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शक्तिपीठों की उत्पत्ति

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हिमालय की तलहटी में दक्ष और सनकादि मुनि एक लाख वर्षों तक माया-बीज मन्त्र का जप करते रहे। इतने घोर तप से प्रसन्न होकर परमशक्ति भगवती ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उनके चार हाथों में पाश, अंकुश, वर और अभय की मुद्रा सुशोभित थी, तीन नेत्र थे, और उनका विग्रह सत्, चित् तथा आनन्द से परिपूर्ण था। करुणा से भरी उस जगद्धात्री ने कोयल-सी मधुर वाणी में कहा कि हे भाग्यशाली मुनियो, वर माँगिए। मुनियों ने प्रार्थना की कि शंकर और विष्णु का शरीर फिर स्वस्थ हो जाए और उन्हें उनकी पूर्व शक्तियाँ लौट आएँ; क्योंकि अपनी ही शक्तियों गौरी और लक्ष्मी का अपमान कर बैठने के कारण वे दोनों देव निस्तेज और विक्षिप्त हो गए थे।

तब दक्ष ने हाथ जोड़कर विनती की कि हे अम्ब, आप मेरे कुल में जन्म लीजिए, जिससे मैं कृतकृत्य हो जाऊँ; और अपने जप, ध्यान तथा निवास-स्थानों का रहस्य भी अपने ही मुख से कह दीजिए। भगवती ने आश्वासन दिया कि उनकी लेशमात्र कृपा से दोनों देव स्वस्थ हो जाएँगे, और उनकी दो शक्तियाँ गौरी तथा लक्ष्मी दक्ष के घर और क्षीरसागर में जन्म लेकर फिर उन्हीं देवों को प्राप्त होंगी। माया-बीज ही उनका प्रधान मन्त्र है और समस्त जगत् ही उनका निवास-स्थान है, यह कहकर मणिद्वीप में विराजनेवाली देवी अन्तर्धान हो गईं।

कुछ काल बीता, और दक्ष के भवन में एक महान् शक्ति-सम्पन्न तेज प्रकट हुआ। तीनों लोकों में उत्सव मनाया गया, देवता प्रसन्न होकर पुष्प बरसाने और दुन्दुभियाँ बजाने लगे, नदियाँ स्वच्छ धारा में बहने लगीं और भगवान् सूर्य मनोहर प्रभा से भर उठे; सब ओर मंगल ही मंगल छा गया। सत्य-स्वरूपा तथा ब्रह्म-स्वरूपिणी होने के कारण दक्ष ने उस कन्या का नाम सती रखा और उन्हें शिव को समर्पित कर दिया, क्योंकि वे पूर्व में भी शिव की ही शक्ति थीं।

दुर्वासा की माला और दक्ष का द्वेष

किन्तु इसी मंगल के भीतर अनर्थ का बीज पड़ चुका था। हुआ यों कि किसी समय ऋषि दुर्वासा जाम्बूनदेश्वरी भगवती के समीप गए और वहीं माया-बीज मन्त्र का जप करने लगे। देवी प्रसन्न हुईं और अपने गले में पड़ी वह दिव्य माला, जिस पर पराग से मतवाले भौंरे मँडरा रहे थे, प्रसाद-रूप में मुनि को दे दी। दुर्वासा ने सिर झुकाकर उसे ग्रहण किया और आकाश-मार्ग से चल पड़े। मार्ग में जहाँ सती के पिता दक्ष विराजमान थे, वहाँ पहुँचकर उन्होंने सती के चरणों में नमन किया। दक्ष ने पूछा कि हे नाथ, यह अलौकिक माला किसकी है; पृथ्वी पर मनुष्यों के लिए तो ऐसी माला अत्यन्त दुर्लभ है, आपने इसे कैसे प्राप्त किया। मुनि ने प्रेम से गद्गद होकर कहा कि यह भगवती का अनुपम प्रसाद है। तब दक्ष ने वह माला माँग ली, और यह सोचकर कि तीनों लोकों में देवी-भक्त को न देने योग्य कोई वस्तु नहीं, मुनि ने वह माला उन्हें सौंप दी।

दक्ष ने सिर झुकाकर माला ली, पर उसे उसी शयन-कक्ष में रख दिया जहाँ पति-पत्नी की सुन्दर शय्या थी। रात में उस माला की सुगन्ध से मत्त होकर दक्ष पशु-कर्म में प्रवृत्त हुए। भगवती के प्रसाद का यही अनादर उनके पतन का मूल बना; उसी पाप के प्रभाव से वे कल्याणकारी दक्ष शंकर तथा देवी सती के प्रति द्वेष-बुद्धिवाले हो गए।

सतीधर्म और शिव का शोक

उसी अपराध के परिणाम-स्वरूप, सतीधर्म को प्रकट करने के लिए, सती ने दक्ष से उत्पन्न अपने उसी शरीर को योगाग्नि से भस्म कर दिया; और फिर वही ज्योति हिमालय के घर में प्रकट हुई। सती के इस दाह से तीनों लोकों में मानो प्रलय उतर आया। शिव के कोप की अग्नि से वीरभद्र प्रकट हुए, और भद्रकाली तथा गणों को साथ लेकर वे संसार का नाश करने पर उतर आए। तब ब्रह्मा आदि देवता शंकर की शरण में गए। सर्वस्व का नाश हो जाने पर भी करुणानिधि शिव ने उन्हें अभय दिया और बकरे का सिर जोड़कर दक्ष प्रजापति को पुनः जीवित कर दिया।

किन्तु शिव का शोक शान्त न हुआ। यज्ञ-स्थल पर पहुँचकर वे अत्यन्त दुखी होकर विलाप करने लगे। अग्नि में जलते हुए सती के चिन्मय शरीर को देखकर हा सती, हा सती पुकारते हुए उन्होंने उस देह को अपने कन्धे पर उठा लिया, और भ्रमित-चित्त होकर देश-देश में भटकने लगे।

विष्णु के बाण और पीठों का जन्म

शिव की इस दशा से ब्रह्मा आदि देवता अत्यन्त चिन्तित हो उठे। तब विष्णु ने शीघ्रता से धनुष उठाकर अपने बाणों से सती के अंगों को काट डाला। वे अंग जिस-जिस स्थान पर गिरे, उन-उन स्थानों पर भगवान् शंकर अनेक विग्रह धारण करके प्रकट हो गए। जिस-जिस भूमि पर देवी का एक-एक अंग गिरा, वहीं एक-एक शक्तिपीठ जन्म ले उठा। अन्य परम्पराओं में विष्णु सुदर्शन-चक्र से सती के शरीर को इक्यावन खण्डों में काटते हैं, किन्तु इस देवीभागवत में वे धनुष-बाण से अंगों का छेदन करते हैं और पीठों की संख्या एक सौ आठ बतायी गयी है।

इसके पश्चात् शिव ने देवताओं से कहा कि जो लोग इन स्थानों पर महान् श्रद्धा के साथ भगवती की आराधना करेंगे, उनके लिए कुछ भी दुर्लभ न रहेगा, क्योंकि इन स्थानों पर साक्षात् भगवती पराम्बा अपने अंगों में सदा निहित रहती हैं; और यहाँ जो पुरश्चरण करेगा, उसका मन्त्र, विशेषकर माया-बीज मन्त्र, अवश्य सिद्ध हो जाएगा। इतना कहकर सती के विरह से अधीर शिव उन्हीं स्थानों में जप, ध्यान और समाधि में लीन होकर समय बिताने लगे।

एक सौ आठ पीठ और उनकी देवियाँ

जनमेजय के पूछने पर व्यास जी ने उन सिद्धपीठों और वहाँ विराजमान देवियों के नाम बताए, जिनके श्रवण-मात्र से मनुष्य पापरहित हो जाता है। वाराणसी में वे विशालाक्षी हैं और नैमिषारण्य में लिङ्गधारिणी। प्रयाग में उनका नाम ललिता है, गन्धमादन पर्वत पर कामुकी, दक्षिण मानसरोवर में कुमुदा और उत्तर में विश्वकामा। हस्तिनापुर में वे जयन्ती हैं, कान्यकुब्ज में गौरी, पुष्कर में पुरुहूता और केदार में सन्मार्गदायिनी। गोकर्ण में वे भद्रकर्णिका कहलाती हैं, स्थानेश्वर में भवानी, श्रीशैल में माधवी और गया में मंगला। पुरुषोत्तम-क्षेत्र में वे विमला हैं, कमलालय में कमला, कालंजर में काली और चित्रकूट में सीता।

विन्ध्याचल पर वे विन्ध्यवासिनी हैं, करवीर में महालक्ष्मी, महाकाल में महेश्वरी और अमरकण्टक में चण्डिका। प्रभास-क्षेत्र में वे पुष्करावती हैं, समुद्र-तट पर पारावारा, द्वारका में रुक्मिणी, वृन्दावन में राधा और मथुरा में देवकी। जालन्धर पर्वत पर वे विश्वमुखी हैं, किष्किन्धा पर तारा, काश्मीर-मण्डल में मेधा और हिमाद्रि पर भीमा। इसी प्रकार देवलोक में इन्द्राणी, ब्रह्मा के मुखों में सरस्वती, सूर्य के बिम्ब में प्रभा, मातृकाओं में वैष्णवी, सतियों में अरुन्धती, अप्सराओं में तिलोत्तमा और सभी शरीरधारियों के चित्त में ब्रह्मकला के रूप में वही एक भगवती व्याप्त हैं।

व्यास जी ने बताया कि ये एक सौ आठ सिद्धपीठ हैं और उतनी ही परमेश्वरी देवियाँ। इनमें कुछ तो साक्षात् सती के अंगों से सम्बन्धित पीठ हैं, और कुछ पृथ्वी के अन्य प्रमुख स्थान, जिनका वर्णन प्रसंगवश कर दिया गया। जो मनुष्य इन एक सौ आठ उत्तम नामों का स्मरण अथवा श्रवण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवती के परम धाम में पहुँच जाता है। विधानपूर्वक इन तीर्थों की यात्रा करके, पितरों का श्राद्ध करके भगवती की विशिष्ट पूजा करनी चाहिए और जगदम्बा से बार-बार क्षमा माँगनी चाहिए। उन क्षेत्रों में रहनेवाले चाण्डाल आदि भी देवी-रूप कहे गए हैं, अतः वहाँ किसी से दान-ग्रहण नहीं करना चाहिए। जो प्रसन्न मन से इन सिद्धपीठों की यात्रा करता है, उसके पितर सहस्र कल्पों तक ब्रह्मलोक में निवास करते हैं, और अन्त में वह स्वयं परम ज्ञान पाकर संसार-सागर से मुक्त हो जाता है।

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)