती, और महल में इधर-उधर अपने काम में लगी रहती। बहुत देर हो गई तो धाय से बोलीं, ”कल्याणी, मेरे लाल को ले आ। बहुत सो लिया।”

धाय बच्चे के पास गई। झुककर देखा। बच्चे की आँखों की पुतलियाँ उलट गई थीं। प्राण, इन्द्रिय, सब उस छोटे-से शरीर को छोड़ चुके थे।

”हाय रे, मैं मारी गई,” कहकर वह वहीं धरती पर गिर पड़ी, और दोनों हाथों से छाती पीट-पीटकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

उसका रोना सुनकर कृतद्युति दौड़ी आई। और उसने देखा कि उसका छोटा-सा बच्चा अकस्मात् मर गया है।

Queen Kritadyuti collapsed beside her dead infant son, hair disheveled and garments awry, wailing like a kurari bird, tears soaking her saffron-and-sandal-anointed breast, flowers falling from her hair; grief-stricken classical Indian color illustration.

महारानी वहीं मूर्च्छित होकर गिर पड़ी। उसके सिर के बाल बिखर गए, वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गया। होश आया तो वह कुररी पक्षी की तरह विलाप करने लगी। केसर और चन्दन से चर्चित उसका वक्ष आँसुओं से भीगने लगा। उसके बालों में गुँथे फूल एक-एक कर झड़ रहे थे, और वह उन्हें समेटने का भी होश न रखती थी।

”अरे विधाता,” वह चीख़ी, ”आप कैसे हैं, जो अपनी ही बनाई सृष्टि के विपरीत चलते हैं। बूढ़े-बूढ़े तो जीते रहें और बच्चे मर जाएँ। अगर आपके स्वभाव में ऐसी ही उलटी रीत है, तो आप जीवों के अमर शत्रु हैं।”

रनिवास के सारे स्त्री-पुरुष दौड़ आए और रोने लगे। वे हत्यारी रानियाँ भी वहाँ आकर झूठमूठ रोने का ढोंग करने लगीं।

चित्रकेतु को ख़बर लगी। शोक के आवेग से उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वे मन्त्रियों और ब्राह्मणों के साथ, रास्ते में गिरते-पड़ते, मृत बालक के पास पहुँचे, और बेहोश होकर उसके पैरों के पास गिर पड़े। लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगे। आँसुओं की अधिकता से उनका गला रुँध गया, और वे कुछ बोल न सके।

पति-पत्नी इस तरह विलाप करने लगे कि मन्त्री से लेकर रनिवास की दासी तक, सारा नगर शोक में अचेत-सा हो गया। वह बच्चा उनकी इकलौती सन्तान था, और बड़ी कठिनाई से मिला था।


तब महर्षि अंगिरा, और साथ में देवर्षि नारद, उस नगर में आए।

राजा मुर्दे की तरह अपने मृत पुत्र के पास ही पड़े थे। दोनों ऋषियों ने देखा कि सम्राट् पुत्रशोक से चेतनाहीन हुए जा रहे हैं, और कोई उन्हें समझाने वाला तक नहीं है।

Sages Angira and the celestial Narada standing before the prostrate, fainting King Chitraketu beside his dead son, Angira gently questioning him about past and future births; consoling classical Indian color illustration with the two radiant sages and the grieving king.

अंगिरा ने कहा, ”राजेन्द्र, जिसके लिए आप इतना शोक कर रहे हैं, वह बालक इस जन्म में और पिछले जन्मों में आपका कौन था? और आप उसके कौन थे? अगले जन्मों में भी उसके साथ आपका क्या सम्बन्ध रहेगा?”

”जैसे जल के वेग से बालू के कण आपस में जुड़ते और बिछुड़ते रहते हैं, राजन्, वैसे ही समय के प्रवाह में प्राणियों का भी मिलन और बिछोह होता रहता है। जैसे कुछ बीजों से दूसरे बीज पैदा होते और नष्ट होते हैं, वैसे ही भगवान् की माया से प्रेरित होकर प्राणियों से दूसरे प्राणी उत्पन्न होते और नष्ट होते हैं। हम, आप, और ये जितने भी प्राणी इस समय यहाँ हैं, मृत्यु के बाद नहीं रहेंगे, और जन्म से पहले भी नहीं थे।”

राजा सुनते रहे। आँसू अब भी बह रहे थे, पर वह आँधी, जो भीतर सब कुछ उड़ाए ले जा रही थी, ज़रा थमने लगी।

तब नारद ने एक और काम किया।

Narada by his yogic power briefly recalling the soul of the dead child; a luminous spirit-form near the small body addressing the stunned royal parents, speaking words of wisdom about the deathless eternal self; mystical classical Indian color illustration.

उन्होंने अपने योगबल से उस मरे हुए बालक के जीव को क्षण-भर के लिए वापस बुलाया, और शोकाकुल माँ-बाप के सामने उसे बोलने को कहा। ”जीवात्मन्, आपका कल्याण हो। देखिए, आपके माता-पिता, आपके सगे-सम्बन्धी आपके वियोग में कितने दुःखी हो रहे हैं। आप अपने इस शरीर में लौट आइए, बाक़ी आयु अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ बिता लीजिए, राजसिंहासन पर बैठिए।”

उस बालक के भीतर से जो आवाज़ आई, वह किसी बच्चे की न थी।

”देवर्षि, मैं अपने कर्मों के अनुसार देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी, न जाने कितनी योनियों में भटक रहा हूँ। इनमें से ये लोग किस जन्म में मेरे माता-पिता हुए थे? विभिन्न जन्मों में सभी एक-दूसरे के भाई, नाती, शत्रु, मित्र, उदासीन और द्वेषी होते रहते हैं। जैसे सोने-चाँदी की चीज़ें एक व्यापारी से दूसरे के पास आती-जाती रहती हैं, वैसे ही जीव भी अलग-अलग योनियों में आता-जाता रहता है।”

”जब तक जिसका जिस वस्तु से सम्बन्ध रहता है, तभी तक उसकी उस वस्तु से ममता रहती है। यह जीव तो नित्य है, अहंकार से रहित है। यह न किसी का अत्यन्त प्रिय है, न अप्रिय, न अपना, न पराया। यह तो कर्म-कारण का साक्षी और स्वतन्त्र है। इसलिए यह न जन्म लेता है, न मरता है।”

इतना कहकर वह जीव चला गया।

और महल में एक अजीब-सी शान्ति उतर आई।

चित्रकेतु और कृतद्युति को सुनकर बड़ा विस्मय हुआ। जिसे वे अपना बेटा मान बैठे थे, वह तो किसी का बेटा कभी था ही नहीं। उनका स्नेह-बन्धन कट गया, और उसके साथ मरने का वह असह्य शोक भी जाता रहा। उन्होंने उस मृत देह का अन्तिम संस्कार किया, और उस दुस्त्यज स्नेह को छोड़ दिया, जिसके कारण शोक, मोह, भय और दुःख की प्राप्ति होती है।

जिन रानियों ने बच्चे को विष दिया था, वे अब अपनी करनी पर लज्जा से आँख तक न उठा पाती थीं। बालहत्या के पाप से श्रीहीन हो चुकी थीं। उन्होंने अंगिरा के उपदेश को याद कर, यमुना के तट पर ब्राह्मणों के बताए अनुसार उस पाप का प्रायश्चित्त किया।

इस तरह अंगिरा और नारद के उपदेश से चित्रकेतु की विवेकबुद्धि जाग उठी। वे घर-गृहस्थी के अँधेरे कुएँ से उसी तरह बाहर निकल पड़े, जैसे कोई हाथी तालाब के कीचड़ से निकल आए।

उन्होंने यमुना में विधिपूर्वक स्नान कर तर्पण किया। फिर इन्द्रियों को साधकर, मौन होकर, दोनों ऋषियों के चरणों में सिर झुकाया।

नारद बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने देखा कि यह राजा अब जितेन्द्रिय है, भगवान् का भक्त है, और शरणागत है। उन्होंने उसे एक विद्या दी, एक मन्त्र-स्तुति, और कहा, ”नरेन्द्र, इसे एकाग्रचित्त से धारण करेंगे, तो सात रात में ही आपको भगवान् संकर्षण के दर्शन होंगे। प्राचीन काल में शंकर आदि ने भी उन्हीं संकर्षणदेव के चरणों का आश्रय लिया था, और उस महिमा को पाया जिससे बढ़कर कोई नहीं, समान भी नहीं।”

नारद और अंगिरा यह विद्या देकर ब्रह्मलोक को चले गए।

राजा ने सात दिन केवल जल पीकर, बड़ी एकाग्रता से उस विद्या का अनुष्ठान किया। और सात रात बीतने पर उन्हें विद्याधरों का अखण्ड अधिपत्य प्राप्त हुआ। कुछ ही दिनों में उस विद्या के प्रभाव से उनका मन और भी शुद्ध हो गया, और वे शेषजी के, भगवान् संकर्षण के चरणों के समीप पहुँच गए।

उन्होंने देखा।

Chitraketu beholding Lord Sankarshana (Shesha) seated amid a circle of perfected siddhas; the Lord's body fair as a lotus-stalk, blue garment, crown, armlets, waist-girdle and wristlets, reddish eyes and a serene welcoming smile; resplendent classical Indian color illustration.

भगवान् शेष सिद्धेश्वरों के मण्डल के बीच विराजमान थे। उनका शरीर कमलनाल-सा गौर, उस पर नीले रंग का वस्त्र। सिर पर किरीट, बाँहों में बाजूबंद, कमर में करधनी, कलाई में कंगन। आँखें रतनारी, और मुख पर एक प्रसन्नता फैली हुई जो किसी आदेश की नहीं, किसी प्रतीक्षा की लगती थी।

दर्शन होते ही चित्रकेतु के सारे पाप झड़ गए। अन्तःकरण स्वच्छ हो गया। हृदय में भक्ति की बाढ़ आ गई, और आँखों से प्रेम के आँसू टप-टप गिरने लगे, इतने कि भगवान् के चरण रखने की चौकी भीग गई। उनके रोम-रोम खिल उठे।

वे बहुत देर तक कुछ बोल ही न सके। मुँह से एक अक्षर न निकले।

फिर, धीरे से, जब साँस लौटी, तो उन्होंने कहा, ”अजित, जितेन्द्रिय और समदर्शी साधुओं ने आपको जीत लिया है। और आपने भी अपने सौन्दर्य, माधुर्य, करुणा से उन्हें अपने वश में कर लिया है। जो निष्काम भाव से आपका भजन करते हैं, उन्हें आप अपने-आपको ही दे डालते हैं।”

”भगवन्, जो नरपशु केवल विषयभोग चाहते हैं, वे आपको छोड़कर आपके वैभव-रूप इन्द्रादि देवताओं की उपासना करते हैं। पर जैसे राजकुल का नाश होने पर उसके अनुयायियों की जीविका भी जाती रहती है, वैसे ही उन छोटे देवताओं का अन्त होने पर उनके दिए भोग भी नष्ट हो जाते हैं।”

भगवान् संकर्षण प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, ”चित्रकेतु, देवर्षि नारद और महर्षि अंगिरा ने आपको मेरे सम्बन्ध में जो विद्या दी, उससे और मेरे दर्शन से आप भलीभाँति सिद्ध हो चुके हैं। मैं ही समस्त प्राणियों के रूप में हूँ, मैं ही उनका आत्मा हूँ, और मैं ही पालनकर्ता भी। जो मनुष्य योगमार्ग का तत्त्व समझने में निपुण हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि जीव का परम स्वार्थ और परमार्थ केवल इतना ही है कि वह ब्रह्म और आत्मा की एकता का अनुभव कर ले।”

इतना समझाकर, चित्रकेतु के देखते-देखते, विश्वात्मा श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गए।


अब चित्रकेतु विद्याधरों के अधिपति थे।

करोड़ों वर्षों तक वे सुमेरु पर्वत की घाटियों में विहार करते रहे। उनके शरीर का बल और इन्द्रियों की शक्ति अक्षुण्ण रही। बड़े-बड़े मुनि, सिद्ध, चारण उनकी स्तुति करते। उनकी प्रेरणा से विद्याधरों की स्त्रियाँ उनके पास भगवान् के गुण और लीलाओं का गान करतीं।

एक दिन वे भगवान् के दिए तेजोमय विमान पर सवार होकर कहीं जा रहे थे। आकाश-मार्ग से, स्वच्छन्द।

Chitraketu aboard his radiant celestial aircraft in the sky, looking down and laughing mockingly at Lord Shiva, who sits in an assembly of sages embracing his consort the Goddess on his lap; matted-haired Shiva calm, the Goddess about to grow angry; classical Indian color illustration, the goddess never named.

तभी उन्होंने नीचे देखा। भगवान् शंकर बड़े-बड़े मुनियों की सभा में, सिद्ध-चारणों के बीच बैठे थे, और भगवती पार्वती को अपनी गोद में बैठाकर एक हाथ से उन्हें आलिंगन किए हुए थे।

चित्रकेतु विमान पर चढ़े हुए ही, भगवती पार्वती को सुना-सुनाकर, ज़ोर से हँसने लगे।

”अहो,” उन्होंने कहा, ”ये तो सारे जगत् के धर्मशिक्षक और गुरुदेव हैं। समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ। और इनकी यह दशा है कि भरी सभा में अपनी पत्नी को शरीर से चिपकाकर बैठे हैं। जटाधारी, इतने बड़े तपस्वी और ब्रह्मवादियों के सभापति होकर भी, साधारण आदमी की तरह गोद में स्त्री लिए। प्रायः साधारण पुरुष भी एकान्त में ही स्त्रियों के साथ उठते-बैठते हैं, और ये इतने बड़े व्रतधारी होकर भी उसे भरी सभा में लिए बैठे हैं।”

भगवान् शंकर की बुद्धि अगाध है। उन्होंने यह कटाक्ष सुना, हँस दिए, और कुछ न बोले। सभा के सदस्य भी चुप रहे।

पर पार्वती चुप न रहीं।

चित्रकेतु को भगवान् शंकर का प्रभाव नहीं मालूम था। उन्हें अपने जितेन्द्रिय होने का, अपनी विद्या और सिद्धि का, एक हल्का-सा घमण्ड हो गया था। उसी धृष्टता को देखकर देवी क्रोध से बोलीं।

”अहो, हम-जैसे दुष्ट और निर्लज्जों को दण्ड के बल पर शासन करने वाला प्रभु इस संसार में यही एक रह गया है क्या? जान पड़ता है, ब्रह्माजी, भृगु, नारद, सनकादि, कपिल, मनु, ये बड़े-बड़े महापुरुष धर्म का रहस्य नहीं जानते, तभी तो वे धर्ममर्यादा का उल्लंघन करने वाले इन भगवान् शिव को नहीं रोकते।”

”इस अधम क्षत्रिय ने उन जगद्गुरु का तिरस्कार किया, जिनके चरणकमलों का ध्यान ब्रह्मा आदि करते हैं। इसे अपने बड़प्पन का घमण्ड है। यह मूर्ख भगवान् श्रीहरि के उन चरणकमलों में रहने योग्य नहीं, जिनकी उपासना बड़े-बड़े सत्पुरुष करते हैं।”

फिर चित्रकेतु की ओर मुड़कर, ”अतः दुर्मते, जाइए, पापमयी असुरयोनि में जन्म लीजिए। ऐसा होने से, बेटा, आप फिर कभी किसी महापुरुष का अपराध न कर सकेंगे।”

सभा में सन्नाटा छा गया।

पर जिसे शाप दिया गया था, वह काँपा नहीं।

चित्रकेतु विमान से उतर पड़े, और सिर झुकाकर पार्वती को प्रसन्न करने लगे।

”माता पार्वती, मैं बड़ी प्रसन्नता से अपने दोनों हाथ जोड़कर आपका शाप स्वीकार करता हूँ। देवता लोग मनुष्यों के लिए जो कुछ कह देते हैं, वह तो उनके प्रारब्ध के अनुसार मिलने वाले फल की पूर्वसूचना मात्र होती है।”

”देवि, यह जीव अज्ञान से मोहित हो रहा है, और इसी कारण इस संसारचक्र में भटकता रहता है, और सदा-सर्वदा सर्वत्र सुख और दुःख भोगता रहता है। सुख-दुःख देने वाला न तो अपना आत्मा है, और न कोई दूसरा। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपने को या दूसरे को सुख-दुःख का कर्ता मानते हैं।”

”यह जगत् गुणों का स्वाभाविक प्रवाह है। इसमें क्या शाप, क्या अनुग्रह, क्या स्वर्ग, क्या नरक, और क्या सुख, क्या दुःख। एकमात्र भगवान् ही बिना किसी की सहायता के, अपनी मायाशक्ति से, सब प्राणियों के बन्धन, मोक्ष और सुख-दुःख की रचना करते हैं। उनका कोई प्रिय-अप्रिय, अपना-पराया नहीं। जब उनका सुख में राग ही नहीं, तब उनमें रागजन्य क्रोध कैसे हो।”

”पतिप्राणा देवि, मैं शाप से छूटने के लिए आपको प्रसन्न नहीं कर रहा। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित लगी हो, उसके लिए क्षमा करें।”

इस तरह शंकर और पार्वती को प्रसन्न कर, चित्रकेतु उनके सामने ही विमान पर सवार होकर वहाँ से चले गए। यह देखकर सब को बड़ा विस्मय हुआ। शंकर ने पार्वती से कहा, ”देखा प्रिये, हरि के इन निःस्पृह भक्तों की महिमा। ये नारायण के परायण हैं, इसलिए किसी से नहीं डरते, और स्वर्ग, नरक, मोक्ष, सबको एक ही दृष्टि से देखते हैं।”


शुकदेव चुप हुए। गंगा की लहरें तट से टकरा रही थीं।

परीक्षित् बहुत देर कुछ न बोले। फिर धीरे से कहा, ”भगवन्, तो जिसने भगवान् संकर्षण के दर्शन कर लिए, जिसका हृदय इतना निर्मल हुआ, उसे भी शाप लगा। और शाप लगा तो भी वह डरा नहीं।”

”हाँ, राजन्,” शुकदेव बोले। ”वही तो उस कथा की चोटी है। पुत्र खोकर जो टूटा था, वही पुरुष शाप पाकर भी काँपा नहीं। क्योंकि बीच के उन दिनों में उसने एक बात जान ली थी, कि जोड़ने और बिछुड़ने का सारा खेल काल का है, अपना नहीं। उसने पार्वती के शाप को भी वैसे ही ले लिया जैसे काल का एक और मोड़। यही जान लेना उसे अगले जन्म में भी ले गया।”

”उसी शाप से वह असुरयोनि में आया। और वही चित्रकेतु, राजन्, अगले जन्म में वृत्र हुआ, जिसकी बात मैंने कल आपसे कही थी। तभी तो वह दानव की देह में भी संत की तरह बोला। दानव की देह बाहर थी, भीतर वही पुराना भक्त बैठा था।”

परीक्षित् ने गंगा की ओर देखा। दूर, आकाश में एक छोटा-सा बादल धीरे से सरकता हुआ, सूरज के सामने से हटकर, जल पर अपनी परछाईं छोड़ता हुआ, दूसरे किनारे की ओर बहता चला गया।

मन्थन

चित्रकेतु की कथा भागवतम् की अत्यन्त मार्मिक कथाओं में है, क्योंकि यहाँ शोक का रास्ता ज्ञान तक जाता है, पर ज़बरदस्ती नहीं। अंगिरा पहले राजा को पुत्र देते हैं, ज्ञान बाद में। पहले घाव असली बनता है, तभी मरहम लगता है।

जो जीव बच्चे की देह से क्षण-भर को बोला, उसने एक ही बात कही, कि कोई किसी का नहीं। हम सब बालू के कण हैं, जो काल के पानी में जुड़ते और बिछुड़ते रहते हैं। यह बात सुनकर माँ-बाप का स्नेह-बन्धन कटा, और उसी क्षण उनका असह्य शोक भी जाता रहा।

पर कथा यहीं नहीं रुकती। दर्शन पाकर भी, सिद्धि पाकर भी, चित्रकेतु से एक छोटी-सी भूल हुई, एक हल्की-सी हँसी, अपने जितेन्द्रिय होने का बारीक-सा घमण्ड। और उसी से अगला जन्म बँध गया। भागवतम् यह नहीं छिपाता कि साधक की एक ज़रा-सी ठेस भी आगे चली जाती है, जैसे जड़भरत का एक हिरण।

और फिर भी, यह कोई सज़ा की कथा नहीं। शाप सुनकर चित्रकेतु काँपते नहीं, गिड़गिड़ाते नहीं। वे हाथ जोड़कर कहते हैं कि शाप और अनुग्रह दोनों एक ही प्रवाह के मोड़ हैं। यही समभाव उन्हें दानव की देह में भी भक्त बनाए रखता है। पकड़ छूट जाए, तो नरक की देह भी राह बन जाती है।

साहित्यिक-संदर्भ

चित्रकेतु की यह कथा श्रीमद्भागवत के षष्ठ स्कन्ध, अध्याय 14 से 17 तक आती है। अध्याय 14 में पुत्र का जन्म और मृत्यु, 15 में अंगिरा और नारद का उपदेश तथा मृत जीव का संवाद, 16 में संकर्षणदेव का दर्शन, और 17 में पार्वती का शाप वर्णित है। यही शाप चित्रकेतु को अगले जन्म में वृत्र बनाता है (स्कन्ध 6, अध्याय 9 से 13), इसलिए यह कथा वृत्र-कथा की पूर्वकथा भी है।