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महाभारतधर्म की कठिन भूमि

अध्याय 36 · भाग 5 · उमा-महेश्वर, विष्णु-सहस्रनाम और भीष्म का स्वर्गारोहण

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महाभारत · अनुशासन पर्व
शर-शय्या से भीष्म का अन्तिम, दान-प्रधान उपदेश, फूल-धूप-दीप तथा गो और स्वर्ण का दान, ब्राह्मण-महिमा, उमा-महेश्वर संवाद, अनेक आख्यान, और अन्ततः उत्तरायण की प्रतीक्षा कर पितामह का देह-त्याग।

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ज्ञान, तप और दान: व्यास और मैत्रेय

युधिष्ठिर ने पूछा कि ज्ञान, तप और दान: इन तीनों में कौन श्रेष्ठ है। भीष्म ने मैत्रेय और व्यास के बीच हुए प्राचीन संवाद की कथा सुनाई। एक बार व्यास, वेश बदलकर संसार में विचरते हुए, वाराणसी पहुँचे और मुनि-वंश में जन्मे मैत्रेय के पास गए। मैत्रेय ने उन्हें आसन दिया, विधिपूर्वक पूजा की, और उत्तम भोजन कराया। वह स्वादिष्ट और हितकर अन्न खाकर व्यास अत्यन्त प्रसन्न हुए और बैठे-बैठे हँस पड़े।

मैत्रेय ने हँसने का कारण पूछा, और साथ ही अपना संशय भी कहा: वे (व्यास) जीवित रहते ही मुक्त हैं, मैं अभी मुक्त नहीं; फिर भी मुझे लगता है कि हम दोनों में बहुत अन्तर नहीं, यद्यपि मैं जन्म से विशिष्ट हूँ। व्यास बोले कि उनका विस्मय एक ऐसे विधान से उपजा है जो प्रत्यक्ष में अतिशयोक्ति-सा लगता है, पर वेद असत्य तो कहते नहीं। कहा गया है कि मनुष्य के तीन परम व्रत हैं: कभी हिंसा न करे, सदा सत्य बोले, और दान करे। उचित परिस्थिति में किया छोटा-सा दान भी महान फल देता है। “आपने प्यासे को श्रद्धा से थोड़ा जल दिया; स्वयं भूखे-प्यासे रहते हुए मुझे यह अन्न देकर आपने अनेक यज्ञों के समान उच्च लोक जीत लिए।” व्यास ने कहा कि दान तीर्थ-स्नान और समस्त वैदिक व्रतों से भी श्रेष्ठ है; दान-दाताओं का मार्ग ही विवेकियों का मार्ग है। जैसे भली-भाँति पढ़े वेद, जैसे इन्द्रिय-संयम, जैसे सर्वत्यागमय जीवन: वैसा ही अत्युत्तम पुण्य दान का है।

व्यास ने यह भी कहा कि संसार में मनुष्यों का आचरण तीन प्रकार का है: कुछ धर्मी, कुछ पापी, कुछ न धर्मी न पापी। जो ब्रह्म में स्थित है, उसके कर्म किसी कोटि में नहीं गिने जाते; जो अपने विहित कर्तव्यों का पालन करता है, वह न पुण्यी न पापी; जो यज्ञ, दान, तप में लगे हैं, वे धर्मी; जो प्राणियों को सताते हैं, वे पापी; और जो दूसरों का धन हरते हैं, वे नरक में पड़ते हैं। “आप क्रीड़ा करें, बढ़ें, आनन्द लें, दान दें, यज्ञ करें: तब न ज्ञानी, न तपस्वी आप पर पार पा सकेंगे।”

मैत्रेय ने उत्तर में दान की महिमा स्वीकार की, पर साथ ही ब्राह्मण की महिमा कही: तप, वेद-ज्ञान और शुद्ध-कुल में जन्म, ये तीन मिलकर ‘द्विज’ की स्थिति बनाते हैं। ब्राह्मण के प्रसन्न होने पर पितर और देव भी प्रसन्न होते हैं। वेदज्ञ ब्राह्मण के बिना सब अन्धकार होता, चार वर्णों की व्यवस्था न होती, धर्म-अधर्म और सत्य-असत्य का भेद मिट जाता। जैसे जुती हुई भूमि में प्रचुर फसल, वैसे ही विद्वान ब्राह्मण को दिए दान से महान पुण्य उपजता है। अविद्वान ब्राह्मण को दिया अन्न दाता और ग्रहीता दोनों को हानि पहुँचाता है; पात्र को दिया हुआ ही सच्चा ‘खाद्य’ है।

तब व्यास ने मैत्रेय की प्रशंसा की और दान से भी श्रेष्ठ विषय पर, तप और ज्ञान पर, बात की। तप पवित्र है; तप से ही वेद और स्वर्ग की प्राप्ति होती है; तप से सब पाप नष्ट होते हैं। मद्यपायी, परधन-हर्ता, भ्रूण-हत्यारा, गुरु-शय्या का दूषक: सभी तप के बल से तर सकते हैं। पूर्ण ज्ञान-दृष्टि वाला और हर प्रकार का तपस्वी: दोनों समान वन्दनीय हैं। व्यास ने मैत्रेय को गृहस्थ-धर्म का उपदेश दिया: जिस घर में पति पत्नी से और पत्नी पति से सन्तुष्ट रहती है, वहाँ सब मंगल होते हैं; जैसे जल से शरीर का मैल और अग्नि के तेज से अन्धकार दूर होता है, वैसे ही दान और तप से पाप धुलता है। यह कहकर व्यास ने विदा ली, और मैत्रेय ने प्रदक्षिणा कर उन्हें प्रणाम किया।

सार: इस संवाद में व्यास दान, ज्ञान और तप: तीनों की महिमा गाते हैं, पर किसी एक को निरपेक्ष रूप से अन्य पर नहीं रखते। मैत्रेय का प्यासे को जल और भूखे को अन्न देना ही अनेक यज्ञों के बराबर बताया गया: पात्र और अवसर देखकर किया छोटा दान महान फल देता है।

पतिव्रता का आचरण: सांडिली और सुमना

युधिष्ठिर ने अच्छी और पतिव्रता स्त्रियों के उत्तम आचरण के विषय में पूछा। भीष्म ने स्वर्गलोक की कथा सुनाई। केकयराज की कन्या सुमना ने सर्वज्ञ और सत्यनिष्ठ सांडिली से पूछा कि वह किस आचरण से, किन कर्मों से, सब पापों से रहित होकर स्वर्ग पहुँची: वह तो अग्नि-शिखा-सी देदीप्यमान है, श्वेत वस्त्र पहने, दिव्य रथ पर सहस्रगुना तेज से प्रकाशित बैठी है।

सांडिली ने मधुर मुस्कान के साथ, एकान्त में उत्तर दिया कि उसने न पीले वस्त्र पहने, न वृक्ष-छाल, न सिर मुँड़ाया, न जटा रखी: इन बाह्य कर्मों से वह स्वर्ग नहीं पहुँची। उसका रहस्य यह था: उसने कभी प्रमादवश पति से अप्रिय या कटु वचन नहीं कहा; सदा देव, पितर और ब्राह्मणों की पूजा की; सावधानी से सास-ससुर की सेवा की। उसका संकल्प था कि वह कभी छल न करे। वह घर के द्वार पर खड़ी न होती, न किसी से देर तक बात करती; कभी ऊँचे स्वर में न हँसती, किसी का अहित न करती, कोई रहस्य प्रकट न करती। पति बाहर से लौटकर आता तो वह आसन देकर आदर से सेवा करती। वह ऐसा कोई भोजन न करती जो पति को अज्ञात हो या अप्रिय हो। प्रातः उठकर वह सम्बन्धियों और कुटुम्बियों के लिए सब आवश्यक कार्य करवाती। पति के परदेश जाने पर वह घर पर रहकर उसके कार्य की सिद्धि हेतु मंगल-कर्म करती; उस अवधि में न अंजन लगाती, न आभूषण, न श्रृंगार करती। पति शान्ति से सोता तो आवश्यक कार्य होने पर भी उसे न जगाती: वह उसके पास बैठे रहने में सुख मानती। वह कभी पति को धन कमाने के लिए अधिक परिश्रम करने का दबाव न डालती; रहस्य गुप्त रखती; घर-आँगन सदा स्वच्छ रखती। जो स्त्री एकाग्र मन से इस कर्तव्य-पथ पर चलती है, वह स्वर्ग में दूसरी अरुन्धती-सी पूजनीय होती है।

इतना कहकर सांडिली वहीं अन्तर्धान हो गईं। भीष्म ने जोड़ा कि जो मनुष्य प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या को इस कथा को पढ़ता है, वह स्वर्ग में नन्दन-वन के सुख पाता है।

सार: सांडिली स्पष्ट कहती हैं कि बाह्य तपस्वी-वेश ने उन्हें स्वर्ग नहीं दिलाया। उन्हें स्वर्ग दिलाया गृहस्थी के भीतर के सहज सत्य-आचरण ने: कटु वचन का त्याग, छल का अभाव, सेवा और संयम। यह मूल का स्त्री-धर्म-वर्णन है, जिसे यहाँ ज्यों-का-त्यों रखा गया है।

सान्त्वना का बल: ब्राह्मण और राक्षस

युधिष्ठिर ने पूछा कि सान्त्वना (मधुर वचन) और दान: इन दोनों में कौन अधिक प्रभावी है। भीष्म ने कहा कि कोई सान्त्वना से प्रसन्न होता है, कोई दान से; हर व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार किसी एक से प्रभावित होता है। फिर उन्होंने एक प्राचीन कथा सुनाई जिसमें एक ब्राह्मण सान्त्वना के बल से राक्षस के चंगुल से छूट गया।

एक वाक्पटु और बुद्धिमान ब्राह्मण एकान्त वन में एक राक्षस के हाथ पड़ गया, जो उसे खाना चाहता था। ब्राह्मण घबराया नहीं; उसने सान्त्वना का प्रयोग करने का निश्चय किया। राक्षस ने आदरपूर्वक उससे पूछा, “आप बच जाएँगे, पर बताइए, मैं इतना पीला और दुबला क्यों हूँ?” ब्राह्मण ने क्षणभर सोचकर एक के बाद एक उत्तर दिए, और हर उत्तर के अन्त में कहता, “इसी कारण आप पीले और दुबले हैं।”

उसने कहा: आप अपने निवास से दूर, अपने से भिन्न क्षेत्र में, मित्रों और बन्धुओं के संग से रहित होकर भी विपुल सम्पत्ति भोग रहे हैं: इसी से आप दुबले हैं। आपके मित्र, भली-भाँति आदृत होकर भी, अपने दुष्ट स्वभाव से आपके प्रति सद्भाव नहीं रखते। आप गुणी और बुद्धिमान होते हुए भी देखते हैं कि गुणहीन लोग आपसे अधिक सम्मानित हो रहे हैं। आपसे धनाढ्य पर आपसे हीन गुण वाले लोग आपकी अवहेलना करते हैं। आप साधन के अभाव में दुखी होते हुए भी, आत्मा की उच्चता से, उपलब्ध साधनों को तुच्छ मानते हैं। आपने धर्म के कारण किसी दूसरे के भले के लिए स्वयं को कष्ट दिया, पर वह आपको ठगा हुआ समझता है। आप लोभ-क्रोध से पीड़ित दुखी लोगों के लिए शोक करते हैं। ज्ञानी होते हुए भी आप मूर्खों से उपहास पाते हैं। किसी शत्रु ने मित्र-वचन कहकर पहले धर्मी-सा बर्ताव किया, फिर ठगकर छोड़ दिया।

इसी क्रम में ब्राह्मण ने अनेक मानवीय पीड़ाएँ गिनाईं: योग्य वचन का अनादर, बन्धुओं का विरोध, स्वजन का असन्तोष, किसी पड़ोसी का आपकी प्रिय पत्नी पर लोभ, किसी कार्य के फल का दूसरे द्वारा छीन लिया जाना, बिना दोष के किसी का शाप, धन और गुण के अभाव में भी मित्रों के दुख दूर करने की असमर्थता, चारों ओर बढ़ते अधर्म और घटते धर्म का शोक, और वेदज्ञ लोगों को अनुचित कर्मों में लगे देखने की वेदना। हर बार वह कहता, “इसी से आप पीले और दुबले हैं।” इस प्रकार प्रशंसित होकर राक्षस ने उस विद्वान ब्राह्मण को सम्मानित किया, मित्र बनाया, और पर्याप्त धन देकर बिना खाए छोड़ दिया।

सार: सान्त्वना की शक्ति का यह दृष्टान्त दिखाता है कि कुशल और सहानुभूतिपूर्ण वचन क्रूरतम प्राणी को भी शान्त कर सकते हैं। ब्राह्मण ने राक्षस की हर सम्भव पीड़ा को नाम देकर उसका मन जीत लिया, और प्राणों के साथ-साथ धन भी पाया।

देव-पितर-ऋषियों का धर्म-रहस्य: श्राद्ध और दान

युधिष्ठिर ने पूछा कि दरिद्र मनुष्य अपना कल्याण कैसे साधे, और सब दानों में श्रेष्ठ क्या है, किस अवसर पर क्या देना चाहिए। भीष्म ने कहा कि वे वही गूढ़ धर्म-रहस्य सुनाएँगे जो व्यास ने उन्हें सुनाए थे: ये रहस्य देवताओं के लिए भी कठिन हैं। यम ने व्रत और योग के बल से इन्हें अपने तप के फल-रूप में जाना था। किस कर्म से कौन देवता, कौन पितर, ऋषि, प्रमथ, श्री, चित्रगुप्त और दिशाओं के गजराज प्रसन्न होते हैं: यह जानकर और तदनुसार आचरण करनेवाला निष्पाप होता है।

फिर भीष्म ने पाप-वृद्धि का यह क्रम कहा: दस कसाई के बराबर एक तेली, दस तेली के बराबर एक मद्यविक्रेता, दस मद्यविक्रेता के बराबर एक वेश्या, और दस वेश्या के बराबर एक प्रादेशिक मुखिया; एक बड़ा राजा इन सबके आधे के बराबर है। अतः इनसे दान ग्रहण नहीं करना चाहिए; धर्म-शास्त्र का श्रवण करना चाहिए।

इसके बाद भीष्म ने एक लम्बी देव-सभा का वृत्तान्त सुनाया, जिसमें इन्द्र की सभा में आए एक आकाशचारी देवदूत ने श्राद्ध के रहस्य पूछे: श्राद्ध करने वाले और श्राद्ध में भोजन करने वाले के लिए उस दिन संग-निषेध क्यों है, और श्राद्ध में दिए जाने वाले तीन पिण्ड किसे, किस क्रम में अर्पित हों। पितरों ने उत्तर दिया: जो श्राद्ध के दिन संग करता है, उसके पितरों को एक मास तक उसके वीर्य पर लेटना पड़ता है। तीन पिण्डों में से पहला जल में डाला जाए, दूसरा पत्नी को खिलाया जाए, तीसरा प्रज्वलित अग्नि में डाला जाए। व्यास से सुना यह रहस्य भीष्म ने युधिष्ठिर को समझाया: जल में डाला पिण्ड चन्द्रदेव को तृप्त करता है, जो लौटकर अन्य देवों और पितरों को तृप्त करते हैं; पत्नी द्वारा खाया पिण्ड सन्तान देता है; अग्नि में डाला पिण्ड पितरों को सीधे तृप्त करता है।

एक उप-कथा: देव-सभा में एक के बाद एक ऋषि और देवता अपने-अपने धर्म-रहस्य कहते हैं। ऋषि विद्युत्प्रभा ने पूछा कि अज्ञानवश मनुष्य कीट, चींटी, साँप, मेष, मृग, पक्षी आदि मारकर भारी पाप करते हैं: इसका उपाय क्या है। शक्र (इन्द्र) ने कुरुक्षेत्र, गया, गंगा, प्रभास और पुष्कर के मन में स्मरण के साथ जल में सिर डुबोने को कहा, और तीन दिन ऐसा करके उपवास तथा गौ के पृष्ठ का स्पर्श और उसकी पूँछ को प्रणाम बताया। फिर बृहस्पति ने वे दोष बताए जो सूर्य की ओर मुख करके मूत्र-त्याग, वायु का अनादर, अग्नि में आहुति का अभाव, और छोटे बछड़े वाली गौ का अधिक दोहन करने से उपजते हैं: सूर्य, वायु, अग्नि और गौ स्वयम्भू द्वारा सब लोकों की रक्षा हेतु रचे गए, ये मनुष्यों के देवता हैं।

तब पितरों ने बताया कि किन कर्मों से वे प्रसन्न होते हैं: नीले रंग के बैल छोड़े जाएँ, अमावस्या को तिल और जल का दान हो, वर्षा-ऋतु में दीप जलाए जाएँ। वृद्ध-गार्ग्य ने नीले बैल छोड़ने का माहात्म्य पूछा; पितरों ने कहा कि वह बैल पूँछ से जो थोड़ा जल उठाता है, उससे साठ हज़ार वर्ष तक पितर तृप्त रहते हैं; वर्षा में दीप-दान देने वाला सोम-सा तेजस्वी होता है; अमावस्या को ताम्र-पात्र में मधु-मिश्रित तिल-जल देने वाला सम्पूर्ण श्राद्ध का फल पाता है।

इसके बाद इन्द्र के पूछने पर विष्णु ने कहा कि उन्हें ब्राह्मणों की निन्दा परम अप्रिय है; ब्राह्मणों के पूजित होने पर वे स्वयं पूजित मानते हैं। गोबर के गिरते समय बनने वाले चक्र, अश्वत्थ, गोरोचन और गौ की पूजा को वे अपनी ही पूजा मानते हैं। इन्द्र के पूछने पर विष्णु ने मुस्कुराकर बताया: चक्र से दैत्य मारे, दो चरणों से लोक नापे, वराह-रूप में हिरण्याक्ष को मारा, वामन-रूप में राजा बलि को जीता; जो इन रूपों की पूजा करते हैं, वे उन्हें तृप्त करते हैं।

फिर बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, और स्वयं गौओं ने अपने-अपने रहस्य कहे। गौओं ने कहा कि जो इन मन्त्रों से गौ की पूजा करता है, “हे वहुला, हे समंगा, हे सर्वत्र निर्भय, हे क्षमाशील और मंगलमयी, हे सखी, हे सर्व-समृद्धि की स्रोत”: वह सब पापों से मुक्त होकर इन्द्र के लोक को पाता है। तब वसिष्ठ-प्रमुख सप्तर्षियों ने ब्रह्मा से पूछा कि निर्धन धर्मी पुरुष यज्ञ-पुण्य कैसे पाएँ; ब्रह्मा ने पौष मास में रोहिणी-योग में स्नान करके, एक वस्त्र पहने, खुले आकाश के नीचे चन्द्र-किरणें पीने का व्रत बताया, जिससे महायज्ञों का पुण्य मिलता है।

एक उप-कथा: सूर्य (विभावसु), श्री, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य, जमदग्नि: प्रत्येक एक रहस्य कहते हैं। श्री कहती हैं कि जिस घर में बर्तन-शय्या बिखरे रहते हैं और स्त्रियाँ पीटी जाती हैं, उसे देव और पितर त्याग देते हैं। जमदग्नि कहते हैं कि हृदय की शुद्धि के बिना अश्वमेध और सौ वाजपेय भी व्यर्थ हैं; शुद्ध हृदय से दिया एक प्रस्थ सत्तू भी एक दरिद्र ब्राह्मण को ब्रह्मलोक तक ले गया।

आगे वायु, लोमश, माहेश्वर (शिव), स्कन्द और विष्णु ने धर्म-रहस्य कहे। माहेश्वर ने एक मास तक गौओं को अन्न देने और स्वयं एक समय भोजन करने का माहात्म्य बताया: गौ तीनों लोकों को धारण करती है, अतः पूजनीय है; उनकी ध्वजा पर बैल इसी कारण रहता है। स्कन्द ने नीले बैल के सींग की मिट्टी से शरीर लीपने का फल बताया। अन्त में विष्णु ने कहा कि जो श्रद्धा और निर्मलता से इन धर्म-रहस्यों को नित्य सुनता, पढ़ता या दूसरों को सुनाता है, वह सब भय और पाप से मुक्त होता है, और पूर्णिमा-अमावस्या को ब्राह्मणों के समक्ष इनका पाठ करने वाला सब व्रतों में स्थिर होकर सौन्दर्य और समृद्धि पाता है।

समझने की कुंजी (प्रमथ): ‘प्रमथ’ शिव के गण हैं: रात में विचरने वाले अदृश्य प्राणी। देव-सभा में जब उनसे पूछा गया कि किन घर-कर्मों के सामने वे शक्तिहीन हो जाते हैं, उन्होंने अशुद्ध आचरण (अशुचि-संग, गुरुजनों का अपमान) से अपनी शक्ति, और गोरोचन, अक्षत, घृत, नित्य-अग्नि आदि से अपनी विफलता बताई।

सार: यह विशाल खण्ड दान-धर्म, श्राद्ध-विधि, गो-दान और तिल-जल-दीप के माहात्म्य को देव, पितर, ऋषि और गौओं के मुख से क्रम-क्रम से कहता है। निर्धन के लिए भी मार्ग बताया गया: थोड़ा सत्तू, थोड़ा जल, एक दीप भी श्रद्धा से दिया जाए तो अक्षय फल देता है; और सब रहस्यों का सार शुद्ध हृदय और अहिंसा है।

अन्न ग्रहण, प्रायश्चित्त और दान के विधान

युधिष्ठिर ने पूछा कि ब्राह्मण किससे अन्न ग्रहण करे, और क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र किससे। भीष्म ने कहा कि ब्राह्मण ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य से अन्न ले, पर शूद्र से कभी नहीं। क्षत्रिय भी ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य से ले। जो अपना उचित कर्म छोड़कर शूद्र-वृत्ति करता है, उसका अन्न भी ग्राह्य नहीं। वैद्य, भाड़े के सैनिक, घर के द्वारपाल बने पुरोहित, और बिना फल के वर्षभर पढ़ने वाले: ये शूद्र-समान माने गए। जो अनादर के साथ या अपमानित होकर दिया जाए, वह अन्न ग्रहण न करे। उन्होंने विस्तार से बताया कि किस-किस से अन्न लेने पर कैसी हानि होती है।

फिर युधिष्ठिर ने प्रायश्चित्त पूछा: विविध अन्न ग्रहण करने पर ब्राह्मण कैसे शुद्ध हो। भीष्म ने बताया: घृत या तिल लेने पर सावित्री-मन्त्र से हवन; मांस, मधु या नमक लेने पर सूर्योदय तक खड़े रहना; स्वर्ण लेने पर गायत्री-जप और हाथ में लोहा धारण; अन्न, खीर, गुड़, तेल आदि लेने पर दिन में तीन बार स्नान; धान, पुष्प, फल, जल आदि लेने पर सौ बार गायत्री-जप। मृत-गृह में तीन रात भोजन करने पर सात दिन तक त्रिकाल-स्नान। शूद्रों के साथ भोजन करने पर शुद्धि-कर्म; वैश्यों के साथ खाने पर तीन रात भिक्षाशन; क्षत्रियों के साथ खाने पर वस्त्र-सहित स्नान। एक ही पात्र में नीचे-वर्ण के साथ खाने पर शूद्र कुल-प्रतिष्ठा, वैश्य पशु-मित्र, क्षत्रिय समृद्धि और ब्राह्मण तेज खोता है: ऐसे में प्रायश्चित्त और देव-आहुति विहित है।

सार: यहाँ भीष्म अन्न-ग्रहण की वर्ण-आधारित मर्यादाएँ और उल्लंघन के प्रायश्चित्त क्रम से कहते हैं। यह मूल का सामाजिक-कर्मकाण्डीय विधान है, जिसकी कठोरता को बिना नरम किए ज्यों-का-त्यों रखा गया है।

दान से स्वर्ग पाने वाले राजा, और दान के पाँच प्रकार

युधिष्ठिर ने पूछा कि दान और तप-भक्ति में कौन श्रेष्ठ है। भीष्म ने उन राजाओं के नाम गिनाए जिन्होंने धर्म, तप और दान से स्वर्ग पाया। ऋषि आत्रेय शिष्यों को परब्रह्म का ज्ञान देकर स्वर्ग गए। उशीनर-पुत्र राजा शिवि ने ब्राह्मण के हित में अपने प्रिय पुत्र का जीवन अर्पित कर स्वर्ग पाया। काशिराज प्रतर्दन ने पुत्र को ब्राह्मण को देकर अक्षय यश पाया। संकृति-पुत्र रन्तिदेव ने वसिष्ठ को दान देकर परम स्वर्ग पाया। देववृद्ध ने सौ-तीली वाला स्वर्ण-छत्र दान कर स्वर्ग पाया। अम्बरीष ने अपना सम्पूर्ण राज्य ब्राह्मण को देकर देवलोक पाया।

फिर भीष्म ने अनेक राजाओं के दान-पुण्य क्रम से गिनाए: सूर्यवंशी जनमेजय ने कुण्डल, रथ और गौएँ दीं; वृषदर्भि ने रत्न और सुन्दर भवन दिए; विदर्भ-नरेश निमि ने अपनी कन्या और राज्य अगस्त्य को दिए; जमदग्नि-पुत्र राम (परशुराम) ने भूमि-दान से सनातन लोक पाए; वसिष्ठ ने अनावृष्टि के समय सब प्राणियों को बचाया; दशरथ-पुत्र राम ने यज्ञों में धन-दान किया; कक्षसेन ने वसिष्ठ के पास जमा धन सौंप दिया; परीक्षित-पुत्र मरुत्त ने अपनी कन्या अंगिरा को विवाह में दी; पांचाल-नरेश ब्रह्मदत्त ने बहुमूल्य शंख दान किया; राजा मित्रसह ने अपनी प्रिय पत्नी मदयन्ती वसिष्ठ को दी; मनु-पुत्र सुद्युम्न ने ऋषि लिखित को उचित दण्ड दिलवाकर परम लोक पाए। लोमपाद ने अपनी कन्या शान्ता ऋष्यशृंग को दी; भगीरथ ने अपनी कन्या हंसी कौत्स को दी, और कोहल को सहस्रों गौएँ दीं। ऐसे और भी अनेक राजाओं ने दान और तप से स्वर्ग पाया, और बार-बार लौटकर आए: उनका यश संसार के रहते रहेगा। “हे राजन्, रात्रि आ गई है; प्रातः आपके मन में जो भी संशय उठें, उन्हें समझाऊँगा।”

अगले दिन युधिष्ठिर ने दान के प्रकार और फल पूछे। भीष्म ने कहा कि दान पाँच प्रकार के हैं: पुण्य की इच्छा से, लाभ की इच्छा से, भय से, स्वेच्छा से, और दया से। निर्मल मन से ब्राह्मणों को दिया जाने वाला दान पुण्य-कामना से होता है। “वह दान देने वाला है, या उसने मुझे पहले दिया है”: ऐसा सुनकर किसी विशेष याचक को दिया दान लाभ-कामना से होता है। “यदि अनादर किया तो यह हानि पहुँचा सकता है”: ऐसे भय से अज्ञानी को भी विद्वान दान देता है। “यह मुझे प्रिय है, मैं इसे प्रिय हूँ”: इस भाव से मित्र को सहर्ष दिया दान स्वेच्छा-दान है। “यह याचक दरिद्र है, थोड़े में ही सन्तुष्ट हो जाएगा”: इस विचार से दरिद्र को दया से दिया दान पाँचवाँ प्रकार है। सृष्टि के स्वामी ब्रह्मा ने कहा है कि मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार सदा दान करे।

सार: भीष्म दान-धर्म को मूर्त उदाहरणों से सिद्ध करते हैं: शिवि, रन्तिदेव, अम्बरीष जैसे राजाओं के नाम-कर्म क्रम से गिनाकर। फिर दान के पाँच भीतरी हेतु (पुण्य, लाभ, भय, स्नेह, दया) खोलते हैं: दान वही श्रेष्ठ है जो शक्ति-भर और निर्मल मन से हो।

विष्णु का माहात्म्य, और उमा-महेश्वर का संवाद

युधिष्ठिर ने धर्म और अर्थ से युक्त, परलोक में कल्याणकारी और सब प्राणियों के लिए विस्मयकारी उपदेश सुनने की इच्छा प्रकट की, “यहाँ साक्षात नारायण (वासुदेव) विराजमान हैं, ये भी आपका आदर करते हैं; इन सबके समक्ष आप उपदेश दें।” भीष्म प्रसन्न होकर बोले कि वे विष्णु का वह माहात्म्य कहेंगे जो उन्होंने अपने गुरुओं से सुना, और वृषभध्वज महादेव का माहात्म्य भी, तथा रुद्र और उनकी पत्नी के मन में उठा संशय भी।

एक बार धर्मात्मा कृष्ण (वासुदेव) ने बारह वर्ष का व्रत किया। उन्हें दीक्षित देखकर नारद, पर्वत, द्वीपजन्मा कृष्ण (व्यास), धौम्य, देवल, कश्यप, हस्तिकश्यप आदि अनेक ऋषि वहाँ आए। कृष्ण ने उनका देवों-योग्य सत्कार किया। व्रत की प्रचण्ड तपस्या रूपी ईंधन से अग्नि-रूप नारायण-तेज कृष्ण के मुख से निकला और उस पर्वत को वृक्ष, लता, पक्षी और पशुओं सहित भस्म करने लगा; फिर वह अग्नि शिष्य-सी विष्णु के चरणों में लौट आई। कृष्ण ने कृपा-दृष्टि से उस पर्वत को पुनः पूर्व-रूप में कर दिया: वह फिर फूलों और पक्षियों से भर उठा। यह अद्भुत दृश्य देख सब ऋषि विस्मित हुए।

कृष्ण ने उनके विस्मय का कारण पूछा। ऋषियों ने कहा कि वही सब लोकों के स्रष्टा और संहर्ता, माता-पिता और मूल हैं; उन्हीं के मुख से अग्नि निकलने का रहस्य वे जानना चाहते हैं। वासुदेव ने बताया कि उनके मुख से निकली वह अग्नि विष्णु का ही तेज है; वे एक तेजस्वी पुत्र पाने हेतु यह व्रत कर रहे हैं, और पितामह ब्रह्मा ने बताया कि वृषभध्वज महादेव का आधा तेज उनके पुत्र-रूप में जन्म लेगा। फिर कृष्ण ने ऋषियों से कुछ विस्मयकारी सुनाने को कहा, और सबने नारद को नियुक्त किया कि वे हिमवान पर्वत पर देखी एक घटना सुनाएँ।

नारद ने शंकर और उनकी पत्नी उमा के संवाद की कथा आरम्भ की। हिमवान के पवित्र पर्वतों पर, सिद्धों-चारणों के बीच, घोर तप करते हुए महादेव विराजमान थे: सैकड़ों भाँति-भाँति के गण उनके चारों ओर थे, कोई सिंह-मुख, कोई व्याघ्र-मुख, कोई गज-मुख। बाघ की खाल कमर पर, सिंह-चर्म ऊपरी वस्त्र, यज्ञोपवीत के रूप में साँप, हरी दाढ़ी, जटाएँ: ऐसे महादेव एक शिखर पर बैठे थे।

तभी हिमवान की पुत्री उमा, गणों की पत्नियों से घिरी, मुस्कुराती हुई पीछे से अपने दोनों सुन्दर हाथों से महादेव के नेत्र ढक बैठीं। नेत्र ढकते ही सम्पूर्ण लोक अन्धकार में डूब गया, सब प्राणी भयभीत हुए, हवन और वषट्कार रुक गया। फिर महादेव के ललाट से प्रचण्ड अग्नि-शिखा फूटी, और एक तीसरा नेत्र दूसरे सूर्य-सा प्रकट हुआ। उस तीसरे नेत्र की अग्नि ने पर्वत को भस्म करना आरम्भ किया; भयभीत पशु महादेव की शरण आए। उमा यह देख घबराईं और पिता हिमवान को नष्ट होते देख न सकीं। तब महादेव ने कृपा-दृष्टि से पर्वत को पुनः पूर्व-रूप में कर दिया।

उमा ने तीसरे नेत्र के प्रकट होने और पर्वत के जलने-पुनर्जीवित होने का कारण पूछा। महादेव ने बताया कि उमा द्वारा अकस्मात नेत्र ढकने से जब लोक अन्धकारमय हो गया, तो सब प्राणियों की रक्षा हेतु उन्होंने तीसरा नेत्र रचा, जिसकी अग्नि ने पर्वत जलाया; फिर उमा के सन्तोष हेतु उन्होंने हिमवान को पूर्ववत कर दिया।

फिर उमा ने पूछा कि उनके पूर्व, उत्तर और पश्चिम के मुख चन्द्र-से सुन्दर क्यों हैं, और दक्षिण का मुख इतना भयंकर क्यों; जटाएँ पिंगल और ऊर्ध्व क्यों; कण्ठ मयूर-कण्ठ-सा नीला क्यों; हाथ में सदा पिनाक (धनुष) क्यों; और वे सदा जटाधारी ब्रह्मचारी क्यों हैं। महादेव ने प्रत्येक का कारण बताया: तिलोत्तमा नामक रूपवती (ब्रह्मा द्वारा हर सुन्दर वस्तु से सौन्दर्य-कण लेकर रची) उन्हें मोहित करने आई, और वह जिस ओर घूमती, उधर महादेव का नया मुख प्रकट होता: इस प्रकार वे योग-बल से चतुर्मुख हो गए। पूर्व-मुख से वे सृष्टि का शासन करते, उत्तर-मुख से उमा के साथ क्रीड़ा, पश्चिम-मुख से प्राणियों का कल्याण, और दक्षिण-मुख से संहार करते हैं। प्राणियों के हित-कामना से वे जटाधारी ब्रह्मचारी रहते हैं; पिनाक देवों के कार्य-सिद्धि हेतु है। पूर्वकाल में उनकी समृद्धि चाहकर इन्द्र ने वज्र फेंका, जिससे उनका कण्ठ झुलस गया: इसी से वे नीलकण्ठ हुए।

उमा ने पूछा कि इतने सुन्दर वाहन होते हुए महादेव ने बैल को वाहन क्यों चुना। महादेव ने बताया कि ब्रह्मा ने सुरभि गौ रची, जिससे अमृत-सा मधुर दूध देने वाली अनेक गौएँ उपजीं; एक बछड़े के मुख का झाग उनके शरीर पर गिरा, क्रोध से उनके तेज ने गौओं को झुलसा दिया, इसी से गौएँ रंग-बिरंगी हुईं; फिर ब्रह्मा ने उन्हें शान्त किया और यह बैल वाहन तथा ध्वजा-चिह्न के रूप में दिया।

उमा ने पूछा कि स्वर्ग में सब सुख-सम्पन्न भवन होते हुए महादेव श्मशान में, जो हड्डी-केश से भरा, गीध-गीदड़ों से व्याप्त और अशुद्ध है, क्यों निवास करते हैं। महादेव ने उत्तर दिया कि उन्होंने सारी पृथ्वी पर पवित्र स्थान ढूँढ़ा, पर श्मशान से अधिक पवित्र कोई स्थान नहीं मिला; वहीं उनके प्रिय गण निवास करते हैं, और गणों के बिना वे कहीं रहना नहीं चाहते: इसी से श्मशान उन्हें परम पवित्र, स्वर्ग-सा प्रिय है।

एक उप-कथा: उमा के प्रश्न पर महादेव चारों वर्णों और जीवन के तीनों मार्गों का विस्तृत धर्म कहते हैं। गृहस्थ के पाँच चिह्न-धर्म, ब्राह्मण के छह कर्म (यज्ञ करना-कराना, दान देना-लेना, पढ़ना-पढ़ाना), क्षत्रिय का प्रजा-पालन और गौ-ब्राह्मण के लिए रणभूमि में प्राण-त्याग, वैश्य का कृषि-गोरक्षा-वाणिज्य, और शूद्र का तीन वर्णों की सेवा: सब क्रम से। फिर प्रवृत्ति (गृहस्थ) और निवृत्ति (मोक्ष) के दो धर्म, और भिक्षुओं के चार भेद, कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस, बताए जाते हैं, जिनमें परमहंस सर्वोच्च है।

आगे महादेव ने ऋषियों के धर्म कहे: फेनप (झाग पर जीने वाले), वाल्खिल्य (अँगूठे-भर के, सूर्य-मण्डल में रहने वाले), चक्रचर, संप्रक्षाल, अश्मकुट्ट, दन्तोलूखल आदि की तपश्चर्या। फिर वन-वासी तपस्वियों का धर्म: त्रिकाल-स्नान, ईश्ति-होम, नीवार-धान्य, फल-मूल, इंगुद-तेल; वीरासन में बैठना, ग्रीष्म में पंचाग्नि-तप, माण्डूक-योग। फिर सिद्धि-शास्त्र के अनुयायी मुनियों के धर्म, और अहिंसा तथा सरलता को परम धर्म बताना।

उमा के प्रश्नों पर महादेव ने यह भी बताया कि किस तप-व्रत से कौन-सी गति मिलती है: कोई गन्धर्वों के साथ, कोई नागों, कोई अमरावती, कोई यक्षों के लोक में जाता है; पंचाग्नि-तप करने वाला अगले जन्म में राजा होता है; विभिन्न दीक्षाओं और देहत्याग की रीतियों से विभिन्न दिव्य लोक मिलते हैं; वीरों के व्रत और वीर-योग का पालन करने वाला वीरों की गति (शक्र का सनातन लोक) पाता है।

फिर उमा ने पूछा कि किन कर्मों से वैश्य शूद्र, क्षत्रिय वैश्य, ब्राह्मण क्षत्रिय बन जाता है, और कैसे तीनों अन्य वर्ण ब्राह्मणत्व पा सकते हैं। महादेव ने कहा कि ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है; मूल सृष्टि से ही वर्ण बनते हैं, पर अपने दुष्कर्मों से ब्राह्मण भी पतित होकर शूद्र तक हो सकता है, और सत्कर्मों से शूद्र ब्राह्मणत्व तक उठ सकता है। शूद्र का अन्न-निषेध, इन्द्रिय-निग्रह, सत्य, अहिंसा: इनकी विस्तृत व्यवस्था कहकर महादेव ने एक गूढ़ निष्कर्ष दिया, “न जन्म, न संस्कार, न विद्या, न सन्तान; आचरण ही द्विजत्व का आधार है। इस संसार के सब ब्राह्मण आचरण से ही ब्राह्मण हैं। आचरण में स्थित शूद्र भी ब्राह्मण की स्थिति वाला माना जाता है। ब्रह्म की स्थिति जहाँ भी हो, समान है: यही मेरा मत है।”

इसके बाद उमा ने पूछा कि मनुष्य काय, वाणी और मन: इन तीन से कैसे बँधते और मुक्त होते हैं, और किन कर्मों से स्वर्ग चढ़ते हैं। महादेव ने तीनों के विस्तृत धर्म कहे: जो किसी को मन-वचन-कर्म से नहीं सताते, जो परधन और परस्त्री से दूर रहते, जो परायी स्त्रियों को माता-बहन-पुत्री समान देखते, जो असत्य नहीं बोलते, जो कटु-भेदक वचन से बचते, जो क्रोध में भी शान्त-प्रिय वचन कहते: वे स्वर्ग पाते हैं। फिर आयु के दीर्घ-अल्प होने का कारण कर्म बताया: जो क्रूर, शस्त्र उठाए, प्राणि-हन्ता और दयाहीन है, वह नरक में गिरता और अल्पायु होता है; जो ‘श्वेत वर्ग’ का है: अहिंसक, शस्त्र-त्यागी, सब प्राणियों पर दया करने वाला, अपने समान दूसरों को देखने वाला: वह देवत्व पाता है, और मनुष्य-जन्म में दीर्घायु तथा सुखी होता है। अन्त में उमा के प्रश्न पर महादेव ने उदार-दानी का स्वर्ग-वर्णन किया: जो अन्न, जल, वस्त्र, घर, कूप, प्याऊ, तालाब, शय्या, वाहन, रत्न, गौ, भूमि आदि सहर्ष दान करता है, वह स्वर्ग का निवासी होता है, और पुण्य-क्षय पर समृद्ध कुल में जन्म लेता है।

समझने की कुंजी (प्रवृत्ति-निवृत्ति): ‘प्रवृत्ति-धर्म’ कर्म में लगे रहने का, गृहस्थ का मार्ग है; ‘निवृत्ति-धर्म’ सब त्यागकर ब्रह्म में लीन होने का, मोक्ष का मार्ग है। महादेव दोनों को धर्म मानते हैं: एक से लोक चलता है, दूसरे से जन्म-बन्धन छूटता है।

सार: कृष्ण के व्रत-प्रसंग से आरम्भ होकर यह खण्ड नारद के मुख से उमा-महेश्वर का विशाल धर्म-संवाद सुनाता है: तीसरे नेत्र, चतुर्मुख, नीलकण्ठ, वृषभ-वाहन और श्मशान-निवास का रहस्य, चारों वर्णों और तीनों मार्गों का धर्म, और अन्ततः यह क्रान्तिकारी कथन कि जन्म नहीं, आचरण ही ब्राह्मणत्व का असली आधार है।

उमा और महेश्वर: किन कर्मों से स्वर्ग, किन से नरक

शरशय्या पर पड़े पितामह भीष्म फिर बोले, और उनका स्वर अब भी गहरा था, जैसे दूर के बादल बोल रहे हों। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि वे एक पुरानी कथा सुनाते हैं, जो उन तक नारद और व्यास से पहुँची थी। हिमवान् पर शंकर और उमा (पार्वती, हिमालय की पुत्री) के बीच कर्म और फल का संवाद हुआ था, और नारद ने वही संवाद ऋषियों की सभा में कृष्ण को कह सुनाया था।

महेश्वर बोले कि जो मनुष्य मित्र और शत्रु, दोनों के साथ समान मैत्री-भाव से बरतता है, वह स्वर्ग जाता है। जो विद्या और करुणा से युक्त है, शरीर और मन से पवित्र है, सत्य पर अटल है, और जो कुछ अपना है उसी में सन्तुष्ट रहता है, वह स्वर्ग जाता है। जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं रखता, जिसके मन में सब जीवों के प्रति मैत्री है, जो भले-बुरे कर्मों के परिणाम को जानता है, और जो देवताओं तथा ब्राह्मणों के प्रति समर्पित है, वह अपने पुण्य-कर्मों के फल से स्वर्ग चढ़ता है।

तब उमा ने एक बड़ी शंका रखी। उन्होंने पूछा, हे महेश्वर, मनुष्यों में इतना भेद क्यों दीखता है। कोई बड़ी आयु पाता है, कोई अल्पायु मरता है। कोई सौभाग्यशाली, कोई दुर्भाग्य से दबा हुआ। कोई उच्च कुल में, कोई नीच कुल में जन्मता है। किसी का रूप काठ-सा कुरूप, किसी का पहली ही दृष्टि में मनोहर। कोई बुद्धिहीन, कोई ज्ञान-विज्ञान से प्रकाशित। किसी को थोड़ा कष्ट, किसी पर भारी विपत्तियों का बोझ। हे निर्मल देव, इसका कारण हमें बताइए।

देवों के देव बोले कि वे कर्मों के फल-विधान पर बोलेंगे। इसी विधान से सब प्राणी अपने कर्मों के फल भोगते हैं। जो मनुष्य भयानक रूप धारण कर दूसरे जीवों के प्राण लेने को निकलता है, जो मोटी लाठियाँ हाथ में लेकर प्राणियों को पीड़ा देता है, जो उठे हुए शस्त्र लिए घूमता है, जो करुणाहीन होकर जीवों को मारता है, जो कीट और चींटी तक को अभय नहीं देता, ऐसा क्रूर मनुष्य नरक में डूबता है। नरक में उसे असह्य यातना सहनी पड़ती है। नरक से जब वह उठता है, तब मनुष्य-योनि में अल्पायु होकर जन्मता है।

इसके विपरीत जो श्वेत वर्ग का मनुष्य है (अर्थात् सात्त्विक, अहिंसक स्वभाव वाला), जो जीवों की हत्या से विरत है, जिसने सब शस्त्र फेंक दिए हैं, जो किसी को दण्ड नहीं देता, जो मारे जाने या मारे जाने की चेष्टा होने पर भी पलटकर वार नहीं करता, जो हिंसा का अनुमोदन तक नहीं करता, जो सब प्राणियों के प्रति करुणामय है और सब से अपने ही समान बरतता है, वह श्रेष्ठ मनुष्य देवता का पद पाता है। और यदि वह फिर मनुष्य-लोक में जन्मे, तो दीर्घायु और सुखी होता है। यही उन धर्मात्माओं का मार्ग है जो हिंसा से विरत रहते हैं, और यह मार्ग स्वयं स्वयम्भू ब्रह्मा का बताया हुआ है।

समझने की कुंजी (श्वेत वर्ग): यहाँ “श्वेत वर्ग” किसी जाति का नाम न होकर कर्म और स्वभाव की एक श्रेणी है। प्राचीन पाठों में मनुष्यों के स्वभाव को रंगों (वर्णों) में बाँटा गया, जहाँ श्वेत का अर्थ है शुद्ध, अहिंसक, सात्त्विक चित्त। यह जन्म से नहीं, आचरण से तय होता है।

उमा ने आगे पूछा कि किस स्वभाव, किस आचरण और किन दानों से मनुष्य स्वर्ग पाता है। महेश्वर बोले कि जो उदार स्वभाव वाला है, जो ब्राह्मणों का सत्कार करता है, जो दीन, अन्धे और दुखी को अन्न, जल और वस्त्र देता है, जो घर बनवाता है, सभा-मण्डप खड़े करता है, कुएँ खुदवाता है, गर्मी के दिनों में थके यात्रियों के लिए शीतल जल की प्याऊ बनवाता है, तालाब खुदवाता है, और प्रतिदिन दान का प्रबन्ध करता है, जो आसन, शय्या, वाहन, धन, रत्न, अन्न, गौ और भूमि देता है, वह प्रसन्न-चित्त से ये दान करता हुआ स्वर्ग का निवासी बनता है। पुण्य क्षीण होने पर वह धनवान कुल में जन्मता है।

दूसरी ओर कुछ ऐसे होते हैं जो दान करने में असमर्थ हैं। संकीर्ण बुद्धि के कारण, धन रहते हुए भी, ब्राह्मण के याचना करने पर भी वे कुछ नहीं देते। दीन, अन्धे, अतिथि को द्वार पर देखकर भी, जीभ के स्वाद में लगे रहकर वे मुँह फेर लेते हैं। ऐसे कृपण, श्रद्धाहीन मनुष्य नरक में डूबते हैं, और फिर निर्धन कुलों में, सदा भूख-प्यास से पीड़ित होकर जन्मते हैं।

कुछ और हैं जो धन के अभिमान से भरे हैं। वे आदर के योग्य को आसन नहीं देते, पैर धोने को जल नहीं देते, अर्घ्य से सम्मान नहीं करते, और अपने गुरुजनों तथा वृद्धों का तिरस्कार करते हैं। ऐसे मनुष्य नरक भोगकर श्वपाक और पुक्कस जैसी नीच जातियों में जन्मते हैं। पर जो अभिमानहीन है, जो देवताओं और ब्राह्मणों का उपासक है, जो आदर के योग्य को नमस्कार करता है, मधुर वचन बोलता है, अतिथियों का सत्कार करता है, वह स्वर्ग जाता है और फिर उच्च कुल में जन्मता है।

उमा ने तब पूछा कि कोई ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न क्यों होता है और कोई जन्म से अन्धा, रोगी, या नपुंसक क्यों। महेश्वर बोले कि जो सदा अपने हित-अहित का विचार करते हैं, जो वेदज्ञ ब्राह्मणों से प्रश्न करते हैं, बुरे कर्म छोड़कर भले कर्म करते हैं, वे स्वर्ग जाकर फिर महाबुद्धिमान होकर जन्मते हैं। जो मूढ़ पराई विवाहिता स्त्रियों पर बुरी दृष्टि डालते हैं, वे जन्म से अन्धे होते हैं। जो काम से प्रेरित होकर नग्न स्त्रियों को देखते हैं, वे आजीवन रोगी रहते हैं। जो अपने वर्ण से भिन्न स्त्रियों से सम्बन्ध करते हैं, जो गुरु-शय्या का उल्लंघन करते हैं, वे अगले जन्म में पुरुषत्व से रहित होते हैं।

उमा ने धर्म-अधर्म के लक्षण पूछे। महेश्वर बोले कि जो धर्म जानने का इच्छुक है, जो श्रेष्ठ गुण और सिद्धियाँ पाना चाहता है, और जो अपने परम कल्याण का मार्ग ढूँढने को ब्राह्मणों से सदा प्रश्न करता है, वह स्वर्ग जाता है और फिर बुद्धि, स्मृति और महान् प्रज्ञा से युक्त होकर जन्मता है। वेदों ने मनुष्यों के सब कर्मों की सीमाएँ बाँधी हैं। जो वेद के अनुसार चलते हैं, वे अगले जन्म में व्रती होते हैं। जो मोह के वश अधर्म को धर्म मानकर समस्त मर्यादाओं का उल्लंघन करते हैं, वे ब्रह्मराक्षस कहलाते हैं, जो होम भूल जाते हैं और वषट् जैसे मन्त्रों का उच्चार नहीं करते।

सार: यह संवाद कर्म-फल का सीधा नक्शा है। हिंसा, कृपणता, अभिमान और इन्द्रिय-लोलुपता नरक और अगले जन्म की हीनता का बीज हैं। अहिंसा, दान, विनय और जिज्ञासा स्वर्ग और अगले जन्म की उच्चता का बीज हैं। महादेव बार-बार यही कहते हैं कि यह विधान स्वयम्भू ब्रह्मा का बनाया हुआ है, कोई बाहरी दण्ड नहीं, अपने ही कर्मों का सहज परिणाम है।

महादेव उमा से पूछते हैं: स्त्री के धर्म

इतना कहकर महादेव ने सुनने की इच्छा की। अब तक जो बोल रहे थे, वे अपनी प्रिया से प्रश्न करने लगे। उन्होंने कहा, हे देवी, आप परम और अपर, दोनों को जानती हैं। आप सब धर्मों से परिचित हैं, आप हिमवान् की पुत्री हैं, संयम से युक्त हैं, और सब प्राणियों को समान दृष्टि से देखती हैं। उन्होंने गिनाया कि सावित्री ब्रह्मा की पतिव्रता पत्नी हैं, शची इन्द्र की, धूम्रोर्णा मार्कण्डेय की, ऋद्धि वैश्रवण (कुबेर) की, गौरी वरुण की, सुवर्चला सूर्य की, रोहिणी चन्द्रमा की, स्वाहा अग्नि की, और अदिति कश्यप की। ये सब अपने पतियों को देवता मानती हैं। महादेव बोले कि उमा इन सब से प्रतिदिन मिलती-बतियाती हैं, अतः वे ही स्त्री-धर्म पर बोलने योग्य हैं। उन्होंने कहा कि उमा का आधा शरीर महादेव का है और महादेव का आधा शरीर उमा का।

उमा ने उत्तर दिया कि वे पहले उन सरितों से (नदियों से, जो स्त्री-स्वरूपा हैं) परामर्श करेंगी, जो महादेव के स्नान के लिए सब तीर्थों का जल लेकर उपस्थित हुई हैं। उन्होंने सरस्वती को सब नदियों में अग्रणी कहा, और विपाशा, वितस्ता, चन्द्रभागा, इरावती, शतद्रु, देविका, कौशिकी, गोमती, तथा आकाश से उतरकर पृथ्वी पर आई गंगा को सम्बोधित किया। उमा ने मुसकराते हुए उन सरितों से स्त्री-धर्म पर परामर्श माँगा। तब गंगा को उत्तर देने के लिए चुना गया।

गंगा ने पहले उमा का सम्मान किया और कहा कि जो स्वयं समर्थ होते हुए भी दूसरे से पूछता है या दूसरे को आदर देता है, वही धर्मात्मा और विद्वान कहलाता है। अभिमानी मनुष्य, बुद्धिमान होने पर भी, सभा में अकेले अपने बल पर बोलते हुए दुर्बल वचन ही कहता है। फिर उमा ने स्त्री के धर्मों का विस्तार से वर्णन किया।

उमा ने कहा कि स्त्री के धर्म विवाह-संस्कार में बन्धुजनों द्वारा रचे जाते हैं। अग्नि के सामने स्त्री अपने पति की सब धर्म-कर्मों में सहभागिनी बनती है। जो स्त्री मधुर वचन, मधुर आचरण और मधुर रूप वाली है, जो अपने पति के मुख की ओर वैसे ही प्रेम से देखती है जैसे अपने शिशु के मुख की ओर, जो पति को देवता मानकर उसकी सेवा करती है, जो विनयशील और प्रसन्नचित्त है, वही सच्ची धर्मात्मा कही जाती है। वह स्त्री, जो कठोर वचन सुनकर और क्रोध-भरी दृष्टि पाकर भी पति के सामने प्रसन्न मुख रखती है, सच्ची पतिव्रता है।

उमा ने आगे कहा कि जो स्त्री प्रातः उठती है, घर की सेवा में लगी रहती है, घर को स्वच्छ रखती है, अग्नि की रक्षा करती है, देवताओं को पुष्प चढ़ाती है, और देवता, अतिथि तथा सेवकों को उनका भाग देकर अन्त में जो बचे उसे स्वयं ग्रहण करती है, वह महान् पुण्य पाती है। जो सास-ससुर के चरणों की सेवा करती है, अपने माता-पिता के प्रति समर्पित है, वही तपोधना कही जाती है। पति की सेवा ही स्त्री का पुण्य है, वही उसका तप है, वही उसका सनातन स्वर्ग है।

उमा ने स्वयं की ओर से कहा कि हे महेश्वर, यदि आप मुझसे प्रसन्न न हों तो मुझे स्वर्ग भी नहीं चाहिए। यदि निर्धन, रोगी, या ब्राह्मण के शाप से पीड़ित पति भी कोई अनुचित या प्राणघातक काम करने को कहे, तो आपद्धर्म की मर्यादा के अनुसार स्त्री बिना झिझक उसे पूरा कर दे। इतना कहकर उमा ने यह धर्म-वर्णन समाप्त किया। महादेव ने हिमवान् की पुत्री की प्रशंसा की और सब सभासदों को, सरितों को, गन्धर्वों और अप्सराओं को विदा किया, जो महादेव को सिर झुकाकर अपने-अपने स्थान लौट गए।

सार: इस उपदेश का स्वर अपने युग का है, जहाँ पति को देवता-तुल्य कहा गया। यहाँ एक नैतिक तनाव भी है: उमा यह भी कहती हैं कि आपद्काल में अनुचित आदेश तक का पालन हो, जिसे पाठ स्वयं “आपद्धर्म” की मर्यादा में रखता है। महाभारत इन कथनों को आदर्श और संकट, दोनों के बीच रखता है, और किसी को सरल नहीं करता।

वासुदेव की महिमा: महादेव ऋषियों से कृष्ण-तत्त्व कहते हैं

तब हिमवान् पर बैठे ऋषियों ने महेश्वर से कहा, हे पिनाकधारी, हे भग के नेत्र चीरने वाले, हे सम्पूर्ण विश्व के पूज्य, हम वासुदेव की महिमा सुनना चाहते हैं। महेश्वर बोले कि हरि स्वयं पितामह ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ हैं। वे सनातन पुरुष हैं, जिन्हें कृष्ण भी कहते हैं। स्वर्ण के समान कान्ति वाले, दूसरे सूर्य की भाँति देदीप्यमान। उनके वक्ष पर श्रीवत्स का चिह्न है, सिर पर घुँघराले केश। उनके उदर से ब्रह्मा का जन्म हुआ, उनके मस्तक से मैं (शिव) प्रकट हुआ, आकाश के सब ज्योतिर्मण्डल उनके केशों से उपजे, उनके शरीर के रोमों से सब देव और असुर निकले।

महेश्वर बोले कि वे ही इस सम्पूर्ण पृथ्वी के रचयिता हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं, और चर-अचर के संहारक भी हैं। उन्हीं के उदर में ब्रह्मा निवास करते हैं, मैं स्वयं, जिसे सर्व कहते हैं, भी उन्हीं में सुख से निवास करता हूँ। उनकी आँखें कमल की पंखुड़ियों जैसी हैं, श्री उन्हीं में निवास करती हैं। शार्ङ्ग धनुष और सुदर्शन चक्र उनके आयुध हैं, साथ में खड्ग, और उनकी ध्वजा पर गरुड़ बैठते हैं।

महेश्वर ने एक भविष्य-वंशावली कही, जिससे वासुदेव का मनुष्य-रूप में अवतार होगा। उन्होंने बताया कि गोविन्द मनु के वंश में जन्म लेंगे। मनु से अंग, अंग से अन्तर्धामा, उससे हविर्धामा, फिर रचीनवर्हि, फिर दस पुत्र जिनमें प्रचेता प्रमुख, फिर दक्ष, फिर दाक्षायणी, फिर आदित्य, फिर मनु, फिर इला और सुद्युम्न। इला से पुरूरवा, पुरूरवा से आयु, आयु से नहुष, नहुष से ययाति, ययाति से यदु, यदु से क्रोष्टा, फिर वृजिनिवत्, फिर उशद्गु, फिर चित्ररथ, फिर शूर। उसी शुद्ध वंश में शूर जन्म लेंगे, जो वसुदेव (आनकदुन्दुभि) को जन्म देंगे, और वसुदेव के पुत्र वासुदेव होंगे, जो चार भुजाओं वाले, अत्यन्त उदार और ब्राह्मण-प्रिय होंगे।

समझने की कुंजी (वंशक्रम): मनु → अंग → अन्तर्धामा → हविर्धामा → रचीनवर्हि → प्रचेता (दस भाइयों में प्रमुख) → दक्ष → दाक्षायणी → आदित्य → मनु → इला → पुरूरवा → आयु → नहुष → ययाति → यदु → क्रोष्टा → वृजिनिवत् → उशद्गु → चित्ररथ → शूर → वसुदेव → वासुदेव (कृष्ण)। यह यदुवंश का वही सूत्र है जो कृष्ण के जन्म तक पहुँचता है।

महेश्वर ने कहा कि वही वासुदेव मगध-शासक जरासन्ध को पर्वतों के बीच बसी उसकी राजधानी में पराजित कर बन्दी राजाओं को मुक्त करेंगे। द्वारका में रहकर वे सम्पूर्ण पृथ्वी की रक्षा करेंगे। तब महादेव ने ऋषियों से कहा कि वे सब मिलकर वासुदेव को वाणी, पुष्पमालाओं और सुगन्धित धूप से पूजें, जैसे सनातन ब्रह्म को पूजते हैं। जो मुझे या पितामह ब्रह्मा को देखना चाहे, वह पहले वासुदेव को देखे, क्योंकि उनके दर्शन से ही मेरा और ब्रह्मा का दर्शन हो जाता है, इसमें कोई भेद नहीं।

महादेव ने यह भी बताया कि वासुदेव का एक बड़ा भाई होगा, जो वल (बलराम) नाम से सब लोकों में विख्यात होगा। उसका आयुध हल होगा, उसका रूप श्वेत पर्वत जैसा होगा। उसके रथ की ध्वजा पर तीन सिर वाला सुनहरा ताड़ का वृक्ष होगा। उसके मस्तक पर विशाल शरीर वाले सर्प छाया करेंगे। वह अनन्त कहलाता है, वह अविनाशी हरि के साथ अभिन्न है। एक बार देवताओं ने गरुड़ से कहा था कि देखें इसका अन्त है या नहीं, पर महाबली गरुड़ भी उस परमात्म-स्वरूप का अन्त न पा सके। वही शेष होकर पृथ्वी को सिर पर धारण किए पाताल में निवास करते हैं। महादेव ने ऋषियों से कहा कि एक चक्र-धारी और दूसरा हल-धारी, ये दोनों परम पूज्य हैं, इन्हें अवश्य देखो।

सार: महादेव यहाँ स्वयं कृष्ण को परम तत्त्व घोषित करते हैं, और अपने तथा ब्रह्मा के दर्शन को कृष्ण-दर्शन से अभिन्न बताते हैं। शिव और विष्णु के बीच कोई स्पर्धा नहीं, एक ही परम सत्ता की ओर संकेत है। बलराम-शेष का रूप-वर्णन इसी विराट् की एक झलक है।

हिमवान् पर विस्मय, और भीष्म का कृष्ण-स्तवन

नारद ने आगे कहा कि महादेव के वचन समाप्त होते ही आकाश में महान् गर्जन हुआ। बिजली कौंधी, नीले घने बादलों ने आकाश को ढक लिया, और मेघदेव ने वर्षा-ऋतु जैसा शुद्ध जल बरसाया। घोर अन्धकार छा गया, दिशाएँ अदृश्य हो गईं। उस पवित्र पर्वत-शिखर पर ऋषियों को महादेव के साथ रहने वाले भूतगण अब दिखाई न दिए। थोड़ी देर में आकाश स्वच्छ हुआ। कुछ ऋषि तीर्थों को चल पड़े, कुछ अपने स्थान लौटे। उस अद्भुत और अकल्पनीय दृश्य को देखकर सब विस्मय से भर गए।

उन ऋषियों ने कृष्ण से कहा कि महादेव ने हिमवान् पर जिस परम-पुरुष की बात कही थी, वह आप ही हैं, आप ही सनातन ब्रह्म हैं। उन्होंने कृष्ण से यह सब इसलिए कहा क्योंकि कृष्ण ने स्वयं उनसे पूछा था। ऋषियों ने कृष्ण को विदा कहते हुए आशीर्वाद दिया कि उन्हें अपने ही समान, या उनसे भी अधिक तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा। फिर वे प्रदक्षिणा कर अपने धामों को गए। और नारायण, अपना व्रत पूर्ण कर, द्वारका लौटे। उनकी पत्नी रुक्मिणी ने गर्भ धारण किया, और दसवें मास एक पुत्र हुआ, जो काम (इच्छा) से अभिन्न था, जो सब प्राणियों के हृदय में संचरण करता है।

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि यह कृष्ण ही चार भुजाओं वाले वासुदेव हैं। प्रेम से उन्होंने स्वयं को पाण्डवों से जोड़ा है, और पाण्डवों ने स्वयं को उनसे। हे पृथापुत्र, शत्रुओं पर आपकी विजय, आपकी अद्वितीय सिद्धियाँ, सम्पूर्ण पृथ्वी पर आपका अधिकार, ये सब इसलिए हुए कि नारायण ने आपका पक्ष लिया। यह कृष्ण ही युगान्त की अग्नि के समान आपकी महान् यज्ञ-स्रुक थे, जिनसे आपने राजाओं को युद्ध की प्रज्वलित अग्नि में आहुति-समान डाला।

तब भीष्म ने एक गहरी बात कही, जिसमें महाभारत की नैतिक जटिलता छिपी है। उन्होंने कहा कि दुर्योधन, जो क्रोध से प्रेरित होकर हरि और गाण्डीवधारी से युद्ध करने चला, अत्यन्त दयनीय था। फिर उन्होंने युधिष्ठिर को सान्त्वना देते हुए कहा कि वे स्वयं, जो अब उपदेश दे रहे हैं, छोटे विचार के लोग थे, दूसरों की इच्छा पर आश्रित, अभागे, और जानते-बूझते मृत्यु के सनातन मार्ग पर चले गए। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि युधिष्ठिर बन्धु-वध का बहुत शोक करते हैं, पर जो रणभूमि में गिरे, वे वास्तव में काल के द्वारा मारे गए। काल ही सर्वशक्तिमान है। यह जान लीजिए कि कृष्ण, जिन्हें हरि भी कहते हैं, वही रक्त-नेत्र और हाथ में गदा लिए हुए काल हैं।

एक उप-कथा: भीष्म याद दिलाते हैं कि वासुदेव और गाण्डीवधारी अर्जुन कोई साधारण नर नहीं। वे बदरिकाश्रम में दस हज़ार वर्ष तक, तीन-तीन युगों तक, कठोर तप करने वाले प्राचीन ऋषि नर और नारायण हैं। भीष्म कहते हैं कि यह उन्होंने नारद और व्यास से सीखा। वासुदेव ने बालक रहते ही, अपने बन्धुओं की रक्षा के लिए, कंस-वध जैसा महान् कार्य किया। उस सनातन पुरुष के कार्य गिनाने का साहस भी भीष्म नहीं करते।

भीष्म ने अन्त में दुर्योधन के लिए, परलोक तक के लिए, शोक प्रकट किया। उन्होंने कहा कि उसी के कारण सम्पूर्ण पृथ्वी अपने बीज और हाथियों सहित उजड़ गई। दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और चौथे दुःशासन के दोष से कुरुवंश नष्ट हुआ।

वैशम्पायन ने आगे कहा कि गंगापुत्र जब यह कह रहे थे, तब कुरुराज युधिष्ठिर मौन रहे। धृतराष्ट्र सहित सब राजा कुरु-पितामह के वचनों से विस्मित हुए। उन्होंने मन ही मन कृष्ण की पूजा की और हाथ जोड़कर उनकी ओर मुड़े। नारद आदि ऋषियों ने भीष्म के वचनों का अनुमोदन किया। कुछ समय बाद, जब युधिष्ठिर ने देखा कि यज्ञों में ब्राह्मणों को प्रचुर धन दे चुके पितामह विश्राम कर स्वस्थ हो गए हैं, तब उन्होंने फिर प्रश्न किया।

सार: भीष्म कृष्ण को काल और परम तत्त्व के रूप में स्थापित करते हैं, और शोक के विरुद्ध यही औषधि देते हैं कि वध काल ने किया। पर वे इसे सरल सान्त्वना नहीं बनाते: वे स्वयं और अपने समान कुरु-वीरों को “जानते-बूझते मृत्यु के मार्ग पर चले” कहकर अपनी ही नैतिक चूक स्वीकार करते हैं। दुर्योधन के प्रति भी शोक है, घृणा का सपाट विजय-घोष नहीं।

विष्णु-सहस्रनाम: हज़ार नामों का स्तोत्र

युधिष्ठिर ने पूछा कि इस जगत् में एक देव कौन है, एक परम आश्रय कौन, जिसकी स्तुति से प्राणी अपना कल्याण पाए। कौन-सा धर्म सब धर्मों में श्रेष्ठ है, और वे कौन-से मन्त्र हैं जिनके पाठ से जीव जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त होता है।

भीष्म अपना हाथ बढ़ाते और युधिष्ठिर अंजलि फैलाकर आशीर्वाद लेते, बीच में कृष्ण शांत बैठे।

भीष्म ने उत्तर दिया कि सब आलस्य त्यागकर मनुष्य को सदा उस विश्वेश्वर, देवों के देव वासुदेव की स्तुति करनी चाहिए, उनके हज़ार नामों का उच्चार करना चाहिए। उस अविनाशी का ध्यान कर, उन्हें नमस्कार कर, उनके लिए यज्ञ कर, और सदा विष्णु की स्तुति कर, मनुष्य सब शोक के पार जा सकता है। यही, भीष्म के मत में, सब धर्मों में श्रेष्ठ धर्म है: कि कमल-नयन वासुदेव की भक्ति से पूजा-स्तुति की जाए। वे परम तेज हैं, परम तप हैं, परम ब्रह्म हैं, परम आश्रय हैं। युग के आरम्भ में सब प्राणी उन्हीं से प्रकट होते हैं, युग के अन्त में सब उन्हीं में लीन होते हैं।

भीष्म बोले कि सुनिए, हे राजन्, उस विश्व-स्वामी विष्णु के, पापनाशक, हज़ार नाम, जो उनके गुणों से उपजे हैं, जिन्हें ऋषियों ने गाया है। ये ओम् से आरम्भ होते हैं: वे जो सब वस्तुओं में प्रवेश करते हैं, जो सबको आच्छादित करते हैं, जिन्हें यज्ञ की आहुतियाँ दी जाती हैं, जो भूत-वर्तमान-भविष्य के स्वामी हैं, सब विद्यमान वस्तुओं के स्रष्टा और धारक हैं, जो स्वयं सत् हैं, सबकी आत्मा हैं, सबके आदि-कारण हैं।

स्तोत्र में नामों की धारा बहती है, और हर नाम एक रूप या लीला की ओर संकेत करता है। वे विशुद्ध-आत्मा हैं, परमात्मा हैं, मुक्तों का परम आश्रय हैं, अविनाशी हैं, साक्षी हैं, क्षेत्रज्ञ हैं। वे योग में जिस पर मन टिकता है, वे योगियों के नेता हैं, प्रधान (प्रकृति) और पुरुष, दोनों के स्वामी हैं। उन्होंने नृसिंह का रूप धारण किया, वे पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। वे सबके आदि हैं, वह आधार जिसमें सब प्रलय के समय लीन होते हैं, वे अपनी इच्छा से जन्म लेते हैं, वे सब जीवों के कर्मों को फल देते हैं।

स्तोत्र आगे कहता है कि वे स्वयम्भू हैं, अपने भक्तों को सुख देते हैं, सूर्य-मण्डल के बीच स्वर्ण-रूप अध्यक्ष हैं, कमल-नेत्र हैं, गम्भीर-स्वर हैं, आदि-अन्त से रहित हैं। वे अनन्त आदि रूपों में विश्व को धारते हैं। उनकी नाभि से वह आदि-कमल उपजा जिसमें ब्रह्मा का जन्म हुआ। वे रक्त-नेत्र कृष्ण हैं, जो प्रलय में सब प्राणियों का संहार करते हैं। वे गरुड़ पर सवार होकर विश्व में विचरते हैं। वे ही दिवस हैं, वर्ष हैं, सर्प हैं।

स्तोत्र कृष्ण और राम की लीलाओं को नामों में पिरोता है। वे राम-रूप में दशरथ के पुत्र हुए, पिता की आज्ञा से वन गए, सुग्रीव से सन्धि की, और रावण का वध कर सीता को मुक्त कराया। वे चाण्डाल गुहक के मित्र हुए, जो शृंगवेरपुर का स्वामी था, इस प्रकार उन्होंने नीच कहे जाने वालों पर भी करुणा दिखाई। वे मत्स्य-रूप धारण कर, प्रलय के जल में मनु की नौका को अपने सींग से बाँधकर सुरक्षित ले गए। वे वराह-रूप में डूबी पृथ्वी को उबार लाए। वे वामन हुए, जिन्होंने तीन डगों से स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल को नाप लिया।

एक उप-कथा (कुछ नाम और उनकी कथाएँ): कई नामों के साथ उनकी लीला जुड़ी है। जैसे “दामोदर” का संकेत: यशोदा ने जिन्हें (कृष्ण-रूप में) रस्सी से बाँधा था, उनके उदर पर रस्सी का चिह्न रहा। “गोवर्धनधर” का संकेत: इन्द्र की मूसलधार वर्षा से ब्रजवासियों की रक्षा हेतु जिन्होंने गोवर्धन को उठाया। “हंस” का संकेत: जिन्होंने हंस-रूप में पितामह ब्रह्मा को वेद दिए। “कूर्म” का संकेत: जिन्होंने अपनी पीठ पर मन्दर पर्वत को धारा, जब देवों-असुरों ने समुद्र-मन्थन किया। एक-एक नाम एक-एक स्मृति का द्वार है।

स्तोत्र विश्व के विराट् रूप को छूता है: वे एक हैं और (माया से) अनेक हैं। वे आनन्द-स्वरूप हैं, वे “तत्” कहे जाने वाले परम हैं, परम आश्रय हैं। वे स्वर्ण-वर्ण हैं, सुन्दर अंगों वाले हैं, चन्दन से लिपटे अंगद-धारी हैं। वे चार भुजाओं वाले हैं, जिनसे शंख, चक्र, गदा और कमल धारण करते हैं। वे चारों वेदों के ज्ञाता हैं, जिनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, ये चार पुरुषार्थ उपजते हैं। वे वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, इन चार व्यूहों में स्वयं को बाँटते हैं।

स्तोत्र के अन्त में आता है: वे शंख (पाञ्चजन्य) धारण करने वाले हैं, ज्ञान और माया रूपी खड्ग को धारते हैं, युगों के चक्र को सतत घुमाते हैं, और सब प्रकार के आयुधों से सज्जित हैं। और तब उद्घोष होता है, ओम्, उन्हें नमस्कार।

भीष्म बोले कि इस प्रकार उन्होंने केशव के हज़ार उत्तम नाम बिना किसी छूट के सुना दिए। जो मनुष्य प्रतिदिन इन नामों को सुनता या पढ़ता है, उसे यहाँ या परलोक में कोई अनिष्ट नहीं होता। ब्राह्मण ऐसा करे तो वेदान्त में पारंगत हो, क्षत्रिय करे तो युद्ध में विजयी, वैश्य करे तो धनी, और शूद्र करे तो महान् सुख पाए। जो धर्म चाहे उसे धर्म, जो धन चाहे उसे धन, जो सन्तान चाहे उसे सन्तान मिलती है। रोगी निरोग होता है, भयभीत निर्भय, संकटग्रस्त संकटमुक्त होता है। जो वासुदेव की शरण लेता है, वह सब पापों से मुक्त होकर सनातन ब्रह्म को प्राप्त करता है। यह स्तोत्र व्यास द्वारा रचा गया है, और जो सुख तथा परम कल्याण (मोक्ष) चाहता है, उसे इसका पाठ करना चाहिए।

समझने की कुंजी (सहस्रनाम का ढाँचा): “सहस्रनाम” का अर्थ है हज़ार नाम। यह कोई सूची-मात्र नहीं, हर नाम विष्णु के एक गुण, एक लीला या एक दार्शनिक संकेत को बाँधता है। यहाँ संक्षेप में मूल का क्रम और भाव रखा गया है, मूल में ये नाम एक-एक कर गिने जाते हैं (ओम् से आरम्भ होकर अन्तिम नमस्कार तक)। पाठ-परम्परा में यही स्तोत्र प्रतिदिन की उपासना का अंग है।

सार: भीष्म युधिष्ठिर के “एक परम तत्त्व कौन” प्रश्न का उत्तर विष्णु-सहस्रनाम से देते हैं। यही दान-धर्म पर्व का आध्यात्मिक शिखर है: सब कर्म, सब दान, सब विधि-विधान के पीछे एक ही आश्रय, वासुदेव। नामों में अवतार-कथाएँ, सृष्टि-प्रलय और परम-ब्रह्म, सब एक साथ पिरोए हैं।

सावित्री-मन्त्र और देव-ऋषि-नामों का जप

युधिष्ठिर ने पूछा कि वह कौन-सा नित्य जप है जिससे मनुष्य बड़ी मात्रा में धर्म कमाता है। यात्रा पर निकलते समय, नवीन भवन में प्रवेश करते समय, किसी कार्य के आरम्भ में, या देव-पितृ-यज्ञ के अवसर पर कौन-सा मन्त्र सिद्धि देता है, सब अनिष्ट शान्त करता है, और वेदों के अनुकूल है।

भीष्म बोले कि वह मन्त्र व्यास द्वारा कहा गया है, सावित्री द्वारा विहित है, और तत्काल सब पापों को धोने में समर्थ है। यह मन्त्र वशिष्ठ को नमस्कार से आरम्भ होता है, पराशर को, अनन्त (शेष) को, और सिद्धों तथा ऋषियों को नमस्कार से। फिर हज़ार सिरों वाले, हज़ार नामों वाले जनार्दन को नमस्कार। इसके बाद भीष्म ने एकादश रुद्रों के नाम गिनाए, जो सब लोकों के स्वामी हैं: अज, एकपाद, अहिर्बुध्न्य, अजेय पिनाकी, ऋत, पितृरूप, त्रिनेत्र महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हवन और ईश्वर।

फिर बारह आदित्यों के नाम आए, जो कश्यप के पुत्र हैं: अंश, भग, मित्र, जलपति वरुण, धाता, अर्यमा, जयन्त, भास्कर, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और विष्णु। फिर आठ वसु: धर, ध्रुव, सोम, सवित्र, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभव। फिर दो अश्विन, नासत्य और दस्र, जो मार्तण्ड और उनकी पत्नी संज्ञा के पुत्र हैं। भीष्म ने कहा कि ये देवता सब यज्ञ, सब दान, सब शुभ-कर्म के साक्षी हैं, अदृश्य रहते हुए भी सबके भले-बुरे कर्म देखते हैं।

तब भीष्म ने ऋषियों के समूह गिनाए, जो दिशाओं के अधिपति माने जाते हैं। पूर्व में यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, औशिज, कक्षीवान्, और अंगिरा के पुत्र बल। ये इन्द्र के पुरोहित हैं। दक्षिण में उन्मचु, प्रमचु, स्वस्त्यात्रेय, दृढव्य, ऊर्ध्वबाहु, त्रिणसोम, अंगिरस्, और मित्रावरुण के पुत्र अगस्त्य, ये यम के ऋत्विक् हैं। पश्चिम में दृढेयु, ऋतेयु, परियाध, एकत, द्वित, त्रित, और अत्रि के पुत्र सारस्वत, ये वरुण के महायज्ञ में ऋत्विक् थे। उत्तर में अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप, गोतम, भरद्वाज, विश्वामित्र, और ऋचीक के तेजस्वी पुत्र जमदग्नि, ये कुबेर के ऋत्विक् हैं।

समझने की कुंजी (दिशाओं के सप्तर्षि): भीष्म ऋषियों को सात-सात के समूहों में, चार दिशाओं में बाँटकर गिनाते हैं, और कुछ ऐसे भी जो किसी दिशा में बँधे नहीं। पाठ कहता है कि जिस दिशा में जिस ऋषि का वास हो, उपासक उसी ओर मुख करके उन्हें स्मरण करे। यह मानो आकाश और दिशाओं का एक जप-मानचित्र है।

भीष्म ने आगे संवर्त, मेरुसावर्ण, मार्कण्डेय, सांख्य और योग, नारद, और महर्षि दुर्वासा के नाम लिए, जो तीनों लोकों में विख्यात हैं। फिर उन्होंने धर्म, काम, काल, वसु, वासुकि, अनन्त और कपिल को, जो जगत् के धारक हैं, और राम, व्यास तथा द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा को गिनाया। उन्होंने प्रसिद्ध राजाओं के नाम भी लिए: वेन-पुत्र पृथु, जिनकी पुत्री पृथ्वी बनी; इला-पुत्र पुरूरवा; भरत; कृतयुग में गोमेध-यज्ञ करने वाले रन्तिदेव; श्वेत; और भगीरथ, जिन्होंने महादेव की कृपा से गंगा को स्वर्ग से उतारा और सगर के साठ हज़ार पुत्रों की भस्म को गंगा-जल से पवित्र कर उन्हें पाप से मुक्त किया।

भीष्म ने कहा कि इन देवताओं, ऋषियों और राजाओं के नाम लेने से मनुष्य अग्नि और चोर के भय से मुक्त होता है, बुरे स्वप्न नहीं आते, रोग दूर होते हैं। घर में जपने से घर के दोष मिटते हैं, खेत में जपने से फसल बढ़ती है, यात्रा में जपने से सौभाग्य मिलता है। क्षत्रिय युद्ध में प्रवेश करते समय इन नामों का जप करे तो शत्रुओं का नाश और अपनी विजय देखता है। जहाँ ये सावित्री-मन्त्र पढ़े जाते हैं, वहाँ अग्नि लकड़ी नहीं जलाती, बालक नहीं मरते, सर्प नहीं रहते, और राजा, पिशाच या राक्षस का भय नहीं रहता।

भीष्म ने जोड़ा कि जो ब्राह्मण को सींगों पर स्वर्ण-पत्र मढ़ी सौ गौएँ दान करता है, और जो प्रतिदिन अपने घर में भारत की उत्तम कथा का पाठ कराता है, दोनों समान पुण्य कमाते हैं। यह उपदेश पराशर का परम मत है, जो प्राचीन काल में स्वयं शक्र (इन्द्र) को कहा गया था, और जो सत्य या सनातन ब्रह्म का स्वरूप है।

सार: सावित्री-मन्त्र देवताओं, ऋषियों और राजर्षियों के नामों का एक विशाल जप है, जो साक्षी-शक्तियों का स्मरण कराकर रक्षा और मंगल देता है। यहाँ “भारत” (महाभारत) की कथा-श्रवण को गो-दान के बराबर पुण्य कहा गया, जो स्वयं इस ग्रन्थ की अपनी महिमा-घोषणा है।

ब्राह्मण की महिमा: पवन और अर्जुन (कार्तवीर्य) का संवाद

युधिष्ठिर ने पूछा कि वे किनकी पूजा करें, किनको नमस्कार करें। भीष्म बोले कि ब्राह्मणों का अपमान साक्षात् देवताओं का अपमान है। उन्हें नमस्कार करने में कोई दोष नहीं, उन्हें अपने पुत्रों के समान मानना चाहिए। वे ही सब लोकों को धारते हैं, वे धर्म के सेतु हैं। चाहे ब्राह्मण विद्वान हो या अविद्वान, सदा उच्च देवता है, जैसे अग्नि चाहे संस्कारित हो या असंस्कारित, सदा महान् देवता है। श्मशान में जलती अग्नि भी स्थान के कारण दूषित नहीं मानी जाती, वैसे ही ब्राह्मण सदा पूज्य है।

तब युधिष्ठिर ने पूछा कि ब्राह्मणों की पूजा का क्या फल है, जिसे देखकर पितामह उनकी पूजा करते हैं। भीष्म बोले कि इस सम्बन्ध में एक प्राचीन कथा है, पवन (वायुदेव) और अर्जुन (कार्तवीर्य) का संवाद। हज़ार भुजाओं वाला महाबली कार्तवीर्य, हैहयवंशी क्षत्रियों का स्वामी, माहिष्मती नगरी में राज करता था। उसने ऋषि दत्तात्रेय की आराधना की, जिन्होंने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा।

राजा ने माँगा कि सेना के बीच युद्ध में उसकी हज़ार भुजाएँ हों, घर में सामान्य दो; वह अपने पराक्रम से सम्पूर्ण पृथ्वी जीते और धर्मपूर्वक उसका शासन करे; और चौथा वर यह कि जब भी वह मार्ग से विचलित हो, तब धर्मात्मा आगे आकर उसे ठीक मार्ग पर लौटा दें। दत्तात्रेय ने “ऐसा ही हो” कहा। पर अपने पराक्रम से अन्धा होकर कार्तवीर्य ने कहा कि धैर्य, तेज, यश और बल में उसके समान कौन है। तब आकाश से एक अदृश्य वाणी बोली, हे अज्ञानी, क्या आप नहीं जानते कि ब्राह्मण क्षत्रिय से श्रेष्ठ है। ब्राह्मण की सहायता से ही क्षत्रिय सब प्राणियों का शासन करता है।

अर्जुन (कार्तवीर्य) ने तर्क किया कि प्रसन्न होने पर वह सृष्टि कर सकता है, क्रुद्ध होने पर संहार। मन, वचन और कर्म में वही श्रेष्ठ है, ब्राह्मण उससे ऊपर नहीं। उसने कहा कि वह आज से उन स्वच्छन्द, अभिमानी ब्राह्मणों को अपने अधीन कर लेगा, जो भिक्षा को अपना धन्धा बनाए घूमते हैं। तब वायुदेव ने आकाश से कहा कि वह यह पापपूर्ण भाव छोड़े, ब्राह्मणों को प्रणाम करे, अन्यथा ब्राह्मण उसे राज्य से भ्रष्ट कर देंगे। राजा ने पूछा कि वे कौन हैं। वायु ने कहा कि वह पवन है, देवों का दूत, और राजा के हित की बात कह रहा है। तब अर्जुन ने पूछा कि ब्राह्मण आखिर किस प्रकार का प्राणी है, क्या वह वायु, जल, अग्नि, सूर्य या आकाश के समान है।

समझने की कुंजी (दो अर्जुन): यहाँ “अर्जुन” पाण्डव अर्जुन न होकर कार्तवीर्य अर्जुन हैं, हैहयवंश के सहस्रबाहु राजा। यह वही कार्तवीर्य हैं जिनसे आगे भृगुवंश (परशुराम) का बैर बँधेगा। पवन उन्हें संकेत देते हैं कि भृगु के वंश से उन्हें संकट है, पर वह दूर के दिनों की बात है।

सार: यह संवाद ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच श्रेष्ठता का शास्त्रार्थ है। कार्तवीर्य अपने पराक्रम के मद में ब्राह्मण को तुच्छ कहता है; पवन उसे आगे की कथाओं से समझाते हैं कि ज्ञान-तप का बल अस्त्र-बल से परे है। यह तनाव महाभारत में सहज रखा गया है, राजा का अहंकार छिपाया नहीं गया।

पवन की कथाएँ: कश्यप, उतथ्य, अगस्त्य, वशिष्ठ, अत्रि और च्यवन

वायुदेव बोले कि ब्राह्मण उन सबमें श्रेष्ठ है जिन्हें राजा ने गिनाया। उन्होंने उदाहरण दिए। प्राचीन काल में पृथ्वी ने अंग-नरेश के साथ स्पर्धा कर अपना पृथ्वी-स्वरूप त्यागना चाहा, तब कश्यप ने उसे रोक लिया। महर्षि अंगिरा ने अपने तेज से सब जल पी डाला, और तृप्त न होने पर फिर एक महान् तरंग उठाकर पृथ्वी को जल से भर दिया। पुरन्दर (इन्द्र), अहल्या के शरीर का लोभ करने पर, गौतम के शाप से ग्रस्त हुए। समुद्र, जो पहले स्वच्छ जल वाला था, ब्राह्मणों के शाप से खारा हो गया। सगर के साठ हज़ार पुत्र, जो समुद्र की पूजा करने आए थे, स्वर्ण-वर्ण कपिल मुनि से भस्म हो गए। दण्डक का विशाल राज्य एक ब्राह्मण से नष्ट हुआ; महाबली तालजंघ केवल एक ब्राह्मण और्व से।

वायु ने कहा कि कार्तवीर्य ने भी यह सब राज्य, बल, धर्म और विद्या दत्तात्रेय की कृपा से ही पाया है, फिर वह क्यों मोह में पड़ता है। फिर उन्होंने एक कथा कही। एक राजा अंग सारी पृथ्वी को ब्राह्मणों को दान देना चाहता था। इससे पृथ्वी, जो ब्रह्मा की पुत्री थी, चिन्तित होकर अपने पिता के पास चली गई, और राजा का राज्य नष्ट होने को हुआ। तब कश्यप ने अपना शरीर त्यागकर, योग के बल से, पृथ्वी के स्वरूप में प्रवेश किया। तीस हज़ार दिव्य वर्ष तक पृथ्वी कश्यप के तेज से भरी रही, और सर्वत्र धर्म और निर्भयता रही। फिर पृथ्वी लौट आई, कश्यप को प्रणाम किया, और उसी दिन से उनकी पुत्री बन गई। वायु ने पूछा, बताइए, कौन-सा क्षत्रिय कश्यप से श्रेष्ठ है।

एक उप-कथा (उतथ्य और वरुण): वायु ने उतथ्य की कथा कही। सोम की पुत्री भद्रा अनुपम सुन्दरी थी, और सोम ने उतथ्य को उसके योग्य वर माना। अत्रि ने उतथ्य को बुलाकर भद्रा उन्हें सौंप दी। पर वरुण उस कन्या को पहले से चाहते थे। एक दिन जब वह यमुना में स्नान को उतरी, वरुण उसे हर ले गए और अपने जल-भवन में रख लिया। उतथ्य ने नारद को सन्देश देकर भेजा कि वरुण उनकी पत्नी लौटा दें, पर वरुण ने मना किया। तब क्रुद्ध उतथ्य ने अपने तप से सारा जल ठोस कर पी लिया। फिर भी वरुण न झुके, तो उतथ्य ने पृथ्वी और सरस्वती को आज्ञा दी कि वह स्थान सूख जाए और सरस्वती मरुभूमि की ओर चली जाए। वह क्षेत्र, जहाँ छह लाख सरोवर थे, सूख गया। तब वरुण ने भद्रा लौटा दी। उतथ्य ने अपनी पत्नी पाकर विश्व और वरुण, दोनों को संकट से उबार लिया।

वायु ने अगस्त्य की कथा कही। एक बार असुरों ने देवताओं को पराजित कर दिया, उनके यज्ञ और पितरों की स्वधा छीन ली। श्रीहीन देवता पृथ्वी पर भटकते हुए अगस्त्य के पास पहुँचे और रक्षा माँगी। अगस्त्य क्रुद्ध हुए और प्रलयाग्नि के समान प्रज्वलित हो उठे। उनकी किरणों से दानव जलने लगे, हज़ारों आकाश से गिरने लगे। शेष दानव स्वर्ग और पृथ्वी छोड़कर दक्षिण भाग गए, और कुछ पाताल में, राजा बलि के अश्वमेध-यज्ञ में, छिपे रहे। देवताओं ने प्रार्थना की कि पाताल के असुरों को भी भस्म करें, पर अगस्त्य ने कहा कि ऐसा करने से उनका तप क्षीण होगा, इसलिए वे यह शक्ति नहीं लगाएँगे।

फिर वायु ने वशिष्ठ की कथा कही। एक बार देवता वैखानस सरोवर के तट पर यज्ञ कर रहे थे और उन्होंने वशिष्ठ को मन में ही अपना पुरोहित बनाया। तब खलिन नामक पर्वत-समान दानवों ने उन क्षीण देवताओं को मारना चाहा। मानस सरोवर के जल में डाले जाने पर वे दानव ब्रह्मा के वर से फिर जी उठते थे। उन्होंने सरोवर का जल सौ योजन ऊँचा उठा दिया। संकट में इन्द्र ने वशिष्ठ की शरण ली। वशिष्ठ ने बिना श्रम के उन खलिनों को भस्म कर दिया, और कैलास गई गंगा को वहाँ लाकर सरोवर के जल को भेदा। वह दिव्य धारा सरयू नाम से बहने लगी।

फिर अत्रि की कथा आई। एक बार अन्धकार में देव-दानव युद्ध करते समय राहु ने सूर्य और चन्द्र, दोनों को अपने बाणों से बेध दिया। अन्धकार में डूबे देवता असुरों से मार खाने लगे और अत्रि की शरण में गए। अत्रि ने स्वयं चन्द्रमा का और फिर सूर्य का रूप धारण कर, अपने तप के बल से, युद्धभूमि को प्रकाशित किया, अन्धकार हर लिया, और असुरों को परास्त किया। फलमात्र पर जीवन-यापन करने वाले उस ऋषि ने सूर्य को प्रकाशित किया, देवताओं की रक्षा की, और असुरों का संहार किया।

अन्त में च्यवन की कथा आई। च्यवन ने अश्विनीकुमारों को वचन देकर इन्द्र से कहा कि उन्हें अन्य देवताओं के साथ सोमपान का अधिकार दें। इन्द्र ने मना किया, क्योंकि अश्विन देवताओं में गिने नहीं जाते थे। तब च्यवन ने स्वयं यज्ञ आरम्भ कर, मन्त्रों से देवताओं को स्तम्भित कर दिया। क्रुद्ध इन्द्र पर्वत और वज्र लेकर दौड़े, पर च्यवन ने एक क्रोध-भरी दृष्टि और थोड़े जल से इन्द्र को वज्र-पर्वत सहित जड़ कर दिया। फिर उन्होंने अग्नि में दी आहुतियों से “मद” नामक एक भयानक असुर रचा, जिसका मुख विकराल था, हज़ार दाँत सौ योजन तक फैले, और एक गाल पृथ्वी पर तो दूसरा आकाश को छूता था। इन्द्र सहित सब देवता उसके जिह्वा-मूल पर, मानो विशाल मछली के मुख में फँसी छोटी मछलियाँ, खड़े दीखने लगे।

मद के मुख में खड़े देवताओं ने इन्द्र से कहा कि वे च्यवन के सामने सिर झुकाएँ। इन्द्र ने झुककर उनकी आज्ञा मानी, और तब च्यवन ने अश्विनों को अन्य देवों के साथ सोमपान का अधिकार दिलाया। फिर उन्होंने मद को वापस बुलाकर चार स्थानों में बाँट दिया: द्यूत, आखेट (शिकार), मद्यपान और स्त्री। इसी से, वायु ने कहा, जो इनमें फँसते हैं उनका नाश होता है, अतः इन दोषों को दूर रखना चाहिए।

सार: पवन एक के बाद एक कथा से सिद्ध करते हैं कि तप का बल राज-बल से परे है। हर कथा के अन्त में वे एक ही प्रश्न दोहराते हैं, क्या कोई क्षत्रिय इस ऋषि से बड़ा है, और कार्तवीर्य मौन रह जाता है। च्यवन की कथा में “मद” के चार रूप, द्यूत-शिकार-मद्य-स्त्री, मानो उन व्यसनों की ओर संकेत हैं जिन्होंने आगे कुरुओं को ही ग्रस लिया।

कापों का वध, और अर्जुन का नमन

वायु ने अन्तिम कथा कही। जब इन्द्र आदि देवता मद-असुर के मुख में फँसे थे, तब च्यवन ने उनसे पृथ्वी भी छीन ली। स्वर्ग और पृथ्वी, दोनों से वंचित देवता दुखी होकर ब्रह्मा की शरण में गए। उन्होंने कहा कि च्यवन ने पृथ्वी ले ली और कापों ने स्वर्ग। ब्रह्मा ने कहा कि वे ब्राह्मणों की शरण लें, उन्हें प्रसन्न कर वे दोनों लोक फिर पा लेंगे। देवता ब्राह्मणों के पास गए और रक्षा माँगी। ब्राह्मणों ने पूछा कि किसे जीतना है, देवताओं ने कहा, कापों को।

ब्राह्मणों ने कापों के विनाश का अनुष्ठान आरम्भ किया। यह सुनकर कापों ने धनिन् नामक दूत भेजा, जिसने कहा कि कापगण भी आप ब्राह्मणों के समान ही हैं, वेदज्ञ, यज्ञपरायण, सत्यव्रती। वे कभी निष्फल सम्भोग नहीं करते, यज्ञ में न मारे गए पशु का मांस नहीं खाते, अग्निहोत्र करते हैं, गुरुजनों की आज्ञा मानते हैं, और बिना अपनी सन्तान में बाँटे कोई भोजन नहीं करते। ऐसे गुणी कापों को क्यों जीतना चाहते हैं, इस प्रयत्न से विरत रहें, उसी में आपका भला है।

ब्राह्मणों ने कहा कि वे देवताओं के साथ एक मत हैं, अतः कापों का वध होगा, और धनिन् लौट जाए। धनिन् ने लौटकर कापों को बताया कि ब्राह्मण भला करने को तैयार नहीं। तब कापों ने शस्त्र उठाए और रथ-ध्वजाएँ ऊँची कर ब्राह्मणों की ओर बढ़े। ब्राह्मणों ने वैदिक मन्त्रों से कुछ प्रज्वलित अग्नियाँ रचीं, जिन्होंने कापों का संहार कर दिया और फिर आकाश में स्वर्ण-मेघों-सी चमकने लगीं। युद्ध में देवताओं ने भी अनेक दानवों को मारा, पर वे नहीं जानते थे कि वास्तविक विनाश ब्राह्मणों ने किया। तब नारद ने आकर देवताओं को यह सत्य बताया। यह सुनकर देवता अति प्रसन्न हुए, अपने ब्राह्मण-मित्रों की प्रशंसा की, और उन्हें अमरता का वर मिला।

तब कार्तवीर्य अर्जुन ने वायुदेव की विधिवत् पूजा की और कहा कि वह सदा और सब प्रकार से ब्राह्मणों के लिए ही जीता है, उनकी पूजा करता है, और दत्तात्रेय की कृपा से ही उसने यह बल पाया है। वायु ने कहा कि वह अपने जन्म-सिद्ध क्षत्रिय-धर्म से ब्राह्मणों की रक्षा करे, अपनी इन्द्रियों के समान उनकी रक्षा करे। फिर एक संकेत दिया, कि भृगु के वंश से उसे संकट है, पर वह दूर के दिन की बात है।

सार: कापों की कथा एक नैतिक मोड़ रखती है: कापगण स्वयं गुणी और वेदज्ञ थे, फिर भी देवताओं के पक्ष में ब्राह्मणों ने उन्हें मारा। पाठ इसे सरल “धर्म बनाम अधर्म” नहीं बनाता, युद्ध की क्रूरता और पक्ष-निर्णय की कठिनता को बना रहने देता है। अन्त में कार्तवीर्य झुक जाता है, और भविष्य के भृगु-बैर का बीज बो दिया जाता है।

कृष्ण ही सब हैं: भीष्म युधिष्ठिर को केशव सौंपते हैं

युधिष्ठिर ने फिर पूछा कि ब्राह्मण-पूजा का क्या फल है। भीष्म बोले कि यहीं केशव विराजमान हैं, वे ही सब कहेंगे। और तब पितामह ने एक मार्मिक बात कही। उन्होंने कहा कि उनका बल, कान, वाणी, मन, नेत्र और निर्मल बुद्धि, सब अब धुँधले पड़ रहे हैं। उन्हें लगता है कि अब वह समय दूर नहीं जब वे यह शरीर त्यागेंगे। उन्हें सूर्य बहुत धीमे चलता-सा जान पड़ता है। फिर उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि शेष जो थोड़ा जानना बाकी है, वह कृष्ण से सीखें, क्योंकि भीष्म कृष्ण को सचमुच जानते हैं।

भीष्म ने कृष्ण-तत्त्व का विराट् वर्णन किया। उन्होंने कहा कि कृष्ण ने ही पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग रचे; पृथ्वी उन्हीं के शरीर से उपजी; वे ही महावराह बनकर डूबी पृथ्वी को उबार लाए। उनकी नाभि में कमल प्रकट हुआ, और उस कमल में ब्रह्मा। त्रेता में वे धर्म-रूप में, फिर ज्ञान-रूप में रहे; द्वापर में बल-रूप में; और कलि में वे अधर्म-रूप में पृथ्वी पर आते हैं। जब धर्म का कारण क्षीण होता है, तब यह कृष्ण देवताओं या मनुष्यों के कुल में जन्म लेते हैं, और रक्षणीय की रक्षा करते हुए असुर का संहार करते हैं।

भीष्म ने कहा कि वे ही राहु, सोम और शक्र हैं; वे ही विश्वकर्मा हैं; वे ही संहारक और स्रष्टा हैं। उन्होंने ब्रज में, इन्द्र की मूसलधार वर्षा से ग्वालों की रक्षा हेतु, गोवर्धन पर्वत उठाया। वे ही वायुदेव हैं, वे ही अश्विन, वे ही सहस्र-किरण सूर्य। उन्होंने तीन डगों से तीन लोक नाप लिए। वे ही वर्ष, ऋतु, पक्ष, दिन-रात, और काल के सूक्ष्म विभाग, कला, काष्ठा, मात्रा, मुहूर्त, लव, क्षण हैं। रुद्र, आदित्य, वसु, अश्विन, साध्य, विश्वेदेव, मरुत्, प्रजापति, अदिति और सप्तर्षि, सब कृष्ण से उपजे।

भीष्म ने आगे कहा कि वे ही जीव-रूप में होकर संकर्षण कहलाते हैं, फिर प्रद्युम्न, फिर अनिरुद्ध बनते हैं, और इस प्रकार स्वयं को चार व्यूहों में बाँटते हैं। पाँच महाभूतों से इस विश्व को रचने की इच्छा से वे देव, असुर, मनुष्य, पशु और पक्षी, इन पाँच प्रकार के जीवन में इसे चलाते हैं। जो कुछ है और जो कुछ होगा, सब केशव है। यह कृष्ण ही वह मृत्यु हैं जो अन्त-काल में सब प्राणियों को ग्रस लेती है, और वही धर्म के कारण को धारते हैं। भीष्म ने कहा कि अतः केशव से श्रेष्ठ किसी की कल्पना ही असंगत है। वे नारायण हैं, परम के भी परम, अविनाशी और अक्षय। हे युधिष्ठिर, उन्हीं की शरण लो।

समझने की कुंजी (चार व्यूह): जगत् के आधार और गुणों से परे कृष्ण वासुदेव हैं; जीव बनने पर वे संकर्षण कहलाते हैं, फिर प्रद्युम्न और फिर अनिरुद्ध बनते हैं। भीष्म यहाँ इसी क्रम से कृष्ण को सृष्टि के मूल और विस्तार, दोनों रूपों में दिखाते हैं।

सार: मरण-शय्या पर पितामह अपनी इन्द्रियों के क्षीण होने का संकेत देते हुए, अपना अन्तिम भार युधिष्ठिर के लिए कृष्ण पर रख देते हैं। यह केवल स्तुति नहीं, उत्तराधिकार का संकेत है: जो ज्ञान भीष्म पूरा न कर सकें, वह अब साक्षात् केशव से मिलेगा।

वासुदेव और दुर्वासा की कथा; शत-रुद्रिय और रुद्र के नाम

युधिष्ठिर ने अब कृष्ण से ही ब्राह्मण-पूजा का फल पूछा। वासुदेव बोले कि वे एक कथा कहते हैं। एक बार द्वारका में, उनके पुत्र प्रद्युम्न ने, कुछ ब्राह्मणों से रुष्ट होकर, उनसे यही प्रश्न पूछा था कि ब्राह्मण-पूजा का क्या फल है। तब कृष्ण ने उसे रुक्मिणी-पुत्र को समझाया कि धर्म, अर्थ, काम, या मोक्ष, या यश, या रोग की चिकित्सा, या देव-पितृ-पूजा, हर प्रयोजन में ब्राह्मणों को प्रसन्न करना चाहिए। वे ही सुख-दुख के दाता हैं, और इस लोक तथा परलोक में सब प्रिय वस्तु का मूल ब्राह्मणों में है।

कृष्ण ने एक अद्भुत कथा सुनाई। उनके घर में ब्राह्मण दुर्वासा रहते थे, जिनका रंग हरा-पीला था, जो चिथड़ों में लिपटे, बिल्व-वृक्ष की लाठी लिए, लम्बी दाढ़ी वाले और अत्यन्त कृश थे। वे सब लोकों में घूमते हुए सभाओं में यही गाते कि कौन है जो दुर्वासा को अपने घर अतिथि बनाएगा, जो ज़रा-सी चूक पर भी क्रुद्ध हो जाते हैं। जब किसी ने उन्हें आश्रय न दिया, तब कृष्ण ने उन्हें निमन्त्रित कर अपने घर में रखा।

एक उप-कथा (दुर्वासा की परीक्षा): दुर्वासा कभी हज़ारों के योग्य भोजन खा जाते, कभी बहुत थोड़ा। कभी बिना कारण हँसते, कभी रोते। एक दिन उन्होंने अपने कक्ष की सारी शय्या, चादरें और सेवा में लगी दासियाँ जला दीं और बाहर चले गए। फिर उन्होंने कृष्ण से तुरन्त खीर माँगी। कृष्ण ने पहले से तैयार खीर तत्काल दी। थोड़ी खाकर दुर्वासा ने कहा कि कृष्ण उस खीर को अपने सारे अंगों पर लगा लें। कृष्ण ने बिना किसी संकोच के ऐसा ही किया, शरीर और सिर पर खीर लगा ली। तब दुर्वासा ने रुक्मिणी के शरीर पर भी खीर पोत दी, और उन्हें रथ में जोत लिया। ऋषि उस रथ पर चढ़कर नगर के राजमार्ग पर निकल पड़े, और कृष्ण के देखते-देखते रुक्मिणी को पशु-समान रथ खींचना पड़ा।

यह विचित्र दृश्य देख कुछ दशार्ह क्रोध से भर उठे, पर कृष्ण ने मन में रंचमात्र भी द्वेष या ऋषि को हानि पहुँचाने का भाव नहीं आने दिया। मार्ग में रुक्मिणी लड़खड़ाकर गिरने लगीं, तो ऋषि ने उन्हें कोड़े से हाँका। फिर अचानक वे रथ से कूदकर पैदल ही दक्षिण की ओर बिना मार्ग के दौड़ पड़े। कृष्ण खीर से लिपटे ही उनके पीछे दौड़े और बोले कि वे प्रसन्न हों।

तब दुर्वासा रुके और बोले कि कृष्ण ने अपने स्वभाव के बल से क्रोध को जीत लिया है, उन्होंने कृष्ण में तनिक भी दोष नहीं पाया। उन्होंने कृष्ण को वर दिया कि जब तक देव और मनुष्य भोजन से प्रेम रखेंगे, तब तक सब कृष्ण से वैसा ही प्रेम रखेंगे; जब तक लोकों में धर्म रहेगा, तब तक कृष्ण का यश रहेगा; और जिन अंगों पर खीर लगी है, वहाँ मृत्यु का भय न होगा। फिर उन्होंने हँसकर पूछा कि कृष्ण ने अपने पाँवों के तलवों पर खीर क्यों नहीं लगाई, यह उन्हें स्वीकार नहीं हुआ। रुक्मिणी को भी ऋषि ने वर दिया कि वे अपनी सोलह हज़ार सपत्नियों में अग्रणी होंगी, उन्हें जरा-रोग न छुएगा, और अन्त में कृष्ण की अविच्छिन्न संगति पाएँगी। फिर वह ब्राह्मण आँखों के सामने ही अन्तर्धान हो गए। कृष्ण ने उसी दिन से प्रण किया कि वे ब्राह्मणों की हर आज्ञा पूरी करेंगे, और घर लौटकर देखा कि दुर्वासा ने जो कुछ तोड़ा-जलाया था, सब नया और अधिक टिकाऊ होकर फिर खड़ा है।

तब युधिष्ठिर ने कृष्ण से वह ज्ञान माँगा जो उन्होंने दुर्वासा की कृपा से पाया, और उस महात्मा के नाम और महिमा जाननी चाही। वासुदेव बोले कि वे कपर्दी (शिव) को नमस्कार कर वह शत-रुद्रिय सुनाते हैं, जिसे वे प्रतिदिन प्रातः जपते हैं। उन्होंने कहा कि तीनों लोकों में महादेव से बड़ा कोई नहीं, उनके समान भी कोई नहीं। जब वे युद्धभूमि में क्रोध से खड़े होते हैं, तब उनके शरीर की गन्धमात्र से शत्रु अचेत हो जाते हैं।

वासुदेव ने दक्ष-यज्ञ की कथा कही। जब दक्ष ने भव (शिव) की अवहेलना कर यज्ञ रचा, तब क्रुद्ध शिव ने अपने भयानक धनुष से यज्ञ-पुरुष को बेध दिया और गर्जना की। उनकी प्रत्यंचा के टंकार से सम्पूर्ण विश्व काँप उठा, समुद्र क्षुब्ध हुआ, पर्वत अपने आधार से हिल उठे, और सब ज्योतियाँ मन्द पड़ गईं। रुद्र ने भग के नेत्र निकाल लिए, पूषा के दाँत तोड़ दिए। तब देवताओं ने सिर झुकाकर शत-रुद्रिय मन्त्रों से उनकी स्तुति की, और प्रसन्न होने पर रुद्र ने यज्ञ-पुरुष के अंग फिर पूर्ण कर दिए।

वासुदेव ने त्रिपुर-दहन की कथा कही। असुरों के आकाश में तीन नगर थे, एक लोहे का, एक चाँदी का, एक सोने का, जिन्हें इन्द्र भी न भेद सके। तब रुद्र ने विष्णु को अपना बाण-फल बनाया, अग्नि को बाण-दण्ड, यम को पंख, वेदों को धनुष, सावित्री को प्रत्यंचा, और ब्रह्मा को सारथि बनाया, और एक ही शर से तीनों नगर भस्म कर दिए। फिर एक और कथा आई, जिसमें महादेव पाँच जटाओं वाले बालक-रूप में पार्वती की गोद में थे, और इन्द्र ने ईर्ष्या से उन्हें वज्र से मारना चाहा, पर बालक ने इन्द्र की भुजा जड़ कर दी। तब ब्रह्मा ने तप से जाना कि वह बालक स्वयं महादेव है, और स्तुति की, तब इन्द्र की भुजा पूर्ववत् हुई।

वासुदेव ने कहा कि वही महादेव दुर्वासा-रूप में द्वारका में उनके घर बहुत समय रहे और अनेक कठिन कार्य किए, जिन्हें कृष्ण ने हृदय की उदारता से सहा। वे ही रुद्र हैं, शिव हैं, अग्नि हैं, सर्व हैं, इन्द्र हैं, वायु हैं, अश्विन हैं, चन्द्र हैं, सूर्य हैं, वरुण हैं, काल हैं, मृत्यु हैं, दिन-रात हैं, ऋतु हैं, वर्ष हैं। वे धाता हैं, विधाता हैं, विश्वकर्मा हैं। सौ वर्षों में भी कोई उनके गुण गिनकर समाप्त नहीं कर सकता।

फिर वासुदेव ने रुद्र के अनेक नामों का अर्थ बताया। ऋषि महादेव को अग्नि, स्थाणु और महेश्वर कहते हैं; एक-नेत्र, त्रिनेत्र, विश्वरूप और शिव कहते हैं। उनके दो रूप हैं, एक उग्र और भयानक, दूसरा सौम्य और कल्याणकारी। उग्र रूप अग्नि, बिजली और सूर्य से अभिन्न; सौम्य रूप धर्म, जल और चन्द्र से। उनका आधा शरीर अग्नि और आधा सोम है। क्योंकि वे महान् और सबके स्वामी हैं, वे महेश्वर कहलाते हैं; क्योंकि वे तीक्ष्ण और तेजोमय होकर रौद्र कर्म करते हैं, वे रुद्र; क्योंकि वे धूम्र-वर्ण के हैं, वे धूर्जटि; क्योंकि वे सबका कल्याण चाहते हैं, वे शिव; क्योंकि उनका लिंग सदा स्थिर है, वे स्थाणु; और क्योंकि वे सब प्राणियों का पोषण-पालन करते हैं, वे पशुपति। वासुदेव बोले कि वे सब प्राणियों के शरीर में मृत्यु-रूप, और प्राण-अपान रूप में भी विद्यमान हैं, और ब्राह्मण उनके सम्मान में वेदों का तथा व्यास का रचा शत-रुद्रिय जपते हैं।

समझने की कुंजी (शत-रुद्रिय): “शत-रुद्रिय” का अर्थ है रुद्र के सौ रूपों/नामों की स्तुति, जो वेद में आती है। दुर्वासा-कथा का मर्म यह है कि वे साक्षात् रुद्र का अवतार थे, और कृष्ण ने उनकी असह्य परीक्षा को सहकर ब्राह्मण-सेवा का चरम आदर्श दिखाया। यह विष्णु और शिव की एकता का एक और सूत्र है।

सार: दान-धर्म पर्व यहाँ विष्णु से शिव की ओर भी झुकता है। कृष्ण स्वयं शिव-स्तुति (शत-रुद्रिय) को अपनी नित्य उपासना बताते हैं, और दुर्वासा-कथा से दिखाते हैं कि अहंकार-शून्य सहनशीलता ही ब्राह्मण-सेवा (और दैवी कृपा) का द्वार है। यहाँ दोनों परम देव एक-दूसरे की महिमा गाते हैं।

प्रत्यक्ष या शास्त्र, प्रमाण कौन

देवकीनन्दन कृष्ण के यह वचन कह चुकने पर, युधिष्ठिर ने फिर शान्तनुपुत्र भीष्म से पूछा, “हे महाबुद्धिमान्, हे कर्तव्यों के ज्ञाताओं में अग्रणी, इन दोनों में, प्रत्यक्ष और शास्त्र, किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए कौन प्रमाण माना जाए?”

भीष्म ने कहा, “हे महाप्रज्ञ, इसमें हमें कोई संशय नहीं दिखता। सुनिए, हम उत्तर देते हैं। आपने जो प्रश्न पूछा, वह उचित है। संशय करना सरल है, पर उस संशय का समाधान कठिन है। प्रत्यक्ष और श्रवण (शास्त्र) दोनों के विषय में अनगिनत ऐसे स्थल हैं जहाँ संशय उठ सकता है। कुछ लोग, जो अपने को तार्किक कहलाने में आनन्द पाते और स्वयं को श्रेष्ठ बुद्धि वाला मान बैठते हैं, यह कहते हैं कि केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। वे कहते हैं कि जो प्रत्यक्ष नहीं दिखता वह चाहे कितना भी सत्य हो, उसका अस्तित्व नहीं, अथवा कम-से-कम वे उसके अस्तित्व में संशय करते हैं। ऐसा कथन एक असंगति है, और जो ऐसा कहते हैं वे मूढ़बुद्धि हैं, चाहे उन्हें अपनी विद्या का कितना ही अभिमान हो।

“और यदि आप यह संशय करते हैं कि वह एक अविभाज्य ब्रह्म कारण कैसे हो सकता है, तो हम उत्तर देते हैं कि उसे कोई दीर्घकाल के अभ्यास से, और आलस्य छोड़कर साधे गए योग की सहायता से ही समझ सकेगा। जो जैसा प्राप्त हो वैसे साधनों से जीता है, किसी एक नियत जीवन-पद्धति से बँधा नहीं रहता, और जो उस प्रश्न के समाधान में लगा रहता है, वही उसे समझ सकेगा। उसके अतिरिक्त सचमुच कोई और इसके योग्य नहीं। जब कोई हेतुओं (तर्कों) के अन्त तक पहुँच जाता है, तब वह उस उत्तम और सर्वसमावेशी ज्ञान को पाता है, उस विशाल तेज-राशि को जो सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करती है, जिसे ब्रह्म कहते हैं। हे राजन्, जो ज्ञान केवल तर्क या अनुमान से निकलता है, वह बमुश्किल ज्ञान कहलाने योग्य है। ऐसे ज्ञान को त्याग देना चाहिए। यह शब्द से परिभाषित या ग्रहण नहीं होता, इसी से इसे त्याग देना चाहिए।”

समझने की कुंजी (चार प्रमाण): प्रत्यक्ष (आँखों देखा), अनुमान (तर्क से निकाला), आगम/शास्त्र (वेद-वचन), और सत्पुरुषों का आचरण। केवल-प्रत्यक्षवादी (वामपन्थी तार्किक) को भीष्म मूढ़ कहते हैं; जो दिखे केवल वही सत्य है, यह मान्यता अधूरी है। ब्रह्म तर्क से नहीं, दीर्घ योग-अभ्यास से ही समझ आता है।

युधिष्ठिर ने कहा, “हे पितामह, इन चारों में परम प्रमाणस्वरूप कौन है, प्रत्यक्ष, अवलोकन से किया गया अनुमान, आगम अथवा शास्त्र का ज्ञान, और सत्पुरुषों को अन्यों से पृथक् करने वाले भाँति-भाँति के आचरण?”

भीष्म ने कहा, “जब महाबली दुष्ट पुरुष धर्म का नाश करने पर तुले होते हैं, तब उसे कुछ काल के लिए वे सत्पुरुष बचा सकते हैं जो सावधानी और श्रम से यत्न करते हैं। पर अन्ततः वह रक्षा टिकती नहीं, क्योंकि अन्त में विनाश धर्म को घेर ही लेता है। फिर, धर्म प्रायः अधर्म को ढकने का आवरण बन जाता है, जैसे घास और तिनके किसी गहरे गड्ढे के मुख को ढककर उसे दृष्टि से छिपा देते हैं। इसी कारण सत्पुरुषों का आचरण दुष्टों द्वारा बाधित और नष्ट किया जाता है। जो दुराचारी हैं, जो श्रुति को त्याग देते हैं, वे धर्म-द्वेषी दुष्ट उस उत्तम आचरण-मार्ग को ही नष्ट कर देते हैं जो अन्यथा आदर्श रूप में स्थापित हो सकता था। इसी से प्रत्यक्ष, अनुमान और आचरण, इन तीनों से संशय जुड़ जाता है।

“अतएव सत्पुरुषों में जो शास्त्र से शुद्ध हुई बुद्धि वाले और सदा सन्तुष्ट हैं, वे ही श्रेष्ठ माने जाते हैं। जो व्याकुल हैं और जिनके चित्त की शान्ति छिन गई है, वे ऐसे पुरुषों के पास जाएँ। हे युधिष्ठिर, आप भी उनकी सेवा कीजिए और अपने संशय का समाधान उन्हीं से पूछिए। ऐसे पुरुषों का आचरण कभी भ्रष्ट नहीं होता, न नष्ट होता है, और न उनके यज्ञ, वेद-अध्ययन और कर्म। ये तीन, आचरण जो प्रकट कर्मों में दिखता है, मन की पवित्रता का व्यवहार, और वेद, मिलकर ही धर्म का निर्माण करते हैं।”

युधिष्ठिर ने कहा, “हे पितामह, हमारी बुद्धि फिर संशय से मूढ़ हो रही है। हम इस समुद्र के इस ओर खड़े उसे पार करने का उपाय खोज रहे हैं, पर हमें उसका दूसरा तट नहीं दिखता। यदि ये तीन, वेद, प्रत्यक्ष (देखे गए कर्म), और आचरण (मन की पवित्रता), मिलकर प्रमाण माने जाएँ, तो कहा जा सकता है कि इनमें भेद है। तब धर्म, जो एक और अविभाज्य है, वस्तुतः तीन प्रकार का हो जाता है।”

भीष्म ने कहा, “धर्म कभी-कभी महाबली दुष्ट पुरुषों द्वारा नष्ट होता दिखता है। हे राजन्, यदि आप यह सोचते हैं कि धर्म सचमुच तीन प्रकार का है, तो हमारा उत्तर है कि आपका निष्कर्ष तर्कसंगत है। सत्य यह है कि धर्म एक और अविभाज्य है, यद्यपि उसे तीन भिन्न दृष्टियों से देखा जा सकता है। धर्म की नींव बनाने वाले उन तीनों के मार्ग अलग-अलग बता दिए गए हैं। आप जो निर्देश दिए गए हैं, उन्हीं के अनुसार आचरण कीजिए। आपको धर्म के विषय में विवाद नहीं करना चाहिए, और न फिर उन्हीं संशयों का समाधान खोजना चाहिए जिनमें आप पड़ जाएँ। हे भरतश्रेष्ठ, ऐसे संशय आपके मन को कभी न घेरें। हम जो कहते हैं उसे बिना किसी हिचक के मानिए। एक अन्धे की भाँति, अथवा उस व्यक्ति की भाँति जो स्वयं विवेकहीन होकर दूसरे के विवेक पर निर्भर रहता है, आप हमारा अनुसरण कीजिए।

“अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव (अर्थात् क्षमा), और दान की उदारता, हे शत्रुरहित राजन्, इन चार का आप अभ्यास कीजिए, क्योंकि ये चार ही सनातन धर्म हैं। हे महाबाहु, आप ब्राह्मणों के प्रति वही आचरण कीजिए जो आपके पिताओं और पितामहों द्वारा उनके प्रति किया गया है। ये धर्म के प्रमुख लक्षण हैं। जो अल्पबुद्धि पुरुष, जो सदा प्रमाण माना गया उसी को नकारकर प्रमाण का भार गिराना चाहता है, वह स्वयं मनुष्यों में प्रमाण न बन सकेगा। ऐसा पुरुष संसार में बहुत शोक का कारण बनता है। आप ब्राह्मणों का आदर कीजिए और उनका आतिथ्य कीजिए। सदा इसी प्रकार उनकी सेवा कीजिए। विश्व उन्हीं पर टिका है। आप उन्हें ऐसा ही समझिए।”

सार: धर्म एक और अविभाज्य है, पर तीन दृष्टियों से दिखता है, वेद, प्रत्यक्ष कर्म, मन की पवित्रता। संशय से बचने का मार्ग, शास्त्र-शुद्ध सत्पुरुषों की शरण। चार स्तम्भ नित्य हैं: अहिंसा, सत्य, क्षमा, और दान।

धर्म-द्वेषी और धर्म-प्रेमी की गति, और सत्पुरुष के लक्षण

युधिष्ठिर ने कहा, “हे पितामह, हमें बताइए कि जो धर्म से द्वेष करते हैं और जो उसका आदर तथा पालन करते हैं, उनकी गति क्रमशः क्या है?”

भीष्म ने कहा, “जो पुरुष धर्म से द्वेष करते हैं, उनके हृदय रजोगुण और तमोगुण से अभिभूत कहे जाते हैं। ऐसे पुरुषों को सदा नरक जाना पड़ता है। और हे राजन्, जो सदा धर्म का आदर और पालन करते हैं, जो सत्य और निष्कपटता में लगे हैं, वे सत्पुरुष कहलाते हैं। वे सदा स्वर्ग के सुख का भोग करते हैं। अपने गुरुजनों की श्रद्धापूर्वक सेवा करने से उनके हृदय सदा धर्म की ओर मुड़े रहते हैं। जो धर्म का आदर करते हैं, वे देवताओं के लोकों को पाते हैं। जो मनुष्य अथवा देवता लोभ और द्वेष से रहित होकर तपस्या के अभ्यास से अपने शरीर को कृश और क्लेशित करते हैं, वे उस धर्म के कारण, जो तब उनका हो जाता है, महान् सुख पाते हैं। बुद्धिमानों ने कहा है कि ब्राह्मण, जो ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र हैं, धर्म के प्रतिनिधि हैं। धर्मात्मा सदा उनकी पूजा करते हैं, और उनका हृदय उनके प्रति उतने ही स्नेह से भरा रहता है जितना भूखे मनुष्य का पेट पके और मधुर फलों के प्रति।”

युधिष्ठिर ने कहा, “जो दुष्ट हैं उनका रूप कैसा होता है, और जो सत्पुरुष कहलाते हैं उन्हें कौन-से कर्म करने चाहिए? हे पवित्रात्मन्, यह हमें समझाइए। सत्पुरुष और दुष्ट के लक्षण बताइए।”

भीष्म ने कहा, “जो दुष्ट हैं, वे अपने आचरण में बुरे होते हैं, जिन्हें नियमों की मर्यादा में रखना असम्भव होता है, और जो दुर्मुख होते हैं। दूसरी ओर जो सत्पुरुष हैं, वे अपने कर्मों में सदा भले होते हैं। ये पुरुष जो कर्म करते हैं, वे ही उस आचरण के लक्षण माने जाते हैं जिसे सदाचार कहते हैं।

“हे राजन्, सत्पुरुष कभी सार्वजनिक मार्ग पर, अथवा गोशाला के बीच, अथवा धान के खेत पर मल-मूत्र का त्याग नहीं करते। देवता, पितर, अतिथि, अन्य प्राणी और स्वजन, इन पाँचों को भोजन कराने के पश्चात् ही वे अपना भोजन करते हैं। वे भोजन करते समय बात नहीं करते, और गीले हाथों से (अर्थात् हाथ पोंछे बिना) सोने नहीं जाते। जब वे इनमें से किसी को देखते हैं तो आदर दिखाने के लिए उनकी प्रदक्षिणा करते हैं, प्रज्वलित अग्नि, बैल, देवप्रतिमा, गोशाला, चौराहा, और कोई वृद्ध तथा सदाचारी ब्राह्मण। वे स्वयं एक ओर खड़े होकर इन्हें मार्ग देते हैं, वृद्धों को, भार उठाए हुओं को, स्त्रियों को, ग्राम या नगर के शासन में उच्च पद धारण करने वालों को, ब्राह्मणों को, गायों को, और राजाओं को।

“सत्पुरुष वही है जो अपने अतिथियों, सेवकों और अन्य आश्रितों की, अपने सम्बन्धियों की, और उन सबकी रक्षा करता है जो उसकी शरण में आते हैं। ऐसा पुरुष सदा इनका शिष्टाचारपूर्ण कुशल-प्रश्नों से स्वागत करता है। देवताओं ने मनुष्यों के भोजन के लिए दो काल नियत किए हैं, प्रातः और सायं। इस बीच कुछ नहीं खाना चाहिए। भोजन का यह नियम पालने से ही मनुष्य उपवास का पालन करता कहलाता है। जैसे होम का समय आने पर पवित्र अग्नि आहुतियों की प्रतीक्षा करती है, वैसे ही ऋतुकाल बीत जाने पर स्त्री अपने पति से समागम की अपेक्षा रखती है। जो ऋतुकाल के पश्चात् ही अपनी पत्नी के पास जाता है, अन्य किसी समय नहीं, वह ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता कहलाता है।

“अमृत, ब्राह्मण और गायें, ये तीन समान माने जाते हैं। अतएव विधिपूर्वक सदा ब्राह्मणों और गायों की पूजा करनी चाहिए। यजुर्वेद के तन्त्रों की सहायता से यज्ञ में मारे गए पशुओं का मांस खाने से कोई दोष या कलंक नहीं लगता। पर पीठ की रीढ़ का मांस, अथवा यज्ञ में न मारे गए पशुओं का मांस, उसी प्रकार त्यागना चाहिए जैसे कोई अपने पुत्र का मांस त्यागता है। अपने अतिथि को कभी बिना भोजन के न जाने देना चाहिए, चाहे अपने देश में हो अथवा परदेश में।

समझने की कुंजी (दुहराव-धर्म और इसकी नैतिक जटिलता): भीष्म यज्ञ में विधिपूर्वक मारे गए पशु का मांस खाने को निर्दोष कहते हैं, पर रीढ़ का मांस और अयज्ञीय मांस वर्जित बताते हैं। यह वैदिक यज्ञ-व्यवस्था का अंग है, जिसे महाभारत बिना सपाटीकरण के ज्यों-का-त्यों रखता है।

“अपना अध्ययन पूरा करने पर अपने आचार्य को दक्षिणा अर्पित करनी चाहिए। आचार्य को देखकर श्रद्धा से उनका अभिनन्दन करना चाहिए, उनकी पूजा करनी चाहिए, और उन्हें आसन देना चाहिए। आचार्य की पूजा करने से मनुष्य अपनी आयु, यश और समृद्धि बढ़ाता है। वृद्धों की कभी निन्दा न करनी चाहिए, न उन्हें किसी काम पर भेजना चाहिए। जब कोई वृद्ध खड़ा हो तब कभी बैठना न चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य अपनी आयु की रक्षा करता है। किसी नग्न स्त्री अथवा नग्न पुरुष पर दृष्टि न डालनी चाहिए। एकान्त के अतिरिक्त कभी समागम न करना चाहिए। भोजन भी दूसरों के देखे बिना करना चाहिए।

“आचार्य तीर्थों में अग्रणी हैं; हृदय सब पवित्र वस्तुओं में अग्रणी है; ज्ञान खोजने योग्य सब वस्तुओं में अग्रणी है; और सन्तोष सब सुखों में अग्रणी है। प्रातः और सायं वृद्धों के गम्भीर उपदेश सुनने चाहिए। वर्षों से आदरणीय जनों की निरन्तर सेवा से मनुष्य प्रज्ञा पाता है। वेद पढ़ते अथवा भोजन करते समय दाहिने हाथ का प्रयोग करना चाहिए। अपनी वाणी और मन को, तथा अपनी इन्द्रियों को, सदा भली प्रकार वश में रखना चाहिए। भली प्रकार पके भात, यवक, कृसर और घी से अष्टका नामक श्राद्ध में पितरों और देवताओं की पूजा करनी चाहिए; ग्रहों की पूजा में भी यही अर्पित करना चाहिए। अपने ऊपर आशीर्वाद माँगे बिना क्षौर (हजामत) न कराना चाहिए। यदि कोई छींके तो उपस्थित जनों को उसे आशीर्वाद देना चाहिए। जो रोगी अथवा पीड़ित हैं उन्हें आशीर्वाद देना चाहिए और उनकी आयु-वृद्धि की प्रार्थना करनी चाहिए।

“किसी श्रेष्ठ पुरुष को ‘त्वम्’ शब्द से (अर्थात् अनादरपूर्वक) कभी सम्बोधित न करना चाहिए। बड़ी-से-बड़ी कठिनाई में भी ऐसा न करना चाहिए। ऐसे पुरुष को ‘त्वम्’ कहना और उसका वध करना समान है; विद्वान् पुरुष ऐसे सम्बोधन से अपमानित होते हैं। जो अपने से हीन हैं, अथवा समान हैं, अथवा शिष्य हैं, उनके लिए ऐसा शब्द प्रयुक्त किया जा सकता है।

समझने की कुंजी (आदर का व्याकरण): मूल पाठ में ही भीष्म ‘त्वम्’ (अनादर-सूचक एकवचन) से श्रेष्ठ का सम्बोधन वर्जित बताते हैं, उसे वध के समान कहते हैं। यह आदरयुक्त सम्बोधन की वही मर्यादा है जो इस कथा की पूरी वाणी में निभाई गई है।

“पापी मनुष्य का हृदय सदा उसके किए पापों की घोषणा करता रहता है। जो पुरुष जान-बूझकर पाप करते हैं, वे उन्हें सत्पुरुषों से छिपाने के यत्न में नष्ट हो जाते हैं। पक्के पापी अपने पाप-कर्मों को दूसरों से छिपाने का यत्न करते हैं; वे सोचते हैं कि उनके पापों का साक्षी न कोई मनुष्य है न देवता। अपने पापों से अभिभूत पापी एक दुखद योनि में जन्म लेता है। ऐसे पुरुष के पाप निरन्तर बढ़ते हैं, जैसे सूदखोर का ब्याज दिन-प्रतिदिन बढ़ता है। यदि कोई पाप करके उसे धर्म से ढकना चाहे, तो वह पाप नष्ट हो जाता है और अन्य पापों के स्थान पर धर्म की ओर ले जाता है। जैसे नमक पर जल डालने से वह तुरन्त घुल जाता है, वैसे ही प्रायश्चित्त करने पर पाप घुल जाता है। इसी से पाप को कभी छिपाना न चाहिए; छिपाने से वह बढ़ता ही है। पाप करके सत्पुरुषों के सम्मुख उसे स्वीकार कर लेना चाहिए; वे उसे तुरन्त नष्ट कर देंगे।

“यदि कोई आशा में संचित धन को उचित समय पर न भोगे, तो परिणाम यह होता है कि उस संचित धन का, संचय करने वाले की मृत्यु के पश्चात्, कोई दूसरा स्वामी हो जाता है। बुद्धिमानों ने कहा है कि हर प्राणी का मन ही धर्म की सच्ची कसौटी है। इसी से संसार के सब प्राणियों में धर्म को सिद्ध करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। धर्म को अकेले, एकल भाव से साधना चाहिए। अपने को धर्मात्मा घोषित कर, प्रदर्शन के लिए धर्म की पताका ऊँची उठाए हुए नहीं चलना चाहिए। जो धर्म के फल भोगने के लिए उसका पालन करते हैं, वे धर्म के व्यापारी कहे जाते हैं। अभिमान के भाव को स्थान दिए बिना देवताओं की आराधना करनी चाहिए। इसी प्रकार छल के बिना अपने आचार्य की सेवा करनी चाहिए। परलोक में अपने लिए अमूल्य धन का प्रबन्ध करना चाहिए, जो इस लोक में सुपात्रों को दिए गए दान से ही बनता है।”

सार: सत्पुरुष का दैनिक आचरण, अतिथि-सेवा, गुरु-पूजा, वृद्धों का आदर, इन्द्रिय-संयम, पवित्रता। पाप छिपाने से बढ़ता है, स्वीकार और प्रायश्चित्त से घुल जाता है। धर्म प्रदर्शन की वस्तु नहीं; दान ही परलोक का अमूल्य धन है।

धन, भाग्य और पुरुषार्थ का प्रश्न

युधिष्ठिर ने कहा, “देखा जाता है कि यदि कोई पुरुष अभागा हो, तो वह चाहे कितना ही बलवान् क्यों न हो, धन नहीं पा सकता। दूसरी ओर यदि कोई भाग्यवान् हो, तो वह दुर्बल अथवा मूर्ख होने पर भी धन पा लेता है। जब प्राप्ति का काल नहीं आया होता, तब अपने अत्यन्त प्रयत्न से भी कोई प्राप्ति नहीं कर पाता। पर जब प्राप्ति का काल आता है, तब बिना किसी प्रयत्न के महान् धन मिल जाता है। सैकड़ों मनुष्य ऐसे देखे जाते हैं जो अपना अत्यन्त श्रम करने पर भी कोई फल नहीं पाते; और बहुत-से ऐसे भी देखे जाते हैं जो बिना किसी श्रम के प्राप्ति कर लेते हैं।

“यदि धन श्रम का ही फल होता, तो श्रम से उसे तुरन्त पाया जा सकता। तब कोई विद्वान् अपनी जीविका के लिए किसी विद्याहीन की शरण न लेता दिखता। हे भरतश्रेष्ठ, मनुष्यों में जो प्राप्त होने को नियत नहीं, वह कभी प्राप्त नहीं होता। कोई धन को सैकड़ों उपायों से खोजता है (और फिर भी नहीं पाता), जब कि दूसरा बिना उसे खोजे ही उसके अधिकार में सुखी रहता है। कोई धन के लिए निरन्तर बुरे कर्म करता दिखता है और फिर भी उसे नहीं पाता; दूसरे बिना कोई बुरा कर्म किए धन भोगते हैं। और कुछ, जो शास्त्र द्वारा सौंपे गए कर्तव्यों का पालन करते हैं, वे धनहीन रहते हैं।

“कोई नीति और मोरल-शास्त्र के सब ग्रन्थ पढ़कर भी उस विद्या के ज्ञान से रहित दिखता है; दूसरा बिना नीति-शास्त्र पढ़े ही किसी राजा का प्रधानमन्त्री नियुक्त दिखता है। कोई विद्वान् धनवान् दिखता है, कोई विद्याहीन धन का स्वामी दिखता है, और दोनों ही प्रकार के मनुष्य कभी पूर्णतः धनहीन भी दिखते हैं। यदि विद्या पाने से ही धन का सुख मिलता, तो कोई विद्वान् अपनी जीविका के लिए किसी विद्याहीन की शरण में न जीता। यदि विद्या से सब इष्ट वस्तुएँ वैसे ही मिल जातीं जैसे प्यासे को जल मिलने पर उसकी प्यास बुझ जाती है, तो इस संसार में कोई विद्या पाने में आलस्य न दिखाता। यदि किसी का काल नहीं आया, तो वह सैकड़ों बाणों से बिंधने पर भी नहीं मरता; और यदि काल आ गया, तो घास के एक तिनके से चोट लगने पर भी प्राण त्याग देता है।”

भीष्म ने कहा, “यदि कोई महान् श्रम वाले कार्य में लगकर भी धन न कमा सके, तो उसे कठोर तपस्या करनी चाहिए। बीज बोए बिना कोई फसल नहीं उगती। इस जीवन में सुपात्रों को दान देने से ही मनुष्य अगले जीवन में अनेक भोग्य वस्तुएँ पाता है, जैसे वर्षों से आदरणीय जनों की सेवा से वह बुद्धि और प्रज्ञा पाता है। बुद्धिमानों ने कहा है कि सब प्राणियों के प्रति क्रूरता-त्याग के कर्तव्य का पालन करने से मनुष्य दीर्घायु होता है। अतएव दान देना चाहिए, और दूसरों से माँगना अथवा माँगने पर लेना नहीं चाहिए। जो धर्मात्मा पुरुष हैं उनकी पूजा करनी चाहिए। सबके प्रति मधुरभाषी रहना चाहिए और सदा वही करना चाहिए जो दूसरों को प्रिय हो। मन और बाहर, दोनों की पवित्रता पानी चाहिए। किसी प्राणी को कभी हानि न पहुँचाने में लगे रहना चाहिए। हे युधिष्ठिर, जब कीट और चींटी तक के सुख-दुख में उनके अपने कर्म (इस और पूर्व जन्मों के) और प्रकृति ही कारण हैं, तब उचित है कि आप शान्त रहें।”

सार: धन केवल श्रम से नहीं, काल और कर्म से भी मिलता है; विद्वान् भी धनहीन और मूर्ख धनवान् दिख सकते हैं। पर इससे निष्क्रियता नहीं, श्रम विफल हो तो तप करें, दान दें, अहिंसा साधें। हर प्राणी का सुख-दुख उसके अपने कर्म से बँधा है, अतः शान्त रहिए।

धर्म नित्य, काल अधिष्ठाता, और चार वर्णों का तत्त्व

भीष्म ने कहा, “यदि कोई स्वयं भले कर्म करे अथवा दूसरों से करवाए, तो उसे धर्म के फल की आशा रखनी चाहिए। इसी प्रकार यदि कोई स्वयं बुरे कर्म करे और दूसरों से करवाए, तो उसे धर्म के फल की आशा कभी न रखनी चाहिए। हर काल में काल ही सब प्राणियों की बुद्धि में प्रवेश कर उन्हें धर्म अथवा अधर्म के कर्मों में लगाता है, और फिर उन पर सुख अथवा दुख देता है। जब कोई पुरुष धर्म के फल देखकर धर्म को श्रेष्ठ समझता है, तभी वह धर्म की ओर झुकता और उसमें श्रद्धा रखता है। पर जिसकी बुद्धि दृढ़ नहीं, वह उसमें श्रद्धा नहीं रख पाता। धर्म में श्रद्धा रखना ही सब पुरुषों की प्रज्ञा का लक्षण है।

“जो दोनों को जानता है (अर्थात् क्या करना चाहिए और क्या नहीं), उसे अवसर देखकर सावधानी और भक्ति से वही करना चाहिए जो उचित है। जो धर्मात्मा इस जीवन में ऐश्वर्य से युक्त हुए हैं, वे अपनी इच्छा से चलकर अपनी आत्मा का विशेष ध्यान रखते हैं, जिससे अगले जन्मों में उन्हें रजोगुण-प्रधान पुरुषों के रूप में जन्म न लेना पड़े। काल, जो सब वस्तुओं का परम विधाता है, धर्म को कभी दुख का कारण नहीं बना सकता। इसी से जानना चाहिए कि जो आत्मा धर्मात्मा है, वह निश्चय पवित्र है, अर्थात् पाप और दुख के अंश से मुक्त है। अधर्म के विषय में कहा जा सकता है कि वह चाहे कितने ही बड़े परिमाण का हो, उस धर्म को छू भी नहीं सकता जो सदा काल से रक्षित है और प्रज्वलित अग्नि की भाँति प्रकाशमान है। धर्म से ये दो फल मिलते हैं, आत्मा की निर्मलता, और अधर्म से अछूते रहने की स्थिति। धर्म विजय से युक्त है। उसका तेज इतना महान् है कि वह तीनों लोकों को प्रकाशित करता है।

“कोई बुद्धिमान् किसी पापी को पकड़कर बलपूर्वक धर्मात्मा नहीं बना सकता। जब बलपूर्वक धर्म-आचरण को प्रेरित किया जाता है, तब पापी केवल भय से प्रेरित होकर पाखण्ड से आचरण करते हैं। शूद्रों में जो धर्मात्मा हैं, वे इस बहाने से ऐसे पाखण्ड का आश्रय कभी नहीं लेते कि शूद्रों को चारों विहित आश्रमों में से किसी के अनुसार जीने की अनुमति नहीं है। हम आपको विशेष रूप से बताते हैं कि चारों वर्णों के कर्तव्य वस्तुतः क्या हैं। जहाँ तक शरीर का सम्बन्ध है, चारों वर्णों के व्यक्तियों में पाँच ही प्रधान तत्त्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) घटक हैं। इस दृष्टि से वे सब एक ही द्रव्य के हैं। फिर भी उनमें भेद हैं, जीवन-व्यवहार और धर्म-कर्तव्य, दोनों के सम्बन्ध में। इन भेदों के होते हुए भी उन्हें इतनी कर्म-स्वतन्त्रता दी गई है कि सब व्यक्ति एक समान स्थिति को पा सकते हैं।

“धर्म के फल रूप जो सुख-लोक हैं, वे शाश्वत नहीं, क्योंकि वे अन्त को प्राप्त होने को नियत हैं। पर धर्म शाश्वत है। जब कारण शाश्वत है, तो फल शाश्वत क्यों नहीं? इसका उत्तर यह है, केवल वही धर्म शाश्वत है जो फल अथवा पुरस्कार की इच्छा से प्रेरित न हो। जो धर्म फल की इच्छा से प्रेरित है, वह शाश्वत नहीं। इसी से प्रथम प्रकार के धर्म से जुड़ा अनिच्छित फल, अर्थात् ब्रह्म के साथ तादात्म्य की प्राप्ति, शाश्वत है। पर फल की इच्छा से प्रेरित धर्म से जुड़ा फल, अर्थात् स्वर्ग, शाश्वत नहीं।

“सब मनुष्य अपने शारीरिक संगठन की दृष्टि से समान हैं। उन सबकी आत्माएँ भी अपने स्वभाव की दृष्टि से समान हैं। जब प्रलय आता है, तब और सब विलीन हो जाता है। जो शेष रहता है, वह धर्म साधने का प्रारम्भिक संकल्प है। वही (अगले जन्म में) स्वयं फिर प्रकट होता है। जब परिणाम ऐसा है, अर्थात् इस जीवन के भोग और सहन पूर्व जन्म के कर्मों से होते हैं, तब मनुष्यों में जो भाग्य की विषमता दिखती है, वह किसी प्रकार अनुचित नहीं ठहराई जा सकती। यही देखा जाता है कि मध्यवर्ती योनियों के प्राणी भी अपने कर्मों में उदाहरण के प्रभाव से समान रूप से बँधे रहते हैं।”

समझने की कुंजी (सकाम और निष्काम धर्म): फल की इच्छा से किया धर्म स्वर्ग देता है, पर स्वर्ग अनित्य है। इच्छा-रहित (निष्काम) धर्म ब्रह्म-तादात्म्य देता है, जो नित्य है। चारों वर्ण शरीर के पाँच भूतों में एक हैं; भेद केवल कर्तव्य-व्यवहार में, और मुक्ति का द्वार सबके लिए खुला है।

सार: काल ही प्राणियों को धर्म-अधर्म में लगाने वाला अधिष्ठाता है। धर्म प्रज्वलित अग्नि सा है, अधर्म उसे छू नहीं सकता। निष्काम धर्म का फल नित्य, सकाम का अनित्य। प्रलय में संकल्प-बीज ही बचता है और अगले जन्म में फूटता है, इसी से भाग्य की विषमता अन्यायपूर्ण नहीं।

पितामह का मौन, और युधिष्ठिर को नगर लौटने की अनुमति

इतना सुनकर जनमेजय ने वैशम्पायन से पूछा, जब कौरवों में श्रेष्ठ भीष्म उस शर-शय्या पर लेटे थे, और चारों ओर पाण्डव बैठे थे, तब मेरे महान बुद्धिमान प्रपितामह युधिष्ठिर ने धर्म के इन रहस्यों को सुना और उनके सब संशय हल हो गए। उन्होंने दान के विषय में भी सब विधान सुन लिए। अब, हे विद्वान ब्राह्मण, मुझे बताइए कि उस महान पाण्डव-राजा ने और क्या किया।

वैशम्पायन ने कहा, जब भीष्म मौन हुए, तब चारों ओर बैठे राजाओं का पूरा घेरा भी मौन हो गया। वे सब निश्चल बैठे रहे, मानो कैनवस पर चित्रित आकृतियाँ हों। तब सत्यवती के पुत्र व्यास ने क्षण-भर विचार कर गंगा-पुत्र भीष्म से कहा, हे राजन, कुरु-श्रेष्ठ युधिष्ठिर अपने सब भाइयों और अनुचरों सहित अपने स्वभाव में लौट आए हैं। महान बुद्धि वाले कृष्ण को साथ लेकर वे आपके सामने सिर झुकाते हैं। अब आप उन्हें नगर लौटने की अनुमति दें।

व्यास के इस वचन पर शान्तनु और गंगा के पुत्र भीष्म ने युधिष्ठिर और उनके मन्त्रियों को विदा दी। उन्होंने मधुर स्वर में अपने पौत्र से कहा, हे राजन, आप नगर लौट जाइए। आपके हृदय का ज्वर शान्त हो। आप ययाति की भाँति अन्न और धन के बड़े दानों से युक्त अनेक यज्ञों में देवताओं की आराधना कीजिए। क्षत्रिय-धर्म में स्थित होकर, हे पृथा-पुत्र, पितरों और देवताओं को तृप्त कीजिए। अपनी सब प्रजा को आश्वस्त कीजिए और सबमें शान्ति स्थापित कीजिए। अपने सब हितैषियों को यथायोग्य पुरस्कार से सम्मानित कीजिए। और जब इस संसार से मेरे प्रस्थान का समय आए, तब आप यहाँ आ जाइएगा। वह समय वही है जब सूर्य अपनी दक्षिण-यात्रा रोककर उत्तर की ओर लौटने लगेगा।

कुन्ती-पुत्र ने उत्तर दिया, ऐसा ही हो। और श्रद्धा से पितामह को प्रणाम कर, अपने सब बन्धुओं और अनुचरों के साथ, हाथी के नाम वाले उस नगर (हस्तिनापुर) की ओर चल पड़े। धृतराष्ट्र को आगे रखकर, और अपने स्वामी के प्रति अत्यन्त समर्पित गान्धारी को साथ लेकर, ऋषियों और केशव के साथ, नागरिकों और देश के निवासियों तथा मन्त्रियों सहित, कुरु-श्रेष्ठ युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर में प्रवेश किया।

नगर लौटकर युधिष्ठिर ने नागरिकों और प्रजा को सम्मानित कर अपने-अपने घर भेजा। जिन स्त्रियों ने युद्ध में अपने वीर पति और पुत्र खोए थे, उन्हें राजा ने प्रचुर धन देकर सान्त्वना दी। राज्य पाकर, महान बुद्धि वाले युधिष्ठिर ने स्वयं को विधिपूर्वक सिंहासन पर स्थापित कराया, और अनेक सद्-कर्मों से सब प्रजा को आश्वस्त किया। उन्होंने ब्राह्मणों, प्रमुख सेनापतियों और प्रमुख नागरिकों का सारभूत आशीर्वाद पाने का यत्न किया।

सार: पितामह के मौन होते ही पूरी सभा चित्रवत् स्तब्ध हो गई। व्यास के कहने पर भीष्म ने युधिष्ठिर को हस्तिनापुर लौटने और राज्य सँभालने की अनुमति दी, और कहा कि उत्तरायण के आरम्भ पर वे लौट आएँ, वही उनके प्रस्थान का समय है। युधिष्ठिर ने राज-काज सँभाला और प्रजा को आश्वस्त किया।

उत्तरायण आ गया: युधिष्ठिर का अन्तिम आगमन

नगर में पचास रातें बिताकर, धन्य राजा युधिष्ठिर ने वह समय स्मरण किया जिसे पितामह ने अपने प्रस्थान की घड़ी बताया था। कुछ पुरोहितों को साथ लेकर वे हस्तिनापुर से निकले, यह देखकर कि सूर्य अब दक्षिण जाना छोड़कर उत्तर की ओर बढ़ने लगा है।

कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर अपने साथ भीष्म के शरीर के दाह-संस्कार के लिए बहुत-सा घृत, पुष्प-मालाएँ, सुगन्ध, रेशमी वस्त्र, उत्तम चन्दन, अगुरु और गहरे रंग की कृष्ण-काष्ठ ले गए। अनेक प्रकार की मूल्यवान मालाएँ और रत्न भी इस सामग्री में थे। धृतराष्ट्र को आगे रखकर, और गुणों से विख्यात रानी गान्धारी तथा अपनी माता कुन्ती और सब भाइयों को साथ लेकर, महान बुद्धि वाले युधिष्ठिर, कृष्ण और महान विद्वान विदुर के साथ, युयुत्सु और युयुधान (सात्यकि) सहित, और अपने अन्य बन्धुओं तथा अनुचरों के बड़े समूह के साथ आगे बढ़े; मार्ग में स्तुति-पाठक और बन्दी उनकी कीर्ति गाते जा रहे थे। भीष्म की यज्ञ-अग्नियाँ भी इस यात्रा में आगे-आगे ले जाई जा रही थीं। इस प्रकार वह राजा अपने नगर से ऐसे निकले मानो दूसरे देवराज इन्द्र हों।

शीघ्र ही वे उस स्थान पर पहुँचे जहाँ शान्तनु-पुत्र अब भी अपनी बाण-शय्या पर लेटे थे। उन्होंने देखा कि उनके पितामह की सेवा में पराशर-पुत्र व्यास, नारद, देवल और असित बैठे हैं, और देश के विभिन्न भागों से आए हुए बचे-खुचे राजा भी वहाँ हैं। राजा ने देखा कि उनके महान-आत्मा पितामह, अपनी वीर-शय्या पर लेटे, चारों ओर इस कार्य के लिए नियुक्त योद्धाओं से रक्षित हैं। रथ से उतरकर, राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित अपने पितामह को प्रणाम किया, और व्यास आदि ऋषियों को भी प्रणाम किया; उन सबने भी बदले में उनका अभिवादन किया।

फिर अपने भाइयों के साथ, धर्मराज युधिष्ठिर ने उस कुरु-श्रेष्ठ गंगा-पुत्र को, जो उस शय्या पर लेटे थे, सम्बोधित किया, हे राजन, मैं युधिष्ठिर हूँ! आपको प्रणाम, हे जाह्नवी (गंगा) के पुत्र! यदि अब भी आप मुझे सुनते हैं, तो कहिए मैं आपके लिए क्या करूँ। आपकी यज्ञ-अग्नियाँ साथ लेकर, हे राजन, मैं यहाँ आया हूँ और आपके बताए समय पर आपकी सेवा में उपस्थित हूँ। सब विद्या-शाखाओं के आचार्य, ब्राह्मण, ऋत्विक, मेरे सब भाई, आपके पुत्र महान तेजस्वी धृतराष्ट्र, मेरे मन्त्री, और महान पराक्रमी वासुदेव, सब यहाँ हैं। बचे हुए योद्धा और कुरुजांगल के सब निवासी भी यहाँ हैं। नेत्र खोलकर, हे कुरु-श्रेष्ठ, इन्हें देखिए। इस अवसर पर जो भी करना था, सब मैंने व्यवस्थित कर रखा है।

कुन्ती के महान बुद्धिमान पुत्र के इस प्रकार सम्बोधित किए जाने पर, गंगा-पुत्र ने नेत्र खोले और चारों ओर खड़े सब भरतवंशियों को देखा। तब महाबली भीष्म ने युधिष्ठिर का दृढ़ हाथ पकड़कर मेघ-गम्भीर स्वर में कहा।

समझने की कुंजी, दाह-सामग्री: युधिष्ठिर जो सामग्री लाए वह सब अन्त्येष्टि की थी, घृत (अग्नि-संस्कार के लिए), चन्दन, अगुरु और कृष्ण-काष्ठ (सुगन्धित चिता-काष्ठ), रेशमी वस्त्र और मालाएँ। यह स्पष्ट संकेत था कि अब प्रस्थान की घड़ी आ गई है, और युधिष्ठिर पूरी तैयारी के साथ आए हैं।

सार: पचास रातें बीतने पर युधिष्ठिर ने उत्तरायण का आरम्भ देखा और दाह-सामग्री लेकर, पूरे परिवार और कृष्ण के साथ, कुरुक्षेत्र लौटे। पितामह को प्रणाम कर उन्होंने अपना आगमन और सारी व्यवस्था निवेदित की। भीष्म ने नेत्र खोलकर उनका हाथ थामा।

पितामह के अन्तिम वचन: धृतराष्ट्र, कृष्ण और सब को

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा, सौभाग्य से, हे कुन्ती-पुत्र, आप अपने सब मन्त्रियों सहित यहाँ आ गए, हे युधिष्ठिर! सहस्र-रश्मि वाले दिन के स्रष्टा, पवित्र सूर्य ने अपना उत्तरायण-पथ आरम्भ कर दिया है। मैं यहाँ अपनी इस शय्या पर अट्ठावन रातों से लेटा हूँ। इन तीखे नोक वाले बाणों पर पड़े-पड़े मुझे यह अवधि एक शताब्दी-सी लम्बी लगी है। हे युधिष्ठिर, माघ का चान्द्र मास आ गया है। यह शुक्ल पक्ष है, और मेरी गणना से इसका चौथा भाग अब तक बीत चुका होगा।

भीष्म के देह से तेज की धारा आकाश की ओर उठती, पास हाथ जोड़े युधिष्ठिर और कृष्ण बैठे।

यह कहकर गंगा-पुत्र भीष्म ने धृतराष्ट्र को प्रणाम कर उनसे कहा, हे राजन, आप धर्मों के ज्ञाता हैं। अर्थ-शास्त्र सम्बन्धी आपके सब संशय अच्छी तरह हल हो चुके हैं। आपने अनेक महान विद्वान ब्राह्मणों की सेवा की है। वेदों से जुड़े सूक्ष्म शास्त्र, धर्म के सब कर्तव्य, और चारों वेद आपको भली-भाँति ज्ञात हैं। इसलिए, हे कुरु-नन्दन, आप शोक न कीजिए। जो पूर्व-निर्धारित था वही हुआ है; अन्यथा हो ही नहीं सकता था। युधिष्ठिर और उसके भाई जैसे पाण्डु के पुत्र हैं, वैसे ही धर्म से आपके भी पुत्र हैं। धर्म के कर्तव्यों में स्थित होकर आप उनका पालन और रक्षण कीजिए। वे भी अपने बड़ों की सेवा में सदा तत्पर हैं। धर्मराज युधिष्ठिर शुद्ध-आत्मा हैं; वे सदा आपके आज्ञाकारी रहेंगे। आपके अपने पुत्र दुष्ट-आत्मा थे, क्रोध और लोभ के दास, ईर्ष्या से भरे, दुराचारी। उनके लिए आपको शोक करना उचित नहीं।

कृष्ण हथेली उठाकर भीष्म को आशीर्वाद देते, आकाश में दिव्य रथ और देवगण प्रकट होते।

इतना धृतराष्ट्र से कहकर, कुरु-वीर ने महाबाहु वासुदेव को सम्बोधित किया, हे पवित्र, हे देवों के देव, हे समस्त देवों और असुरों से पूजित, हे तीनों लोकों को तीन पगों से नापने वाले, आपको प्रणाम, हे शंख-चक्र-गदा के धारी! आप वासुदेव हैं, आप स्वर्ण-शरीर हैं, आप एक पुरुष हैं, आप सृष्टिकर्ता हैं, आप विशाल हैं। आप जीव हैं, आप सूक्ष्म हैं, आप परम और नित्य आत्मा हैं। हे कमल-नयन, मुझे उबारिए, हे समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ! हे कृष्ण, मुझे इस संसार से प्रस्थान की अनुमति दीजिए, हे परम-आनन्द-स्वरूप! पाण्डु के पुत्रों की रक्षा सदा आप ही करें; आप ही उनके एकमात्र आश्रय हैं।

युधिष्ठिर हाथ जोड़कर भीष्म से अंतिम उपदेश ग्रहण करते, साथ बैठे कृष्ण, तट पर रथ और सेना।

पितामह ने आगे कहा, पहले मैंने मूर्ख, दुर्बुद्धि दुर्योधन से कहा था कि जहाँ कृष्ण हैं वहाँ धर्म है, और जहाँ धर्म है वहाँ विजय है। मैंने उसे बार-बार समझाया कि वासुदेव को आश्रय बनाकर वह पाण्डवों से सन्धि कर ले, और यही सन्धि का परम उपयुक्त समय है। पर उस दुर्बुद्धि दुर्योधन ने मेरी बात नहीं मानी; पृथ्वी पर महान संहार कराकर अन्ततः उसने स्वयं भी अपने प्राण त्याग दिए। हे कृष्ण, मैं आपको वह प्राचीन और श्रेष्ठ ऋषि जानता हूँ जो बदरी के आश्रम में नर के साथ अनेक वर्ष रहे। देवर्षि नारद ने मुझे यह बताया, और कठोर तपस्वी व्यास ने भी; कि आप और अर्जुन मनुष्यों के बीच जन्मे वही प्राचीन ऋषि नारायण और नर हैं। हे कृष्ण, मुझे अनुमति दीजिए; मैं अपना शरीर त्यागूँ। आपकी अनुमति पाकर मैं परम गति को प्राप्त करूँगा।

संध्या के तारों भरे आकाश में भीष्म के देह से प्रकाश की धारा तारे की ओर उठती।

वासुदेव ने कहा, हे भीष्म, मैं आपको अनुमति देता हूँ! हे राजन, आप वसुओं के पद को प्राप्त हों, हे महान तेजस्वी; आपने इस संसार में एक भी अपराध नहीं किया। हे राजर्षि, आप अपने पिता के प्रति समर्पित रहे; इसीलिए आप दूसरे मार्कण्डेय के समान हैं। यही कारण है कि मृत्यु आपके अधीन है, मानो वह आपकी इच्छा की प्रतीक्षा में खड़ा सेवक हो।

यह सुनकर गंगा-पुत्र ने एक बार फिर धृतराष्ट्र-सहित पाण्डवों और अपने अन्य मित्रों तथा हितैषियों को सम्बोधित किया, मैं अपने प्राण त्यागना चाहता हूँ। आप सब मुझे अनुमति दें। आप सत्य के लिए यत्न करें; सत्य ही परम बल है। आप सदा उन ब्राह्मणों के साथ रहें जो सदाचारी हैं, तप में लगे हैं, क्रूरता से दूर रहते हैं, और जिनकी आत्मा वश में है। इतना कहकर, और सबको हृदय से लगाकर, बुद्धिमान भीष्म ने एक बार फिर युधिष्ठिर से कहा, हे राजन, सब ब्राह्मण, विशेषकर वे जो ज्ञान से सम्पन्न हैं, जो आचार्य हैं, जो यज्ञ में सहायक पुरोहित हैं, आपके लिए सदा पूजनीय रहें।

विदा की घड़ी में भीष्म राजकुमार को गले लगाते, पास खड़े कृष्ण करुणा भरी दृष्टि से देखते।

समझने की कुंजी, माघ शुक्ल पक्ष: भीष्म ने अपने प्रस्थान का ठीक काल बताया, माघ मास, शुक्ल पक्ष, जिसका चौथा भाग बीत चुका था, और सूर्य उत्तरायण में प्रवेश कर चुका था। अट्ठावन रातों की उनकी प्रतीक्षा इसी पवित्र मोड़ के लिए थी।

एक उप-कथा: भीष्म का “मृत्यु आपके अधीन है” वाला वरदान कोई कवि-कल्पना नहीं, यह उनके पिता शान्तनु का दिया वर था, कि भीष्म तभी मरेंगे जब स्वयं चाहेंगे। इसीलिए वे शर-शय्या पर इतने दिन ठहर सके। कृष्ण इस अधिकार को उनकी पितृ-भक्ति से जोड़ते हैं, और उसी भक्ति के कारण उन्हें “दूसरा मार्कण्डेय” कहते हैं, जो चिर-जीवी ऋषि माने जाते हैं। पितृ-भक्ति का यही प्रतिफल था।

सार: भीष्म ने उत्तरायण का आगमन और माघ शुक्ल पक्ष का काल घोषित किया। उन्होंने धृतराष्ट्र को शोक न करने और पाण्डवों को पुत्रवत् पालने को कहा, कृष्ण को नर-नारायण के रूप में पहचानकर देह-त्याग की अनुमति माँगी, और कृष्ण ने उन्हें वसु-पद की प्राप्ति का आशीर्वाद देकर अनुमति दी। फिर सब से विदा लेते हुए उन्होंने सत्य और ब्राह्मण-सेवा का अन्तिम उपदेश दिया।

पितामह का देह-त्याग: प्राणों का ऊर्ध्व-प्रस्थान

वैशम्पायन ने कहा, सब कुरुओं से ऐसा कहकर, शान्तनु के पुत्र भीष्म कुछ समय के लिए मौन हो गए, हे शत्रु-दमन! फिर उन्होंने अपने प्राणों को क्रम से शरीर के उन्हीं स्थानों पर रोका जो योग में बताए गए हैं। उस महान-आत्मा के प्राण, विधिपूर्वक रोके जाकर, ऊपर उठने लगे। शान्तनु-पुत्र के शरीर के जिन-जिन भागों से, योग के बल पर, प्राण ऊपर उठते गए, वे भाग एक-एक करके पीड़ा-रहित होते गए, और वहाँ जो बाण धँसे थे, वे भी मानो हटते गए।

व्यास आदि महान ऋषियों सहित उन सब उच्च-आत्मा जनों के बीच, यह दृश्य अद्भुत था, हे राजन। थोड़ी ही देर में भीष्म का सारा शरीर बाण-रहित और पीड़ा-रहित हो गया। यह देखकर वासुदेव आदि सब विशिष्ट जन और व्यास आदि सब तपस्वी विस्मय से भर उठे। रोके गए, और किसी द्वार से निकलने में असमर्थ प्राण, अन्ततः मस्तक के मुकुट-भाग (ब्रह्मरन्ध्र) को भेदकर ऊपर स्वर्ग की ओर बढ़े।

उसी क्षण आकाश में देवताओं के दुन्दुभि (नगाड़े) बज उठे, और पुष्पों की वर्षा होने लगी। सिद्ध और ऋषि आनन्द से भरकर “साधु, साधु!” पुकार उठे। भीष्म के प्राण, मस्तक के मुकुट-भाग को भेदकर, एक बड़े उल्का-पिण्ड की भाँति आकाश में ऊपर शूट हुए और शीघ्र ही अदृश्य हो गए। इसी प्रकार, हे महान राजन, शान्तनु-पुत्र, भरतवंश के उस स्तम्भ ने स्वयं को अनन्त (नित्यता) में मिला लिया।

भीष्म के महाप्रयाण के बाद युधिष्ठिर तट पर उदास खड़े, बादलों में भीष्म की छवि उभरती।
दिव्य प्रकाश में नहाए भीष्म शरशय्या पर बांहें खोले लेटे, चारों ओर शोकमग्न परिजन और ऋषि खड़े।

समझने की कुंजी, योग-मरण: भीष्म की मृत्यु साधारण मृत्यु नहीं, योग-मरण है। प्राणों को इन्द्रियों के सब द्वारों (नेत्र, कर्ण, नासिका आदि) से समेटकर, योगी उन्हें ब्रह्मरन्ध्र (सिर के ऊपरी छिद्र) से बाहर निकालता है। यही ऊर्ध्व-गति उत्तरायण के “प्रकाश के मार्ग” से जुड़ती है, जिसका संकेत पितामह ने दीप-दान के प्रसंग में स्वयं दिया था।

सार: भीष्म ने योग-विधि से प्राणों को रोककर ऊपर चढ़ाया; जैसे-जैसे प्राण उठते गए, शरीर के अंग बाण-रहित और पीड़ा-रहित होते गए। अन्ततः प्राण ब्रह्मरन्ध्र भेदकर उल्का-से आकाश में लीन हो गए। देव-दुन्दुभि और पुष्प-वर्षा के बीच भरतवंश का वह स्तम्भ नित्यता में मिल गया।

अन्त्येष्टि, गंगा का विलाप, और कृष्ण की सान्त्वना

तब महान-आत्मा पाण्डवों और विदुर ने बहुत-सी लकड़ी और अनेक प्रकार के सुगन्धित द्रव्य लेकर एक चिता बनाई। युयुत्सु आदि इन तैयारियों के साक्षी बनकर खड़े रहे। फिर युधिष्ठिर और महान-आत्मा विदुर ने भीष्म के शरीर को रेशमी वस्त्र और पुष्प-मालाओं से ढका। युयुत्सु ने उस पर एक उत्तम छत्र तान रखा। भीमसेन और अर्जुन, दोनों ने हाथों में शुद्ध श्वेत चँवरों की जोड़ी ले रखी। माद्री के दोनों पुत्रों (नकुल-सहदेव) ने हाथों में दो शिरस्त्राण (मुकुट) ले रखे। युधिष्ठिर और धृतराष्ट्र कुरु-स्वामी के चरणों के पास खड़े थे; ताड़-पत्र के पंखे उठाकर, सब उस शरीर के चारों ओर खड़े होकर उसे धीरे-धीरे झलने लगे।

पाण्डव भीष्म का अलंकृत पार्थिव शरीर चन्दन की चिता पर रखते हैं; पीछे कृष्ण और नेत्रहीन धृतराष्ट्र खड़े हैं।
अपने गिरे हुए पुत्र भीष्म के शोक में नदी से उठती देवी गंगा जल-तर्पण देती हुई, और पास खड़े साँवले नीले कृष्ण सान्त्वना के वचन कहते हुए

तब महान-आत्मा भीष्म का पितृ-यज्ञ (अन्त्येष्टि-कर्म) विधिपूर्वक सम्पन्न हुआ। पवित्र अग्नि में अनेक आहुतियाँ डाली गईं। सामगान गाने वालों ने अनेक साम गाए। फिर गंगा-पुत्र के शरीर को चन्दन, कृष्ण-अगुरु, छाल-काष्ठ और अन्य सुगन्धित ईंधन से ढककर उसमें अग्नि लगाई गई। धृतराष्ट्र आदि सब कुरु उस चिता के दाहिनी ओर खड़े रहे। इस प्रकार गंगा-पुत्र के शरीर का दाह करके, कुरु-श्रेष्ठ जन ऋषियों के साथ पवित्र भागीरथी की ओर चले।

उनके पीछे व्यास, नारद, असित, कृष्ण, भरतवंश की स्त्रियाँ, और हस्तिनापुर के वे नागरिक चले जो वहाँ आए थे। सबने उस पवित्र नदी पर पहुँचकर महान-आत्मा गंगा-पुत्र को विधिपूर्वक जल की अंजलि अर्पित की। जब वे अपने पुत्र को जल-तर्पण कर चुके, तब देवी भागीरथी जल-धारा से ऊपर उठीं, रोती हुई और शोक से विह्वल।

नदी से प्रकट शोकाकुल गंगा बाणशय्या पर लेटे भीष्म की ओर बांहें फैलातीं, पास कृष्ण और राजागण।

विलाप करती हुई गंगा ने कुरुओं को सम्बोधित किया, हे निष्पाप जनो, मेरी बात सुनिए, जो मैं अपने पुत्र के विषय में कहती हूँ। राजोचित आचरण और स्वभाव वाला, बुद्धि और उच्च कुल से सम्पन्न मेरा पुत्र अपने वंश के सब बड़ों का हितैषी था। वह अपने पिता के प्रति समर्पित और उच्च व्रतों वाला था। उसे जमदग्नि-पुत्र राम (परशुराम) भी अपने दिव्य महान-तेज अस्त्रों से नहीं हरा सके। हाय, वह वीर शिखण्डी से मारा गया! हे राजाओं, निःसन्देह मेरा हृदय वज्र का बना है, जो उस पुत्र के अपनी आँखों से ओझल हो जाने पर भी नहीं फटता! काशी के स्वयंवर में उसने अकेले, एक ही रथ पर, एकत्र क्षत्रियों को हराकर तीन राजकुमारियों को (अपने सौतेले भाई विचित्रवीर्य के लिए) हरण किया था। पृथ्वी पर बल में उसकी बराबरी का कोई न था। हाय, अपने उस पुत्र का शिखण्डी द्वारा वध सुनकर भी मेरा हृदय नहीं फटता!

नदी की उस देवी को इस प्रकार विलाप करते सुनकर महाबली कृष्ण ने अनेक सान्त्वना-वचनों से उन्हें ढाढ़स दिया। कृष्ण ने कहा, हे सौम्ये, धीरज धरिए। शोक के वश न हों, हे सुन्दर मुख वाली! निःसन्देह आपका पुत्र परम सुख के लोक में गया है। वह महान तेजस्वी वसुओं में से एक था। एक शाप के कारण, हे सुन्दरी, उसे मनुष्यों के बीच जन्म लेना पड़ा। उसके लिए शोक करना आपको उचित नहीं। क्षत्रिय-धर्म के अनुसार वह युद्ध में लड़ते हुए धनंजय (अर्जुन) द्वारा मारा गया; हे देवी, वह शिखण्डी द्वारा नहीं मारा गया। जब वह धनुष ताने खड़ा था, तब स्वयं देवराज भी उसे युद्ध में नहीं मार सकते थे। हे सुन्दर मुख वाली, आपका पुत्र सुखपूर्वक स्वर्ग गया है। एकत्र सब देवता मिलकर भी उसे युद्ध में नहीं मार सकते थे। इसलिए, हे देवी गंगा, उस कुरु-वंशी पुत्र के लिए शोक न कीजिए। वह वसुओं में से एक था, हे देवी! आपका पुत्र स्वर्ग गया है। आपके हृदय का ज्वर शान्त हो।

कृष्ण और व्यास के इस प्रकार सम्बोधित करने पर, सब नदियों में श्रेष्ठ वह देवी अपना शोक त्यागकर समभाव में लौट आईं, हे महान राजन। वहाँ उपस्थित सब राजाओं ने, कृष्ण को आगे रखकर, हे राजन, उस देवी का विधिपूर्वक सम्मान किया और उनकी अनुमति पाकर उनके तटों से विदा ली। इस प्रकार अनुशासन पर्व का समापन होता है।

कृष्ण जल में बैठी रोती गंगा के सिर पर हाथ रखकर सांत्वना देते, पीछे भीष्म का पार्थिव शरीर।

एक उप-कथा: गंगा का विलाप और कृष्ण का उत्तर महाभारत की उस नैतिक परत को खोलता है जो छिपाई नहीं जाती। माता को सान्त्वना देने के लिए कृष्ण एक कठोर सत्य बोलते हैं, कि भीष्म वास्तव में शिखण्डी से नहीं, अर्जुन के बाणों से मारे गए, क्योंकि शिखण्डी तो केवल आड़ था। यह वही उपाय था जिससे अर्जुन ने उस अजेय योद्धा को गिराया था, जिसे देवराज भी सम्मुख-युद्ध में नहीं हरा सकते थे। कथा इस तीखे प्रसंग को मधुर नहीं करती, उसे स्पष्ट रखती है।

समझने की कुंजी, वसुओं में से एक: कथा बार-बार दोहराती है कि भीष्म आठ वसुओं में से एक थे, जिन्हें एक शाप के कारण मनुष्य-जन्म लेना पड़ा। इसीलिए कृष्ण उन्हें “वसु-पद की प्राप्ति” का आशीर्वाद देते हैं, और गंगा को आश्वस्त करते हैं कि उनका पुत्र अपने मूल दिव्य स्थान को लौट गया है।

सार: पाण्डवों ने भीष्म का शरीर वस्त्र-माला से ढककर, छत्र-चँवर के साथ, विधिपूर्वक चिता पर दाह किया। भागीरथी पर तर्पण के समय गंगा शोक-विह्वल होकर ऊपर उठीं और शिखण्डी द्वारा पुत्र-वध पर विलाप किया। कृष्ण ने उन्हें यह कठोर सत्य कहकर ढाढ़स दिया कि भीष्म वस्तुतः अर्जुन के बाणों से गिरे, वसु-पद को लौट गए, और शोक का कारण नहीं। यहीं अनुशासन पर्व पूर्ण होता है।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), अनुशासन पर्व, दानधर्म उपपर्व, अध्याय 1-168; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।

आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)