कैलास पर वे दिन बड़े सुहावने थे। शिव और पार्वती अपने दोनों पुत्रों की बाल-लीला निहारते और प्रेम में मग्न हो जाते। एक ओर छह मुख वाले कार्तिकेय, जिन्हें कोई षडानन कहता तो कोई स्कन्द; दूसरी ओर गजमुख गणेश, जिनकी बुद्धि का कोई पार न था। दोनों बालक भक्ति भरे मन से माता-पिता की सेवा में लगे रहते, और उन्हें देख-देखकर शिव-पार्वती का स्नेह शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भाँति दिन पर दिन बढ़ता चला जाता। नारद के पूछने पर यही प्रसंग ब्रह्माजी ने कह सुनाया था।
दो पुत्र, एक होड़
एक समय शिव और शिवा एकान्त में बैठे और आपस में विचार करने लगे। हमारे ये दोनों पुत्र अब विवाह के योग्य हो गए, अब इनका शुभ विवाह किस भाँति सम्पन्न हो? हमें जितना षडानन प्रिय है, उतना ही गणेश भी। इसी सोच में डूबे वे लीलावश आनन्दमय हो रहे।
माता-पिता के मन की बात दोनों पुत्रों ने भी ताड़ ली, और उनके भीतर भी विवाह की उमंग जाग उठी। फिर तो दोनों में होड़ लग गई। पहले हमारा विवाह हो, एक कहता; नहीं, पहले हमारा, दूसरा कहता। जगत के स्वामी वे दम्पति अपने पुत्रों की यह बात सुनकर विस्मय में पड़ गए, और लौकिक रीति का सहारा लेकर उन्होंने दोनों को पास बुलाया।
कुछ लोग इस कथा में एक फल की होड़ जोड़ते हैं, पर शिवपुराण में फल कहीं नहीं आता; होड़ केवल इसी बात की है कि विवाह पहले किसका हो।
शिव-पार्वती बोले, सुनिए प्यारे पुत्रो। हमने पहले से ही एक नियम बना रखा है, जो आप दोनों के लिए सुखदायक होगा। आप दोनों हमें समान प्रिय हैं, किसी पर विशेष प्रेम नहीं; इसलिए विवाह के विषय में हमने एक शर्त रखी है। जो सारी पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौट आएगा, उसी का विवाह पहले किया जाएगा।
शर्त: पृथ्वी की परिक्रमा
यह सुनते ही शरजन्मा महाबली कार्तिकेय तुरन्त अपने स्थान से उठे और पृथ्वी की परिक्रमा को चल पड़े। परन्तु अगाध बुद्धि वाले गणेश वहीं खड़े रह गए। वे मन ही मन सोचने लगे, अब हम क्या करें, कहाँ जाएँ? परिक्रमा तो हमसे होगी नहीं। एक कोस चलने के बाद आगे पैर ही न बढ़ेंगे। फिर सारी पृथ्वी घूमकर हम सुख कैसे पाएँगे?
ऐसा विचारकर गणेश ने जो किया, वह सुनिए। वे घर लौटे, विधिपूर्वक स्नान किया, और माता-पिता से बोले, पिताजी, माताजी! मैंने आपकी पूजा के लिए यहाँ दो आसन रख दिए हैं। आप दोनों इन पर विराजिए और हमारा मनोरथ पूरा कीजिए।
गणेश की बात सुनकर पार्वती और परमेश्वर पूजा ग्रहण करने आसन पर विराज गए। गणेश ने विधिपूर्वक उनकी पूजा की, बार-बार प्रणाम किया, और सात बार उनकी परिक्रमा की। फिर हाथ जोड़कर, प्रेम में डूबकर, बुद्धि के सागर गणेश ने माता-पिता की स्तुति करते हुए कहा, हे माता, हे पिता! अब हमारी उत्तम बात सुनिए और शीघ्र ही हमारा शुभ विवाह कर दीजिए।
माता-पिता ही तीर्थ हैं
माता-पिता ने लीला करते हुए उत्तर दिया, पुत्र! पहले आप भी इस सारी पृथ्वी की, इसके वनों सहित, परिक्रमा कर आइए। कुमार तो निकल ही चुके; आप जाइए और उनसे पहले लौट आइए, तब आपका विवाह पहले कर दिया जाएगा।
नियम के पक्के गणेश यह सुनकर तनिक रोष में बोल उठे, हे माता, हे पिता! आप दोनों सर्वश्रेष्ठ हैं, धर्म के स्वरूप हैं, महाबुद्धिमान हैं; इसलिए धर्म के अनुसार हमारी बात सुनिए। हमने तो सात बार पृथ्वी की परिक्रमा कर ली, फिर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?
शिव-पार्वती फिर लीला की चाल चलकर बोले, पुत्र! समुद्र तक फैली, बड़े-बड़े वनों से भरी, सात द्वीपों वाली इस विशाल पृथ्वी की परिक्रमा आपने कब कर ली?
तब महाबुद्धि गणेश ने कहा, माता और पिता! हमने अपनी बुद्धि से आप दोनों की, शिव और पार्वती की, पूजा करके परिक्रमा कर ली, इसी से समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी की हमारी परिक्रमा पूरी हो गई। धर्म के मूर्तरूप वेदों और शास्त्रों में जो वचन मिलते हैं, वे सत्य हैं या असत्य? वे कहते हैं कि जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी परिक्रमा करता है, उसे सारी पृथ्वी घूमने का फल मिल जाता है। और जो माता-पिता को छोड़कर तीर्थयात्रा को निकल जाता है, वह पाप का भागी होता है, क्योंकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण-कमल ही सबसे बड़ा तीर्थ हैं। अन्य तीर्थ तो दूर जाकर मिलते हैं, पर धर्म का साक्षात रूप तो यहीं है। यदि यह वचन झूठा ठहरे, तो वेद भी झूठे ठहरेंगे, और वेदों में वर्णित आपका स्वरूप भी झूठा समझा जाएगा। इसलिए या तो शीघ्र हमारा विवाह कर दीजिए, या कह दीजिए कि वेद-शास्त्र झूठे हैं। आप दोनों धर्मरूप हैं; भली-भाँति विचार करके जो सर्वोत्तम लगे, वही कीजिए।
इतना कहकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ गणेश चुप हो गए। जगत के स्वामी शिव-पार्वती अपने पुत्र के वचन सुनकर विस्मित रह गए, और उसकी सच्चाई तथा अद्भुत बुद्धि की प्रशंसा करते हुए बोले, पुत्र! आप महान आत्मबल से सम्पन्न हैं, इसी से आप में यह निर्मल बुद्धि उपजी है। आपकी बात बिलकुल सत्य है। संकट के समय जिसकी बुद्धि जाग उठती है, उसका दुःख वैसे ही मिट जाता है जैसे सूर्य के उदय होते ही अन्धकार। जिसके पास बुद्धि है, वही बलवान है; बुद्धिहीन के पास बल कहाँ? वेद, शास्त्र और पुराणों में बालक के लिए जो धर्म कहा गया है, वह सब आपने पूरा कर दिखाया। जो आपने किया, वह और कौन कर सकता है? हमने आपकी बात मान ली; अब इसके विरुद्ध कुछ न करेंगे।
सिद्धि और बुद्धि
यों कहकर उन्होंने बुद्धि-सागर गणेश को सान्त्वना दी और उनके विवाह का विचार करने लगे। उधर प्रसन्न बुद्धि वाले प्रजापति विश्वरूप को जब शिवजी के इस उद्योग का पता चला, तो विचार करके उन्हें बड़ा सुख हुआ। उनकी दो परम सुन्दरी कन्याएँ थीं, नाम था सिद्धि और बुद्धि। शंकर और गिरिजा ने उन दोनों कन्याओं के साथ गणेश का विवाह निश्चित किया। पार्वती के मनोरथ के अनुसार विश्वकर्मा ने वह विवाह सम्पन्न कराया। उसे देखकर ऋषियों और देवताओं को परम हर्ष हुआ, और दोनों पत्नियों को पाकर गणेश को जो सुख मिला, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
कुछ काल बाद गणेश के इन दोनों पत्नियों से दो दिव्य पुत्र हुए। सिद्धि के गर्भ से जिसने जन्म लिया, उसका नाम क्षेम रखा गया; और बुद्धि के गर्भ से जो परम सुन्दर पुत्र आया, वह लाभ कहलाया। इस प्रकार गणेश अचिन्त्य सुख भोगते हुए अपने घर में बस गए।
क्रौंच पर्वत और मल्लिकार्जुन
इसी बीच दूसरे पुत्र स्वामिकार्तिक पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करके लौटे। उसी समय नारद ने आकर उन्हें सारा समाचार सुना दिया। सुनते ही कुमार के मन में बड़ा क्षोभ हुआ। माता-पिता शिव और पार्वती ने बहुत रोका, पर वे रुके नहीं, और क्रौंच पर्वत की ओर चल दिए।
उसी दिन से शिव-पुत्र स्वामिकार्तिक का कुमारत्व तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गया। उनका यह रूप शुभ देने वाला, सब पापों को हरने वाला और उत्तम ब्रह्मचर्य की शक्ति देने वाला है। कार्तिक की पूर्णिमा को देवता, ऋषि, तीर्थ और मुनि सदा कुमार के दर्शन को क्रौंच पर्वत पर जाते हैं। जो मनुष्य कार्तिक पूर्णिमा के दिन कृत्तिका नक्षत्र के योग में स्वामिकार्तिक के दर्शन करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और मनवांछित फल मिलता है।
उधर स्कन्द के बिछोह से उमा को बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने दीन होकर अपने स्वामी से कहा, प्रभो! हमें भी साथ लेकर वहाँ चलिए। तब प्रिया को सुख देने के लिए स्वयं शंकर एक अंश से उस पर्वत पर पधारे और सुखदायक मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में वहाँ प्रतिष्ठित हो गए। वे सत्पुरुषों की गति हैं और अपने भक्तों के सब मनोरथ पूरे करते हैं; आज भी शिवा के साथ उसी पर्वत पर विराजते हैं।
पुत्र-स्नेह से विवश वे दोनों, शिव और पार्वती, हर पर्व पर कुमार को देखने जाते हैं। अमावस्या के दिन स्वयं शम्भु वहाँ पधारते हैं और पूर्णिमा के दिन पार्वती जाती हैं।
स्वामिकार्तिक और गणेश का यह चरित्र जो पढ़ता या पढ़ाता, सुनता या सुनाता है, उसके सब मनोरथ सफल हो जाते हैं। यह अनुपम आख्यान पापों को नष्ट करने वाला, कीर्ति और सुख बढ़ाने वाला, आयु देने वाला, पुत्र-पौत्र की वृद्धि करने वाला, शिव-पार्वती में प्रेम उपजाने वाला और शिव-भक्ति बढ़ाने वाला है। मोक्ष चाहने वाले और निष्काम भक्त सदा इसे सुनें।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (कुमार खण्ड)